रविवार, 31 मई 2009

कहानी


बैसाखियाँ

इला प्रसाद
इस बार वह पूरी तरह तैयार हो कर आई थी । एक दिन पहले ही कम्प्यूटर पर देख लिया था , नाइन्टीन सिक्स्टी पर सेन्ट पैट्रिक्स डे की परेड दोपहर दो बजे से शाम चार बजे के बीच थी । रविवार होने की वजह से और सहूलियत थी । उसने कई काम कल ही खत्म कर लिए थे ।
यह आइरिश त्योहार हमेशा उसे होली की याद दिलाता है और मार्च के महीने में होने की वजह से अक्सर ही होली या तो बीत चुकी होती है या फ़िर आनेवाली होती है । सेन्ट पैट्रिक्स डे यानि हरे रंगों की बहार ! हरी शर्ट , हरी टोपी , हरे मोतियों की माला और आँखॊं पर हरे रंग के फ़्रेम का चश्मा । कुछ ने हरा रंग चेहरे पर पोत रखा था । हरा गुलाल भी दिखाई पड़ा । हरियाली सब ओर । वसंत के आगमन की सूचना देता हुआ , संत पैट्रिक ने नाम पर मनाया जाने वाला यह आइरिश त्योहार अब अमेरिका की जिन्दगी का हिस्सा हो चुका है । यूँ तो उसने देखा है कि खुलता हुआ हरा रंग ही - जैसे कि घास का होता है - हर ओर छाया होता है लेकिन हरे के बाकी शेड भी देखने को मिल जाते हैं । अमूमन वह भी उस दिन कोई हरी शर्ट डाल लेती है अपनी ब्लू जीन्स पर और भीड़ में शामिल हो जाती है । उसे यह परेड अच्छी लगती है और यदि परेड के दौरान दर्शकों की तरफ़ फ़ेंके गए चाकलेट, मोतियों की माला, कूपन आदि में से शैमरॉक ( तीन पत्तियों के आकार वाला ) का चिन्ह यदि उसे मिल गया तो वह आम आयरिश की तरह मान लेती है कि यह उसके लिए सौभाग्य लाने वाला है । दरअसल ऐसा ही उसके साथ होता भी आया है। पहली बार वह जबरन इस परेड के दर्शकों में शामिल हुई थी । वह सप्ताह भर का सौदा- सुलुफ़ लेने बाजार निकली थी और लौटते वक्त जाना कि घर तक पहुंचने के रास्ते बन्द हैं । सड़्क पर शेरिफ़ की गाड़ियाँ हार्न देती घूम रही थीं । फ़ुट्पाथों पर लोग जमे थे और किसी भी तरह कार निकालने की गुंजाइश नहीं थी । मजबूरन उसने कार पार्किंग लॉट में कार पार्क की थी और सड़्क के दोनों ओर हजारों की संख्या में खड़े दर्शकों में शामिल हो गई थी । तब उसने पीली शर्ट पहनी हुई थी और कुछ भी हरा नहीं । वह भीड़ से अलग दिखाई दे रही थी कुछ थोडे़ से अन्य लोगों की तरह जो उसी की तरह शायद फ़ंस गये थे । हरे रंग के गुब्बारों और शैमरॊक के चिन्ह से सजी विभिन्न कम्पनियों का इश्तेहार लगाए हुए गाड़ियाँ , जिनकी खुली छतों से ढेर सारे लोग दर्शकों को लक्ष्य कर मालाएँ फ़ेंक रहे थे , एक - एक कर गुजरती रहीं । गुजरती हुई गाड़ियों को वह दिलचस्पी से देखती रही थी । दर्शकों में बच्चे अधिक थे और उनके अभिभावक पिछली पंक्तियों में खड़े चाकलेट आदि लूटने में उनकी सहायता कर रहे थे । एक ट्र्क या कार गुजरती और बीड्स- बीड्स की गुहार मच जाती । हैप्पी सेन्ट पैट्रिक्स डे के नारों से आकाश गूंज उठता । "प्राउड टू बी एन आयरिश " के नारे गुजरती गाड़ियों पर पढ़ कर वह मुस्कराती रही थी । तरह तरह की गाड़ियाँ - कोई जूते के आकार की , कॊई घर बना हुआ ..... बड्लाइट की ट्रक से उस शराब का विज्ञापन करती गाड़ियाँ की-चेन फ़ेंक रही थीं जिसमें कार्डबोर्ड की बडलाइट की बोतल जुड़ी हुई थी । सबकुछ हरे रंग का । बीच-बीच में बच्चों की टोलियाँ खूबसूरत हरे रंग की ड्रेस पहने जिमनास्टिक के करतब भी दिखा रही थीं । कुछ गीत गाते हुए बच्चे भी गुजरे । एक म्यूजिक कम्पनी की गाड़ी कर्णप्रिय धुनें बजाती गुजर गई । कुल मिला कर सुषमा को यह जुलूस बहुत अच्छा लगा था । दर्शनीय!
