मंगलवार, 12 जून 2012

वातायन-जून,२०१२

हम और हमारा समय

वातायन का यह अंक किन्हीं अपरिहार्य कारणों से कुछ विलंब से प्रस्तुत हो पा रहा है.  यह  अंक विशेषरूप से वरिष्ठ कथाकार,कवि और सम्पादक क़मर मेवाड़ी पर केन्द्रित है. हाल में उनके सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह ’जिजीविषा और अन्य कहानियां’ का लोकार्पण हुआ, जिसकी रपट के साथ संग्रह से उनकी चर्चित कहानी –’ऊंचे कद का आदमी’  और उनकी कथा-यात्रा पर वरिष्ठ आलोचक प्रो. सूरज पालीवाल का आलेख  दिया जा रहा है.

क़मर मेवाड़ी जितने अच्छे कथाकार-कवि हैं उतने ही अच्छे व्यक्ति और सम्पादक भी हैं. ’सम्बोधन’ हिन्दी की एक मात्र ऎसी पत्रिका है जो १९६६ से अनवरत प्रकाशित हो रही है. ’सम्बोधन’ ने कितने ही उल्लेखनीय विशेषांक प्रकाशित कर नये कीर्तिमान स्थापित किए. विपरीत परिस्थितियों में भी क़मर भाई ने सम्बोधन को स्थगित नहीं किया यह साहित्य के प्रति  उनके सरोकारों और समर्पण को उद्घाटित करता है. ऎसे जीवंत साहित्यकार और सम्पादक पर केन्द्रित एक बड़ा अंक प्रकाशित किया जाना चाहिए था, लेकिन वातायन की सीमाओं और ब्लॉगर.कॉम के नवीन परिवर्तनों के कारण मैं अपने पाठकों तक  कुछ सामग्री ही पहुंचा पा रहा हूं.

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’समय और हम’ के अंतर्गत मेरे स्थाई स्तंभ के स्थान  पर प्रस्तुत है ४ जून,२०१२ को दिल्ली में आयोजित अमेरिका निवासी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद के रचना पाठ पर आधारित वरिष्ठ कथाकार-कवि अशोक आन्द्रे द्वारा लिखित  एक बहस-जन्य आलेख.

आशा है अंक आपको पसंद आएगा.

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संगोष्ठी में बहस  

प्रवासी व्यक्ति होता है या साहित्य
(संदर्भ: इला प्रसाद का रचना पाठ)

अशोक आंद्रे


गत 4 जून, 2012 को शाम 6 बजे नई दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित दीवानचन्द ट्रस्ट सभागार में अक्षरम और प्रवासी दुनिया के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय मूल की अमेरिका निवासी कथाकार और कवयित्री इला प्रसाद के रचना पाठ का आयोजन किया गया. घोषित योजनानुसार कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण और संचालन वरिष्ठ कथाकार और कवि बलराम अग्रवाल को करना था, लेकिन किन्हीं अपरिहार्य कारणवश ऋतुपर्ण जी के न पहुंच पाने के कारण अध्यक्षता का भार प्रेमचन्द साहित्य मर्मज्ञ डॉ. कमलकिशोर गोयनका को सौंपा गया और बलराम अग्रवाल ने संचालन का कार्यभार संभालने के लिए वरिष्ठ कवि सुरेश यादव से अनुरोध किया और सुरेश ने बलराम अग्रवाल के अनुरोध का मान रखा. कार्यक्रम में तीस से अधिक साहित्यकार-पत्रकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे.

कार्यक्रम का प्रारंभ इला प्रसाद के हाल ही में दिवंगत पिता डॉ. दिनेश्वर प्रसाद को श्रद्धांजलि दिए जाने के साथ प्रारंभ हुआ. डॉ. गोयनका ने उनके जीवन और कर्म पर प्रकाश डालते हुए उनकी विशेषताओं का उल्लेख किया. उन्होंने डॉ. प्रसाद को हिन्दी का उद्भट विद्वान, अच्छा अनुवादक, कर्मठ प्राध्यापक  और हिन्दी नाटक मर्मज्ञ बताते हुए कहा कि घर-घर पाये जाने वाले फादर कामिल बुल्के के अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश को तैयार करने में डॉ. प्रसाद की अहम भूमिका थी और फादर की मृत्यु के पश्चात भी वह उसे निरंतर अपडेट करते रहे थे.  रचना पाठ से पूर्व संचालक सुरेश यादव ने इला प्रसाद का संक्षिप्त परिचय दिया और उनसे अनुरोध किया कि वह कम से कम अपनी दो कहानियों के पाठ के पश्चात कुछ कविताएं भी पढ़ेंगी.

