सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

कहानी








एक्ज़िट
सुधा ओम ढींगरा

''आज कल पार्टियों में मेहता दम्पत्ति दिखाई नहीं देते. क्या बात है ?''
"मेहता दम्पत्ति का समाचार जानने की उत्सुकता क्यों ? तुम तो उन्हें पसंद नहीं करते .सब लोग जनतें हैं कि पार्टियों में तुम उन्हें बर्दाश्त भी नहीं कर पाते.''
''कितनी बड़ी बात कह दी तुमने.''
''सही नहीं क्या ?''
''सम्पदा , जब मैंने कभी कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी तो लोग कैसे जान गए !. सब तुम्हारे मन की बातें हैं.''
''सुधांशु , मेहता दम्पत्ति पार्टी में प्रवेश करते नहीं कि तुम्हारी भावभंगिमाएँ बदल जाती हैं . और जब तक वे पार्टी में रहते हैं तुम कोने में एक टोले में बैठे रहते हो -- गुप्ता जी, महेश जी , आनंद सेठ ,सुहास भाई . फिर तुम वहां से बस घर वापिस आने के लिए ही उठते हो.''
''सम्पदा, इसका अर्थ यह तो नहीं हुआ कि मैं उन्हें बर्दाश्त नहीं करता या पसंद नहीं करता. ''
''और क्या हुआ ?''
''क्या बेहूदा बात कर रही हो -तुम भी जानती हो कि मेहता परिवार कितना ओछा है. कृत्रिमता अंग-अंग से छलकती है. बातें कितनी बनावटी हैं .''
नैविगेटर की आवाज़ उभरती है ''टेक लेफ्ट.''
सुधांशु ने स्टीयरिंग व्हील बाईं ओर घुमा दिया .
''न मुझे अजय मेहता से नफरत है न मैं उसे नपसंद करता हूँ . समस्या है उसकी डींगें --पूरी पार्टी में वह हाँकता है और अफसोस कि लोग सुनतें हैं.''
''क्या लोग कान बंद कर लें .सब की रुचियाँ तुम्हारी जैसी नहीं.''
''पर पार्टी में अनर्गल बेवजह वार्तालाप तो सुनने मैं नहीं जाता, बौद्धिक न सही कुछ तो महत्त्वपूर्ण बात हो--मौलिकता बेचारी दूर खड़ी रोती है. गप्प के बिना बात ही शुरू नहीं करता अजय मेहता.''
'' क्या मेहता परिवार का बड़ा घर सच नहीं, बी.एम.डब्लू , मर्सीडीज़, लैक्सिस कारें झूठी हैं. बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहें हैं-साल में चार बार मंहगें स्थलों पर छुट्टियाँ बितानें जाते हैं- सुंदरी मेहता गहने कपड़ों से लदी रहती है - नित नई पार्टियाँ करना क्या गप्पें हैं?''
कार ५४० हाई वे पर सरपट दौड़ रही थी. सुधांशु ने कार दाईं ओर की लेन में कर ली. चार पंक्तियों की सड़क पर कारें ८० मील की रफ्तार से भाग रहीं थीं. दाईं ओर की लेन में सुधांशु ने क्रूज़ कंट्रोल में ६५ मील की रफ्तार सेट कर गाड़ी चलानी शुरू कर दी. दाईं लेन धीमी रफ्तार वालों व गंतव्य स्थान आने पर प्रस्थान लेने वालों के लिए होती है.
''सम्पदा , अमेरिका में किस के पास यह सब नहीं है. पार्टियों में आते ही कहना-आज सिस्को के दस हज़ार शेयर ख़रीदे पंद्रह डालॅर पर और एक घंटे बाद सोलह डालॅर पर बेच दिए. साठ मिनट में मैंने दस हज़ार डालॅर बना लिए.''
''उसका धंधा है.''
''और क्या धंधें के बिना हैं. कितने लोग अपने धंधें की पींगें डाल कर बैठ जातें हैं.''
''जो कमाएगा वही बात करेगा .''
''बाकी बेकार हैं.''
''मैंने कब कहा बेकार हैं.''
