शनिवार, 31 दिसंबर 2011

वातायन-जनवरी,२०१२

(चित्र- बलराम अग्रवाल)

वातायन के पाठकों को नववर्ष की मंगल कामनाएं


हम और हमारा समय

टूटना एक सपने का
रूपसिंह चन्देल

विगत नौ महीने पहले देश ने एक सपना देखा था. सपना था एक मजबूत लोकपाल बिल का जो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के उन्मूलन में सार्थक भूमिका निर्वाह कर सकता, जिसके लिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में लाखों लोगों ने आंदोलन किया. उनके आंदोलन की कहानी देश - देशांतर तक सभी जानते हैं. यद्यपि सरकार ने यह आभास पहले ही दे दिया था कि वह वह सब नहीं करने जा रही जो अन्ना, उनकी टीम और आंदोलन कर रही जनता चाह रही है अर्थात वह ’लोकपाल बिल’ उस रूप में प्रस्तुत नहीं करने वाली जो ’जन लोकपाल बिल’ के रूप में ’सिविल सोसाइटी’ ने प्रस्तुत किया था. सरकार वह बिल प्रस्तुत करेगी जिसे वह बेहतर मानती है और दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन को तोड़वाने के लिए किए गए वायदों से अपने को दरकिनार करते हुए सरकार ने एक ऎसा बिल प्रस्तुत किया जिसे न केवल ’सिविल सोसाइटी’ ने खारिज कर दिया बल्कि विपक्षी दलों ने उसे बेहद कमजोर करार दिया.

अन्ना ने कहा था कि भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए एक सशक्त लोकपाल बिल (उनके शब्दों में ’जन लोकपाल बिल) देश की जनता को मिलना चाहिए और इसे उन्होंने देश की दूसरी आजादी स्वीकार किया था. यहां मैं एक बार पुनः वातायन के पाठकों को याद दिला दूं कि ठीक यही बात कानपुर के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी हलधर बाजपेई ने भी अपनी मृत्यु से पहले कही थी. वे मार्क्सवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य थे और वहां से मोहभंग होने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी. उसके बाद वह कांग्रेस में शामिल हुए, लेकिन वहां भी उनका मोहभंग हुआ और उन्होंने अपने अनुभव के आधार यह कहा था कि देश को जो आजादी मिली वह अधूरी है. दूसरी आजादी की लड़ाई एक बार पुनः लड़ी जानी होगी. असमय ही असम में भूकंप पीड़ितों की सेवा करते हुए १९५० में उनकी मृत्यु हो गयी थी. दूसरी आजादी की लड़ाई की बात निश्चित ही अन्ना की अपनी सोच और अनुभव से उत्पन्न हुई, क्योंकि आजीवन समाज सेवा करते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के जितने रूप देखे होंगे दूसरों ने भी उनसे कम नहीं देखे होगें. आज आम और खास जिसप्रकार भ्रष्टाचार का शिकार हो रहा है यही कारण रहा कि अन्ना के आह्वान पर लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर निकल आए, लेकिन सरकार ने उस जन भावना की उपेक्षा की और जो लोकपाल बिल संसद में प्रस्तुत किया वह इतना लचर और बेदम था कि उससे भ्रष्टाचार से मुक्ति तो दूर बढ़ावा ही मिलने वाला था. लोकसभा में वह पास भले ही हो गया था, लेकिन स्पष्ट था कि राज्यसभा में वह पास नहीं होनेवाला था. मैं कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगडे की इस बात से पूरी तरह सहमत हूं और शायद आप भी होंगे कि सभी राजनीतिक दलों की मंशा लोकपाल बिल को पास करवाने की थी ही नहीं. उन राजनीतिक दलों के तर्क भले ही कुछ भी क्यों न हों, लेकिन वे सभी एक ही खेल खेल रहे थे---बिल पर अपने को गंभीर प्रदर्शित करना लेकिन उसे किसी भी कीमत में पास न होने देना. यह सब अकारण नहीं था. पूरा देश जानता है कि हर पार्टी में कितने नेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं. सशक्त लोकपाल बिल आने से उन सभी के बेनकाब होने का खतरा कौन पार्टी उठाना चाहती!

हमने देखा कि संसद में अन्ना के विरुद्ध कौन से नेता बढ़चढ़कर ----यहां तक कि भाषा और लोक मर्यादा को ताक पर रखकर बोल रहे थे और क्यों बोल रहे थे यह भी पूरा देश जानता है. रामविलास पासवान और लालू प्रसाद यादव की भाषा बेहद आपत्तिजनक थी, लेकिन वे सांसद हैं----आज के राजा ---और राजा के सभी खून माफ होते हैं. वे यह भूल गए कि देश में अब राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है और जनता अब पहले जैसी मूर्ख नहीं रही.

राजनीतिज्ञों ने देश को पुनः भ्रष्टाचार के कीचड़ में हाथ पैर मारने के लिए छोड़ दिया है क्योंकि उनकी चिन्ता ’लोकपाल बिल’ से अधिक आगे आने वाले चुनावों पर टिकी हुई थी. कुछ को सशक्त लोकपाल बिल आने से यह खतरा भी सता रहा था कि कभी कोई थानेदार आकर उन्हें हथकड़ी पहनाकर जेल में ठूंस देगा, लेकिन अब वे उस भय से मुक्त हैं और यही उनका ध्येय था. यदि वे अपने को पाक-साफ मान रहे हैं तो उन्हें यह खतरा क्यों सता रहा है! हकीकत पूरा देश जानता है. शायद इसी हकीकत को पहचानकर एक दिन सत्तादल के मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि देश की जनता का सब्र का घड़ा फूट न जाए इसलिए कुछ किया जाना चाहिए. यही बात यशवंत सिन्हा ने कही, लेकिन संसद ने और खासकर सरकार ने उनकी बातों पर कान नहीं दिया. यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकारें गंभीर न हुईं तो जनता कब तक लुटती-पिटती रहेगी! देश की सन सत्तावन की क्रान्ति या हाल-फिलहाल मिश्र की जनक्रांति को राजनीतिज्ञों को याद रखना चाहिए. अपने आलस्य और ज्यादितियों को बर्दाश्त करने के लिए दुनिया में प्रसिद्ध भारतीय जनता जब जागती है तब इतिहास बदल देती है. इतिहास इस बात का साक्षी है. इसलिए राजनीतिज्ञों को समय से जाग जाना चाहिए --- उससे पहले कि जनता जाग जाए.
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इस बार के वातायन में प्रस्तुत है वरिष्ठ कथाकार और कवि सुभाष नीरव की तीन लघुकथाएं और भावना प्रकाशन, पटपड़गंज, दिल्ली से सद्यः प्रकाशित उनकी लघुकथा पुस्तक - ’सफ़र में आदमी’ पर वरिष्ठ कथाकार और कवि बलराम अग्रवाल का आलेख.

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लघुकथाएं



सुभाष नीरव की तीन लघुकथाएँ


बीमार

''चलो, पढ़ो।''
तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढ़ने लगी, ''अ से अनाल... आ से आम...'' एकाएक उसने पूछा, ''पापा, ये अनाल क्या होता है ?''
''यह एक फल होता है, बेटे।'' मैंने उसे समझाते हुए कहा, ''इसमें लाल-लाल दाने होते हैं, मीठे-मीठे!''
''पापा, हम भी अनाल खायेंगे...'' बच्ची पढ़ना छोड़कर जिद-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, ''बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फॉर एप्पिल... एप्पिल माने...।''
सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डॉक्टर ने सलाह दी थी- पत्नी को सेब दीजिये, सेब।
लेकिन मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच-विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था- पत्नी के लिए।
बच्ची पढ़े जा रही थी, ''ए फॉर एप्पिल... एप्पिल माने सेब.. .''
''पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ? जैसे मम्मी ?...''
बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, उसके चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।
बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नज़रों से देखते हुए पूछा, ''मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा ?''

(सुभाष नीरव)

(मो.नं.०९८१०५३४३७३)




एक और कस्बा

देहतोड़ मेहनत के बाद, रात की नींद से सुबह जब रहमत मियां की आँख खुली तो उनका मन पूरे मूड में था। छुट्टी का दिन था और कल ही उन्हें पगार मिली थी। सो, आज वे पूरा दिन घर में रहकर आराम फरमाना और परिवार के साथ बैठकर कुछ उम्दा खाना खाना चाहते थे। उन्होंने बेगम को अपनी इस ख्वाहिश से रू-ब-रू करवाया। तय हुआ कि घर में आज गोश्त पकाया जाए। रहमत मियां का मूड अभी बिस्तर छोड़ने का न था, लिहाजा गोश्त लाने के लिए अपने बेटे सुक्खन को बाजार भेजना मुनासिब समझा और ख़ुद चादर ओढ़कर फिर लेट गये।
सुक्खन थैला और पैसे लेकर जब बाजार पहुँचा, सुबह के दस बज रहे थे। कस्बे की गलियों-बाजारों में चहल-पहल थी। गोश्त लेकर जब सुक्खन लौट रहा था, उसकी नज़र ऊपर आकाश में तैरती एक कटी पतंग पर पड़ी। पीछे-पीछे, लग्गी और बांस लिये लौंडों की भीड़ शोर मचाती भागती आ रही थी। ज़मीन की ओर आते-आते पतंग ठीक सुक्खन के सिर के ऊपर चक्कर काटने लगी। उसने उछलकर उसे पकड़ने की कोशिश की, पर नाकामयाब रहा। देखते ही देखते, पतंग आगे बढ़ गयी और कलाबाजियाँ खाती हुई मंदिर की बाहरी दीवार पर जा अटकी। सुक्खन दीवार के बहुत नज़दीक था। उसने हाथ में पकड़ा थैला वहीं सीढ़ियों पर पटका और फुर्ती से दीवार पर चढ़ गया। पतंग की डोर हाथ में आते ही जाने कहाँ से उसमें गज़ब की फुर्ती आयी कि वह लौंडों की भीड़ को चीरता हुआ-सा बहुत दूर निकल गया, चेहरे पर विजय-भाव लिये !
काफी देर बाद, जब उसे अपने थैले का ख़याल आया तो वह मंदिर की ओर भागा। वहाँ पर कुहराम मचा था। लोगों की भीड़ लगी थी। पंडित जी चीख-चिल्ला रहे थे। गोश्त की बोटियाँ मंदिर की सीढ़ियों पर बिखरी पड़ी थीं। उन्हें हथियाने के लिए आसपास के आवारा कुत्ते अपनी-अपनी ताकत के अनुरूप एक-दूसरे से उलझ रहे थे।
सुक्खन आगे बढ़ने की हिम्मत न कर सका। घर लौटने पर गोश्त का यह हश्र हुआ जानकर यकीकन उसे मार पड़ती। लेकिन वहाँ खड़े रहने का खौफ भी उसे भीतर तक थर्रा गया - कहीं किसी ने उसे गोश्त का थैला मंदिर की सीढ़ियों पर पटकते देख न लिया हो! सुक्खन ने घर में ही पनाह लेना बेहतर समझा। गलियों-बाजारों में से होता हुआ जब वह अपने घर की ओर तेजी से बढ़ रहा था, उसने देखा हर तरफ अफरा-तफरी सी मची थी, दुकानों के शटर फटाफट गिरने लगे थे, लोग बाग इस तरह भाग रहे थे मानो कस्बे में कोई खूँखार दैत्य घुस आया हो!

सफ़र में आदमी

''अबे, कहाँ घुसा आ रहा है !'' सिर से पांव तक गंदे भिखारीनुमा आदमी से अपने कपड़े बचाता हुआ वह लगभग चीख-सा पड़ा। उस आदमी की दशा देखकर मारे घिन्न के मन ही मन वह बुदबुदाया, ''कैसे डिब्बे में चढ़ बैठा?... अगर अर्जेन्सी न होती तो कभी भी इस डिब्बे में न चढ़ता। भले ही ट्रेन छूट जाती।''
माँ के सीरियस होने का तार उसे तब मिला, जब वह शाम सात बजे आफिस से घर लौटा। अगले दिन, राज्य में बन्द होने के कारण रेलें रद्द कर दी गयी थीं और बसों के चलने की भी उम्मीद नहीं थी। अत: रात की गाड़ी पकड़ने के अवाला उसके पास कोई चारा नहीं बचा था।
एक के बाद एक स्टेशन पीछे छोड़ती ट्रेन आगे बढ़ी जा रही थी। खड़े हुए लोग आहिस्ता-आहिस्ता नीचे फर्श पर बैठने लग गये थे। कई अधलेटे-से भी हो गये थे।
''ज़ाहिल ! कैसी गंदी जगह पर लुढ़के पड़े हैं ! कपड़ों तक का ख़याल नहीं है।'' नीचे फर्श पर फैले पानी, संडास के पास की दुर्गन्ध और गन्दगी के कारण उसे घिन्न-सी आ रही थी। किसी तरह भीड़ के बीच में जगह बनाते हुए आगे बढ़कर उसने डिब्बे में अन्दर की ओर झांका। अन्दर तो और भी बुरा हाल था। डिब्बा असबाब और सवारियों से खचाखच भरा था। तिल रखने तक की जगह नहीं थी।
यह सब देख, वह वहीं खड़े रहने को विवश हो गया। उसने घड़ी देखी, साढ़े दस बज रहे थे। सुबह छह बजे से पहले गाड़ी क्या लगेगी दिल्ली! रातभर यहीं खड़े-खड़े यात्रा करनी पड़ेगी। वह सोच रहा था।
ट्रेन अंधकार को चीरती धड़धड़ाती आगे बढ़ती जा रही थी। खड़ी हुई सवारियों में से दो-चार को छोड़कर शेष सभी नीचे फर्श पर बैठ गयी थीं और आड़ी-तिरछी होकर सोने का उपक्रम कर रही थीं।
''इस हालत में भी जाने कैसे नींद आ जाती है इन्हें!'' वह फिर बुदबुदाया।
ट्रेन जब अम्बाला से छूटी तो उसकी टांगों में दर्द होना आरंभ हो गया था। नीचे का गंदा, गीला फर्श उसे बैठने से रोक रहा था। वह किसी तरह खड़ा रहा और इधर-उधर की बातों को याद कर, समय को गुजारने का प्रयत्न करने लगा।
कुछ ही देर बाद, उसकी पलकें नींद के बोझ से दबने लगीं। वह आहिस्ता-आहिस्ता टांगों को मोड़कर बैठने को हुआ। लेकिन तभी अपने कपड़ों का ख़याल कर सीधा तनकर खड़ा हो गया। पर, खड़े-खड़े झपकियाँ ज्यादा जोर मारने लगीं और देखते-देखते वह भी संडास की दीवार से पीठ टिकाकर, गंदे और गीले फर्श पर अधलेटा-सा हो गया।
किसी स्टेशन पर झटके से ट्रेन रुकी तो उसकी नींद टूटी। मिचमिचाती आँखों से उसने देखा। डिब्बे में चढ़ा एक व्यक्ति एक हाथ में ब्रीफकेस उठाये, आड़े-तिरछे लेटे लोगों के बीच से रास्ता बनाते हुए भीतर जाने की कोशिश कर रहा था। उसके समीप पहुँचने पर गंदे, गीले फर्श पर उसे यूँ अधलेटा-सा देखकर उसने नाक-भौं सिकोड़ी और बुदबुदाता हुआ आगे बढ़ गया, ''ज़ाहिल! गंदगी में भी कैसा बेपरवाह पसरा पड़ा है!''
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आलेख


सुभाष नीरव : समकालीन लघुकथा का जागरूक हस्ताक्षर

बलराम अग्रवाल

विश्वभर में सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों के विशेषज्ञों के बीच बाजारवाद आज विशेष रूप से विचारणीय मुद्दा है। उन्हें लगता है कि समाज के गरीब से लेकर सुसम्पन्न अर्थात् हर व्यक्ति के सामने 'बाजार' सुरसा के मुख की तरह लगातार भयावह ढंग से फैलता जा रहा है और आदमी 'बाजार' के ही

(बलराम अग्रवाल)

द्वारा क्रेडिट-कार्ड आदि के रूप में मुहैय्या सुविधाओं को अपनाकर उसके काबू में न आने की वैसी ही असफल कोशिश कर रहा है जैसी प्रारम्भ में महावीर हनुमान ने की थी-'जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा, तासु दून कपि रूप दिखावा'। लेकिन बहुत जल्द उनकी समझ में आ गया कि लगातार फैलते जा रहे इस 'बाजार' पर पार पाना है तो क्रेडिट-कार्ड से मुक्ति पाकर दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा और तब-'अति लघु रूप पवन सुत लीन्हा'। 'बाजार' को उसकी स्पर्धा में रहकर नहीं, स्पर्धा से दूर रहकर ही धराशायी किया जा सकता है; लेकिन आदमी की अहंजनित आवश्यकताएं 'बाजार' से लड़ाई के इस तरीके को भोथरा किए रखती हैं। इसी कारण मानवीय संवेदनाओं के तन्तु उसकी चेतना को झकझोर पाने में अक्षम हो जाते हैं। वर्तमान दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के सामने उसे अन्य सभी आवश्यकताएं, यहाँ तक कि नैतिक दायित्व भी, क्षुद्र प्रतीत होने लगती हैं। यहाँ एक अन्य सत्य की ओर इंगित करना भी आवश्यक-सा है। आज का आदमी वस्तुओं में ही नहीं, रिश्तों में भी 'प्रोडक्टिविटी' ही तलाश करता है। जिन वस्तुओं और रिश्तों की प्रोडक्टिव उपयोगिता उसकी दृष्टि में समाप्त हो चुकी होती है, उन्हें वह अनदेखा करना, त्याग देना श्रेष्ठ समझता है। सुभाष नीरव की लघुकथा 'कमरा' के हरिबाबू और उनकी पत्नी को जब वृद्ध पिता अनुपयोगी और अपने पुत्र की शिक्षा उपयोगी प्रतीत होते हैं तब वे उपयोगी से अनुपयोगी को रिप्लेस करने का विवेक और दायित्व से हीन कदम उठाते हैं। दायित्वहीन इस अर्थ में कि रिप्लेसमेंट की इस क्रिया को वे रिश्तों की गरिमा को भूलकर हानि और लाभ के गणित को ध्यान में रखकर अंजाम देते हैं। अन्तत: हानि-लाभ का यही गणित उन्हें बेटे के भविष्य को दांव पर लगा देने हेतु भी उकसाता है जिसके कारण पिताजी से खाली कराया गया कमरा बिना झिझक तीन हजार रुपए प्रतिमाह किराए पर चढ़ा दिया जाता है। 'बाज़ार' की इसी क्रूर और हिंसक वृत्ति का सटीक चित्रण सुभाष नीरव की लघुकथा ‘मकड़ी’ में हुआ है-

