सोमवार, 4 मई 2009

कविताएं



सुधा ओम ढींगरा की दस कवितायें
१) रात भर
रात भर
यादों को
सीने में
उतारती रही,
चाँद- तारों
को भी
चुप-चाप
निहारती रही.
शांत
वातावरण
में न
हलचल हो कहीं,
तेरा नाम
धीरे से
फुसफुसा कर
पुकारती रही.
तेरी नजरें
जब भी
मिलीं
मेरी नज़रों से,
उन क्षणों को
समेट
पलकों का सहारा
देती रही.
उदास
वीरान
उजड़े
नीड़ को,
अश्रुओं
कुछ आहों
चंद सिसकियों से
संवारती रही.
जीवन की
राहों में
छूट गए
बिछुड़ गए जो ,
मुड़-मुड़ के
उन्हें देखती
लौट आने को
इंतज़ारती रही.
२)रिश्ते
तुमने कितनी ज़ल्दी
इस अनाम एहसास को
नाम दे दिया,
रिश्ते में बांध दिया.
मैंने तो सिर्फ़ इतना कहा था
कि तुम मेरे दिल के क़रीब हो
क्या दिल के क़रीब सिर्फ़ रिश्ते होते हैं?
वो एहसास वे जज़्बात
जो अँकुरित हुए ही थे,
जिन्हें पलना था,
बढ़ना था,
पल्लवित और
परिमार्जित होना था,
परवान चढ़ना था
अपने शैशवकाल में ही
रिश्तों की सूली पर टँग गए.
भावनाएँ-संवेग
खुले रहकर भी मर्यादित रह सकते हैं
फिर बंधना-बाँधना क्यों?
शायद तुमने सामाजिक ज़रूरत समझी होगी,
मैं ऐसा समाज निर्मित करूँगी
जहाँ औरत सिर्फ़ माँ, बेटी, बहन, पत्नी या
प्रेमिका ही नहीं
एक इन्सान,
सिर्फ़ इन्सान हो,
उसे इसी तरह
जाना, पहचाना और परखा जाए ।
३)क्या पाया.......
खुशियाँ ढूँढने चले
ग़म राह में गड़े थे.
ग़मों को चुन कर हटाया
दर्द साथ ही खड़े थे.
दर्द से रिश्ता जोड़ा
आँसू झर-झर झड़े थे.
आँसुओं को जब समेटा
दिन जीवन के कम पड़े थे.
४)अलगाव
साथ-साथ इकठ्ठे चले
दुनिया जीतने हम.
सीढ़ी दर सीढ़ी
चढ़ते गए--
पीछे न मुड़े हम.
बुलंदियाँ छूने
ऊँचे उठे--
बेखबर उड़ते ही रहे हम.
प्रेम, समझौता भूल
अस्तित्व-व्यक्तित्व से--
टकराते रहे हम.
स्वाभिमान मेरा
अहम् तुम्हारा--
अकड़ी गर्दनों से अड़े रहे हम.
अकाश से तुम
धरती सी मैं--
क्षितिज तलाशते रहे हम.
भोर की लालिमा
साँझ की कालिमा--
डगमग सा जीते रहे हम.
बेतुकी बातों का मुद्दा
बना निस्तेज से प्राणी--
भावनाओं को चोट पहुँचाते रहे हम.
असमान छूते
नीड़ तलाशते--
चोंच से चोंच लड़ाते रहे हम.
वक्त ने झटका दिया
हाथ छूटा, साथ टूटा--
दिशाओं अलग में चल दिए हम.
मैं कहाँ और
तुम कहाँ चल दिए
कहाँ से क्या हो गये हम.
दुनिया तो दूर, स्वयं को भी
जीतने के काबिल न रहे हम.

