सोमवार, 3 जुलाई 2023

शख्सियत

 

 

उपलब्धि की सार्थकता दूसरों की सहायता में है – डॉ. राकेश जैन

                                                           बाएं से -नवनीत मिश्र और डॉ. राकेश जैन

(वरिष्ठ कथाकार नवनीत मिश्र के साथ डॉ.राकेश जैन की बातचीत)

         दिव्यांगता किसी की भी तरह की हो,मनुष्य को तोड़ने वाली होती है। भरे-पूरे लोगों और पूरमपूर दुनिया के बीच उसे अपना आप ही असहनीय लगता रहता है। सारे लोग उसे अपनी ही ओर देखते और उसी के बारे में बातें करते जान पड़ते हैं। दया और करूणा प्रकट करने वाली  ’च् च् च्’ की आवाजें और धीमी आवाज में बोले गए सहानुभूति जताते वाक्य उसे अपने मन में भर गए दयनीयता के भाव से उबरने ही नहीं देते। ऐसी घिसटती हुई जिन्दगी में ईश्वर और भाग्य को कोसते रहने के अलावा जैसे उसके पास करने को कुछ और रह ही नहीं जाता।

मस्तिष्क पक्षाघात (Cerebral Palsy) और उससे जुड़ी और कठिनाइयां किसी भी प्रकार की अन्य दिव्यांगताओं में सबसे अधिक दुस्सह और दारूण होती हैं। मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रस्त व्यक्ति आंखें खुली होने पर भी कुछ नहीं देखने के लिए विवश रहता है| उसके लिए कोई भी आवाज कोई अर्थ नहीं रखती, सामने किसी के भी आकर खड़े हो जाने से उस पर कोई असर नहीं होता क्यों कि उसके शरीर में केवल प्राण तत्व मौजूद है जिसके कारण उसे जीवित कहा जा सकता है,बस। उसको अपनी दशा पर दया तक नहीं आती क्योंकि प्रकृति ने यह काम उसके बेबस तीमारदारों को सौंप दिया होता है। वहीं एक नेत्रहीन उच्च मनोबल की अपनी सफेद छड़ी के सहारे कितने ही दुर्लंघ्य कंचनजंघा सर कर लेता है। दृष्टिबाधित व्यक्ति की दुनिया भले ही आवाजों,गंधों और स्पर्शों तक सीमित होकर रह जाती है लेकिन धीरे-धीरे उनका अपना एक संसार तो बन ही जाता है जिसमें वे विचरण करने लगते हैं। यह जरूर है कि उनके संसार में आवाजें होती हैं पर कोई चेहरा सामने नहीं होता, गंध होती है लेकिन उसका स्रोत ओझल रहता है और स्पर्श से कोई आकृति नहीं उभरती . . . उनकी चेतना में सूर्योदय की लालिमा और फूलों के रंगों की कोई अवधारणा नहीं होती। उनका मानस सिर्फ एक ही रंग जानता है और वह होता है काला रंग, लेकिन वह काला रंग काली घटाओं का,काले बालों का या काली रोशनाई का नहीं होता। वह कालापन होता है उसके सामने फैले दृष्टिपथ में कुछ भी न होने से निचाट रह गए संसार का।

इस अंधेरी दुनिया के निवासी सारा जीवन भटकते और निराशा में डूबकर मृत्यु की प्रतीक्षा ही करते रह जाते अगर संसार के तमाम दृष्टिहीनों ने दृष्टिबाधिता पर विजय प्राप्त करके संसार के अपने जैसे दिव्यांगों के सामने उम्मीद की नयी मशालें प्रज्ज्वलित न की होतीं और दिव्यांगता को शिकस्त देने का हौसला बुलन्द न किया होता।

जरूर ही दिव्यांगों को सामान्य जीवन जीने के लायक बनाने में ऐसे लोगों का योगदान कम नहीं रहा होगा जिन्होंने चाहे किसी भी भाषा में दृष्टिबाधित लोगों को यह कहकर सांन्त्वना दी होगी और उनका हौसला बढ़ाया होगा कि-

तुझमें कोई कमी नहीं पाते

 तुझमें कोई कमी नहीं मिलती।

जिनको पता है कि जन्मांध सूरदास को हिंदी साहित्य का सूर्य कहते हुए किसी ने कहा है कि,

‘सूर सूर तुलसी ससी उदगन केसवदास’ या जो जानते हैं कि शेक्सपीयर के बाद अंग्रेजी साहित्य के सबसे बड़े माने जाने वाले नेत्रहीन कवि  जॉन मिल्टन ने केवल पंद्रह हजार शब्दों में अपनी काव्य-यात्रा पूरी कर ली जबकि शेक्सपीयर ने यह यात्रा पूरी करने में तीस हजार शब्द व्यय किये थे या जिनके दिलों में फ्रांस के उन लुई ब्रेल के प्रति हमेशा कृतज्ञता का भाव रहता है जिन्होंने ब्रेल लिपि का आविष्कार करके नेत्रहीनों को एक ऐसा उपहार दे दिया जिससे वे जीवन में कभी उऋण नहीं हो सकेंगे,ऐसे डा0 राकेश जैन से भेंट करना बहुत दिलचस्प रहा जो अपनी दिव्यांगता पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद सफलता के शिखर पर लोगों के लिए  ’मन के हारे हार है मन के जीते जीत’ का अप्रतिम उदाहरण और प्रेरणा की मूर्ति बन कर खड़े मिले -

नवनीत मिश्र - डाक्टर जैन हमें अपने और अपने परिवार के बारे में कुछ बताइये।

राकेश जैन -मेरा जन्म राजकोट में 1963 में हुआ। मेरे पिता जी आकाशवाणी में इंजीनियर थे और मां गृहणी।

न मि -   आपके पिताजी का शुभ नाम? यह सवाल इसलिए भी और एक विशेष लगाव के कारण क्योंकि मैंने भी जीवन का एक बड़ा हिस्सा आकाशवाणी की सेवा में बिताया है।

राकेश जैन -यह जानकर अच्छा लगा। उनका नाम है स्वर्गीय जीवन प्रकाश जैन।

न मि -   आपकी जो दृष्टिबाधिता है वह जन्म से है या किसी दुर्घटना के कारण?

राकेश जैन - मैं जब छः महीने का था तब मेरे पिताजी दिल्ली में थे। खामपुर, जहां आकाशवाणी के ट्रांस्मीटर हैं वहां मेरे पिताजी काम करते थे। उन्हीं दिनों मेरी आंखों से पानी गिरने लगा। चार-पांच वर्षों तक एम्स के डाक्टरों ने इलाज किया। उन्होंने बताया कि ग्लूकोमा की शिकायत है और आप्टिकल नर्वस में खून की आपूर्ति रूक गई है। 27-28 बार आपरेशन हुए लेकिन नजर लगातार कमजोर होती जा रही थी। तभी किसी ने बताया कि संगरूर में कोई बाबा जी हैं जो भभूत देते हैं जिससे ऐसे मरीजों को बहुत फायदा होता है। चूंकि सब लोग निराश हो चुके थे इसलिए अन्तिम उपाय के रूप में मुझे संगरूर के उन बाबाजी के पास ले जाया गया। बाबाजी ने आंखों में लगाने के लिए भभूत जैसा कुछ दिया। उस भभूत को लगाने से दिन भर आंखें जलती रहीं और दस साल की उम्र में मुझे जो थोड़ा-बहुत दिखाई दे रहा था वह भी बन्द हो गया। फिर यही निर्णय लिया गया कि मुझे दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के स्कूल में भर्ती करा दिया जाए।

न मि -   क्या आज आपको लगता है कि अगर बाबाजी की भभूत का प्रयोग न किया गया होता तो शायद परिणाम कुछ और होता?

