रविवार, 3 फ़रवरी 2008

आलेख

मूल रचना बनाम अनुवाद



सुशील कुमार


“हर बेचैन स्त्री
तलाशती है
घर प्रेम और जाति से अलग
अपनी एक ऐसी ज़मीन
जो सिर्फ़ उसकी अपनी हो
एक उन्मुक्त आकाश जो शब्दों से परे हो"
(`नगाड़े की तरह बजते शब्द`- पृष्ठ- ०९)

लेकिन हिन्दी भाषा-साहित्य की काव्यभूमि पर निर्मला पुतुल की ज़मीन कितनी अपनी है, हम आगे खुलेंगे इस आत्मसंशय के साथ कि उस ऊसर ज़मीन को अगर उर्वर प्रदेश न बनाया गया होता तो कैक्टस, नागफनी और बबूल सरीखे पेड़-पौधे ही वहाँ अपनी जड़ें जमा पाते!
देखने वाली बात है कि एक संताल आदिवासी परिवार में जन्मी-पली पुतुल का सिर्फ़ अपनी भाषा (संताली वांडमय, द्विभाषा नहीं) में अब तक एक भी कविता-संग्रह नहीं आया है। क्षेत्र में कई संताली पत्रिकाएं परिचालन में हैं, फिर भी अनुवाद से पूर्व वह इनमें लगभग नहीं के बराबर छपी हैं। हाँ, सामाजिक कार्यकर्त्ता होने के नाते विशेष गरज़ से रमणिका फाउंडेशन के द्वारा इनका द्विभाषी काव्य-संकलन 'अपने घर की तलाश में` प्रकाश में आया जिसमें प्रतिपृष्ठ दायीं ओर संताली और बायीं ओर हिन्दी में कविताएं आमने-सामने पाठकों से संवाद करती नज़र आती हैं, जो इस बात का पुख्ता सबूत है कि पुतुल की अनुदित कविताएं ही काव्यजगत में उनकी पहचान बना पाई हैं। किन्तु यक्षप्रश्न यह है कि किस भाषा-साहित्य में, हिन्दी में या संताली में या दोनों में, क्योंकि संताली भाषा के रचनाकार को हिन्दी भाषा-साहित्य के रचनाकार में ढ़ालने का जो प्रयास जाने-अनजाने जारी है, उससे अनुवाद-चिंतन की परंपरा से संबंधित कई-एक सवाल हाल के दिनों में उठ खड़े हुए हैं। समकालीन एक अन्य काव्य संग्रह 'नगाड़े की तरह बजते शब्द`, जिनमें अधिकतर कविताएं पहले संग्रह की ही हैं, भारतीय ज्ञानपीठ ने वर्ष २००४ में प्रकाशित की जो चर्चित रही और वर्ष २००५ के 'बेस्टसेलर पुस्तकों` की अनुक्रम में सूचीबद्ध भी हुई। दोनों ही संग्रहों में भाषा-रुपान्तर अशोक सिंह का हैं।
यहाँ यह बता देना समीचीन है कि संताली भाषा प्रक्षेत्र की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं यथा- बांग्ला, भोजपुरी, उर्दू, खोरठा, नागपुरी, मैथिली की तरह संताली भाषा न तो हिन्दी वर्णमाला के समीप है और न सहज ग्राह्य। इसमें टोन, अंडरटोन, बोलने के लहजे, शब्दार्थ, ये सब बिल्कुल भिन्न हैं। अतएव जटिल भाषा-साहित्य के वाड़्मय पर पकड़ बनाकर उसकी संस्कृति या सृजन पर अनुवाद का कार्य बेहद जोखिम़ भरा होता है, इसलिए कोई करता है तो उसके शब्दकर्म को उत्साहित करना चाहिए। पर दु:खद है कि भारतीय ज्ञानपीठ से छपे इस संग्रह के आवरणपृष्ठ पर अंकित कवि अरुणकमल के वक्तव्य को यदि हटा दिया जाए तो यह बताना मुश्किल हो जाएगा कि रचना किस भाषा से अनूदित है। रुपान्तर का नाम भी छोटे अक्षरों में अंकित है सिवाय इसके, अनुवादक के लिए एक वाक्य, एक शब्द, एक अक्षर तक नहीं लिखा गया है, संग्रह के आमुख पृष्ठ पर रुपान्तरकार की अभिव्यक्ति की जरुरत भी नहीं समझी गई।