 इला प्रसाद ने अपनी दो बहुचर्चित कहानियां ‘उस स्त्री का नाम’ और मेज’ का पाठ किया. कहानियों की समाप्ति के पश्चात सुरेश यादव ने इला प्रसाद से कविताएं सुनाने का अनुरोध किया, लेकिन तभी कार्यक्रम के संयोजक अनिल जोशी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि कहानियों पर चर्चा के पश्चात इला जी का कविता पाठ उचित होगा. लेकिन अपने इस हस्तक्षेप के बाद ही सभी को आश्चर्यचकित करते हुए अनिल जोशी ने सुरेश यादव को दरकिनार करते हुए स्वयंमेव संचालन कार्य प्रारंभ कर दिया. इस अप्रिय स्थिति में सुरेश यादव ने बहुत ही शालीनता का परिचय दिया.

अनिल जोशी ने इला प्रसाद की कहानियों पर बोलने के लिए सर्वप्रथम वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल को आमंत्रित किया. डॉ.चन्देल ने एक वाक्य में इला प्रसाद की कहानियों की विशेषताएं बतायीं, लेकिन संयोजक और अब संचालक अनिल जोशी इससे संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने चन्देल जी से अनुरोध किया कि वह इला प्रसाद के कहानी संग्रह ‘उस स्त्री का नाम’ में लिखी अपनी भूमिका लोगों के लिए पढ़ दें. चन्देल जी ने उसे पढ़ा. उसके पश्चात वरिष्ठ कथाकार सुभाष नीरव को बोलने के लिए कहा गया. नीरव ने विस्तार से इला प्रसाद की कहानियों की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने संग्रह की सभी कहानियां पढ़ीं हैं और उस पर समीक्षा भी लिखा है जो वागर्थ के अप्रैल,२०२ अंक में प्रकाशित हुई थी. ’उस स्त्री का नाम’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बदली हुई भौगोलिक स्थितियों में भी यह कहानी इसी रूप में होनी थी. उन्होंने कहा कि भौगोलिक स्थितियों से उनका आभिप्राय अमेरिका और भारत से है. ’मेज’ कहानी के विषय में उनका कहना था कि घर की बेकार हो चुकी मेज को जिस प्रकार लेखिका ने पक्षियों की डायनिगं टेबल में परिवर्तित किया वह न केवल उनके कथाकार की विशेषता को स्पष्ट करता है बल्कि समकालीन कथा परिदृश्य में, जब बहुत ही अपठनीय कहानियां लिखी जा रही हैं, इस कहानी को अप्रतिम बना देता है.

   बलराम अग्रवाल ने कहानियों की विशिष्टता पर संक्षिप्त वक्तव्य देते हुए कहा कि उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि उन्होंने कथाकार इला प्रसाद को पहले जाना और उनके पिता को बाद में. इस विषय में उन्होंने खलील जिब्रान की एक सूक्ति का भी उल्लेख किया. सुरेश यादव को छोड़कर वहां उपस्थित लगभग सभी  लोगों को अनिल जोशी ने कहानियों पर बोलने के लिए आमंत्रित किया. सभी ने इला प्रसाद की कहानियों की प्रशंसा की और उन्हें प्रवासी साहित्यकारों में उल्लेखनीय रचनाकार स्वीकार किया.

डॉ. कमलकिशोर गोयनका ने अपना अध्यक्षीय वक्तव्य प्रवासी साहित्य की अपनी अवधारणा की स्थापना से प्रांरभ किया.  डॉ.चन्देल ने संयोजक-संचालक अनिल जोशी से अध्यक्षीय भाषण समाप्त होने के पश्चात उस विषय में अपनी बात कहने के लिए दो मिनट वक्त की मांग की. डॉ. गोयनका ने कहा कि प्रवासी’ शब्द बहुत पुराना है और उसी से प्रवासी साहित्य का जन्म हुआ है. अब दुनिया की कोई ताकत प्रवासियों द्वारा लिखे जा रहे साहित्य को प्रवासी साहित्य’ कहे जाने से रोक नहीं सकती. उन्होंने आगे कहा कि,  “मेरे द्वारा सम्पादित एक पत्रिका के प्रवासी साहित्य’ विशेषांक में प्रकाशित होने से जब इला प्रसाद ने इंकार किया, क्योंकि वह अपने साहित्य के लिए प्रवासी साहित्य कहा जाना उचित नहीं मानती, तब मेरे मन में इला प्रसाद के प्रति सम्मानभाव बढ़ गया. मैंने सोचा कि कोई तो है जो अपने सिद्धान्त पर अटल है.”  अपनी बात को विस्तार देते हुए डॉ. गोयनका ने  कहा, “इसीलिए मैं इला प्रसाद के साहित्य को हिन्दी साहित्य मानता हूं –प्रवासी साहित्य’ नहीं . मैं उषा प्रियंवदा के साहित्य को भी प्रवासी साहित्य’ नहीं मानता.”  उन्होंने इला प्रसाद की कहानियों की प्रशंसा की और उन्हें एक सशक्त कथाकार कहा.