''डॉ. वाणी कितने शांत रहते हैं , सबसे हँस कर बात करते हैं. उनका सान्निध्य सुख देता है. कभी उन्होंने अपनी रिसर्च की बात की. ब्रैस्ट कैंसर की दवाई ''टैक्साल '' खोजने वाला कितना विनम्र है.''
''सब तो डॉ. वाणी नहीं हो सकते.''
''यहाँ की प्रतिस्पर्धा और काम के तनाव से मुक्त होने पार्टियों में जाते हैं. आनन्द , मनोरंजन के लिए- देश परिवार की बात करने ,सद्भावना से मेलमिलाप के लिए अन्यथा एक दूसरे की सूरत देखने को तरस जायें.''
तभी एक कार साथ की लेन से सुधांशु की बी.एम.डब्लू के आगे आ गई उसे प्रस्थान करना था. सुधांशु ने कार की गति को क्रूज़ कंट्रोल से हटा कर सामान्य में डाल दिया. कार की गति धीमी हो गई. पहली कार के एक्ज़िट लेते ही सुधांशु फिर अपनी गति में आ गया पर इस बार उसने कार को क्रूज़ पर नहीं डाला. सुधांशु ने फिर अपनी बात शुरू कर दी.
''पार्टी में आते ही अजय मेहता वाईन का ग्लास पकड़ता है , दो चार पैग पीता है और शुरू हो जाता है-आई.बी.एम में पैसा लगा दो. डेल आज कल ख़रीदा जा सकता है. दवाईओं की किसी भी कंपनी में पैसा न लगाओ. एफ.डी.ए. ने सब की बजा दी है. वैसे मैंने आज ग्लैक्सो से बीस हज़ार डालर बनाए हैं .''
सम्पदा कुछ बोली नहीं. रोष में सुधांशु बोलता गया.
''ख़ुद तो दवाईओं की कंपनी के शेयरों से पैसा बनाता है दूसरों को मना करता है.''
''पर वह अनुभवी है. पिछले दस सालों से यही काम कर रहा है. तभी तो मना करता है. इसीलिए तो नौकरी छोड़ दी.''
''छोड़ी नहीं, निकला गया . वहां भी काम के समय शेयर बाज़ारी करता था. भारत थोड़े ही है कि सरकारी नौकरी ले ली और उम्र भर की रोटियां लग गईं.''
''मिसिज़ मेहता तो कह रही थी स्टेट बजट पर कट लगने से मेहता जी की नौकरी चली गई.''
चौथी लेन से एक नवयुवक तेज़ गति से कारों को ओवर टेक करता सुधांशु के आगे आ गया. अगले मोड़ पर उसे प्रस्थान करना था. क्षणिक तीव्रगामी घटना क्रम ने सम्पदा के हाथ डैश बोर्ड की ओर बढ़ा दिए और सुधांशु कार सँभालते हुए बुदबुदाया -- मरेगा साला , साथ में दूसरों को भी मारेगा. क्षणों में कार संभल गई- कुछ देर की खामोशी रही.
'' सम्पदा, जब कट लगता है तो काम चोर लोग पहले निकाले जाते हैं. तुम भी हरेक की बातों में आ जाती हो.''
''सुंदरी मेहता इसे वरदान समझती है, बहुत खुश है. अमेरिका की सरकारी नौकरी में प्राइवेट कम्पनियों के सामानांतर क्या मिलता है और सुरक्षा भी नहीं.''
''भारत की सरकारी नौकरी समझ कर ली थी . काम और समय के प्रति भारतीय सोच चली नहीं यहाँ .''
''सुंदरी मेहता महिला मंडल में बड़ी शान से कहती है -- हम तो उस नौकरी में कुछ भी न कर पाते, भगवान जो करता है सही ही करता है .ये दस हज़ार डालर से बीस हज़ार डालर दिन के बना लेतें हैं.''
''क्या यह शेखी नहीं?''
"उस दिन पार्टी में मेहता भी कह रहा था- अमेरिका में डाक्टर बहुत कमाते हैं और मेरी ओर देख कर कहने लगा पर दिन के पचास हज़ार डालर नहीं. मैं आज अभी आने से पहले इतना पैसा बना कर आया हूँ. यह बड़बोलापन नहीं तो और क्या है ? सम्पदा कोई भी डाक्टर मेहता का मुकाबला क्यों करेगा?''
''उसके ऐसा कहने पर तुम्हें चोट लगी ."
"मुझे चोट क्यों लगेगी--उस पर शराब हावी थी, उसे पता भी नहीं था वह क्या बक रहा है''
