शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

वातायन - अक्टूबर २००९



हम और हमारा समय

फलते नेता - मरता किसान

रूपसिंह चंदेल

पिछले दिनों निजी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के वेतनमानों को लेकर सरकार की चिन्ता उभरकर सामने आई. कंपनी मामलों के मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने उनके भारी-भरकम वेतनमानों पर चिन्ता प्रकट की . सरकारी हलकों में बहुत दिनों से इस विषय पर मरमराहट थी और इसीलिए खुर्शीद साहब की टिप्पणी को सरकार का दृष्टिकोण माना गया . योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने अपनी राय प्रकट करते हुए मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के लिए सरकारी सुझावों की बात कही . मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के वेतनमानों का इस परिप्रेक्ष्य में गहराई से विश्लेषण किया जा सकता है कि जिन मंत्रियों के कंधों पर देश का बोझ है उन्हें एक सांसद के बराबर वार्षिक वेतन मिलता है जो किसी क्लर्क से अधिक नहीं है . अन्य सुविधाओं को यदि जोड़ा जाए तब यह ग्यारह लाख प्रति माह के लगभग बैठता है. लेकिन इतनी बड़ी जिम्मेदारी ढोनेवाले मंत्री जी का वेतन और सुविधा किसी छोटी कंपनी के मुख्यकार्यकारी अधिकारी से अधिक नहीं बैठता . कहां देश की जिम्मेदारी से हलाकान मंत्री और कहां एक या कुछ कंपनियों का मुख्य कार्यकारी अधिकारी . उसके सामने मंत्री जी का वेतन और सुविधाएं चुटकीभर . इस असुन्तुलन पर सरकार का चिन्तित होना लाजिमी है . उदाहरण के लिए देश के कुछ मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के वेतन की चर्चा आवश्यक है . मुकेश अंबानी ने 2008-09 में बावन करोड़ रुपए के लगभग वेतन और भत्ता प्राप्त किया जबकि 2007-08 में यह राशि 44.02 करोड़ थी . इसी दौरान उनके अनुज अनिल अंबानी को 30.02 करोड़ और भारती एयरटेल के सुनील मित्तल को 22.89 करोड़ मिले थे.

सरकार की चिन्ता मुझ जैसे साहित्यकार को भी चिन्तित करती है और सोचने के लिए विवश करती है कि इतने कम वेतन और सुविधा में एक मंत्री या सांसद अपना गुजर बसर कैसे करता होगा . इस समाचार ने मुझे बहुत छकाया . मैंने कुछ जानकारियां उपलब्ध कीं . अर्थ विशेषज्ञ नहीं हूं इसलिए कुछ चूक भी संभव है .

उपलब्ध जानिकारियों से ज्ञात हुआ कि मंत्री जी का वेतन भले ही ऊंट के मुह में जीरा हो लेकिन उन्हें प्राप्त अन्य सुविधाएं ( जो कि आवश्यक भी हैं ) भारी से भारी वेतन पाने वाले मुख्य कार्यकारी अधिकारी से कई गुना अधिक हैं . केंन्द्र के मंत्री जिन बंगलों में रहते हैं उनके किराए का बाजार मूल्य साठ-सत्तर लाख रुपए प्रति माह है . इसके अतिरिक्त निजी स्टॉफ , सेक्योरिटी , गाडि़यां , पेट्रोल , मुफ्त हवाई यात्राएं आदि.....इत्यादि--- यह सब उन्हें बिना किसी जवाबदेही के उपलब्ध होता है . देश की आर्थिक स्थिति ध्वस्त हो रही है , बाढ़ , सूखा , आतंक ... अर्थात् कहीं कुछ भी होता रहे , न उनकी सुविधाएं कम होती हैं और न उनकी कुर्सी डगमगाती है . उनका पद पांच वर्ष के लिए सुरक्षित रहता है . लेकिन एक कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ ऐसा नहीं होता . वह न केवल कंपनी के शेयर होल्डर्स के प्रति , बल्कि अपने कर्मचारियों और बाजार के प्रति भी जवाबदेह होता है . हमने देखा कि आर्थिक मंदी के कारण दिवालिया हुई कितनी ही कंपनियों -बैंकों के मुख्य-कार्यकारी अधिकारियों को अपने पद से हाथ धोना पड़ा . लेकिन जिस जनता के वोटों से जीतकर एक सांसद मंत्री बनता है , उसके प्रति वह कितनी जिम्मेदारी अनुभव करता है ? उसे उसकी सुध पांच वर्ष बाद ही आती है और तब तक उसके क्षेत्र के कितने ही किसान - मजदूर अपनी परेशानियों के चलते आत्म-हत्याएं कर चुके होते हैं . उसके क्षेत्र का किसान भुखमरी की कगार पर पहुंच रहा होता है ---सरकारी कुनीतियों के कारण दस बीघे खेतों का स्वामी पांच वर्षों में खेत गंवा मजदूर बन चुका होता है जबकि मंत्री जी का बैंक बैंलेंस कई गुना बढ़ चुका होता है . मंत्री ही क्यों सांसदों और विधायकों का भी .

