शनिवार, 13 जुलाई 2019

वातायन-जुलाई,२०१९









कहानी
बस अब अंत

रूपसिंह चन्देल

दोनों देर से उठे. आठ बजे से पहले दोनों नहीं उठते. आते ही हैं रात ग्यारह बजे ऑफिस से. खाना वहीं  खा लेते हैं. बहु-राष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले अधिकांश की दिनचर्या यही है. बारह बजे ऑफिस पहुंचना और देर रात घर लौटना और देर से सोना. उठते ही कांचना किचन में जा पहुंचती है अपने और पुनीत के लिए चाय बनाने. उनसे नहीं पूछती. प्रारंभ में, जब ब्याहकर आयी थी, एक-दो बार पूछा था, और उन्होंने मना कर दिया था.  क्योंकि वह सात बजे तक अपने लिए ग्रीन टी बनाकर पी चुके होते थे. लेकिन कभी-कभी कांचना को चाय बनाता देख उनका मन करता कि उसे अपने लिए भी बनाने के लिए कहें, लेकिन चुप रहते यह सोचकर कि वह यह न कह दे कि “पापा इतनी जल्दी दूसरी चाय---? आप अपनी ग्रीन टी तो पी चुके हैं!” एक बार उन्होंने बेटे से कहा था कि वह कांचना को उनके लिए भी बनाने के लिए कह दे तब यही उत्तर उसने दिया था. 

सुबह चार बजे उठ जाने की उनकी आदत बहुत पुरानी है---युवा अवस्था से ही. हालांकि दोनों के ऑफिस से लौटने तक वह जागते रहते हैं. पत्नी थी तब वह जागती उनके लिए दरवाजा खोलने के लिए, लेकिन एक साल पहले उसके न रहने पर यह जिम्मेदारी उन पर आ पड़ी थी. जबकि सुबह जल्दी जागने के लिए पत्नी के रहते वह ठीक दस बजे बिस्तर पर चले जाते थे. चार बजे उठकर साढ़े चार बजे  सैर के लिए निकल जाया करते थे. सैर के बाद पार्क में कुछ समय बिताकर वह छः बजे घर लौटते. उनके लौटने के समय पत्नी जागती. कई बार उन्होंने उसे सलाह दी थी कि वह भी सुबह जल्दी उठ लिया करे और सैर के लिए जाया करे, लेकिन उसके पास एक ही बहाना था कि बेटा-बहू दफ्तर से देर से आते हैं और इसलिए वह देर से जागती है. वह नहीं जा सकती. उन्होंने समझाया था कि बढ़ती उम्र में बीमारियां जल्दी पकड़ती हैं. लेकिन वह अपनी बात पर अडिग रही थी. जब बेटा और बेटी छोटे थे उसके पास उनके स्कूल की तैयारी करने, उन्हें स्कूल भेजने और उनके दफ्तर जाने से पहले नाश्ता और लंच तैयार करने का बहाना था. वह कहते कि वह दिन में कुछ देर की झपकी ले लिया करे, और वह लेती, लेकिन उसने  सुबह की सैर या योग में कभी रुचि नहीं ली. और न केवल शुगर की मरीज बनी थायोराइड भी उसे जबर्दस्त हुआ और कई सालों तक बीमारी झेलते एक साल पहले---. लेकिन उसकी मृत्यु से पहले वह बेटी का विवाह कर चुके थे. अपनी बीमारी भूल अनीता बेटी के हाथ पीले करने की चिन्ता में डूबी रहती थी और उसीने निर्णय दिया था कि बड़ा होते हुए भी बेटी के विवाह के बाद ही बेटे की शादी करेगी वह और ऎसा ही हुआ. पुनीत के शादी के दूसरे माह ही उसने उनका साथ छोड़ दिया था. 

उस दिन सुबह की सैर से लौटने के बाद ग्रीन टी पीते हुए वह देर तक अनीता के विषय में सोचते रहे थे. उसके रहते वह कितना निश्चिंत थे. बच्चों से लेकर उनकी हर सुख-सुविधा की जिम्मेदारी उसने अपने सिर ले रखी थी. कहीं घूमने जाने के विषय में उसने एक-दो बार ही कहा और जब उन्होंने उसे समझाया कि बच्चों की जिम्मेदारी से मुक्त होकर और नौकरी से अवकाश लेने के बाद वह देशाटन ही करेंगे. उसने हंसकर कहा था, “बीमारी इतनी फुर्सत देगी तब न---!” और वह अंदर तक हिल उठे थे. 

शादी से पहले बेटा और बेटी दोनों ही नौकरी में आ गए थे---दोनों ही बहु राष्ट्रीय कंपनियों में. वह प्रसन्न थी. यह उसीकी इच्छा थी कि बहू भी नौकरीवाली लाएगी . “पढ़-लिखकर भी मैं कुछ नहीं कर सकी. घर से बंधी रही---.” अपनी इच्छा बेटी में तो पूरी देख ही रही थी, बहू में भी देखना चाहती थी.

अनीता को नौकरी न कर पाने का पश्चाताप था.  ऎसे समय वह उसे यह समझाकर सांत्वना देते कि उसके कारण ही बेटी और पुनीत आज उच्च शिक्षा पाकर ऊंचे पदों पर बड़ी कंपनियों में काम कर रहे हैं. जब वह नौकरीपेशा बहू लाने की बात करती तब वह सोच में पड़ जाते. तब वह कहती, “पुनीत के पापा, समय बदल गया है---मंहगाई और शौक---आज जब दोनों कमाएगें तभी समाज में सही जीवन जी सकेंगे.”

“लेकिन संतानों को कैसे संभालेंगे?” वह चिन्ता व्यक्त करते.