हालाँकि उसने बाकी लोगों की तरह चिल्लाकर बीड्स नहीं माँगे थे तब भी काफ़ी कुछ उसके पैरों के पास आकर गिरा था । कई रंगों की मोतियों की मालाएँ, चाकलेट और एक टिन की बनी चमकीली तीन पत्ती भी । बीड्स वे लें जो ईसाई हैं , उसे क्या ....! उसने सोचा था किन्तु फ़िर सारा कुछ बटोरती चली गई । वह दिन अच्छा गुजरा था । मन में जैसे हरियाली छा गई थी । बहुत कुछ आँखों के रास्ते भी मन में उतरता है।
जब उसी दिन पोस्ट किए गए रिसर्च पेपर की स्वीकृति की सूचना , करीब महीने भर बाद मिली तो उसने मान लिया कि यह तीन पत्ती सचमुच शुभ शगुन है । अगले साल वह फ़िर से जुलूस देखने गई । उसने भीड के साथ उछल - उछल कर बहुत कुछ लपका था । उसके हाथ कई शैमरॉक के चिन्ह वाले रैपर लगे चाकलेट आए थे । उसके बाद जब अचानक ही एक दिन लुइस आकर उसके पैसे लौटा गया तो वह सोचने पर मजबूर हो गई थी । इस तीन पत्ती के आकार में कुछ तो है । सेन्ट पैट्रिक डे एक शुभ दिन का नाम है। तब से हर साल वह अपनी किस्मत जानने को इस भीड़ में शामिल हो जाती है । फ़िर कोई तीन पत्ती मिलेगी क्या ? कोई चाकलेट ही, जिसके रैपर पर यह चिन्ह बना हो ! बल्कि अब तो वह अपनी मित्र मंडली को भी यह जुलूस देखने के लिए प्रोत्साहित करती है । दूसरी सारी वजहों को किनारे कर देने पर भी यह जुलूस दर्शनीय तो है ही और थोड़ी देर के लिए आप बच्चों में शामिल हो कर खुद भी बच्चे हो जाते हैं ।
यही सब सोच कर उसने वन्दिता को फ़ोन किया था ।
"कल सेन्ट पैट्रिक्स डे है । आ रही है ?"
"वह क्या होता है?"
"कम ऒन यार ! तेरे दो बच्चे हैं और तुझे ही नहीं मालूम ?"
"बता न ।"
सुषमा ने विस्तार से जानकारी दी थी । शैमरॉक और गोल्डेन बीड्स से जुड़े आयरिश विश्वास और संत पैट्रिक के बारे में उसने कम्प्यूटर पर पढ़ा था । ईसाई मान्यताएँ यूँ भी उसके लिए नई नहीं थीं । वह बचपन से ईसाई कान्वेन्ट स्कूळ में पढ़ी थी । ईसाई धर्म भी की भी इतनी शाखाएँ है और एक चर्च दूसरे से अपनी मान्यताओं को लेकर कितने भिन्न हो सकते है उसी जीसस क्राइस्ट पर विश्वास के बावजूद, यह जरूर उसने अमेरिका आने के बाद जाना । यहाँ आकर ईसाइयत के इतने विभिन्न रूप देखने को मिलेंगे यह उसके लिए भारत में रहते हुए कल्पनातीत था । और अभी तो वह अपना सारा ज्ञान वन्दिता के सामने उड़ेल रही थी । लेकिन वन्दिता तो वन्दिता ठहरी । अमेरिका में उसी की तरह पिछले पाँच साल से रहने के बावजूद थोड़ी भी नहीं बदली । अपनी भारतीय मंडली में घूमेगी । हर महीने उसके घर सत्यनारायण कथा या उस जैसा ही कोई उत्सव होगा । विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ी होने के कारण भी उसका दायरा काफ़ी बड़ा है । आए दिन भीड़ लगी होती है । कभी कभी सुष को आश्चर्य होता है , कैसे संभालती है यह सबकुछ । दो बच्चे, नौकरी , पति और आए दिन चले आने वाले अतिथि । फ़िर वह हर किसी के घर पूजा में जायेगी भी । यह दीगर बात है कि उसी की वजह से सुष भी कुछ पर्व त्यौहार मना लेती है । होळी - दीवाली में उसके घर चली जाती है तो अकेला नहीं लगता !
"हाँ , हाँ , समझ गई । अरे अभी चैत्र के नवरात्र चल रहे हैं , यह समय तो शुभ होता ही है !"
सुष को लगा यह कभी नहीं सुधरेगी !