सम्पदा ने घड़ी पर सरसरी नज़र डाली -- वेक फारेस्ट पहुँचने में अभी समय था. उसने रेडियो पर ८८.१ ऍफ़ .एम लगा दिया. गीत बाज़ार कार्यक्रम चल रहा था--होस्ट अफ़रोज़ और जान की नोंक -झोंक चल रही थी.
''जान अमेरिकन हो कर भी कितनी अच्छी हिन्दी बोलता है.''
''हाँ , तेरे मेहता को तो इसे सुन कर भी शर्म नहीं आती--पंजाबी भी अंग्रेज़ी लहजे में बोलता है.''
''मेरा मेहता कब से हो गया .''
''तुम्हीं तो उसका पक्ष लेती हो. ''
''कुछ भी कहो पैसा तो उस के पास है. पता है मिसिज़ मेहता के पास हीरे , मोती और जवाहरात के कितने सेट हैं.''
''तुम्हें ईर्ष्या होती है.''
''हाँ, होती है. सर्जन की पत्नी हो कर भी क्या मैं ऐसे जी पाईं हूँ जैसे मिसिज़ मेहता जीती है .''
''मिसिज़ मेहता अपने लिए जीती है तुम अपने से पहले दूसरों के लिए जीती हो.''
''अपने लिए जीने में क्या बुराई है.''
''तो जी लो ना अपने लिए , कौन रोकता है-मत दो हजारों का दान-खरीद लो अपने लिए हीरे -जवाहरात .''
सम्पदा चुप हो गई. रेडियो पर राहत फतेह अली का गाना चल रहा था--तुझे देख -देख जगना, तुझे देख-देख सोना--गाने को सुनते हुए दोनों खामोश रहे--घड़ी की सुई देखते ही सुधांशु फिर बोल पड़ा--
'' कैरी से वेक फारेस्ट इतना लम्बा पड़ता है कि ड्राइविंग करते-करते इन्सान थक जाता है. अपनी सहेली ऊषा से कहो कैरी में घर ले- ले. हर महीने पार्टी रख लेती है.''
''डॉ. ध्रुव कुमार आप के भी तो दोस्त हैं आप क्यों नहीं कह देते.''
तभी फ़ोन की घंटी बजी--बी.एम.डब्लू में एक आसानी है फ़ोन कार के स्पीकर पर बजने लगता है सिर्फ़ टॉक बटन दबाना पड़ता है--बिन्दु सिंह की आवाज़ उभरी--'' सम्पदा, आज की पार्टी केंसल हो गई है, अजय मेहता हास्पिटल में है. उसे हार्ट-अटैक के साथ ही स्ट्रोक भी आया है. डॉ.ध्रुव कुमार तो हस्पताल चले गये हैं. ऊषा ने पार्टी केंसल कर दी है. कुछ फ़ोन काल्स वह कर रही है कुछ मैं कर रही हूँ .पार्टी में लोग भी तो बहुत आ रहे थे.''
''पर हुआ क्या--?'' सम्पदा सुधांशु दोनों बोल पड़े.
'' यहाँ की अर्थ-व्यवस्था और पिछले दिनों शेयर बाज़ार में जो मंदी आई उसको मेहता परिवार ने सहज लिया. पुराने खिलाड़ी थे कई उतार- चढ़ाव देख चुके थे. सम्पदा जो बात पता चली मेहता परिवार बूँद-बूँद कर्ज़े में डूबा हुआ था. घर, कारें, क्रेडिट कार्ड और गहने बैंकों के पास गिरवी थे--सबके विपरीत कर्ज़ा लिया हुआ था यहाँ तक कि घर की एकुटी (घर में इकठ्ठे हुए पैसे ) पर भी कर्ज़ा ले रखा था और पूरा पैसा शेयर बाज़ार में डाला हुआ था.शेयर बाज़ार की गिरावट रोज़ बढ़ती गई और अजय मेहता के पास कई किश्तें देने के लिए पैसा नहीं बचा . अब जब किश्तें चुका नहीं पाए तो बैंक ने कारें ले लीं घर फोर क्लोज़र पर आ गया था. अब नीलाम हो रहा है. ज़ेवर बिक चुकें हैं. एक तरह से सड़क पर आ गया अजय मेहता. यह सदमा सह नहीं सका , तुम लोग अगले एक्ज़िट से कार वापिस मोड़ लो. रैक्स हस्पताल में उसे दाखिल किया गया है.''
इसके साथ ही बिन्दु का फ़ोन सम्पर्क कट गया.
सुधांशु ने कार अगले एक्ज़िट की ओर बढ़ा दी.