सभी स्वीकारते हैं कि परायी या इतर संस्कृति और दुरुह भाषा-साहित्य से संबंधित सृजन का अनुवाद मौलिक लेखन से भी कठिन होता है। इस संदर्भ में मूल रचना को अनुवाद के माध्यम से अशोक सिंह ने अपनी भाषा में उतना ही सहज और भावप्रवण बनाकर प्रस्तुत करने का जो अपरिमित कौशल, अभ्यास, अध्ययन और लेखन क्षमता का परिचय दिया है ( कि मूल रचना भी अनुवाद के सामने निष्प्रभ मालूम पड़ती है) उस पर प्रकाशक और (पत्रिकाओं में) संपादकों द्वारा नि:शब्द रहना कहाँ तक न्यायसंगत प्रतीत होता है? क्योंकि सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद पुनर्सृजन की प्रक्रिया है जो मूल लेखन से किसी भी दृष्टि से न तो घटिया है और न कम महत्वपूर्ण। इस दृष्टि से हिन्दी अनुवाद-चिंतन परंपरा के एक मुख्य आधार-स्तंभ हरिवंश राय बच्चन का मत ध्यातव्य है। उनका मत है कि "स्तरीय अनुवादों से सृजनशील साहित्य निश्चित रुप से प्रभावित होता है। इसलिए अनुवाद की चरम सफलता यही मानी गयी है कि वह अनुवाद न होकर जिस अनुपात में मौलिक प्रतीत हो, उसी अनुपात में इसे सफल माना जा सकता है।" मौलिक सृजन की तुलना में अनुवाद की स्थिति के विषय में उनका कहना है कि "मैं अनुवाद को, यदि मौलिक प्रेरणाओं से एकात्म होकर किया गया हो, मौलिक सृजन से कम महत्व नहीं देता। अनुभवी ही जान सकेंगे कि प्राय: यह मौलिक सृजन से अधिक कठिन होता है।"
लेकिन बाजारवाद के इस युग में साहित्य में "मार्केटिंग" का जो प्रभाव देखा जा रहा है, उससे हिन्दी अनुवादक किस हद तक पीड़ित है और इसके क्या सांस्कृतिक-साहित्यिक फलाफल होंगे, इसको देखना-गुनना ही इस आलेख का वर्ण्य-विषय है क्योंकि बदलते परिवेश में, जहाँ सृजन की गुणवत्ता बाजार के द्वारा निर्धारित हो रही है, लोककला, लोकसंस्कृति, लोकसाहित्य और लोकचेतना को महज बाजार की वस्तु बन जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। बाजार में वस्तु प्रधान होती है, उसका निर्माता या वस्तुविद् नहीं क्योंकि उसकी मूल्यवत्ता, उसकी अर्थसत्ता से संचालित होती है। इस कारण साहित्य में अनुवादक के 'लोकेशन` से "मार्केंटिंग” को परहेज होता है क्योंकि इससे उसे एक धक्का-सा लगता है और सृजन को मूल रुप में प्रेषित करने की वंचना में अवरोध पैदा होता है। लेकिन क्रेता-पाठक इस चकमेबाजी से बच जाते हैं। मुगालते में उनकी जेबें भी कटने से बच जाती है।
निर्मला पुतुल की कविताओं के संदर्भ हमें नहीं भूलना चाहिए कि उनके अपने क्षेत्र संताल परगना और उससे बाहर दिल्ली तक उनकी जो साहित्यिक छवि बन रही है, वह कविताओं की अनूदित प्रतिलिपियों के प्रकाशन के बाद बनी है, उससे पहले नहीं।
