शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

कहानी



कोंचई गुरु....

कृष्ण बिहारी

कांचई गुरु को कौन नहीं जानता...
कोंचई गुरु को सब जानते हैं . कोंचई गुरु अद्भुत हैं . लाजवाब हैं . अनूठे हैं . कोंचई गुरु इलेक्ट्रानिक युग की उत्पत्ति और उपलब्धि हैं . मजे की बात , कोंचई गुरु अकेले और किसी एक जगह नहीं हैं . वह एक जाति हैं . नहीं ; जाति नहीं ; एक जाति की प्रजाति हैं और दुनिया की सभी विकसित जगहों पर मौजूद हैं . कोंचई गुरु यकीनन एक करिश्मा हैं और हैरत में डालने वाले हैं ....
कोंचई गुरु का असली नाम “शरत् है और अवस्था अभी यही कोई चार वर्ष और कुछ दिन . उनके जन्म की तारीख मझे याद नहीं मगर यह पता चला था कि चार-पांच दिन पहले उनका चैथा जन्म-दिन मैक डोनाल्ड में बड़ी धूम-धाम से मनाया गया . पैसे उनके बाप ने खर्च किए मगर कैसे खर्च होंगे और क्या -क्या होगा , यह सब कोंचई गुरु ने स्वयं तय किया था ...
कोंचई गुरु से मेरी पहली मुलाकात उनके जन्म के कुछ घण्टे बाद अस्पताल में हुई थी . वह अपनी मां के बिस्तर के पास ही एक अलग खटोले में लिटाए गए थे . कमरा एयरकण्डीशण्ड था इसलिए उन्हें कम्बल में लपेट-सा दिया गया था . मैंने उनके चेहरे पर झुलते हुए जब कहा , ‘‘का हो गुरु ... कइसी लग रही है ई दुनिया ....?’’ तो उन्होंने आंखें खोलकर झपकानी शुरू कर दी थीं. छोटी-छोटी उन चकित आंखों में सीधे देखते हुए मैंने अगला वाक्य कहा था , ‘‘गुरु ! तुम तो पूरे कोंचई हो ....कोंचई गुरु ....’’ और उसी वक्त से यही नाम उनकी पहचान बन गया . क्या मां-बाप और क्या दादा-दादी ; सबके लिए कोंचई गुरु . ऐसे गुरु कि कुछ बाद में उन्होंने मेरा ही नामकरण कर दिया कोंचई....
’’’’ तीसरे दिन कोंचई गुरु अस्पताल से घर आ गए . माता-पिता की पहली संतान कोंचई गुरु मेरे सहकर्मी के पुत्र हैं . कुछ ऐसा संयोग बना कि उनके घर के पास ही मेरे छोटे बेटे को सप्ताह में तीन दिन विज्ञान विषय की ट्यूशन पढ़ने जाना पड़ा . उसे पढ़ने के लिए पहुंचाने के बाद तब तक क्या करता जब तक वह पढ़कर वापस आता . वह समय मेरा कोंचई के साथ बीतने लगा . बेटे की ट्यूशन तो पूरे दो साल चली लेकिन कोंचई गुरु तो दो साल के होते ने होते मेरे दीवाने हो गए . उनकी आशिकी मुझे महंगी पड़ने लगी . होता यह कि मुझे देखते ही उनकी दुनिया बदल जाती . और जैसा कि मोहब्बत में होता है कि आशिक की हर चीज अच्छी लगती है वैसा ही कोंचई गुरु के साथ हुआ . उन्हें मैं तो अच्छा लगता ही था , मेरा घर , मेरी कार , मेरे बच्चे , यहां तक कि मेरी बीवी भी अच्छी लगने लगी . गजब के डिप्लोमेट कोंचई गुरु कहते , ‘‘ममी , अच्छी वाली आण्टी के घर चलो न ...’’ अपने मां-बाप के साथ आते और “शुरू हो जाते , ‘‘कित्ती अच्छी साड़ी है न ...ममी, आण्टी की साड़ी देखो...और हार .... और चूडि़यां ...खूब सारा सोना पहना है आण्टी ने ....’’