**********
सुधा ओम ढींगरा जालंधर (पंजाब) के साहित्यिक परिवार में जन्मी. एम.ए.,पीएच.डी की डिग्रियां हासिल कीं. जालंधर दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं रंगमंच की पहचानी कलाकार, चर्चित पत्रकार (दैनिक पंजाब केसरी जालंधर की स्तम्भ लेखिका). कविता के साथ-साथ कहानी एवं उपन्यास भी लिखती हैं. काव्य संग्रह--मेरा दावा है, तलाश पहचान की, परिक्रमा उपन्यास (पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद) एवं माँ ने कहा था...कविताओं की सी.डी. है. दो काव्य संग्रह एवं एक कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है. १) विश्व तेरे काव्य सुमन २) प्रवासी हस्ताक्षर ३) प्रवासिनी के बोल ४) साक्षात्कार ५) शब्दयोग ६) प्रवासी आवाज़ ७) सात समुन्द्र पार से ८) पश्चिम की पुरवाई ९) उत्तरी अमेरिका के हिन्दी साहित्यकार इत्यादि पुस्तकों में कविताएँ-कहानियों का योगदान. तमाम पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकीं हैं. जिनमें प्रमुख हैं चतुर्थ प्रवासी उत्सव २००६ में ''अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान.''''अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए वाशिंगटन डी.सी में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चंदर द्वारा सम्मानित.'' हिन्दी चेतना (उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका) की सह- संपादक हैं. भारत के कई पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब-पत्रिकाओं में छपतीं हैं. अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनगिनत कार्य किये हैं. हिन्दी पाठशालाएं खोलने से ले कर यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाई. हिन्दी के बहुत से नाटकों का मंचन कर लोगों को हिन्दी भाषा के प्रति प्रोत्साहित कर अमेरिका में हिन्दी भाषा की गरिमा को बढ़ाया है. अनगिनत कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन एवं संचालन किया है. हिन्दी विकास मंडल (नार्थ कैरोलाइना) के न्यास मंडल में हैं. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) के कवि सम्मेलनों की संयोजक हैं. 'प्रथम' शिक्षण संस्थान की कार्यकारिणी सदस्या एवं उत्पीड़ित नारियों की सहायक संस्था 'विभूति' की सलाहकार हैं. तन , मन एवं धन से हिन्दी के लिए जीवन समर्पित है.
Sudha Om Dhingra919-678-9056 (H)919-801-0672(C)Visit my Hindi blog at : http://www.vibhom.com/blogs/Visit my Web Site at : http://www.vibhom.com/