'लेकिन, कुछ बरस पहले बहुत लुभावना लगने वाला बाजार अब उसे भयभीत करने लगा था। हर माह आने वाले बिलों का न्यूनतम चुकाने में ही उसकी आधी तनख्वाह खत्म हो जाती थी। इधर बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी पढाई का खर्च बढ़ रहा था। हारी-बीमारी अलग थी। कोई चारा न देख, आफिस के बाद वह दो घंटे पार्ट-टाइम करने लगा। पर इससे अधिक राहत न मिली। बिलों का न्यूनतम ही वह अदा कर पाता था। बकाया रकम और उस पर लगने वाले ब्याज ने उसका मानसिक चैन छीन लिया था। उसकी नींद गायब कर दी थी। रात में, जैसे-तैसे आँख लगती तो सपने में जाले-ही-जाले दिखाई देते जिनमें वह ख़ुद को बुरी तरह फंसा और मुक्ति हेतु छटपटाता हुआ पाता।'

अपनी आकर्षक, लुभावनी और नि:स्वार्थ प्रतीत होती सेवा-शर्तों के पीछे 'बाजार' कितना क्रूर और छिपा हुआ हत्यारा सिद्ध होता है, इस सत्य का यथार्थ-चित्रण करती 'मकड़ी' एक ऐसी सम्पूर्ण लघुकथा है, जिसकी तुलना में 'बाजार' के हिंसक और मारक चरित्र को केन्द्र में रखकर लिखी गई कोई अन्य लघुकथा आसानी से टिक नहीं पाएगी। इसके जालों की चपेट में अब तक भारत का मध्य अथवा निम्न-मध्य वर्ग ही नहीं, निम्न आय वर्ग भी आ चुका है। सत्य का आभास होने तक व्यक्ति अपने शरीर का अधिकांश ख़ून इस 'मकड़ी' से चुसवा चुका होता है।
लघुकथा 'अच्छा तरीका' का केन्द्रीय कथ्य भी बाजारवाद की ओर ही संकेत करता है। यह विशुद्ध भौतिकवाद और आध्यात्मिक भौतिकवाद की ओर भी संकेत करता है। यह लघुकथा ग्रामीण और महानगरीय सोच के मध्य अन्तर की ओर भी संकेत करती है। इन सारे बिन्दुओं को सुभाष नीरव ने 'हिन्दी' और 'अंग्रेजी' विषय को लेकर स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद बेरोजगारी झेलने वाले दो मित्रों के मानसिक धरातल के मद्देनजर प्रस्तुत किया है। भौतिकवाद नि:संदेह ऐसा आकर्षण है जो आवश्यकता के रूप में सामने आता है। लेकिन इस आकर्षण के पाश में कुछ लोग वैयक्तिक लाभ-हानि के गणित के साथ जुड़ते हैं तो कुछ सामाजिक और लोकहितकारी दृष्टि के तहत। 'अच्छा तरीका' में लोक से जुड़ी चेतना वाले 'मैं' को हिन्दी के अ, आ, इ, ई... व गांव के बच्चों से जुड़ा तथा वैयक्तिकता से जुड़े राकेश को नगर व अंग्रेजी मानसिकता के पोषकों से जुड़ा दिखाना भी कथाकार की विशिष्ट दृष्टि का परिचायक है।
सरकारी, अर्द्ध-सरकारी अथवा गैर-सरकारी कार्यालयों में कार्यरत जो लोग किसी भी स्तर पर अतिरिक्त-कमाई वाली सीटों पर काबिज हैं, उनके घरों का मासिक खर्चा वेतन से कहीं-अधिक होना स्वाभाविक है। कठोपनिषद् की स्थापना है- न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्या:। अर्थात् धन की ओर से मनुष्य हमेशा अतृप्त ही बना रहता है। लघुकथा 'दिहाड़ी' का मुख्य-पात्र रतन पुलिस की नौकरी में है। उसकी तैनाती ऐसे बाजार में है जहाँ के रेहड़ी-पटरी वालों से वह 'दिहाड़ी' वसूलने की स्थिति में है। बस, उसकी यह सामर्थ्य ही उसके तनाव का मुख्य कारण है। घर-खर्च को वेतन की रकम जितना सीमित रखना उसकी पत्नी और वह, दोनों ही भूल चुके हैं। लघुकथा में यद्यपि पत्नी और उसके व्यवहार को नेपथ्य में रखकर रतन को ही फोकस में रखा गया है तथापि- 'सुबह बच्चे बिना खाये-पिये ही स्कूल चले गये थे। पत्नी ने पड़ोसियों से कुछ भी माँगने से साफ इन्कार कर दिया था' के माध्यम से कथा को प्रभावित करते उसके चारित्रिक-आभास को नकारा नहीं जा सकता है। अपने इस इन्कार के जरिये ही वह बीमार पति पर 'दिहाड़ी' वसूलने जाने का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाती है।
स्कूल का 'रफ' काम करने के लिए ऑफिस के 'फ्रेश' रजिस्टर का उपयोग सरकारी कार्यालयों में कार्यरत लोगों के बच्चों के लिए आम बात है। सरकारी-स्टेशनरी का यह सदुपयोग बच्चों को कराते अपनी-अपनी पहुँच के अनुरूप अफसर से लेकर चपरासी तक सभी देखे जा सकते हैं। छोटी लगने वाली इस चोरी को कुछ लोग आदतन करते हैं तो कुछ अनायास। 'रफ कॉपी' का बाबू रामप्रकाश भी इस सुविधा का आनन्द लूटता है लेकिन आदतन नहीं, अनायास। ऑफिस स्टेशनरी का आदतन आनन्द लूटने वालों में सुभाष नीरव की लघुकथा 'चोर' के मि. नायर का उल्लेख किया जा सकता है।
'अपने क्षेत्र का दर्द' अपने देश में राजनीतिज्ञों के संवेदनहीन हो जाने की कथा है। 'पत्र को पढ़कर उसे अपनी बेटी का ध्यान हो आया। आये दिन वह एक नयी माँग के साथ धकेल दी जाती है- मायके में। क्या किसी दिन उसे भी? नहीं-नहीं... वह भीतर तक काँप उठा।' के माध्यम से इस लघुकथा में फ्रायड के मनोविश्लेषण-सिद्धांत 'आरोपण' का भी निर्वाह हुआ है।
'रंग परिवर्तन' सुभाष नीरव द्वारा प्रयुक्त सांकेतिक शीर्षक है। मन्त्री महोदय के कमरे में बिछे कीमती कालीन, सोफा-कवर्स और खिड़कियों पर लहराते पर्दों के माध्यम से उन्होंने नए-नए मन्त्री बने मनोहर लाल जी की मानसिकता और कार्यशैली दोनों पर गहरा कटाक्ष किया है। एक पत्रकार के प्रश्न के उत्तर में मनोहर लाल जी 'फिजूलखर्ची रोकने और अंधविश्वासों से ऊपर उठने' को प्राथमिकता देने की बात करते हैं लेकिन इन दोनों ही कमजोरियों से मुक्त नहीं रह पाते।
'अकेला चना' शासकीय कर्मचारी वर्ग में व्याप्त संवेदनहीनता, अभद्रता और अमानवीयता को तो यथार्थत: हमारे सामने रखती ही है, सामाजिकों के भी स्त्रैण-चरित्र का उद्धाटन करती है। सोचने की बात यह तो है ही कि कथानायक के साथ कैसा व्यवहार हुआ, यह भी है कि सामाजिक के तौर पर कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं हर आदमी अपने-आप को 'अकेला' खड़ा जरूर पाता है, इसके बावजूद किसी और को वैसा अकेला फंसा देखकर वह आग नहीं पकड़ पाता है। बस, देखता और आनन्द लेता रहता है। जिस प्रकार 'अकेला चना' की घटना बस-यात्रा के दौरान घटित होती है उसी प्रकार 'कड़वा अपवाद' भी बस-यात्रा के दौरान ही घटित एक घटना को हमारे सामने रखती है। लेकिन 'कड़वा अपवाद' का कथ्य 'अकेला चना' के कथ्य से एकदम भिन्न और अलग स्तर का है। 'अकेला चना' का महानगरीय भागमभाग में फंसा नायक शासकीय कर्मचारियों की गलत कार्यपद्धति के खिलाफ लड़ता हुआ अपने जैसे ही अन्य यात्रियों की संवेदनहीनता का शिकार होकर हारता है जबकि 'कड़वा अपवाद' का नायक इस सत्य का सामना करता है कि छल और छद्म से भरे इस समाज में सभी झूठे और मक्कार नहीं हैं। कुछ लोग नि:संदेह दीनता और हीनता का जीवन जीते हुए असहाय मर जाने को विवश हैं।

...तभी, मैं आगे बढ़कर बोला, ''साला, बन रहा है... नशा करके लेटा होगा...'' और मैंने एक झटके से उसके ऊपर की चिथड़ा हुई धोती को खींचकर एक तरफ कर दिया।
मेरे पाँव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। वह तो सचमुच ही ठंड से अकड़कर मर चुका था।

यहाँ पर अनायास ही 'भेड़िया आया-भेड़िया आया' वाली पुरातन कहानी हमारे सामने एक अलग अर्थ ध्वनित करती हुई खुल जाती है। 'वह तो सचमुच ही ठंड से अकड़कर मर चुका था।'- कौन ? वह अविश्वास जो दलित और दमित आबादी के निरन्तर रुदन 'भेड़िया आया' वाली कहानी ने हमारे मन में जमा दिया है। यह लघुकथा एक जिम्मेदार साहित्यिक कृति का दायित्व पूरा करते हुए हमें बताती है कि सारे रुदन धोखे से भरे नहीं होते।
'वॉकर' यों तो एक निम्न-मध्यवर्गीय गृहस्थ के हर्ष और व्यथा दोनों को व्यक्त करती कथा नजर आती है लेकिन यह एक स्तरीय मनोवैज्ञानिक कथा है। सुभाष नीरव अपने अनेक कथ्यों का निर्वाह मनोवैज्ञानिक धरातल पर करते हैं। इसके अलावा उनके अनेक शीर्षक अघोषित व्यंजना से भरे होते हैं। 'वॉकर' भी व्यंजनापरक है। पैदल यानी वाहन आदि की सुविधा से हीन जैसे-तैसे ही सही, अपने पांवों पर चलने-फिरने वाले व्यक्ति के लिए भी 'वॉकर' शब्द का ही प्रयोग किया जाता है। 'मुन्नी' सम्बोधित अपनी लाड़ली संतान हेतु 'वॉकर' खरीदने के निमित्त निकालकर दिए जाने वाले सौ रुपए के नोट का समापन घर में आने वाले मेहमानों के बहाने ही सही, घर-खर्च की भेंट चढ़ जाएगा, ऐसा पति-पत्नी दोनों ने ही नहीं सोचा होगा। इस स्थिति को स्वयं कथानायक के शब्दों में देखिए-
मैंने एक बार हाथ में पकड़े हुए सौ के नोट को देखा और फिर पास ही खेलती हुई मुन्नी की ओर। मैंने कहा, ''मगर, वह मुन्नी का वॉकर...।''
''अभी रहने दो। पहले घर चलाना ज़रूरी है।''
मैंने देखा, मुन्नी मेरी ओर आने के लिए उठकर खड़ी हुई ही थी कि तभी धम्म् से नीचे बैठकर रोने लगी।

अन्तिम पैरा में सुभाष नीरव द्वारा ताने गये बिम्ब को समझे बिना इस लघुकथा की तीव्रता को समझना असम्भव है। आम भारतीय परिवार की यह आर्थिक-विडम्बना है कि उसे 'घर' पहले चलाना है, बच्चे के बारे में बाद में सोचना है।
वनवासी राम को अयोध्या वापस ले जाने की नीयत से चित्रकूट पहुँचे भरत की, उनके साथ गये गुरु वशिष्ठ, मन्त्री सुमन्त्र, तीनों माताओं तथा ससुर जनक, किसी की भी बात को राम ने नहीं माना था। अनमने भरत को अयोध्या का शासन सँभालने की आज्ञा देकर उन्होंने कहा था- 'करहु प्रजा परिवारु सुखारी।' अर्थात् प्रजारूपी परिवार को सुख प्रदान करो। यह उस काल की बात है जब 'राजनीति' धर्म के अन्तर्गत आती थी। जनता का प्रतिनिधि कैसा हो ? यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-

मुखिया मुख सों चाहिए, खान-पान को एक।
पालहि पोसहि सकल अंग तुलसी सहित विवेक॥

लेकिन इस काल में 'राजनीति' प्रजा को भोगने के अधिकार के अन्तर्गत आती है। यही कारण है कि आज का राजनेता 'सिंहासन' को खतरे में भाँपते ही उसकी सुरक्षा के प्रति चिन्तित हो उठता है। 'इन्सानियत का धर्म' में सुभाष नीरव ने इसे ही कथ्य बनाया है। यह लघुकथा शिल्प की दृष्टि से कुछ कमजोर रह गई है।
सुभाष नीरव की कुछेक लघुकथाओं के शीर्षक उनकी लघुकथाओं में तनी संवेदना में झोल पैदा करने का काम करते-से महसूस होते हैं। ऐसा लगता है कि रचना के शीर्षक पर सुभाष नीरव कोई भी शब्द अथवा शब्द-युग्म लिखकर उसे शीर्षक दे डालने के बोझ से स्वयं को मुक्त मान लेते हैं; जबकि ऐसा नहीं है। 'लघुकथा' में शीर्षक भी एक आवश्यक अवयव है। वह रचना में व्यक्त संवेदना को पाठक-हृदय तक पहुंचाने में उत्प्रेरक का काम करता है और लेखकीय-दायित्व के अन्तर्गत ही आता है।

'बीमार' बाल-मनोविज्ञान की उत्कृष्ट लघुकथा है। इस लघुकथा का नायक अपनी असहाय आर्थिक स्थिति को हलाहल की तरह उसी तरह अपने कंठ में धारण करने को विवश है जिस तरह सम्पूर्ण विश्व में जीवन को बचाने के लिए भगवान शंकर। निम्न और निम्न-मध्य वर्ग के इस त्रास को शब्द देती अनेक स्तरीय रचनाओं में इस लघुकथा का स्थान विशिष्ट माना जा सकता है।

'बीमारी' इस देश के लगभग सभी सरकारी कार्यालयों में अपने अधीनस्थों के प्रति अधिकारियों के व्यवहार की सचाई को पाठकों के सामने रखती है तो 'चन्द्रनाथ की नियुक्ति' सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों का यथार्थ-दर्शन हमें कराती है। न्याय-प्रक्रिया की पेचीदगियों और किताबी-नियमों पर आधारित न्यायिक निर्णयों ने आम आदमी के मन को न्यायालयों के प्रति अविश्वास से भर दिया है। 'चीत्कार' लघुकथा देश की न्याय-व्यवस्था के प्रति आम आदमी के गहरे विश्वास और उसके टूटने और टूटे हुए को पुन: कायम रखने की संकल्प शक्ति का चित्र हमारे सामने रखती है। 'फर्क' आज की युवा-पीढ़ी के उस चरित्र की कथा है जिसके चलते उसे आसानी से गलित-मानसिकता वाली कहा जा सकता है। 'कत्ल होता सपना'- मैं समझता हूँ कि समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में कस्बाई स्तर तक की लड़कियों का आज का भी यही हश्र होता है। बेटियों को कभी शक्तिपूर्वक डरा-धमकाकर तो कभी भावनात्मक त्रास देकर कत्लगाह में उतरने को विवश किया जाता है। नि:सन्देह, जाग्रति आ रही है लेकिन वह महानगरों से अभी बमुश्किल नगरों तक ही पहुंच पाई है, वह भी बहुत धीमी गति से। 'मरना-जीना' को भी इसी धारा में गिना जा सकता है। अन्तर यहाँ लड़की की विवाहोपरान्त अशांत, असहाय एवं दयनीय स्थिति मात्र का है। 'एक खुशी खोखली-सी' काल का अतिक्रमण कर पाने में अक्षम रही है। गत सदी का सातवां-आठवां दशक तो वाकई इस विपदा से ग्रस्त था, लेकिन देश में इंजीनियर स्तर का आदमी आज बेरोजगार नहीं है। सुभाष नीरव की 'अपना-अपना नशा', 'चोरी' आदि कुछेक लघुकथाओं में विपरीत स्थिति के चित्रण जैसा प्रयोग भी हुआ है। ऐसी लघुकथाओं के पूवार्द्ध में कथानायक नैतिक सम्भाषण करते दिखाया जाता है तथा उत्तरार्द्ध में उसके कथन के एकदम विपरीत कार्यों में उसे लिप्त दिखा दिया जाता है। इस तकनीक की पहली लघुकथा नि:संदेह प्रेमचंद की 'राष्ट्र का सेवक' है लेकिन देशकाल के मद्देनजर वह एक स्तरीय लघुकथा है। विपरीत स्थिति, कृत्य अथवा मानसिकता को दर्शाती लघुकथाओं के तांडव को आठवें दशक में 'सारिका' ने खूब हवा दी थी। वस्तुत: वह काल भी कुछ-कुछ वैसी अभिव्यक्ति को शब्द देने का आवश्यक काल था; लेकिन लघुकथा आज अपने उस शैशवकाल से अब बाहर आ चुकी है। अत: लघुकथा में अब ऐसे प्रयोगों को बचकाना ही माना जाएगा।

'एक और कस्बा' यथार्थ और फैंटेसी के सम्मिश्रण से रची बेहतरीन रचना है। बाजार से बोटियाँ खरीदकर घर लौटते सुक्खन द्वारा कटी पतंग को लूटने में लगा देने के बहाने इसमें खेल के प्रति बाल-सुलभ उछाह का स्वाभाविक चित्रण हुआ है तथा मांस की बोटियों को लेकर विभिन्न समुदायों के लोगों तथा कुत्तों के माध्यम से इसमें फैंटेसी का प्रवेश हुआ है।

