मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

वातायन -फरवरी,२०११

(चित्र : अवधेश मिश्र)

हम और हमारा समय

हिन्दी साहित्य बनाम प्रवासी हिन्दी साहित्य

रूपसिंह चन्देल

पिछले कुछ वर्षों से विदेशों में बैठे हिन्दी रचनाकारों के लिए ’प्रवासी हिन्दी साहित्यकार’ और उनके साहित्य के लिए ‘प्रवासी हिन्दी साहित्य’ का प्रयोग कुछ अधिक देखने-सुनने में आ रहा है. यह स्पष्ट नहीं है कि इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले कब और कहां हुआ और किसने किया. यह शोध का विषय है और यह भी शोध का विषय है कि इस अवधारणा के पीछे उद्देश्य क्या था ! यह विभेद किसी सोची-समझी योजना के तहत किया गया (जैसाकि ‘स्त्री विमर्श’ के संदर्भ में कहा जाता है) या यह अनायास ही प्रचलन में आ गया और कुछ लोग स्वयं को चर्चित करने के उद्देश्य से इसे ले उड़े. स्पष्ट है ऎसा करने वाले लोग प्रवासी ही होंगे. लेकिन बड़ी संभावना यह है कि ऎसा ‘आप्रवासी’ लेखकों के लेखन को कम महत्वपूर्ण मानने के उद्देश्य से किया षडयंत्र लगता है. कुछ लोगों को दरकिनार करने के ऎसे षडयंत्र होते रहे हैं , होते रहते हैं और शायद होते रहेंगे.

भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त शायद ही किसी अन्य भाषा के रचनाकारों को, जो अपने देश से बाहर रहकर साहित्य सृजन कर रहे होते हैं, ‘प्रवासी’ रचनाकार और उनके साहित्य को ’प्रवासी साहित्य’ कहा जाता हो. ऎसा कोई उदाहरण मेरी दृष्टि में नहीं है. जापानी, रशियन, अंग्रेजी आदि भाषाओं के रचनाकार किसी भी देश में रहकर लिख रहे होते हैं लेकिन उन्हें उनके देश में कभी प्रवासी साहित्यकार नहीं माना जाता. रोजगार, व्यवसाय या किसी अन्य कारण से रचनाकार प्रवासी हो सकता है लेकिन उसके साहित्य को ’प्रवासी’ कहा जाना उसका और उस भाषा का अपमान करना है.

आज दूर देशों में बैठे हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकार उत्कृष्ट साहित्य लिख रहे हैं. लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह भी है कि अपने लिखे साहित्य के लिए ’प्रवासी साहित्य’ कहे जाने का विरोध करने वाले साहित्यकार आखिर किन विवशताओं के चलते ‘प्रवासी हिन्दी लेखक सम्मेलन’ का विरोध करना तो दूर उसका हिस्सा बन जाते हैं. यही नहीं कई लोगों ने स्वयं ’प्रवासी हिन्दी कहानी’ और ’प्रवासी हिन्दी कविता’ जैसी पुस्तकों का सम्पादन भी किया है और भविष्य में नहीं करेंगे, कहना कठिन है. यह बात भी विचारणीय है और इस विषय में प्रवासी हिन्दी रचनाकारों को ही विचार करना है.

इस विषय पर केन्द्रित वरिष्ठ गज़लकार, कवि एवं कहानीकार प्राण शर्मा की निम्न कविता केवल उनकी ही बात नहीं कहती बल्कि उन सभी प्रवासी रचनाकारों की बात कहती है जो इस शब्द के विरोधी हैं.

कविता
प्राण शर्मा

साहित्य के उपासको , ए सच्चे साधको

कविता - कथा को तुमने प्रवासी बना दिया
मुझको लगा कि ज्यों इन्हें दासी बना दिया
ये लफ्ज़ किसी और अदब में कहीं नहीं
इसका नहीं है आसमां , इसकी ज़मीं नहीं
मुझको हमेशा कह लो प्रवासी भले ही तुम
कविता को या कथा को प्रवासी नहीं कहो
साहित्य के उपासको, ए सच्चे साधको

कविता हो या कथा हो मनों की उमंग है
इंसानियत का सच्चा , खरा रूप - रंग है
इनको प्रवासी शब्द में बांधो कभी नहीं
इनकी विराटता में कहीं भी कमी नहीं
मुझको हमेशा कह लो प्रवासी भले ही तुम
कविता को कथा को प्रवासी नहीं कहो
साहित्य के उपासको, ए सच्चे साधको

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वातायन के पाठकों को यह सूचना देना आवश्यक समझता हूं कि वरिष्ठ कथाकार-कवि सुभाष नीरव के चार ब्लॉग – साहित्य सृजन, सेतु साहित्य, वाटिका और गवाक्ष अब पाठक नहीं देख सकेगें. पिछले दिनों उन्हें किसी ने हटा दिया है. यह अपराधपूर्ण कार्य किसने किया इसके तथ्यों की तह तक जाने के प्रयास जारी हैं और जैसे ही यह स्पष्ट होगा उसे आप सभी तक अवश्य पहुंचाया जाएगा. लेकिन इससे एक बात स्पष्ट होती है कि हिन्दी साहित्य में कुछ ऎसे लोग हैं जिनकी मानसिकता किसी अच्छे कार्य को तहस-नहस करने की रहती है. वे स्वयं अच्छा नहीं कर पाते और जो अच्छा कर रहे होते हैं, उनकी गतिविधियों में बाधा उत्पन्न करते रहते हैं. अच्छा न करके भी वे अपने को ’अहं सर्वोपरि’ समझने की गलतफहमी का शिकार रहते हैं. ब्लॉग की दुनिया से जुड़े अन्य बन्धुओं के लिए सुभाष नीरव के साथ घटी दु-र्घटना एक उदाहरण है और सभी को ऎसे लोगों से सतर्क रहने की आवश्यकता है.