डॉ. गोयनका का वक्तव्य समाप्त होते ही डॉ. चन्देल ने जब अपनी बात कहनी चाही तब उन्हें रोकते हुए अनिल जोशी ने अपना वक्तव्य जारी कर दिया और कुछ लोग यह कहने लगे कि डॉ. चन्देल अपनी बात बाहर निकलकर कहें. एक बार तो ऎसा लगा कि यह सब किसी षडयंत्र के तहत किया जा रहा था. अंततः डॉ. चन्देल ने बुलंद आवाज में अपनी बात कहनी प्रारंभ कर दी. उन्होंने कहा कि डॉ. गोयनका की इस बात से वह सहमत हैं कि प्रवासी’ शब्द बहुत पुराना है, लेकिन प्रवासी साहित्य’ शब्द कब आविर्भूत हुआयह वह जानना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि अपनी युवावस्था में अभिन्यु अनत के उपन्यासों और कहानियों को साप्ताहिक हिन्दुस्तान,सारिका और धर्मयुग आदि  में वह हिन्दी साहित्य के रूप में पढ़ते रहे हैं. चंद वर्षों से ही उनके साहित्य को प्रवासी साहित्य कहा जाने लगा जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है. डॉ. चन्देल ने कहा, “व्यक्ति प्रवासी होता है उसके द्वारा रचित साहित्य नहीं.”  उन्होंने प्रश्न किया कि क्या दुनिया की किसी अन्य भाषा में रचित साहित्य के लिए यह शब्द प्रचलित है? उन्होंने डॉ. गोयनका के वक्तव्य के विरोधाभास की ओर संकेत करते हुए कहा कि उन्होंने अभी कहा कि इला प्रसाद  और उषा प्रियंवदा के साहित्य को वह प्रवासी साहित्य’ नहीं कहते; तब वह दूसरे प्रवासी रचनाकारों के साहित्य को किस आधार पर प्रवासी साहित्य कह रहे हैं. डॉ. चन्देल ने कहा कि यह विशुद्ध बाजारवाद है और कुछ लोग प्रवासी साहित्य’  के नाम पर दुकानदारी कर रहे हैं.

डॉ. चन्देल के पश्चात अनिल जोशी ने इला प्रसाद की कहानियों की चर्चा की. उन्होंने प्रवासी साहित्य’ पर अपना मत व्यक्त करते हुए डॉ. गोयनका के मत का समर्थन किया और कहा कि अब इस शब्द को कोई खारिज नहीं कर सकता. उन्होंने कहा कि प्रवासी साहित्य’ के कुछ पैरामीटर्स हैं. लेकिन वे क्या हैं यह उन्होंने बताना उचित नहीं समझा. गोयनका जी की ही भांति उन्होंने भी कहा कि प्रवासी’ शब्द बहुत पुराना है.

प्रवासी’ और प्रवासी साहित्य’ के इस घालमेल के अतिरिक्त शायद कोई ठोस तर्क न गोयनका के पास था और न ही उनके समर्थक अनिल जोशी के पास. मेरा मानना है कि सुधी साहित्य चिंतकों को इस बहस में उतरने का यह उपयुक्त अवसर है कि विदेश में प्रवास कर रहे किसी रचनाकार की किसी रचना को प्रवासी साहित्य के खाते में आखिर किस आधार पर डाला जाए और क्यों? जैसा कि अनिल जोशी ने कहा—‘प्रवासी साहित्य के कुछ पैरामीटर्स हैं तो स्पष्ट किया जाए कि वे पैरामीटर्स क्या हैं, उन्हें किसी एक (या कुछेक) व्यक्ति या संस्था ने किन्हीं व्यावसायिक निहित अर्थों के तहत तैयार किया है या वे समय की आग में तपकर स्वयं तैयार हुए हैं?

कार्यक्रम का अंत इला प्रसाद के कविता पाठ से हुआ.