'"अरे यार , बच्चों को तो भेज । वे मजे कर लेंगे । सब होते हैं , हिन्दू , मुस्लिम, ईसाई । आयरिश और नन- आयरिश । यह अमेरिका है!"
"अच्छा, अगली बार देखेंगे । अपने सब डिवीजन में होली- मिलन है आज । ड्राइव तो मुझे ही करना होगा न । नाइटीन सिक्सटी बहुत दूर है यहाँ से।"
"तो मिनट मेड पार्क चली जा । डाउन टाउन । वहाँ का जुलूस तो और अच्छा है । तेरा दीपू तो कह रहा था कि उसे मालूम है सेन्ट पैट्रिक्स डे क्या होता है ।"
"हाँ , सब स्कूल में सीख आते हैं । मैं तो बहन परेशान हो गई । वाइ एम सी ए स्विमिंग के लिए ले जाओ । फ़िर कराटे सीखना है । होम वर्क करवाऒ । इन्हें तो फ़ुरसत ही नहीं मिलती । सब मुझे ही करना है ।"
"चल, जाने दे ।"
सुषमा जानती है , वह नहीं आयेगी । न ही बच्चों को उसके साथ जाने देगी । अमेरिका आने के बाद भी भारतीय पति अन्य मामलों में चाहे बदल जाएँ , पत्नी को लेकर भारतीय बने रहते हैं । यह सुविधाजनक है !
लेकिन सुषमा जायेगी । उसे तीन पत्ती चाहिए !
इस बार उसके पास लखनवी अंगूरी रंग का कुर्ता है - उसका सबसे प्रिय और इस वक्त उसने वही पहना हुआ है ।
यह नाइन्ट्न सिक्स्टी अक्सर उसे भ्रमित करता है । पहली बार तो जब सुना था तो उसकी समझ में ही नहीं आया था कि यह संख्या किसी रास्ते को सूचित करती है । अभी भी वह अक्सर गलत मोड़ ले लेती है और गलत रास्ते पर पहुँच जाती है लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ । उसने कार सीयर्स के बड़े से गोदाम के पास पार्क की और कार की ट्रंक से कुर्सी निकाल ली । उसे लगा था कि वह लेट हो गई है लेकिन अभी परेड शुरू नहीं हुई थी । कई सारे दर्शक सड़क के दोनों ओर कुर्सियाँ डाले बैठे थे । पार्किंग लॉट में घुसने और निकलने का रास्ता भी कुर्सियों से पटा पड़ा था । वह नाइन्टिन सिक्स्टी के पीछे की तरफ़ से आई थी , इसीलिए घुस सकी थी । बैठनेवालों में तमाम बड़े थे । बच्चों की कतार तो उत्साह से भरी उचक उचक कर सड़्क के उस सिरे पर नजर लगाए थी जहाँ से जुलूस आनेवाला था । उसने एक कोने में अपनी मुड़नेवाली कुर्सी खोली और जम गई । उसके ठीक बगल में एक गोरी वृद्धा आँखों पर शैमरॉक के आकार का हरा चश्मा लगाए हुए है । उसे अपनी ओर देखता पाकर वह मुस्कराई । सुष ने भी इशारा कर दिया - बहुत सुन्दर ! वह खुश हो गई ।
इस बार फ़िर अगर शैमरॉक मिलता है तो जरुर उसका चयन होनेवाला है । वह इन्टरव्यू देगी । अब आगे पढ़ाई करने का उसका इरादा नहीं । वह व्यवस्थित होना चाहती है । अपनी जिन्दगी की अगली पारी खेलना चाहती है । अमेरिका से वापस लौटने का तो प्रश्न ही नहीं उठता । यहाँ की सुविधापूर्ण जिन्दगी की आद्त अब उसे भारत की धूल -पसीने भरी जिन्दगी से किनारा करने पर मजबूर करती है । उसने एक छोटा सा भारत अपने मन में बसा लिया है और उसी के साथ वह जीती चली जा रही है। जीती चली जायेगी । मन के उस कोने में जहाँ उसका देश बसता है ,वह अक्सर घूम आती है । अपने दोस्तों , गली -मुहल्लों , माँ बाप , भाई बहनों, फ़ूल- पौधों से बतिया लेती है और फ़िर अमेरिका में जीने लगती है , जो उसका वर्तमान है । वह जानती है यह उस जैसे तमाम भारतीयों का सच है । और वन्दिता चाहे अपने धर्म को लेकर आग्रही हो , देश को लेकर वह भी नहीं है ।