५)नज़रों से ओझल
मंदिरों के घंटे
मस्जिदों की अज़ाने
शून्य चीरते
हवाओं संग गूँजते
बुलाएँ ऐसे जैसे शाम को सहर.
सुखद क्षणों में भूलें
दुखद पलों में पुकारें
गम की लहरों में
खोजें उसका ठौर
ढूँढें ऐसे जैसे रात को पहर.
हर गाँव
हर बस्ती में
है उसका बसर
फिर क्यूँ भटके इधर-उधर
खोजें ऐसे जैसे सागर को लहर.
झलक न पाई उसकी
पढ़ डाले वेद-पुराण
नज़रों से ओझल रहा
देखा हर द्वार
कम रही
शायद आराधना
पाया न ऐसे जैसे आँसूं को नज़र.
६ )खिलवाड़
दिन की आड़ में
किरणों का सहारा ले
सूर्य ने सारी खुदाई
झुलसा दी.
रात ने धीरे से
चाँद का मरहम लगा
तारों के फहे रख
चाँदनी की पट्टी कर
सुला दी.
७ )वादा किया होगा
धीरे -धीरे
जो कत्ल हुआ होगा
दर्द जाने उसने कितना पिया होगा .
संवेदनशील क्षणों में
स्वार्थ के वजूद को देख
चैन अपना
औरों के नाम किया होगा.
स्वागत में पतझड़ के
झड़ गए पत्ते
उड़ गए आँधी संग
दम तो उसका,
जो फिर भी खड़ा रहा होगा.
समय के थपेड़े
जीवन की बेरहम तरंगें
जान पाएँगी कहाँ
तोड़ा जो घरौंदा होगा.
दहलीज़ ही से जो
लौट यात्रा को गए
यकीनन उन्हें
घर खाली सा लगा होगा.
चाँद से तो नम न होगी
वादों की ज़मीं
आँचल जब किरणों से
भरने का वादा किया होगा.

८ )मजबूरी
न कहने की मजबूरी
दिल पर भारी है.
कुछ कहने की मजबूरी
बुद्घि पर भारी है.
रिश्तों के टूटने की मजबूरी
आत्मा पर भारी है.
रिश्तों को निभाने की मजबूरी
विवेक पर भारी है.
ऐसी मजबूरी की मजबूरी
क्यों निभाना ज़रूरी है?
९)बचा लो इन्हें
तेज़ हवाओं से
डर कर
कहीं बुझ न जायें
दीए,
बचा लो उन्हें
करके साया
दुआओं का .
दिल के
ज़ख्म
दिल में ही
रहने दो
न जान ले
इन्हें कोई
तेरी अदाओं से.
छुपा लो
ख़ुद को
ख़ुद में
या पर्दे में
पता फिर भी
जान ही लेंगे
इन फिज़ाओं से.
रूह छोड़ने
लगती है जब
घरौंदा अपना
नहीं पलट कर आती
वह सदाओं से.