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वातायन के इस अंक में प्रस्तुत है सुभाष नीरव की कतिवाएं, वरिष्ठ कथाकार रामेश्वर कंबोज ’हिमांशु’ की लघुकथाएं, वरिष्ठ कथाकार बद्री सिंह भाटिया की कहानी और ’दिशा बोध’ के दो प्रवासी कहानी विशेषांको (अतिथि सम्पादक – इला प्रसाद) और ’समीक्षा’ (सम्पादक –सत्यकाम और प्रबन्ध सम्पादक – महेश भारद्वाज) की समीक्षाएं.

आपकी प्रतिकिया की प्रतीक्षा रहेगी.

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34 टिप्‍पणियां:

Pran Sharma ने कहा…

Aapne badee imaandaree se videshon
mein likhe jaa rahe hindi sahitya
ke liye prayukt shabd " prawasee"
kaa khandan kiya hai .Main Hindi ke
sabhee sampaadkon v sheersh
sahityakaaron se appeal karta hoon
ki ve " prawasee " shabd ko istemal
karne kaa moh tyage . Delhi Yaa
Mumbaee ke sthaayee yaa asthaayee
prawas kaal mein likha gya upnyaas
" prawasee Hindi upnyaas nahin ban
jaataa hai .

सुभाष नीरव ने कहा…

भाई चन्देल, मैं तुम्हारी बात से पूर्णत: सहमत हूँ। प्रवासी शब्द पंजाबी साहित्य के साथ भी लगता रहा है। परन्तु, अब चूंकि प्रवासी पंजाबी लेखक कवि स्वयं इस शब्द को अपने रचे साहित्य के साथ लगाना सही नहीं समझते, इसलिए धीरे धीर वहां इस शब्द का प्रचलन खत्म होता जा रहा है। प्राण शर्मा जी का मेल मेरे पास भी आया था, उन्हें जवाब न दे सका। पर यहाँ मैं तुम्हारी बात से सहमति व्यक्त करके उनकी बात को भी पूरी तरह सही ठहरा रहा हूँ।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

ये लफ़्ज़ किसी और अदब में कहीं नहीं
इसका नहीं है आसमां इसकी ज़मीं नहीं
श्रद्धेय प्राण साहब की ये रचना...और खास तौर पर ये दो पंक्तियां सब कुछ कह रही हैं...साहित्य तो पूरी दुनिया की धरोहर है...
चंदेल साहब, ये सुभाष नीरव जी के ब्लॉग्स को कैसे हटा दिया? कुछ विस्तार से जानकारी मिल जाए, तो सावधानी बरतने में आसानी होगी.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

आपका भेजा लिंक देखा - मेरे पूज्य पापा जी की बहुचर्चित पुस्तक का शीर्षक था ,
' प्रवासी के गीत ' जिसका यह प्रणय गीत ' आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगें '
सभी काव्य प्रेमियों को बड़ा प्रिय रहा है ...उस समय पापा अ प्रवास उनके जन्म स्थल
ग्राम जहांगीरपुर , खुर्जा से इलाहाबाद और बंबई तक हुआ ..और वे ' प्रवासी ' कहलाये ..उन्हीं को श्रध्धांजलि देते हुए मेरी पहली काव्य पुस्तक को मैंने ' फिर गा उठा प्रवासी ' नाम दिया ...मेरा प्रवास मेरे जन्म स्थान बंबई से उत्तर अमरीका तक का रहा है ...भाई श्री चंदेल जी ने सामयिक प्रश्न उठाया है और आपकी शिकायत भी सही है ...हिन्दी भाषा लिखनेवाले हम सभी ' रचनाकार ' हैं सृजनधर्मी तो सृजन ही करते हैं उनमे ये दुभांत और बंटवारे की दीवारें क्यों हों ?
स स्नेह, सादर ,
- लावण्या

निर्मला कपिला ने कहा…

कल्पनायें तो असीम होती हैं। आसमा से भी दूर और जमीं से भी गहरी । बेशक ये अपनी हो कर भी प्रवासियों की तरह हमेशा बाहर इधर उधर ही घूमती रहती हैं उन्हें कुछ भी कहो लेकिन प्रवासी कहना उनको उन भार्तीयों का दिल दुखाता है जो इन्हें अपने देश को ले कर अन्तस मे छुपाये फिरते हैं वो खुद प्रवासी हैं लेकिन उनके शब्द और उनकी भावनायें तो अपने देश मे रहती हैं। और जब उनकी भावनाओं को भी प्रवासी कहा जाये तो जरूर उनके दिल को चोट ओपहुँचती है यही बात इस कविता मे है। प्राण भाई साहिब का दर्द बखूबी इस रचना मे दिखा। सुन्दर रचना के लिये उन्हें बधाई। ये जान कर बहुत दुख हुआ कि नीरव जी के ब्लाग हैक कर लिये गये हैं तब हम जैसे अनजान लोगों की क्या विसात है। चिन्तनीय विषय है। धन्यवाद।

बलराम अग्रवाल ने कहा…

आपके संपादकीय को पढ़ते हुए मैं सोच ही रहा था कि टिप्पणी में मैं अपने आदरणीय मित्र प्राण शर्मा की पूरी कविता डालकर इसकी सामयिकता सिद्ध कर अपनी पीठ थपथपा लूँगा, लेकिन आपने वैसा मौका दिया नहीं, प्राण जी की कविता पहले ही हथिया ली। यह कविता एक वाजिब पीड़ा है। कुछेक विभाजन कार्य के क्षेत्र की विशिष्टता के मद्देनजर तो कुछ, मुझे लगता है कि नारेबाजी के लिए भी किए ही जाते हैं।
सुभाष के ब्लॉग्स का सिरे से ही गायब कर दिया जाना हिन्दी के स्तरीय ब्लॉग लेखन की अपूरणीय क्षति है। सु्भाष को हिंदी के साहित्यिक ब्लॉग्स के आधार प्रस्तोताओं में गिना जाता है। इस दृष्टि से यह काम हिंदी ब्लॉग लेखन के इतिहास के एक भरे-पूरे चैप्टर पर पानी फेर देने की साजिश से कम नहीं है जिसकी सामूहिक भर्त्स्ना की जानी जरूरी है।
पहली बार पता चला कि लावण्या जी की जड़ें बुलन्दशहर(जहाँगीरपुर इसी जनपद का हिस्सा था)में हैं। पढ़कर गर्व का अनुभव हुआ। लगा--हम कुछ नहीं, बहुत-कुछ हैं।
बाकी रचनाओं पर टिप्पणी बाद में।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