खेद है कि समकालीन हिन्दी अनुवादकों को हाशिये पर धकलने में जितना बाजार दोषी है, उससे कम दोषी हिन्दी पत्र-पत्रिकाएं नहीं हैं। कुछ सचेत पत्रिकाओं को छोड़कर अन्य के संपादकों-संयोजकों का ध्यान इस ओर नहीं हैं। उनकी अन्यमनस्कता के कारण अन्य भारतीय भाषाओं में सृजन के हिन्दी अनुवाद को अपूरणीय क्षति हो सकती है।
चूंकि निर्मला पुतुल की काव्यवस्तु ने मेरे मन को मोहा है और ये भीतर तक मुझे आलोड़ती भी है, इसलिए मैं इनकी अनूदित कविताओं का अरसे से एक सजग पाठक रहा हूँ। लेकिन साथ ही साथ अनुवादक के साथ हो रही वंचना और उपेक्षा भी मुझे कहीं न कहीं हमेशा सालती रही है। स्वसंग्रहित विविध पत्रिकाओं से नीचे कुछ हिन्दी पत्रिकाओं के नाम अंकित है, अंक-संख्या, पृष्ठ-संख्या के साथ, जहाँ संताली कविताएं अनूदित होकर प्रमुखता से छपीं, पर इनमें न तो अनुवादक का नाम अंकित किया गया, न कविता के संताली से अनूदित होने का ही कोई प्रमाण मिलता है। अनजान पाठकों को तो हमेशा भरम रहेगा कि रचनाएं सीधे हिन्दी की है, और ऐसा हुआ भी हैं।
१. "अद्यतन", अनियतकालीन (सीवान) - अंक- ११/सितम्बर २००२. चार कविताएं प्रकाशित - मैं वो नहीं हूँ, क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए, अपनी जमीन तलाशती स्त्री, अपने घर की तलाश में ।
२. "अपेक्षा" (त्रैमासिक) अंक १२/जुलाई- सितम्बर २००२/पृष्ठ सं0- ५६. छ:कविताएं। ३. “प्रभात खबर” दीपावली विशेषांक २००५/पृष्ठ सं0- १३८ । दो कविताएं - बाहामुनी और अहसास होने से पहले।
४. “हंस” मई २००५/पृष्ठ सं0- ५० पर/तीन कविताएं मूलत: हिन्दी में छपी।
५. “इरावती” अंक- २/अक्टूबर- दिसम्बर २००५। पृष्ठ सं0- ४५ पर ५ कविताएं छपीं जिसमें दो संताली की है पर अनूदित होने का कोई जिक्र नहीं।
६. “अस्मिता” (पटना) अंक ०१/२००५ पृष्ठ सं0- ५९ पर
७. “हंस” संभवत: २००४ के मध्य के किसी अंक में निर्मला पुतुल की संताली कविताएं- `धर्म के ठेकेदारों की ठेकेदारी` और 'मेरा सब कुछ अप्रिय है`, हिन्दी की मूल रचना के रुप में छापी गई।
८. “समकालीन जनमत” पटना/सितम्बर २००३। आदिवासी विशेषांक पृष्ठ सं0- १०२ पर तीन कविताएं।
९. “कांची” रांची - जनवरी २००२ अंक में पृष्ठ सं0- ४३ पर दो कविताएं।
१०. “देशज अधिकार” फरवरी २००६/पिछले आवरण पृष्ठ पर प्रकाशित कविता "एक खुला पत्र अपने झारखंडी भाईयों के नाम।"
११. “युद्धरत आदमी” - अखिल भारतीय आदिवासी विशेषांक के पृष्ठ सं0-१३७ पर संताली हिन्दी कविताएं आमने-सामने, लेकिन अनुवादक का नाम नहीं।
१२. बिहार विधान परिषद से प्रकाशित पत्रिका "साक्ष्य" अंक-१०/सितम्बर २००० में पृष्ठ सं0-१९० पर तीन कविताएं।

