सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

कविता



रंजना श्रीवास्तव की सात कवितायें

1
एक उनींदी भोर

दु:ख उतने नहीं हैं
जितनी कि गहरी हैं
पीड़ाएँ

दृश्यों के संयोजन में
दुखते घावों की जगह
सबसे ऊपर है
हँसी और उल्लास के रंगों में
मुरझा जाने की चिन्ताएँ
शामिल हैं

विवशताओं के कटे पंखों पर
एक आवेगमयी
उड़ान जैसा
प्रकट होता है- सुख
या फिर धूप का
एक टुकड़ा
जो घनी छायाओं के
जंगल में तनिक देर के लिए
उगा हो
अघोषित सत्यों के
संग्रहालय में
स्मृतियों की कब्रों पर
कसमसाता हुआ
सिर धुनता हुआ
अपने होने को
परिभाषित न कर पाने की
पीड़ा से
दु:ख की सामाजिकता से
आहत-मर्माहत सा

एक चमक जिससे
फूटती है रोशनी

एक उनींदी भोर
जिसमें
ठहरे हुए जीवन को
साँसों की धरोहर में
सम्हाल लिया जाए
पूरे एहतियात से।
00

2
अतिक्रमण

ज़रूरी नहीं
विवशताओं में
ठहराव की गुंजाइशें
शत-प्रतिशत हों
दु:ख ठेलता है
अवसाद के
भरते बादलों का
पानी
अंधेरे विवरों में ही
जल उठते हैं
रोशनी के पहाड़
गतियाँ मृत्यु से
जीवन की ओर
दौड़ती हैं लगातार
जकड़नें खोलती हैं
बंधी गाँठों के
जटिल अवरोध

हर मुश्किल का हल
आपके भीतर से
प्रकट होता है
कठिन पीड़ा में ही
जन्म लेता है प्रतिरोध
और चमत्कार की तरह
वक्त की लगाम
आपके हाथ में
दुबारा आ जाती है
दु:ख कितना भी बड़ा हो
समय भर देता है
जख्मों के निशान

परछाइयाँ
आपकी स्मृतियों में
जगह लेकर
जज्ब हो जाती हैं
दृश्यों व बिम्बों के
आन्तरिक कक्षों में

आपके भीतर
एक और पृथ्वी का नक्शा
अपनी मौजूदगी की
शिनाख्त पर
इतरा रहा होता है
आपके भीतर
जन्म ले रहा होता है
एक और शख्स
आपकी तमाम
कमजोरियों पर
अतिक्रमण करता हुआ।
00

3
तुम मिटा सकते हो

आँधियों के सपने नहीं होते
सपनों के मिट जाने की
कथाओं से बनता है
आँधियों का वजूद

हवा के आँधी बनने तक
डूब चुकी होंगी आस्थाएँ
समंदर की तली में
बचा रह गया होगा
थोड़ा-सा नमक
थोड़ी-सी धूप
पृथ्वी के किसी हिस्से में
छटपटा रही होगी

फूल व खुशबू की
किस्मत में लिखा होगा
बेवक्त मर जाना
और खून में
सफ़ेदी का उतरना
आहिस्ता-आहिस्ता
समय के प्राचीन नक्शे में
आँधियों का वजूद
नहीं रहा होगा
जब उम्मीदों के
पत्थरों को रगड़कर
पैदा की गई थी आग
आँधियाँ कहाँ थीं

उस समय
जीवन की अल्हड़ हँसी में
सब के सब शामिल थे
भूख और प्यास के सि
द्धान्तों में
अपने-पराये का
ख्याल तक नहीं था
एक ही आग पर
पकती थीं- रोटियाँ और दु:ख
एक समंदर
सबके बीच लहराता था
और पूरी पृथ्वी गीली हो जाती थी

मेहनत और खुशी की
हमख्याली ने
जीवन की गति को
कितने एहतियात से साधा होगा
कितनी सावधानी से
रचा गया होगा समाज
कोई क्या जानता था
कि मूल्यों और सिद्धान्तों के
हथौड़े से
मनुष्यता को
इस कदर पीटा जाएगा
कि गरम हो जाएगा
ब्रह्मांड

कितनी भावुक थी हवा

जब ईर्ष्या की आग में
नहीं जली थीं कामनाएँ

सोचो !

हवा के भीतर से
उठे बवंडर ने
आँधियों की शक्ल
क्यों अख्तियार की

तुम मिटा सकते हो
पृथ्वी के नक्शे से
इन आँधियों के निशान।
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4
आग चंदन बनती जा रही है

बच्चे खेल रहे हैं
किलकारियाँ गूंज रही हैं
ब्रह्माण्ड में

सुख की सार्थकता के
अनुपम दृश्यों से

गुजर रही है पृथ्वी
बच्चे उछल रहे हैं
पीट रहे हैं तालियाँ
स्तब्ध है आसमान
खुशी से दमक रहा है
उसका चेहरा
बच्चों की मुस्कानों में
खिल रहे हैं फूल
उछालें मार रही हैं
नदियाँ
बादल बरस रहे हैं
मूसलाधार
और आग
चंदन बनती जा रही है
हम सबके दिलों में ।
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5
वह एक उदास घर था