चंदेल जी ने सही विषय उठाया है ...प्रवासी तो इन्सान किसी भी वजह स हो सकता है ... परन्तु साहित्य समाज और देश के साथ जुड़ा रहता है ... कहीं भी रहने वाला लेखक जो हिंदी या किसी भी भाषा में साहित्य लिखता है .. उसकी सोच, मानसिक स्थिति उसका लेखन परिवेश ... अपना समाज, अपना देश और अपने समाज जी मानसिक परिस्थिति ही होती है ... अतः मेरा भी ये स्पष्ट मानना है की उसे भारतीय साहित्य ही माना जाए न की प्रवासी या अप्रवासी ....
आदरणीय प्राण जी ने अपनी कलम के माध्यम से इस पीड़ा को बहुत प्रभावी तरीके से रखा है ... सच कहा है की कविता या साहित्य प्रवासी नहीं हो सकता ..

cmpershad ने कहा…

जब तक हिंदी में लिखा जा रहा है उसे हिंदी साहित्य ही कहेंगे। शायद हमारे देश में हर चीज़ को खण्डों में देखने की आदत पड गई है [राजनेताओं की सोहबत में] तभी तो, स्त्री साहित्य, दलित साहित्य.... की भी चर्चा होती है। इस रोग का शायद लुकमान के पास भी कोई इलाज नहीं है :)

नीरज गोस्वामी ने कहा…

शब्द, भाव प्रवासी कैसे हो सकते हैं...??? ये तो सबके लिए हैं...साहित्य को चार दीवारों में बाँध कर नहीं रखा जा सकता...खुशबू कभी बंधी है किसी से...ऐसा हुआ है कभी के आपके आँगन में लगी रात की रानी पडौसी को न महकाए...??? आदरणीय प्राण साहब ने सीधे सरल शब्दों में बहुत जोरदार तरीके से ये बात कही है...अपनी भावनाओं का बहुत ख़ूबसूरती से इज़हार किया है...मुझको हमेशा कह लो प्रवासी भले ही तुम...कविता को कथा को प्रवासी नहीं कहो..." इन पंक्तियों में उनके मन की पीड़ा स्पष्ट झलकती है...

नीरज

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

bhasha kabhi bhi pravaasi nahi ho sakti hai . bhaasha ki apni pahchaan hai , apni baangi hai .. pran ji ki rachna bahut sundar hai aur aapka lekh bhi ..

meri shubhkaamnaye.

अनुराग ने कहा…

यह वि‍चारणीय प्रश्‍न है। इस पर व्‍यापक चर्चा होनी चाहि‍ए। प्रवासी-अप्रवासी के खांचे में साहि‍त्‍य को बांटना घोर अपराध है।
प्राण शर्मा जी ने इस दर्द को सुंदर अभि‍व्‍यक्‍ि‍त दी है- मुझकों हमेशा कह लो प्रवासी भले ही तुम
कवि‍ता को या कथा प्रवासी न कहो।

Devi Nangrani ने कहा…

"कविता को या कथा को प्रवासी नहीं कहो"
yahi param satya hai. Anuj neeraj ka kahna ki "shabd" kaise pravasi ho sakte hai.bilkul sahi hai. Maan hamari janmadatini hamesha maa hi kahlayi jayegi. kya desh se door pardes mein jaane se rishton ke naam ya arth badal jayehe. agar nahin to pravasi shabd kis sandarbh mein upyog mein laya ja raha hai. Bhasha ka vikas sirf desh mein hi nahin yahan uSA mein bhi ho raha hai ise nakara nahin ja sakta. Bhasha ka vikas hamara vikas hai. Pravasi Apravasi ke is sandarbh mein Roopsinh Chandelji ne likh kar ise limelight mein laya hai aur saath mein Shri Pran Sharma ji ki rachna mein ek dard ki peeda ka ahsaas hota hai..Sooraj ki roshini ki tarah hamari bhasha Hindi par har ek Hindustani ka haQ hai yeh virasat usse koi nahin cheen sakta.
bahut bahut aabhaar is lekh ko yahan pesh karne ke liye..

Abnish Singh Chauhan ने कहा…

प्राण शर्मा जी की यह कविता सोचने को विवश करती है. बधाई स्वीकारें - अवनीश सिंह चौहान

अनुराग ने कहा…

यह महत्‍वपूर्ण मुद्दा है। इस पर व्‍यपाक वि‍मर्श होना चाहि‍ए।
प्रवासी साहि‍त्‍य कह कर खींची जाने वाली वि‍भाजक रेखा के दर्द को प्राण शर्मा जी ने अपनी कवि‍ता में मार्मिक ढंग से उकेरा है।

बेनामी ने कहा…

रूप सिंह चंदेल जी का लेख और प्राण शर्मा जी आपकी कविता पढ़ी। अच्छी लगी। इस विषय में विचार किया। मेरे मत में विदेशों में लिखी जाने वाली हिन्दी कविता को प्रवासी कविता कहना सर्वथा अनुपयुक्त है। व्याक्ति प्रवास करता है, कविता नहीं। कविता तो हृदय की भाषा है, मन से निकलती है और अपनी भाषा में निकलती है, जब अंग्रेज़ी में कविता विदेशों में लिखी जाती है तो जब वह प्रवासी नहीं होती तो हिन्दी की क्यों? मुझे पता नहीं कि अन्य भारतीय भाषाएँ भी कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग करती हैं।
मुझे तो लगता है कि हम भारतीय भी नए-नए शब्दों की खोज करते रहते हैं और व्यक्ति के साथ-साथ कविता को भी प्रवासी बना देते हैं। प्रवासियों के मन में कुछ अलग भाव अवश्य उभरते है और कविता की सोच अनुभवों के आधार पर ज्यादा बड़ी हो सकती है, भाषा या छंद कभी अच्छे साहित्यकारों की कसौटी पर खरे न भी उतरें, पर सच तो ये है कि प्रवासी कवि जब भारत जाकर कविता पढ़ते हैं तो उन्हें भारतीय हिन्दी साहित्यकार अतिथि जैसा आदर और सम्मान देते हैं, इस बात पर गर्व करते हैं कि विदेश की व्यस्तताओं के बीच भी हमारी संस्कृति और साहित्य को जीवित रखने का प्रयास किया जा रहा है, तो प्रवासी कविता कहने के पीछे 'निगेटिवीटी' तो नहीं है परन्तु सुनकर ऐसा लगता है कि हमें अलग-थलग 'डिस्क्रिमिनेट' कर दिया गया है। मैं तो यही कहूंगी कि यह शब्द न ही उपयोग करें तो अच्छा है ।

रेखा राजवंशी
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

बेनामी ने कहा…

गज़ब कर रहे हो गुरु.