उपर्युक्त के अतिरिक्त गद्य अनुवाद का भी यही हाल है ! जरा नज़र डालिये-
१. 'कांची` (रांची) अंक अक्टूबर २००३ कहानी विशेषांक। कहानी के मूलत: संताली होने का कोई संकेत नहीं। रुपान्तरकार का नाम नहीं।
२. 'युद्धरत आदमी`- आदिवासी स्वर और नई शताब्दी खंड-२ (पृष्ठ सं0-३३९) पर अंकित संताली आलेख जब पटना से निकलने वाली पत्रिका 'आधी दुनिया आधी जमीन` में प्रकाशित हुई तो वह मूल हिन्दी आलेख बन गया।


अनुदित रचनाओं से भाषान्तरण पर भी एक दृष्टि :

अनुवाद-चिंतन परंपरा के परिपक्व लेखक यदि मूल रचना से अनूदित सृजन को लेकर भाषान्तर का कार्य करते हैं तो यह अंकित करना नहीं भूलते हैं कि उनके इस पुनर्सृजन का आधार क्या है। निर्मला पुतुल की हिन्दी में अनूदित कविताओं के आधार पर अंग्रेजी, मराठी, उड़िया, उर्दु आदि भाषाओं में अनुवाद का उपक्रम जारी है। किन्तु, एकमात्र मराठी अनुवादक पृथ्वीराज तौर ने ही उल्लेख किया है कि 'यह रचना अमुक अनुवाद पर आधारित है।` मैं शेष भाषान्तरकारों से एक विनम्र सवाल पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने उनकी मूल रचना (जो संताली में है) से ही यह सुकार्य किया है अथवा अनुलेखन का आधार अशोक सिंह द्वारा अनूदित हिन्दी रचना ही रही है? क्या उनको संताली भाषा-संस्कृति का बोध है? यही नहीं, पुतुल की दोनों हिन्दी अनूदित संग्रह (“अपने घर की तलाश में” और “नगाड़े की तरह बजते शब्द”) पर काफी समीक्षाएं छपी हैं, दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में, पर किसी ने अनुवादक के कार्य को रेखांकित नहीं किया। कितनों ने तो नाम तक का जिक्र नहीं किया। यह सैकड़ों वर्ष पुरानी विरासत में मिली अनुवाद-साहित्य परंपरा के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसलिए अनुवाद-चिंतन एवं साहित्य के अस्तित्व पर अब एक केन्द्रीय बहस की आवश्यकता है। यदि भाषान्तरकारों को उनके कार्यफल के रुप में सिर्फ गुमनामी और उपेक्षाएं मिलती रही तो हिन्दी भाषा साहित्य के विशाल हृदय-प्रदेश में जहाँ अनेकानेक देशी-विदेशी भाषा साहित्यों के सृजन के फूल अनूदित होकर विकसित होते है, मुरझाने लगेंगे। अन्य भाषाओं की प्रतिभाएं हिन्दी लेखकों के साथ इतनी गड्ड-मड्ड हो जायेंगी कि हिन्दी के मूल लेखक की मौलिकता एवं पहचान भी एक हद तक प्रभावित हो जायेगी। प्रकाशकों का क्या कहना, उनकी तो सिर्फ चांदी कटनी चाहिए। किन्तु भाषान्तर की स्वस्थ परंपरा कायम रखने के लिए प्रकाशक को इस विषय पर ईमानदार होना पडेग़ा। यह तभी संभव है जब संपादन निष्पक्ष और सावधानीपूर्वक हो और समीक्षक विषयांकित विन्दु पर सचेत हों। उनके द्वारा मूल रचना के अनुलेखन कला शिल्प के गुण-दोष की विवेचना भी मूल रचना के साथ ही अवश्य की जाय ताकि अनुवादक भी समालोचना की परिधि में आ सकें। इस क्रियाशीलन को पुन: जागृत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है जो हमारी चिरकालीन परंपरा भी रही है किन्तु अब अवमाननाग्रस्त हो चली है।
एक संताली रचनाकार को हिन्दी भाषा साहित्य के मूल लेखक के रुप में जिस तरह से आगे खड़ा करने की जो प्रकिया अपनायी गई है उसकी आलोचना इस भय के कारण भी आवश्यक है कि इस परंपरा का कहीं सामान्यीकरण न होता चला जाय। मुझे हैरत होती है कि हिन्दी साहित्य के क्षेत्र का एक बहुचर्चित सम्मान "बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान" वर्ष २००४ के लिए निर्मला पुतुल का चयन किया गया है जो उनकी अनूदित कृति 'नगाड़े की तरह बजते शब्द` जिनके अनुवादक अशोक सिंह है, के लिए देने की घोषणा की गई है। यह भी कि, सम्मान समिति के निणार्यक मंडल में हिन्दी के एक वरिष्ठ समालोचक एवं एक वरिष्ठ कथाकार के अतिरिक्त तीन विज्ञ साहित्य-सेवी भी है किन्तु वे इस बात से अब तक बेखबर है कि पुतुल हिन्दी की नहीं, संताली मूल की कवयित्री हैं और उनकी मूल रचना संताली में ही है। (अगर संताली