‘‘मैंने भी तो अच्छी साड़ी पहनी है और सोना भी तो ....’’
‘‘पूर्णिमा... तुम कुछ समझती नहीं .... तुम्हारी भी साड़ी अच्छी है मगर आण्टी....आण्टी आप बहुत सुन्दर हैं ...’’ कोंचई गुरु का मन , चाहे तो मां को ममी कहें और चाहें तो नाम से बुलाएं . आण्टी की तारीफ के बाद उनकी फरमाई , ‘‘चाय पिलाइए आण्टी ....’’
‘‘चाय नहीं , दूध....बच्चे दूध पीते हें ....’’
‘‘मैं बच्चा नहीं हूं ...चाय ...’’ और कोंचई गुरु जिदिया जाते हैं . चाय पीने के बाद कहते हें , ‘‘ लांग ड्राइव पर चलो न कोंचई अंकल ...मैं अपकी कार में बैठूंगा .... आपकी कार बहुत अच्छी है ... मुझे बहुत पसंद है ....’’
‘‘कार तो तुम्हारी भी अच्छी है ....’’
‘‘हां , अच्छी तो है मगर .... आपकी कार ...बहुत अच्छी है ....’’
कोंचई गुरु मेरी कार में बैठते हैं . लम्बी ड्राइव से लौटते रात हो गई है . ग्यारह से ऊपर का समय हो गया है . लेकिन उनका मन मुझसे अलग होने का नहीं है , ‘‘आपका घर कित्ता सुन्दर है .... पापा , कोंचई अंकल के फ्लैट की तरह लो न अपना भी फ्लैट....’’
‘‘अब घर चलो ...’’
‘‘नईं ....’’ कोंचई गुरु रोने लगते हैं . अब यह अक्सर होने लगा है . यदि मैं उनके घर से वापस आने लगूं तो या वह मेरे घर से वापस ले जाए जाने लगें तो , उनका नियम हो गया है , मचलते हुए जोर-जोर से रोना . उनके रोने से तकलीफ हाती है . मुझे ही कुछ कठोर होना पड़गा . बच्चे से इतना लगाव ठीक नहीं . कोंचई गुरु तीन वर्ष के हैं....
और , मुझसे अलग होते हुए जार-जार रो रहे हैं ....,,‘‘”शरत्....’’ उनके पापा-मम्मी की सम्मिलित कड़ी आवाज . एक पल के लिए सहमते हैं वह लेकिन फिर वही रोना .
‘‘छोड़ दो, आने दो मेरे पास ...’’ पापा-मम्मी की पकड़ से छूटते ही मेरी ओर . हालांकि उन्हें पकड़े ही कौन था ? एक पुकार चाहिए थी . मिलते ही मेरी बांहों में .
‘‘कोंचई गुरु , कहां आए थे ?’’
‘‘आपके घर ....’’
‘‘फिर आओगे ...?’’
‘‘हां....’’
‘‘ तो रोना बन्द करो ... आज से मेरे लिए रोओग तो मैं तुमसे कभी नहीं मिलूंगा ....’’
‘‘नहीं रोऊंगा ....’’ कोंचई गुरु रोते हुए कानों को हाथ लगाकर ‘प्रामिस’ कर रहे हैं ....
चुप हो गए हैं . अपनी कार की पिछली सीट पर बैठकर बॉय-बॉय कर रहे हैं . कार चल पड़ी है ....
मेरे मना करने के बाद से फिर कभी मुझसे अलग होते हुए कभी नहीं रोए....
न जाने कितनी बार मिल चुके हैं ...
कोंचई गुरु का एडमिशन के.जी. I में करा दिया गया हैं . स्कूल बैग , लंच-बॉक्स और वॉटर बॉटल के साथ स्कूल जाना उन्हें अच्छा लगने लगा है . स्कूल में फेंसी ड्रेस काम्पिटिशन है . वह अपनी टीचर के सामने हैं , ‘‘टीचर , मैं माइकेल जैक्सन बनूंगा ....’’
‘‘कैसे ....?’’
‘‘हैट लगाऊंगा ...यहां तक जूते पहनूंगा और डांस करूंगा ....’’ घुटने से कुछ नीचे हाथ ले जाकर उन्होंने वहां तक लम्बे जूते पहनने की बात समझाई है ...
‘‘डांस करना आता है तुम्हें ...?’’
‘‘कसेट तो लगाइए ...’’
‘‘वह तो अभी नहीं है ....’’
‘‘तो फिर आप गाइए.... लिफ्ट करा दे....’’