“बहुत-सी कंपनियों ने यह सुविधा दे रखी है. पुनीत के ऑफिस की ओर से क्रेच की सुविधा है---वहीं ऑफिस बिल्डिंग में. और सौ बात की एक बात मेरा समय और था. आज कोई भी पढ़ी-लिखी लड़की घर बैठना पसंद नहीं करेगी. और बैठे भी क्यों? पढ़ाई की है तो उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के अवसर मिलने ही चाहिए. “
वह चुप रह जाते थे अनीता के तर्कों के सामने. लेकिन उसके जाने के बाद वह खोए से रहने लगे थे. पुनीत और कांचना एक-दो वाक्यों से अधिक उनसे बातें नहीं करते थे. सुबह जाते तब ’पापा जी, दरवाजा बंद कर लें’ और आते तब बेटा हर दिन  पूछता ,”अरे आप अभी तक सोए नहीं?” और वह चुप रह सोचते, ’कैसा मूर्खतापूर्ण प्रश्न. मैं सो जाता तब दरवाजा कौन खोलता और इसे पता है कि उन दोनों के आने की चिन्ता में वह सो भी नहीं सकते. आखिर पैंतालीस किलोमीटर की दूरी तय करके आते हैं वे गुरुग्राम से---दिल्ली की सड़कें--रात का समय---बेलगाम ट्रैफिक---उनकी जान उन दोनों पर अटकी रहती है.’ 

पहले इस दुश्चिन्ता को अनीता झेलती थी. अब वह. 

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वह बेटा और बहू की व्यस्तता समझते थे.  लेकिन विचित्र तब लगता जब शनिवार और रविवार वे दोनों दस बजे के लगभग सोकर उठते. सुबह दस बजे तक उन्हें नाश्ता चाहिए होता. अनीता नौ बजे नाश्ता डायनिंग मेज पर लगा दिया करती थी. जब वह नौकरी में थे तब और उसके बाद भी. लेकिन उसके जाने के बाद उन्हें अपने को बदलना पड़ा था. अब वह बेटा-बहू के दस बजे ऑफिस के लिए निकलने के बाद नाश्ता करते थे. कांचना उनके लिए नाश्ता और लंच बना देती. अपने और पति के लिए नाश्ता निकालकर अपने कमरे में चली जाती लेकिन न उनके लिए नाश्ता निकालकर डाइनिंग मेज पर रखती, जबकि सास को वैसा करते उसने देखा हुआ था, और न ही उन्हें नाश्ता करने के लिए कहती. दोनों के ऑफिस जाने के बाद दरवाजा बंद करके वह स्वयं नाश्ता निकालते और अपने लिए दूसरी चाय बनाते. शाम के भोजन के लिए दोनों ने मेड लगा देने के लिए पूछा था, लेकिन उन्होंने मना करते हुए कहा था, “तुम दोनों चिन्ता न करो. मैं खुद कुछ कर लिया करूंगा. और वह कभी दलिया तो कभी खिचड़ी पका लेने लगे थे. मेड सुबह नौ बजे आती थी बर्तन मांजने और झाड़ू-पोचा करने के लिए. 

वह अधिक से अधिक अपने को पढ़ने में खपाने लगे थे. दिन में कुछ समय के लिए टी.वी. देख लेते थे. सोसाइटी में किसी से परिचय नहीं बना पाए थे. यह स्वभाव ही नहीं था उनका. वास्तव में लोग जिस प्रकार की दुनियादारी की बातें करते वह उन्हें पसंद नहीं था. अधिकांश सरकारी कर्मचारी थे सोसाइटी में. सोसाइटी ही थी केन्द्रीय कर्मचारियों की. उन्होंने भी आवेदन किया और उन्हें भी नोएडा की उस सोसाइटी में एम.आई.जी. फ्लैट मिल गया था. सरकारी कर्मचारियों के पास दो ही विषय होते बातचीत के---मंहगाई भत्ता और राजनीति पर चर्चा. उनकी तरह अवकाश प्राप्त लोगों के पास एक और विषय होता---भारत सरकार द्वारा स्वास्थ्य के विषय में जारी किए गए आदेश---जो समय समय पर भारत सरकार जारी करती रहती है.  नौकरी में थे तब भी बाबुओं को इन्हीं सब बातों में गर्क देखते थे और हर दिन वही बातें सुनकर वह ऊब अनुभव करते और इसीलिए सोसाइटी में शिफ्ट होने के बाद भी उन्होंने किसी से जान-पहचान नहीं बनायी.

’पुस्तकों से अच्छा कोई मित्र नहीं’ वह सोचते, लेकिन कहीं कुछ ऎसा था जो दरक रहा था. कुछ था जो उन्हें उन पुस्तकों के अलावा परेशान करता.  एक इंसान कब तक मुंह बंद करके रह सकता है. सप्ताह के पांच दिनों में बेटा-बहू की ओर से संवाद के हर दिन केवल दो वाक्य और अवकाश के दिनों में भी कोई संवाद नहीं. उन दिनों तो दरवाजा बंद करने और खोलने की भी बात नहीं थी तो वे दो वाक्य सुनने के लिए उन्हें सोमवार का इंतजार करना होता. उन दिनों वह शाम को छः बजे के लगभग पार्क में चले जाते थे जहां बच्चों को खेलते देखते रहते. कभी पुनीत और बेटी को भी वह हर शनिवार और रविवार सुबह और शाम पार्क में ले जाया करते थे और उनके साथ बैडमिंटन खेला करते थे. कभी गेंद उछालते और तीनों उसे पकड़ने के लिए दौड़ा करते थे. अब वह सोसाइटी के बच्चों को खेलता देख उन दिनों को पुनः जीने का प्रयास करते. यादें---बहुत-सी यादें. गर्मी की छुट्टियों में वह दोनों बच्चों को पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने बनी दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी  ले जाते थे. बेटा आठवीं कर चुका और बेटी छठवीं जब वह पहली बार दोनों को लेकर गए थे. दोनों को पुस्तकालय की सदस्यता भी दिला दी थी उन्होंने. दोनों वहां के बाल विभाग में घण्टों व्यतीत करते. वह बड़ों के सेक्शन में अपनी मन पसंद पुस्तकें खोज लेते और बच्चों के चलने के लिए कहने तक पढ़ते और तीनों अपने लिए पुस्तकें इश्यू करवाकर लौटते.  चार-पांच बार बच्चों के साथ वह गए थे. उसके बाद दोनों स्वयं जाने लगे थे. 