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अशोक आंद्रे
मो. ०९८६८१६२५४४
      ०९८१८९६७६३२

10 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

प्रिय रूप जी ,
मेरी यह टिप्पणी वातायन पर लगा दीजिये क्योंकि मुझे वहाँ हिंदी में
लिखने की दिक्कत आ रही है .
प्रवासी व्यक्ति होता है , साहित्य , भाषा , धर्म और संस्कृति नहीं .
आज कुछ लोग विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य पर ` प्रवासी ` शब्द का
ठप्पा लगा रहे हैं , मुझे आशंका है कि कल वे ही हिंदु धर्म और संस्कृति को ` प्रवासी
हिंदु धर्म और ` प्रवासी हिंदु संस्कृति ` कहना शुरु कर देंगे .
रवींद्र कालिया जालंधर के निवासी हैं . दिल्ली के प्रवासकाल में उन्होंने
कई रचनाओं का सृजन किया है . उनके लेखन पर ` प्रवासी ` का ठप्पा क्यों नहीं
लगाया जाता है ? सत्येन्द्र श्रीवास्तव बनारस के हैं . लन्दन के प्रवासकाल में
उन्होंने कई रचनाओं का सृजन किया है . उनके लेखन पर ` प्रवासी ` का ठप्पा क्यों
लगाया जाता है ? बड़ी अजीब बात है !
यहाँ मेरे एक पंजाबी लेखक मित्र ने एक दिन मुझसे पूछा - ` सुना है
कि विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य को ` प्रवासी हिंदी साहित्य ` कहा जाता है
अब ? मुझे स्वीकार करना पड़ा . वे झट बोले - ` हो जाये कोई प्रवासी ग़ज़ल .`
ग़ज़ल के साथ मुझे ` प्रवासी ` शब्द का उपयोग बड़ा हास्यास्पद लगा .
मैं कमल किशोर गोयनका का मान करता हूँ लेकिन उनसे निवेदन है
कि विदेशों में रचे जा रहे हिंदी साहित्य को प्रवासी या आदिवासी का नाम नहीं दें और
मेरी इन काव्य - पक्तियों पर गौर फरमाएँ -

कविता - कथा को तुमने प्रवासी बना दिया
मुझको लगा कि ज्यों उन्हें दासी बना दिया
ये लफ्ज़ किसी और अदब में कहीं नहीं
उसका नहीं है आसमां , उसकी ज़मीं नहीं
मुझको हमेशा कह लो प्रवासी भले ही तुम
कविता को या कथा को प्रवासी नहीं कहो

प्राण शर्मा

सुरेश यादव ने कहा…

अशोक आंद्रे जी ने सटीक शब्दों में उस गोष्ठी की रिपोर्ट प्रस्तुत की है और प्रवासी साहित्य के सन्दर्भ में सार्थक बहस को जन्म दिया .साहित्य कभी प्रवासी नहीं हो सकता है ,जैसे --हवा ,धूप,आकाश ,विचार ,भाव आदि प्रवासी नहीं होते हैं .रूप सिंह चंदेल जी ने इस बात को बहुत ही जोर देकर और गंभीरता से कहा --साहित्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का उनका सघन प्रयास था .हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य है कि यहाँ जोड़ तोड़ का बाज़ार गरम है और अच्छा साहित्य चर्चा से बाहर है

जनविजय ने कहा…

मैं हिन्दी में लिखता हूँ, इसलिए मेरी रचनाएँ हिन्दी साहित्य की प्रतिनिधि हैं, तथाकथित प्रवासी साहित्य की नहीं। हमें प्रवासी बताकर हमें हिन्दी साहित्य से काटने वाले लोगों का मैं विरोध करता हूँ। मैंने सिर्फ़ एक बार साहित्य अकादमी के ’प्रवासी मंच’ से भाषण दिया था। वह भी इसलिए कि मुझे शुरू से यह नहीं मालूम था कि मेरी प्रस्तुति का आयोजन ’प्रवासी मंच’ के अन्तर्गत किया जा रहा है। जब कार्यक्रम में भाग लेने के लिए हॉल में पहुँचा, तभी पता लगा।
इसके अतिरिक्त कभी भी मैंने प्रवासी साहित्यकार के रूप में कहीं भी, किसी भी गोष्ठी या सम्मेलन में भाग नहीं लिया। मुझे यह प्रवासी का ठप्पा नहीं चाहिए।