(यह कविता ईराक युद्ध में शहीद हुए नौजवान सिपाहियों को समर्पित हैं. इसे नार्थ-कैरोलाइना (अमेरिका) के सैनिक संस्थान समारोह में पढ़ा गया था.)
१०) माँ की फरियाद
सूरज से कहो
रौशनी न दे
अंधेरों में रह लूंगी.
चाँद से कहो
चाँदनी न दे
बिन चाँदनी जी लूंगी.
तारों से कहो
अपनी चमक न दें
रास्तों में भटक लूंगी.
ऋतुओं से कहो
रंग बदलना छोड़ दें
बेरंगी ही रह लूंगी.
सब दुःख सह लूंगी
पर बेटा मेरा लौटा दो मुझे
वह सिर्फ़ देश प्रेमी और
सिपाही ही नहीं, इन्सान भी है.
२० वर्ष भी पूरे नहीं
किए उसने,
लड़ने का ही नहीं
जीने का भी हक़ है उसे.
*****
सुधा ओम ढींगरा
सुधा ओम ढींगरा का जन्म--जालंधर , पंजाब (भारत) में हुआ.
शिक्षा- बी.ए.आनर्ज़, एम.ए. ,पीएच.डी ( हिंदी ) , पत्रकारिता में डिप्लोमा.
लेखन विधायें--कविता, कहानी , उपन्यास , इंटरव्यू , लेख एवं रिपोतार्ज.
प्रकाशित साहित्य--मेरा दावा है (काव्य संग्रह-अमेरिका के कवियों का संपादन ) ,तलाश पहचान की (काव्य संग्रह ) ,परिक्रमा (पंजाबी से अनुवादित हिन्दी उपन्यास), वसूली (कथा- संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी ), सफर यादों का (काव्य संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी ), माँ ने कहा था (काव्य सी .डी ). पैरां दे पड़ाह , (पंजाबी में काव्य संग्रह ), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण ). १२ प्रवासी संग्रहों में कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित.
अन्य गतिविधियाँ एवं विशेष--विभौम एंटर प्राईसिस की अध्यक्ष , हिन्दी विकास मंडल (नार्थ कैरोलाइना) के न्यास मंडल में हैं. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) के कवि सम्मेलनों की राष्ट्रीय संयोजक हैं. 'प्रथम' शिक्षण संस्थान की कार्यकारिणी सदस्या एवं उत्पीड़ित नारियों की सहायक संस्था 'विभूति' की सलाहकार हैं. हिन्दी चेतना (उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका) की सह- संपादक हैं. पत्रकार हैं -अमेरिका से भारत के बहुत से पत्र -पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं के लिए लिखतीं हैं. अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनगिनत कार्य किये हैं. हिन्दी पाठशालाएं खोलने से ले कर यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाई. इंडिया आर्ट्स ग्रुप की स्थापना कर हिन्दी के बहुत से नाटकों का मंचन कर लोगों को हिन्दी भाषा के प्रति प्रोत्साहित कर अमेरिका में हिन्दी भाषा की गरिमा को बढ़ाया है. अनगिनत कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन एवं संचालन किया है. रेडियो सबरंग ( डेनमार्क ) की संयोजक. टी.वी , रेडियो एवं रंगमंच की प्रतिष्ठित कलाकार. पुरस्कार- सम्मान-- १) अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए वाशिंगटन डी.सी में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चंदर द्वारा सम्मानित. २) चतुर्थ प्रवासी हिन्दी उत्सव २००६ में ''अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान.'' ३) हैरिटेज सोसाइटी नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका ) द्वारा ''सर्वोतम कवियत्री २००६'' से सम्मानित , ४) ट्राईएंगल इंडियन कम्युनिटी, नार्थ - कैरोलाईना (अमेरिका ) द्वारा ''२००३ नागरिक अभिनन्दन ''. हिन्दी विकास मंडल , नार्थ -कैरोलाईना( अमेरिका ), हिंदू- सोसईटी , नार्थ कैरोलाईना( अमेरिका ), अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए कई बार सम्मानित.संपर्क--101 Guymon Ct., Morrisville, NC-27560. U.S.A.E-mail-sudhaom9@gmail .comPhone-(919) 678-9056
Hindi blog : http://www.vibhom.com/blogs/Web site : http://www.vibhom.com

19 टिप्‍पणियां:

बलराम अग्रवाल ने कहा…

सही बात तो यह है कि 10वीं कविता ने पूर्व की 9 कविताओं के प्रभाव को धो डाला। यह कविता अगर पहले नम्बर पर कम्पोज़ होती तो शेष 9 के प्रभाव को धो डालती, बीच में कहीं कम्पोज़ होकर यह आगे-पीछे वाली कविताओं को धो डालती। सही बात तो यह है कि इसने मुझे झिंझोड़ डाला है।

