शनिवार, 17 दिसंबर 2011

वातायन-दिसम्बर,२०११



हम और हमारा समय

रवीन्द्र नाथ टैगोर, शांतिनिकेतन और रोज़ा हजनोशी गेरमानूस की डायरी



रूपसिंह चन्देल

पिछले दिनों हंगरी की एक गृहणी की डायरी ’अग्निपर्व: शांतिनिकेतन’ पढ़ने का अवसर मिला, जिसका हिन्दी अनुवाद कार्तिक चन्द्र दत्त ने किया है. गेरमानूस अप्रैल १९२९ से १९३१ तक शांतिनिकेतन में रही थीं और मार्च,१९३२ के अंत में बुडापेस्ट वापस लौट गई थीं. हंगरी में यह ’बेंगाली तूज़’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, जिसका अंग्रेजी अनुवाद ’ फा़यर ऑफ बेंगाल’ के नाम से हुआ था. हंगरी में इसका प्रकाशन १९४४ में हुआ था. पुस्तक के प्रकाशन से दो वर्ष पहले लेखिका ने आत्महत्या कर ली थी. कारण आज तक अज्ञात हैं.

इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि १९४४ से १९७२ के मध्य इसकी १० लाख प्रतियां बिक चुकी थीं. १९४५ से १९५६ तक हंगरी रूस के अधीन रहा और उस दौरान इसका प्रकाशन बंद रहा था. आश्चर्य यह कि इसका अंग्रेजी अनुवाद बहुत बाद में प्रकाशित हुआ और वह भी बांग्ला देश में. सोचा जा सकता है कि इस पुस्तक में ऎसा क्या आपत्तिजनक था कि इसका अंग्रेजी अनुवाद ब्रिटेन के किसी प्रकाशक ने नहीं प्रकाअशित किया या उन्हें प्रकाशित करने से रोका गया. भारत में पहली बार कार्तिक चन्द्र दत्त ने इसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करवाया. आश्चर्य यह भी कि बांग्ला में इसका आज तक अनुवाद नहीं हुआ.

यद्यपि इसे एक डायरी कहा गया है और लिखा भी उसी रूप में गया है, लेकिन इसकी शैली औपान्यासिक है. यह अपने समय का एक जीवन्त दस्तावेज है, जो रवीन्द्र नाथ टैगोर, अमिय चक्रवर्ती, गांधी जी सहित अनेक विशिष्ट लोगों पर विस्तार से प्रकाश डालती है. लेखिका के पति ज्य़ुला के अनुसार गेरमानुस दैनिन्दिन अपनी डायरी लिखती थीं, जिसे सुव्यवस्तित रूप से पुस्तक का रूप उन्होंने १९३२ में हंगरी वापस लौटने के बाद दिया था. ज्य़ुला अरबी-फारसी के विद्वान थे और शांतिनिकेतन में तीन वर्षों के लिए उन्हें टैगोर ने ये भाषाएं पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था.

यह डायरी टैगोर के जीवन के एक ऎसे पहलू से परिचित करवाती है जिसके विषय में हम कम ही जानते हैं. अमिय चक्रवर्ती भी वहां प्राध्यापक थे. उनकी शिक्षा पश्चिम में हुई थी और वह पूरी तरह उस सभ्यता से प्रभावित थे. भारत आने से पहले उन्होंने एक स्वीडिश लड़की से विवाह किया था, जिसका हिन्दू रीति-रिवाज से पुनः विधिवत विवाह शांतिनिकेतन में टैगोर ने करवाया था. टैगोर ने उस स्वीडिश युवती को नाम दिया था हेमन्ती. हेमन्ती ने न केवल हिन्दू धर्म स्वीकार किया बल्कि वह हिन्दू संस्कृति में यों रमी कि पश्चिम को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी. साड़ी उसका परिधान हो गया और पूरी तरह से वह भारतीयता में रंग गयी. लेकिन पश्चिम के रंग में रंगे अमिय को पत्नी का वह रुप स्वीकार नहीं था. लेकिन हेमन्ती ने इसकी परवाह नहीं की और वह अमिय की उपेक्षा करती हुई महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में कूद गयी. वह साबरती आश्रम गयी और गिरफ्तार होकर पूना में महीनों जेल में रही. उससे प्रभावित शांतिनिकेतन के कितने ही छात्र-छात्राएं असहयोग आंदोलन में कूद पड़े. टैगोर को जब यह ज्ञात हुआ तब उन्होंने अमिय को डांटते हुए कहा – “तुमने अपनी पत्नी पर अंकुश नहीं रखा…उसे दबाया नहीं…उसीका परिणाम है कि वह साबरमती जा पहुंची”. यही नहीं शांति निकेतन के जो छात्र-छात्राएं गांधी जी के समर्थक थे टैगोर ने उन्हें शांतिनिकेतन छोड़ने के आदेश दिए. दो अंग्रेज अध्यापक भी गांधी जी के समर्थक थे, उन्हें भी शांतिनिकेतन छोड़ना पड़ा था. टैगोर की दृष्टि में गांधी जी का आंदोलन अर्थहीन था. संक्षेप में ---पुस्तक के अनुसार टैगोर गांधी के विरुद्ध दिखाई देते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा राष्ट्रगान जार्ज पंचम के स्वागत के लिए लिखा गया था. तो क्या टैगोर अंग्रेजपरस्त थे? जब वह अमिय को हेमन्ती पर अंकुश न लगाने और उसे दबाकर न रख पाने की बात करते हैं तब वह भारतीय नारी के विषय में पुरुष के पारम्परिक सोच को पोषित करते दिखते हैं, लेकिन दूसरी ओर वह शांतिनिकेतन में लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रेरित करते हुए भी दिखते हैं. यह कैसा विरोधाभास था? अनुवादक के अनुसार ऎसी ही कितनी ही बातों और अमिय चक्रवर्ती के विरोध के चलते (अमिय के जर्मन युवती रुडिगर गेरट्रुड के साथ संबन्ध बन गए थे और उसके साथ उन्होंने शांतिनिकेतन छोड़ दिया था) इस पुस्तक का प्रकाशन लंबे समय तक भारत में नहीं हो सका….शायद अंग्रेजी में बांग्लादेश जैसे छोटे–से देश से होने के पीछे भी यही कथा रही हो.