Ila ने कहा…

मुझे तो इस सारे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण और मजेदार भी- गोयनका जी का यह कथन लगा - "आज मैं इला प्रसाद का अभिनंदन हिन्दी साहित्यकार के रूप में करता हूँ न कि प्रवासी साहित्यकार के रूप में। इला प्रसाद का साहित्य हिन्दी का साहित्य है, प्रवासी साहित्य नहीं।"
किसी ने गोयनका जी से यह नही पूछा-( मेरी तो आवाज ही नहीं पहुँच रही थी उन तक- पहुँचती भी तो किसी को सुन कहाँ रहे थे वे..) कि प्रवासी साहित्य अगर हिन्दी साहित्य नहीं है तो किस भाषा का साहित्य है? साहित्य तो किसी भाषा का होता है न?
इला प्रसाद का साहित्य हिन्दी साहित्य है , और बाकियों का? प्रवासी साहित्य हिन्दी साहित्य नही है उनके अनुसार तो फ़िर क्या है वह ? क्या वह साहित्य नहीं है? क्या वे यह कहना चाहते थे कि प्रवासी साहित्य हिन्दी की मुख्य धारा का साहित्य होने के लायक नहीं है इसलिये उसे अलग खाने में रखते हैं वह और अमेरिका से केवल इला प्रसाद एवं उषा प्रियंवदा का साहित्य ही, मुख्य धारा में आने के लायक है।
यह अन्तर्ध्वनि बाकी, विदेशों में बैठे रचनाकारों को, पचेगी क्या? और क्यों पचे , बहुत सारे अच्छा लेखन करनेवाले अमेरिका में भी हैं।
गोयनका जी की प्रवासी साहित्य की दूकान के कारण कई अयोग्य और कचरा लेखन करनेवाले भी नामांकित हो गये हैं इसलिये भी गोयनका जी को शायद प्रवासी साहित्य नामक वर्गीकरण करना पड़ा है जिसका घाटा अच्छे लेखकों को हो रहा है | वे जब तक इसको लेकर गंभीर नहीं होंगे, प्रवासी साहित्य के अंतर्गत छपने से मना नहीं करेंगे , यह होता रहेगा | अनिल जनविजय जी का कहना सही है , अनजाने में भी हम कई बार ऐसे मंचों पर पहुँच जाते हैं , ऐसे लेबल के साथ छाप दिए जाते हैं | मेरे साथ तो यह कई बार हो चुका अलग अलग पत्रिकाओं में | किन्तु मेरा विरोध जारी है |
सादर
इला

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

फरवरी,२०११ के ’वातायन’ के स्थायी स्तंभ ’हम और हमारा समय’ के अंतर्गत मेरे आलेख ’हिन्दी साहित्य बनाम प्रवासी हिन्दी साहित्य’ के प्रकाशित होने के बाद एक दिन रात नौ बजे आदरणीय डॉ. कमलकिशोर गोयनका जी का फोन आया. उन्होंने अमेरिका की लेखिका और कवयित्री सुधा ओम ढींगरा का हवाला देते हुए कहा कि उनके कहने पर उन्होंने वातायन में मेरा आलेख पढ़ा और वह उससे कतई सहमत नहीं हैं. लंबी बातचीत हुई…लगभग एक घण्टा हुई बातचीत में उनका वही तर्क था जो उन्होंने ४ जून,२०१२ को इला प्रसाद के रचना पाठ के बाद अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा. दोनों ही अवसरों पर मेरे इस तर्क का कि व्यक्ति प्रवासी होता है साहित्य नहीं क्योंकि साहित्य भाषा का होता है और किसी भी भाषा में दुनिया के किसी भी देश में बैठकर लिखा जाने वाला साहित्य उस भाषा का साहित्य होता है (यहां तसलीमा नसरीन का उदाहरण पर्याप्त है). मेरे इस तर्क के उत्तर में डॉ. गोयनका जी के पास रटा-रटाया एक ही उत्तर था कि ’प्रवासी’ शब्द बहुत पुराना. कोई ठोस तर्क उनके पास न तब था और न ही ४ जून,२०१२ को वह दे पाए.

यह एक गंभीर विषय है, जिसे केवल यह कहकर कि ’प्रवासी’ शब्द बहुत पुराना है और इसलिए प्रवासी रचनाकारों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य ’प्रवासी साहित्य’ है, निबटाया नहीं जा सकता. इसके तह में जाने की आवश्यकता है. क्या कारण है कि कल तक अभिनन्यु अनत का साहित्य हिन्दी साहित्य था, लेकिन अचानक कुछ वर्षों से उनके साहित्य को ’प्रवासी साहित्य’ कहा जाने लगा. यह एक गहरी साजिश के तहत किया जा रहा है, जिसका सीधा संबन्ध अर्थतंत्र से है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनत जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति के हिन्दी साहित्य को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा रहा है. लेकिन यह अकारण नहीं हो रहा. इसके पीछे बाजारवादी संस्कृति है और है प्रतिभाहीन लोगों के कूड़ा-कचरा साहित्य को महिमामंडित करने का उद्देश्य.

सूत्रों पर विश्वास करें तो कुछ लोग कूड़ा-कचरा लिखने वाले प्रवासी रचनाकारों से लाखों रुपए लेकर उनके साहित्य को ’प्रवासी साहित्य’ के खांचे में डालकर उनके साहित्यकार होने के अहं को संतुष्ट कर रहे हैं. लेकिन इस साजिश का शिकार अभिमन्यु अनत जैसे रचनाकार भी हो रहे हैं और अन्य प्रतिभाशाली प्रवासी रचनाकार भी.