इस इंटरव्यू को लेकर वह कई दिनों से उधेड़्बुन में है । जाए न जाए । पहले तो लगता रहा था कि बुलावा ही नहीं आयेगा । वह अपने आप को इस स्थिति के लिए तैयार करती रही । इसके अतिरिक्त और कौन कौन सी कंपनियाँ हैं जहाँ वह आवेदन कर सकती है । कितने कम पैसों मे वह गुजारा कर सकती है । बड़ी कम्पनी यानी बड़ा पैसा यानी बड़ी प्रतियोगिता । उसके लिए कितनी गुंजाइश बचती है , वह हिसाब लगाती रही थी और अब जब इन्टर्व्यू में एक सप्ताह रह गया है वह इस जुलूस में अपनी किस्मत जानने आई है । तीन पत्ती मिली तो एयर टिकट बुक करवा लेगी ।
सहसा उसकी नजर अपने दूसरी ओर आकर खड़ी हो गई बारह - तेरह साल की मोटी सी, जो शायद स्पैनिश थी , बच्ची पर पड़ी । उसके दोनों हाथ बैसाखियों पर टिके थे और चेहरे पर गहरी उदासी थी । पहला खयाल जो सुषमा के मन में आया वह यह था कि यदि यह बैसाखियों पर न होती तो मोटापे की समस्या का ईलाज करवा रही होती । पिज्जा खा खाकर मोटे हुए माँ बाप बच्चों को असमय ही मोटापे की समस्या का शिकार बना देते हैं । लेकिन उसकी बगल में खड़ी स्त्री मोटी नहीं थी ।
सुष की कुर्सी की ठीक बगल में उस लड़की ने जगह ली । उसकी आँखें सुषमा से मिलीं लेकिन सुष की मुस्कुराहट के प्रत्युत्तर में वह स्त्री मुस्कुराई । वह लड़की नहीं । सुषमा को एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई । वह उसकी उदासी को समझ सकती थी । जहाँ आगे की लाइन में खड़े बच्चे उछ्ल उछलकर मालाएँ लूट रहे थे, खुशी से चिल्ला रहे थे , यह लड़की प्रस्तर-प्रतिमा सी अपनी बैसाखियों पर बस खड़ी थी । सुष को हैरत हुई कि क्यों नहीं इसकी माँ या अभिभाविका , जो भी यह औरत है , आगे बढ़्कर कुछ बीड़्स , कुछ चाकलेट इसके लिए बटोर लाती है । वह तो ऐसा कर ही सकती है । या कि इसे पीछे ही रोके रखने के लिए , कि यह भीड़ में अपनी और दुर्गति न कराए , वह पीछे खड़ी है ?
जुळूस अपने चरम पर था । सारी चीजें अगली पंक्तियों में खड़े लोगों द्व्रारा लपक ली जातीं । अभी तक सुष तक कुछ नहीं पहुंचा था । और कुछ नहीं तो भी उसे एक तीन पत्ती तो चाहिए , सोचती हुई वह अपनी कुर्सी से उठ कर कुछ आगे बढ़ गई ।
बस थोड़ा ही बढ़ी थी कि एक चाकलेट कैन्डी ठीक उसके पैरों के पास गिरी । वह कोई बच्ची तो नहीं , जो लालीपॉप खाए । उसने वह चाकलेट पीछे मुड़कर उस बच्ची की तरफ़ बढ़ा दी "दिस इज फ़ॉर यू ।"
उस बच्ची के उदास चेहरे पर एक क्षीण मुस्कराह्ट बिजली की चमक सी कौंधकर पल भर में विलीन हो गई ।
सुष ने फ़िर जुलूस की तरफ़ नजर दौड़ाई । लगता नहीं कि उसके हिस्से में कुछ आनेवाला है । इस बार गुजरती गाड़ियों में विज्ञापन ज्यादा है । शैमरॉक के डिजाइन ज्यादा हैं लेकिन कुछ वैसा दर्शकों की तरफ़ नहीं आ रहा । लेकिन शायद यह भी सच नहीं था । छोटे से ट्रक पर बैठे दो बच्चों ने शैमराक के आकार के बैलून फ़ुलाए और एक-एक दोनों दिशाओं में दर्शकों की तरफ़ उछाल दिए । एक बच्चे और दूसरी ओर एक लम्बे आदमी द्वारा वे हवा में ही लपक लिए गए । सुष मायूस हो गई । बस इतना ही तो चाहिए था उसे फ़िर तो वह वापस हो लेती । क्या पता उसी तरह यह बच्ची भी कुछ ऐसा ही सोचकर यहाँ आई हो । उसने मुड़्कर बच्ची की तरफ़ देखा । वह चेहरा भावहीन था । जैसे कॊई उम्मीद कहीं बची ही न हो।
सुष आगे बढ़कर पहली लाइन में खड़े बच्चों की पंक्ति के ठीक पीछे आ गई । बस एक तीन पत्ती , बाकी सबकुछ वह उस बच्ची को दे देगी । तीन पत्ती मिली तो वह इन्टर्व्यू के लिए जायेगी वरना नहीं । इतनी दूर बोस्टन जाऒ , जब कि वहाँ बर्फ़ पड़ रही है, और अगर होना ही नहीं है तो क्या जरूरत है जहमत उठाने की ।
