रविवार, 7 मार्च 2010

कविता




सुनो यह विलाप


-आलोक श्रीवास्तव


अवध की एक शाम पुकारती है
लोगो सुनो
लहू में डूबी, वह शाम फैलती जाती है चारो ओर


बिछा दो तुम जाजम
रौशनियां
तुम्हारी कोई होली, कोई दीवाली, कोई ईद
उस मातम को छिपा नहीं पाएगी
जो इस मुल्क के बाशिंदों पर डेढ़ सौ साल से तारी है


पूरा अवध खून में डूबा आज भी पुकारता है
ढही मेहराबों और ऊंचे बुर्जों के पीछे से एक कराह उठती है
गोमती का सूखा पानी
किसी ग़ज़ल में आज भी रोता है


इस लुटे पिटे शहर की वीरानी
क्या रोती है तुम्हारी रात में?
तुम अपने ही शहर के आंसू नहीं देख पाते!


जनरल नील का कत्लेआम
इलाहाबाद की दरख्त घिरी राहों से चलता
देखो दंडकारण्य तक जा पहुंचा है


पद्मा से सोन तक
मेरी प्रिया का वह लहराता आंचल था मेरे ख्वाब में झलकता
खून के धब्बे गाढ़े होते जाते हैं आज उस पर


और हत्यारों को तोपों की सलामी जारी है
तिरंगे की साक्षी में


सुनो अवध का विलाप
फैलता जा रहा है समूचे मुल्क में


मौत की, मातम की
गुलामी की रात तुम्हारे सिरहाने खड़ी है...
****
(01 मार्च, 2010)
OOOO


जन्म : 15 अगस्त, 1968 .

उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों-कस्बों में बचपन गुजरा। पिछले 20 वर्षों के मुंबई में, पहले सात साल ‘धर्मयुग’ में बतौर उप-सम्पादक काम किया। फिलहाल आजीविका के लिए पत्रकारिता।



प्रकाशन

कविता संग्रह :
वेरा उन सपनों की कथा कहो ! (1996)
जब भी बसंत के फूल खिलेंगे (2004)
यह धरती हमारा ही स्वप्न है !(2006)
दिखना तुम सांझ तारे को (2010)
दुख का देश और बुद्ध (2010)

अन्य :
अख़बारनामा : पत्रकारिता का साम्राज्यवादी चेहरा(2004)
शहीद भगत सिंह : क्रांति के प्रयोग (2004)
(कुलदीप नैयर द्वारा लिखित भगत सिंह की जीवनी का अनुवाद)
विश्व ग्रंथमाला का संपादन।

संपर्क : ए-4, ईडन रोज़, वृंदावन कॉम्पलेक्स, एवरशाइन सिटी, वसई रोड, पूर्व, ठाणे-401 208(मुंबई)
फोन : 0250-2462469, 09320016684
ई-मेल :
samvad.in@gmail.com

4 टिप्‍पणियां:

Kamlesh Kumar Diwan ने कहा…

Alok ji .suno yah vilap kavita padhi,behtar savad citra kavita ki takat hai ,itihaas ke ve drisha kaishe beebhst rahe hoge ,man kaap uthta hai .
shubhkamnayen

सुभाष नीरव ने कहा…

उफ़्फ़ ! क्या कविता है ! पढ़कर दंग रह गया हूं ! आलोक जी की कई कविताएं पहले पढ़ चुका हूँ, पर ऐसा रंग और तेवर अभी तक नहीं देख पाया था। "गोमती का सूखा पानी, किसी ग़ज़ल में आज भी रोता है…" बहुत ही मारक और अन्दर तक हिला देने वाली पंक्तियों से सजी इस कविता को भुला पाना कठिन है।

ashok andrey ने कहा…

Alok jee ki kavita padee, hame jhakjhor deti hai tatha kae sawaalo ke gheron men bhee khada kar deti hai-
iss lute pite shahar ki veeranee
kayaa roti hai tumhaari raat men?
tum apne hee shahar ke aansoon naheen dekh paate !
bahut sundar, badhai.

ashok andrey ने कहा…

Alok jee ki kavita padee, hame jhakjhor deti hai tatha kae sawaalo ke gheron men bhee khada kar deti hai-
iss lute pite shahar ki veeranee
kayaa roti hai tumhaari raat men?
tum apne hee shahar ke aansoon naheen dekh paate !
bahut sundar, badhai.