राकेश जैन -         नहीं। देखिये इतने दिनों के इलाज के बाद यह तो तय हो गया था कि दृष्टि पूरी तरह से  वापस नहीं लौटेगी अगर बाबा की भभूत का इस्तेमाल न किया गया होता तो हो सकता था कि कुछ रोशनी कुछ दिनों तक और बची रहती। जब आंखों की रोशनी बिलकुल ही चली गई तब यह निर्णय किया गया कि मेरी आगे की पढ़ाई ब्रेल लिपि से ही होगी।

न मि -   तो ब्रेल लिपि से आपने किस क्लास तक की शिक्षा प्राप्त की?

राकेश जैन -वैसे तो मैंने कक्षा दो तक सामान्य विद्यार्थियों की तरह पढ़ाई कर ली थी लेकिन फिर जब मुझे ब्रेल लिपि के स्कूल में दाखिल किया गया तो मैंने नये सिरे से नर्सरी से पढ़ाई शुरू की।

न मि -   आपने कहां तक शिक्षा प्राप्त की?

राकेश जैन -         मैंने अंग्रेजी में एम ए किया, पी एचडी की -

न मि -   सब बे्रल से?

राकेश जैन -देखिये ब्रेल से तो बहुत लिमिटेड मैटीरियल उपलब्ध होता है। जब हम स्कूल में थे तब पूरी क्लास में एक किताब हुआ करती थी जो सबको बारी-बारी से मिलती थी कभी एक घंटे के लिए या कभी कुछ ज्यादा समय के लिए। उसके बाद जब हम यूनीवर्सिटी में आए तो किताबें सुनकर या लोगों से रिकार्ड कराकर, या मुख्य रूप से सुनकर और सुने हुए को याद रखकर ही काम करना पड़ता था क्योंकि ब्रेल लिपि में एक तो किताबें बहुत ही सीमित संख्या में होती थीं और जो होती थीं वह बहुत महंगी हुआ करती थीं।

न मि -   तो परीक्षा में लिखने का काम कैसे होता था?

राकेश जैन -उसके लिए हम जैसे दिव्यांगों को राइटर मिलता है जो हमसे एक दो क्लास जूनियर होता है उसको हम लोग बोल-बोलकर लिखवाते हैं। हाई स्कूल, इण्टरमीडिएट और बीए एम ए तक इसी प्रकार डिक्टेटशन देकर काम चला, कॉपी लिखने के लिए नियमानुसार हम जैसे लोगों को आधा घंटा समय अधिक दिया जाता है।

न मि -   फिर आपने पी एच डी कैसे पूरी की?

राकेश जैन -         पीएचडी के समय तक कम्प्यूटर आ चुका था। कम्प्यूटर पर टाइप करके थीसिस तैयार की।

न मि -   आपकी पीएचडी का विषय क्या था ?

राकेश जैन -         मेरी पीएचडी आयरिश ड्रामा पर थी।

न मि-    जिस समय आप क्लास में जाते थे आपके सहपाठियों का आपके प्रति व्यवहार कैसा होता था?

राकेश जैन -         बहुत अच्छा होता था। वास्तविकता तो यह है कि मेरे सहपाठियों ने कभी मुझे एक दिव्यांग के रूप में देखा ही नहीं। मैं पढ़ने-लिखने में थोड़ा अच्छा था तो मैं सबकी सहायता करता था। मैं जितनी मदद अपने सहपाठियों से लेता था उससे ज्यादा उनकी मदद करता था। मेरी अभिरूचि हर विषय में रहती थी। तकनीकी विषयों, देश दुनिया में क्या हो रहा है और आसपास की चीजों को जानने की उत्सुकता मुझमें रहती थी और आज मैं कह सकता हूं कि जानकारी रखने के मामले में और सामान्य आई क्यू सब लोगों से ज्यादा ही रहता था कम नहीं होता था।

न मि -   ये बातें तो तब की हैं जब आप अपनी दिव्यांगता से तालमेल बैठा चुके थे लेकिन जब ये स्थिति शुरू हुई होगी तब तो बड़ा शॉकिंग रहा होगा?

राकेश जैन -         होता यह है कि कोई ऐसी स्थिति अगर अचानक पैदा हो जाए तो शॉकिंग होता है लेकिन जब स्थितियां धीरे-धीरे सामने आती हैं तो आदमी मानसिक रूप से उसके लिए तैयार होता जाता है और -

न मि -   लेकिन छः बरस के बच्चे के लिए तो -

राकेश जैन -         जब बाबाजी वाली घटना हुई तो मैंने मान लिया कि नहीं दिखाई देता है तो नहीं दिखाई देता - एक हिसाब से कहें तो नयी स्थिति का सामना करने के लिए मैंने अपने आप को तैयार कर लिया था।

न मि -   इस समय लखनऊ के जिस नेशनल पीजी डिग्री कालेज में बैठकर मैं आपसे बात कर रहा हूं वहां आप प्रोफेसर हैं। शुरू-शुरू में आपको नौकरी के लिए किस तरह का संघर्ष करना पड़ा ?

राकेश जैन -         देखिये जॉब के मामले में आम तौर पर लोगों के लिए यह एक्सेप्ट करना आसान नहीं होता कि एक दिव्यांग व्यक्ति जो देख नहीं पा रहा है वो किसी पद पर काम कर सकेगा। मैंने विश्वविद्यालय में अप्लाई किया लेकिन मेरी वहां नियुक्ति नहीं हुई पूरी क्वालिफिकेशन होने के बावजूद। फिर उत्तर प्रदेश में हायर एजुकेशन सर्विस कमीशन है वहां पर पोस्ट निकली थी प्रदेश के डिग्री कालेजों में नियुक्तियों के लिए। मैंने उसमें आवेदन किया। मैं फर्स्ट डिवीजन एम ए था पीएचडी भी था। मुझे पीएचडी स्कॉलर के रूप में यूजीसी से जूनियर रिसर्च फेलोशिप फिर सीनियर रिसर्च फेलोशिप भी मिली। फिर मुझे डी लिट करने के लिए रिसर्च एसोसिएटशिप भी मिली लेकिन उस बीच में मुझे यहां जॉब मिल गई तो पूरा नहीं हो पाया वह प्रोजेक्ट। तो कमीशन में जब मैंने इन्टरव्यू दिया तो वहां मेरा सेलेक्शन हो गया। पूरे उत्तर प्रदेश की मेरिट लिस्ट में मेरा तेरहवां नंबर था और इसलिए जो कालेज मैंने चुना, जहां मैं काम करना चाहता था मुझे मेरी मेरिट के आधार पर वही कालेज मिल गया। यह कालेज मेरे घर के नजदीक है और मेरे लिए जरा सुविधाजनक है।

न मि      तो विश्वविद्यालय में नियुक्ति न होने का कोई अफसोस ?