PRAN SHARMA ने कहा…

SUDHA OM DHINGRA HINDI SAHITYA KAA
JAANAA-MAANAA HASTAKSHAR HAI.MAIN
KAEE SAALON UNKEE KAHANIYAN ,
KAVITAAYEN AUR SAKSHATKAR PADH RAHA
HOON.HAR VIDHA MEIN UNKEE LEKHNEE
BADEE KHOOBSURTEE SE CHALTEE HAI.
AAPKE BLOG PAR UNKEE 10 KAVITAAYEN
PADHNE KAA SAUBHAGYA PRAPT HUAA
HAIN.HAR KAVITA MEIN MUN KO CHHOO
LENE WAALAA KUCHH N KUCHH SANDESH
HAI.UMDAA KAVITAYEN KE LIYE SUDHA
JEE AUR AAPKO SAADHUVAAD.

विजयशंकर चतुर्वेदी ने कहा…

माँ की फरियाद कविता वाकई बहुत अच्छी है. इसका शिल्प नया तो नहीं लेकिन सुधा जी की इन्हीं कविताओं में से अलग है. अच्छी बात यह है कि यह कविता कृत्रिम नहीं लग रही है. धन्यवाद!

rachana ने कहा…

sudha ji
aap ko jitna padhti hoon utni hi aap ki prashanka hoti jati hoon .man naman karne lagta hai .sari hi kavita apne me samarath hai kis ke bare me likhun kis ke bare me nahi soch nahi pa rahi hoon .
chandel ji ka dhanyavad ki unhone aap ki itni sunder kavitayen padhne ka avsar diya

saader
rachana

PRAN SHARMA ने कहा…

AAJ KEE CHARCHIT SAHITYAKAR SUDHA
OM DHINGRA KEE SABHEE 10 KAVITAYEN
PADH GAYAA HOON,.YUN TO UNKEE
SABHEE KAVITAYEN MUN KO CHHONE
WALEE HAIN LEKIN "Majbooree" aur
"Maa kee fariyaad" ne jhakjhor diya
hai.Seedhe-saade shabdon mein
bhavabhivyakti ati sundar ban padee
hai.Aesee behtreen kavitaayen kaa
jadoo kabhee-kabhee kavi/kaviyitri
kee lekhnee dikhatee hai.

सुभाष नीरव ने कहा…

सुधा जी की दस कविताओं में नि:संदेह अन्तिम कविता " माँ की फरियाद" एक असरदार कविता है । अन्य कविताएं बेशक इस कविता जैसा प्रभाव नहीं डालती हैं परन्तु वे बिलकुल नकार देने वाली कविताएं भी नहीं हैं। प्रेम और उससे जुड़े रिश्तों के अहसासों के आसपास की ये सहज -सी लगने वाली कविताएं भले ही बहुत बड़ी बात न करती हों, पर हमारे बहुत करीब की कविताएं हैं। "क्या पाया", "नज़रों से ओझल", और "खिलवाड़" कविताएं गहरी संवेदनात्मकता लिए हुए हैं। पहली कविता "रात भर" में सुधा जी ने एक शब्द "इंतज़ारती" का प्रयोग किया है। मेरे विचार में ऐसा कोई शब्द नहीं है। कविता में तुक निभाने के लिए प्रयोग किया गया लगता है। स्त्री के संदर्भ में अगर "इंतज़ारती" आया है तो पुरुष के संदर्भ में "इंतज़ारता" होगा जो मेरे ख़याल से और भी अटपटा लगेगा।

Atmaram Sharma ने कहा…

आपकी भावों से भरी कविताएँ पढ़ीं. आपका यह रूप भी उजागर हुआ.
- रिश्ते - कविता व्यापक फलक लिये हुए है. इसे पढ़ते हुए - वोल्गा से गंगा - याद आता है.
- वादा किया होगा - कविता में लरजते एहसास बयाँ होते हैं.

बेनामी ने कहा…

आदरणीय सुधा जी,
वातायन पर आपकी भावों से भरी कविताएँ पढ़ीं. आपका यह रूप भी उजागर हुआ.