फरवरी,२०११ में डॉ. गोयनका जी के फोन से आश्चर्य नहीं हुआ था. सोचा था कि यह उनका अपना मत है, लेकिन बाद में जिस प्रकार ’प्रवासी साहित्य’ शब्द को स्थापित करने के लिए एक अभियान के रूप में उन्हें सक्रिय देखा/जाना उसने सोचने के लिए विवश किया. मात्र यह प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है कि उनके विचार को चुनौती मिल रही है अतः उनका अभियान इसलिए है. उससे आगे बात कहीं बहुत कुछ गंभीर है.

यह सर्वविदित है कि डॉ. गोयनका जी का संबन्ध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से है और वह स्वयं अपने को भाजपाई स्वीकार करते हैं. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी अपने को राष्ट्रवादी और साहित्य,संस्कृति और कला का सरंक्षक घोषित करते हैं. भाषा इन तीनों की संवाहिका होती है और उस भाषा के साथ ऎसा दुर्व्यहार और वह भी उस व्यक्ति द्वारा जो इनके संरक्षक कहने वाली संस्थाओं से अपने को जुड़ा हुआ कहता है---यह बेहद तकलीफदेह और दुखद आश्चर्य की बात है. आज जब तमिलनाडु में पुनः हिन्दी विरोधी माहौल तैयार होने लगा है तब हिन्दी वाले ही हिन्दी के विरुद्ध वातावरण तैयार करें इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा. मुझे यह आश्चर्य भी हो रहा है कि डॉ. गोयनका ही क्यों ’प्रवासी साहित्य’ के पक्ष में झंडा उठाए घूम रहे हैं. डॉ. गोयनका जी ने एक स्थान में लिखा कि प्रवासी रचनाकार ’प्रवासी साहित्य’ शब्द का विरोध भी करते हैं और उनके द्वारा संपादित किसी पत्रिका के ’प्रवासी साहित्य’ विशेषांक में प्रकाशित भी होना चाहते हैं. चौंकाने वाला तथ्य है और ’प्रवासी साहित्य’ शब्द का विरोध करने वालों को इस अपमानजनक स्थिति से बचना चाहिए.

अंत में केवल इतना ही कि ईमानदार प्रवासी रचनाकारों को ’प्रवासी साहित्य’ के नाम पर चल रही दुकानदारी को समझना चाहिए और इससे उत्पन्न होने वाली अपमानजनक स्थिति से बचना चाहिए. एक बात ध्यातव्य है कि अंततः रचनाकार की रचना ही जीवित रहती है और यदि किसी को अपने शब्दों पर विश्वास और आस्था नहीं तो उसे लेखन से बाहर हो जाना चाहिए. ’प्रवासी साहित्य’ के बैनर के नीचे वह कितने दिनों जिन्दा रह सकेगा? अतः उसे इसकी दुकानदारी करने वालों के हित-साधन होने से बचते हुए अपने साहित्य (हिन्दी साहित्य) को साधने का प्रयास करना चाहिए.

रूपसिंह चन्देल
०९८१०८३०९५७
०९८११३६५८०९
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बेनामी ने कहा…

प्रिय रूप जी ,
अभी - अभी कमल किशोर गोयनका के नाम खुला पत्र आपको
भेजा है . कृपया वातायन पर लगा दीजिये . अन्यत्र भी भेजिएगा . आपके
तर्क से हम सब सहमत हैं .
शुभ कामनाओं के साथ ,


कमल किशोर गोयनका के नाम खुला पत्र
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प्रिय कमल किशोर गोयनका जी ,
कहानी , उपन्यास , कविता , लेख अंग्रेज़ी , हिंदी , उर्दू , मराठी ,
या पंजाबी के तो होते हैं लेकिन ` प्रवासी ` नहीं . भारत में रह कर मार्क तूली और
कई अँगरेज़ अंग्रेज़ी में साहित्य सृजन करते हैं लेकिन कोई उनके साहित्य पर ` प्रवासी `
का ठप्पा नहीं लगाता है . मुझे हैरत होती है जब आप विदेशों में स्थायी रूप से रह रहे
हिंदी साहित्यकारों के हिंदी लेखन पर प्रवासी का ठप्पा लगाते हैं . आपके ज्ञान के लिए
एक बात बताता हूँ कि हमारा हिंदी साहित्य तब प्रवासी साहित्य कहलाये जब हम प्रवासी
रहे हों . अब तो सब विदेशों में नागरिक हैं , स्थायी नागरिक . भारत जाने के लिए सबको
वीजा लेना पड़ता है . एक बात और . आप पक्के हिंदु हैं . हिंदु तो सारे विश्व को कुटुंब
मानता है . वह विभाजन में विश्वास नहीं रखता है . लेकिन आप तो साहित्य में विभाजन
करने पर तुले हुए हैं . बेहतर होगा कि साहित्य को साहित्य ही कहें आप .
प्राण शर्मा
PRAN SHARMA