राकेश जैन -         अफसोस, बिलकुल नहीं। मैं आज जहां तक पहुंच गया हूं वहां पहुंचकर मुझे लगता है कि विश्वविद्यालय में मेरा नहीं हुआ तो बहुत अच्छा हुआ। जो पहचान मुझे मिली और काम करने का जो अवसर मुझे नेशनल पीजी कालेज में मिला वह मुझे विश्वविद्यालय में नहीं मिलता। वहां में एक टीचर के सिवा और कुछ नहीं होता जबकि यहां मैं एक टीचर होने के साथ कालेज के पचासों काम देखता हूं। पॉलिसी लेवल से लेकर इम्लीमेंटेशन तक। यहां पर अपने अंग्रेजी विभाग के साथ’साथ तीन पाठ्यक्रम और हैं जिनका मैं काआर्डिनेटर हूं।  बैंकिंग इन फाइनेंस का हमारे यहां पीजी प्रोग्राम चलता है,एक साफ्टवेयर डेवलप का कार्यक्रम चलता है इसके अलावा जर्नलिज्म इन मास कम्युनिकेशन का भी प्रोग्राम चलता है  मैं इन तीनों का कॉआर्डिनेटर हूं।

न मि-    इतने सारे विभागों का काम संभालने के लिए  आपको कितना समय कालेज को देना पड़ता है ?

राकेश जैन-          मैं काम के घंटे नहीं देखता। हमारा कालेज ऑटोनॉमस है तो ऐसे में यहां काम करने वालों की जिम्मेदारी अन्य कालेजों की अपेक्षा कुछ बढ़ जाती है। कालेज में कम्प्यूटर से संबन्धित जितना भी काम होता है वह सब मैं ही देखता हूं। रिजल्ट निकालना, परीक्षाएं करवाना, कालेज में प्रवेश परीक्षाएं करवाना, कालेज में जो भी खरीद आदि होती है वह मैं देखता हूं,एकेडमिक काउंसिल का मैं कन्वीनर हूं,फाइनेंस कमेटी का मैं मेम्बर हूं, कालेज के जितने लीगल मामले होते हैं सब मैं ही देखता हूं। टीचिंग के साथ-साथ मेरे पास और इतने सारे काम हैं कि पिछले बीस वर्षों से मैंने न तो गर्मी की छुट्टियां ली हैं और न सर्दियों की।

न मि -   आपने इतने सारे काम गिना दिए जिनको सुनकर ही सांस फूलने लगी। इतने सारे काम निबटाने में दृष्टिहीनता कहीं इसमें बाधा नहीं बनती ?

राकेश जैन -         देखिए एक लेवल पर आकर जब आप काम करने की स्थिति में होते हैं तो आप गाइड करते हैं अपने स्टाफ को और अपने साथ के लोगों को। आपको तो पहले समझना है और फिर समझाना है। आज एक तो टेक्नॉलॉजी इतनी विकसित हो चुकी है कि अगर कोई भी नहीं है तो कम्प्यूटर या मोबाइल के माध्यम से सबकुछ संभव है मेरे लिए। ऐसे साफ्टवेयर आ गए हैं जो बोल-बोलकर सब कुछ बता देते हैं। मैं सबकुछ पढ़ लेता हूं,समझ लेता हूं, लिख लेता हूं, ब्रेल का डिजिटल यंत्र है मेरे पास जिसके द्वारा मैं खुद ड्राफ्टिंग कर लेता हूं। जब आप खुद कोई काम करते हैं तब आपको किसी को गाइड करना या उससे काम लेना कठिन नहीं रह जाता।

न मि -   आपका जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन संघषों से  जूझने के लिए आपका प्रेरणा स्रोत कौन रहा ?

राकेश जैन -         मुझको लगता है मेरा परिवार मेरा प्रेरणा स्रोत रहा। देखिये इसमें दो चीजें होती हैं। आपको कान्फीडेंस लेवल कौन देता है? जब तक दूसरा व्यक्ति आपमें कांफीडेंस नहीं रखेगा तब तक आप कुछ नहीं कर पाएंगे। तो सबसे पहले मेरे परिवार ने मुझमें इतना भरोसा रखा कि दृष्टिबाधित होने के बावजूद मेरे माता-पिता सोच सके कि यह तो दिव्यांग है और सन्तानें होनी चाहिए लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं सोचा। मैं और मेरा छोटा भाई एक साथ पले-बढ़े। मेरे पिता ने मेरे अध्ययन में पूरी सहायता ही नहीं की पूरा प्रोत्साहन भी दिया। स्कूली शिक्षा के बाद वह चाहते तो स्नातक और स्नातकोत्तर पढ़ाई के लिए वो मुझे किसी हॉस्टल में भी रख सकते थे या कहीं और छोड़ सकते थे लेकिन उन्होंने मुझे घर में परिवार के बीच अपने साथ ही रखा और पढ़ने-लिखने में मेरी हर तरह से मदद की।

न मि -   यहां इस कालेज में आने के बाद शुरू-शुरू का आपका अनुभव कैसा रहा?

राकेश जैन -         जब मैं इस कालेज में आया तो यहां के प्रिंसिपल थे प्रो0 एस.पी.सिंह। उन्होंने मुझे देखा, मेरी योग्यता को परखा कि मैं किस तरह से काम कर रहा हूं, किस तरह से मैं हर व्यक्ति की समस्या को अपने स्तर पर अपनी सामर्थ्य भर सुलझााने की कोशिश करता हूं तो उनमें कांफीडेंस आया मुझे लेकर। उन्होंने मुझे काम दिया तो मेरे लिए वो भी प्रेरणा के एक स्रोत रहे। जब कोई आपमें भरोसा दिखाता है तो आपको अच्छा से अच्छा करके दिखाना होता है। जहां तक संघर्ष की बात है जो आपने कही, तो संघर्ष तो सभी के जीवन में होता है। अपने बारे में मैं कह सकता हूं कि मैंने अपने काम को जिया है, काम करने में आनन्द अनुभव किया है। लोग मुझसे कहते है कि आप इतने सारे काम लेकर बैठे हुए हैं,छोड़ क्यों नहीं देते तो मैं उनसे कहता हूं कि काम करना मुझे अच्छा लगता है।

न मि-    आपका जीवन दर्शन क्या है ?

राकेश जैन -         मेरा जीवन दर्शन यह है कि आपकी सफलता आपकी अपनी उपलब्धियों में नहीं है। आपकी उपलब्धियों की कीमत तभी तक है जब आप अपनी उपलब्धियों का उपयोग दूसरों की सहायता करने में करते हैं। जैसे धन को ही ले लें तो आपके पास जितनी भी धनराशि हो उसका तब तक कोई मूल्य नहीं है जब तक आप जरूरतमंद के लिए उस धनराशि का उपयोग न कर सकें। थोड़े शब्दों में कहूं तो आपकी उपलब्धि की सार्थकता दूसरों की सहायता करने में है।

न मि-    कालेज में अध्यापन के अलावा आप और क्या करते हैं ?

राकेश जैन-          जैसा कि पहले बताया कि कालेज का काफी काम मेरे पास होता है जिसमें मेरी बहुत व्यस्तता रहती है लेकिन मुझे किताबें पढ़ने का,किताबें सुनने का बहुत शौक है।

न मि-    किताबे सुनने से आपका क्या मतलब है ?

