गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

वातायन - अप्रैल,२००९




हम और हमारा समय

निकटस्थ लोक सभा चुनाव ने सभी अवसरवादी राजनीतिक दलों को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ आ खड़े होने के लिए विवश कर दिया है. इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति में कोई किसी का दुश्मन नहीं होता. कल तक जो एक दूसरे की ओर देखने से बचते थे, आज उन्हें हंसकर गले मिलते देखा जा सकता है. सभी को सत्ता से सरोकार है. उन्हें कुर्सी चाहिए . कुर्सी के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं. इसे हमारे देश के समृद्ध लोकतंत्र की विशिष्टता ही कहना होगा कि टिकट न मिलने पर लोग अपनी एक नई पार्टी बना लेते हैं और अवसर मिलते ही किसी भी पार्टी में शामिल हो लेते हैं या अपनी ही पार्टी में पुनः वापस लौट लेते हैं. इस देश में कितनी राजनीतिक पार्टियां हैं यह बता पाने में चुनाव आयोग को भी कुछ समय लग सकता है. दरअसल देश में व्याप्त अशिक्षा इन राजनीतिज्ञों को मनमानी करने की पूरी छूट देती है. वे चाहते भी यही हैं --- जनता अशिक्षित बनी रहे. वैसे भी शिक्षित लोगों में वोट के प्रति उत्साह कम होता गया है. जनता के अशिक्षित रहने से वे जवाबदेही से बचे रह सकते हैं.

हमारे लोकतंत्र की एक खूबी यह भी है कि राजनीति में बने रहने की कॊई आयु सीमा निर्धारित नहीं है. शायद अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी नहीं है, लेकिन वहां के राजनीतिज्ञ अपनी क्षमता को पहचान लेते हैं और स्वयं ही राजनीति से सन्यास ले लेते हैं. यहां चल सकने में असमर्थ -- ह्वीलचेयर पर चलने के लिए अभिशप्त बीमार नेता भी राजनीति से सन्यास लेने के लिए तैयार नहीं होता. बल्कि वह प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने के स्वप्न तक देखता रहता है. राजनीति का पतन यहां तक हो चुका है कि सदैव अवसरवादी राजनीति करनी वाली पार्टियां उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रही हैं जिनकी राजनीतिक बुनियाद जातिवाद और अपराधवाद पर टिकी हुई है.

लेकिन सब कुछ अंधकारमय ही नहीं है. उभरते कुछ युवा नेताओं में देश के उज्वल भविष्य की एक क्षीण रेखा दिखाई दे रही है . इन युवाओं की आंखों में देश को लेकर कुछ स्वप्न हैं , जिन्हें कभी नेहरू-गांधी ने देखे थे. उनमें कुछ कर गुजरने का एक ईमानदार जज्बा दिखाई दे रहा है. आज देश को ऎसे ही युवाओं की आवश्यकता है--- उन बूढ़ों की नहीं जो स्विस बैंकों में काला धन जमा करके अपनी भावी पीढि़यों का भविष्य सुरक्षित करते रहे और आगे भी करना चाहते हैं. जो देश के लिए नहीं केवल अपने लिए जीते रहे और चाटुकारों को लाभान्वित करते रहे.

आज स्विस बैंकों में जमा धन को वापस लाने की चर्चा जोर पकड़ती जा रही है. इन बैंकों में राजनीतिज्ञों , ब्यूरोक्रेट्स और सितारों का अकूत धन जमा है. राजनीतिज्ञ और ब्यूरोक्रेट्स मिलकर आजादी के बाद से ही इस देश को लूटते रहे हैं. आज भी लूट रहे हैं और किसी भी समझदार व्यक्ति को यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि इन लोगों का स्विस बैंकों में जमा पैसा वापस आयेगा. कहते हैं यह धन इतना है कि यदि वापस आ जाये तो भारत विदेशी कर्ज से मुक्त हो सकता है.

वातायन के अप्रैल, २००९ अंक में प्रस्तुत है मेरे द्वारा अनूदित और ’संवाद प्रकाशन’ से ही प्रकाश्य पुस्तक ’लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार’ से एक संस्मरण अंश और वरिष्ठ कथाकार और कवि सुभाष नीरव द्वारा अनूदित पंजाबी के युवा कथाकार तलविन्दर की कहानी ’फासला’.

’फासला’ की भी अपनी एक कहानी है. इस कहानी को वरिष्ठतम कथाकार और ’हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने हंस के लिए स्वीकृत किया था. लगभग डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद सुभाष ने जब कहानी के प्रकाशन के विषय में पूछा तब राजेन्द्र जी ने जल्दी ही प्रकाशित होने का अश्वासन दिया. लेकिन कहानी प्रकाशित नहीं हुई. सुभाष ने जब भी राजेन्द्र जी को फोन किया वे अश्वासन देते रहे. इसी बीच कहानीकार संजीव हंस से जुड़े. उन्होंने राजेन्द्र जी द्वारा स्वीकृत कहानियों पर अपने निर्णय लिए और राजेन्द्र जी और अपने चहेते कहानीकारों की कहानियों को छोड़कर शेष को दरकिनार कर दिया. ’फासला’ के साथ भी यही हुआ. अब राजेन्द्र जी ने सुभाष नीरव को संजीव जी से बात करने की सलाह दी और संजीव जी क्यों नीरव से बात करते ! क्योंकि तब वह कहानीकार मात्र नहीं थे, हंस के कार्यकारी सम्पादक भी थे. व्यस्तता के अतिरिक्त और भी जो बात उनके आड़े आयी हो उन्होंने सुश्री वीना उनियाल से कहलवा दिया कि ’फासला’ उन्हें पसंद नहीं .

मुझे आपकी बेबाक टिप्पणी की प्रतीक्षा रहेगी.

4 टिप्‍पणियां:

J.L. Gupta 'Chaitanya' ने कहा…

Respected Dr Saa'b
I must endorse your views about current change in politicians decline to low for grabbing chair. Please continue raising such issues through your blog. Congrates.
J.L.GUPTA

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

आप ने जिन मुद्दों पर आवाज़ उठाई है हम कई बार यहाँ उन पर विचार विमर्श करतें हैं--प्रकृति से भी हम नहीं सीखते वह भी पुराने पत्तों को झाड़ कर नए पत्तों को स्थान देती है और स्वागत करती है. लेकिन भारत के नेता शायद यह सब समझना चाहते नहीं. काश! भारत की बागडोर युवा वर्ग के हाथ में आ सके .......

अखिलेश शुक्ल ने कहा…

आदरणीय श्री चंदेल जी
साउर अभिवादन
आज आपके ब्लाग पर आया हूं। रचनाएं पढ़कर बहुत अच्छा लगा। आपसे यह पहला परिचय है। सादरपुर के निवासी श्री महेश दर्पण जी, श्री रामकुमार कृषक जी,जोशी जी आदि से मेरा परिचय है। अब आपसे भी हो गया है। यह सुखद है। मेरा अपना ब्लाग साहिथ्तयक पत्रिकाओं की समीक्षा के लिए है। वैसे में एक त्रैमासिक पत्रिका कथा चक्र का संपादक हूं। जिसे शायद आपने कभी देख भी होगा।
अखिलेश शुक्ल
संपादक कथा चक्र
http://katha-chakra.blogspot.com

परमजीत बाली ने कहा…

आप की रचनाएं पढ़ी।अच्छी लगी।बहुत सुन्दर व बढिया विचार प्रेषित किए हैं।बहुत -सी नयी जानकारीयां मिली आभार।