शनिवार, 2 अगस्त 2008

कविता

चन्द्रकांत देवताले की कविताएं

मेरी पोशाक ही ऐसी थी

पणजी से चली बस
पता नहीं क्यों नहीं दीख पड़ी बच्ची वह
लोंडा से चलने पर बस के
नजर पड़ी उस पर
उसकी मां भी खड़ी थी गोद में बच्चा लिये
इतनी आदिवासी कि बस में शोभा नहीं देती थी
घुटनों से टिकी हिचकोले खा रही थी
गिरने-गिरने को हो आती थी कभी
अपनी रोनी सूरत के साथ
उसे उठाकर बैठा लिया मैंने गोद में अपनी
उसकी मां के संकोच के बावजूद

उसका सिर मेरी छाती से टिक गया
और अपने ख्यालों में सफर करते हुए
मैं पंद्रह साल पहले की बस में शुजालपुर से राजगढ़ जाने लगा
तब इतनी ही बड़ी थी मेरी बेटी

उसका माथा सूंघते हुए मुझे लगा
यही है बेटी की गंध
और मैं याद करते हुए न जाने क्या-क्या
भूल गया सब कुछ
और मेरे भीतर आदमी के कलेजे की जगह

धड़कने लगा बाप का दिल
फिर यही सोचकर दुख हुआ मुझे
कि बच्ची को शायद ही मिली होगी
मुझसे बाप की गंध
मैं क्या करता मेरी पोशाक ही ऐसी थी

मेरा जीवन ही दूसरा था।


मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा

मैं मरने से न तो डरता हूं
न बेवजह मरने की चाहत संजोए रखता हूं
एक जासूस अपनी तहकीकात बखूबी करे
यही उसकी नियामत है

किराए की दुनिया और उधार के समय की
कैंची से आजाद हूं पूरी तरह
मुग्थ नहीं करना चाहता किसी को
मेरे आड़े नहीं आ सकतीं सस्ती और सतही मुस्कुराहटें

मैं वेश्याओं की इज्जत कर सकता हूं
पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख
भड़क उठता हूं पिकासो के सांड की तरह
मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूं
और जक्मों की भाषा और उसके गूंगेपन को
अच्छी तरह समझता हूं
उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूं
निनसे भद्रलोग जिन्दगी और कविता की नापजोख करते हैं

मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा
कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा
और मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया
जो घृणित युद्ध में शामिल हैं
और सुभाषितों से रौंद रहे हैं
अजन्मी और नन्हीं खुशियों को

मेरी यही कोशिश रही
पत्थरों की तरह हवा में टकराएं मेरे शब्द
और बीमार की दूबती नब्ज को थामकर
ताजा पत्तियों की सांस बन जाएं

मैं अच्छी तरह जानता हूं
तीन बांस, चार आदमी और मुट्ठी भर आग
बहुत होगी अंतिम अभिषेक के लिए
इसीलिए न तो मैं मरने से डरता हूं
न बेवजह शहीद होने का सपना देखता हूं

ऐसे जिन्दा रहने से नफरत है मुझे
जिसमें हर कोई आए और मुझे अच्छा कहे
मैं हर किसी की तारीफ करते भटकता रहूं
मेरे दुश्मन न हों
और इसे मैं अपने हक में बड़ी बात मानूं

पुनर्जन्म

मैं रास्ते भूलता हूं
और इसीलिए नए रास्ते मिलते हैं
मैं अपनी नींद से निकलकर प्रवेश करता हूं
किसी और की नींद में
इस तरह पुनर्जन्म होता रहता है
एक जिन्दगी में एक ही बार पैदा होना
और एक ही बार मरना
जिन लोगों को शोभा नहीं देता
मैं उन्हीं में से एक हुं

फिर भी नक्शे पर जगहों को दिखाने की तरह ही होगा
मेरा निन्दगी के बारे में कुछ कहना
बहुत मुशिकल है बताना
कि प्रेम कहां था किन-किन रंगों में
और जहां नहीं था प्रेम उस वक्त वहां क्या था

पानी, नींद और अंधेरे के भीतर इतनी छायाएं हैं
और आपस में प्राचीन दरख्तों की जड़ों की तरह
इतनी गुत्थमगुत्था
कि एक दो को भी निकालकर
हवा में नहीं दिखा सकता

जिस नदी में गोता लगा हूं
बाहर निकलने तक
या तो शहर बदल जाता है
या नदी के पानी का रंग
शाम कभी भी होने लगती है
और उनमें से एक भी दिखाई नहीं देता
जिनके कारण चमकता है
अकेलेपन का पत्थर


(सभी कविताएं 'कवि एकादश' (संपादक : लीलाधर मंडलोई और अनिल जनविजय - प्रकाशक : मेधा बुक्स, एक्स -11, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110 032 फोन: 011-22323672) से साभार)


देवताले का जन्म 7 नवम्बर 1936 को जौलखेड़ा (जिला बैतूल), मध्य प्रदेश में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा बड़वाह तथा इंदौर में। होल्कर कॉलेज, इंदौर से 1960 में हिन्दी साहित्य में एम ए । सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पर 1954 में पीएच डी।

छात्र जीवन में 'नई दुनिया', 'नवभारत' सहित अन्य अखबारों में कार्य। 1961 से 1996 तक मध्य प्रदेश शासन, उच्च-शिक्षा विभाग के तहत पन्ना, भोपाल, ;उज्जैन, पिपरिया, राजगढ़, रतलाम, नागदा, इंदौर के कॉलेजों में अध्यापन। शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इंदौर में हिन्दी विभागाध्यक्ष तथा डीन, कला संकाय, देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय , इंदौर के पदों से सेवा-निवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन तथा पत्रकारिता।

उनकी प्रकाशित कृतियों में : हड्डियों में छिपा ज्वर' (1973), 'दीवारों पर खून से'(1975), 'लकड़बग्घा हंस रहा है'(198), 'रोशनी के मैदान की तरफ'(1982), 'भूखंड तप रहा है '(1982), 'आग हर चीज में बताई ई थी'(1987), 'पत्थर की बैंच'(1996), 'इतनी पत्थर रोशनी'(2002), 'उसके सपने'(1997), 'उजाड़ में संग्रहालय'(2003), कविता संग्रहों के अतिरिक्त अन्य अनेक पुस्तकें प्रकाशित।

संपर्क : एफ 2/7, शक्ति नगर, उज्जैन (म प्र ) - 456010

1 टिप्पणी:

ई-हिन्दी साहित्य सभा ने कहा…

chandel ji,Namaste
Sri Devtale ji ka parichay unki kavitaon ke sath "katha-vytha ke liye lena chahata hun, kripa Ejaajat dete tou acha hota. aapaka hi - shambhu choudhary
ehindisahitya@gmail.com