शनिवार, 2 अगस्त 2008

वातायन अगस्त,2008


हम और हमारा समय

मैं क्यों लिखती हूँ ?

मेरे हिस्से का आकाश
इला प्रसाद


अपनी किताब? "इस कहानी का अंत नहीं " की भूमिका में मैंने स्वीकार किया है कि लेखन मेरे लिए तनाव मुक्ति का साधन रहा है। जहाँ तक मैं जानती हूँ , लेखन का आरंभ आमतौर पर ऐसे ही व्यक्तिगत उद्देश्यों से शुरू होता है। लेखन कभी शौकिया शुरू होता है , कभी व्यक्तिगत कुंठाओं से मुक्ति पाने के लिए, कभी ऐसा ही कुछ और। जो कुछ मैं झेलती रही हूँ , जो उस सामाजिक परिवेश की उपज रहा है जिसमें मैं पैदा हुई, पली - बढ़ी , उसे ही धो-पोंछ कर सुन्दर रूप में वापस लौटा देने की मेरी कोशिश रही - उसी समाज को - जो मुझे सौ-सौ कुंठाएँ झेलने पर मजबूर करता रहा।
यह शुरूआत थी।

मेरे अंतर्मुखी व्यक्तित्व ने अपने लिए यह तरीका ईजाद किया था और इसीलिए अपने लिखे को सार्वजनिक करने में मुझे एक लम्बा समय लगा। शुरूआत कविताओं से हुई और कहानी तक पहुँचते- पहुँचते मैं उस मन:स्थिति में आ चुकी थी कि जब जो कहानी जिसके ऊपर लिखी, उसे ही थमा दी ।"लो, पढ़ो।" जानो इस कहानी के माध्यम से खुद को और मुझे। उस अनकहे को जो मैं सीधे तौर पर कभी नहीं कह पाती।

तब वह दुनिया मेरे दोस्तों-मित्रों तथा कुछ परिचितों तक सीमित थी।

जब पहली बार यह किया , तब बी. एस. सी. प्रथम वर्ष की छात्रा थी। दूसरी बार एम. एस.. सी की। दोनॊं ही कहानियाँ दोस्तों ने रख लीं। नहीं जानती, वे मित्र कहाँ हैं और उन कहानियों का अंतत: उन्होंने क्या किया। किन्तु जब तीसरी कहानी लिखी, तब आई. आई. टी. में थी और फ़िर वही किया। अपने जिन पुरुष सहकर्मियों के व्यवहार से तंग आ कर वह कहानी लिखी थी , वह उन्हें ही पढ़ने को दे दी। बाद में वही कहानी "जनसत्ता" में छपी- "इस कहानी का अन्त नहीं" के नाम से , मेरे संग्रह में भी है- और उसी कहानी से मेरे अन्दर की कहानी लेखिका का सार्वजनिक तौर पर जन्म हुआ।

उसके बाद अमेरिका आई किन्तु तब तक मेरी मानसिकता बदल चुकी थी । जीवन में जिन विसंगतियों को झेल रही थी उनके प्रति एक द्रष्टा- भाव जाग्रत हो चुका था और अपने जिए को औरों से बाँटने की बेचैनी ज्यादा थी। अमेरिका को लेकर , पश्चिमी जीवन शैली को लेकर जो आधी- अधूरी जानकारियाँ भारत में रहते हुए मुझ तक पहुँचती रही थीं उनसे मेरा साक्षात्कार मुझमें एक दायित्व बोध भी भरता रहा कि कि इस जीवन का राई - रत्ती हाल मैं अपने लोगों को सुनाऊँ। इसीलिए मेरी कहानियों के विषय के रूप में मैं कोई खास , बड़ा या विशिष्ट चरित्र या घटना उठाने से बचती रही। वह रोजमर्रा की घटनाएँ हैं जिनसे हमारा रोज ही साक्षात्कार होता है।? जीवन के ये छोटे-छोटे सच जो मैं टुकड़ों में अपने पाठकों को सुनाती रही ह? , उनसे साक्षात्कार कर मेरी आँखें भी खुलती रही हैं, मेरी प्रत्येक कहानी का विकास मेरा आंतरिक विकास भी बनता रहा है।

मैं अब अपने खोल से बाहर हूँ और अमेरिका के वर्जनाहीन समाज में रहकर अपने लेखन में अधिक सामाजिक हो गई हूँ।

मेरे अन्दर का यही दायित्व-बोध मुझे हिन्दी में विज्ञान सम्बधी लेख लिखने को भी प्रेरित करता है कि मशीनीकरण के खतरों को भी हम पहचानें। आँख मूँद कर अंधानुकरण न करें। "सार सार को गही रहे, थोथा देय उड़ाए" वाली मानसिकता तक पहुँचें। कम से कम कोशिश तो करें । ये बातें उन तक भी पहुँचे जो अंगरेजी न जानने के कारण यह सब नहीं जान पाते।

और अब , जब मैंने कुछ दो दर्जन के आसपास कहानियाँ लिख डाली हैं, कई लेख, तो जाहिर है, यह समझने की कोशिश में भी हूँ कि लेखन के महाकाश में मेरी जगह कितनी है! कितनों तक मैं अपनी बात पहुँचा पा रही हूँ क्योंकि लेखन अब मात्र स्वातं:सुखाय नहीं रह गया है।

लेखन मेरी विवशता नहीं , मेरा स्वेच्छा से अपनाया गया माध्यम है जिससे मैं एक बहुत बड़े समाज से जुड़ती हूँ।

लेखन ने मुझे मजबूत किया है, अन्दर से और बाहर से और मैं कृतज्ञ हूँ प्रकृति के उस अनोखे विधान की , कि मैं लिख सकती हूँ !


झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।छात्र जीवन में काव्य लेखन की शुरुआत । प्रारम्भ में कालेज पत्रिका एवं आकाशवाणी तक सीमित।"इस कहानी का अन्त नहीं " कहानी , जो जनसत्ता में २००२ में प्रकाशित हुई , से कहानी लेखन की शुरुआत। अबतक देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं यथा, वागर्थ, हंस, कादम्बिनी, आधारशिला , हिन्दीजगत, हिन्दी- चेतना, निकट, पुरवाई , स्पाइल आदि तथा अनुभूति- अभिव्यक्ति , हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुंज सहित तमाम वेब पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ प्रकाशित। "वर्तमान -साहित्य" और "रचना- समय" के प्रवासी कथाकार विशेषांक में कहानियाँ/कविताएँ संकलित । डा. अन्जना सन्धीर द्वारा सम्पादित "प्रवासिनी के बोल "में कविताएँ एवं "प्रवासी आवाज" में कहानी संकलित। कुछ रचनाओं का हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद भी। विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी एवं सम्मेलन की अमेरिका से प्रकाशित स्मारिका में लेख संकलित। कुछ संस्मरण एवं अन्य लेखकों की किताबों की समीक्षा आदि भी लिखी है । हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखों का अनुवाद और स्वतंत्र लेखन। आरम्भिक दिनों में इला नरेन के नाम से भी लेखन।कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) ।लेखन के अतिरिक्त योग, रेकी, बागवानी, पर्यटन एवं पुस्तकें पढ़ने में रुचि।सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन ।सम्पर्क : 12934, MEADOW RUNHOUSTON, TX-77066USAई मेल ; ila_prasad1@yahoo.com

6 टिप्‍पणियां:

तेजेन्द्र शर्मा ने कहा…

इला प्रसाद का लेख सरल, सादा और दिल से लिखा है। लेखिका ने अपनी कहानियों की ही तरह जो लिखा है सच लिखा है। एक सम्पादक के तौर पर मैनें उनकी कहानियां पुरवाई एवं रचना समय (अतिथि सम्पादक) में प्रकाशित की हैं। बहुत कम समय में इला की कहानियां मैच्योर लगने लगी हैं। भारत से बाहर रह रहे लेखकों में इला का नाम कहानी एवं कविता के क्षेत्र में आदर से लिया जाता है। बधाई - तेजेन्द्र शर्मा, लन्दन।

बेनामी ने कहा…

प्रिय चंदेल जी,
इला प्रसाद का आलेख मुझे बहुत पसंद आया। उनकी सादगी और संजीदगी प्रभावित करनेवाली है।
आपका ब्लॉग हिन्दी के श्रेष्ठतम ब्लॉगों में है।
बधाई।
सप्रेम
राजकिशोर

शहरोज़ ने कहा…

अच्छा लगा.
पहले भी इला जी की रचनाएँ नज़र से गुज़रती रही हैं.
शायद स्मरण में हो .वर्तमान-साहित्य के प्रवासी अंक में उनकी रचनाओं
पर टिप्पणी मैं ने ही लिखी थी.

बेनामी ने कहा…

माननीय,
आप के ब्लाग को खूब पढ़ती हूँ,
अति उत्तम ब्लाग है.
इला प्रसाद के लिए मेल पोस्ट करनी चाही कर नहीं सकी
आप को भेज रही हूँ.


ऐसा लगा कि इला की ज़ुबानी ही सब
कुछ सुन रही हूँ. स्पष्ट, बेबाक लेखनी,
सरल, सादा बयान--इला की यह है पहचान.
सुधा

Sudha Om Dhingra
919-678-9056 (H)
919-801-0672(C)
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बेनामी ने कहा…

Bhai Chandel Ji,
Apke is satambh ne dhom macha rakhee hai. Ila ji ka alekh pad kar laga ki diggaj rachnakar ko padh rahe hon. Bhasha ki sadgi, shabdon ka chayan aur abhivyakti ka pravah lajawab hai. Katha Shikahar ke liye bhi Ila ji ne ek kahani bheji hai jo bahut hi shandar hai.Unki rachnaon main sadapan hi unki vishishtata hai. Is khoobsoorat prastuti ke liye apko tatha Ila ji ko badhai.

Devi Nangrani ने कहा…

Ila ko janna aur pehchanna ek sangarsh hai. nki lekhni ka sthar har kon se uttam hai. Kahani ka shilp to dad ke kabil hai. Unse parichit hone ka sukhad anubhav meri prerna bana hai

Devi Nangrani