दिल्ली का किराए का मकान छोड़ जब वह सोसाइटी के मकान में नोएडा गए दिल्ली पब्लिक पुस्तकालय की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी. जब तक नौकरी में रहे केन्द्रीय सचिवालय पुस्तकालय के सदस्य रहे  और अब पुस्तकें खरीदनी पड़तीं. खरीदते पहले भी थे, लेकिन अब अधिक संख्या में खरीदते. जब तक पढ़ते सब भूले रहते, लेकिन कितना पढ़ सकते थे---दो घण्टे—चार घण्टे. उसके बाद---खाली समय खाने को दौड़ता. ’इंसान संवाद के बिना कब तक रह सकता है” वह प्रायः सोचने लगे थे. ’विकल्प क्या है?’ एक दिन उन्होंने सोचा था. ’विकल्प है.  मोहमुक्त होने और साहस दिखाने की आवश्यकता है.’ अंदर से आवाज उठी थी.
’तुम कभी मोह-मुक्त नहीं हो पाओगे. तुम्हारी तरह कितने ही हैं जो ऎसे ही जीने के लिए अभिशप्त हैं.’ दूसरी
आवाज थी. 

’बहुत से लोग हैं जिन्होंने ऎसी स्थितियों में आशियाना खोज लिया है. मुझे ठीक-ठाक पेंशन मिलती है. तुम चिन्ता न करो.’ 

’ओह!’ और उसदिन के बाद से वह निरंतर उसी विषय में सोचने लगे थे. 

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और आज. 

पुनीत कंधे पर बैग लटकाए हाथ में नाश्ते की प्लेट थामे डायनिंग रूम में आया. उसके आने के पांच-सात मिनट पहले ही अमेरिका से उनके एक मित्र का फोन आया था. वह मोबाइल पर उनसे बातों में मशगूल थे. पुनीत डायनिंग रूम  में,जो ड्राइंग रूम से सटा हुआ है, डाइनिंग मेज के इर्द-गिर्द उत्तेजित-सा चक्कर काटने लगा था. उन्होंने एक बार उसकी ओर देखा और बातों में व्यस्त हो गए थे. पुनीत प्लेट थामे हुए ही अपने कमरे की ओर गया पैर पटकता हुआ. उन्होंने उसे उधर जाते देखा और घड़ी की ओर देखा. दस बज चुके थे. पुनीत उसी प्रकार पैर पटकता किचन में गया और नाश्ता की प्लेट जोर से सिंक में पटकी और पैर पटकता फिर डायनिंग मेज के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा. बातें करते हुए उन्होंने पुनः एक नज़र बेटे पर डाली. उसके चेहरे पर तनाव था और चेहरा लाल हो रहा था. उन्होंने अस्पष्ट-सी फुंकारने की सी आवाज भी उसकी नाक से निकलती अनुभव की. लेकिन लगभग एक साल बाद वह मित्र से बातें कर रहे थे, जो बी.ए. में उनका सहपाठी रहा था और इनकम टैक्स विभाग से बड़े पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद न्यू जर्सी में अपने बेटा के पास रह रहा था. वह वहां की अपनी समस्याएं बता रहा था. उसकी समस्या उनसे भिन्न न थी और इसीलिए वह बातचीत में अधिक ही डूबे हुए थे. तभी उन्हें बेटे की चीखने की आवाज सुनाई दी थी.
“यह क्या ढंग है कि हमारे जाने के समय अक्सर आप फोन पर बातें करने लगते हैं”.

बेटे के चीखने की आवाज से वह सकते में आ गए . मशीनी गति से हाथ ने मोबाइल को कान से दूर किया लेकिन तब भी उन्होंने उधर से मित्र की आवाज सुन ली थी, “क्या हुआ? यह आवाज कैसी थी?” लेकिन उन्होंने झटके से फोन बंद कर दिया और अचकचाकर इसप्रकार उठ खड़े हुए मानो कोई अपराध करते हुए पकड़े गए थे. तभी अपने कमरे से परफ्यूम उड़ाती कंधे पर लैप-टॉप का बैग लटकाए और हाथ में लच बैग थामे कांचना प्रकट हुई और “क्यों चीख रहे थे?” पति से बोली, “सॉरी, आज दस मिनट लेट हो गए---कोई नहीं—“ और वह दरवाजे की ओर लपकी. पुनीत भी उनकी ओर बिना देखे और बिना ’दरवाजा बंद कर लें पापा जी’ कहे दरवाजा खोल बाहर गैलरी में निकल गया था.
वह देर तक उसी स्थिति में खड़े रहे थे. उनका दिमाग उड़ रहा था.


’बस अब अंत.’ उन्होंने दृढ़तापूर्वक सोचा और अपने कमरे की ओर बढ़ गए  अपना सामान समेटने के लिए.
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शनिवार, 12 अगस्त 2017

वातायन-अगस्त,२०१७



वरिष्ठ साहित्यकार प्राण शर्मा की लघुकथाएं
उपचार
        दौलत राम और देविका रानी का जवान बेटा  दिमागी बीमारी का शिकार हो गया था। उसके हाव - भाव विचित्र हो गए थे। सारा दिन उसकी आँखें ऊपर की ओर उठी रहती थीं। उसकी ऐसी शोचनीय हालत देख कर दौलत राम और देविका रानी विचलित हो गए थे। उनकी रातों की नींद उड़ गई थी। कुछ भी खाने को उनका जी नहीं करता था।  उन्होंने बेटे को शहर के प्रसिद्ध मनोचिकिस्तकों को दिखाया। पैसा पानी की तरह बहाया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। किसीने सुझाव दिया -
" दौलत राम जी , ऐसी मानसिक बीमारी कोई तांत्रिक ही दूर कर सकता है। मेरा भांजा तांत्रिक से ही स्वस्थ हुआ था। शहर के प्रसिद्ध तांत्रिक हैं -त्रिभुज जी। बेटे को ले कर उनके पास जाइये। अवश्य ही लाभ होगा। "
         दौलत राम  और देविका रानी तंत्र - मंत्र में विश्वास नहीं रखते हैं लेकिन मजबूरी के सामने उनका विश्वास डोल  गया। बेटे को ले कर उन्हें त्रिभुज जी के पास जाना ही पड़ा। सब कुछ देखने - परखने के बाद त्रिभुज जी बोले - " देखिये , आपके बेटे के शरीर में कोई भूत घुस गया है , उसे निकालना होगा। "
         " कैसे निकालेंगे ? " दौलत राम ने दुःखी स्वर में पूछा। 
         " आपके बेटे के शरीर को  मार - पीट कर। "
           सुनते ही दौलत राम और देविका रानी कांप  उठे। कांपते स्वर में ही दोनों ने पूछा - " स्वामी जी , कोई और उपाय नहीं है ? "
         " नहीं , कोई और उपाय नहीं है। देखिये , भूत बातों से नहीं लातों से भागते हैं। "
           दौलत राम और देविका रानी को त्रिभुज जी की बात के आगे झुकना पड़ा। जैसे - तैसे बेटा स्वस्थ होना चाहिए। 
           बेटे को एक गुप्त कमरे में ले जाया गया। भूत निकालने की विधि शुरु हो गयी।  बेटे को कभी थप्पड़ों - मुक्कों और कभी चाबुक से पीटा गया। चीखते - चीखते वह निढाल हो गया।  उसके निढाल शरीर से  आत्मा 
निकल गयी  लेकिन भूत नहीं निकला  . 
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रक्षक