एक सुनहली माला उस तक आ कर गिरी । यह भी शुभ् शगुन है , उसने सोचा और फ़िर पीछे जाकर माला उस बच्ची को दे दी। यह उसकी पहली माला थी, । उसने गले में डाल ली । अबतक अगली पंक्ति के बच्चे मालाओं से लद चुके थे । हरी, सुनहली , नीली , पीली , लाल, बैगनी - हर रंग की मालाएँ । पालिथीन चाकलेटों से भरे ।
विपरीत दिशा में देख रही , उसके पैरों से फ़िर कुछ टकराया । सफ़ेद मोतियों की माला ।
इसे वह अपने लिए रखेगी ।
पीछे खड़ी बच्ची के गले में अब दो मालाएँ थीं । एक उसके साथ की स्त्री ने उठाई थी ।
अगली दो चाकलेट फ़िर सुष ने बच्ची को दे दी । वह फ़िर मुस्कराई । लेकिन थैंक्यू जैसा कोई शब्द उसके मुँह से नहीं निकला । शायद वह बाकी बच्चों से अपनी तुलना कर रही थी जो मालाओं, चाकलेटों ,और तरह तरह के पैकेटों , टी शर्ट आदि से लदे फ़ंदे खुशी से कूद रहे थे ।
गाडियाँ गुजरती रहीं । अब वे पीछे खड़े लोगों को लक्ष्य कर रहे थे । बहुत कुछ पीछे भी पहुँच रहा था । सुष फ़िर से पीछे ह्ट आई थी । और एक एक कर कई मालाएँ वह बटोर चुकी थी । हर गाड़ी के गुजरने के साथ उसकी मायूसी बढ़ती जा रही थी । कोई तीन पत्ती उसे नहीं मिलनेवाली । हालाँकि ऐसी मालाएँ भी फ़ेंकी गई थीं जिनमें तीन पत्ती यानी शैमरॉक गुँथे हुए थे । उसमें से कुछ भी सुष तक नहीं पहुँचा था । एक घंटे के जुळूस का तीन चौथाई पार हो चुका था ।
सुष को लौटना था ।
सहसा बारिश शुरू हो गई । लोग भागने लगे । सुष ने अपनी मालाऎँ गिनीं । एक में सिक्स फ़्लैग का कूपन था । दूसरे से फ़ूलों के आकार की सुगन्धित मोमबत्तियाँ लटक रही थीं एक कूपन के साथ कि वह अपनी मोमबत्ती इस दूकान पर आकर ले जाए । यानि कि जो उसे चाहिए था उसके सिवा बहुत कुछ मिल गया था उसे लेकिन उसके अन्दर का विश्वास जगाने के लिए कुछ नहीं । एक एक कर सारी मालाएँ उसने गले में डाल लीं । उसने पीछे लौटते हुए देखा , उस बच्ची के गले में भी तकरीबन इतनी ही मालाएँ थीं , हालाँ कि वह अपनी जगह से हिली भी नहीं थी , सिवाय एक बार के , जब एक पीली माला उन दोनों के बीच आ कर गिरी थी और सुष ने उससे कहा था "टेक इट ।" तब उसने झुक कर माला उठा ली थी ।
चमकती हुई , शीशे की मोतियों की मालाओं की तरह उस लड़की का चेहरा प्रसन्न्नता से चमक रहा था । मालाओं की चमक शायद अब उसके अन्दर भरने लगी थी । चेहरे पर शान्ति थी। वह मुस्करा रही थी ।
सुषमा ने अपनी बाकी चाकलेट्स भी उसे दे दीं । इतने चाकलेटों का वह करेगी क्या । किसी पर शैमरॉक का चिन्ह भी नहीं !.........
बच्ची ने पहली बार उसे "थैंक यू" कहा ।
शायद उसे उसका इच्छित सबकुछ मिल गया था !
भागते हुए लोगों में वह वृद्धा भी थी जिसने हरा चश्मा पहना था - शैमराक की डिजाइन का । " यह क्या बारिश होने लगी ।" वह सुषमा से अंग्रेजी में बोली ।
"मैं भारतीय हूँ । हमारे यहाँ ऐसी हल्की बारिश को लोग शुभ मानते हैं । "सुषमा ने कहा ।
"अच्छा।" वह वृद्धा प्रसन्नता से मुस्कराई ।
"हाँ । आपको मानना चाहिए कि यह सेन्ट पैट्रिक्स डॆ हैप्पी होने वाला है ।"
"हैप्पी सेन्ट पैट्रिक्स डे ।" वह हँसी ।
कुछ हो न हॊ , सुषमा ने सोचा , उस वृद्धा का विश्वास उसने दुबारा जगा दिया है । अपनी मान्यताओं से जोड़कर । जबकि वह खुद इस बात में यकीन नहीं करती !