'सफर में आदमी' ऊपरी तौर पर विपरीत स्थितियों के चित्रण का पुंज नजर आती है लेकिन वह असामान्य परिस्थितियों में भी 'अनुकूलन' की स्वाभाविक मानवीय वृत्ति को दर्शाती एक श्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक लघुकथा है। इस लघुकथा का अन्त इसको कथ्य के स्तर पर भी और विचार के स्तर पर भी अनन्त प्रवाह प्रदान करता है। 'अनुकूलन' की वृत्ति के अनुरूप ही 'साधारणीकरण' भी सहज मानवीय वृत्ति है। व्यक्ति कभी-कभी अपने पद और ख्याति के तानो-बानों में इस तरह उलझ जाता है कि खुली हवा में सांस लेने, खुली 'धूप' का आनन्द लेने और सामान्य आदमी की तरह उनके बीच उठने, बैठने, लेटने, जीने को वह तरस जाता है। 'धूप' दर्पानुभूति में जी रहे एक अधिकारी के माध्यम से आम जीवन जीने की उसकी लालसा की कथा है।

गोधन गजधन बाजधन और रतनधन खान।
जब आवै संतोषधन सब धन धूरि समान ॥

'मुस्कराहट' के माध्यम से सुभाष नीरव ने अब्दुर्रहीम खानखाना द्वारा प्रतिपादित इस दार्शनिक सत्य को कथात्मक अभिव्यक्ति दी है। बेटे द्वारा स्थापित टूरिस्ट कंपनी का मालिक बन जाने के बाद सदानंद बाबू का चेहरा चमक उठता है लेकिन गरीबी और भुखमरी के दिनों में भी होठों पर खेलती रहने वाली उनकी मुस्कान अब किसी को नजर नहीं आती।
'सर्व धर्म समभाव' का नारा समाज-सेवकों द्वारा समय-समय पर उछाला जाता रहता है; लेकिन इसमें विश्वास करने और इस पर अमल करने वाले गृहस्थ की सामाजिक स्थिति लोगों की नजर में क्या रह जाती है? 'कोठे की औलाद' के माध्यम से सुभाष नीरव ने इस तथ्य पर प्रकाश डालने का यत्न किया है। लेकिन इस लघुकथा में एक नकारात्मक एप्रोच दिखलाई देती है जिससे लेखक को बचना चाहिए।

'कबाड़' समाज और परिवार के समकालीन चारित्रिक पतन की कथा प्रस्तुत करती है। ख़ुद तंगी में रहकर किशन बाबू ने बेटे को तालीम तो ऊँची दिला दी लेकिन पतनशील सामाजिक चाल-चलन से उसे वे नहीं बचा पाए। इस लघुकथा में किशन बाबू की खाट को तीसरे कमरे से हटाकर किचन के बराबर वाले स्टोर में स्थानांतरित करने का कार्य अगर बहू के द्वारा सम्पन्न होता तो यह सामान्य कथानक वाली लघुकथा होती। समाज और परिवार में आई नैतिक गिरावट के चित्रण के लिए अति आवश्यक है कि कथाकार पुराने कथानकों की लीक से हटकर चलें और कुछ ऐसे सत्यों का उद्धाटन करें जो स्थिति का आरोपित नहीं बल्कि यथार्थ चित्रण करने में सक्षम हों। 'आदान-प्रदान' दूरदर्शन में आधिकारिक प्रभुता को प्राप्त एक ऐसे लेखक की कथा है जिसकी रचनाएं पूर्व में लगातार अस्वीकृत होकर सखेद वापस आती रही हैं लेकिन संपादको को मुद्रा-लाभ कराने और प्रचार-प्रसार में सहायक होने की स्थिति में पहुँचते ही उसका नाम चर्चित लेखकों की सूची में शुमार हो जाता है। 'चेहरे' प्रकारान्तर से विपरीत के चरित्र चित्रण की ही रचना है। 'फिटनेस' में जहाँ एक ओर डॉक्टर की अपने मरीज के प्रति सदाशय को दर्शाया गया है, वहीं सरकारी-अर्द्ध सरकारी कार्यालयों में क्या, अस्पतालों तक में जड़ों तक फैल चुके रिश्वत के कार्य-व्यवहार को कथन का आधार बनाया गया है। 'खर्चा-पानी' में व्यक्ति की उस अबोधता को कथा का आधार बनाया गया है जिसके कारण निजी स्वार्थ में अंधा होकर वह भावी पीढ़ी के पांवों में अशिक्षा की बेड़ियां डाल बैठता है। शिक्षा व्यक्ति को केवल रोजगार ही हासिल करने में मदद नहीं करती बल्कि जीने और सोचने के उसके अंदाज में भी परिवर्तन लाती है। कुछेक निजी स्वार्थों में घिरे अथवा पुरातनपंथी लोग नई पीढ़ी के जीने और सोचने के अंदाज में आने वाले इन परिवर्तनों को प्राप्त शिक्षा का दोष करार दे डालते हैं। सुभाष नीरव की लघुकथा 'कत्ल होता सपना' में बेटी इस परिवर्तन की प्रतीक बनी है तथा 'नालायक' में बेटा। 'सहयात्री' एक द्वंद्व-प्रधान लघुकथा है। यह उनकी पूर्व आकलित लघुकथा 'फर्क' में वर्णित समाज का सकारात्मक पहलू है। 'फर्क' में सीट पर बैठे नौजवान जहाँ असभ्यता की सीमा तक द्वंद्वरहित रहते हैं वहीं 'सहयात्री' में सीट पर बैठे पुरुष के मन में निरंतर झंझावात चलता है जो अन्तत: उसे वही करने को उकसाता है जो किसी भी सत्पुरुष को वैसी स्थिति में करना चाहिए। 'भला मानुष' को अन्तर्मन की आवाज के रूप में देखना चाहिए। वह नौजवान जो कार-दुर्घटना में घायल एक युवती को अस्पताल पहुंचाने की सामाजिक जिम्मेदारी निभाता है, अस्पताल पहुंचने तक सांत्वना देने के बहाने ऑटो में उसकी पीठ को सहलाने, गाल थपथपाने और उसका मुँह-माथा चूमने जैसी काम-चेष्टाएं करता रहता है-

''घबराओ नहीं... हिम्मत रखो... कुछ नहीं हुआ। अभी पहुँचे जाते हैं अस्पताल। सब ठीक हो जाएगा।'' कहते हुए वह लड़की की पीठ सहलाने लगा। कहारती हुई लड़की को वह रास्तेभर दिलासा देता रहा। कभी उसके गाल थपथपाकर, कभी सिर, कन्धे, कमर, हाथ-पैर दबाकर और कभी उसका मुँह-माथा चूमकर कहने लगता, ''बस, अभी पहुँचे अस्पताल... हिम्मत रखो! ड्राइवर! पीछे क्या देखते हो? आगे देखो और थोड़ा तेज चलो।''

फ्रॉयड के अनुसार 'मनुष्य मात्र के सभी कर्मों की मूल प्रेरणा व्यक्ति की कामेच्छा है जो उसमें जन्म से ही उत्पन्न हो जाती है। उसका कहना है कि व्यक्ति का समस्त जीवन इसी कामेच्छा की तृप्ति का इतिहास होता है। उसने इसे 'रंजन सिद्धान्त' (प्लेयर प्रिंसीपिल) नाम दिया है। उसका मानना है कि सामाजिक दृष्टि से अशोभनीय इच्छाएँ व्यक्ति के अचेतन में चली जाती हैं और वह उन्हें चेतन में आने से रोक लेता है। समयानुरूप ये दमित इच्छाएँ समाज सेवा, मानवसेवा अथव प्राणी सेवा जैसा परिष्कृत रूप धारण करके चेतन में प्रवेश पाने में समर्थ हो जाती हैं।' सुभाष नीरव की लघुकथा 'भला मानुष' के नायक का कृत्य फ्रॉयड के इस सिद्धान्त को पुष्ट करता है।
'तिड़के घड़े' लघुकथा के रूप में वृद्ध-जीवन का यथार्थ-दर्शन है। इस पूरी कथा को समझने के लिए पाठक का निम्न पंक्तियों में बद्ध बिम्ब को समझ लेना नितान्त आवश्यक है जो सुभाष नीरव के ग्राम्य-संस्कारों की देन है तथा जिसे शैल्पिक कलाकारी दिखाते हुए एक अच्छे बॉलर की तरह उन्होंने कथा के करीब-करीब उस स्थान पर टप्पा खिलाया है जिसे क्रिकेट की भाषा में 'फुल लेंथ' कहा जाता है-

दिनभर शब्दों के अनेक कंकर-पत्थर बूढ़ा-बूढ़ी के मनों के शान्त और स्थिर पानियों में गिरते रहते हैं। गुड़ुप-सी आवाज होती है। कुछ देर बेचैनी की लहरें उठती हैं और फिर शान्त हो जाती हैं।

इन लघुकथाओं में सुभाष नीरव एक समर्थ कथाकार होने का परिचय देते हुए कथ्य और कथानक दोनों ही स्तरों पर प्रस्तुति-वैभिन्य का निर्वाह करने में सफल रहे हैं। किसी एक ही विषय अथवा भाव पर उन्होंने अनेक लघुकथाएं न लिखकर जहाँ अपने अनुभवों की व्यापकता का परिचय दिया है, वहीं एक वस्तु को अनेक कोण प्रदान करने की कथात्मक त्वरा का उन्होंने सफल निर्वाह किया है। अपनी लघुकथा 'बांझ' में उन्होंने बच्चे की अनुशासनहीनता की ओर से अपनी आँखें मूंदे रखकर प्रकारान्तर से उसको प्रश्रय देने वाली माँ का चित्र प्रस्तुत किया है तो 'वाह मिट्टी' में बच्चे को अनुशासित रखने की जिद में उसकी स्वाभाविक क्रीड़ा-वृत्ति को बाधित कर डालने वाली अतिरिक्त-सावधानी से युक्त माँ का चित्र प्रस्तुत किया है-

''छी-छी! गंदी मिट्टी! मिट्टी में नहीं खेलते बेटा। देखो, हो गए न गंदे हाथ-पैर! छी!'' सोनू बाहर चला जाता तो रमा उसे तुरन्त उठाकर अन्दर ले आती। प्यार से समझाती-झिड़कती।

यह अतिरिक्त सावधानी और हर समय की टोका-टाकी स्वतन्त्र रूप से खेलने की बच्चे की भावना का दमन कर देती है-

फिर, न जाने क्या हुआ कि सोनू ने बाहर जाकर मिट्टी में खेलना तो क्या उधर झांकना भी बन्द कर दिया। दिनभर वह घर के अन्दर ही घूमता रहता। कभी इस कमरे में, कभी उस कमरे में। कभी बाहर वाले दरवाजे की ओर जाता भी तो तुरन्त ही 'छी मित्ती!' कहता हुआ अन्दर लौट आता। अब न सोनू हँसता था, न किलकारियाँ मारता था। हर समय खामोश और गुमसुम-सा बना रहता।

इस दमित बच्चे को दादा-दादी के समीप गांव में भेजकर और मिट्टी में खेलता हुआ दिखाकर सुभाष नीरव बच्चे को उसकी जड़ों और परम्पराओं से जोड़े रखने का पक्ष पाठकों के समक्ष रखते हैं।
गत सदी के छठे-सातवें दशक तक भी भारतीय माता-पिता शैशवकाल से ही अपने बच्चों को कुछ नैतिकताएँ सिखाने की ओर सचेत देखे जाते थे। ग्राम-संस्कारों वाले माता-पिता को छोड़कर यह चेतनता महानगरीय क्या नगरीय और कस्बाई संस्कारों के माता-पिता में भी अब नहीं बची है। नैतिक-शिक्षा की दृष्टि से माता-पिता द्वारा आज का बच्चा पूर्वकाल के बच्चों की तुलना में लगभग पूरी तरह अनदेखा और अनछुआ है। बच्चे की विध्वंसक गतिविधियों को आज के माता-पिता उसकी शिशु-सुलभ चपलता और बुद्धिमत्ता मानते और उल्लसित होते हैं तथा दूसरों के समक्ष उनका वर्णन बिल्कुल इस अंदाज में करते हैं जैसे कि उनका लाड़ला अपने समय के शेष सभी शिशुओं में विशिष्ट हो। इस क्रम में वे दूसरों की कोमल भावनाओं को आहत करने से भी अक्सर नहीं चूकते हैं। 'बांझ' में सुभाष नीरव ने इसी क्लिष्ट मनोवैज्ञानिक विषय को कथ्य बनाया है और सफलतापूर्वक निभाया भी है।

'इस्तेमाल' स्थापित एवं वयोवृद्ध लेखकों द्वारा नवोदित एवं साहित्य-क्षेत्र में स्थापित होने के लिए संघर्षरत लेखकों के भावनात्मक शोषण की कथा है।
बाल-मन कितना सरल, निर्मल और निर्भय होता है, इसे लघुकथा 'अपने घर जाओ न अंकल' में खेलने के लिए कर्फ्यू के दौरान भी घर से बाहर सड़क पर निकल आए बालकों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। सरलता का इससे बड़ा उदाहरण दूसरा क्या हो सकता है कि बच्चे उन्हें डराने-धमकाने वाले सिपाही के प्रति ही संवेदनशील हो उठते हैं और उसे भी कर्फ्यूग्रस्त इलाके में न घूमते रहकर घर चले जाने और अपना जीवन बचाने की सलाह दे देते हैं।
आदमी का दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक इतिहास बताता है कि वह क्षुद्र स्वार्थों का उलझा हुआ गुच्छा है। अनेक स्थितियों में क्षुद्र स्वार्थों के कारण ही वह धर्म-निरपेक्ष होने का ढोंग रचता है जबकि यथार्थत: वह संकुचित आस्था और विश्वास से आजन्म मुक्त नहीं हो पाता। नि:संदेह प्रत्येक क्षुद्र स्वार्थ मानवीय दृष्टि से या तो सकारात्मक होता है या फिर नकारात्मक, बिल्कुल वैसे जैसे यथार्थ सिर्फ कटु नहीं होता, मृदु भी होता है तथा यथार्थ का चित्रण सिर्फ सकारात्मक प्रभाव ही नहीं उत्पन्न करता, नकारात्मक प्रभाव भी उत्पन्न करता है। सुभाष नीरव की लघुकथा 'धर्म-विधर्म' में चित्रित पति समाज की नकारात्मक स्वार्थ वाली इकाई का प्रतिनिधि है। इसमें यद्यपि पत्नी द्वारा पुत्र का पक्ष लेने हेतु पति के समक्ष प्रस्तुत तर्कपूर्ण कथन को भी क्षुद्र स्वार्थ की श्रेणी में ही गिना जा सकता है परन्तु सामाजिक सरोकार की दृष्टि से वह सकारात्मक प्रभाव वाला है। समकालीन लघुकथाओं का आकलन वस्तुत: इस दृष्टि से भी होना चाहिए कि उनमें व्यक्त अपने समय के सकारात्मक अथवा नकारात्मक अथवा दोनों प्रकार का यथार्थ किस स्तर का मानसिक उद्वेलन उत्पन्न कर रहा है।
सुभाष नीरव नौवें दशक के प्रतिभासंपन्न लघुकथाकार हैं। रूपसिंह चंदेल व हीरालाल नागर के साथ उनकी लघुकथाओं को एक संकलन 'कथाबिंदु' सन् 1997 में आ चुका है। और अब उनकी अपनी लघुकथाओं का पहला एकल संग्रह नीरज बुक सेंटर, पटपड़ गंज, दिल्ली से ‘सफ़र में आदमी’ शीर्षक से प्रकाशित होकर जनवरी 2012 में पाठकों के समक्ष आने वाला है। लेखन, अनुवाद व संपादन आदि लघुकथा की बहुआयामी सेवा के मद्देनजर लघुकथा के लिए पूर्णत: समर्पित पंजाब की साहित्यिक संस्था 'मिन्नी' द्वारा सन् में उन्हें प्रतिष्ठित 'माता शरबती देवी पुरस्कार' से सम्मानित किया जा चुका है। इस संकलन की लघुकथाओं को पढ़कर नि:संकोच कहा जा सकता है कि अपने समकालीनों की तुलना में भले ही उन्होंने कम और कभी-कभार लेखन किया है लेकिन जितना भी किया है वह अनेक दृष्टि से उल्लेखनीय है। सबसे बड़ी बात यह कि लघुकथा के प्रति समर्पित भाव उनमें लगातार बना रहा है। उनके इस जुड़ाव के कारण ही पंजाबी का लघुकथा-संसार हिन्दी क्षेत्र के संपर्क में बहुलता से आना प्रारम्भ हुआ जिसे सौभाग्य से अन्य अनुवादकों का भी संबल हाथों-हाथ मिला। उनकी लघुकथाएं लघुकथा-लेखन के अनेक आयाम प्रस्तुत करती हैं और हिन्दी लघुकथा-साहित्य की सकारात्मक धारा को पुष्टि प्रदान करती हैं।
संपर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मोबाइल: 9968094431

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

वातायन-दिसम्बर,२०११



हम और हमारा समय

रवीन्द्र नाथ टैगोर, शांतिनिकेतन और रोज़ा हजनोशी गेरमानूस की डायरी



रूपसिंह चन्देल

पिछले दिनों हंगरी की एक गृहणी की डायरी ’अग्निपर्व: शांतिनिकेतन’ पढ़ने का अवसर मिला, जिसका हिन्दी अनुवाद कार्तिक चन्द्र दत्त ने किया है. गेरमानूस अप्रैल १९२९ से १९३१ तक शांतिनिकेतन में रही थीं और मार्च,१९३२ के अंत में बुडापेस्ट वापस लौट गई थीं. हंगरी में यह ’बेंगाली तूज़’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, जिसका अंग्रेजी अनुवाद ’ फा़यर ऑफ बेंगाल’ के नाम से हुआ था. हंगरी में इसका प्रकाशन १९४४ में हुआ था. पुस्तक के प्रकाशन से दो वर्ष पहले लेखिका ने आत्महत्या कर ली थी. कारण आज तक अज्ञात हैं.

इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि १९४४ से १९७२ के मध्य इसकी १० लाख प्रतियां बिक चुकी थीं. १९४५ से १९५६ तक हंगरी रूस के अधीन रहा और उस दौरान इसका प्रकाशन बंद रहा था. आश्चर्य यह कि इसका अंग्रेजी अनुवाद बहुत बाद में प्रकाशित हुआ और वह भी बांग्ला देश में. सोचा जा सकता है कि इस पुस्तक में ऎसा क्या आपत्तिजनक था कि इसका अंग्रेजी अनुवाद ब्रिटेन के किसी प्रकाशक ने नहीं प्रकाअशित किया या उन्हें प्रकाशित करने से रोका गया. भारत में पहली बार कार्तिक चन्द्र दत्त ने इसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करवाया. आश्चर्य यह भी कि बांग्ला में इसका आज तक अनुवाद नहीं हुआ.

यद्यपि इसे एक डायरी कहा गया है और लिखा भी उसी रूप में गया है, लेकिन इसकी शैली औपान्यासिक है. यह अपने समय का एक जीवन्त दस्तावेज है, जो रवीन्द्र नाथ टैगोर, अमिय चक्रवर्ती, गांधी जी सहित अनेक विशिष्ट लोगों पर विस्तार से प्रकाश डालती है. लेखिका के पति ज्य़ुला के अनुसार गेरमानुस दैनिन्दिन अपनी डायरी लिखती थीं, जिसे सुव्यवस्तित रूप से पुस्तक का रूप उन्होंने १९३२ में हंगरी वापस लौटने के बाद दिया था. ज्य़ुला अरबी-फारसी के विद्वान थे और शांतिनिकेतन में तीन वर्षों के लिए उन्हें टैगोर ने ये भाषाएं पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था.

यह डायरी टैगोर के जीवन के एक ऎसे पहलू से परिचित करवाती है जिसके विषय में हम कम ही जानते हैं. अमिय चक्रवर्ती भी वहां प्राध्यापक थे. उनकी शिक्षा पश्चिम में हुई थी और वह पूरी तरह उस सभ्यता से प्रभावित थे. भारत आने से पहले उन्होंने एक स्वीडिश लड़की से विवाह किया था, जिसका हिन्दू रीति-रिवाज से पुनः विधिवत विवाह शांतिनिकेतन में टैगोर ने करवाया था. टैगोर ने उस स्वीडिश युवती को नाम दिया था हेमन्ती. हेमन्ती ने न केवल हिन्दू धर्म स्वीकार किया बल्कि वह हिन्दू संस्कृति में यों रमी कि पश्चिम को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी. साड़ी उसका परिधान हो गया और पूरी तरह से वह भारतीयता में रंग गयी. लेकिन पश्चिम के रंग में रंगे अमिय को पत्नी का वह रुप स्वीकार नहीं था. लेकिन हेमन्ती ने इसकी परवाह नहीं की और वह अमिय की उपेक्षा करती हुई महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में कूद गयी. वह साबरती आश्रम गयी और गिरफ्तार होकर पूना में महीनों जेल में रही. उससे प्रभावित शांतिनिकेतन के कितने ही छात्र-छात्राएं असहयोग आंदोलन में कूद पड़े. टैगोर को जब यह ज्ञात हुआ तब उन्होंने अमिय को डांटते हुए कहा – “तुमने अपनी पत्नी पर अंकुश नहीं रखा…उसे दबाया नहीं…उसीका परिणाम है कि वह साबरमती जा पहुंची”. यही नहीं शांति निकेतन के जो छात्र-छात्राएं गांधी जी के समर्थक थे टैगोर ने उन्हें शांतिनिकेतन छोड़ने के आदेश दिए. दो अंग्रेज अध्यापक भी गांधी जी के समर्थक थे, उन्हें भी शांतिनिकेतन छोड़ना पड़ा था. टैगोर की दृष्टि में गांधी जी का आंदोलन अर्थहीन था. संक्षेप में ---पुस्तक के अनुसार टैगोर गांधी के विरुद्ध दिखाई देते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा राष्ट्रगान जार्ज पंचम के स्वागत के लिए लिखा गया था. तो क्या टैगोर अंग्रेजपरस्त थे? जब वह अमिय को हेमन्ती पर अंकुश न लगाने और उसे दबाकर न रख पाने की बात करते हैं तब वह भारतीय नारी के विषय में पुरुष के पारम्परिक सोच को पोषित करते दिखते हैं, लेकिन दूसरी ओर वह शांतिनिकेतन में लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रेरित करते हुए भी दिखते हैं. यह कैसा विरोधाभास था? अनुवादक के अनुसार ऎसी ही कितनी ही बातों और अमिय चक्रवर्ती के विरोध के चलते (अमिय के जर्मन युवती रुडिगर गेरट्रुड के साथ संबन्ध बन गए थे और उसके साथ उन्होंने शांतिनिकेतन छोड़ दिया था) इस पुस्तक का प्रकाशन लंबे समय तक भारत में नहीं हो सका….शायद अंग्रेजी में बांग्लादेश जैसे छोटे–से देश से होने के पीछे भी यही कथा रही हो.

लेखिका ने भारतीय अंधविश्वासों और गंदगी का जो वर्णन किया है वह आज भी उतना ही सच है, लेकिन उसने यहां के लोक जीवन की प्रशंसा में भी पृष्ठ दर-पृष्ठ रंगे हैं---विशेषरूप से आदिवासियों के जीवन ने उसे बहुत अधिक प्रभावित किया था. इतिहास पर जिस अधिकार के साथ वह बात करती हैं उतने ही अधिकारपूर्वक वह आध्यात्म और दर्शन पर चर्चा करती हैं.

६२० पृष्ठों की इस पुस्तक को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित कर एक स्तुत्य कार्य किया है.
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वातायन में इस बार प्रस्तुत है सुभाष नीरव द्वारा प्रस्तुत ’दिल्ली संवाद’ की ओर से आयोजित संगोष्ठी की रपट और मेरे द्वारा अनूदित संस्मरण पुस्तक –लियो तोलस्तोय का अंतरंग संसार’ का प्राक्कथन. पुस्तक शीघ्र ही संवाद प्रकाशन मेरठ से प्रकाश्य है.
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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

रपट


सभागार में बैठे साहित्यकार और विद्वान




लोकार्पण और विचार संगोष्ठी




साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था ’दिल्ली संवाद’ की ओर से ९ दिसम्बर,२०११ को साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने की और मुख्य अतिथि थे डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय. कार्यक्रम का संयोजन और संचालन वरिष्ठ लेखक और पत्रकार बलराम ने किया. इस आयोजन में भावना प्रकाशन, पटपड़गंज, दिल्ली से प्रकाशित चर्चित चित्रकार और लेखक राजकमल के उपन्यास ’फिर भी शेष’ पर चर्चा से पूर्व भावना प्रकाशन से सद्यः प्रकाशित दो पुस्तकों – वरिष्ठतम कथाकार हृदयेश की तीन खण्डों में प्रकाशित ’संपूर्ण कहानियां’ और वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल की ’साठ कहानियां’ तथा वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रेमजनमेजय पर केंद्रित कनाडा की हिन्दी पत्रिका ’हिन्दी चेतना’ का लोकार्पण किया गया.

चन्देल ने कभी नीलाम होना स्वीकार नहीं किया : बलराम

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए बलराम ने भावना प्रकाशन, उसके संचालक श्री सतीश चन्द्र मित्तल और नीरज मित्तल के विषय में चर्चा करने के बाद वरिष्ठतम कथाकार हृदयेश के हिन्दी कथासाहित्य में महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे अपने समय के सशक्त रचनाकार रहे हैं जो अस्सी पार होने के बावजूद आज भी निरंतर सृजनरत हैं.
(साठ कहानियां’ का लोकार्पण : बाएं से - बलराम, डॉ. नामवर सिंह, नीरज मित्तल(पीछे), रूपसिंह चन्देल, डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय और डॉ. राजेन्द्र गौतम(बैठे हुए).


”कथाकार रूपसिंह चन्देल के उपन्यासों और कहानियों की चर्चा करते हुए बलराम ने कहा कि चन्देल के न केवल कई उपन्यास चर्चित रहे बल्कि अनेक कहानियां भी चर्चित रहीं. उन्हीं में से श्रेष्ठ कहानियों का संचयन है उनका कहानी संग्रह – ’साठ कहानियां’. उन्होंने कहा कि चन्देल समकालीन कथा साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं जो अपनी सृजनशीलता में विश्वास करते हैं. चन्देल के विषय में मित्रगण जो बात गहनता से अनुभव करते हैं उसे सार्वजनिक मंच से उद्घोषित करते हुए बलराम ने कहा - “चन्देल ने कभी नीलाम होना स्वीकार नहीं किया.”

प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेमजनमेजय की व्यंग्ययात्रा पर प्रकाश डालते हुए बलराम ने कहा कि समकालीन व्यंग्यविधा के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है और उनके योगदान का ही परिणाम है कि कनाडा की हिन्दी चेतना ने उनपर केन्द्रित विशेषांक प्रकाशित किया.

(हिन्दी चेतना का लोकार्पण: बाएं से - डॉ. अर्चना वर्मा, बलराम, डॉ.नामवर सिंह, नीरज मित्तल, डॉ. श्रोत्रिय और डॉ. गौतम)


लेखकों पर बलराम की परिचायत्मक टिप्पणियों के बाद दोनों पुस्तकों और पत्रिका के लोकार्पण डॉ. नामवर सिंह, डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय और डॉ. अर्चना वर्मा द्वारा किया गया.

’फिर भी शेष’ पर विचार संगोष्ठी

लोकार्पण के पश्चात राजकमल के उपन्यास ’फिर भी शेष’ पर विचार गोष्ठी प्रारंभ हुई. डॉ. अर्चना वर्मा ने अपना विस्तृत आलेख पढ़ा. आलेख की विशेषता यह थी कि उन्होंने विस्तार से उपन्यास की कथा की चर्चा करते हुए उसकी भाषा, शिल्प और पात्रों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की. वरिष्ठ गीतकार डॉ. राजेन्द्र गौतम ने उपन्यास की प्रशंसा करते हुए उसे एक महत्वपूर्ण

(उपन्यास पर विचार गोष्ठी - बाएं से डॉ.श्रोत्रिय, डॉ. गौतम, डॉ.ज्योतिष जोशी, उपन्यासकार राजकमल और राजकुमार गौतम)

उपन्यास बताया. वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता ने उपन्यास पर अपना सकारात्मक मत व्यक्त करते हुए उसके कवर की प्रशंसा की. डॉ. ज्योतिष जोशी ने उसके पात्र आदित्य के चरित्र पर पूर्व वक्ताओं द्वारा व्यक्त मत से अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि उपन्यास ने उन्हें चौंकाया बावजूद इसके कि उसमें गज़ब की पठनीयता है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाती है. इन वक्ताओं के बोलने के बाद डॉ. नामवर सिंह ने जाने की इजाजत मांगी और “मैंने उपन्यास पढ़ा नहीं है, लेकिन वायदा करता हूं कि उसे पढ़ूंगा अवश्य और जो भी संभव होगा करूंगा.” कहते हुए उपस्थित भीड़ को हत्प्रभ छोड़कर नामवर जी तेजी से उठकर चले गए. नामवर जी के जाने के पश्चात उपन्यास पर अपना मत व्यक्त करते हुए बलराम ने कहा कि यह एक महाकाव्यात्मक उपन्यास है.

कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपना लंबा वक्तव्य दिया. उन्होंने उपन्यास के अनेक अछूते पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए पूर्व वक्ताओं से अपनी असहमति व्यक्त की, लेकिन लेखक की भाषा और शिल्प की प्रशंसा करने से अपने को वह भी रोक नहीं पाए.

भावना प्रकाशन के नीरज मित्तल ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया. इस अवसर पर बड़ी मात्रा में दिल्ली और दिल्ली से बाहर के साहित्यकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे. डॉ. कमलकिशोर गोयनका,डॉ. रणजीत शाहा, बलराम अग्रवाल,सुभाष नीरव, रमेश कपूर, प्रदीप पंत, उपेन्द्र कुमार, गिरिराजशरण अग्रवाल, राजकुमार गौतम सहित लगभग पचहत्तर साहित्यकार और विद्वान उपस्थित थे.

प्रस्तुति – सुभाष नीरव

लियो तोलस्तोय का अंतरंग संसार



मैक्सिम गोर्की के साथ तोलस्तोय





प्राक्कथन


रूपसिंह चन्देल

लियो निकोलाएविच तोल्स्तोय के अंतिम और अप्रतिम उपन्यास ’हाजी मुराद’ का अनुवाद करते समय न केवल उस महान लेखक के विषय में अधिकाधिक जानने बल्कि उनके पढ़े हुए साहित्य को पुनः पढ़ने की इच्छा जागृत हुई. यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके विषय में आलोचनात्मक, संस्मरणात्मक, जीवनीपरक---विपुल साहित्य उपलब्ध है. इसी प्रक्रिया में ’हेनरी त्रायत’ और ’विक्तोर श्लोव्स्की’ की जीवनियां पढ़ा. दोनों जीवनीकारों ने उनके रिश्तेदारों, मित्रों, सहयोगियों, लेखकों ,कलाकारों आदि के संस्मरणों, पत्रों और उनकी डायरियों को अपनी जीवनियों में अनेकशः उद्धृत किया है. इससे उन सबको मूल में पढ़ने की इच्छा हुई और तब खोज प्रारंभ हुई उन संस्मरणों, पत्रों और डायरियों की. जो सामग्री मुझे प्राप्त हुई और जिनका अनुवाद मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं मेरा अनुमान है उससे कम सामग्री मेरे लिए अप्राप्य रही. प्राप्त सामग्री में अधिकांशतया संस्मरण, तोलस्तोय की पत्नी सोफिया अंद्रेएव्ना की डायरी, पी.एम. त्रेत्याकोव के नाम आई.एन. क्रम्स्काई के दो पत्र, और मैक्सिम गोर्की की टिप्पणियां और उनका एक पत्र शामिल हैं. इन सबसे गुजरते हुए लियो तोलस्तोय के जीवन के अनेक अज्ञात पहलू मेरे समक्ष उद्घाटित हुए. मैंने अनुभाव किया कि वह न केवल महान लेखक थे बल्कि एक ऎसे महामानव थे जो सदियों में जन्मते हैं. कहना अत्युक्ति न होगा कि विश्व के वह एक मात्र ऎसे महानतम लेखक थे जिनका जीवन और लेखन उत्कृष्ट, चमत्कारिक और अतुलनीय था. उनका नाम होमर (Homer), लूथर (Luther) और बुद्ध के साथ जोड़ा गया. वह बुद्ध के दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थे. उनकी मृत्यु से दस वर्ष पहले चेखव ने याल्टा में कहा था, ’तोलस्तोय की मृत्यु को लेकर मैं भयभीत हूं. यदि वह मर जाते हैं, मेरे जीवन में एक विशाल शून्यता उत्पन्न हो जाएगी. उनके बिना हमारा साहित्य बिना चरवाहे का रेवड़ हो जाएगा.’
चेखव से लगभग बीस वर्ष पहले तुर्गनेव ने भी तोलस्तोय के विषय में कुछ ऎसे ही विचार व्यक्त किए थे और उनकी मृत्यु से दो वर्ष पहले अलेक्जेंदर ब्लॉक (Alexander Block) ने भी ऎसा ही भय प्रदर्शित किया था. न केवल प्रगतिशील बुद्धिजीवी उनकी मृत्यु से अपने को अनाथ और उनके नेतृत्व से वंचित अनुभव कर रहे थे, बल्कि साधारण जन भी वैसा ही अनुभव कर रहे थे.
तोलस्तोय की बेधक दृष्टि--- बाह्यातंर तक सब कुछ जान लेने की क्षमतावाली दृष्टि…के विषय में उनके कई मित्रों ने अपने संस्मरणों में उल्लेख किया है, लेकिन उसमें पर-दुखकातरता थी. उनका हृदय अपने मित्रों, परिचितों, परिजनों और गरीब किसानों के प्रति अगाघ प्रेम से ओतप्रोत था. किसानों की विपन्नता उन्हें विचलित करती थी. २८ जून, १८८१ को तोलस्तोय ने अपनी डायरी में लिखा, ’मैं एक गरीब आत्मा को देखने गया. वह एक सप्ताह से बीमार है. उसे दर्द और कफ है. पीलिया बढ़ रहा है. कुर्नोसेन्कोव को पीलिया था. कोन्द्राती उसी से मरा. गरीब लोग पीलिया से मर रहे हैं. वे फलाला से मर रहे हैं.’ वह आगे लिखते हैं, ’उसकी पत्नी की गोद में एक बच्चा है. तीन लड़कियां हैं और भोजन नहीं है. चार बजे तक उन्हें भोजन नहीं मिला था. लड़कियां सरसफल तोड़ने गयी थीं और वही उनका भोजन था.’
अपने संस्मरण ’यास्नाया पोल्याना से लेव निकोलाएविच का प्रस्थान’ में दुसान पेत्रोविच मकोवित्स्की ने लिखा, ’ लेव निकोलाएविच शांत थे. कम बोल रहे थे और ऎसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह थके हुए थे. पिछले दिन हमने कठिन और थकाऊ घुड़सवारी की थी. प्रस्थान से ठीक पहले मैंने गांव की दो गरीब महिलाओं से बात की थी, जो आग का शिकार थीं और ऎसा प्रतीत हो रहा था कि वे सहायता प्राप्त होने की आशा में तोलस्तोय की प्रतीक्षा कर रही थीं. जब वह आए उन्होंने उन्हें ग्रामीण सोवियत से प्राप्त हलफनामा दिखाया, लेकिन तोलस्तोय इतना अस्तव्यस्तता की स्थिति में थे कि उन्होंने न तो उन महिलाओं से बात की और न ही उन्हें पैसे दिए. मुझे याद है कि इससे पहले ऎसा कभी नहीं हुआ था.’
वह किसानों और गरीबों के मसीहा थे…अहर्निश उनके विषय में सोचने और उनके लिए कुछ न कुछ करते रहने वाले. वेरा वेलीच्किना; मैक्सिम गोर्की और इल्या रेपिन के संस्मरण इस विषय में पर्याप्त प्रकाश डालते हैं. अपने संस्मरण ’काउण्ट लेव निकोलाएविच तोल्स्तोय’ में रेपिन लिखते हैं :
’एक दिन यास्नाया पोल्याना में हम एक नंगे पांव मुज़िक से मिले जो सहायता प्राप्त करने के लिए लेव निकोलाएविच के पास जा रहा था . खेत बोने के लिए उसे बीज चाहिए थे.
’तुम्हे मिल जाएगें’ लेव निकोलाएविच ने सहजतापूर्वक कहा . ’मैं कह दूंगा. एक घण्टा बाद आ जाना __ कारिन्दा वह तुम्हे दे देगा.’
तोल्स्तोय ने इसी संदर्भ में रेपिन से कहा , ’गरीबी जीवन के महत्तम शिक्षकों में से एक है.’
‘युद्ध और शांति’, ‘अन्ना कारेनिना’, ‘पुनरुत्थान’, और ‘हाजी मुराद’ उपन्यास, तीन आत्मकथात्मक उपन्यास – ‘बचपन’, ‘किशोरावस्था’, और ‘कज्ज़ाक’, ‘फ़ादर सेर्गेई’, ‘इवान इल्यीच की मृत्यु’, ‘क्रुज़र सोनाटा’ (लंबी कहानी), ‘घोड़े की कहानी’, ‘बाल नृत्य के बाद’ आदि कहानियाँ, ‘अंधकार की सत्ता’ तथा ‘जीवित शव’ नाटक सहित लगभग पचीस कृतियों के लेखक तोलस्तोय ने जीवन से ही अपने पात्रों के चयन किए. उन्होंने रूसी जनता के कार्यों, खुशियों और दुखों को जिसप्रकार अभिव्यक्त किया उसने उन्हें विश्व साहित्य में महानता के शिखर पर पहुंचा दिया. विषय और भाषा के चयन के प्रति वह अत्यधिक सतर्क रहते थे. संतुष्ट होने तक बार-बार लिखते थे. ६ अक्टूबर, १८७८ को अपनी डायरी में सोफिया अंद्रेएव्ना ने लिखा, ’सुबह मैंने लेव को नीचे की मंजिल में डेस्क पर लिखते हुए पाया. उन्होंने कहा कि वह अपनी नयी पुस्तक के प्रारंभ को दसवीं बार पुनः लिख रहे थे.’ मैक्सिम गोर्की से उनकी कहानी लोअर देप्थ्स (Lower Depths) पर चर्चा करते हुए तोलस्तोय ने पूछा, ’किस कारण तुमने इसे लिखा?’ गोर्की ने यथा संभव स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया. तोलस्तोय बोले, ’तुम मुर्ग की भांति चीजों पर झपटते हो, सदैव---और फिर तुम्हारी भाषा बहुत ही चौंकाने वाली है, युक्तियों से परिपूर्ण है, यह नहीं चलेगा. तुम्हें बहुत सादगीपूर्ण लिखना चाहिए, क्योंकि लोग सादगी से बात करते हैं. वे अलग-अलग शब्द बोलते हैं, लेकिन वे अपने को अच्छी प्रकार अभिव्यक्त कर लेते हैं.’----तुम्हारे हीरो वास्तविक चरित्र नहीं हैं. वे सब कुछ, एक जैसे हैं. संभवतः तुम महिलाओं को समझ नहीं पाए. अपनी सभी महिला पात्रों के चित्रण में तुम असफल रहे हो---कोई उन्हें याद नहीं रख पाएगा.’ शायद इसीलिए तोलस्तोय से बहुत-सी बातों में वैचारिक मतभेद के बावजूद गोर्की ने कहा, ’मैं इस संसार में अनाथ नहीं हूं जब तक यह व्यक्ति इसमें वास कर रहा है.’
’लियो तोलस्तोय का अंतरंग संसार’ की रचनाओं पर कार्य करते हुए मैंने अनुभव किया कि ये उनके पारिवारिक, सामाजिक, साहित्यिक, राजनीतिक, धार्मिक---अर्थात उनके बहुआयामी जीवन के सभी पक्षों पर प्रकाश डालती हैं और इनमें उनका जीवन संपूर्णता में प्रतिभाषित है. आशा है सुहृद पाठक इसका स्वागत करेंगे.