महेश दर्पण

बेनामी ने कहा…

रूप सिंह चंदेल जी

नमस्कार।

इस विषय पर शायद पहली बहस मैनें शुरू की थी। दिल्ली दूरदर्शन पर करीब तीस मिनट इसी विषय पर बोला। बहुत से तर्क दिये। अमरीका, ब्रिटेन और भारत के विविध मंचों पर अपनी बात रखने का असफल प्रयास किया। मगर 7 तारीख़ को वरिष्ठ कहानीकार महीप सिंह जी ने बहुत ही प्यार से एक बात कही - उनका कहना था, देखो भाई तेजेन्द्र अब यह प्रवासी शब्द स्थापित हो चुका है। यह उन लोगों द्वारा रचे गये साहित्य की ओर इंगित करता है जो विदेश में रह कर साहित्य रचते हैं। अंग्रेज़ी में भी Diasporic Literature जैसी विधाओं की चर्चा रहती है।

जिस तरह मुंबई की हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के लाख आपत्ति उठाने के बावजूद उसे बॉलिवुड कहा जाता है और उसी की तर्ज़ पर कलकत्ता सिनेमा को कॉलिवुड और पाकिस्तानी सिनेमा को लॉलिवुड कहा जाता है, उसका कोई इलाज नहीं है।

उर्दू भाषा का एक शब्द है खुलासा। जिसका अर्थ होता है संक्षेप में। मगर हिन्दी में उस शब्द का अनर्थ हो कर बन गया है विस्तार से। मुझे महीप सिंह जी की बात में दम दिखा। अब हमें प्रवासी कहा जाता है। हमारे साहित्य को प्रवासी साहित्य कहा जाता है। प्रवासी दिवस मनाया जाता है। अब इससे छुटकारा पाना संभव नहीं दिखता।

वैसे 7 तारीख़ को साहित्य अकादमी के सभागार में आपकी प्रतीक्षा रही।

आज यमुना नगर जा रहा हूं। 13 को लौटूंगा।

सादर

तेजेन्द्र

Tejinder Sharma
General Secretary (Katha UK)
London, UK

बेनामी ने कहा…

Dear Roopchandelji,

I read your feature- Hindi Sahitya banam pravasi Hindi Sahitya in Vatayan. I am fully agreed with you - Sahitya ki khemebazi dunia ki kisi aur bhasha main najar nahi aati. Sahitya ko uski sampurna samagrata se dekhna chahiye.

I had started writing since my teenage. I had got published short stories in India's national magazines and had written my first novel, 'Parivertan' while I was there. But after coming to Denmark I have become 'Pravasi lekhak'.

I have recently written an alochnatmak lekh on 'this topic.

Best regards,

Archana Painuly
Visit my website at: www.archanap.com

Pran Sharma ने कहा…

Lagta hai ki mere anuj Tejendra
Sharma ne videshon mein likhe jaa
rahe Hindi sahitya ke saath zabran
jode gaye shabd " prawasee " ko
hataane kee jang mein apne haath
khade kar liye hain . Unko yah
jang zaaree rakhnee chaahiye thee.
Ajeeb baat hai ki kewal Maheep
singh ke kahne par unhonne apnaa
yah abhiyaan tyag diyaa .
Videshon mein baitha shayad
hee koee Hindi sahityakaar hoga
jo " prawasee " shabd kee pairvee
kartaa hai. Sabhee is shabd ko
hataane ke paksh mein hain .
Subhash Neerav ji ne sahee kahaa hai ki " prawasee " shabd dheere-
dheere videshon mein likhe jaa rahe
Punjabi Sahitya se lupt hota jaa
rahaa hai .Hindi mein bhee yah
sambhav ho sakta hai .
Main nahin chaahtaa hoon
ki kise bhartiya Hindi patrika mein
koee sampaadak meree gazal yaa
laghukatha ke saath " prawasee "
likhe . Main kya , Archna Painuly,
Ila Prasad , Gautam Sachdev ,
Krishan Biharee, Susham Bedi ,
Sudha Dheengra , Sameer Lal Sameer,
Umesh Agnihotri , lavanya Shah
ityaadi sabhee iske upyog ke virodh
mein hain . Mun se Tejendra Sharma
bhee is shabd ko naapasand karte
honge .
Main " Vaatayan " ke maadhyam se Hindi kee sabhee
patrikaaron ke sampaadkon se appeal
kartaa hoon ki videshon mein likhe
jaa rahe Hindi Sahitya ke liye
" prawasee " shabd ko istemaal karna band karen .