आकाश काले बादलों से भरता जा रहा था । वसंत का स्वागत करते पेड़ों में नई पत्तियाँ थीं लेकिन उनका घने छायादार स्वरूप में ढलना बाकी था कि कोई उनके नीचे खड़ा होकर खुद को बारिश से अंशत: ही सही , बचा सके । सुष और वह वृद्धा कुछ दूर तक साथ साथ पार्किंग ळॉट में चलते रहे । काले आसमान के नीचे ,सुष को उसकी दूधिया हँसी बहुत पवित्र सी लगी । उसे घर जाना था । बाकी बचे काम निबटाने थे । वह वृद्धा शायद कुछ और कहना चाहती थी लेकिन सुष आगे बढ़ ली । नीचे हरा रंग अब भी सब तरफ़ फ़ैला था । भागते हुए लोग एक हरी दीवार की मानिन्द नजर आ रहे थे । बैसाखियों पर खड़ी लड़की अब भी गले में मालाएँ पहने शान्त भाव से खड़ी मुसकरा रही थी । शायद उनलोगों की कार आस पास ही कहीं थी । सुषमा ने सोचा, जाने दो । इन्टरव्यू वह दे देगी । घर लौटकर पहला काम एयर टिकट बुक करना । फ़िर इंटरव्यू की तैयारी । आज का दिन तो बीत गया । एक दिन यात्रा का । तो बस पाँच दिन बचे हैं । ठीक से तैयारी करेगी । चयन हो न हो ! जाने का खर्च तो कम्पनी दे ही रही है । और उसे क्या करना है । कड़ी प्रतियोगिता है इसीलिए साहस मरा हुआ है लेकिन यदि सफ़ल हुई तो बॉस्टन अच्छी जगह है । बड़ा पैसा भी है । चलॊ , छोड़ॊ, वह भी क्या अन्धविश्वास पाल रही है !
सहसा उसने मह्सूस किया कि बैसाखियों पर सिर्फ़ वह लड़की नहीं वह खुद भी खड़ी थी और कई सारे अन्य लोग । फ़र्क इतना है कि आज उसकी बैसाखियाँ उतर गईं । । वह मुक्त है -अपने पाँवों से चलने को स्वतंत्र !
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झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।छात्र जीवन में काव्य लेखन की शुरुआत । प्रारम्भ में कालेज पत्रिका एवं आकाशवाणी तक सीमित।"इस कहानी का अन्त नहीं " कहानी , जो जनसत्ता में २००२ में प्रकाशित हुई , से कहानी लेखन की शुरुआत। अबतक देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं यथा, वागर्थ, हंस, कादम्बिनी, आधारशिला , हिन्दीजगत, हिन्दी- चेतना, निकट, पुरवाई , स्पाइल आदि तथा अनुभूति- अभिव्यक्ति , हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुंज सहित तमाम वेब पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ प्रकाशित। "वर्तमान -साहित्य" और "रचना- समय" के प्रवासी कथाकार विशेषांक में कहानियाँ/कविताएँ संकलित । डा. अन्जना सन्धीर द्वारा सम्पादित "प्रवासिनी के बोल "में कविताएँ एवं "प्रवासी आवाज" में कहानी संकलित। कुछ रचनाओं का हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद भी। विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी एवं सम्मेलन की अमेरिका से प्रकाशित स्मारिका में लेख संकलित। कुछ संस्मरण एवं अन्य लेखकों की किताबों की समीक्षा आदि भी लिखी है । हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखों का अनुवाद और स्वतंत्र लेखन। आरम्भिक दिनों में इला नरेन के नाम से भी लेखन।कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) ।लेखन के अतिरिक्त योग, रेकी, बागवानी, पर्यटन एवं पुस्तकें पढ़ने में रुचि।सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन ।सम्पर्क : 12934, MEADOW RUNHOUSTON, TX-77066USAई मेल ; ila_prasad1@yahoo.com