22 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

एग्जिट
सुधा ढींगरा जीवन के जीवंत पक्षों को छूकर, शब्दों में उतार कर, उन्हीं पात्रों के साथ पाठकों का भावनात्मक जगत बनने में पारंगत हैं. मेहता जी जैसे भौतिकवादी मानसिकता ने आज समाज, परिवार और व्यक्ति को कुंठा, उद्विग्नता, विषाद और निराशा से ग्रस्त किया है. एक होती है प्यास जो बुझ जाती है, एक होती है पिपासा जो तीन लोकों की संपदा से भी नहीं बुझती. महत्त्वकांक्षी होना अच्छा है पर उसके विषय सात्विक होने चाहिए. मेहता जी के मध्यम से सुधा जी ने आडम्बर, शेखी और दिखावे का खोखला पन दिखा कर समाज को सजग करने का प्रयास किया है. कहानी पात्र और पात्रता सभी हमारे आस-पास के ही तो हैं अतः प्रत्येक पंक्ति में, संवाद में, यथार्थ है.
मृदुल कीर्ति

Pran Sharma ने कहा…

Sudha Om Dhingra kee kahani"Exit"
abhee-abhee padh kar khatm kee
hai.kahani apne sheershak ko saarthak kartee hai.America mein
rah rahe uchvargee bhartion kee
jeevan shailee ko khoobhee ke saath
chitrit kiyaa hai lekhika ne.
Laghbhag paanch minutes ke kahani
mein lagaa hai ki jaese gaagar mein
saagar bhar bhar diyaa gayaa ho.
Chust sanvaadon se kahaani mein
sajeevtaa aa gayee hai.Asha hai ki
bhavishya mein bhee lekhika aesee
hee sajeev kahanian dengee.

Dr madhu sandhu ने कहा…

Exit punjivaadee maansikta se , bhotikvaad se niklane ke sanket aur sandesh liye ha. jyada paisaa insaan ko ochhaa bana deta ha to pase ka chuknaa uskee jaan bhee le sakataa ha. Kahanee achhee lagee.

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

समकालीन कठोर सामाजिक सत्य को बहुत ही निपुणता के साथ शब्दों में पिरोया है आपने।कितने ही अजय मेहता हैं। उन्हें पढ़नी चाहिये यह कहानी।हार्दिक बधाई।

सुभाष नीरव ने कहा…

बहुत ही सार्थक और वर्तमान समय के सच को ब्यस्त करती कहानी है- एक्जिट। आडम्बर और ढ़ोंग का सहारा लेकर अधिक पैसे की चाह में जीने वालों का हश्र क्या होता है, यह कहानी बखूबी दर्शाती है। कहानी अपनी बुनावट और प्रस्तुति में भी सफल है। बधाई !

सुभाष नीरव ने कहा…

"एक्जिट" कहानी पर मेरी टिप्पणी में आए शब्द "व्यस्त" को "व्यक्त" पढ़ें। अऑन लाइन टाइपिंग में इस तरह की गलतियाँ हो जाया करती है कि कभी कभी अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

haidabadi ने कहा…

वैश्विक आर्थिक मंदी की मार पर आधारित
सु श्री सुधा ओम ढींगरा की यह कहानी
मेरे ख़याल में हिन्दी की पहली कहानी है
कहानी में रवानी है यह एक मोड़ पर आ कर
विराम करती है और क्लाइमेक्स इसे अपने गले लगा लेता है
बहुत कुछ कह दिया कहानी में
तेरे लफ्ज़ों की इस बयानी में

चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

बेनामी ने कहा…

वैश्विक आर्थिक मंदी की मार पर आधारित
सु श्री सुधा ओम ढींगरा की यह कहानी
मेरे ख़याल में हिन्दी की पहली कहानी है
कहानी में रवानी है यह एक मोड़ पर आ कर
विराम करती है और क्लाइमेक्स इसे अपने गले लगा लेता है
बहुत कुछ कह दिया कहानी में
तेरे लफ्ज़ों की इस बयानी में

चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

Atmaram Sharma ने कहा…

आदरणीय सुधा जी,

एक्जिट कहानी पढ़ी. पहली प्रतिक्रिया - बेहतरीन. दूसरी बात - कहानी पढ़ते हुए बार-बार यह विचार उभर रहा था कि हिंदुस्तानी कितने ही साल कहीं भी रह लें वे विचारों से मूल हिंदुस्तानी ही रहे आते हैं.
कहानी में मेहता के जरिये एक पूरी की पूरी पीढ़ी की सोच और जीवन-दर्शन उभरकर सामने आता है. कहानी का सबसे उल्लेखनीय पहलू है उसकी ताजगी और रवानगी. इसके जरिये आपने अपने समय की नब्ज पर हाथ रखा है. छोटे और पूर्ण वाक्य आपकी - कहन - की ताकत को धारदार (अनेकार्थ) बना देते हैं और यही वजह है कि एक बार शुरू करने के बाद कहानी खत्म करके ही पढ़ने वाला दम लेता है.
एक उम्दा कहानी पढ़वाने के लिए बहुत धन्यवाद.

सादर
आत्माराम

ashok andrey ने कहा…

sudha jee ki kahani padi achchi lagi aaj har hindustani kahin bhi jaa kar base veh paise ke piche bhag raha hai lekin veh bhagte bhagte kis moud par jaa kar talhatti chu lege veh kabhi nahi jan pata hai aour yahi trasdi hai/sachai hai jise veh jan kar bhi anjan bana rehta hai kayonki paisa hi uska ishvar ban jata hai tabhi to kahani ka mukhya patre ajay mehta jaise log apne hi banaya darshan shashtron me phas jate hain sudha jee ne ajay ke madhyam se aaj ke yug ke khokhlepan ko badi sahejta se prastut kiya hai jo iss kahani me jan daal deta hai meri aour se sudha jee ko achchi kahani ke liya badhai deta hoon

ashok andrey

अभिनव ने कहा…

मुझको ये कहानी बहुत अच्छी लगी. सुधाजी को अमेरिका की आर्थिक मंदी को इतने बढ़िया तरीके से शब्दों में पिरोने के लिए अनेक शुभकामनाएं. कहानी में मेहताजी के जो चारित्रिक गुण दर्शाए गए हैं ऐसे अनेक गुण हमें अपने आस पास देखने को मिलते रहते हैं. बडबोलापन और दिखावा संस्कृति भले ही दो चार क्षण को प्रभावित करे पर अंततः वही सफल होता है जिसमें संयम और शालीनता होती है. 'जान', 'अफरोज़', सड़कों और शहरों के नामों से परिचित होने के कारण कहानी पढ़ते पढ़ते ऐसा लगा मानो कहीं ये कोई सच्ची घटना तो नहीं. अभी तक मुझे सुधा जी के साक्षात्कार और उनकी कविताएं पढने का ही इंतज़ार रहता था, अब कहानियों की प्रतीक्षा भी रहा करेगी.

डा. फीरोज़ अहमद ने कहा…

बहुत ही सार्थक और समसामयिक समय के सच को व्यक्त करती कहानी – एक्जिट है. आडम्बर और ढ़ोंग का सहारा लेकर अधिक पैसे की चाह में जीने वालों का हश्र क्या होता है, यह कहानी बखूबी दर्शाती है। कहानी का कथ्य और शिल्प बहुत अच्छा है .कबीर साहब ने भी आडम्बर और ढ़ोंग का विरोध किया था. मेरी बधाई स्वीकार करें.