पिछले दिनों एक अन्य समाचार ने भी चैंकाया . समाचार पांच वर्षों में हरियाणा के विधायकों के खातों में पांच करोड़ रुपए जुड़ने का था . कहां से आया यह धन ? और यह वह राशि है जो पत्रकारों की जानकारी में आई . अज्ञात कितनी होगी ? और हरियाणा ही क्यों --- कौन -सा प्रदेश इससे अछूता है ? लूटने के ढंग अलग हो सकत हैं --- लेकिन लुट जनता ही रही होती है .

उत्तर प्रदेश अब ‘बुत प्रदेश’ बनने जा रहा है . जनता की गाढ़ी कमाई के छब्बीस सौ करोड़ रुपए--- और बुत भी उनके नहीं जिनकी कुर्बानियों की बदौलत हम आज स्वतंत्र देश में सांस ले रहे हैं . देश की आजादी के लिए नाना साहब , अजीमुल्ला खां , अजीजन , शमसुद्दीन , तात्यां टोपे , अहमदुल्लाशाह , बेगम हजरत महल , वाजिदअलीशाह , लक्ष्मी बाई आदि ने आजादी के लिए 1857 में प्रथम भारतीय क्रांति की अलख जगाई थी , लेकिन कितनों के बुत लगाए गए ? कानपुर के पास बिठूर में नाना साहब के महल की मात्र एक बची ध्वस्त दीवार ढहने के लिए तैयार है , उसका संरक्षण तक नहीं . जनरल हैवलॉक ने बर्बरता का परिचय देते हुए नाना के महल को जमींदोज करवाकर वहां हल चलवा दिया था . वहां नाना , तांत्या और अजीमुल्ला के स्मारक नहीं बनने चाहिए ? कानपुर में ही गणेश शंकर विद्यार्थी , हलधर बाजपेई आदि की कितनी बुतें लगाई उत्तर प्रदेश सरकार ने ? चन्द्रशेखर आजाद , रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाकउल्ला खां , राजेन्द्र लाहिड़ी --- कितने ही क्रान्तिकारी हैं -- कितनों के स्मारक हैं ? इसे राजनैतिक कृतघ्नता ही कहना होगा --- .

सरकार को निजी कंपनियों के मुख्यकार्यकारी अधिकारियों के वेतनमानों और भत्तों की चिन्ता करने की अपेक्षा राजनैतिक भ्रष्टाचार और कदाचार की चिन्ता करने की आवश्यकता है .
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वातायन के प्रस्तुत अंक में युवा कवि योगेन्द्र कृष्ण की कविताएं और वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बिहारी की कहानी .
आशा है अंक आपको पसंद आएगा .

8 टिप्‍पणियां:

बलराम अग्रवाल ने कहा…

पूँजीपति होना उतना घातक शायद नहीं है जितना कि पूँजीवादी मानसिकता का होना। इस मानसिकता के व्यक्ति को मैं ऐसे जानवर के रूप में देखता हूँ जो लगातार अपनी पूँछ को निगल रहा हो और इस खुशफहमी में जी रहा हो कि उसके पड़ोसी की पूँछ उसके जबड़ों में है और बहुत जल्द उसे वह पूरा का पूरा निगल जाएगा। भले ही यह कारनामा हमारी और आपकी जिन्दगी में न हो, लेकिन हमारे बच्चे देखेंगे कि कि ये सारे के सारे जानवर खुद को पूरा निगल चुके होंगे।

सहज साहित्य ने कहा…

आपकी चिन्ता सबको चिन्तित करती है; परन्तु जनता के खून -पसीने की कमाई से अचानक करोड़पति बननेवाले नेताओं को नहीं ।