कविताएँ पढ़ते हुए कुछ विचार मन में उठे, वे यों हैं -
१. मन के भावों को ठीक-ठीक बयान करने का जरिया शब्द हैं, लेकिन शब्दों का दुर्भाग्य ये है कि वे बहुत सीमित हैं और अब तक भाषा इतनी समृद्ध नहीं हो पाई है कि मानस में चलने वाली उथल-पुथल को हूबहू उजागर कर सके. हालाँकि पद्य (कविता) के जरिये यह काफी हद तक बयान हो पाते हैं. मुक्तिबोध जैसे बड़े कवि ऐसा मानते हैं.

२. उनका मानना है कि कविता करते हुए बहुत चौकस (सजग) रहने की जरूरत है. बहुत सोच-विचार करके (नाप-तौल कर) शब्दों का इस्तेमाल करना है. कविता पढ़ते हुए पाठक के विचारों को विस्तार (स्पेस) मिलना चाहिए (यह पहली और आवश्यक शर्त है). मुक्तिबोध आगे कहते हैं कि कविता विचारों को विस्तार देती है, जबकि गद्य बाँधता (सीमित) है.

३. - श्री रामचंद्र कृपालु भज मन, हरण भव-भय दारुणं - को रामचंद्र शुक्ल सबसे बड़ी कविता मानते हैं. अब इसमें देखिये कि शब्दों के भीतर कितना बड़ा फलक (आकाश) समाया हुआ है. यह पद्य सुख-दुख और कैसी भी अवस्था में समान असर पैदा करता है.

उपरोक्त बिंदुओं की कसौटी पर आपकी कविताएँ यत्किंचित खरी उतरती हैं.

रिश्ते कविता व्यापक फलक लिये हुए है. इसे पढ़ते हुए - वोल्गा से गंगा - याद आता है.
वादा किया होगा - कविता में लरजते एहसास बयाँ होते हैं.

सादर
आत्माराम

बेनामी ने कहा…

Priya Chandel ji,

Sudha Om Dhingara ji ki kahani kabhi Vaatayan mein padhi thi. Sudha ji jitani sashakt kathakar hain utani sashakt unaki kavitayen hain. Khaskar Rishe aur 'Main ki fariyad' unaki ullekhaniya kavitayen hain.

Aap dono ko badhai.

JL Gupta

बेनामी ने कहा…

नीरव जी,
इंतज़ारती शब्द पर आप ने जैसी प्रतिक्रिया दी है, वैसे ही मैंने भी दी थी,
जब भारत के एक प्रतिष्ठित कवि, लेखक ने इस शब्द को प्रयोग कर कविता
मुझे वापिस भेजी थी. इंतज़ार करती को इकठ्ठा कर दिया था. साथ ही उन्होंने
उदाहरण भी दिए थे कि एक नामी लेखक ने अपने उपन्यास में महसूस करती को महसूसती प्रयोग किया है. उनका तर्क था की भाषा को नए शब्दों से समृद्ध करना चाहिए. पुरुष के लिए इंतजारता अच्छा नहीं लगेगा. अपनी- अपनी पसंद पर निर्भर करेगा. शब्द कोष के सभी शब्द तो प्रयोग में नहीं लाये जाते. मैंने सिर्फ उनके कहने पर ही यह
प्रयोग नहीं किया-बचपन से बुज़ुर्ग और गुरुजन यही कहते आये हैं की भाषा में नए शब्द लाना, हमेशा नए प्रयोग करना. कभी सफलता मिलेगी कभी असफलता पर भाषा ज़रूर समृद्ध होगी. मैंने यह स्पष्टीकरण नहीं दिया सिर्फ अपना पक्ष रखा है.
आप अपना आशीर्वाद और स्नेह हमेशा बनाये रखेंगे. उससे मुझे वंचित नहीं करेंगे. मुझे ख़ुशी इस बात की है कि आप ने मेरी कविताएँ पढ़ी और उन्हें नोटिस किया.
सादर सस्नेह,
सुधा

haidabadi ने कहा…

रात भर रिश्तों के बारे में सोचते रहे
क्या पाया "अलगाव"
नज़रों से ओझल चाँद की मरहम लगा कर खुद से "खिलवाड़"
करते रहे वादा क्या होता लेकिन मजबूरी माँ की फरियाद थी
बचा लो इन्हें
यह सोच कर लिख डाला कहीं सुधा जी इन्तजारती न हो