वह एक उदास घर था
वहाँ बच्चे नहीं थे
यूँ सब कुछ था
घर को
घर कहे जाने लायक
बचपन की छलकती
हँसी के बग़ैर
उदास थीं दीवारें
उदास थे फूल
तितलियाँ
आसमान के रंगों से
बच्चों की हँसी ढूँढ़ती थीं

एक उदास संगीत में
डूबे विषाद की
कंपन से
मायूस इस घर में
बच्चों का न होना
उनके होने की मुखरता को
शीर्ष बिन्दु तक पहुँचाकर
छीन लेता था
इस घर से
उसकी खुशियाँ
हँसी की
उदास फुलझरियाँ
अपनी चमक के
फीकेपन पर
हताशा के कोहरे में

क़ैद हो जाती थीं।
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6
समय एक आग का गोला है

तुम्हारी मौलिकता में
एक संवेदनशील
पृथ्वी की भावुकताएँ हैं
मेरी विवशता में
खामोश रातों का
नि:शब्द अकेलापन

यूँ सब कुछ

व्यवस्थित है
इस अव्यवस्था के बीच
जिसके मौन में
हमारी नदी के
टूटते कगारों के
ढहते जाने की आवाज़ें हैं
हम व्यर्थ होते जा रहे हैं
अपनी समर्थताओं के
बावजूद
हमारी उपस्थितियों में
अनुपस्थित है

हमारा वजूद

समय आग का एक गोला है
जिसकी लपटों में
जल रहा है
हमारा वर्तमान

कहाँ है वे नौकाएँ
जिनमें रखीं
चप्पुओं की आवाज़ें
हमें धारा के विपरीत
तैरना सिखाएँगी
गतियाँ थामेंगी
हमारे विषाद की
ठंडी हथेलियाँ
और जीवन बहेगा
कामनाओं की
ख़ामोश नदी में दोबारा
प्राणवायु की तरह।
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7
गतियाँ ठहर जाती हैं

ख़ामोशी के
कितने रंग हैं
जिनमें डूबा है
आकाश
उदास कैनवश पर
उत्तप्त लहरें हैं

मैं अपनी अँजुरी में
उठाती हूँ दु:ख
और सहेज लेती हूँ
गतियाँ ठहर जाती हैं
मेरी पृथ्वी के
नाभिकीय कक्ष में।
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रंजना श्रीवास्तव
शिक्षा : एम ए, बी एड ।
जन्म : गाज़ीपुर(उत्तर प्रदेश)
प्रकाशित पुस्तकें : 'चाहत धूप के टुकड़े की
', 'सक्षम थीं लालटेनें'(कविता संग्रह), 'आईना-ए-रूह'(ग़ज़ल संग्रह)

संपादन : 'सृजन-पथ'(साहित्यिक पत्रिका)
पूर्वांचल की अनेक साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं से संबद्ध। हिन्दी की प्रतिष्ठित लघु पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियाँ, समीक्षाएं एवं स्त्री विषयक लेख प्रकाशित।
सम्मान :
'चाहत धूप के टुकड़े की' कविता संग्रह पर सिलीगुड़ी गौरव सम्मान, उत्तर बंग नाट्य जगत से विशिष्ट कविता लेखन के लिए सम्मानित। हल्का-ए-तामीर-ए-अदब(मऊ आइमा), इलाहाबाद से महती सेवाओं हेतु प्रशस्ति पत्र।

संपर्क : श्रीपल्ली, लेन नंबर 2, पी ओ – सिलीगुड़ी बाज़ार, जिला- सिलीगुड़ी(पश्चिम बंगाल)-734 005
फोन : 09933946886
ई-मेल : ranjananishant@yahoo.co.in

5 टिप्‍पणियां:

Pran Sharma ने कहा…

Rajana Shrivastav kee sab kee sab
kavitayen padh gayaa hoon.Bhaavabh-
ivyakti atee sunder hai.Badhaaee.

सुभाष नीरव ने कहा…

रजना जी की कविताएं इस बात की गवाह हैं कि ब्लॉग्स पर अच्छी रचनाएं भी छपती हैं। रंजना श्रीवास्तव की कविताएं हमारे अपने समय को रेखांकित करती नये भावबोध की बहुत ही सारगर्भित कविताएं हैं। इस बार का "वातायन" चन्देल के आलेख, रंजना जी की कविताओं और डा0सुधाओम ड़ींगरा की कहानी और उनकी सुन्दर प्रस्तुति के कारण बहुत सुन्दर और पठनीय बन पड़ा है।

ashok andrey ने कहा…

APKI BLOG PATRIKA ME RANJNA JEE KI KAVITAYN PADI ACHCHI LAGIN
INN SUNDER PANKTIYON KE LIYA-
MAIN APNI ANJURI MEIN
UTHATI HOON DHUKH
AOUR SAHEJ LETI HOON

MEIN RANJNAJEE KO TATHA APKO BADHAI DETA HOON

ASHOK ANDREY

बेनामी ने कहा…

Vaatayan par Rajana Shrivastava ki kavitayen is baat ki aaswasti deti hain ki kavita abhi mari nahi hai. Jis bhavbodh ki ye kavitayen hain, vah idhar ki kavitaon mein kum hi dekhne ko milta hai. Aisi kavitayeN lagane ke liye bahut bahut badhayee !

योगेंद्र कृष्णा ने कहा…

रंजना श्रीवास्तव की बेहतरीन कविताएं प्रस्तुत करने के लिए मेरी बधाई…