गुरुवार, 2 जुलाई 2009

कविताएं



अंजना संधीर की पांच कविताएं

( अंजना जी की कविताओं में भाषा का सहज प्रवाह है और मौलिकता भी। अपने परिवेश और सोच, दोनों का सम्मिलित सुन्दर शब्द- चित्र हैं उनकी कविताएँ। उनमें धार है और वे सीधे चोट करती हैं। मुझे बेहद अच्छी लगती हैं. - इला प्रसाद (यू.एस.ए.)


(१) अमरीका हड्डियों में जम जाता है

वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत "हाइवे"
जिन पर चलती हैं कारें--
तेज रफ़्तार से,कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते,
टेलीफ़ोन करते, 'टू -डॊर' कारों में,रोमांस करते-करते,
अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है।

मूँगफ़ली और पिस्ते का एक भाव
पेट्रोल और शराब पानी के भाव,
इतना सस्ता लगता है सब्जियों से ज्यादा मांस
कि ईमान डोलने लगता है।
मँहगी घास खाने से तो अच्छा है सस्ता मांस ही खाना
और अमरीका धीरे-धीरे स्वाद में बसने लगता है।

गर्म पानी के शावर
टेलीविजन के चैनल, सेक्स के मुक्त दृश्य,
किशोरावस्था से 'वीकेन्ड' में गायब रहने की स्वतंत्रता
'डिस्को' की मस्ती, अपनी मनमानी का जीवन,
कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ
उठने- बैठने की आजादी......
धीरे-धीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमरीका।

अमरीका जब साँसों में बसने लगा
तो अच्छा लगा, क्योंकि साँसों को पंखों की
उड़ान का अंदाजा हुआ।
और जब स्वाद में बसने लगा अमरीका
तो सोचा खाओ, इतना सस्ता कहाँ मिलेगा ?
लेकिन अब जब हड्डियों में बसने लगा है अमरीका,
तो परेशान हूँ।

बच्चे हाथ से निकल गए,वतन छूट गया!
संस्कृति का मिश्रण हो गया ।
जवानी बुढ़ा गई,सुविधाएँ हड्डियों में समा गईं
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में समा जाता है!!

व्यक्ति वतन को भूल जाता है
और सोचता रहता है--
मैं अपने वतन को जाना चाहता हूँ।
मगर, इन सुखॊं की गुलामी तो मेरी हड्डियों में
बस गई है।
इसीलिए कहता हूँ कि
तुम नए हो,
अमरीका जब साँसों में बसने लगे,
तुम उड़ने लगो, तो सात समुंदर पार
अपनों के चेहरे याद रखना।
जब स्वाद में बसने लगे अमरीका,
तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद करना ।
सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना।
यहीं से जाग जाना.....
संस्कृति की मशाल जलाए रखना
अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना ।
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है!र

(2) तुम अपनी बेटियों को......
तुम अपनी बेटियों को
इन्सान भी नहीं समझते
क्यों बेच देते हो अमरीका के नाम पर?
खरीददार अपने मुल्क में क्या कम हैं कि.....
बीच में सात समुंदर पार डाल देते हो?
जहाँ से सिसकियाँ भी सुनाई न दे सकें
डबडबाई आँखॆं दिखाई न दे सकें
न जहाँ तुम मिलने जा सको
न कोई तुम्हें कुछ बता सके
कभी वापस आएँ भी तो
लाशॆं बने शरीर....जिन पर गहने और
मंहगे कपड़े पड़े हों.....!
तुम्हारी शान बढ़ाएँ और तुम्हारे पास भी
बिना रोये लौट जाएँ
उसी सोने के पिंजरे में
जहाँ अमरीका की कीमत
मजदूरी से भी चुकता नहीं होती !
(3) कैसे जलेंगे अलाव
ठंढे मौसम और
ठंढे खानों का यह देश
धीर-धीर मानसिक और शारीरिक रूप से भी
कर देता है ठण्ढा।
कुछ भी छूता नहीं है तब
कँपकँपाता नहीं है तन
धड़कता नहीं है मन
मर जाता है यहाँ , मान, सम्मान और स्वाभिमान।
बन जातीं हैं आदतें दुम हिलाने की
अपने ही बच्चों से डरने की
प्रार्थनाएँ करने की
छूट जाते हैं सारे रिश्तेदार
भूळ जाती है खुशबू अपनी मिट्टी की
बुलाता नहीं है तब वहाँ भी कोई।
आती नहीं है चिट्टी किसी की
जिनकी खातिर मार डाला अपने स्वाभिमान को।
उड़ जाते हैं वे बच्चे भी
पहले पढ़ाई की खातिर
फ़िर नौकरी, फ़िर ढूँढ़ लेते हैं साथी भी वहीं ।
बड़ी मुश्किलों से बनाए अपने घर में भी
लगने लगता है डर
अकेले रहते।
सरकारी नर्सें आती हैं, कामकाज कर जाती हैं।
फ़ोन कर लेते हैं कभी
आते नहीं हैं बच्चे ।
उनके अपने जीवन हैं
अपने माँ-बाप, भाई-बन्धु और देश तो
पहले ही छॊड़ आये थे वो
अब ये भी छूट गए
माया मिली न राम!
सोचते हैं
धोबी के कुत्ते बने, घर के न घाट के।
घंटों सोचते रह्ते हैं।
खिड़की से पड़ती बर्फ़ धीरे-धीरे
हड्डियों पर भी
पड़ने लगती है।
काम की वजह से मजबूरी में
खाया बासी खाना उम्र भर
रहे ठण्ढे मौसम में
अब सबकुछ ठंढा -ठंढा है
मन पर पड़ी ठंढक में
भला सोचिए, कैसे जलेंगे अलाव?
(4) सभ्य मानव
ईसा!
मैं मानव हूँ।
तुम्हें इस तरह सूली से नीचे नहीं देख सकता!