भाषा में उत्कृष्ट शब्दकर्म पर यह सम्मान देने का निर्णय आता तो बात और थी) क्योंकि सर्वविदित है कि यह सम्मान हिन्दी कवि और हिन्दी कथाकार को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए अब तक दिये जाने की परंपरा रही है। पूर्व के सम्मान संबंधी स्थापित प्रतिमानों को यहाँ खारिज करते हुए इस निर्णय ने जहाँ एक ओर हिन्दी-अनुवाद-साहित्य के लिए खतरे की घंटी बजा दी है, वहीं दूसरी ओर इतरभाषी रचनाकार हिन्दी रचनाकार के रुप में प्रतिस्थापित कर देने से हिन्दी के समानधर्मा कवियों को अपनी मौलिकता की पहचान एवं अस्तित्व पर एक बार नये सिरे से सोचने को मजबूर कर दिया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि मैं किसी एंगिल से पुतुल की कविताओं के मेरिट में जा रहा हूँ। उनका काव्यवस्तु और काव्यविवेक यहाँ आलोचना का विषय नहीं है। उनकी रचनाओं के पार्श्व में जो कुछ है उसे यहाँ रखने का प्रयोजन मात्र इतना ही है कि मूल रचनाकार के साथ-साथ अनुवादक की हित-चिंता से भी हिन्दी साहित्य का अविच्छिन्न सरोकार होना चाहिए।
प्रस्तुत लेख में एक अनुवादक और एक ही मूल लेखक के मुद्दे उठाये गये हैं। और दोनों समकालीन हैं, समस्थानिक भी। दुमका में जन्में, पले। वयस् में क्रमश: एक वर्ष आगे-पीछे। दोनों सहकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता भी। पिछले बारह वर्षो से दोनों एक साथ विविध जन-जातीय विषयों पर शोध कार्य भी करते रहे हैं।
निर्मला पुतुल की अनूदित कविताओं की भांति अनुवादक अशोक सिंह की अपनी कविताएं भी वागर्थ, वसुधा, कथादेश, काव्यम्, साहित्य अमृत, सृजन पथ, अक्षरा, साक्षात्कार, इंद्रप्रस्थ भारती, समकालीन भारतीय साहित्य जैसी चालीसों विशिष्ट हिन्दी पत्रिकाओं में छपती रही हैं। इसके अतिरिक्त संताली जीवन एवं संस्कृति पर उनका शोध विषयक आलेख भी 'संवेद` जैसी पत्रिका एवं हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर जैसे अखबारों के पन्नों पर दर्ज होते रहे हैं। फर्क़ सिर्फ यह है कि अशोक सिंह हिन्दी से हैं, निर्मला पुतुल संताली से। पुनश्च, हिन्दी में अपनी जमीन तलाशती पुतुल को भाषा पर पकड़ बनाने में अभी कुछ वक्त लगने की संभावना है क्योंकि 'नया ज्ञानोदय`, अंक अक्टूबर २००५ और 'समकालीन भारतीय साहित्य`, (अंक १२५/मई-जून २००६) में हाल में पुतुल की स्वयं के द्वारा अनुदित हिन्दी कविताएं `पहाड़ी यौवना` `देवदार` 'मां`, 'औरत`, इत्यादि में प्रारंभिक भाषाई कमजोरियां ही उजागर होती है। यहाँ एक अहम् सवाल है कि अगर उनकी हिन्दी सशक्त और पकी हुई होती तो उन्हें अनुवादक की वैशाखी की आवश्यकता क्यों पड़ती? पूर्व की अनुदित रचनाओं की तुलना में यहाँ भाषा की बुनावट में एक कृत्रिमता-सी आ गई है जिसमें भाषा का परायापन हावी है और आदिवासियत का अभाव भी एक अंश तक खटकता है। 'नया ज्ञानोदय' के युवा पीढी विशेषांक,मई ०७ में पुतुल की प्रकाशित कविताएं देखकर तो मन ग्लानि से भर उठता है।
उपर्युक्त सभी विचार-विथियों के समर्थन में मै यहां उद्धृत करना चाहता हूँ कि वर्ष १९८८ में पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश की हत्या के उपरांत उनकी कविताओं का हिन्दी रुपान्तर संकलन की प्रस्तावना तैयार करते हुए नामवर सिंह जी ने अनुवादक के प्रति अपने आभार के ये वाक्य लिखे थे जो अनुकरणीय एवं श्लाघ्य है- "पाश की कविता में यह ताकत है जो अनुवाद में भी इतना असर रखती है। ..... हमें तो चमनलाल का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने अनुवाद को संवारने-निखारने का धीरज छोड़कर जल्द से जल्द पाश की कविताओं के अधिकांश को हिन्दी में सुलभ करा दिया। आशा की जानी चाहिए कि इस दिशा में वे भी सक्रिय होंगे जो कवि हैं - पाश के समानधर्मां हिन्दी कवि।"
क्योंकि अनुवादक तो फिर भी आदमी है, अगर पेड़ की भी उपेक्षा की जाती है तो पेड़ भी दु:खी होता है –