           रतन  और अन्य लोग बार - बार  कलाई में बंधी  घड़ी देख रहे थे। कोई बस आती नज़र नहीं  आ रही थी।  " ये क्या  व्यवस्था है ? इस सरकार को अब जाना ही चाहिए। `` क़तार में  खड़े सभी लोग रोष प्रकट कर रहे थे। एक बस आती दिखायी दी , सबके चेहरे खिल गए लेकिन वो पास आते ही फुर्र से निकल गयी। एक और बस आयी , वो भी फुर्र से निकल गयी। लोगों का रोष और बढ़ गया।  एक बस आ कर रुकी। " दो ही सवारियाँ चाहिए। " कण्डक्टर ऊँचे स्वर में बोला।  लोगों में भगदड़ मच गयी। सभी बस पर चढ़ने को टूट पड़े।  रतन और उसके पीछे का व्यक्ति धक्कों के बीच बस पर चढ़ने ही लगे थे कि कहीं से दो सिपाही आ टपके। दोनों डंडों के ज़ोर से सबको धकेल कर बस पर चढ़ गए। 
            रतन और अन्य लोग विरोध में चिल्ला उठे " कण्डक्टर ,ये क्या माजरा है ?हम आधे घंटे से बस की प्रतीक्षा कर रहे हैं ,ये पुलिस वाले अभी आये और सवार हो गए। इन्हें उतारिये और हमें चढ़ाइये। "
            " इन्हें मैं उतार नहीं सकता। "
            " क्यों नहीं उतार सकते ?"
            " इन्हें ड्यूटी पर पहुँचना है। "
            " हमें भी ड्यूटी पर पहुँचना है। " लोगों की आवाज़ गूँजी। 
            " ये समाज की व्यवस्था के रक्षक हैं। "
            " हम क्या समाज की व्यवस्था के रक्षक नहीं हैं ? "
            " इनकी बात और है। "
              कण्डक्टर ने झट सीटी बजायी और बस  को आँखों से ओझल होते देर नहीं लगी। 
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मुराद

              घर में ख़बर फैलते ही सबके चेहरों पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी कि छोटी बहु पेट से है। चार सालों के बाद सबकी मुराद पूरी हुयी थी।  दादा जी तुरंत बेटे और बहु की जन्म पत्रियाँ लेकर नगर के प्रसिद्ध 
ज्योतिषाचार्य के पास पहुँच गए। 
               दादा जी के अलावा घर में आठ सदस्य हैं - दादी , दो बेटे ,दो बहुएँ ,दो बेटियाँ और बड़े बेटे का बेटा। सभी दादा जी की प्रतीक्षा कर रहे थे। बेटियाँ तो उतावली सी पाँच - पाँच मिनट के बाद बाहिर जा कर उनकी राह देख आती थीं। 
               दादा जी का  प्रवेश हुआ। उत्सुकता में सभी उनके पीछे पड़ गए " बताइये , ज्योतिष ने क्या कहा है ?"
               " बताता हूँ , पहले प्यास तो बुझा लूँ। "
               " प्यास बाद में बुझाइये , पहले बताइये। "
               " कन्या  यानि लक्ष्मी का योग है। "
               " उफ़ ! "
                 सबके चेहरे लटक गए। 
               " अरे , चेहरे क्यों लटकाते हो ? लड़के का योग है। "
               " सच ? "
               "  सच। "
               "  हुर्रे ! "
                  झूमते हुए सबने दादा जी को उठा लिया 
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मोह

                 दादा जी गुस्से वाले थे। दादी जी के स्वर्ग सिधारने के बाद उनके गुस्से में बढ़ोतरी हो गयी थी। उनके गुस्से का नज़ला मेरे बड़े भाई पर अधिक गिरता था। बड़े भाई की दिलचस्पी क्रिकेट खेलने में अधिक और पढ़ाई -लिखाई में कम थी। दादा जी चाहते थे कि हम दोनों  भाई भी उनकी तरह ख़ूब पढ़ -लिख जाएँ और खानदान का नाम रोशन करें। 
                 बड़े भाई की दसवीं की परीक्षा चल रही थी। गणित की परीक्षा के एक दिन पहले छुट्टी थी। वह सारा दिन क्रिकेट खेलता रहा था। सूरज के डूबने के बाद वह घर लौटा। उसे देखते ही दादा जी गरज उठे - " कहाँ था तू अब तक ? "
                 " क्रिकेट खेलने गया था। "
                 " सूरज के डूबने तक क्रिकेट खेलता रहा ? कल गणित की परीक्षा है , उसकी कोई चिंता है तुझे ? "
                   बड़ा भाई उत्तर नहीं दे पाया। 
                 " नालायक ; बेपरवाह , तू सुधरेगा नहीं। "
                    दादा जी की आँखें सुर्ख हो गयीं। उनके थप्पड़ बड़े भाई के दोनों गालों पर पड़ने शुरु हो गए। उसके मुँह से खून बहते देर नहीं लगी।  पहले दादा जी के सामने माँ की मुँह खोलने की हिम्मत नहीं होती थी लेकिन अब बेटे के मुँह से ख़ून बहता हुआ देख कर वह चुप नहीं रह सकी। गुस्से में वह भी बोल उठी - " इतना गुस्सा ! आपने तो बेटे को पीट - पीट कर लहूलुहान कर दिया है। "
                   " बहु , पीटूँगा नहीं तो ये सुधरेगा कैसे ,पढ़े-लिखेगा कैसे ? "
                   " आगे से  आप इस पर हाथ नहीं उठाएँगे , छोड़ दीजिये 
                      मेरे बेटे को। "
                   "  ले ,छोड़ दिया तेरे बेटे को , तेरा घर भी छोड़ रहा हूँ। मेरा यहाँ रहना अब मुनासिब नहीं। "
                     माँ  ने हाथ जोड़े , उनके पैरों पर पडी लेकिन दादा जी ने अपना सामान उठाया और घर चले गए। दादा जी का घर से चले जाना किसीको अच्छा नहीं लगा। सब पर उदासी छा गयी।  इस उम्र में वह ------------ माँ  अपने कहे पर बहुत पछतायी।  पापा ने दादा जी के सब मित्रों से पूछताछ की , शहर के हर होटल , हर धर्मशाला और वृद्धाश्रम में उनको ढूँढा लेकिन उनका कोई अता -पता नहीं मिला। 
                      एक दिन मैं घर के बाहिर खड़ा था। मुझे दादा जी आते हुए दिखायी दिए। खुशी में मैं झूम उठा। मैंने माँ को तुरंत आवाज़ दी - " माँ,बाहिर आइये , देखिये कौन आ रहा है ?"
                     " कौन आ रहा है ?" माँ ने भीतर से ज़ोर से पूछा। 
                     " आप ही आ कर देख लें। "
                        माँ भागी - भागी बाहिर आयी। दादा जी को आते हुए देख कर उसकी आँखें खुशी के आँसुओं से भर गयीं। 
                      पास आते ही दादा जी ने मुझे अपनी  बाँहों में भर लिया और मेरे सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरना शुरु कर दिया। 
                      माँ से मिलते  ही वह भीगी आँखों से बोले - " बहु , पोतों का मोह मुझे वापस खींच लाया है। "