6 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Yaar tum to kaviyatri mat likho.sahi shabd kavyitri hai.

Krishnabihari

बलराम अग्रवाल ने कहा…

'ईसाई धर्म भी की भी इतनी शाखाएँ है और एक चर्च दूसरे से अपनी मान्यताओं को लेकर कितने भिन्न हो सकते है उसी जीसस क्राइस्ट पर विश्वास के बावजूद, यह जरूर उसने अमेरिका आने के बाद जाना। यहाँ आकर ईसाइयत के इतने विभिन्न रूप देखने को मिलेंगे यह उसके लिए भारत में रहते हुए कल्पनातीत था।' इस वाक्य से पता चलता है कि कोई जितने छोटे या जितने बड़े कुएँ से आकाश को देखता है आकाश का उतना ही छोटा या बड़ा सच उसके सामने प्रकट हो पाता है। कहानी इस टिप्पणी से अलग संवेदना की है, जिसके लिए अलग से पृष्ठ चाहिएँ।
अन्त में, आदरणीय कृष्णबिहारीजी की टिप्पणी पढ़कर एक चुटकुला याद आ गया--'पत्नी बदहवास-सी भागती हुई आई और एक पेपर- स्लिप पति को पकड़ाती हुई चीखी--लो पढ़ लो, आपका बेटा कविता लिखने वाली पडोस की लड़की के साथ भाग गया है। पति ने पर्ची हाथ में ली और पढ़ते हुए बोले--यह लड़का पता नहीं कब ठीक लिखना सीखेगा। देखो, कवयित्री को कवियत्री लिख कर गया है।' काश, कि वे कहानी पढ़ते और उसपर टिप्पणी करते। लेखिका को प्रोत्साहन मिलता।