"पेड़ों को दु:ख है कि
उस कवि ने भी कभी अपनी कविताओं में
उसका जिक्र नहीं किया
जो रोज उसकी छाया में बैठ
लिखता रहा देश-दुनियां पर कविताएं।"

(`पेड़` कविता से : रचना अशोक सिंह
`उन्न्यन`/अंक-२६/पृष्ठ सं-१९३)



संपर्क : हंसनिवास, कालीमंडा,
हरनाकुंडी रोड, पोस्ट- पुराना दुमका,
दुमका, झारखंड- ८१४ १०१
दूरभाष : 09431310216
ई मेल :sk.dumka@gmail.com



अगला अंक
वातायन- मार्च, 2008

हम और हमारा समय के अंतर्गत पंजाबी के समकालीन चर्चित कवि बलबीर माधोपुरी की कविताएं और जीवनी के अंतर्गत महान रूसी लेखक मिखाइल फ्योदोर दास्तोव्स्की की संक्षिप्त जीवनी।

7 टिप्‍पणियां:

बलराम अग्रवाल ने कहा…

Shushi ka aalekh mahatavpurn hai. Agar kisi bhasha ka lekhak aisa karta hai, to uski ninda karni chahiye. Anuvad agar parishramik lekar kiya gaya hai tab bhi anuvadak ke mahatav ko nakara nahi ja sakta. Aur uska naam anudit rachna ke saath jana chahiye.
-Balram Agarwal
www.jangatha.blogspot.com