रूपसिंह चन्देल
गुरुपर्व, १0 नवंबर, २०११

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

वातायन- नवंबर,२०११





वातायन में इस बार ’हम और हमारा समय’ स्तंभ के अंतर्गत वरिष्ठ कवि और गज़लकार रामकुमार कृषक का आलेख प्रस्तुत है. साथ ही प्रस्तुत है वरिष्ठ कवि,कथाकार और पत्रकार अशोक आंद्रे की कविताएं और सोफिया अंद्रेएव्ना की डायरी के शेष अंश. वरिष्ठ कथाकार बलराम अग्रवाल ने पिछले दिनों खलील जिब्रान पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक तैयार की है, जिसका एक उल्लेखनीय अंश वह वातायन में प्रकाशनार्थ देने वाले थे, लेकिन किन्हीं व्यस्तताओं के कारण नहीं दे सके. वातायन के पाठकों तक वह आलेख न पहुंचा पाने के लिए मुझे खेद है. यदि संभव हुआ तो वह अंश दिसम्बर अंक में प्रकाशित हो सकेगा.

हम और हमारा समय

अन्ना से अ-लगाव



रामकुमार कृषक

'जन-लोकपाल बिल' को लेकर गत दिनों गाँधीवादी बुजुर्ग अन्ना हजारे का आंदोलन अपने शबाब पर था। प्राय: समूचा देश आंदोलित रहा। कम से कम दृश्य और पठ्य माध्यम तो यही दिखा रहे थे। मैंने स्वयं दो-तीन बार इंडिया गेट और रामलीला मैदान तक आवाजाही की। उसी उत्साह के चलते एक-दो कलमकार साथियों को भी साथ लेना चाहा। पर नहीं। एक उनमें से इसलिए झुँझला उठे कि मैंने किंचित हँसते हुए पूछ लिया था- 'भाई, अभी तक सो रहे हो क्या!' इससे शायद उनकी लेखकीय ईगो हर्ट हुई थी, क्योंकि मेरे स्वर में कुछ व्यंग जरूर था। दूसरे कवि मित्र से जब मैंने कहा कि यार, आओ तो... देखो कि जिसे तुम भीड़ कह रहे हो, उसका हिस्सा बनकर कैसा लगता है, तो वे मेरी नासमझी पर तरस खाते हुए बोले- अरे पंडज्जी, यह तो सोचो कि अन्ना के पीछे है कौन? वही आर.एस.एस. और बी.जे.पी. या फिर इलीट क्लास के चंद पढ़े-लिखे मटरगश्त। जनता वहाँ कहाँ है? तभी मैंने उस रिक्शाचालक को याद किया, जिसने मुझे गाँधी-शांति प्रतिष्ठान की बगल से रामलीला मैदान तक अपने तयशुदा भाड़े (20 रुपए) से पाँच रुपए कम लेकर पहुँचा दिया था, क्योंकि मैं अन्ना के 'जलूस' में शामिल होने जा रहा था!

नागार्जुन अपनी एक कविता में कहते हैं-

इतर साधारण जनों से / अलहदा होकर रहो मत
कलाधार या रचयिता होना नहीं पर्याप्त है
पक्षधर की भूमिका धारण करो
विजयिनी जनवाहिनी का पक्षधर होना पड़ेगा...

माने 'पक्षधर' होना अपरिहार्य है। स्वेच्छा से नहीं हुए तो 'होना पड़ेगा', क्योंकि अगर हम 'विजयिनी जनवाहिनी' या अपने युगीन 'विप्लवी उत्ताप' की अनदेखी कर हिमालय पर भी जा बसें तो भी उसके परिधिगत ताप से बच नहीं पाएँगे।
अन्ना कोई विप्लवी या क्रांतिकारी व्यक्तित्व नहीं हैं। न वे भगतसिंह हो सकते हैं, न महात्मा गाँधी। वनांचलों में सुलगती जनक्रांति के लिए सक्रिय लोगों तक भी वे शायद ही जाना चाहेंगे। फिर भी उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के संवैधानिक ढाँचे में रहते हुए जो कुछ किया, वह उपेक्षणीय नहीं। इसीलिए जिन सत्ताधीशों ने उनकी उपेक्षा की (और बाद में वंदना भी), वे स्वयं उपेक्षित हुए। जनबल ऐसा ही होता है। निर्बल, मगर जाग्रत जनता सदा ही महाबलियों को धूल चटाती है। 16 से 28 अगस्त, 2011 तक हमने यही देखा, और यह भी देखा कि उच्च शिक्षित जन, विद्यार्थी और ग्रामीण-कस्बाई लोग अन्ना जैसे अल्प शिक्षित और गँवई चेहरे-मोहरे वाले व्यक्ति को शिरोधार्य किए हुए थे। गाँधी अन्ना की तरह अल्प शिक्षित और ग्रामीण नहीं थे; पर ग्रामीणों जैसा बाना जरूर पहनते थे। अन्ना का बाना भी वैसा सादा नहीं है। फिर भी लोग उन्हें 'दूसरा गाँधी' कह रहे थे, और 'अन्ना' तो सबके सब हो ही गए थे, जबकि अन्ना ने स्वयं लोगों को चेताते हुए कहा- 'मैं अन्ना हूँ' की टोपी पहनकर ही आप अन्ना नहीं हो सकते! इस वाक्य के गहरे अर्थ हैं। यह बात किसी भी फैशनेबल या उत्सवधर्मी अनुयायित्व को आईना दिखानेवाली है।
यहीं हमें यह भी जानना होगा कि भ्रष्टाचार सिर्फ मौद्रिक रिश्वत का ही खेल नहीं है, बल्कि यह इस पूँजीवादी व्यवस्था में हमारे किसानों और श्रमिकों के शोषण, यानी उनके द्वारा उत्पादित पूँजी में उनकी उचित हिस्सेदारी का नहीं होना भी है। साथ ही इसका दूसरा छोर हमारी जनता के समग्र सामाजिक बोध और मनुष्य होने से जुड़ा हुआ है। किसी राष्ट्र-राज्य में भ्रष्टाचार के जितने भी रूप हैं, वे कानूनी अभाव या अक्षमता के उतने नहीं, जितने हमारी नैतिक चेतना के कुंद और कलुषित होने के परिणाम हैं। सत्ता-व्यवस्था कोई भी हो- पूँजीवादी या साम्यवादी, राजतंत्र या लोकतंत्र, उच्चतम मानव-मूल्य सब कहीं आवश्यक हैं; अन्यथा न गाँधी का रामराज्य आएगा, न माक्र्स का लोकराज्य।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और गणराज्य बने इसे इकसठ साल हो चुके हैं। इन छह दशकों में तरह-तरह की चुनौतियों से निबटते हुए हमने जो 'तरक्की' की है, देखा जाय तो उसी में हमारी पतनशीलता के बीज छुपे हुए हैं। विकास का पश्चिमी, पूँजीवादी मॉडल अपनाकर हमारे रंग-बिरंगे सत्ताधीशों ने जनता को जिस तरह लूटा है, उसका कोई सानी नहीं। और गत दो दशक से तो उसी पूँजीवादी विश्व द्वारा थोपी गई ग्लोबल अर्थ-व्यवस्था, यानी नव-साम्राज्यवादी लूटतंत्र के हिस्से होकर हमने जैसे सभी कुछ बहुराष्ट्रीय निगमों को सौंप दिया है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी आज जनता को नसीब नहीं, जबकि सार्वजनिक संसाधानों की लूट में शामिल वर्ग के लिए सबकुछ उपलब्ध है। जाहिरा तौर पर हमारा नेतृत्ववर्ग इस मोर्चे पर भी नेतृत्वकारी है। इसे श्रमिकों की नहीं, सटोरियों की परवाह है। सेंसेक्स ही इसके उत्थान-पतन का पैमाना है। इसके भरे पेटों के सामने स्विस बैंकों की भी कोई हैसियत नहीं, क्योंकि वे इन्हीं के बल पर हैसियतदार हुए हैं। जनता के खून-पसीने और देश की धूल-मिट्टी से सना पैसा इनके नामी-बेनामी खातों में पहुँचकर न जाने किस जादूगरी से स्वर्ण-मुद्राओं में तब्दील हो जाता है! बेशक उस जादूगरी या कानूनी-गैरकानूनी मकड़जाल से हम परिचित न हों, लेकिन जादूगरों को इस देश की जनता जरूर पहचानने लगी है।
ध्यान से देखा जाय तो पहचानने की इस प्रक्रिया के दो परिणाम दिखाई देते हैं। एक, आदिवासी बहुल लाल गलियारे में सशस्त्र नक्सलवादी जनांदोलन और दूसरा, अन्ना हजारे के 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' जैसे जनतांत्रिक आंदोलन। मार्क्सवादी दर्शन में ऐसे आंदोलन को सत्ता-समर्थित 'सेफ्टी वाल्व' कहा गया है, यानी जनता के भीतर सुलगते गुस्से और क्रांतिकारी व्यवस्था-परिवर्तन की आग को ठंडा करना। सच है, सत्ताएँ कई बार ऐसा करती हैं, लेकिन अंतत: दोनों की मिली-भगत सामने आ ही जाती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि अन्ना-आंदोलन के संदर्भ में ऐसी कोई आशंका नजर नहीं आती। हमारी विधायिका और कार्यपालिका के भ्रष्टाचरण को भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका ने बार-बार लक्षित किया है। मीडिया भी इस मामले में पीछे नहीं है, बेशक बाजार ही उसकी प्राथमिकता है। इसलिए अगर राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार या व्यवस्थाजन्य अन्य कदाचारों के विरुद्ध जनता का आक्रोश किसी गैर-सरकारी संगठन के पीछे लामबंद होता है तो जरूरी नहीं कि उसका अंतिम नतीजा नकारात्मक ही हो।
वैसे भी अगर हम 'जन-लोकपाल बिल' के प्रस्तावित प्रावधानों को देखें तो उनमें कुछ जोड़ा ही जा सकता है। मसलन, एन.जी.ओ. और कार्पोरेट क्षेत्र का भ्रष्टाचार और उन पर निगरानी। 'जन-लोकपाल बिल' के प्रारूप में इनको शामिल न किया जाना अन्ना-टीम को कठघरे में खड़ा करता है, और इसकी आलोचना हुई है। उम्मीद है, उसके संशोधित प्रारूप में ये दोनों क्षेत्र अनिवार्य रूप से शामिल होंगे। इनके अतिरिक्त बिल की शेष धाराओं या उसके कार्यकारी स्वरूप में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे संसदीय लोकतंत्र के लिए 'खतरनाक' कहा जाय। खतरनाक तो लोकतंत्र के लिए जन-प्रतिनिधियों से जनता का विश्वास उठ जाना है; और यह विश्वास सब कहीं टूटा है। गाँवों से लेकर शहरों तक सत्ता और पूँजी का मजबूत गँठजोड़ कायम है; और लोग बेबस हैं। अन्ना कहते हैं कि लोकतंत्र में लोक की ही अनदेखी हो रही है। हर जगह उसे किनारे कर दिया गया है। इस संदर्भ में उनकी दो अवधारणाओं पर विचार करें- 'जन-संसद' और 'ग्रामसभा'। हम सभी जानते हैं कि संसद की सर्वोच्चता या संसदीय गरिमा को सांसद ही भंग करते आए हैं-जनता नहीं- चाहे वे किसी भी दल के हों। वामपंथी दलों को अवश्य इससे कुछ अलग रखना होगा। यहाँ 'जन-संसद' का आशय अन्ना-टीम जैसे लोगों से नहीं है, बल्कि इस देश की समूची जनता से है, जो कि अपने मताधिकार से भारतीय संसद को सप्राण करती है। इसलिए संसद को जनता की आवाज के दायरे में होना ही चाहिए। इस पद का यही आशय है। दूसरा पद है- 'ग्रामसभा'। कहा जा सकता है कि हमारे गाँवों में निर्वाचित ग्राम-पंचायतें हैं तो। लेकिन तथ्य यह है कि उनके सदस्य या पंच प्रधान प्रेमचंद के 'पंच परमेश्वर' नहीं रह गए हैं, बल्कि उनका आचरण जूनियर सांसदों और विधायकों जैसा है। पैसा, पावर और जातिवादी राजनीति ने उन्हें पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो हमारी ग्राम-पंचायतें राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजनीति तथा स्थानीय प्रशासनिक निकायों के स्वार्थों की ही पूर्ति करती हैं, व्यापक जनहित से उन्हें कोई मतलब नहीं। जन-कल्याण के नाम पर आया पैसा वोट बैंक के हिसाब से खर्च हो जाता है। गाँव-देहात के लिए, खेत-खलिहानों के लिए कानूनों का निर्माण वैभवशाली गुंबदों में बैठे वे लोग करते हैं, जो कि जनता द्वारा ही पंचसाला भोग के लिए अधिकृत कर दिए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, हमारी जनता अपने ही वोट से अपना सबकुछ हार जाती है। कविता में कहा जाय तो संसदीय जनतंत्र की एक परिभाषा यह भी है-
वोट हमारा हार हमारी जीत-जश्न उनके
द्यूतसभा शकुनी के पासे बिछी बिसातें हैं

जाहिर है, ऐसे जनतंत्र का या तो खात्मा होगा या वह सुधरेगा। इसलिए अन्ना अगर संसद और प्रशासन को जनता के प्रति ज्यादा उत्तरदायी बनाने की बात करते हैं, तो रास्ता यह भी है। असल में तो जन-लोकपाल बिल में शामिल माँगों को सत्ता के जनोन्मुखीकरण की तरह देखा जाना चाहिए। चुनाव-सुधारों को लेकर 'राइट टु रिजेक्ट' और 'राइट टु रिकॉल' जैसी माँगों का भी यही मतलब है। चुनाव-खर्च के लिए अकूत धन जुटाने का मसला भी इसी से जुड़ा हुआ है। हमने देखा ही कि जन-लोकपाल बिल के सिर्फ तीन जरूरी प्रावधानों की अनिवार्यता को लेकर सत्ता पर काबिज चौपड़बाजों ने किस कदर गोटियाँ चलीं। ऐसे में पूरे के पूरे 'जन-लोकपाल बिल' का क्या हश्र होगा, इसकी भी कल्पना की जा सकती है।
अंतत: मैं फिर से शुरुआत की ओर लौटना चाहता हूँ। केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता 'घन-गर्जन' की कुछ पंक्तियाँ हैं-

लेखनी गर्दन झुकाए / सिर कटाए
कायरों की गोद में ही झूल जाए
यह न होगा
लेखनी से यह न होगा
फूल बोएँ / शूल काटें / पेट काटें
रोटियाँ रूठी रहें हम धूल चाटें
यह न होगा
लेखनी से यह न होगा
जिंदगी की आन हारें / ज्ञान हारें
आँसुओं से आग के कुंतल सँवारें
यह न होगा
लेखनी से यह न होगा...