बेनामी ने कहा…

भारत के ज़्यादातर लेखक प्रवासी लेखक हैं । कोई बिहार से दिल्ली, मुम्बई और दूसरे शहरों में चला गया है तो कोई राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से दूसरे राज्यों में। कुछ लोग बुलन्दशहर और मेरठ से दिल्ली चले आए, वे भी दिल्ली में तो प्रवासी ही हैं । इलाहाबादी लेखक बम्बई, जबलपुर चले गए, छत्तीसगढ़ी लेखक दिल्ली चले आए, वे भी प्रवासी हैं । तो भाई, हम विदेशों में चले आने वाले लेखकों कवियों के लिए ही सिर्फ़ इस शब्द का उपयोग क्यों? मैंने सिर्फ़ एक बार साहित्य अकादमी में प्रवासी मंच के अन्तर्गत अपना वक्तव्य दिया था । वो भी मज़बूरी में, क्योंकि वायदा कर चुका था और अंतिम क्षणों में ही मुझे पता लगा था कि साहित्य अकादमी के भीतर भी प्रवासी-मंच बना दिया गया है और मुझे उसी के अन्तर्गत बोलना है। उसके बाद मैंने साहित्य अकादमी की तरफ़ गर्दन उठाकर भी नहीं देखा । दर‍असल यह एक षड़यन्त्र के अलावा और कुछ नहीं है कि भाई लोगो, आप प्रवासी हैं, आप हमसे अलग हैं, आप विशिष्ट हैं, अजूबा हैं, आप जो भी लिखते हैं, उसे हम भारतीय साहित्य की मूलधारा में शामिल नहीं कर सकते । मेरे पास पासपोर्ट भारतीय है, लेकिन मैं प्रवासी हूँ । मेरा दिल भारतीय है, लेकिन मैं प्रवासी हूँ । जिस देश में मैं रहता हूँ, उस देश के लिए मैं विदेशी हूँ और जिस देश का मैं रहने वाला हूँ, उसके लिए प्रवासी हूँ । यह हम लोगों को हमारी जड़ों से काटने, हमें हमारी अपनी दुनिया से अलग कर देने की साज़िश नहीं तो और क्या है भला। इस अभियान में मैं दोनों हाथ उठा कर आपके साथ हूँ, दोस्तो। भाई रूपसिंह चंदेल जी का हार्दिक आभारी हूँ कि उन्होंने इस गम्भीर विषय को उठाया।
सादर, अनिल जनविजय

जनविजय ने कहा…

भारत के ज़्यादातर लेखक प्रवासी लेखक हैं । कोई बिहार से दिल्ली, मुम्बई और दूसरे शहरों में चला गया है तो कोई राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से दूसरे राज्यों में। कुछ लोग बुलन्दशहर और मेरठ से दिल्ली चले आए, वे भी दिल्ली में तो प्रवासी ही हैं । इलाहाबादी लेखक बम्बई, जबलपुर चले गए, छत्तीसगढ़ी लेखक दिल्ली चले आए, वे भी प्रवासी हैं । तो भाई, हम विदेशों में चले आने वाले लेखकों कवियों के लिए ही सिर्फ़ इस शब्द का उपयोग क्यों? मैंने सिर्फ़ एक बार साहित्य अकादमी में प्रवासी मंच के अन्तर्गत अपना वक्तव्य दिया था । वो भी मज़बूरी में, क्योंकि वायदा कर चुका था और अंतिम क्षणों में ही मुझे पता लगा था कि साहित्य अकादमी के भीतर भी प्रवासी-मंच बना दिया गया है और मुझे उसी के अन्तर्गत बोलना है। उसके बाद मैंने साहित्य अकादमी की तरफ़ गर्दन उठाकर भी नहीं देखा । दर‍असल यह एक षड़यन्त्र के अलावा और कुछ नहीं है कि भाई लोगो, आप प्रवासी हैं, आप हमसे अलग हैं, आप विशिष्ट हैं, अजूबा हैं, आप जो भी लिखते हैं, उसे हम भारतीय साहित्य की मूलधारा में शामिल नहीं कर सकते । मेरे पास पासपोर्ट भारतीय है, लेकिन मैं प्रवासी हूँ । मेरा दिल भारतीय है, लेकिन मैं प्रवासी हूँ । जिस देश में मैं रहता हूँ, उस देश के लिए मैं विदेशी हूँ और जिस देश का मैं रहने वाला हूँ, उसके लिए प्रवासी हूँ । यह हम लोगों को हमारी जड़ों से काटने, हमें हमारी अपनी दुनिया से अलग कर देने की साज़िश नहीं तो और क्या है भला। इस अभियान में मैं दोनों हाथ उठा कर आपके साथ हूँ, दोस्तो। भाई रूपसिंह चंदेल जी का हार्दिक आभारी हूँ कि उन्होंने इस गम्भीर विषय को उठाया।

बेनामी ने कहा…

भाई तेजेन्द्र की टिप्पणी पढ़कर हैरत हुई। वह हिन्दी में वर्षों से लिख रहे हैं तब से जब वह हिन्दुस्तान में थे और अब पिछले कई वर्षों से विदेश में प्रवास कर रहे हैं। उन्होंने कई वर्ष पहले अगर दूरदर्शन पर ‘प्रवासी साहित्य’ शब्द पर विरोध दर्ज कराया था( जैसा कि उन्होंने लिखा है) तो नि:संदेह उन्हें इस शब्द से तकलीफ़ होती ही रही होगी, तभी तो वह दिल्ली दूरदर्शन पर तीस मिनट तक अपना विरोध दर्ज कराते रहे। भाई तेजेन्द्र के पास कलम है, पैसा है, मंच है, और वह विदेश में प्रवास कर रहे हैं, वह इस गलत प्रचलन का विरोध का सिलसिला कहीं बेहतर और मजबूत तरीके से जारी रख सकते थे, और उन सभी लेखकों, रचनाकारों की आवाज़ बन सकते थे जो विदेशों में रहकर भी अपनी मातृ-भाषा हिंदी अथवा पंजाबी में निरतंर सक्रियता से अच्छा लेखन करते रहे है/कर रहे हैं और जिनके रचे साहित्य को ‘प्रवासी’ कहकर मुख्यधारा से ही पृथक किया जाता रहा है। लेकिन बड़ी हास्यास्पद-सी बात है कि जिनका यह दर्द है, वही एक गैर-प्रवासी लेखक की बात से इतनी आसानी से कन्विन्स हो गए और इस मुद्दे को हल्का मानकर इससे किनारा कर बैठे। भाई तेजेन्द्र जी यह आपका और आप जैसे उन सभी कलमकारों का मुद्दा था जो अपने वतन से दूर रहकर भी अपनी भाषा में निरन्तर नोटिस लिया जाने वाला लेखन करते रहे और कर रहे हैं। यह महीप सिंह का दर्द कतई नहीं था। उनकी बात से भाई तेजेन्द्र को कायल होने की बजाय, मजा तो तब था कि वह अपनी बात पर महीप सिंह जी को कन्विन्स कर पाते। भाई तेजेन्द्र जिस तबीअत और जोश-जुनून के व्यक्ति हैं, वह मात्र एक गैर प्रवासी लेखक की बात सुनकर अपने हथियार डाल देंगे, जानकर आश्चर्य होता है।