राकेश जैन -~ऑडियो बुक्स। हम लोगों के लिए पढ़ना तो संभव हो नहीं सकता लेकिन ऑडियो बुक्स हम दृष्टिबाधित लोगों का बहुत बड़ा सहारा हैं। ऑडियो बुक्स की एक बहुत बड़ी दुनिया है जिसमें बहुत सारी किताबें मिल जाती हैं। इसके अलावा हम लोगों के लिए स्पेशल लाइब्रेरीज हैं जैसे ऑडीबल डॉट कॉम एमेजान का है, स्टोरी टेल के नाम से है इसके अलावा बुक शेयर करके एक अमरीकी लाइब्रेरी है जिसमें लाखों की संख्या में किताबें उपलब्ध हैं दिव्यांग जनों के लिए। आपको बताना चाहूंगा कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई समझौते हुए हैं जिसके तहत एक देश दृष्टिबाधितों के लिए जो किताबें तैयार करता है वे किताबें दूसरे देशों को उपलब्ध कराई जाती हैं। 

न मि-    यह बड़े सन्तोष की बात है कि दृष्टिबाधितों के लिए कई स्तर पर निरन्तर प्रयास जारी हैं।

राकेश जैन -         आजकल एक नया ट्रेण्ड चला है। नया क्या, है तो पुराना लेकिन अब धीरे-धीरे पापुलर हो रहा है, वह है आडियो डिस्क्राइब्ड मूवीज।

न मि -   इसके बारे में कभी सुना नहीं।

राकेश जैन -         पिक्चर में क्या होता है? डायलॉग्स होते है लेकिन बहुत से सीन ऐसे होते हैं जिनमें कोई संवाद नहीं होता है खाली एक्शन होता है तो जब एक्शन हो रहा होता है तो हमें नहीं पता चल पाता कि क्या हो रहा है तो उसके लिए आडियो डिस्क्रिप्शन होता है। जहां पर खाली सीन है कोई डायलॉग नहीं है तो उस ट्रैक के लिए  ऑडियो रिकार्ड किया जाता है कि इस समय स्क्रीन पर क्या हो रहा है। तो हिंदी में ऐसी कई फिल्में आईं जैसे धोबी घाट,तारे जमीं पर और शोले जैसी कई फिल्में हैं। ये फिल्में हमारे एन जी ओ द्वारा तैयार की जाती हैं। नेटफ्लिक्स पर आप जितनी सीरीज देखेंगे उनमें आडियो डिस्क्रिप्शन होता ही होता है, यह एक इन्टरनेशनल रूल है।

न मि -   इस क्षेत्र में आपने भी कुछ काम किया है ?

राकेश जैन -         हमने ऑडियो बुक्स तैयार करने का काम किया है। हमारी एक एन जी ओ है जिसका नाम है रिहैबिलिटेशन सोसायटी आफ दि विजुअली एम्पेयर्ड। उसमें हमारे पास एक स्टूडियो है जिसमें हम आडियो बुक्स तैयार करते हैं। छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए किताबें, कोर्स की किताबें और पाठ्य पुस्तकों को रिकार्ड करने पर हमारा खासतौर पर जोर रहता है। इसके अलावा हमने बहुत सारे उपन्यास,कहानियां आदि रिकार्ड किए हैं

पिछले पंद्रह वर्षों में। इंडिया में हमें बेस्ट रिकार्डिंग का नेशनल अवार्ड भी मिला है।

न मि -   क्या कभी आपने आत्म कथा लिखने पर विचार किया?

राकेश जैन - नहीं।

न मि-    क्यों ?

राकेश जैन -         क्योंकि मुझे नहीं लगता कि मैंने जीवन में ऐसा कुछ विशेष किया है जो और लोग नहीं कर सकते।

न मि-    अब एक आखिरी सवाल। आपका विवाह हुआ ?

राकेश जैन -         जी मेरा विवाह हुआ। मेरी पत्नी उमा जैन से मेरा परिचय हुआ फिर 1997 में हम दोनों ने शादी कर ली।

न मि -   क्या वह भी दिव्यांग हैं ?

राकेश जैन -         नहीं। वह एकदम सामान्य हैं। हमारे दो बेटे हैं। एक एच डी एफ सी बैंक में काम करता है और दूसरा नोइडा में बी.टेक कर रहा है।

नवनीत मिश्र -    आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा डाक्टर राकेश। आपने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच हमसे बात करने के लिए समय निकाला इसके लिए मेरा आभार स्वीकार करें। आप प्रकाश स्तम्भ की तरह जगमगाते हुए लोगों को राह दिखाने के लिए सक्रिय रहें यही कामना है।

राकेश जैन -         आपको भी धन्यवाद।             

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नवनीत मिश्र                                      

ई-4, सौभाग्य अपार्टमेंन्ट,

8 , गोपाल नगर ,लखनऊ- 226 023

मो-0 94 500000 94

 

 

    

 

 

 

    

 

मंगलवार, 27 जून 2023

संस्मरण

 

संस्मरण

’कथाबिंब’ को अपनी तीसरी पुत्री मानते थे  ’अरविन्द जी’

रूपसिंह चन्देल

बाएं मैं और दाएं डॉ.माधव सक्सेना ’अरविन्द’

1988 की बात है. एक दिन स्व.कथाकार विजय ने कहा, “तुम डॉ.माधव सक्सेना ’अरविन्द’ की पत्रिका ’कथाबिंब’ को कोई कहानी क्यों नहीं भेजते!”

“मेरा उनसे परिचय नहीं है.”

“जिन पत्रिकाओं में छपे उनके सम्पादकों से पहले से परिचित थे?”

“नहीं.”

“फिर कथाबिंब के सम्पादक से परिचय की क्या बात. वह एक भले सम्पादक हैं. तुम्हारी कहानी उन्हें पसंद आएगी तब उसे अवश्य प्रकाशित करेंगे.”

उन दिनों विजय प्रायः हिन्दुस्तान बिल्डिंग में लोगों से मिलने जाते थे. मैं भी महीने में एक और कभी-कभी दो बार वहां जाने लगा था. हम पहले ही तय कर लेते कि अमुक समय वहां या कॉफी होम में मिलेंगे.

“आप मुझे उनका पता दे दीजिएगा. मैं अपनी नयी कहानी कथाबिंब को भेज दूंगा.” मैंने कहा.

विजय जी डीआरडीओ में वैज्ञानिक थे और लगभग हर दिन लंच के समय फोन पर हम दोनों बातें करते. उनसे पता लेकर मैंने माधव सक्सेना जी को कहानी भेजा. कहानी स्वीकृत हुई और अगले ही अंक में प्रकाशित भी. इस प्रकार कथाबिंब में प्रकाशित होने का सिलसिला प्रारंभ हुआ. यह याद नहीं कि कथाबिंब में प्रकाशित होने वाली मेरी पहली कहानी कौन-सी थी और वह किस अंक में प्रकाशित हुई थी. इतना अवश्य याद है कि मेरी कहानियां प्रकाशित करने में वे अधिक विलंब नहीं करते थे. त्रैमासिक पत्रिका होने पर कुछ विलंब स्वाभाविक था. अपना दूसरा उपन्यास ’रमला बहू’ मैंने जुलाई 1990 में लिखना प्रारंभ किया था. उपन्यास 1993 के प्रारंभ में समाप्त हुआ. नौकरी,परिवार और लेखन में ताल-मेल बैठाना आसान न था. बच्चों के देखभाल की समस्या थी. ’रमला बहू’ लिखने के लिए मैं कभी एक सप्ताह तो कभी दो सप्ताह का अवकाश लेता, जितना लिखा जाता उसे अगले अवकाश से पहले संशोधित करता रहता. सबसे पहला अंश ’छिद्दा सिंह’ मैंने कथाबिंब को भेजा. 20 फरवरी,1991 का अरविन्द जी का पत्र मुझे मिला:

“प्रिय भाई,

आज ही आपका पत्र मिला. आपका उपन्यास अंश काफी पहले मिल गया था. बस पत्रोत्तर नहीं दे सका. क्षमा करें. ’कथाबिंब’ का प्रकाशन नियमित होने लगा है किंतु पहले का इतना कुछ है जिसे समेटते-समेटते बहुत समय निकलता जा रहा है. आगे के लिए भी सारा कर्य योजनाबद्ध ढंग से होता रहे इस ओर भी ध्यान दे रहा हूं. ऑफिस में भी बहुत काम है. तबियत भी ऊपर-नीचे लगी रहती है. ’छिद्दा सिंह’ अप्रैल-जून अथवा जुलाई-सितंबर अंक में जाएगा. अभी निश्चित नहीं कर सका हूं. आपको यथा-समय सूचना दूंगा.