इसके बाजवूद विडंबना ही है कि हमारी प्रगतिशील और जनवादी लेखक बिरादरी ने अन्ना-आंदोलन से सुरक्षित दूरी बनाए रखी। संदेह और तर्कशीलता भले ही बुद्धिजीवियों की खास पहचान है, पर अगर यह पहचान जनता में उन्हें ही अपरिचित बनाए रखे, तो किस काम की। इसी के चलते कहा जाता है कि लेखक वाकई किसी दूसरी दुनिया का जीव होता है। दिल्ली में ही अनेकानेक वरिष्ठतम लेखकों की मौजूदगी है; प्रलेस, जलेस, जसम जैसे संगठन भी हैं, पर न कहीं कोई लेखक व्यक्तिगत तौर पर दिखा और न सांगठनिक स्तर पर किसी की राय सामने आई। ऊपर से रोना यह कि हिंदी समाज में लेखक की कोई हैसियत नहीं। अंग्रेजी में अरुंधती राय हैं, जो विरोधद में ही सही, बोलती तो हैं। यहाँ तो चुप्पी ही शायद सबसे ऊँची आवाज है! हाँ, एक आवाज हिंदी में दलित लेखकों की जरूर है, जो अक्सर ही अलग बोलते हैं। उन्हें संसद की उतनी नहीं, जितनी संविधान की चिंता है, जो उनके लिए किसी बाइबिल से कम नहीं, जबकि उसी ने उसमें संशोधान का अधिकार भी संसद को दिया है। बाबा साहेब अंबेदकर ने संविधान में यह कहीं नहीं लिखा कि जनता के वोट से चुनकर संसद में आए सांसद जनता की ही अनदेखी करें। दरअसल संविधान, संसद और जनता परस्पर पूरक की तरह हैं, न कि प्रतियोगी या प्रतिद्वंद्वी। इसके बावजूद संसदीय जनतंत्र, बल्कि संविधान को भी नकारनेवाली ताकतें हमारे यहाँ सक्रिय हैं, और उनके कुछ वाजिब तर्क हैं; और अगर आज वे हमारी जनता को सहज स्वीकार्य नहीं हैं, तो जरूरी नहीं कि कल भी स्वीकार्य न हों।
अन्ना हजारे गाँधीवादी हैं। चिंतक नहीं, सत्याग्रही। बल्कि गाँधी जैसे सत्याग्रही और अहिंसावादी भी नहीं। ठेठ किसानी अंदाज में बोलते हैं। मुहावरेदार बोली-बानी में - माल खाए मदारी और नाच करे बंदर! या फिर - भगवान को मानता हूँ, मंदिर को नहीं! अथवा- कुछ लोग इसलिए जी रहे हैं कि क्या-क्या खाऊँ और कुछ इसलिए कि क्या खाऊँ! जनता इस भाषा को खूब समझती है। शोषणकारी सिद्धांत और प्रक्रिया को नहीं समझती। तालियाँ बजाती है। नारे लगाती है। और संसद में बैठे मदारी बगलें झाँकते हैं। यह एक दृश्य है, जिसे किसी फिल्मांकन की जरूरत नहीं। ऐसे में हम वहाँ नहीं होंगे तो कोई और होगा। भाजपा, आर.एस.एस. वगैरह। अन्ना की नहीं, सोनिया की सत्ता पलटने आएँगे वे -कोढ़ में खाज की तरह। दूसरी ओर हम हैं, जो मरहम होने का दावा करते हैं, लेकिन जनता के घावों को देखना तक नहीं चाहते। माना कि अन्ना के साथ गाँव-देहात की जनता नहीं थी, लेकिन महानगरों में जो 'जनता' है, उसमें क्या हमारे गाँव शामिल नहीं हैं? फिर मध्यवर्ग में भी बढ़ोत्तरी हुई है। उसमें भी किसानों और मजदूरों की कुछ हिस्सेदारी है। गाँव के गाँव उजड़कर शहरों में चले आ रहे हैं। लेकिन उनमें हमारी कोई दिलचस्पी नहीं। पढ़ा-लिखा शहरी मध्यवर्ग ही हमारे लिए मध्यवर्ग है, जबकि उसकी उच्च-मधयवर्गीय-या पूँजी-केंद्रित महत्वाकांक्षाओं को हम लगातार अनदेखा करते हैं, क्योंकि वही हमारा भी आईना है। सच तो यह है कि मार्क्सवादी कहलाने से ज्यादा डर हमें गाँधीवादी कहलाने से लगता है, पर सच यह भी है कि मार्क्स हमारे जीवन-व्यवहार की नैतिक और सामाजिक परिधि में आज भी शामिल नहीं हैं; अन्यथा क्या वे हमें हमारी जनता के बीच जाने से रोक देते? अगर वह प्रतिगामियों के फेर में है तो भी, और नहीं है तो भी। आखिर भटकावों में सही दिशा देने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होनी चाहिए; और यह जनता से दूर रहकर नहीं हो सकता।
संदर्भ बेशक श्रम-संबद्धता का है, लेकिन 1975 में एक साक्षात्कार के दौरान रूसी-हिंदी विद्वान डॉ. पी. बरान्निकोव ने मुझसे कहा था- ''मुझे लगता है, आपके साहित्यकार श्रेष्ठता-बोध के शिकार हैं। समाज से ऊपर हैं जैसे, समाज में नहीं हैं। फिर जो आपका लोकतंत्र है, उसमें पूँजी का महत्व है, श्रम का नहीं। इससे जो कल्चर बन रही है, वह अलगाव की है, एकता की नहीं है। तो इसका प्रभाव लेखकों पर भी है। वे जनता से दूर जा रहे हैं। प्रेमचंद जैसे जानते थे अपने लोगों को, वे नहीं जानते। या जानने से बचते हैं कि कहीं बड़े लोगों का तबका उन्हें छोटा न समझने लगे!''-कहा उन्होंने', पृ.-167

(‘अलाव’ सितम्बर-अक्टूबर, २०११ से साभार)
संपर्क – ’अलाव’
संपादक – रामकुमार कृषक
सी-३/५९, नागार्जुन नगर, सादतपुर विस्तार,
दिल्ली – ११००९४
मो. ०९८६८९३५३६६
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हवा के झोंकों में
अशोक आंद्रे

रात्री के दूसरे पहर में

स्याह आकाश की ओर देखते हुए

पेड़ों पर लटके पत्ते हवा के झोंकों पर

पता नहीं किस राग के सुरों को छेड़ते हुए

आकाश की गहराई को नापने लगते हैं

उनके करीब एक देह की चीख

गहन सन्नाटे को दो भागों में चीर देती है

और वह अपने सपने लिए टेड़े-मेड़े रास्तों पर

अपनी व्याकुलता को छिपाए

विस्फारित आँखों से घूरती है कुछ

फिर अपने चारों और फैले खालीपन में

पिरोती है कुछ शब्द

जिन्हें सुबह के सपनों में लपेटकर

घर के बाहर ,

जंगल में खड़े पेड़ पर

टांग देती है हवा, पानी और धूप के लिए

तभी ठीक पास बहते पानी की सतह पर

कोई आकृति उसके जिस्म में पैदा करती है सिहरन

तभी अपने को समेटते हुए एक ओर खड़ी होकर

ढूँढने लगती है कोई सहारा

मानो इस तरह वह अपनी देह के साथ

अपनी कोख को आहत होने से बचाने के लिए

अपने ही पैरों से कुछ रेखाओं को खींच कर

किसी अज्ञात का सहारा ले रही हो

तभी घबराहट में उसके बाल हवा में लहरा जाते हैं

जिन्हें बांधने का असफल प्रयास किया था उसने

जिन्हें बिखरा,उसके चेहरे को

ढक दिया था किसीअन्य देह ने

ताकि उसकी कोख को

जमीन छूने से पहले झटक सके अपने तईं.

उधर पानी की शांत लहरें

उसके बुझे चेहरे पर सवालों की झरी लगा देती हैं

जो फफोलों में बदल कर लगते हैं भभकने.

अनुत्तरित जंगल खामोश दर्शक की तरह

अपनी ही सांसों में धसक जाता है

तभी मूक हंसी लिए ओझल हो जाती है वह देह कहीं दूर

छोड़ जाता है उसे उसके ही अकेलेपन के
घने कोहरे के मध्य
शायद यही हो सृष्टी के अनगढ़ स्वरूप की कर्म स्थली
नया आकार देने के लिए उसको
शायद इसीलिए जंगल ने भी
हवा के झोंकों में खो जाना ज्यादा सही समझा
शायद इसीलिए वह फिर नये सिरे से
जमीन को कुरेदने लगी है
अपने ही पाँव के अंगूठे से
-0-0-0-0-0-0-
दो

पानी का प्रवाह
जो पूर्ण है
उसे व्यक्त करना
अथवा उसकी ओट से

विध्वंस की भावनात्मक सोच का
विस्तार करना
किस दिशा की ओर इंगित करता है-
कहीं यह सत्य का विखंडन करना तो नहीं?
उसके प्रवाह को रोकना सत्य हो सकता है क्या ?
सत्य तो परावर है
जिस तरह पहाड़ों से नीचे की ओर
आता पानी
भविष्य को निर्धारित कर जाता है
जैसे ठीक बरसात के बाद
सूखी जमीन पर फैली घास को छू कर
पानी का प्रवाह
विस्तार कर जाता है ईश्वरीय सत्ता का.
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जन्म-०३-०३-५१ (कानपुर) उ.प.
अब तक आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित.
सम्मान -१, हिंदी सेवी सहस्त्राब्दी सम्मान (२००१)
२, हिंदी सेवी सम्मान (जैमिनी अकादमी) , हरियाणा
३, आचार्य प्रफुल राय स्मारक सम्मान, (कोलकता )
४, नेशनल अकेडमी अवार्ड २०१० फॉर आर्ट एंड लिटरेचर ( एकेडमी ऑफ़ बंगाली पोएट्री , कोलकता.

विशेष- "साहित्य दिशा" साहित्य द्वैमासिक पत्रिका तथा न्यूज़ ब्यूरो ऑफ़ इंडिया में मानद साहित्य सलाहकार सम्पादक के रूप में कार्य किया.

लगभग सभी राष्ट्रिय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकीं हैं

सोफिया अंद्रेएव्ना की डायरी

सोफिया अंद्रेएव्ना की डायरी के शेष अंश


जनवरी १४, १८९९

हमने एक खूबसूरत शाम बितायी. लेव निकोलायेविच ने हमें चेखव की दो कहानियां सुनाईं -- ’डार्लिंग’ और दूसरी आत्महत्या के विषय में , जिसका नाम मैं भूल चुकी हूं, लेकिन मैं कहूंगी कि अपनी प्रकृति में वह निबन्ध अधिक थी.

जनवरी १७, १८९९

लेव निकोलायेविच ने म्यासोयेदोव और बत्यर्स्काया जेल के जेलर का स्वागत किया, जिन्होंने जेल से संबन्धित तकनीकी पक्ष , कैदियों और उनके जीवन आदि के विषय में बहुत-सी सूचनाएं उन्हें प्रदान कीं. ’रेसरेक्शन’ के लिए यह सामग्री बहुत महत्वपूर्ण है.

जून २६, १८९९

लेव निकोलायेविच ने एक ’स्नैग’ पर प्रहार किया : रेसरेक्शन में सीनेट ट्रायल का एक दृश्य. उन्हें एक ऎसे व्यक्ति की तलाश है जो सीनेट की बैठकों के विषय में बता सकता हो, और प्रत्येक के साथ अपनी मुलाकात को मजाक में कह सके. " मेरे लिए एक सीनेटर खोज दो." यह ऎसे ही है जैसे लेव निकोलायेविच दूर चले गये हैं: वह अकेले, पूरी तरह अपने काम में डूबे रहते हैं, अकेल टहलने जाते हैं, अकेले बैठते हैं, आधा भोजन समाप्त होने के समय नीचे आ जाते हैं, बहुत कम खाते हैं और पुनः गायब हो जाते हैं. कोई भी देख सकता है कि उनका मस्तिष्क पूरे समय व्यस्त रहता है और किसी न किसी तरह यह उनकी शुरूआत है. वह बहुत कठोर श्रम कर रहे हैं.

दिसम्बर ३१, १८९९

१४ नवम्बर को, हमारी तान्या का विवाह मिखाइल सेर्गेई सुखोतिन से हुआ. हमने, उसके मां-पिता (तान्या के) ने उतना ही दुखी अनुभव किया जितना वान्या की मृत्यु पर किया था. लेव निकोलायेविच ने जब तान्या को गुडबॉय कहा तब वह रो पड़े थे----- वह इस प्रकार बिलख रहे थे मानो उनके जीवन का अत्यन्त प्रिय उनसे अलग हो रहा था.

तान्या का अभाव लेव निकोलायेविच को इतना खला और वह इतना अधिक रोये कि अंततः २१ नवम्बर को पेट और लिवर में तेज दर्द से वह बीमार हो गये. लगभग छः सप्ताह व्यतीत हो चुके हैं. अब वह स्वस्थ हो रहे हैं.

नवम्बर १३, १९००

तान्या और उसका पति हमसे मिलने आये. लेव निकोलायेविच इतना प्रसन्न हुए कि उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास न करते हुए कहा, "तो तुम आ गयी ? यह अप्रत्याशित है ."

नवम्बर २४, १९००

लेव निकोलायेविच एक पागलखाने के विक्षिप्तों के लिए आयोजित संगीत समारोह में उपस्थित रहे.

दिसम्बर ७, १९००

लेव निकोलायेविच ग्लेबोव में आन्द्रेमेन द्वारा आयोजित २३ ब्लालाइका (गिटार की तरह का एक तिकोना रूसी तीन तारा वाद्ययंत्र) बजाने वालों के संगीत समारोह में आमंत्रित थे. उनके ऑर्केस्ट्रा में अन्य लोक वाद्ययंत्र यथा -- ’झेलीका’ और ’गुस्की’ भी शामिल थे.

यह बहुत मनोहर था, विशेषरुप से रूसी गायन, और शुमन वाल्ज वारम (Shumann Waltz Warum) भी. लेव निकोलायेविच ने उन्हें सुनने की इच्छा व्यक्त की और विशेषरूप से उनके लिए समारोह की व्यवस्था की गई थी.

फरवरी १२, १९०१

हमने अपने घर में ९ को एक संगीत समारोह का आयोजन किया ---- जब अतिथिगण चले गये और लेव निकोलायेविच ड्रेसिंग गाउन पहन चुके और सोने के लिए जाने ही वाले थे, कि विद्यार्थियों, कुछ युवतियों और क्लिमेन्तोवा-मरोम्त्सेवा (जो ड्राइंग रूम में ठहरी हुई थीं) ने रूसी, जिप्सी और कामगारों के गीत गाना प्रारंभ कर दिया. वे हंस रहे थे और नाच रहे थे ---- लेव निकोलायेविच उनका उत्साह बढ़ाते हुए और अपनी पसंदगी व्यक्त करते हुए एक कोने में बैठ गये थे. वह उनके साथ लंबे समय तक बैठे रहे थे.

मार्च ६, १९०१

कई घटनाओं के दौरान हम जन-सामान्य की भांति रहे बजाय घरेलू ढंग से रहने के . २४ फरवरी को चर्च से लेव निकोलायेविच का बहिष्करण संबन्धी समाचार सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ . फरमान को उच्चवर्ग ने रोष और सामान्यजन ने आश्चर्य और असंतोषपूर्वक ग्रहण किया. तीन दिनों तक लेव निकोलायेविच के सम्मान में जय-जयकार की जाती रही. ताजे फूलों से भरे टोकरे घर लाये जाते रहे, और उन पर तारों, पत्रों और संदेशों की वर्षा होती रही. लेव निकोलायेविच के प्रति सहानुभूति व्यक्त करने और धर्म-सभाओं और आर्कबिशप के विरुद्ध रोष अभी तक समाप्त नहीं हुआ. उसी दिन मैंने एक पत्र लिखा और उसे पोबेदोनोत्सेव और विशप को भेजा. उसी रविवार, २४ फरवरी, को लेव निकोलायेविच और दुनायेव की लुव्यान्स्काया स्क्वायर पर अकस्मात भेंट हो गयी, जहां हजारों की संख्या में लोग एकत्रित थे. एक ने लेव निकोलायेविच को देख लिया और बोला, "वह जा रहा है, मनुष्य के रूप में शैतान." बहुत से लोगों ने मुड़कर देखा और लेव निकोलायेविच को पहचानकर चीखने लगे , "लेव निकोलायेविच -- हुर्रा---- लेव निकोलायेविच हुर्रा. अभिवन्दन , लेव निकोलायेविच. महान व्यक्ति को सलाम, हुर्रा."

भीड़ बढती गयी, आवाजें ऊंची होती गईं. घबडाये हुए कोचवान ने गाड़ी रोक दी.

अंत में एक छात्र गाड़ी के निकट आया. लेव निकोलायेविच और दुनायेव की उतरने में उसने सहायता की. भीड़ देखकर एक सशस्त्र घुड़सवार पुलिस वाला आगे बढ़ा, घोड़े की लगाम पकड़ उसे रोका और हस्तक्षेप करते हुए उसने उन्हें वापस गाड़ी में बैठा दिया.

कई दिनों तक मेरे घर में सुबह से शाम तक आने वालों की भीड़ के कारण उत्सवजनित कोलाहल होता रहा.

मार्च २६, १९०१

एक महत्वपूर्ण दिन. लेव निकोलायेविच ने”जार और उनके एड्जूटेण्ट’ के नाम एक पत्र भेजा.