4:42 PM (6 hours ago)

बेनामी ने कहा…

मैं प्रवासी साहित्य नामक ‘ब्रांड’ के आविष्कारकों और उसे पेटेंट करवाकर भारतीय साहित्य के बाजार में बेचने वालों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वे देसी (भारतीय) हिन्दी साहित्य और विदेशों में रचित साहित्य का तात्त्विक अन्तर बता सकते हैं ? क्या वे इस तथाकथित प्रवासी साहित्य को उसकी भाषा, शैली-शिल्प, विधा, संस्कार और पठनीयता में देसी हिन्दी साहित्य से अलग करके पहचान सकते हैं ? अगर नहीं, तो वे अपने मनमाने लेबलों से क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? क्या इसपर चर्चा करके वे कोई अहसान कर रहे हैं या अपनी दुकानदारी बढ़ा रहे हैं ? मेरा उनसे विनम्र निवेदन है कि या तो वे ‘प्रवासी साहित्य’ नामक साहित्य के मूल तत्त्व और विशेषताएँ गिनायें और उसके मूल्यांकन के मानदंड निर्धारित करें या उसे हिन्दी साहित्य का अंग मानकर मनमानी फ़तवेबाज़ी से परहेज़ करें ।

सप्रेम

गौतम सचदेव

ashok andrey ने कहा…

मेरे लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि वातायन में प्रकाशित मेरी रपट (प्रवासी व्यक्ति होता है या साहित्य) से एक सार्थक बहस प्रारंभ हुई लेकिन कुछ मित्र रपट में उठाए गए मुख्य मुद्दे से भटकते प्रतीत हो रहे हैं बल्कि यह कहूंगा कि इसे भटकाने का प्रयास कर रहे हैं. ’प्रवासी साहित्य’ शब्द पर सार्वजनिक रूप से गर्मागर्म बहस न छिड़ती यदि ४ जून को इला प्रसाद का रचनापाठ न हुआ होता. मैंने बेहद ईमानदारी से रपट तैयार की, जिसमें कुछ भी ऎसा नहीं लिखा गया जो वहां घटित नहीं हुआ. यह एक अच्छा कार्यक्रम था, लेकिन उसमें जो अनियमिताएं हुईं उसका उल्लेख यदि न किया जाता तो रपट अधूरी रहती. कार्यक्रम का अंत जिस बहस से हुआ चर्चा उस पर होनी चाहिए न कि सतहीपन का परिचय देते हुए अवमानित भाषा में यह जानने की कोशिश की जाए कि कार्यक्रम क्यों और कैसे आयोजित हुआ. मैं एक बार पुनः रपट के उस विषय की ओर आपका ध्यान केन्द्रित कर ’प्रवासी साहित्य’ शब्द की बहस को आगे बढ़ाने का आह्वान करता हूं.



अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए डा.गोयनका स्वयं ही भ्रमित थे और दो तरह से अपनी बात रख रहे थे. एक ओर वह इला प्रसाद तथा उषा प्रियवंदा

जी के साहित्य को हिंदी साहित्य के रूप में उद्घोषित कर रहे थे तथा दूसरी और अन्य प्रवासी साहित्यकारों

के साहित्य को प्रवासी साहित्य की श्रेणी में रखने के लिए अडिग थे और विषय की सारगर्भिता से परे ’प्रवासी’ और ’प्रवासी साहित्य’ शब्दों का घालमेल कर रहे थे. उसी दौरान एक नए शब्द

’पैरामीटर्स’ (प्रवासी साहित्य के संदर्भ में) को अन्वेषित किया जा रहा था. उस पैरामीटर्स का आधार क्या है इस पर इसके अन्वेषक खामोश थे. पूछने जाने पर भी चुप थे. कोई उत्तर ने देकर वे

एक दूसरे के चेहरों की ओर बस देखे जा रहे थे.



मैं जानना चाहता हूं कि मौसम परिवर्तन के समय बहुत से पक्षी दूसरे देशों

में प्रवास करने पहुंते हैं. भारत में भी कितने ही देशों के पक्षी आते हैं. प्रवासी देश में उनके क्रियाकलाप ’प्रवासी क्रियाकलाप’ और उनकी चहचआहट ’प्रवासी चहचआहट’ हो जाती है?



दूसरी ओर कई देशों के लेखक व पत्रकार दूसरे देशों में प्रवास के दौरान अपनी भाषा में साहित्य सृजन

करते हैं, उन्हें उनके भाषा के लोग तो कभी प्रवासी सहित्य/ रिपोर्टिंग की तरह चिन्हित नहीं करते हैं

तो फिर हिंदी साहित्य में ऐसा क्यूँ ?