आकांक्षा

आकांक्षा तीस साल की हो गयी थी। अब तक उसका विवाह हो जाना चाहिए था। वह रईस से रईस माँ - बाप के बेटे से विवाह करना चाहती थी। बात बन नहीं रही थी। लड़के भी रईस से रईस माँ - बाप की बेटी से विवाह करना चाहते थे। माँ की सभी कोशिशें बेकार हो जाती थीं और बेटी की  वर्षों से  पाली बड़े - बड़े देशों को देखने की आकांक्षा धरी की धरी रह जाती थी। किसीने एक रईस ` लड़का ` सुझाया। रूप - रंग गोरा - चिट्टा था उसका पर उम्र सत्तर साल की थी उसकी। आकांक्षा ने सुना तो बौखला उठी - " उफ़ ,इतनी बड़ीऔर  उम्र ! नहीं,मैं उस बूढ़े खूँसट  से कभी ब्याह नहीं करुँगी। "माँ ने बेटी को पास बिठाया और बड़े लाड़ -प्यार से  समझाया - " अरी , क्या हुआ जो वो सत्तर साल का है ,है तो रईस न। एकाध साल में वो लुढ़का ही समझ। सारी संपत्ति की तू  वारिस होगी। तब ऐश और आराम का जीवन बिताना और जहाँ भी चाहे आना - जाना। तू किसी रानी  से कम नहीं होगी। "आकांक्षा को माँ का सुझाव खजूर से भी ज़्यादा मीठा लगा। दूसरे दिन ही  अग्नि के सात फेरों के बाद वह बूढ़े खूँसट की अर्धांगनी बन गयी। 

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                   संतान की सफलता 

   सुमित्रा के जीवन की एक ही कामना थी कि उसकी इकलौती बेटी रमा बी ए में प्रथम आये। उसकी सफलता का समाचार अखबारों में मोटे - मोटे और हरे - गुलाबी अक्षरों में छपवायेगी,आसपास के सभी मोहल्लों में खोये के लड्डू बँटवायेगी भले ही उसके हज़ारों रुपये ख़र्च हो जाएँ. बेटी रमा ने कमरे की सीढ़ियों के नीचे से गुहार लगायी - " माँ , कहाँ है आप ?मैं पास हो गई हूँ। आपकी मुराद पूरी हो गई है , मैं प्रथम आई हूँ , प्रथम। "
माँ ने सुना तो वह खुशी से उछल पड़ी। सीढ़ियों के ऊपर से ही बोली - फिर से बोल , मैंने अच्छी तरह से सूना नहीं है। "
" माँ , मैं प्रथम आई हूँ। " बेटी की आवाज़ कमरे में गूँज उठी। 
" मेरी आत्मा को खुश कर दिया है तूने। बलिहारी जाऊँ तुझ पर। "
बेटी को गले लगाने के लिए माँ खुशी में पागल हो कर नीचे उतरी। एक सीढ़ी पर उसका दाहिना पाँव फिसल गया। धड़ाम से वह नीचे आ गिरी। उसके माथे से ज़रा - ज़रा ख़ून बहना शुरु हो गया। 
डॉक्टर को बुलाने के लिए बेटी फोन की ओर लपकी। 
माँ ने रोक लिया। बाँहें फैला कर बोली - " पहले मेरे गले  से तो लग जा। ऐसी खुशी रोज़ - रोज़ कहाँ आती है ? "
माँ - बेटी गलबइयाँ हो गयीं। दोनों की पलकों पर खुशी के मोटे - मोटे मोती 
चमक उठे थे। 
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साख

एक निर्माणाधीन फिल्म को और रोमांचित बनाने के लिए निर्माता और निर्देशक को एक पहलवान की ज़रूरत पड़ गयी थी। यूनिट के सभी लोगों से विचार - विमर्श किया गया। देश के बड़े - बड़े पहलवानों के नाम सुझाये गए। हरियाणा के हट्टे - कट्टे पहलवान उदय सिंह को रोल के लिए निर्णय किया गया। निर्माता और निर्देशक तुरंत उदय सिंह के पास पहुँच गए। बातों - बातों में उन्होंने अपने आने का उद्देश्य बताया-" उदय सिंह जी , हमारी फिल्म में आपकी ज़रुरत है। आशा है , आप निराश नहीं करेंगे।"
- देखिये , मैंने अब तक किसी फिल्म में काम नहीं किया है। 
- हमारी फिल्म से काम करना शुरु कर दीजिये। 
- आपकी फिल्म में मुझे क्या करना है ?
- हीरो से बस कुश्ती करनी है। 
- हार - जीत का फैसला तो होगा ही ?
- जी , होगा। जीत हीरो की होगी। 
- मेरी हार दिखाएँगे आप ?
- खामोशी 
- देखिये , मैं अब तक देश - विदेश में हर बार जीता हूँ। आप मुझे हारा 
   हुआ दिखाना चाहते हैं ?
- हम आपकी हार के लिए दस लाख रुपये देंगे। 
- दस लाख रुपयों के लिए देश वासियों में बनी अपनी छवि बिगाड़ लूँ क्या ?
   जाइये ; जाइये , किसी और को ढूँढ़िये। 

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परिचय

प्राण शर्मा का जन्म १३ जून १९३७ को वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में. पंजाब विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी). १९५५ से लेखन . फिल्मी गीत गाते-गाते गीत , कविताएं और ग़ज़ले कहनी शुरू कीं.