इधर कुछ नया नहीं लिख सका हूं. काफी अफसोस होता रहता है.

शेष शुभ है.

कृपा बनाए रखें,

आपका-

अरविन्द”

पत्रिका निकालना कितना कठिन होता है यह लघु-पत्रिकाएं निकालने वाले सम्पादक ही जानते हैं. ’कथाबिंब’ का पहला अंक 1979 में प्रकाशित हुआ था. तब से अंक 160 तक (अक्टूबर-दिसम्बर,2022) तक अरविन्द जी ने जिस मनोयोग से पत्रिका प्रकाशित की उसे लघु-पत्रिकाओं के इतिहास में उनका अविस्मरणीय योगदान कहा जाएगा. पारिवार,नौकरी आदि की चिंताओं के साथ अहर्निश पत्रिका उनके जेहन में रहती और यह बात उनकी चिन्ता का विषय होता कि उसे किस प्रकार बेहतर बनाएं. जनवरी,1992 में उन्होंने पत्रिका के दो अंक कहानी विशेषांक के रूप में प्रकाशित करने की योजना बनायी जिसके लिए उन्होंने लेखकों को एक प्रपत्र भेजा. तब तक अरविन्द जी और मेरे संबन्ध बहुत ही प्रगाढ़ हो चुके थे. हालांकि हमारी मुलाकात बहुत बाद में हुई, लेकिन सम्बन्धों की प्रगाढ़ता का अनुमान उनके पत्रों से लगाया जा सकता है. (उनके 17 पत्र मेरी पत्रों की पुस्तक ’समय की लकीरें’ (2020, श्री साहित्य प्रकाशन, दिल्ली) में संकलित हैं.)  

कहानी विशेषांक के लिए लेखकों को भेजा पत्र उन्होंने मुझे भी भेजा. प्रपत्र के अंत में पुनश्च हिस्सा ध्यान देने योग्य है—

“10 जनवरी,1992 (बंबई)

प्रिय रूपसिंह जी,

’कथाबिंब’ नियमित प्रकाशन के चौदहवें वर्ष में प्रवेश कर रही है. कहीं न कहीं, इस यात्रा के दौरान आपके सामने भी पत्रिका का एक न एक अंक अवश्य आया होगा. परिस्थितियों के अनुकूल-प्रतिकूल बहाव में भी यदि ’कथाबिंब’ ने अपना बुनियादी रास्ता नहीं छोड़ा, तो इसके पार्श्व में सिर्फ और सिर्फ आप जैसे नामों का परोक्ष अथवा अपरोक्ष सान्निध्य ही है.

अपने अब तक सहेजे-कमाए आत्मविश्वास के आधार पर हमने एक कहानी-विशेषांक की योजना बनायी है. यह विशेषांक दो खंडों में लगभग चालीस कथाकारों को लेकर विचाराधीन है.

संभवतः आपको जानकारी हो कि ’कथाबिंब’ ने पुस्तकाकार रूप में ’समकालीन कविता’ और ’लघुकथा:दशा और दिशा’ विशेषांकों का एक सिलसिला पहले भी पूरा किया था. इन विशेषांकों को साहित्यिक हलकों में मिला प्रतिसाद आज कथाबिंब की मिल्कियत का हिस्सा है.

हमारे सामने आज कई खतरे हैं, चुनौतियां हैं. सीमित साधनों के बावजूद भी ’कथाबिंब’ ने हिन्दी पाठकों को सदा ही बेहतर सामग्री देने की कोशिश की है. बड़ी पत्रिकाएं, पारिश्रमिक देकर रंगीन पृष्ठों पर कहानियां सजाती हैं. लेकिन हमे तो आज की कहानी का बिंब थाल भर पानी में संजोना है. सजाने और संजोने का यह फर्क ही आपकी ताज़ा कहानी मांगने को हमें उकसा रहा है.

विशेषांक का पहला खंड मई-जून,93 तक प्रकाशित होगा. कृपया अपनी रचनाधर्मिता को रेखांकित करती हुई एक प्रतिनिधि कहानी जल्दी से जल्दी हमें भेज दें.

नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ,

उत्तर की प्रतीक्षा में,

आपका-

अरविन्द

पुनश्च: प्रिय भाई, आपको यह औपचारिक प्रपत्र भेजते हुए अच्छा नहीं लग रहा है. हम लोगों के आपसी संबन्ध कहीं अधिक प्रगाढ़ हैं. मैं चाहता हूं, विशेषांक के दोनों खंड काफी जोरदार निकलें. इसीलिए इतना पहले लिख रहा हूं कि बढ़िया-सी कहानी फरवरी अंत तक भेज पाओ तो अच्छा रहेगा.

शेष शुभ है.

अरविन्द”

उपरोक्त प्रपत्र मेरे प्रति उनके प्रेम को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है. कथाबिंब के लिए वह कितना समर्पित थे यह निम्न पत्र से स्पष्ट है. वह बहुत अच्छे कथाकार थे, लेकिन कथाबिंब और ऑफिस उनका इतना अधिक समय ले लेता कि उनका मौलिक लेखन लगभग बंद हो चुका था. उनके केवल दो कहानी संग्रह ही प्रकाशित हुए. पहला बहुत पहले स्व. मधुदीप के ’दिशा प्रकाशन’ से और दूसरा 2022 में ’इंडिया नेटबुक्स प्रा.लि. नोएडा’ से. अपनी व्यस्तता और न लिख पाने की पीड़ा को व्यक्त करते हुए उन्होंने मुझे 4 अप्रैल,1993 को लिखा :

“प्रिय रूपसिंह जी,

पत्र आपका प्राप्त किया. आपकी कहानी की बाबत मैंने एक पत्र डाला था किसी कारण से आपको मिला नहीं. विशेषांक के प्रथम खंड में ’फूहड़’ कहानी जाएगी,निश्चिंत रहें. अभी तक 5-6 कहानियां आयी हैं. इस माह के अंत तक कुछ रचनाकारों ने वायदा किया है. यह खंड जून में ही आ पाएगा. उससे पहले ’कथाबिंब’ के दो सामान्य अंक निकलने हैं. अंकों में विलंब हो जाने से सभी लोग सोचने लगते हैं कि कहीं पत्रिका बंद तो नहीं हो गयी? पर फिलहाल ऎसी स्थिति नहीं आयी है. दंगों के कारण ही विलंब पैदा हुआ है. इस समय एक अंक इलाहाबाद में और दूसरा भाई सुनील कौशिश द्वारा कानपुर में छप रहा है.