मार्च ३०, १९०१

कल की बात है. हमने रेपिन के साथ खुशनुमा शाम व्यतीत की . उन्होंने कहा कि सेण्टपीटर्सबर्ग में पेरेद्विझिनिकी प्रदर्शनी में, जहां उन्होंने लेव निकोलायेविच का पोट्रेट प्रदर्शित किया हुआ है (अलेक्जेण्डर तृतीय म्यूजियम में ) वहां दो डिमांस्ट्रेशन हुए थे. पहले में अनेकों लोगों ने पोट्रेट के सामने फूल चढ़ाए थे. गत रविवार, २५ मार्च, १९०१ को , दूसरे में एक बड़ी भीड़ एक बड़े प्रदर्शनी कक्ष में एकत्र हुई थी. एक छात्र ने एक कुर्सी पर खड़े होकर पोट्रेट के फ्रेम के चारों ओर फूलों का गुलदस्ता रखा, फिर उसने प्रशंसापूर्ण भाषण दिया, जिसके बाद भीड़ चीखकर हुर्रा बोली और, मानों स्वतः, फूलों की वर्षा हुई. परिणामस्वरुप पोट्रेट को उतार लिया गया और उसे मास्को में प्रदर्शित नहीं किया जायेगा. अन्य प्रदेशों के विषय में कुछ नहीं कहा गया.

जुलाई ३, १९०१

जून २७ की रात लेव निकोलायेविच अस्वस्थ हो गये------ आज उन्होंने मुझसे कहा, "मैं अब चौराहे पर खड़ा हूं, और आगे जाने वाला मार्ग (मृत्यु की ओर) अच्छा है, और पीछे (जीवन) का भी अच्छा था. यदि मैं अच्छा हो जाता हूं, तो यह केवल विलम्बन ही होगा." वह रुके, सोच में डूब गये, और फिर बोले, "लोगों से कहने के लिए अभी भी मेरे पास बहुत कुछ है."

जब हमारी बेटी माशा उनके लिए उनका बिल्कुल हाल में लिखा आलेख, जिसकी प्रतिलिपि एन.एन.घे ने अभी-अभी तैयार की थी, उन्हें दिखाने के लिए लेकर आयी, उसे देखकर वह ऎसा प्रसन्न हुए जैसे एक शय्यासीन बीमार मां अपने प्रिय नन्हें बच्चे को लाये जाने पर होती है. उन्होंने तुरंत घे से कहा कि वह उसमें किंचित परिवर्तन करें. कल उन्होंने दूर के एक गांव में अग्निकांड के शिकार लोगों के प्रति अपना विशेष सरोकार प्रकट किया, जिनके लिए उन्होंने कुछ दिन पहले मुझसे पैंतीस रूबल लिये थे, और जानना चाहा कि क्या कोई यहां आया था. उन्होंने मुझसे पूछा कि उनमें से क्या कोई सहायता के लिए आया था !.

जुलाई २२, १९०१

लेव निकोलायेविच अब स्वस्थ हो रहे हैं.

कल शाम तुला से हमें एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसे निकोलई ओबोलेन्स्की ने हमारे लिए पढ़ा. वे सभी लेव निकोलायेविच के स्वास्थ्य-लाभ से प्रसन्न थे. उन्होंने उन्हें सुना, हंसे और बोले, "यदि पुनः मेरे मरने के लक्षण प्रकट हों, तो मुझे इस सबसे एक बार फिर गुजरना होगा. इस बार यह मूर्खों जैसा व्यवहार नहीं होगा. यह सब पुनः प्रारंभ होना, झुण्ड का झुण्ड लोगों, संवाददाताओं, पत्रों और तारों का आना, मेरे लिए शर्मनाक होगा---- सब छोटी-सी बात के लिए. नहीं, यह असंभव होगा. पूर्णतया अशोभन------."

----- कल, जब लेव निकोलायेविच ने कहा कि यदि वह दोबारा बीमार पड़ें, वह एक शालीन मृत्यु चाहेंगे. मैंने टिपणी की, ’वृद्धावस्था उकताऊ होता है. मैं भी जल्दी ही मर जाना चाहूंगी." इस पर लेव निकोलायेविच ने प्रबल विरोध करते हुए कहा, "नहीं, हमें जीवित रहना है. जिन्दगी इतनी अद्भुत है."

दिसम्बर ९, १९०१ (क्रीमिया, गास्वरा)

लेव निकोलायेविच के लिए हम सितम्बर ८, से यहां रह रहे हैं, लेकिन उनके स्वास्थ में अधिक सुधार नहीं है.

दिसम्बर २३, १९०१

लेव निकोलायेविच अब बेहतर हैं. आज वह लंबी दूरी तक टहले और सीढि़यां चढ़कर मैक्सिम गोर्की से मिलने गये.

जनवरी १६, १९०२

जार निकोलस द्वितीय को लिखे लेव निकोलायेविच के पत्र को तान्या ने फेयर किया और उसे ग्रैण्ड ड्यूक निकोलई मिखाइलोविच को डाक से भेज दिया. निकोलई मिखाइलोविच ने वायदा किया था कि परिस्थितियां अनुकूल देखकर वह उसे जार को दे देंगे. यह एक तीखा पत्र है.

जनवरी २५, १९०२

निदान में बायें फेफड़े में सूजन पता चली है. यह दाहिने में भी फैल चुकी है. इस समय हृदय भी भलीभांति काम नहीं कर रहा है.

जनवरी २६, १९०२

मेरे लेव निकोलायेविच मर रहे हैं ---- उन्होंने ये पंक्तियां कहीं किसी दिन पढ़ी थीं, "बूढ़ी औरत तड़प रही है, बूढ़ी औरत खांस रही है, बूढ़ी औरत के लिए यह उचित समय है कि वह अपने कफन में सरक जाये." वह जब इन पंक्तियों को दोहरा रहे थे तब उन्होंने इशारा किया कि उनका संकेत अपनी ओर ही था और उनकी आंखों में आंसू आ गये. फिर उन्होंने कहा, "मैं इसलिए नहीं रो रहा हूं कि मुझे मरना है, बल्कि मृत्यु की सुन्दरता पर रो रहा हूं."

जनवरी २७, १९०२

आज मैं उनके पास गयी ---- और पूछा, "आप कष्ट में हैं ?" "नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूं " उन्होंने कहा. माशा बोली, "पापा, अच्छा महसूस नहीं कर रहे, नहीं ?" और उन्होंने उत्तर दिया, "शारीरिकरूप से बहुत खराब, लेकिन मानसिक तौर पर -- अच्छा, सदैव अच्छा ----." हमारे प्रति उनका व्यवहार सुखद और स्नेहमय है. ऎसा प्रतीत होता है कि हमारी देखभाल से वह प्रसन्न हैं, जिसके लिए वह कहते रहते हैं "शानदार, अत्युत्तम."

जनवरी ३१, १९०२

कल उन्होंने तान्या से कहा, "उन्होंने एडम वसील्येविच (काउण्ट ओल्सूफ्येव) के विषय में क्या कहा ----- वह सहजता से मर गये थे. मरना इतना आसान नहीं है, यह बहुत कठिन है. इस सुविदित मनोदशा को निकाल देना कठिन है." उन्होंने अपने कृशकाय शरीर की ओर इशारा करते हुए कहा था.

फरवरी ७, १९०२

उनकी स्थिति लगभग, कहा जाय यदि पूरी तरह से नहीं, तो भी निराशाजनक है. सुबह से उनकी नब्ज हल्की है और उन्हें कपूर के दो इंजेक्शन दिए गये ----- लेव निकोलायेविच ने कहा, "तुम लोग मेरे लिए अपना सर्वोत्तम कर रहे हो----कैम्फर और बहुत कुछ दे रहे हो---- लेकिन मैं फिर भी मर रहा हूं."

एक और समय, उन्होंने कहा, "भविष्य की ओर देखने का प्रयत्न मत करो, मैं स्वयं कभी ऎसा नहीं करता."

फरवरी २०, १९०२

लेव निकोलायेविच अधिक प्रसन्न हैं. कल उन्होंने डॉ. वोल्कोव से कहा था ,"मुझे प्रतीत होता है कि मैं अभी रहने वाला हूं" मैंने उनसे पूछा, "आप जीवन से हतोत्साहित क्यों हैं ?" और अचानक उन्होंने उत्साहपूर्वक उत्तर दिया "जीवन से हताश ? कोई कारण नहीं ! मैं बेहतर अनुभव कर रहा हूं. " शाम को उन्होंने मुझे लेकर चिन्ता प्रकट की . मैंने कहा मैं थकी हुई हूं. मेरा हाथ दबाते और स्नेहपूर्वक मेरी ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "प्रिये, तुम्हे धन्यवाद, मैं बहुत अच्छा अनुभव कर रहा हूं."

फरवरी २८, १९०२

आज उन्होंने तान्या से कहा, "लंबे समय के लिए बीमार पड़ना अच्छा है. यह किसी को मृत्यु के लिए अपने को तैयार करने के लिए एक समय देता है."

फिर, पुनः वह तान्या से बोले, "मैं हर बात के लिए तैयार हूं. जीने के लिए तैयार हूं, और मरने के लिए भी तैयार हूं."

मार्च ११, १९०२

लेव निकोलायेविच स्वस्थ हो रहे हैं---- उन्होंने कहा, "मैं एक कविता रच रहा हूं. पंक्तियां इसप्रकार हैं :

"मैं सब जीत लूंगा, सोना बोला."

मैंने उसे इस प्रकार व्यक्त किया :

"मैं कुचल और तोड़ दूंगा, सामर्थ्य बोला,
मैं पुनर्चना कर दूंगा, मस्तिष्क बोला."

जून २२, १९०२ (यास्नाया पोल्याना )

आज हम क्रीमिया से घर वापस लौट आए.

अगस्त ९, १९०२

लेव निकोलायेविच ’हाजी मुराद’ लिख रहे हैं और आज अच्छी प्रकार काम नहीं हुआ, ऎसा प्रतीत होता है. वह लंबे समय तक एकांतवास में बैठे, जो इस बात का संकेत है कि उनका दिमाग व्यस्त है और वह अभी तक नहीं समझ पाये कि वह क्या चाहते हैं.

अगस्त ११, १९०२

लेव निकोलायेविच ने कहा कि लेस्कोव ने कहानी के लिए उनका ’प्लाट’ लिया, उसे तोड़ा-मरोड़ा और प्रकाशित करवा लिया. लेव निकोलायेविच का ’आइडिया’ इस प्रकार था : एक लड़की से बताने के लिए कहा गया कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति कौन है, सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय क्या है, और किस काम को सबसे महत्वपूर्ण समझती है. कुछ सोच-विचार के बाद उसने उत्तर दिया, इस क्षण सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति आप हैं, वर्तमान समय सबसे महत्वपूर्ण है, और इस क्षण आप जो काम कर रहे हैं, वही अच्छा और महत्वपूर्ण काम है.

फरवरी २०, १९०३

लेव निकोलायेविच के पास एक मिलनेवाला आया है ---- एक बूढ़ा व्यक्ति जिसने निकलस प्रथम के अधीन एक सैनिक के रूप में कार्य कि था, काकेशस का युद्ध लड़ा था और अब वह उन्हें उन दिनों के संस्मरण सुना रहा है.

जुलाई १०, १९०३

लेव निकोलायेविच निकलस प्रथम काल के इतिहास में डूबे हुए हैं और उन्हें जो भी हस्तगत होता है उसे एकत्रित कर रहे हैं और पढ़ रहे हैं. उस सबका प्रयोग ’हाजी मुराद’ में होगा.

जनवरी १४, १९०९

आज मैंने ---- उस कहानी को फेयर करना प्रांरभ किया, जिसे लेव निकोलायेविच ने अभी पूरा किया है .

उसका थीम --- क्रान्तिकारी, मृत्युदंड और उनके उद्देश्य हैं. रोचक हो सकती है. लेकिन ढंग वही है ---- मुझिकों के जीवन का वर्णन. संदेह नहीं, वह क्रान्ति को काव्यात्मक बनाना चाहेंगे, बावजूद अपनी ईसाइयत के प्रति झुकाव के. वह निःसंदेह उनके प्रति सहानुभूति रखते हैं, क्योंकि ऊंची हैसियत, अथवा सत्ता की क्रूरता से उन्हें घृणा है.

अप्रैल ७, १९१०

हम इससे क्रुद्ध हैं कि लेव निकोलायेविच को जेल में एक हत्यारे से मिलने की अनुमति नहीं दी गई. अपने लेखन के लिए उन्हें इसकी आवश्यकता थी.

अप्रैल १९, १९१०

गांव के पुस्तकालय के बाहर हमने ग्रामोफोन बजाया और उसे सुनने के लिए बहुत से लोग एकत्र हो गये. लेव निकोलायेविच ने किसानों से बात की. कुछ ने पुच्छलतारा के विषय में और कुछ ने ग्रामोफोन के डिजाइन के विषय में उनसे पूछा.

जुलाई ८, १९१०

लेव निकोलायेविच हमारे लिए एक नये फ्रेंच लेखक मिले की एक अच्छी कहानी पढ़कर सुनाई. कल उन्होंने हमारे लिए उसका "la luiche ecrassee" पढ़ा था, जिसे उन्होंने स्वयं पसंद किया था.

जुलाई २८, १९१०

आज शाम लेव निकोलायेविच ने हमारे लिए मिले की एक अच्छी छोटी कहानी "Le repos hebdomadaire" पढ़ी, जिसे उन्होंने स्वयं बहुत पसंद किया, और एक अन्य कहानी , "Le Secreta" पढ़ना प्रारंभ किया.

अक्टूबर १४, १९१०

लेव निकोलायेविच दॉस्तोएव्स्की का ’दि कर्माजोव ब्रदर्स’ (The Karamazova Brothers ) पढ़ रहे हैं और उन्होंने कहा कि यह बहुत खराब है. विवरणात्मक परिच्छेद अच्छे हैं, लेकिन संवाद निम्नकोटि के हैं. मानो दॉस्तोएव्स्की स्वयं बोल रहे हैं, न कि चरित्र. उनके कथन वैयक्तिक नहीं हैं.

अक्टूबर १९, १९१०

शाम के समय लेव निकोलायेविच ’दि करमाजोव ब्रदर्स’ पढ़ने में तल्लीन थे. उन्होंने कहा, "आज मैंने महसूस किया कि दॉस्तोएव्स्की में लोगों को क्या मिलता है ! उनके पास आश्चर्यजनक आइडियाज हैं." फिर उन्होंने दॉस्तोएव्स्की की आलोचना प्रारंभ कर दी और एक बार फिर कहा कि सभी चरित्र दॉस्तोएव्स्की की जुबान बोलते हैं ---- नितांत शब्दाडंबर.

सोफिया अन्द्रेएव्ना तोल्स्तोया की डायरी के कुछ अन्य महत्वपूर्ण अंश

फरवरी १४, १८७० (यास्नाया पोल्याना)

एक दिन जब मैं पुश्किन की जीवनी पढ़ रही थी, मेरे मन में आया कि मैं भावी पीढ़ियों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती हूं, जो लेव निकोलायेविच तोल्स्तोय के जीवन के विषय में कुछ जानना चाहेगें. मैं न केवल उनके दैनन्दिन जीवन, बल्कि उनकी मनोदशा का रिकार्ड रख सकती हूं ---- कम से कम जितना मेरी सामर्थ्य में है. यह विचार मेरे मन में पहले भी उत्पन्न हुआ था, लेकिन तब मैं बहुत व्यस्त थी.

अब उसे प्रारंभ करने का उपयुक्त समय है . ’
फरवरी १५, १८७०

कल लेव ने देर तक शेक्सपियर के विषय में मुझसे बात की और उसके प्रति बहुत प्रशंसा प्रकट की. वह नाटककारों में उन्हें बहुत बड़ा मानते हैं. जहां तक गोयेथ का प्रश्न है, सौन्दर्य और सादृश्यबोध से वह उसे सौन्दर्यबोधी मानते हैं, लेकिन उसमें नाटकार की प्रतिभा नहीं---- वहां वह कमजोर है. लेव फेट से उनके प्रेमपात्र गोयेथ के विषय में बात करना चाहते हैं. लेकिन लेव ने कहा कि जब गोयेथ दार्शनिक रूप प्रस्तुत करते हैं तब निश्चित ही वह महान है..

जब मैं आज सुबह लेव की स्टडी के दरवाजे के सामने से गुजर रही थी, उन्होंने मुझे अंदर आने के लिए कहा. उन्होंने मुझसे रूसी इतिहास और महान व्यक्तियों के विषय में लंबी चर्चा की. वह ’पीटर दि ग्रेट’ पर उस्त्र्यालोव का इतिहास पढ़ रहे थे.

’पीटर दि ग्रेट’ और मेन्सिकोव जैसे व्यक्तियों में उनकी बहुत रुचि है. मेन्सिकोव को उन्होंने शक्तिशाली और विशुद्ध रूसी चरित्र बताया, जो केवल आमजन के मध्य से आते हैं. पीटर दि ग्रेट के विषय में उन्होंने कहा कि वह अपने समय का कठपुतली था, कि वह निर्दयी था , लेकिन भाग्य ने उसे रूस और योरोपीय संसार के बीच संपर्क स्थापित करने के मिशन के लिए निर्दिष्ट किया था. लेव को एक ऎतिहासिक नाटक के लिए विषय की तलाश है और वह नोट्स ले रहे हैं, जिसे वह अच्छी सामग्री मानते हैं. आज उन्होंने मिरोविच की कहानी लिखी, जो इयोन एण्टोनोविच को किले से मुक्त करवाना चाहता है. कल उन्होंने मुझसे कहा था कि उन्होंने पुनः कॉमेडी लिखने का विचार त्याग दिया था, लेकिन एक ड्रामा के विषय में सोच रहे थे. वह कहते रहते हैं कि आगे कितना अधिक काम है !

हम साथ-साथ स्कैटिंग के लिए गये और उन्होंने सभी प्रकार के प्रदर्शन में भाग लिया. उन्होंने एक पैर से, दोनों पैरों से, पीछे चलकर, घूमकर और भी कई प्रकार से स्कैटिंग की. वह एक बच्चे की भांति प्रसन्न थे.

फरवरी २४, १८७०

आज अंततः बहुत हिचकिचाहट के बाद वह काम करने बैठे . कल उन्होंने कहा कि जब भी वह गंभीरता पूर्वक विचार करते हैं वह चीजों को नाट्य रूप की अपेक्षा महाकाव्यात्मक रूप में ही देखते हैं.