-सुभाष नीरव

बेनामी ने कहा…

भाई प्राण शर्मा जी और रूप सिंह चन्देल जी
आपकी टिप्पणी के साथ-साथ अन्य लेखकों/पाठकों की टिप्पणियाँ भी पढ़ीं । अपनी ओर से मात्र इतना जोड़ना चाहता हूँ कि किसी ग़लत बात को स्वीकार करके हथियार डाल देना और भीड़ के साथ दौड़ पड़ना न तो साहस का द्योतक होता है और न ही बड़प्पन का । ऐसा व्यक्ति लेखक हो या समीक्षक, और चाहे कुछ हो, क़लम को हथियार बनाकर लड़ने की ताक़त नहीं रखता ।

सप्रेम आपका

गौतम सचदेव

बेनामी ने कहा…

प्रिय भाई तेजेंद्र जी ,
श्री रूप सिंह चंदेल के www.vaatayan.blogspot.com पर
हिंदी साहित्य के साथ प्रवासी शब्द की उपयोगिता के पक्ष में आपके
विचारों ने मन पर गहरा आघात किया है . मेरे मन को ही नहीं विदेशों
में बसे प्राय: सभी हिंदी साहित्यकारों को आहत किया होगा . आप तो
प्रवासी शब्द का विरोध करने की बजाय प्रचार - प्रसार कर रहे हैं . यह
विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य के हित में कतई नहीं है . कृपया
विदेशों में रहते हिंदी साहित्यकारों की आवाज़ को सुनिए और उनकी
आवाज़ से अपनी आवाज़ मिलाईये . यह एक बुजुर्ग का नेक मशवरा है
भाषा कभी प्रवासी नहीं होती है .
शुभ कामनाओं के साथ ,
प्राण शर्मा

roopchandel@gmail.com ने कहा…

मित्रो,

वातायन के सम्पादकीय का जिसप्रकार स्वागत हुआ और जिसप्रकार प्रतिक्रियाएं मिलीं और लगातार मिल रही हैं वह सुखद है. लेकिन किंचित तकनीकी गड़बड़ी के कारण कुछ मित्र अपनी प्रतिक्रिया वातायन में पोस्ट नहीं कर पाए और उन्होंने उसे मुझे मेल किया, जिसे मैंने copy करके बेनामी के अंतर्गत वातायन में पोस्ट किया है. उन टिप्पणियों में स/श्री महेश दर्पण, तेजेन्द्र शर्मा, सुभाष नीरव, प्राण शर्मा और गलती से अनिल जनविजय की टिप्पणियां मुख्य हैं.

रूपसिंह चन्देल

सहज साहित्य ने कहा…

प्रवासी को लेकर अच्छी बहस शुरू हुई। लेखक तो सिर्फ़ लेखक है । जिस भाषा में लिख रहा है , उसका लेखक। वह पहाड़ पर बैठकर लिखे या झाड़ पर । हिन्दी साहित्य का इतिहास और पाठ्यक्रम भी इसके शिकार हो चुके हैं । मैं विदेश की बात क्या कहूँ -अपने ही देश के किसी अहिन्दी प्रान्त में बैठकर हिन्दी की सेवा करने वालों की उपेक्षा करने में भी हम पीछे नहीं है । भारत से बाहर कविता-कहानी लिखने वाले ऐसे भी रचनाकार हैं, जिनकी रचनाओं में बहुत दम है । उनके सामने यहाँ के बहुत से रचनाकार कहीं नहीं टिकते । उन्हें प्रवासी कहकर बड़े आराम से किनारे कर दिया जाता है । अब तो और कई प्रजातियाँ साहित्य में उग आई हैं , प्रशासनिक जगत और कार्पोरेट जगत के साहित्यकार । साहित्य का काम जोड़ना था , बाँटना क्यों हो गया ? इसे साजिश ही कहा जाएगा ।

roopchandel@gmail.com ने कहा…

तेजेन्द्र शर्मा जी,

वातायन पर मेरे सम्पादकीय पर आपकी प्रतिक्रिया मिली थी, जिसे मैंने वातायन में पोस्ट कर दिया और उसपर आयी रचनाकारों की प्रतिक्रियाएं आपको भेजी. मिली होंगी. भाई नीरव की प्रतिक्रिया (संशोधित रूप में) आपको भेज रहा हूं. पढ़ेंगे और संभव हो तो उत्तर देंगे.

आपकी प्रतिक्रिया में दिए गए तर्कों से मैं सहमत नहीं हूं. हिन्दी फिल्मों में कई विदेशी कलाकार और हालीवुड में कई भारतीय अभिनेताओं ने अभिनय किए और कर रहे हैं, लेकिन उनके अभिनय को ’प्रवासी अभिनय’ नहीं कहा जाता और ना ही उन्हें प्रवासी अभिनेता. बात भाषा और उसके साहित्य की है, जिसका संबन्ध अस्मिता से है.

डॉ. महीपसिंह जी का हवाला देकर आपने जिसप्रकार सहजता से इस मुद्दे से अपने को अलग करना चाहा है वह अचंभित करता है.

7 को नहीं आ पाया. खेद है. आप जैसे सुहृद से न मिल पाने का दुख है.