-पत्रिका संबन्धी पत्र-व्यवहार ही काफी समय ले लेता है. अपना लिखने के लिए काफी फुर्सत चाहिए. पिछले साल दो कहानियां लिखी थीं. पर यह काफी नहीं है—यह जानता हूं. बहुत सी चीजों से समझौता करना पड़ता है. उन्हीं में यह भी एक है.; बहरहाल, जैसा है ठीक ही है.

आपका-

अरविन्द”

 

कथाबिंब के कारण अरविन्द जी के परिचय का दायरा बहुत विस्तृत था. आवश्यकता पड़ने पर वह लोगों की सहायता भी करते. ’कथानक’ के सम्पादक सुनील कौशिश उनके घनिष्ट मित्र थे. मधुमेह के कारण सुनील का स्वास्थ्य बहुत खराब था. आंखों से नहीं बराबर दिखाई देता था. मधुमेह ने  केवल उनकी आंखों को ही प्रभावित नहीं किया था, किडनी तथा अन्य समस्याएं भी पैदा की थीं. अक्टूबर 1994 में उपचार के लिए सुनील कौशिश मुम्बई गए और लगभग एक माह तक अरविन्द जी के यहां रहे. अंततः 4 जनवरी,95 को मुम्बई के किसी अस्पताल में ऑपरेशन के बाद कौशिश की मृत्यु हो गयी थी. इस बारे में अरविन्द जी ने 10 जनवरी,1995 के पत्र द्वारा मुझे सूचित किया. कौशिश मेरे भी अच्छे मित्र थे. कानपुर में मेरे बड़े भाई साहब के निवास के निकट ही उनका घर था. अरविन्द जी ने कथाबिंब के लिए उन पर संस्मरण लिखने के लिए कहा, लेकिन उनसे पहले ’सम्बोधन’ के सम्पादक क़मर मेवाड़ी जी मुझे कह चुके थे. दोनों ही मेरे घनिष्ट थे. क़मर भाई को मैं वचन दे चुका था. संस्मरण मैंने उन्हें दिया. इस बात की शिकायत अरविन्द जी ने शिष्टतापूर्वक पत्र द्वारा दर्ज करवायी थी.  

कथाबिंब के प्रत्येक अंक में वह एक साहित्यकार का साक्षात्कार प्रकाशित करते थे. उनके कहने  पर मैंने हिमांशु जोशी और शिवप्रसाद सिंह के साक्षात्कार किए. शिवप्रसाद सिंह का साक्षात्कार लंबा था, जिसका एक अंश मैंने कथाबिंब को दिया था. उन्होंने कमलेश्वर जी का साक्षात्कार करने के लिए कहा. उन दिनों तक कमलेश्वर जी से मेरा परिचय मात्र इतना था कि मैंने उनके कहानी संग्रह की समीक्षा ’जनसत्ता’ के लिए लिखा था जिसके प्रकाशन के बाद मैंने उसकी फोटो प्रति उन्हें भेजा. उत्तर में कमलेश्वर जी का पत्र आया था, जिसमें उन्होंने मुझे समीक्षाएं लिखने से बचने की सलाह दी थी. कमलेश्वर जी से मेरा संपर्क 1996 में हुआ जो उनके अंतिम दिनों तक रहा और बहुत अच्छा रहा था. 2 अक्टूबर,2000 मैंने कमलेश्वर जी का लंबा साक्षात्कार किया, जिसका एक अंश कथाबिंब में प्रकाशित हुआ था. साक्षात्कार के अतिरिक्त कथाबिंब में आत्म-कथ्य का एक स्तंभ है, जिसके लिए उन्होंने मुझसे मेरा आत्मकथ्य लिखवाया था.

कथाबिंब के अतिरिक्त वह एक अन्य पत्रिका ’वैज्ञानिक’ के सम्पादन से भी जुड़े हुए थे. उन्हें हर दिन रचनाएं और समीक्षार्थ पुस्तकें मिलतीं. हर लेखक की यह अपेक्षा रहती है कि सम्पादक उसकी रचना पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दे. 24 अप्रैल,1998 के पत्र में उन्होंने अपनी इस उलझन को साझा किया था.  मेरे ’पाथर टीला’ उपन्यास का एक अंश पत्रिका में प्रकाशनार्थ पड़ा हुआ था, जिसके प्रकाशन के बारे में वह मुझे लिख चुके थे. लेकिन दो अन्य लेखकों ने भी उन्हें उपन्यास अंश भेजे. वह द्विविधा में थे.

24 अप्रैल,1998

“प्रिय रूपसिंह जी,

कई नावों पर एक साथ पैर रखने जैसी स्थिति है मेरी. आपके पत्र मिलते रहते हैं---उपन्यास अंश भी है. इसके साथ ही तीन अन्य लोगों के उपन्यास अंश आए हुए हैं. ’कथाबिंब’ के अलावा मैं एक अन्य पत्रिका ’वैज्ञानिक’ से  भी जुड़ा हुआ हूं. उसके प्रकाशन में भी बहुत समय जाता है. कई-कई बार प्रूफ रीडिंग से लेकर हर पृष्ठ का ले आउट (दोनों त्रैमासिक पत्रिकाओं का) मैं ही बनाता हूं—ऎसे दिनों में मात्र सामान्य पत्र-व्यवहार ही हो पाता है. औसतन पांच पत्र रोज, एक पत्रिका और सप्ताह में एक पुस्तक आती है---हर व्यक्ति चाहता है कि रचना पर सम्मति भी दी जाए—ऎसे में कुछ व्यक्ति जो करीब हैं और जिन्हें यूं ही निबटाया नहीं जा सकता उनके पत्रों को अलग रख लेता हूं. पलाश विश्वास 11 पृष्ठों के पत्र भेजते हैं और 32 टाइप किए पृष्ठों की कहानी---पत्रिका को लेकर काम  दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है---अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं. मैं एक सहयोगी/सहायक तलाश कर रहा हूं जो रूटीन काम कर ले—थोड़े कुछ पैसे भी ले ले. अन्यथा आप जैसे मित्र कटते जाएगें. एक अंक तैयार हो रहा है और दो अंकों की रचनाएं स्वीकृत हैं. आप बताएं कि उपन्यास अंशों (तीन) का मैं क्या करूं?

मेरी बेचारगी पर तरस खाएगें.

शुभकामनाओं के साथ,

अरविन्द”

अरविन्द जी से मेरी पहली मुलाकात 2000 के आसपास नई दिल्ली में उनके भांजे के घर हुई, जो किसी सरकारी विभाग में डाक्टर थे और साहित्य अकादमी के निकट एक सरकारी बंगले में रहते थे. उस समय घर से बाहर निकलकर हम देर तक बातें करते रहे थे. अरविन्द जी टेनिस के अच्छे खिलाड़ी थे और प्रतिदिन शाम के समय टेनिस खेलते थे बावजूद इसके कि उन्हें घुटने की समस्या थी. अंतिम दिनों उनकी यह समस्या काफी गंभीर हो चुकी थी.

12 मई, 2006 का अरविन्द जी का हस्तलिखित अंतिम पत्र था, जिसमें उन्होंने अपने अवकाश ग्रहण करने की सूचना दी थी.