नहीं तो तुममें और मुझमें क्या अंतर?
बच्चों ने आज
कीलें निकाल कर तुम्हें मुक्त कर दिया
क्योंकि नादान हैं वे
तुम्हारा स्थान कहाँ है
वे नहीं जानते
वे तो हैरान हैं
तुम्हें इस तरह कीलों पर गड़ा देखकर
मौका पाते ही,
तुम्हारी मूर्ति क्रास से अलग कर दी उन्होंने
पर मैं...
मैं सभ्य मानव हूँ
दुनिया में प्रेम, ममत्व, वात्सल्य, उपदेश,
सूली पर टँगा ही उचित है
अत: आओ,
बच्चों की भूल मैं सुधार दूँ
तुम्हें फ़िर कीलों से गाड़ दूँ
क्रास पर लटका दूँ
ताकि, तुम ईसा ही बने रहो।
(5) ओवरकोट
काले-लम्बे
घेरदार ,सीधे
विभिन्न नमूनों के ओवर कोट की भीड़ में
मैं भी शामिल हो गई हूँ।
सुबह हो या शाम, दोपहर हो या रात
बर्फ़ीली हड्डियों में घुसती ठंढी हवाओं को
घुटने तक रोकते हैं ये ओवरकोट।
बसों में,सब वे स्टेशनों पर इधर-उधर दौड़ते
तेज कदमों से चलते ये कोट,
बर्फ़ीले वातावरण में अजब सी सुंदरता के

चित्र खींचते हैं।
चाँदी सी बर्फ़ की चादरें जब चारों ओर बिछती हैं
उन्हें चीर कर जब गुजरते हैं ये कोट
तब श्वेत-श्याम से मनोहारी दूश्य
ऐसे लगते हैं
मानों किसी गोरी ने
बर्फ़ीली चादरों को नजर से बचाने के लिए
ओवरकोट रूपी तिल लगा लिया हो!
*****

डाo अन्जना संधीर का जन्म १ सितम्बर, को रुड़की (उत्तर प्रदेश) में हुआ था.
बहुआयामी प्रतिभा की धनी अंजना जी मनोविज्ञान में पी . एच .डी हैं.
लेखन : हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती और उर्दू में समान अधिकार से लेखन। कई विधाओं - गजल,
कविता, संस्मरण, निबंध, अनुवाद, सम्पादन एवं हिन्दी शिक्षण पाठ्य-पुस्तक लेखन- में एक साथ सक्रिय।
प्रकाशित कृतियाँ - "बारिशों का मौसम", "धूप छाँव और आंगन", "मौजे-सहर", "तुम मेरे पापा जैसे नहीं हो" "अमरीका हड्डियों
में जम जाता है", " संगम" "अमरीका एक अनोखा देश", लर्न हिन्दी एंड हिन्दी फ़िल्म सांग्स","अहमदाबाद से अमरीका"। दूरदर्शन के लिए "स्त्री- शक्ति" सीरियल का निर्माण।
"यादों की परछाइयाँ" और "इजाफ़ा" का उर्दू
से हिन्दी में अनुवाद।
सम्पादन: " प्रवासी हस्ताक्षर", "सात समुन्दर पार से", ये कश्मीर है", प्रवासिनी के बोल " और "प्रवासी - आवाज"।
पुरस्कार: गुजरात उर्दू साहित्य- अकादमी पुरस्कार , गुजरात हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, "तुलसी
सम्मान"(लखनऊ), "अदिति साहित्य शिखर सम्मान"(गाजियाबाद), अखिल भारतीय कविसभा(दिल्ली) का "काव्यश्री" और "विक्रमशिला" का "साहित्यभूषण" पुरस्कार। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत। इसके अतिरिक्त अमेरिका की विभिन्न संस्थाओं द्वारा विदेश में हिन्दी-
सेवा के लिए कई बार पुरस्कृत।
व्यवसाय : पत्रकारिता से आरम्भ कर अमेरिका में कोलम्बिया विश्वविद्यालय , न्यूयार्क में कई वर्षॊं तक हिन्दी का अध्यापन। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयार्क में उल्लेखनीय भूमिका। "विश्व मंच पर
हिन्दी" का सम्पादन और प्रवासी-हिन्दी साहित्यकारों की पुस्तक-प्रदर्शनी का आयोजन।
संपर्क : एल-१०४, शिलालेख सोसाइटी, अहमदाबाद - ३८०००४
गुजरात, भारत
ईमेल; anjana_sandhir@
yahoo.com