महावीर ने कहा…

'एक्ज़िट' कहानी में कथानक, सम्वाद और चित्रोद्घाटन का सुंदर संयोजन है। भारतीय प्रवासियों के एक विशिष्ट वर्ग की अभिवृत्ति, कृत्रिम जीवन शैली को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया है।

बेनामी ने कहा…

सुध जी की कहानी "एग्ज़िट" पढ़ कर लगा कि मैं भी उस घटना क्रम को साक्षात देख रही हूं । मेहता जी को छोड़ कर बाकी सभी पात्रों को जानती हूं इस लिये तब से मेहता जी को ढूंढ़ रही हूं । छोटे छोटे संवाद एवं कथानक की रवानगी इसे और भी रोचक बना देती है । सुधा जी को बहुत बहुत बधाई ।

shyam skha ने कहा…

सहज,सरल ढंग से सारगर्भित बात कहमे की क्षमता है,सुधा ओम धींगड़ा मेंए एग्जिट आज अनेक लोगों का यथार्थ है।हालांकि इस कथानक पर अनेक कहानियां आ चुकी हैं ,पर कथन शैली ने इसे न केवल नवीनता प्रदान की है अपितु रोचक व पठ्नीय बना दिया है।पाठक का कोतूहल कायम रखने में सफल रही है-कहानी
श्याम सखा ‘श्याम’
कहानी हेतु-http//:kathakavita.blodspot.com

geet gazal hetu-http//:chhanda ro halkaaro.blodspot.com (छंदा रो हलकारो)

तेजेन्द्र शर्मा ने कहा…

Sudha jee - Exit kahani abhi abhi padhi. Kewal pati patni kee baatcheet mein aapney aaj kee financial crisis ko bahut khoobsoorti se darshaya hai. Ek achhee baat ye hai ki aap ne Mehta ko dhongi nahin dikhaya - jab wo kehta hai ki kamaa raha hai, tow kamaa raha hai. He has invested everything in shares. In fact mazedaar baat ye hai ki pathak Sudhanshu ki baat sach hotey huey bhee uss ke saath nahin sochta. Sampada ka charitra bahut mature dikhaya hai. Kahani mein koyee ghatna nahin aur sab kuchh dimagh ke bheetar hee ghatit hota rehta hai. Ek achhee kahani ke liye badhai.

Tejendra Sharma
General Secretary
Katha UK (London)

बेनामी ने कहा…

सुधाजी की कहानी पर इतनी सार्थक टिप्पणियां पढ़कर मैं तो अभिभूत हूं। दरअसल एक अच्छे रचनाकार को अपने वक़्त की धड़कन को महसूस करना पड़ता है। सुधाजी ने जिस तरह वैश्विक आर्थिक मंदी की ट्रेजिडी को अपने पात्र मेहता के माध्यम से साकार किया है वह बेहद सराहनीय है। लगातार ऊपर जाता हुआ कहानी का ग्राफ़ भी उनकी अभिव्यक्ति को कलात्मक बना देता है। ऐसी सुंदर कहानी की प्रस्तुति के लिए बधाई।

देवमणि पाण्डेय, मुम्बई

सुमन कुमार घई ने कहा…

सुधा जी, एक अच्छी कहानी के लिए बधाई! आज के समय की कसौटी पर खरी उतरती हुई – आप्रवासी समाज का सही दर्पण, पारस्परिक मानवीय व्यक्तित्वों का संघात, पात्रों के चरित्र का सहज चित्रण यानि कि कहानी हर पक्ष से सशक्त है। आज जब दुनिया सिमट कर वास्तव में विश्वग्राम का रूप ले चुकी है – भारत का समाज भी इस समस्या से अछूता नहीं रहा है। इस तरह से सट्टा-बाज़ार में लुट जाना तो पुराना विषय है परन्तु कथानकों की विविधताओं की भी तो सीमा है। कहानी को नयापन उसकी अभिव्यक्ति और भाषा देती है — जो कि इस कहानी में है। दिल तो चाह रहा है पूरी समीक्षा लिखूँ पर इसे टिप्पणी तक ही सीमित रखते हुए पुनः सुधा जी ऐसा ही यहाँ (उत्तरी अमेरिका) के परिप्रेक्ष्य में साहित्य सृजन करते रहिए।