१९६५ से ब्रिटेन में.

१९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार.

लेख - 'हिन्दी गज़ल बनाम उर्दू गज़ल" पुरवाई पत्रिका और अभिव्यक्ति वेबसाइट पर काफी सराहा गया. शीघ्र यह लेख पुस्तकाकार रूप में प्रकाश्य.

२००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित.
"गज़ल कहता हूं' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित.
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डॉ. किरण मिश्र की कविताएं

स्त्री-1
सारे दरवाजे बंद कर
घनघोर अँधेरे में बैठा वो
निराश हताश था
दरारों से जीवन ने प्रवेश किया
खोल दी खिड़की, जीवन की
वो स्त्री थी
जो रिक्त हुये में भरती रही उजाले
और बदल गई अँधेरे के जीवाश्म में
******
स्त्री-2
टूटती जुड़ती स्त्री के बीच
बसी दुनियाँ में किसी ने 
हँसते हुए कहा स्त्री सिर्फ आंसू है
जबकि वो हँसी ले आया था
अपने बाहों में प्रेम की
किस्सों से आवाज आयी
स्त्री लालची है
स्त्री हैरान थी क्योंकि
उसने अपने अंश को जला
दी थी राजमहल को सुगंध चन्दन की
तभी शोर मचता है बेहया, बेशर्म
इतिहास में विचरण करती
पिता को दुग्धपान करा
उनकी जान बचाती
स्त्री को लोग दिखा रहे है
तोड़े गये समाज के  मुल्य
होकर परेशान
सारी सभ्यताओं को लांघ जाना चाहती है स्त्री
लेकिन हर बार सभ्यता रोकती है रास्ता
क्योंकि स्त्री आधा दिन और आधी रात है
जिसे दिन में सूरज सा जल कर
रात में रोपना है अपने स्त्री मन को
पुरुष के अन्दर
जिन्दा रखने सभ्यताओं को।
स्त्री सिर्फ रोपनी है।
*******
स्त्री-3
बादल उमड़ घुमड़ रहे है
खदेडी गई कौमों की स्त्रियां
इंतज़ार में है
अषाढ की उमस कुछ कम पड़े
सियासत की हवा कुछ नरम पड़े
तो नसों में धंसी वक्त की कीलों
को निकाल फेका जाए
वो जर्द चिनारों से
जो खौफ लेकर चली थी
वो खौफ भी उनके नहीं
आंसुओं से तर दर्द सूख गये
लेकिन लोरियों में घुले खून की महक
अभी तक गई नहीं
उनके रौंदे जिस्म महज़ब की कहानी कहते है
स्त्रियां भूल गई
रचना रचाना स्त्री का है
उसे बारूद के ढेर पर बैठाना पुरुष का काम है
स्त्री के लिए जमी कभी जन्नत न बनी
फिरदौस बरूह जमीनस्तो
जहाँगीर ने कहा था
नूरजहां कहां कह पायी थी ?
*******






स्त्री-4
तेदू पत्ता तुड़ान करते हुये एक दिन
मेरे ही धधकती जवानी से
ठेकेदार ने जब बीड़ी सुलगा ली तो
मैं नहीं बची
गुम हो मिल गई
दंडकारणय  की गुमनाम कहानियों में
लेकिन कहते है न
कुछ बचा रह जाता है
सो बची रही
नख भर उम्मीद  नख भर ताकत
उसी से ले हाथ में बगावत की विरासत
गांधी के न्यासिता के सिद्धांत को नकारा
लैण्ड माईन बिछाई लाल विचारों की
और कर दी घोषणा क्रांति की
उखाड़ फेका सत्ता, पुलिस, सेना को
हो कर खुश हवा में उठाया हांथ
मुठ्ठी बंद की और जोर से चिल्लाई
लाल सलाम
मैं आजाद थी
वर्ष बीते, बीते आजादी के ढंग
देख रही हूं हर तरफ
सिद्धांत परिभ्रमण का।
लोमड़ी जिसे मिली थी आजादी
बन के वो शेर शासक कहला रही है
अधोवस्त्र  फेक बीड़ी सुलगा रही है
मैं क्रांति की बात करने वाली
खुराक बन सत्ता की
कब की शेरों  के गले उतर चुकी हूं
मार्क्स तैयार है वर्ग संघर्ष के लिए
सलामी दे
हवा में हाथ लाल सलाम।

*******
तलाश
जीवन के खंड खंड से निकले शब्द
कविता बन उतरे कागजों पर
तो कभी मन के प्रान्तर में भटकते रहे
लेकिन एकांत अखंड ही रहा
आमंत्रण देता
संभावनाओं के पंख लगे
अब अधिष्ठाती हूँ मैं
फिर कोलाहल हुआ
'मैं' खंडित
तो कौन उपस्थित था
ऊर्जा
कैसी उर्जा
सम्बन्ध
कैसा सम्बन्ध
सारी ध्वनियाँ थरथरा कर
गुरुत्वाकर्षण का भेदन
नहीं करती
क्यों
कुछ नि:शेष है
शून्य से आगे
महाशुन्य की तलाश में
मैं।
******


 