टीचर गाने लगी हैं . बच्चों की उत्सुक आंखें देख रहीं हैं और कोंचई गुरु नाच रहे हैं अदनान सामी के गीत ‘थोड़ी-सी तो लिफ्ट करा दे’....
काम्पिटिशन के दिन उन्होंने अपने पापा से कहा , ‘‘चिन्ता मत करो ... मैं डांस कर लूंगा ....अच्छा करूंगा...आप वीडियो अच्छा बनाना....’’
कोंचई गुरु ने माइकेल जैक्सन को मात कर दिया . उन्हें फर्स्ट प्लेस मिली . पापा ने वीडियोग्राफी की और स्कूल फाटोग्रॉफर ने अनेक फोटो लिए...
स्कूल स्पोर्ट में अपने एज-ग्रुप में उन्हें हॉपिंग रेस के लिए चुना गया . घर में धमा-चैकड़ी “शुरू , ‘पापा , चिन्ता मत करो ... मैं दौड़ लूंगा ....’’
कोंचई गुरु दौड़े और खूब दौडे . दूसरे स्थान पर आए . सिलवर मेडेल मिला . पापा से बोले , ‘‘चिन्ता मत करो ... अगली बार गोल्ड मिलेगा ....’’
डन्होंने मुझे फोन किया है , ‘‘कोंचई अंकल , मेरे घर आइए....’’
‘‘बात क्या है ?’’
‘‘आइए तो ...अच्छी चाय पिलाएंगे ...’’
‘‘बाद में आऊंगा ...आज तबीयत ठीक नहीं है ...’’
‘‘क्या हुआ आपको ...?’’
‘‘कफ और कोल्ड....’’
‘‘कोंचई अंकल , थोड़ी-सी ले लीजिए..’’
‘‘क्या ?’’
‘‘ब्राण्डी, व्हिस्की या फिर रम ....चीयर्स कर लीजिए ...ठीक हो जाएंगें ....’’
‘‘वाह गुरु कोंचई .... तुम तो पूरे डॉक्टर हो गए हो....’’
‘‘पापा लेते हैं न वीक-एण्ड को ... मैं भी चीयर्स करता हूं....’’
‘‘तुम क्या पीते हो पापा के साथ ...?’’‘‘खून...खून पीता हूं.... आप पीएंगे खून....आपका खून भी बढ़ जाएगा ... कित्ते दुबले और कमजोर हैं आप ....’’
पता चला कि रूह आफजाह के साथ चीयर्स करते हैं . पापा ने कहा है कि खून पीने से खून
बढ़ता है . “शरीर में ताकत आती है ....
कोंचई गुरु अब के.जी. II में हैं . स्कूल जा रहे हैं पापा की कार में ....
‘‘पापा , तेज चलाओं न ...’’
‘‘क्यों ? चल तो रही है तेज ...’’
‘‘और तेज....’’
‘‘नहीं , इतनी स्पीड ठीक है ....’’
‘‘जल्दी चलो न ....नहीं तो कोई और बैठ जाएगा उसके पास ....’’
‘‘किसके पास ....?’’
‘‘नन्दिता के साथ ....मेरे क्लास में पढ़ती है ...सब उसके पीछे हैं लेकिन वह मेरी गर्ल फ्रेण्ड है ....’’
कोंचई के पापा अवाक् हुए फिर मुस्कराकर उसे देखा . मिलने पर मुझे बताया और कहा , ‘‘यह तो हाल अभी है ...आगे क्या होगा ?’’

‘‘कुछ नहीं होगा ...जिस तरह सभी चीजें उनको अभी मिल रहीं हैं वैसे ही कोंचइन भी मिल गई.... इसमें आश्चर्य क्या है ....’’
‘‘ऐसे ही चलता रहा तो “शादी से पहले तीन-चार तलाक तो हो ही जाएंगे....’’
हम दोनों हंस पड़ते हैं ....
एक “शाम अपने पापा के साथ कोंचई गुरु मेरी कार में थे . सिग्नल पर कार रुकी . मैडस्ट्रियन क्रासिंग से बहुत छोटी स्कर्ट पहने एक युवती गुजरी , ‘‘देखो , श्रीमती कलावती जा रही हैं ....’’ मैंने उनके पापा से कहा . तबसे किसी स्त्री को स्कर्ट पहने देखकर पापा और मम्मी को दिखाते हैं , ‘‘वो दोखे श्रीमती कलावती ....’’
कम्प्यूटर पर चैट करते हैं . दोस्तों को फोन करते हैं . कार्टून और वीडियो गेम्स में उलझे रहते हैं . बच्चे नहीं पुरखे हैं .
जरा- सा दृष्टि उठाएं . आपके आस-पास कोई कोंचई गुरु जरूर होंगे . पिछले दिनों छुट्टियों में भारत गया था . वहां जिस किसी के भी घर गया वहां मुझे कोंचई गुरु हंसते-खेलते मिले ....
अपनी दुनिया में मस्त....
यह दुनिया ही कोंचई गुरुओं की है ...
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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद के ग्राम कुंडाभरथ में 29 अगस्त 1954 को जन्म.
कानपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में एम.ए.