“प्रिय रूपसिंह जी,

मैं सोच ही रहा था कि आपको कहानी के लिए लिखूं, पर इस बीच आपने स्वयं कहानी भेज दी. बहुत-बहुत आभार. कहानी बढ़िया है और यह अप्रैल-जून2006 अंक में जा रही है. इससे पहले वाला अंक भी लगभग तैयार है. मैं बता दूं कि 31 मार्च को मैं भाभा परमाणु केन्द्र की 40-1/2 वर्षों की नौकरी के बाद सेवा-निवृत्त हो गया हूं. अब पत्रिका के लिए और अपने लेखन के लिए अधिक समय दे पाऊंगा. ऎसा फिलहाल लग रहा है.

शेष सामान्य है,

आपका-

अरविन्द”

27 जनवरी,2007 (शनिवार) की सुबह अरविन्द जी का  फोन आया कि वह दिल्ली में हैं. किसी विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिए वह मंजुश्री जी के साथ आए थे और दक्षिण दिल्ली के किसी होटल में ठहरे हुए थे.  हमने शाम 3 बजे कॉफी होम, कनॉट प्लेस में मिलने का तय किया. अरविन्द जी ने विजय जी को बुलाने के लिए कहा. ठीक तीन बजे हम मिले. हॉल में बैठने का स्थान न मिलने के कारण हम बाहर खुले में लगभग दो घण्टे बैठे और साहित्य तथा साहित्येतर विषयों पर बातें करते रहे. अगले दिन सुबह साढ़े सात बजे मैं छत पर अखबार पढ़ रहा था कि सुरेश सलिल ने फोन करके बताया कि 27 की रात कमलेश्वर जी का देहावसान हो गया था. वह समाचार की सत्यता जानना चाहते थे. मुझे इसलिए फोन किया था क्योंकि उन्हें मालूम था कि मैं कमलेश्वर जी के काफी निकट था. मैंने अरविन्द जी को फोन किया. वह उस समय कमलेश्वर जी के निवास पर थे. समाचार सही था. रात नौ बजे के लगभग मयूर विहार में अपने किसी प्रवासी मित्र से मिलकर कमलेश्वर जी गायत्री जी के साथ घर लौट रहे थे कि रास्ते में उन्हें हार्ट अटैक हो गया था.

अरविन्द जी से तीसरी मुलाकात भावना प्रकाशन में हुई थी. मेरे साथ बलराम अग्रवाल भी थे. इस मुलाकात की तिथि याद नहीं, लेकिन एक अनुमान के अनुसार यह मुलाकात 2012-13 में कभी हुई थी.

 

यह बात 2014 जनवरी की है. एक दिन अरविन्द जी का फोन आया कि वह मेरे अतिथि सम्पादन में ’कथाबिंब’ का कहानी विशेषांक निकालना चाहते हैं. जब मैंने उनसे उनके लेखकों की सूची मांगी, उन्होंने कहा, “आप पूरी तरह स्वतंत्र हैं.” मैंने देश और विदेश के 34 रचनाकारों को मेल और पत्र लिखे. फोन किए. सभी ने रचनाएं दीं. दो रचनाकारों की रचनाएं छोड़नी पड़ी थीं,क्योंकि उन्होंने पूर्व प्रकाशित कहानियां भेजी थीं, जिनकी जानकारी समय रहते हो गयी थी. ’जनवरी-जून’ 2014 का 216 पृष्ठों का विशेषांक बहुत चर्चित रहा था. आश्चर्यजनकरूप से इस महा-विशेषांक का मूल्य अरविन्द जी ने सामान्य अंकों की भांति मात्र पचीस रुपए ही रखा था.

अरविन्द जी चाहते थे कि उन सभी कहानियों को पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया जाए. परिचित प्रकाशकों का तर्क था कि जब पचीस रुपए में लोगों को अंक उपलब्ध हो चुका है तब पांच सौ रुपए की पुस्तक कौन खरीदेगा. उनका तर्क सही था. फिर भी हमारा प्रयास जारी रहा. अमन प्रकाशन, कानपुर इसे प्रकाशित करने के लिए तैयार हुए, लेकिन वह सभी लेखकों को नहीं छापना चाहते थे. पुस्तक के आकार को दृष्टिगत रखते हुए तय हुआ कि उसे दो भागों-—’कथा पर्व’ और ’कथा समय’ नाम से प्रकाशित करवाया जाए. विशेषांक के कुछ लेखकों की कहानियों के स्थान पर ’कथा समय’ में दूसरे लेखकों की कहानियां देने का निर्णय हुआ. ’कथा पर्व’ में मन्नू भण्डारी जी की कहानी दी गयी. ’कथा पर्व’ अमन प्रकाशन और ’कथा समय’ के.एल.पचौरी, गाजियाबाद ने प्रकाशित किए. ये दोनों पुस्तकें 2020 विश्व पुस्तक मेला  के दौरान प्रकाशित हुई थीं. 

थोड़ा पीछॆ लौटता हूं. ’अमन प्रकाशन’ कानपुर के श्री अरविन्द बाजपेयी जी से मेरा परिचय 2015 के विश्व पुस्तक मेला में हुआ था. 2016 में ’चुनी हुई कहानियां’ श्रृखंला में वह मेरा कहनी संग्रह प्रकाशित कर चुके थे.  2017 में मैंने उन्हें  अपनी पुस्तकों पर तब तक प्रकाशित समीक्षाएं और आलोचनात्मक आलेख प्रकाशित करने के लिए प्रस्ताव दिया. बाजपेयी जी सहस्र तैयार हो गए. मुझसे पहले वह एक-दो वरिष्ठ साहित्यकारों की ऎसी पुस्तक प्रकाशित कर चुके थे. प्रश्न पैदा हुआ कि पुस्तक का सम्पादन कौन करेगा. बाजपेयी जी चाहते थे कि कोई वरिष्ठ साहित्यकार पुस्तक का सम्पादन करें. बहुत सोचने के बाद मैंने डॉ. माधव सक्सेना ’अरविन्द’ जी से बात की. वह तैयार ही नहीं हुए  उन्होंने पूरा सहयोग किया.

 

वर्षों से ऎसा हो रहा था कि जब भी अरविन्द जी विदेश जाते, मुझे सूचित कर देते. हम प्रायः व्वाट्स ऎप पर बातें करते रहते. अमेरिका में वह जहां भी घूमने जाते उसके चित्र मुझे व्वाट्स ऎप पर भेजते. कितनी ही बार उन्होंने मुझे मुम्बई आने के लिए कहा लेकिन मैं जा नहीं पाया. आज तक मुम्बई नहीं गया और अब यदि कभी भविष्य में जाना हुआ तब वहां अरविन्द जी नहीं होंगे.

एक दिन कथाबिंब के मेल से मंजुश्री जी की कहानी मिली. यह बात भी शायद 2017 की है. पहली बार उनकी कहानी पढ़ रहा था. कहानी पढ़ने के बाद मैंने अरविन्द जी को फोन करके कहानी की प्रशंसा की. बोले, “आजकल दिनभर लैपटॉप पर कुछ न कुछ लिखती रहती हैं.” फिर फोन मंजुश्री जी को देते हुए बोले, “लो आप उन्हीं को बधाई दें.”