बेनामी ने कहा…

भाई सुशील जी,
'वातायन' में आपका लेख पढ़ा । बेहद अच्छा और ज़रूरी लेख है । अनुवादकों की हिन्दी समाज द्वारा जो उपेक्षा की जा रही है, उसका विरोध तो होना ही चाहिए, हिन्दी समाज को यह भी समझना होगा कि बिना अनुवादकों के हिन्दी समाज वहीं रह जाएगा, जहाँ पर है । अनुवादक का महत्व मूल लेखक से ज़्यादा होता है । मैंने बहुत अच्छे लेखकों द्वारा किए गए घटिया अनुवाद भी पढ़े हैं और अशोक जी द्वारा किए गए निर्मला पुतुल की कविताओं के श्रेष्ठ और उत्तम अनुवाद भी । हर व्यक्ति अच्छे अनुवाद नहीं कर सकता है । अशोक जी को आप जानते हों तो कृपया उन तक मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ पहुँचा दीजिएगा । उन्हें बताइयेगा कि इतने अच्छे अनुवादों के लिए हम जैसे पाठक उनके आभारी हैं और वे इस काम को छोड़ें नहीं, बल्कि एक सामाजिक ज़िम्मेदारी के तहत करते रहें । आरम्भ में मैं भी यही समझता था कि निर्मला पुतुल हिन्दी में ही लिखती हैं । अभी छह-सात महीने पहले ही मुझे पता लगा कि वे तो संताली में लिखती हैं और यह सारी कारामात अशोक जी की है । मैं यह लेख अन्य कई मित्रों को भी भेज रहा हूँ । अगर आप स्वीकृति देंगे तो मैं इसे संजाल पर अन्य पत्रिकाओं तथा अन्य स्थलों पर भी पेश करूंगा ।
हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ
हिन्दी का एक सजग पाठक
अनिल जनविजय

बेनामी ने कहा…

रूपसिंह जी ,

वातायन देखा. अच्छा प्रयास है. लघुकथाएं अच्छी लगीं. निर्मला पुतुल - जिनकी कविताअओं की मैं प्रशंसिका हूं -- की कविताअओं के अनुवाद को लेकर अशोक सिंह को मिली उपेक्छा अनुचित है और इस संदर्भ में आपका आलेख अच्छा लगा. बधाई.

इला प्रसाद
यू एस ए

बेनामी ने कहा…

Priy Roop Ji,

Vatayan-Feb.2008 issue bahut achha hai... hindi ki laghukatha ke liye laghu kahani bhi upyukta shabd hai ... main aapke ank dekhta partha rahta hoon. Is tarah ke prayas Hindi Sahitya ko bahut samridh kar rahe hain.

Aapka

Harnot(Shimla)

बेनामी ने कहा…

Deaar Sir,

It is realy very nice to see Vaatayan. It will become a leading mag in hini.

Mahesh Darpan

सुभाष नीरव ने कहा…

भाई चन्देल। ब्लाग तुम्हारा प्रगति पर है। इस पर आईं टिप्पणियां बताती हैं कि लोग नोटिस ले रहे हैं। इसी तरह लगे रहो और सामग्री के चयन में विशेषता लाओ। एक दिन निश्चय ही हिंदी ब्लाग्स की दुनिया में "वातायन" का नाम होगा।

जितेन्द्र कुमार ने कहा…

सुशील कुमार जी का आलेख- "मूल रचना वनाम अनुवाद" पढा। काफ़ी अच्छा लगा। साहित्य में "मार्केटिंग" के प्रभाव पर जो उन्होंने सवाल उठाये हैं, वह विचारणीय है दूसरी बात यह कि अन्य भाषा के रचनाकार को हिन्दी भाषा साहित्य के मूल लेखक के रुप में प्रोजेक्ट करना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है। अगर हिन्दी सहित्य के वर्तमान महानुभावों से ऐसी गलती हुई है तो खेदजनक है। हम हिन्दी-साहित्य के पाठकगण श्री कुमार के प्रति आभारी हैं कि उन्होंने एक गहन विषय को उठाया है। इस पर राष्ट्रीय बहस होनी ही चाहिये।..... जितेन्द्र कुमार, jkdmk@rediffmail.com