लेखिका ने भारतीय अंधविश्वासों और गंदगी का जो वर्णन किया है वह आज भी उतना ही सच है, लेकिन उसने यहां के लोक जीवन की प्रशंसा में भी पृष्ठ दर-पृष्ठ रंगे हैं---विशेषरूप से आदिवासियों के जीवन ने उसे बहुत अधिक प्रभावित किया था. इतिहास पर जिस अधिकार के साथ वह बात करती हैं उतने ही अधिकारपूर्वक वह आध्यात्म और दर्शन पर चर्चा करती हैं.

६२० पृष्ठों की इस पुस्तक को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित कर एक स्तुत्य कार्य किया है.
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वातायन में इस बार प्रस्तुत है सुभाष नीरव द्वारा प्रस्तुत ’दिल्ली संवाद’ की ओर से आयोजित संगोष्ठी की रपट और मेरे द्वारा अनूदित संस्मरण पुस्तक –लियो तोलस्तोय का अंतरंग संसार’ का प्राक्कथन. पुस्तक शीघ्र ही संवाद प्रकाशन मेरठ से प्रकाश्य है.
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5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया..अब इन्तजाम करना होगा इस पुस्तक का.

ashok andrey ने कहा…

priya chandel Tagor JEE KA YEH ROOP TO meri kalpanaa se pare thaa yeh to pataa tha ki hamaraa rashtr gaan Jorj v ke agman par Rabindra Nath Tagor jee ke dawaara likhaa gaya thaa.lekin is dayri se rubru hokar ajeeb sa mehsoos kar rahaa hoon jo ki kalpna se pare thaa.haan is pustak ka to intjaar karna padega.ise padvane ke liye tumhaara aabhar vaykt kartaa hoo

सुभाष नीरव ने कहा…

यार चन्देल यह तुमने क्या जानकारी दे दी? क्या टैगोर गांधी जी के आन्दोलन के विरूद्ध थे? क्या वह स्त्रियों का इस आन्दोलन में हिस्सा लेना पसन्द नहीं करते थे जबकि वह शान्तिनिकेतन में स्त्रियों की शिक्षा का समर्थन करते थे। ये दोनों बातें विरोधाभास उत्पन्न करती हैं। सच्चाई क्या है? इस पुस्तक में जो लिखा है, क्या उसे सच मान लिया जाए? क्या ही अच्छा हो तुम इस पुस्सक के कुछ अंश धारावाहिक अपने ब्लॉग में अन्तर्जाल के पाठ्कों के समक्ष भी रखो…

बेनामी ने कहा…

रोजा की डायरी के अंश पढ़ कर टैगोर के सम्बन्ध में अपनी जानकारी पर हर शख्स शक करने लगेगा |
इस किताब को पढ़ना होगा ...
इला

PRAN SHARMA ने कहा…

KUCHH NAYEE BAATEN MAALOOM HUEE HAIN.AESEE NAYEE BAATON KEE TAH
MEIN JAANAA AWASHYAK HAI .