और, यही असली मुद्दा था जो उस गोष्ठी के दौरान बड़ी शिद्दत के साथ उपस्थित हुआ तथा बहस का मुद्दा

बन गया जबकि किसी व्यक्ति विशेष पर कोई आक्षेप नहीं था. अतः मेरा अनुरोध है कि लोग स्वस्थ मन से वैयक्तिक आक्षेप/आरोप से ऊपर उठकर इस मुद्दे पर सार्थक बहस करें ताकि उसे उसके वास्तविक रूप में व्याख्यायित किया जा सके.



अशोक आंद्रे :०९८६८१६२५४४

बेनामी ने कहा…

प्रिय रूप चंदेल जी,
नमस्कार! आपसे अनुरोध है कि ४ जून के दिन इला प्रसाद जी के कहानी पाठ के समय प्रवासी साहित्यकारों की रचनाओं को लेकर जो विवाद हुआ था, उस सम्बन्ध में मेरी टिप्पणी को भी 'वातायन blogspot ' में लगाने में मेरी सहायता करें क्योंकि किन्हीं कारणों से मैं उस वेबसाइट को दोबारा खोलने में असमर्थ हूँ हालांकि अशोक आंद्रे जी की रपट मैं ने पढ़ ली थी.

इस विषय में मैं अपने विचार पहले भी प्रकट कर चुका हूँ और इ.मेल द्वारा मेरी इला प्रसाद जी से भी बातचीत होती रही है. मेरी समझ में प्रवासी साहित्यकारों की कृतियों को 'प्रवासी साहित्य' का नाम दे देना एक घृणित षड्यंत्र है. यह केवल दुकानदारी नहीं है अपितु साहित्यकारों में एक नया 'दलित' वर्ग बनाने का दुष्प्रयास है. कमल किशोर गोयनका जी कुछ तो बताएं कि इस नए वर्गीकरण की आवश्यकता क्या है? विश्व के बहुत से साहित्यकारों ने अपने देश से बाहर जाकर बहुत कुछ लिखा है. बायरन, शैली, किप्लिंग, पर्ल बक, अर्नेस्ट हेमिंग्वे - कुछ उदाहरण हैं. उन्हें तो कोई प्रवासी साहित्यकार नहीं कहता. गोयनका जी, आप बतलायें कि साहित्य कला या कोई भी कला कब से भूगौलिक सीमाओं, रेखाओं में बंधने लगी है? आज तक तो हम यही सुनते आये थे कि कला पर किसी एक देश या जाति का एकाधिकार नहीं होता. यह पूरे विश्व की निधि होती है.

हम प्रवासी ही सही किन्तु भारत में यह जो आदत है कि हर स्थिति में, हर क्षेत्र में पोलिटिक्स में घुसेड़ना, अपने किसी मतलब के लिए नए नए गुट बनाना, बंटवारा करना, इस से हमें कब मुक्ति मिलेगी? यदि तुम अपने साहित्य और साहित्यकारों को छोटी छोटी टुकड़ियों में बाँटते रहोगे, तो किस मुंह से संयुक्त राष्ट्र में यह मांग करोगे कि हिंदी को UNO की स्वीकृत भाषाओं में सम्मिलित किया जाए?
भारत में स्थित और प्रवासी हिंदी साहित्यकारों से मेरी अपील है कि कमल किशोर गोयनका और उनके सहचरों के इस अभियान का कड़ा विरोध करें.

महेंद्र दवेसर 'दीपक'

बेनामी ने कहा…

मेरे पास एक विवाह के निमंत्रण-पत्र में निम्न पंक्तियाँ थी -
" भरोसा अब भी मौजूद है ,नमक की तरह ----
अब भी ,
पेड़ के भरोसे पक्षी सब कुछ छोड़ जातें हैं ,
वसंत के भरोसे वृक्ष बिलकुल रीत जाते हैं ,
पतवारों के भरोसे नाव समुद्र लांघ जाती है ,
बरसात के भरोसे बीज धरती में समां जाते हैं ,

अनजान पुरुष के साथ स्त्री चल देती है सदा के लिए ,
भरोसा अब भी मौजूद है ,नमक की तरह --- "

निमंत्रण-पत्र मुझे कुछ असाधारण लगा ,मेरे पास संग्रह में है |
इन पंक्तियों के रचनाकार हैं -पवन करण
पवन जी मेरे लिए एक रचनाकार हैं ,मैं भी एक सजग पाठक
हूं ,गिरोहों का सख्त विरोधी हूं फिर वो कोई भी हो ,और आगे ,
श्लीलता/अश्लीलता केवल और केवल स्वयं के मन का दर्पण भर है |
सादर ,
महिपाल , २ ४ / ६ / २० १२