बेनामी ने कहा…

आ० चंदेल जी,
वातायन का अक्टूबर अंक पढ़ा | निजी कंपनियों के शिखर अधिकारिओं के वेतन को ले कर
राजनैतिक हलकों में जो हाय तोबा मची उसके सम्बन्ध में सांसदों व मंत्रिओं की वास्तविक
आय की तुलना में मुकेश अम्बानी और और बड़ी कंपनियों के सी० ई० ओ० की आय तो नगण्य
लगती है | राजनीतिबाजों ने जब कंपनियों के अधिकारिओं के वेतन सम्बन्धी चर्चा को उछाला ही
है तो क्या देश के स्वतंत्र अर्थ-शास्त्रिओं और वित्तीय लेखकों की जमात सोयी हुई है जो जनता के
धन के सरकारी दुरूपयोग पर लेखनी नहीं उठाते | समाचार-पत्रों में निजी कंपनी अधिकारिओं के
वेतन की तुलना, जिस पर वे तीस प्रतिशत आय-कर भरते हैं, सांसद और मंत्री की वास्तविक आय
जिसका भुगतान इन करों के पैसों से हो रहा है और जो मूल वेतन पर नाम-मात्र कर दे कर
सुविधाओं के रूप में लाखों रूपया प्रतिमास डकार रहे हैं उनकी इस लूट पर देश का प्रबुद्ध लेखक-वर्ग
चुप क्यों है ? क्या देश के सारे समाचार-पत्र संपादक और अर्थ-शास्त्री बिक गये हैं ? राजनैतिक हलकों
में सांसद और मंत्री वर्ग ने अपनी लूट बढाने के उद्देश्य से ही इस बेचारगी को उछाला है, इस कूट-नीति
को पहचानने वाले क्या कहीं कोई नहीं बचे ? वास्तविक आंकड़े प्रकाशित कर मीडिया इस सत्य को उजागर
करने से क्यों डर रही है ? काश! इन प्रश्नों का उत्तर मुझे कहीं मिल पाता ?
वातायन की कवितायें और अन्य सामग्री बहुत रुचिकर, सारगर्भित, और पठनीय लगीं |
कमल

सुभाष नीरव ने कहा…

भाई चन्देल, तुम्हारी चिन्ता जायज है। ऐसा नहीं है कि जैसा तुम सोचते हो और लोग भी नहीं सोचते होंगे। पर यह कटु सच्चाई है कि तुम्हारी तरह कुछ ही लोग अपनी चिन्ता को लिखकर शेयर करते हैं। उत्तर प्रदेश के 'बुत प्रदेश' की बात तुमने अच्छी कही। सर्वोच्च न्यायालय ही इस पर कुछ कर सकता है। वह कर भी रहा है। पर हमारे राजनीतिज्ञ अपने वोट की खातिर क्या कुछ न अपने स्वार्थ में कर/करवा लें। तुम्हारी ये चिन्ताएं एक लेखक की ही नहीं, तुम्हारे अन्दर के भारतीय नागरिक की भी हैं।

PRAN SHARMA ने कहा…

ROOP JEE,
AAPKEE CHINTAA SABKEE CHINTA
HAI.DESH KO DESH KE NETAA HEE
LOOT RAHE HAIN.SACHIV HO YAA NETA
HO UNKO DEE HUEE SARKAREE GAADIYAN
UNKE RISHTEDARON AUR MEHMAANON KE
SAIR-SPAATON KE LIYE ISTEMAAL KEE
JAATEE HAIN.U.K MEIN BHEE YAHEE
HAAL HAIN.MP LOGON KEE MONEY KO
USE KAR RAHE HAIN APNON PAR.YAHAN
KE LAGBHAG 300 MP KO PUBLIC MONEY
LAUTAANE KE LIYE KAHAA GAYA HAI.
DHAANDHLEE HAR DESH MEIN HAI.
KURSIYON PAR BAITHE HUE " BADE LOG"
APNEE MUTHIYAN GARM KARNE MEIN LAGE
HUE HAIN.JANTA SOYEE HUEE HAI.KYA
KIYA JAAYE? KISEE CHOOHE KO HALDEE
KAA TUKDA MILTA HAI ,VO BHEE APNE-
AAPKO PANSAAREE SAMAJHNE LAGTA HAI.
BHRASHTACHAAR KE MAGARMACHH KEE
LAPET MEIN HAR KOEE HAI.ZAROORAT
HAI MAGARMACHH KO NIGALNE KEE.

Pradeep ने कहा…

आदरणीय चंदेलजी
आपकी और हमारी चिंताएं लगभग एक ही हैं. लेकिन इन चिंताओं पर किसी बड़े हस्‍तक्षेप की आवश्‍यकता भी है, जिसे लेकर कोई बड़ा आंदोलन इन दिनों कहीं दिखाई नहीं दे रहा है. खैर आपने लेख में बहुत ही खरी-खरी कही है.
बधाई एवं दीप पर्व की शुभकामनाओं सहित
- प्रदीप जिलवाने, खरगोन म.प्र.

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

रूप जी आप की चिंताएँ औरों की भी चिंताएँ हैं, पर आप का गुण है कि आप सिर्फ चिंता नहीं करते, कलम उठा लेखक का धर्म निभाते हैं --कई बार हम लोग सिर्फ सोचते ही रहते हैं. यही सोच कर चुप रह जाते हैं कि कुछ बदलने वाला तो है नहीं. बुलंद लिखने की बधाई.

सुरेश यादव ने कहा…

महत्वपूर्ण सवाल उठाने के लिए आप को धन्यवाद