9 टिप्‍पणियां:

सुभाष नीरव ने कहा…

इला जी ने अंजना संधीर जी की कविताओं के विषय में बिलकुल ठीक कहा है- इन कविताओं में भाषा का सहज प्रवाह है और मौलिकता भी। अपने परिवेश से बखूबी वाकिफ़ हैं वे और सोच के धरातल पर बेहद परिपक्व। 'अमरीका हड्डियों में जम जाता है', 'तुम अपनी बेटियों को...... ' और 'ओवरकोट' जैसी संवेदना से भरपूर कविताएं इस बात का प्रमाण हैं। 'वातायन' पर ऐसी परिपक्व कविताएं देने के लिए इला जी, अंजना जी और भाई रूप सिंह को बधाई !
'

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

अन्जना संधीर की कविताएँ पहले से पढ़ी हुई हैं. फिर भी आनन्द आया. इला ने इनके बारे में बहुत सही लिखा है. इनकी गज़लों की झलक मिल जाती तो और भी लुत्फ आता. बधाई!

Suman ने कहा…

nice

शशि पाधा ने कहा…

इला,
अन्जना जी की रचनाएँ एक साथ पढ़ने में बहुत आनन्द आया। मन के आकाश पर कई भाव उमड़े , गहराये । देश की माटी की सुगन्ध सांसों में हर पल समायी रहती है। धन्यवाद इला।

Devi Nangrani ने कहा…

Anjana Sandhir ki rachnayein marm ki shila se tarashi hui lagti hain. Unhein padne ka awsar to mila hai par abhi haal hi mein New York mein America Hadiyon mein ..suna to ek sadi ko jeene ka ahsaas mehsoos kiya. Un ki kalam ki bulandian aur bhi hain,,,aur bhi hain...

Ila Thanks for this opportunity to meet her on Roopsinh Chandel jis BloG

Devi Nangrani

बेनामी ने कहा…

Bhasha-sanskriti ka parcham yoonhi lahraaata rahe..............
hindi ke swar bulaa rahe hain saat samundar paar se.......
mangal kaamnaon ke saath,

Aditya Prakash.

बेनामी ने कहा…

अंजना संधीर एक समर्थ कवयित्री हैं । अपने वक़्त के साथ चलना उन्हें आता है । उनकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है। मेरी 20 साल पुरानी दोस्त हैं । ऐसे दोस्त पर मुझे गर्व है । ऐसी कविता लिखना उन्हीं के वश की बात है । इस सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाई ।


अमरीका जब साँसों में बसने लगे,
तुम उड़ने लगो, तो सात समुंदर पार
अपनों के चेहरे याद रखना।

जब स्वाद में बसने लगे अमरीका,
तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद करना ।

सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना।
यहीं से जाग जाना.....
संस्कृति की मशाल जलाए रखना
अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना ।
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है!

Devmani Pandey

rachana ने कहा…

ila ji aap ne ek bar kaha tha ki kavitayon se yadi aap apne ko jod saken to vo bahut achchhi lagti hai aap ne kitna sahi kaha tha ye anjna ji ki kavitayen padhne ke bad pata chalta hai ek ek line ek ek shabd mano me hi hoon kitna sahi chitran hai .har baat ka .aap ka dhnyavad kahun ya anjna ji ko itni sunder kavita likhne ke kiye badhai dun samajh nahi aaraha hai .pr sach maniye kavitayen padh ke dhnya hogai
saader
rachana

ashok andrey ने कहा…

anjana sandhir jee ki bahut sundar v sashakt kavitaen padvane ke liye meri aur se badhai saveekaren

ashok andrey