सन् 1971 में पहली कहानी प्रका”शत , तब से अब तक लगभग सौ कहानियां देश की प्रायः सभी प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित .

‘मेरे गीत तुम्हारे हैं,’ ‘मेरे मुक्तक मेरे गीत’ , ‘मेरी लम्बी कविताएं’.

‘रेखा उर्फ नौलखिया’ , ‘पथराई आंखों वाला यात्री’ , ‘पारदर्शियां’ उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य .

‘दो औरतें’ , ‘पूरी हकीकत पूरा फसाना’ , ‘नातूर’ और ‘एक सिरे से दूसरे सिरे तक’ कहानी-संग्रह’ प्रकाशित.

आत्मकथा - ‘सागर के इस पार से , उस पार से’ .

आठ एकांकी नाटकों का लेखन और बिरेन्दर कौर और सुभाष भार्गव के साथ निर्देशन .
चर्चित कृतियों की समीक्षाएं , अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद , लेख , संस्मरण , रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित .

खाड़ी के देशों में पढ़ने वाले भारतीय छात्र-छात्राओं के लिए प्रवेशिका से आठवीं कक्षा तक की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प-माला’ का लेखन . सहयोगी - डॉ. मोती प्रकाश एवं श्रीमती कांता भाटिया .
बहुचर्चित कहानी ‘दो औरतें’ का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा , नई दिल्ली द्वारा श्री देवेन्द्र राज ‘अंकुर’ के निर्देशन में मंचन .

अखबार से जीवन-यापन की शुरूआत , अध्यापन , आल इण्डिया रेडियो गैंगटोक से फिर अखबार में काम .
संप्रति अध्यापन
संपर्क - PO Box - 46492
Abu Dhabi
UAE

7 टिप्‍पणियां:

बलराम अग्रवाल ने कहा…

अच्छी कहानी है। समाज में जिस तेजी के साथ भौतिकवाद फैला है, उसी तेजी के साथ बचपन भी बदला है। कोंचई गुरु भारत में भी हैं, बेशक; लेकिन भारत में ही कोंचई गुरुओं की दुनिया से नितान्त अनभिज्ञ बच्चे भी हैं। ऐसे बच्चे, जो तीन क्या तीस बरस के होकर भी ये सब कौतुक नहीं कर सकते। एक कहानी उन पर भी वांछित है बड़े भाईसाहब।

ashok ने कहा…

a good discription of modern generation, they are every where.our generation has to learn to survive.This is what called
'child is the father of man.' Congratulations for such a wonderful discription
A K Srivastava

बेनामी ने कहा…

chandel bhayee,
abhi abhi aapka mail .
bahut bahut aabhari hoon.
aapne is kahani ko chuna. aapki soochna ke liye bata doon ki is kahani ka follow-up lambi kahani ke roop mein likha ja chuka hai.is roop mein yah jagran mein chhapi thee.agla praroop- koi majhab,koi kanoon nahin
hai.
krishnabihari

ushma ने कहा…

धन्य हैं कोंचेई गुरु ...और उनके कोंचेई अंकल !
पूत के पांव पालने में ...ऐसे बच्चे जिन्हें ,
पर्याप्त मात्रा में देखभाल मिलती है ,वे बच्चे ,
आगे चलकर तेजस्वी बनते हैं ,इसमे कोई
शक नहीं .........सर्वांग सुंदर कहानी !!!

सुभाष नीरव ने कहा…

कृष्ण बिहारी जी की कइ कहानियाँ 'हंस' में पढ़ी हैं, उनका कहानी कहने का अंदाज मुझे भाता रहा है। परन्तु इस कहानी में कुछ अधिक ही फैंटेसी हो गई है।

PRAN SHARMA ने कहा…

KRISHNA BIHARI JEE KEE KAEE
KAHANIYAN MAINE PADHEE HAIN.
VE SMARTH KAHANIKAR HAIN.
ANYA KAHANIYON KEE TARAH UNKEE
YE KAHANI BHEE MUJHE ACHCHHEE
LAGEE HAI.

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

कृष्ण बिहारी जी की कहानियाँ एक अरसे से पढ़ रही हूँ ..यह अलग रूप में महसूस हुई.