चाँद हदियाबादी शुक्ला

डेनमार्क

बेनामी ने कहा…

सुधा धींगरा कि दस कविताएँ बेबाक यह कहने को विवश करती हैं कि कवि किसी भी धरती पर खड़ा हो, उसकी संवेदना और भाषा उसकी अपनी ही मिट्टी कि गंध लेकर कविता में ढलती है. निश्चित रूप से सुधा की सारी कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं कि उनका चित्त मन हिंदी मैं ही स्पंदित होता है. सुधा की अंजुरी में इन कविताओं ने खुद को सार्थक किया है.

अशोक गुप्ता
मोबाइल 09871187875

Radheshyam ने कहा…

चन्देल जी,

वैसे सुधा जी की सभी कविताएं पसन्द आयीं, लेकिन ’रिश्ते’, ’क्या पाया’ और ’मां की फरियाद’ मन को झकझोर देने वाली कविताएं हैं.

आप दोनों को ही बधाई.

राधेश्याम तिवारी

सुरेश यादव ने कहा…

सुधा जी की कविताओं में सहज संवेदना है जो आम जीवन के निकट की है .दसवीं कविता निश्चित रूप से मार्मिक है बधाई .चंदेल जी को प्रकाशन के लिए धन्यवाद.

तेजेन्द्र शर्मा ने कहा…

Sudha Om Dhingra ke 10 kavitaeiN padh gaya hoon. Meri kavita kee samajh bahut seemit hai. Phir bhee Majboori naam kee kavita bahut gehrayee liye hai. MaaN ki Fariyaad bhee bahut sensitive mudda uthati hai.

Badhaai

Tejendra Sharma
Katha UK
London

महावीर ने कहा…

आज सुधा जी की दस कविताएं पढ़ीं, बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचनाएं हैं। भावों, विचारों और आशावादी अभिवृत्ति के अपूर्व सामंजस्य गुम्फन के कारण सुधा जी की रचनाएं उच्च कोटि की है।
सूक्ष्मातिसूक्ष्म बातों को बड़ी गहराई के साथ जीवन के सुख-दुखमयी अनुभूतियों के चित्र बड़ी कुशलता से अंकित किए हैं और विशेषता यह है कि पलायनवादी
स्वर नहीं सुना।

मैं ऐसा समाज निर्मित करूँगी
जहाँ औरत सिर्फ़ माँ, बेटी, बहन, पत्नी या
प्रेमिका ही नहीं
एक इन्सान,
सिर्फ़ इन्सान हो,
उसे इसी तरह
जाना, पहचाना और परखा जाए ।

कविता के लिए कुशल शिल्पी बनना होता है जिससे शब्दों को तराश कर, उन्हें मूर्तरूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें और पंक्तियों में अपने भावों, उद्गारों,अनुभूतियों को 'गागर में सागर' की भांति समेट सकें। यह गुण सुधा जी की कविताओं में स्पष्ट रूप से लक्षित हैं।
सभी कविताएं दिल को छू गईं फिर भी 'मजबूरी','रिश्ते' और 'माँ की फ़रियाद' उल्लेखनीय हैं।
सस्नेह
महावीर शर्मा

बेनामी ने कहा…

सुधा जी की सभी कविताएं अच्छी लगीं। आखिरी मार्मिक।
इला

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

मां की फरियाद
बन जाए गर
हो जाए पूरी
इच्‍छा न हो
फिर कोई
बेशक।

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

रात भर कविता
आरती बन
शब्‍दों को
संवारती रही
मन मानस
पखारती रही