Dr. Sudha Om Dhingra ने कहा…

इला की कहानी वैसाखी पहले भी पढ़ चुकी हूँ--चलॊ , छोड़ॊ, वह भी क्या अन्धविश्वास पाल रही है !सहसा उसने मह्सूस किया कि बैसाखियों पर सिर्फ़ वह लड़की नहीं वह खुद भी खड़ी थी और कई सारे अन्य लोग । फ़र्क इतना है कि आज उसकी बैसाखियाँ उतर गईं । । वह मुक्त है -अपने पाँवों से चलने को स्वतंत्र !
कितनी खूबसूरती से इला में मानव मन की एक महत्त्वपूर्ण कुंठित गाँठ खोल कर बात कह दी.
बधाई!

बेनामी ने कहा…

इला प्रसाद की कहानी "बैसखियाँ" पढ़ कर लगा कि हम सब किसी न किसी बैसाखी के सहारे खड़े हैं। जो मुक्त हो जाये उसे दिशा भी मिल जायेगी ।
पूरी कहानी में उत्सुकता बनी रही कि क्या सुषमा अन्त में अपनी तीन पत्ती क्या उस बच्ची को देगी?
लेकिन शायद लेखिका नायिका को स्वावलम्बी देखना चाहती थी । बहुत ही सुन्दर कहानी । लेखिका को बधाई।

शशि पाधा

बेनामी ने कहा…

आदरणीय इलाजी,
सादर-प्रणाम !
मैंने वातायन ब्लागस्पाट पर आपकी कहानी "वैसाखी" पढ़ी . बहुत ही संवेदनशील कहानी है .आपका चित्रण की किसी विकलांग आदमी को वैसाखियों के सहारे खडा देख एक आम आदमी यही सोचता है की वह कितना असहाय है .उसको अपने किसी भी काम के लिए दूसरों की मदद की जरूरत पड़ती है . परन्तु जब अपना आत्मावलोकन करता है तो पाता है वह खुद भी कही न कहीं जरूर वैसाखियों के सहारे ही खडा हैं ,भले ही वे नहीं दिखने वाली हो . बहुत ही उम्दा कहानी है .
यह एक गौरव की बात है , मूल रूप से विज्ञानं से सम्बन्ध रखने पर भी तथा विदेश में विज्ञानं का अध्यापन करने के बावजूद भी हमारे देश की संस्कृति ,भाषा के प्रति अगाध प्रेम आपके दिल में कूट कूट कर भरा है . अभिव्यक्ति ,हिंदी नेस्ट जैसी वेब-पत्रिकाओं से भी आपकी कुछ चुनिन्दा कहानियों को पढूंगा ,जो क्षेत्रीय भाषा से हिंदी में अनुवाद करने में मेरा मार्गदर्शन करेगी.
साभार
दिनेश कुमार माली

Dinesh Mali ने कहा…

आदरणीय इलाजी,
सादर-प्रणाम !
मैंने वातायन ब्लागस्पाट पर आपकी कहानी "वैसाखी" पढ़ी . बहुत ही संवेदनशील कहानी है .आपका चित्रण की किसी विकलांग आदमी को वैसाखियों के सहारे खडा देख एक आम आदमी यही सोचता है की वह कितना असहाय है .उसको अपने किसी भी काम के लिए दूसरों की मदद की जरूरत पड़ती है . परन्तु जब अपना आत्मावलोकन करता है तो पाता है वह खुद भी कही न कहीं जरूर वैसाखियों के सहारे ही खडा हैं ,भले ही वे नहीं दिखने वाली हो . बहुत ही उम्दा कहानी है .
यह एक गौरव की बात है , मूल रूप से विज्ञानं से सम्बन्ध रखने पर भी तथा विदेश में विज्ञानं का अध्यापन करने के बावजूद भी हमारे देश की संस्कृति ,भाषा के प्रति अगाध प्रेम आपके दिल में कूट कूट कर भरा है . अभिव्यक्ति ,हिंदी नेस्ट जैसी वेब-पत्रिकाओं से भी आपकी कुछ चुनिन्दा कहानियों को पढूंगा ,जो क्षेत्रीय भाषा से हिंदी में अनुवाद करने में मेरा मार्गदर्शन करेगी.
साभार
दिनेश कुमार माली