सप्रेम,

चन्देल

Devi Nangrani ने कहा…

चँदेल जी, आपका ळिखा लेख "प्रवासी" शब्द की नई परिभाषा के उजाले हमारे सामने ले आएगा ऐसी मनोकामना है. विदेश में रहने वाले श्री प्राण शर्मा जी की बानगी.....
साहित्य के उपासको, ए सच्चे साधको
"कविता को या कथा को प्रवासी नहीं कहो"
प्रसव पीड़ा की गहराई और गीराई उनकी इस रचना में महसूस की जाती है जब देश के बाहर रहने वाले सहित्यकार को प्रवासी के नाम से अलंक्रित किया जाता है. क्या कभी अपनी मात्र भाषा भी पराई हुई है? कभी शब्दावली अपरीचित हुई है? इस वेदना को शब्दों का पैरहन पहनाते हुए वे भारत माँ की सन्तान को निम्मलिखित कविता में एक संदेश दे रहे है....
यही परम सत्य है, अनुज नीरज का कथन "शब्द, भाव प्रवासी कैसे हो सकते हैं...??? ये तो सबके लिए हैं...साहित्य को चार दीवारों में बाँध कर नहीं रखा जा सकता...खुशबू कभी बंधी है किसी से....!! बिलकुल इस दिशा में सही है.
भारत माँ हमारी जन्मदातिनी है. क्या देश से दूर पारदेस में जाने से रिश्तों के नाम बदल जाते हैं. अगर नहीं तो प्रवासी शब्द किस सँदर्भ में उपयोग हो रहा है. भाषा का विकास हमारा विकास है, और यह सिर्फ देश में ही नहीं यहाँ विदेश में भी हो रहा है इसको नकारा नहीं जा सकता.
बेनामी का कहना "व्याक्ति प्रवास करता है, कविता नहीं। कविता तो हृदय की भाषा है"
सूरज की रोशनी कि तरह भाषा पर हर हिंदोस्तानी का उतना ही अधिकार है जितना एक बालक का माँ की ममता पर होता है. ये उसका हक़ है और इस विरासत को उससे कोई नहीं छीन सकता!.पानी पर लकीरे खींचने से क्या पानी अलग होता है.

भारत हमारी माता, भाषा है उसकी ममता
आंचल से उसके आए सारे जहाँ की खुशबू

भाषा अलग-अलग सी, हर प्रांत की है बेशक
है एकता में शामिल हर इक ज़बाँ की खुशबू
देवी नागरानी

AlbelaKhatri.com ने कहा…

jab pahli baar maine "prawaasi sahitya" ya "prawaasi kavita" kahin padhaa toh mujhe ye shabd bada atpata aur ajeeb laga, lekin main ye soch kar chup raha ki ho sakta hai, ye mere samajh ke daayre se bahar ki cheej ho..........

parantu is aalekh ko baanch kar mujhe bhi yah kahne aur maanne me koi sankoch nahin ki 'prawasi' bhaarteeyon dwara racha gaya sahitya bhi keval sahitya hai use "prawaasi" kahna uske saath anyay karna hai

jab hum "vasudhaiv kutumbkam" ki baat karte hue akhil vishwa ko apna ek parivaar maan lete hain to fir apne hi parivaar aur apne hi ghar me koi prawaasi ya aprawaasi kaise ho sakta hai aur yadi ye desh kal ki seema ke kaaran ho to bhi sahitya toh desh kal aur bsamaaj ki samast seemaaon se mukt hota hai isliye mera bhi vinamra nivedan hai ki prawaasi athva aniwaasi bhaarteeon ke srijan ko "prawaasita " ki salaakhon se mukt karke mahaz sahitya hi samjhaa jaaye

-albela khatri

बेनामी ने कहा…

"अनिल जी से सहमत हूँ | होना यही चाहिए कि हम प्रवासी सम्मेलनों से बचें | प्रवासी के लेबल के साथ छपने से इनकार करें | मेरी मुसीबत तो यह है कि जो पत्रिकाएँ मुझे अतीत में बिना इस शीर्षक के छापती रहीं आज उस शीर्षक के साथ छाप रही हैं | यह बताता है कि यह शब्द किस तेजी से प्रयोग में आ रहा है | यह ध्यानाकर्षित करने का तरीका हो सकता है किन्तु इस बैसाखी की जरूरत नहीं होनी चाहिए |

भारत एक मात्र ऐसा देश है जो अपने नागरिकों को नहीं स्वीकारता | दोहरी नागरिकता का प्रावधान वहाँ नहीं है | यदि आज मैं अमेरिका की नागरिकता ले लूँ तो मेरा भारतीय पासपोर्ट ख़त्म हो जाएगा | प्रवासी साहित्य भी मुझे उसी परम्परा का शब्द लगता है | मैं वैसे "प्रवासी साहित्य" पर शोध दिशा पत्रिका के दूसरे अंक में , सम्पादकीय में अपनी बात कह चुकी हूँ |

अतीत में जो भी हुआ हो किन्तु यह अवसर था जब तेजेंद्र जी इस शब्द "प्रवासी" से मुक्ति पा सकते थे और इसका श्रेय पा सकते थे |"

इला प्रसाद

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

धूप , चांदनी , हवा , गंध रोके से रुके हैं कभी ?
लेखन को सीमाओं में बांधने की कोशिश हास्यास्पद लगती है ।
दोहरापन है ; रहेगा भी !
अंग्रेजी के अलावा रसियन , जर्मन , फ़्रेंच , इटालियन
आदि भाषाओं में सृजित साहित्य की बर्सों पहले की सड़ी जूठन भी हाथ लग जाए तो
तथाकथित बड़े बड़े नामधारी लेखक
रातों रात हिंदी अनुवाद में जुट कर कुछ अलग करने का दंभ लिये'
इनआम अकराम मान सम्मान की जुगत भिड़ाते पाए जाते हैं ।
जबकि… मॉरीशस , कनाडा , दुबई अथवा अमरीका , इंगलैंड या अन्यत्र बसे
प्रवासी हिंदी रचनाकारों के हिंदी में मूल लेखन पर भी तुरंत
प्रवासी का लेबल चस्पा कर दिया जाता है ।

साहित्यिक दोगलापन है यह !