सुमन कुमार घई
www.sahityakunj.net

आनंदकृष्ण ने कहा…

"एग्जिट" एक समर्थ, संवेदनशील और सार्थक लघुकथा के रूप में पाठक को उसके अंतर्मन तक प्रभावित करने में सक्षम है. इसमें आधुनिक जीवन-शैली के थोथे, विद्रूपित और कृत्रिम चेहरे का बेबाकी से चित्रण कर पाने में आप सफल रही हैं. यह लघुकथा दिखावे के लिए जीने वालों और भौतिकता के पीछे अंधी दौड़ लगाने वालों को आगाह करती है. इस लघुकथा में यातायात की शब्दावली के शब्द "एग्जिट" का बहुत खूबसूरती के साथ प्रयोग हुआ है और उसे एक नया अर्थ भी मिला है. शब्द प्रत्येक रचनाकार से ये अपेक्षा तो रखते ही हैं कि वो रचनाकार उन्हें उपयोग करे, उन्हें नए अर्थ दे और इस प्रकार उन शब्दों की जिंदगी को सार्थक करे. रचनाकार से समाज भी ये अपेक्षा करता है कि वो अपने शब्दों से नए अर्थों का सृजन और भावाभिव्यक्ति करे जिससे समाज को दिशा मिले. जिस साहित्य में जीवन-मूल्यों की संस्थापना और समेकित रूप में जीवन-दर्शन की सार्थक व्याख्या न हो वो साहित्य अपने होने की अर्थवत्ता सिद्ध नहीं कर सकता. इस दृष्टि से "एग्जिट" ने अपने भाषाई, सामाजिक और रचनात्मक प्रतिदर्शों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है.

यह छोटी सी रचना पढ़े जाने के बाद अपनी पीछे एक लम्बी चिंतन यात्रा की संभावनाएं छोड़ जाती है. ऐसी ही और सार्थक रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी...........

यहाँ प्रसंगतः आपको याद दिलाना चाहूंगा कि आधुनिक हिंदी साहित्य में लघुकथा एक नयी विधा के रूप में विकसित हो चुकी है. लघुकथा का स्वरुप कथा और कहानी से बिलकुल भिन्न है. उसका अपना एक अलग व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र है. इस पर विस्तृत चर्चा अगली पाती में.....................


सादर-
आनंदकृष्ण, जबलपुर.
मोबाइल : 09425800818
http://www.hindi-nikash.blogspot.com

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

आनन्द कृष्ण जी,

’एग्जिट’ पर विस्तृत टिप्पणी के लिए धन्यवाद. कई दिन पूर्व मैंने आपसे अनुरोध किया था कि यह कहानी आपको किस आधार पर लघुकथा लगी, कृपया स्पष्टीकरण भेजने की कृपा करेंगे. लेकिन आपने कोई उत्तर नहीं दिया. शायद आपभी जानते हैं कि ’एग्जिट’ लघुकथा की परिधि में नहीं आती. वैसे रचना पर टिप्पणी के लिए पाठक स्वतंत्र है, लेकिन टिप्पणी तर्कपूर्ण होनी चाहिए.

वातायन देखने और टिप्पणी देने के आपका आभार और उन सुहृद पाठकों का भी आभार जिन्होंने उसे पढ़ा और अपने विचारों से अवगत करवाया.

चन्देल

सुभाष नीरव ने कहा…

मैं भाई आनन्द जी की बात से सहमत नहीं हूँ कि सुधा ओम ढींगरा जी की कहानी "एक्ज़िट" कहानीं नहीं, एक लघुकथा है। "एक्ज़िट" एक खूबसूरत कहानी ही है,न कि लघुकथा । मैं चन्देल की बात का समर्थन करता हूँ।

Shardula ने कहा…

जीवन के हाईवे पे कृतिमता से चलते मनुष्य का ऐसा ही एग्जिट होता है ! अच्छी कहानी सुधा जी, बधाई :)