मंजुश्री जी से बात हुई. पता चला कि तब तक वह कई कहानियां लिख चुकी थीं और छपने के लिए इधर-उधर भेज चुकी थीं. कुछ दिनों बाद ही पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां प्रकाशित होने लगीं. लेकिन कथाबिंब में उन्होंने अपनी एक भी कहानी प्रकाशित नहीं करवायी. उसी दिन उन्होंने बताया कि उनकी पहली कहानी 1972 में सारिका में कमलेश्वर जी ने प्रकाशित किया था. कमलेश्वर जी उनके सगे ननदोई थे. सारिका के सम्पादक थे, लेकिन उसके बाद मंजुश्री जी ने उन्हें कोई कहानी नहीं दी. देती तो तब जब लिखा होता. लगभग पचास वर्षों का अंतराल और जब उन्होंने लिखना प्रारंभ किया तब कहानियों की बाढ़-सी आ गयी. अरविन्द जी प्रायः उनकी कहानियां मुझे पढ़ने के लिए भेजते. वह मंजुश्री जी को लेखन के लिए निरंतर प्रिरित करते रहे.

31 दिसम्बर,22 को शाम मैंने अरविन्द जी को व्वाट्स पर आने वाले वर्ष के लिए शुभकामनाएं दीं और समाचार पूछते हुए लिखा कि बहुत दिनों से बात नहीं हुई. दरअसल वह व्वाट्स ऎप पर बहुत सक्रिय रहते थे लेकिन लंबे समय से उन्होंने कुछ नहीं भेजा था. 1 जनवरी,23 को सुबह उन्होंने बेटा-बहू का एक चित्र भेजा. मैंने तुरंत ’हार्दिक शुभकामनाएं’ लिख भेजा. उसी समय उन्होंने दोनों का दूसरा चित्र भेजते हुए मुझे नववर्ष की शुभकामनाएं भेजा. एक मिनट बाद ही मैंने पूछा कि क्या दोनों बच्चे मुम्बई में हैं. उन्होंने लिखा. “16 (जनवरी) को आएंगे. 21 को बड़ी लड़की नूपुर की बड़ी लड़की अक्षता की शादी है.” उसीदिन फोन पर बात हुई तब उन्होंने बताया कि माइनर अटैक पड़ा था इसलिए डाक्टरों ने बेड रेस्ट बताया है. इसलिए सारी गतिविधियां बंद हैं.

एक माह बाद 15 फरवरी को दोपहर उनका फोन आया, लेकिन बार-बार फोन कट रहा था. मैंने भी प्रयास किया. अपरान्ह  मैंने फिर फोन किया. लगभग एक मिनट बात हुई. उन्होंने 16 फरवरी को शाम  व्वाट्स संदेश भेजते हुए लिखा, “कल फोन पर ठीक से बात नहीं हो पायी. वैसे तबियत ठीक है. कई समस्याएं हैं. दाएं हाथ की उंगलियों से ठीक से लिखा नहीं जाता. मैं दूसरे फ्लोर पर रहता हूं. लिफ्ट नहीं है. बाएं घुटने के कारण चढ़ना उतरना मुश्किल है. सहारे की जरूरत होती है. वैसे समतल पर चलने में खास परेशानी नहीं होती. सुनने की क्षमता में भी थोड़ी कमी है. इसी कारण कथाबिंब अब जयपुर से निकालेंगे. वे शुरू में मेरे साथ थे. हम दोनों का नाम संस्थापक संपादक के रूप में जाएगा. स्वास्थ्य में धीरे-धीरे ही सुधार आएगा. हर तरह का इलाज चल रहा है. अब जैसा है उसे तो स्वीकारना ही है.” कुछ विराम के बाद उन्होंने फिर लिखा, “प्रबोध (गोविल) ने साहित्यिक जीवन बंबई से शुरू किया था.

17 फरवरी को सुबह ग्यारह बजे मैंने अरविन्द जी को फोन किया. तीन मिनट चौतींस सेकण्ड बात हुई थी. 13 मार्च को शाम जब मैं पार्क में टहल रहा था अरविन्द जी का फोन आया. उस समय सुन नहीं पाया. कुछ देर बाद मोबाईल पर उनकी मिस्ड कॉल देख मैंने उन्हें फोन किया. देर तक बात होती रही. यद्यपि आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन उन्होंने कहा कि दवाओं से लाभ है और वह स्वस्थ हो रहे हैं. उन्होंने एन.जी.ओ.ग्राफी करवा ली थी. उस दिन उन्होंने कथाबिंब के बारे में कहा, “रूपसिंह जी मेरी तीन बेटियां थीं. दो को बहुत पहले शादी करके विदा कर दिया था. दोनों अपने घरों में सुखी हैं. तीसरी बेटी अब विदा हुई है. मुझे राहत है.” कथाबिंब को वह अपनी तीसरी पुत्री मानते थे.

17 मार्च को अरविन्द जी का जन्म दिन था (वह 17 मार्च,1945 को फतेहगढ़,उ.प्र में जन्मे थे).  मैंने उन्हें सुबह व्वाट्स ऎप पर बधाई संदेश दिया. लेकिन उत्तर नहीं आया. तब मैंने 11.20 बजे उन्हें फोन किया, लेकिन तुरंत काट दिया. मन नहीं माना तो एक मिनट बाद दोबारा किया. एकतीस सेकण्ड तक घण्टी बजती रही. उसके बाद नहीं किया. अरविन्द जी से मेरी अंतिम बातचीत 13 मार्च को हुई थी. मैं यह मान रहा था कि वह स्वस्थ हो रहे हैं. वैसे भी उन्होंने लिखा था कि उन्हें सुनने में भी परेशानी है इसलिए  वह मेरा फोन नहीं सुन पाए होंगे. मन आश्वस्त था कि वह जल्दी ही स्वस्थ हो जाएंगे. लेकिन यह मेरा भ्रम था. 12 अप्रैल को  शाम सात बजे के लगभग पार्क में टहलते हुए मैंने मंजुश्री जी को यह सूचित करने के लिए फोन किया कि उनकी भेजी दोनों पुस्तकें (कहानी संग्रह और उपन्यास) मुझे मिल गयी हैं. कुछ देर बात करने के बाद उन्होंने बताया कि वह फोर्टिस अस्पताल में हैं, क्योंकि अरविन्द जी की दिन में वहां एनजीओ प्लास्टी हुई है. उन्हें सांस लेने में तकलीफ थी इसलिए सुबह वह उन्हें फोर्टिस लेकर गयी थीं. डाक्टरों ने उसी दिन एनजीओप्लास्टी कर दिया था. मुम्बई में रहने वाली उनकी बड़ी बेटी नूपुर उनके साथ थीं. फोर्टिस में तीन दिन रखने के बाद उन्हें भाभा रिसर्च सेण्टर के अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया था.

20 अप्रैल को सुबह  मंजुश्री जी का व्वाट्स ऎप संदेश मिला कि 19 की शाम 5.45 बजे अरविन्द जी को गंभीर हृदयाघात हुआ और वह नही रहे. मैं शॉक्ड. मंजुश्री जी को फोन करने का साहस नहीं जुटा पाया. व्वाट्स ऎप मेसेज किया. शाम को किसी प्रकार साहस जुटाकर फोन किया. ज्ञात हुआ कि मृत्यु से  कुछ देर पहले अरविन्द जी को व्वाट्स ऎप पर प्रबोध गोविल से कथाबिंब के नए अंक की पीडीएफ मिली थी, जिसे देखकर वह बहुत प्रसन्न थे. लेकिन वह प्रसन्नत क्षणिक थी. कुछ देर बाद उन्हें दो बार तेज खांसी आयी और दूसरी खांसी जानलेवा साबित हुई थी.

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