कैदी
मुझे एक कैदी में तब्दील कर
वो भागता है हर बार
नये नये स्वप्न तट की तरफ
ये देख दरिया हँसता है
और रोती है दीवारें
लग कर गले
बिछड़े दोस्त की तरह,
मेरे भीतर उसकी मौजूदगी
ढलता सूरज है
उगा भी तो
इस कदर तपा देगा
की हो जाउंगी पत्थर
सुना है होते है
सख्त पत्थर के इरादे।
******
प्रेम
होना तो ये था
पाबंद बन जाने थे माथे पर
जलाना था दिया
जाना था तकिया पर
ये पूछने
दरिया में आग क्यों अमृत क्यों नहीं
शायद दो मैना दिख जाती
लेकिन झुकना न आया
फिर मारे पत्थर दिल पर
खौफ़ की चक्की चलाई
सोचा तो ये भी था
आब-ए-चश्म में नहा कर
पता चलेगा
दिल का जला क्या पता देगा
कुछ आंखो में
जुगनुओं की तरह टिमटिमाया
फिर गायब
खुदाई में मिला
आत्मा का पता नहीं
आम दस्तूर
आग के दरिया से पार नहीं पाया
राख का पंछी बन
भटक रहा है वीराने में
जहां न चुम्बकत्व है
न गंध है
न सूर्य
अब कफ़स में मैना
पैगाम आए तो कैसे।
-----------------------------
तकिया- फकीरों-दरवेशों का निवास-स्थान\
आब-ए-चश्म- आंसू
*****


परिचय

12  अक्टूबर,१९७९ को कानपुर में जन्म
डॉ किरण मिश्रा: प्राचार्या डिग्री कॉलेज कानपुर
लेख- दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण ,लोकसत्य, लोकमत, जनमत की पुकार(पत्रिका) ग्राम सन्देश ।
कविता- आह!जिन्दगी, अटूट बंधन, सौरभ दर्शन
अनेक शोध पत्र -राष्ट्रीय /अंतरष्ट्रीय शोध -पत्रिकाओं में प्रकाशित    
प्रकाशित पुस्तके: समाजशास्त्र;एक परिचय
प्रकाशन में- एक कर्मनिष्ट यति
पुरस्कार सम्मान: माटी साहित्य सम्मान(२०१३), सरस्वती सम्मान (२०१२) निरालाश्री पुरस्कार (२०१५) गगन स्वर पुरस्कार (2015)दिल्ली
रामप्रसाद बिस्मिल सम्मान (2017)दिल्ली

13,टेम्पल रोड भोगल, जंगपुरा,नई दिल्ली   पिन कोड-110014  
मो.-  +918700696816


शनिवार, 8 जुलाई 2017

वातायन- जुलाई,२०१७


मित्रो,

अनेक व्यस्तताओं के कारण वातायन का प्रकाशन नियमित नहीं हो पाने का खेद है. मेरा प्रयास होगा कि पहले की ही भांति इसका प्रकाशन नियमित हो सके.  वातायन एक ब्लॉग पत्रिका के रूप में सदैव आप तक पहुंचता रहा है और विश्वास है कि भविष्य में भी उसी रूप में इसका प्रकाशन हो सकेगा.

वातायन के इस अंक में युवा कवयित्री और लेखिका सुश्री शशि काण्डपाल का  संस्मरण ’डाक्टर यादव’ और उनकी कविता-बूंदों  की ख्वाहिश’ प्रस्तुत है. सुश्री काण्डपाल प्रखर प्रतिभा की धनी हैं, जिनके पास आकर्षक शिल्प, सक्षम भाषा और सूक्ष्म दृष्टि है. भविष्य में भी आप उनकी अन्य रचनाएं यहां पढ़ सकेंगे.


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संस्मरण
(डाक्टर दिवस (०८-०७-१७) पर विशेष)

डाक्टर यादव
शशि काण्डपाल


डाक्टर----आप  पढ़ लिख कर जी जान एक करते है ताकि हमारे रोगों और परेशानियों का निदान कर सके और शायद अपने जीवन भर की नींद और आराम गवां बैठते है ..इसके लिए मैं सभी का आभार मानती हू..

डॉक्टर बोलते ही मुझे अपने  भाई बहनों,पड़ोसियों,मोहल्ले और एरिया के लोगो को सँभालते "डॉ यादव  " होम्योपैथ याद आ जाते है| 
कद छह फुट से थोडा कम,छरहरा शरीर,परिवार के एकलौते बेटे,अविवाहित  और उनकी बड़ी सी कोठी! 

पहले पहल घर में  क्लिनिक खोला और मेरे पापा अक्सर हमें वहाँ  ले जाते..कभी मिलने कभी दवाई लेने | मेरी दादी  को दवाई देने  वो  घर तक आ जाते और लगता हमारा पूरा घर स्वस्थ हो गया ...उनकी छोटी छोटी टिप्स बहुत अमूल्य  हो उठती|

अलग तरह के इंसान,जिन्हें समाज को सस्ती दवाइयां उपलब्ध करानी थीं ,बच्चो के मुँह पर मुस्कान लानी थी ,, हम उन्हें भगवान् सा मानते, ना इंजेक्शन ना कड़वी दवाई  देने  वाले  डॉक्टर!

उन्होंने  अपने घर के पीछे, एक बड़े से कमरे को अपनी कार्य स्थली बनाया,वो या तो पढ़ते रहते या लकड़ी की बनी ,दवाई की शीशियो को सजा कर रखने वाली, चौकोर और छोटे छोटे खानों वाली ट्रे से गोलियां  मिक्स कर रहे होते,पुडिया बना रहे होते....

उनके कमरे तक पहुँचने के लिए पूरी कोठी को गोलाई में पार  कर  उन  तक पहुँचना होता जो की एक अलग अनुभव होता और उससे भी  विशेष आकर्षण होता उनके दरवाजे पर लगी पीतल की घंटी जिसे डोर से खींचकर बजा सकते थे लेकिन मैं जब भी जाती  वो  व्यस्त मिलते  और मैं देहरी पर खड़ी  उनके बुलाये जाने का इंतजार करती...जब थकान से पैर उठाने ,बदलने लगती तब वो गर्दन उठा कर इजाजत देते और कहते तुम बोलोगी नहीं तो दुनिया सुनेगी नहीं ..किसे क्या पड़ी है जो तुम्हारा मौन समझे?? 

 मैं कुछ समझ ना पाती लेकिन आज  जानती हूँ कि  वो  तो  पहले  ही  मुझे अपनी  बड़ी  बड़ी  खिडकियों  से  आते  हुए  देख  चुके  होते  थे  बस  मेरे दब्बू  पन   का  इलाज  कर  रहे  होते  थे! लेकिन  डॉक्टर  साहब  ये  भूल जाते  थे  जन्मजात बिमारिया कम  ठीक  होती  है |

मरीज बढ़ते गए,नाम  बढ़  चला और कोठी गन्दी  होती  गई  सो  बाहर बाजार में एक कमरा जो की कल्लू हलवाई  के  बगल  में था , रोगियों का अस्पताल बना|
कोई भी पेटदर्द बताता तो उनका पहला प्रश्न होता कल्लू की मिठाई खायी थी क्या? 