…और यह निकृष्ट दोहरापन सर्वत्र फैला है । शहर शहर कैक्टस की तरह उग आए
इन साहित्यिक मठाधीशों के दुराग्रह को उन स्थानीय सरस्वती-सुतों को भी भुगतना पड़ता है ,
जो अपनी आत्माओं को बेच कर इनके झंडे तले , इनके टोले की भेड़ बन कर ,
इनकी बनाई स्वरलिपियों में मिमियाने को राजी नहीं होते ।

ख़ुशी मनाएं , प्रवासी कहलाने वालों का अस्तित्व तो स्वीकार किया जा रहा है ।
स्थानीय स्तर पर तो इन साहित्यिक मठाधीशों का अनुयायी पिछलग्गू न बनने वाले
उत्कृष्ट रचनाकारों को हरचंद कोशिशों से , यत्र तत्र सर्वत्र सामूहिक प्रयासों द्वारा
येन केन प्रकारेण हाशिये पर डाल दिया जाता है ।

दरअस्ल स्वयं सर्वेसर्वा , होने की भूख के साथ साथ हर टुकड़े पर
अपना या अपनों का आधिपत्य जमाने की फ़ासिज़्म प्रवृत्ति है यह ।
अकादमियों , धन्नासेठों ,और स्थानीय प्रशासन को अपने लपेटे में लेते लेते
भारत के सर्वोच्च सम्मानों पर विष दंत गड़ाते पाए जाते हैं ऐसे ही गुणी भक्षक !

… लेकिन , श्रेष्ठ सृजन धूप है , चांदनी है, हवा है , सुगंध है ! दबाना छुपाना संभव नहीं !

सच्चे गुणी रचनाकार अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी चाहे आसानी से न जुटा पाएं ,
… पीढ़ियों के लिए उत्कृष्ट सृजन ऐसों के ही द्वारा उपलब्ध होता आया है और होता रहेगा !

और यह प्राण शर्मा जी जैसे प्रवासी रचनाकार ही नहीं ,
राजेन्द्र स्वर्णकार जैसे स्थानीय रचनाकार के संदर्भ में भी उतना ही सच है ।

वातायन को बधाई है । विमर्श के ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए … शुभकामनाएं !

सादर
राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

धूप , चांदनी , हवा , गंध रोके से रुके हैं कभी ?
लेखन को सीमाओं में बांधने की कोशिश हास्यास्पद लगती है ।
दोहरापन है ; रहेगा भी !
अंग्रेजी के अलावा रसियन , जर्मन , फ़्रेंच , इटालियन
आदि भाषाओं में सृजित साहित्य की बरसों पहले की सड़ी जूठन भी हाथ लग जाए तो
तथाकथित बड़े बड़े नामधारी लेखक
रातों रात हिंदी अनुवाद में जुट कर कुछ अलग करने का दंभ लिये'
इनआम अकराम मान सम्मान की जुगत भिड़ाते पाए जाते हैं ।
जबकि… मॉरीशस , कनाडा , दुबई अथवा अमरीका , इंगलैंड या अन्यत्र बसे
प्रवासी हिंदी रचनाकारों के हिंदी में मूल लेखन पर भी तुरंत
प्रवासी का लेबल चस्पा कर दिया जाता है ।

साहित्यिक दोगलापन है यह !

…और यह निकृष्ट दोहरापन सर्वत्र फैला है । शहर शहर कैक्टस की तरह उग आए
इन साहित्यिक मठाधीशों के दुराग्रह को उन स्थानीय सरस्वती-सुतों को भी भुगतना पड़ता है ,
जो अपनी आत्माओं को बेच कर इनके झंडे तले , इनके टोले की भेड़ बन कर ,
इनकी बनाई स्वरलिपियों में मिमियाने को राजी नहीं होते ।

ख़ुशी मनाएं , प्रवासी कहलाने वालों का अस्तित्व तो स्वीकार किया जा रहा है ।
स्थानीय स्तर पर तो इन साहित्यिक मठाधीशों का अनुयायी पिछलग्गू न बनने वाले
उत्कृष्ट रचनाकारों को हरचंद कोशिशों से , यत्र तत्र सर्वत्र सामूहिक प्रयासों द्वारा
येन केन प्रकारेण हाशिये पर डाल दिया जाता है ।

दरअस्ल स्वयं सर्वेसर्वा , होने की भूख के साथ साथ हर टुकड़े पर
अपना या अपनों का आधिपत्य जमाने की फ़ासिज़्म प्रवृत्ति है यह ।
अकादमियों , धन्नासेठों ,और स्थानीय प्रशासन को अपने लपेटे में लेते लेते
भारत के सर्वोच्च सम्मानों पर विष दंत गड़ाते पाए जाते हैं ऐसे ही गुणी भक्षक !

… लेकिन , श्रेष्ठ सृजन धूप है , चांदनी है, हवा है , सुगंध है ! दबाना छुपाना संभव नहीं !

सच्चे गुणी रचनाकार अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी चाहे आसानी से न जुटा पाएं ,
… पीढ़ियों के लिए उत्कृष्ट सृजन ऐसों के ही द्वारा उपलब्ध होता आया है और होता रहेगा !

और यह प्राण शर्मा जी जैसे प्रवासी रचनाकार ही नहीं ,
राजेन्द्र स्वर्णकार जैसे स्थानीय रचनाकार के संदर्भ में भी उतना ही सच है ।

वातायन को बधाई है । विमर्श के ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए … शुभकामनाएं !

सादर
राजेन्द्र स्वर्णकार

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

यह वि‍चारणीय प्रश्‍न है। यह विषय विगत दिनों यमुना नगर में हुए ‘अप्रवासी साहित्य’ पर केन्द्रित सम्मेलन में भी उठा था।
सार्थक चर्चा के लिए बधाई।

अर्चना पैन्यली ने कहा…

वातायन में श्री रूप सिंह चंदेल जी ने प्रवासी साहित्य शब्द के खिलाफ जो चर्चा छड़ी थी, वह समाप्त नहीं होनी चाहिए. मैंने सभी के विचार पढ़ें. यह सच है कि लेखन पहाड पर भी बैठ कर हो सकता है और झाड पर भी बैठ कर. इसे प्रवासी क ख कर साहित्य की खेमेबाजी करने की जरूरत नहीं. विदेशो में रह रहे हिंदी साहित्यकारों को इस विशेषण की आवश्यकता नहीं. अर्चना पैनयूली, डेनमार्क