कुछ दिन पहले वह फेट के पास गये थे, जिन्होंने उनसे कहा कि ड्रामा उनकी विधा नहीं है. इसलिए अब ऎसा प्रतीत होता है कि उन्होंने ड्रामा अथवा कॉमेडी का विचार छोड़ दिया है.

आज सुबह एक शीट पेपर के दोनों ओर उन्होंने मिनटों में भर दिये. बहुत ही चमत्कारिक ढंग से काम प्रारंभ हुआ. उन्होंने बहुत से मान्य व्यक्तियों पर ध्यान केन्द्रित किया, जिनमें कुछ महान लोग भी हैं जो बाद में उनके मुख्य चरित्र बनेंगे.

कल उन्होंने कहा कि वह आभिजात्यवर्ग की एक विवाहिता स्त्री के विषय में सोच रहे थे जो गलत दिशा में जा चुकी थी. उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य यह चित्रित करना था कि वह निन्दा की अपेक्षा दया की पात्र थी. जैसे ही अपनी हीरोइन के विषय में उनकी दृष्टि स्पष्ट हुई, उनके अन्य पात्र जिनकी कल्पना उन्होंने की थी (पुरुष और महिला पात्र) उसके इर्द-गिर्द एकत्रित हो लिए थे.

"अब मुझे सब कुछ स्पष्ट है." वह बोले थे. जहां तक कृषक मूल के पढ़े-लिखे लोगों की बात है, जो उनके मस्तिष्क में लंबे समय से विद्यमान हैं----- उनके विषय में उन्होंने निर्णय किया है कि वह उसे किसी जागीर के कारिन्दा के रूप में चित्रित करेंगे.

मार्च २७, १८७१

दिसम्बर से वह दृढ़ निश्चय के साथ ग्रीक भाषा का अध्ययन कर रहे हैं. दिन और रात वह उसके लिए बैठे रहते हैं. एक नये ग्रीक शब्द को जान लेने अथवा उसकी अभिव्यक्ति को समझ लेने से उन्हें जो आनंद और प्रसन्नता प्राप्त होती है वह दुनिया की किसी अन्य बात में नहीं मिल सकती.---- जेनोफॉन से प्लेटो, फिर ओडिसी और इलियाड (जिसके लिए वह पागल हैं) . वह चाहते हैं कि मैं उन्हें मौखिक अनुवाद करता सुनूं और उनके अनुवाद को ग्नेडिच (Gnedich) से मिलाऊं, जिसे वह बहुत अच्छा और ईमानदार मानते हैं. ग्रीक में उनकी प्रगति (दूसरों को समझकर, जबकि उनमें से वे भी हैं जो विश्वविद्यालय का कोर्स समाप्त कर चुके हैं ) अद्भुत है.

कभी-कभी उनके दो-तीन पृष्ठों के अनुवाद में मुझे दो या तीन से अधिक त्रुटियां अथवा अबोध्य-वाक्यांश नहीं मिले.

वह मुझसे कहते रहते हैं कि वह लिखना चाहते हैं. वह ग्रीक कला और साहित्य जैसा शास्त्रीय , सुबोध्य, ललित और अपेक्षाकृत भारमुक्त कुछ लिखने का स्वप्न देख रहे हैं. मैं बता नहीं सकती, हांलाकि मैं स्पष्टतः महसूस करती हूं कि उनके मस्तिष्क में क्या है. उनका कहना है कि "लिखने की अपेक्षा न लिखना अधिक मुश्किल है." अर्थात मुश्किल चीजें किसी को निस्सार शब्द लिखने से रोकती हैं. कुछ ही लेखक इसमें सक्षम होते हैं.

वह रूसी पुराकाल पर लिखने की सोच रहे हैं ---- चेत्यी-मिनेई (Chetyi-Minei) और संतों के जीवन का अध्ययन कर रहे हैं, और कहते हैं कि यही हमारा वास्तविक रूसी काव्य है.

मार्च १९, १८७३
कल शाम अचानक लेव ने मेरी ओर देखा और बोले, "मैंने डेढ़ पृष्ठ लिखे हैं और मैं सोचता हूं कि वह अच्छा है." यह मानकर कि यह पीटर दि ग्रेट काल पर लिखने का उनका एक और प्रयास है, मैंने उनकी बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया. लेकिन बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि उन्होंने निजी जीवन के विषय में एक समसामयिक उपन्यास प्रारंभ किया था. यह विलक्षण है कि उन्होंने उस पर कितनी सफल रचना की है.

सेर्गेई ने हमारी वृद्धा आण्ट के लिए ऊंचे स्वर में पढ़ने के लिए कुछ देने को कहा. मैंने उन्हें पुश्किन की ’दि स्टोरीज ऑफ बेल्किन ’ (The stories of Belkin) दी. लेकिन वृद्ध आण्ट सो गयीं और मैं इतनी आलसी कि नीचे जाकर पुस्तक को पुस्तकालय में नहीं रखा. उसे ड्राइंग रूम में खिड़की की दहलीज पर रख दिया. अगली सुबह जब हम कॉफी पी रहे थे, लेव ने वह पुस्तक उठायी, उसे देखा और बोले यह कितनी अच्छी है. उसके पीछे उन्होंने कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां देखीं. (अनेन्कोव संस्करण ) और बोले, "मैंने पुश्किन से बहुत कुछ सीखा है. वह मेरे पिता हैं, वह मेरे अध्यापक भी हैं. " फिर उन्होंने उससे एक परिच्छेद पढ़कर सुनाया कि पुराने समय में किस प्रकार जमींदार राजमार्गों पर यात्रा करते थे. उसने उन्हें पीटर दि ग्रेट के समय में आभिजात्य वर्ग के जीवन को समझने में सहायता की. वह एक ऎसा विषय था जो उन्हें विशेषरूप से परेशान कर रहा था. पुश्किन के प्रभाव में उन्होंने उस शाम लिखना प्रारंभ किया था. आज उन्होंने पुनः लिखना प्रारंभ किया और कहा कि वह अपने काम से संतुष्ट हैं.

अक्टूबर ४, १८७३

उपन्यास ’अन्ना कारेनिना’ प्रारंभ हो गया है . उसकी सम्पूर्ण रूपरेखा वसंत में बन चुकी थी. हम गर्मियों में समारा गुबेर्निया गये थे तब उन्होंने अधिक नहीं लिखा. अब वह उसे परिष्कृत कर रहे हैं, बदल रहे हैं और उपन्यास पर लगातार काम कर रहे हैं.

क्राम्स्कोई उनके दो पोट्रेट बना रहे हैं और उनके काम में कुछ व्यवधान उप्तन्न हो रहा है. कला के विषय में प्रतिदिन चर्चा और वाद-विवाद होता है.

नवम्बर २१, १८७६

कल मेरे पास आये और बोले, "लिखना कितना थकाऊ होता है !"

"क्या ?" मैंने चिल्लाकर पूछा.

"हूं, मैंने लिखा कि व्रोन्स्की और अन्ना ने होटल में एक कमरा लिया, लेकिन यह असंभव है. सेण्टपीटर्सबर्ग के किसी भी होटल में उन्हें अलग-अलग मंजिलों में ठहरना चाहिए था. तभी ऎसा होता कि वे अपने मित्रों से अलग-अलग मिलते, और इस प्रकार यह सब मुझे पुनः लिखना होगा.

मार्च १, १८७८

लेव निकोलायेविच निकोलस प्रथम के समय का अध्ययन कर रहे हैं. वह पूरी तरह दिसंबरवादियों की कहानी में तल्लीन हैं. वह मास्को गये थे और पुस्तकों का ढेर लादकर लाये. कभी-कभी वह पढ़कर रो पड़ते हैं.

जनवरी ३१, १८८१

लेव निकोलायेविच केवल शीत रितु में ही काम कर पाये. जब तक उन्होंने सामग्री का अध्ययन किया और दिसंबरवादियों के लिए कुछ रूपरेखा बनायी , गर्मी पुनः प्रारंभ हो चुकी थी और कुछ भी गंभीर नहीं लिखा गया. अपने स्वास्थ्य और लेखन को दृष्टिगत रखते हुए उन्होंने राजमार्ग (कीव क्षेत्र) पर लंबी दूरी तक टहलना प्रारंभ किया जो हमारे यहां से लगभग दो वर्स्ट है. गर्मियों में सम्पूर्ण रूस और साइबेरिया से कीव , वोरोनेझ, ट्रिनिटी-सेर्गेइस मठों और ऎसे ही अन्य स्थानों में पूजा-अर्चना करने के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों के दलों से कोई भी मिल सकता है.

लेव निकोलायेविच अपने रूसी ज्ञान को सीमित और अपूर्ण मानते हैं और इसीलिए पिछली गर्मियों में उन्होंने लोगों की भाषा (लोक भाषा) का अध्ययन प्रारंभ किया था. उन्होंने तीर्थयात्रियों और पर्यटकों से बात की और लोक शब्दों , सूक्तियों, प्रतिबिंबों और भावाभिव्यक्तियों को दर्ज किया. लेकिन उस उद्देशय को जारी रखने के अनपेक्षित परिणाम निकले.

१८७७ तक लेव निकोलायेविच के धार्मिक विचार अपरिभाषित रहे थे. वह धर्म के प्रति उदासीन थे. वह कभी पूर्ण नास्तिक तो नहीं थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी धार्मिक मत का समर्थन नहीं किया था.

लोगों, तीर्थयात्रियों, और धर्म-भिक्षुओं के निकट संपर्क में आने के बाद वह उनके दृढ़, स्पष्ट और अडिग आस्था से विस्मित हुए. उनका अपना संशयवाद उन्हें अकस्मात भयानक प्रतीत होने लगा और उन्होंने अपना हृदय और आत्मा लोगों और उनकी आस्था की ओर मोड़ दिया. उन्होंने न्यू टेस्टामेण्ट का अध्ययन, उसका अनुवाद और उसकी टीका लिखनी प्रारंभ कर दी. इस कार्य का दूसरा वर्ष है और मेरा विश्वास है कि लगभग आधा कार्य सम्पन्न हो चुका है. उनका कहना है कि इससे उन्हें आध्यात्मिक शांति प्राप्त हुई है. अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए उन्हे ’प्रकाश’ दिखा, और उसने जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदल दिया. लोगों के उस छोटे से समूह , जिनके साथ वह समय व्यतीत करते थे , और उन्हींके विषय में प्रयः सोचा करते थे (ऎसा ही उन्होंने कहा था ), लेकिन अब करोड़ों लोग उनके बन्धु हो गये हैं. पहले उनकी जागीर और धन निजी सम्पति थे, लेकिन अब वह उनके लिए केवल गरीबों और जरूरतमंदों को देने के लिए है.

प्रतिदिन वह पुस्तकों से घिरे हुए काम करने के लिए बैठते हैं और डिनर तक कार्य करते रहते हैं. स्वास्थ्य में वह बहुत कमजोर हो गये हैं और सिर दर्द की शिकायत करते रहते हैं. उनके बाल भूरे हो गये हैं और इस जाड़े में उनका वजन घटा है.

मैं जितना चाहती हूं, वह उतना प्रसन्न नहीं प्रतीत होते . वह शांत, चिन्तनशील और चिड़चिड़े हो गये हैं. विनोदी और जीवन्त स्वभाव, जो कभी हम सभी को प्रसन्नता प्रदान किया करता था अब मुश्किल से ही दीप्तिमान होता है. मेरा अनुमान है कि यह कठोर श्रम के परिणामस्वरूप है. ’वार एण्ड पीस’ जैसे दिन नहीं रहे, जब शिकार अथवा ’बालनृत्य’ का वर्णन करने के बाद उत्तेजित और प्रसन्नचित दिखते हुए वह हमारे पास आते थे, मानो वह स्वयं उस आमोद-प्रमोद में लिप्त रहे थे. उनकी आध्यात्मिक शुचिता और शांति प्रश्नातीत हैं, लेकिन दूसरों के दुर्भाग्य ----- गरीबी, कारावास, दुर्दम्यता, अन्याय को लेकर उनकी व्यथा उनकी अतिसंवेदनशील आत्मा को प्रभावित और उनके शरीर को क्षीण कर रही है.

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कारेनिना अन्ना क्यों थी और किस विचार ने उसे आत्महत्या के लिए प्रेरित किया

एन.एन. बिबिकोव नामके लगभग पचास वर्ष के एक व्यक्ति हमारे पड़ोसी थे. वह न धनवान थे और न ही शिक्षित. उसके घर की व्यवस्था संभालने और उसकी रखैल के रूप में रहने वाली लगभग पैंतीस वर्ष की स्त्री अविवाहित और उसकी दिवंगता पत्नी की दूर की रिशतेदार थी. बिबिकोव ने अपने बेटे और भतीजी को पढ़ाने के लिए एक गवर्नेस नियुक्त किया. वह एक सुन्दर जर्मन युवती थी. उसकी पहली रखैल, जिसका नाम अन्ना स्तेपानोव्ना था, अपनी मां से मिलने जाने की बात कहकर तुला चली गयी. अपनी पोटली सहित (जिसमें बदलने के लिए एक जोड़ी कपड़े ही थे) वह निकटतम स्टेशन यसेन्की गयी और चलती मालगाड़ी के आगे कूद गई . बाद में उसके शरीर का पोस्टमार्टम हुआ. लेव निकोलायेविच ने यसेन्की स्टेशन के बैरकों में उसका कुचला सिर, नग्न और विकृत शरीर देखा था. वह भयनक रूप से हिल उठे थे. वह अन्ना स्तेपानोव्ना को लंबी, हृष्ट-पुष्ट, चेहरे और वर्ण में पूरी तरह रूसी, भूरी आंखों सहित भूरे बालों वाली, सुन्दर नहीं, लेकिन आकर्षक स्त्री के रूप में जानते थे.

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गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

वातायन-अक्टूबर,२०११

इंडिया गेट में अन्ना हजारे समर्थकों का प्रदर्शन
चित्र : बलराम अग्रवाल

हम और हमारा समय


क्रूर समय का सच
रूपसिंह चन्देल

देश की आजादी से पहले और उसके बाद आम-भारतीय के लिए जीवन कभी सहज नहीं था. लेकिन आज शायद वह समय के सर्वाधिक क्रूर दौर से गुजर रहा है. सर्वत्र अराजकता की स्थिति है. भ्रष्टाचार और अपराध ने आम व्यक्ति का जीवन नर्क बना दिया है. इस स्थिति के लिए केवल और केवल देश की राजनीति जिम्मेदार है. आजादी के बाद जनता के स्वप्नों को जिसप्रकार राजनीतिज्ञों ने रौंदा और सब्जबाग दिखाते हुए उसे जिसप्रकार वोट बैंक में तब्दील कर अरबों के घोटाले किए वह अब छुपा रहस्य नहीं रहा. लेकिन इस उद्घाटित रहस्य के बावजूद जनता अपने को विवश पाती रही है. अण्णा के आंदोलन ने उसमें जाग्रति उत्पन्न की है, लेकिन सत्ता के अहम में चूर राजनीतिज्ञों ने आखों में पट्टी बांध ली है. जन लोकपाल बिल के विषय में वे वक्तव्य दे रहे हैं कि सरकार की गरदन पर पिस्तौल रखकर बिल पास नहीं करवाया जा सकता. राजनीतिक निरकुंशता का नग्न स्वरूप सत्ताधीशों के काले कारनामों में देखा जा सकता है. नवम्बर, १९८४ का दिल्ली, कानपुर या अन्य शहर रहा हो, या गोधरा के बाद का गुजरात इनके पीछे राजनीतिक षडयंत्र ही थे. वैसे इस देश में हर साम्प्रदायिक दंगा राजनीतिक कारणॊं से जन्मता रहा और उसे लेकर घड़ियाली आंसू बहाने वाले भी वही रहे. लेकिन पिछले दिनों राजनीति का जो विद्रूप चेहरा जनता के सामने उजागर हुआ उसने देश को कम से कम पचीस वर्ष पीछे अवश्य धकेल दिया है. कामनवेल्थ गेम्स, टू जी जैसे अनेक घोटाले हुए और अरबों की लूट हुई. इस लूट में राजनीतिज्ञों के साथ बहती गंगा में ब्यूरोक्रेट्स ने भी जमकर हाथ धोये. ब्यूरोक्रेट्स ने पहली बार ऎसा किया ऎसा नहीं----ब्रिटिश हुकूमत के समय से वे ऎसा करते आ रहे हैं. लेकिन अब वे मुक्तभाव से कर रहे हैं. जनता विवश देख रही है. ये देश की सम्पदा लूटने तक ही सीमित नहीं हैं. इनके खूनी पंजे विवश महिलाओं की इज्जत तार-तार कर रहे हैं. हाल में राजस्थान की नर्स भंवरी देवी कांड इसका ज्वलंत उदाहरण है. अपने काले कारनामों की सीडी बनाकर उन्होंने भंवरी देवी की आवाज बंद कर दी. लेकिन जब उनके ब्लैकमेलिंग से परेशान उसने सीडी का रहस्य सार्वजनिक करने की बात कही उसका अपहरण हो गया. (शायद हत्या भी) जो मंत्री संदेह के घेरे में हैं वह अब अपनी जाति का शक्ति प्रदर्शन कर यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि उनपर हाथ डालने की गलती न की जाए, क्योंकि उनके पीछे उनकी जाति की शक्ति विद्यमान है. गांधी, सुभाष, नेहरू और भगतसिंह का देश कहां से कहां पहुंच गया----बलात्कार और हत्या के बाद राजनीतिज्ञ अपनी जाति के वोट बैंक की ओट लेकर अपने को बचा ले जाने की जुगत बना ले पाने में सफल हो रहे हैं, जो किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जाएगा. दुनिया में पहले से ही भारत चमत्कारों के देश के रूप में चर्चित रहा है. दूसरे चमत्कार हों या न हों लेकिन राजनीति के अपराधीकरण ने जिसप्रकार चमत्कारी चोला पहना है वह बेहद घृणास्पद है.

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वातायन के इस अंक में प्रस्तुत है सोफिया अंद्रेएव्ना तोल्स्तोया की डायरी के उन अंशों की अगली किस्त जो उन्होंने अपने पति लियो तोल्स्तोय को केन्द्र में रखकर लिखे थे. (डायरी के ये अंश मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक – ’लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार’ में संग्रहीत हैं) और पंजाबी की वरिष्ठ और चर्चित लेखिका राजिंदर कौर की कहानी.

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