कल्लू  भी  सुनता  और  डॉक्टर  भी  मिठाई  खाते  और  एक  दूसरे  की सहायता  ही  करते|

अब मेरा  आकर्षण  दुगुना था क्योंकि मीठी  दवाईयों में ,छनती  जलेबियों की खुशबू भी समा गई थी ...खौलता  दूध  और  औटता खोया घर जाने की याद बिसरा देता..

डॉक्टर सिर्फ एक रुपया लेते,और दो चार घंटे में एक स्तूप बन जाता और गिनने के लिए मेरे मत्थे पड़ता, रेजगारी कल्लू के हवाले करने पड़ती| वो कभी सिक्के या रुपये पर हाथ ना लगाते, अगर ज्यादा रूपये दिए है तो बाकी खुद उठा लो क्योंकि दवाई देते समय वो कुछ ना  छूते ..

अक्सर एक जमादार जो अपनी दवाई लेने आता जैसे ही सिक्का डालना चाहता वो डांट देते ..

हटाओ अपना गन्दा सिक्का...मिलाना मत और वो हरिराम खित्त से हँस देता...

सालों  एक  सिक्के को  दिखा  कर  स्वस्थ  होता रहा और हर बार डॉक्टर उसका सिक्का लौटाते  रहे...असल  में वो उससे दवाई के पैसे नहीं लेना चाहते  थे  क्योंकि तब एक रूपये की अच्छी कीमत  हुआ  करती  थी और मैं  हैरान होती की  आखिर  ये  एक तरह  की  बेइज्जती के बाद  भी  हँसता क्यों  है? बहुत  बाद  में  समझी  कि कुछ  दोस्त   ऐसे  भी  होते है...लेकिन वो उनका अहाता साफ़ रखता और अपनी खुद्दारी भी!

बचपन गया,शादी हुई और डॉक्टर मेरी स्मृतियों में धुधले पड़ गए लेकिन जब सालों बाद शहर वापस आई तो उनसे मिलने की कोशिश में कहाँ कहाँ ना  पता लगाया लेकिन वो कही नहीं मिले.

कल्लू की दूकान कलेवा नाम  से प्रसिद्द हो चुकी थी लेकिन मुझे बिलकुल मीठी नहीं लग रही थी..घर की जगह एक शौपिंग मॉल खड़ा था...

कहाँ गया वो बगीचा? वो बिल्लियाँ? वो तोते  और  ढेर  सारे   कबूतर? मैं  अक्सर  पूछती क्या  ये  सब  भी  आपकी मीठी दवाई  खा  सकते  है? और  वो मेरी  नाक  पकड़  कर कुछ सादी गोलियां मेरे मुह में टपका  देते  और मैं समझ  ना पाती   की मेरा  मुँह खुद  खुलता कैसे  है?? समय  ने  समझाया  कि जब सांसों  का   एक  रास्ता  बंद  कर  दो  तो  दूसरा प्रकृति खोल  देती है.....

जिससे भी पूछती  वो  उन्हें स्मृतियों में जानता लेकिन वर्तमान में कहाँ है पता ना चला........वो मेरे लिए अनुत्तरित ही रहे....भाई,पापा,पड़ोसी  सबने पता लगाने की कोशिश की लेकिन अपने माँ बाप की मृत्यु के बाद  वो  मकान बेच ना जाने  कहाँ  चले  गए? किसी  कल्लू, हरिराम और रोगियों को बताये बिना......

अभी कुछ साल पहले हरिद्वार गई और दिमाग ने कहा ऐसा न हो की उनकी परोपकारी प्रवृत्ति उन्हें किसी आश्रम या चेरिटी में ले आई हो और अपने सूत्रों से पता लगाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रही.......क्या पता नाम भी बदल लिया हो!

आज भी उनकी उम्र के बुजुर्ग में उन्हें ढूढती हूँ क्या पता कहीं दिख ही जाये..

कितने भी बदले होंगे तो भी जुगाड़  से पहचान लूंगी उन्हें  और  वो मुझे....

आखिर एक मैं ही तो थी जो रोग होने पर उनके सामने बैठ जाती और वो मुझसे सिमटम्स पूछ  के  बता  रहे  होते  तुझे  ये  हुआ  है  और  सर  पे  एक  चपत  लगा  कर मेरा  दिया  सिक्का अपनी जेब में रख लेते.......
शायद मेरे जीवन के पहले  आदर्श जिनसे मेरा मोह कभी भंग नहीं होगा! सबको स्वस्थ करने वाले डॉक्टर यादव ..

 आप जहाँ  भी  हो कुशल से हो! स्वस्थ हो!
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कविता

बूंदों  की ख्वाहिश
शशि काण्डपाल

सुबह हो, बारिशों  वाली,
और जाना हो कहीं दूर..
खाली सी सड़के हो,
और सोया सा रास्ता,
हँसते से पेड़ हो,
और ढूढ़ना हो,  कोई  नया  पता...

चले और चले फकत  जीने इन रास्तो को ,
जहाँ ये सफ़र हो...
और मंजिल हो लापता,,

ओस आती हो पैरों से लिपटने
और भिगो  जाये  टखनो तक.
दे जाती हो इक सिहरत,
ताउम्र ना भूल पाने को..
बस चलती रहूं
जियूं उन अहसासों को रात  दिन,
जो देते है  रवानियत ..
रहूं तेरी ख़ामोशी में..
बस फकत ये याद दिलाने ...

जब जब हो बारिश,
या शरद की गीली घास
भिगोये ये रास्ते,  तुझे  बार बार  ...
छिटकन बन जाए तेरी उलझन और उलझन  मुस्कान,,
और याद  आये कि पैरों  से लिपटती वो बूंदे ...
कही मैं तो नहीं?

झुक के देख खुद के कदमों को,
जिन्हें मैंने भिगोया ओस की बूंदे बन कर,
उठ के देख खुद को,
जिसे मैंने भिगोया याद बन कर..
कर ख़याल और समझ..
ये मैं  हूं...
मैं ही तो  हूं...
और कौन ............
जो तेरे कदमों  से  लिपट...
तेरे  घर तक जाना चाहे.........

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युवा कवयित्री और लेखिका शशि काण्डपाल