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सोमवार, 10 अगस्त 2009

जीवनीपरक आलेख

किसानों के हमदर्द लेखक : लियो तोल्स्तॉय
रूपसिंह चन्देल
‘युद्ध और शांति’, ‘अन्ना कारेनिना’, ‘पुनरुत्थान’, और ‘हाजी मुराद’ उपन्यास, तीन आत्मकथात्मक उपन्यास – ‘बचपन’, ‘किशोरावस्था’, और ‘कज्ज़ाक’, ‘फ़ादर सेर्गेई’, ‘इवान इल्यीच की मृत्यु’, ‘क्रुट्ज़र सोनाटा’ (लंबी कहानी), ‘घोड़े की कहानी’, ‘बाल नृत्य के बाद’ आदि कहानियाँ, ‘अंधकार की सत्ता’ तथा ‘जीवित शव’ नाटक सहित लगभग पचीस कृतियों के लेखक, चिन्तक, विचारक, दार्शनिक, शांतिवादी और शैक्षिक सुधारक लियो निकोलएविच तोल्स्तॉय का जन्म कास्को से दो सौ किलोमीटर दूर तूला नगर के यास्नाया पोल्याना नामक जागीर में एक समृद्ध तथा उच्च कुलीन परिवार में 28 अगस्त (नये कलेंडर के अनुसार 9 सितम्बर) 1828 को हुआ था। उनके पिता का नाम निकोलई इल्यिच ताल्स्तॉय और मॉं का नाम मारिया निकोनिकोलएव्ना था। उनकी मॉं प्रतिष्ठित वोल्कोन्स्की परिवार से थीं और महाकवि पुश्किन की दूर की रिश्तेदार थीं। लियो तोल्स्तॉय जब दो वर्ष के थे, उनकी मॉं की मृत्यु हो गयी थी।बच्चों की शिक्षा के उद्देश्य से निकोलई इल्यिच तोल्स्तॉय ने मास्को जाने का निर्णय किया। 10 जनवरी, 1837 को यास्नाया पोल्याना से उनकी यात्रा सात स्लेजों में प्रारंभ हुई, जिन्हें उनके अपने और किराये के घोड़े खींच रहे थे। लियो की वृद्धा दादी एक अलग स्लेज में थीं। मास्को में प्ल्यू्श्चिखा में शेर्बाचेव का मकान किराये पर लिया गया, जहॉं वे अठारह महीनों तक रहे थे। निकोलई ने बच्चों की शिक्षा के लिए फ्योदोर एवानोविच नामक शिक्षक नियुक्त किया था। लेकिन इन्हीं दिनों एक दुर्घटना घटी थी। एक सम्पत्ति विवाद के सिलसिले में निकोलई इल्यिच तोल्स्तॉय को अकस्मात तूला जाना पड़ा था। 19 जून, 1837 को उन्होनें
(पत्नी सोफिया के साथ तोल्स्तोय)
मत्यूशा नामक शिकारी, जो उनका नौकर भी था, के साथ तूला के लिए प्रस्थान किया और 24 घंटों से भी कम समय में लंबी यात्रा तय कर 21 जून को वह वहां पहुंचे थे। वह किसी से मिलने जा रहे थे कि रास्ते में गिर गये थे और उनकी मृत्यु हो गयी थी। 25 मई, 1838 को लियो तोल्स्तॉय की दादी प्रिन्सेज गोर्चाकोवा की भी मृत्यु हो गयी थी। पिता की मृत्यु के समय लियो मात्र 9 वर्ष के थे। उनके, उनके भाइयों और बहन के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनकी एक आंट अलैक्जैड्रां इल्यिनिच्ना ने संभाली लेकिन 1841 में उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी दूसरी आंट तात्याना अलैक्जाड्रोंव्ना ने उनके पालन-पोशण का भार संभाला था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद लियो तोल्स्तॉय कज़ान विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए गये। उस समय उनकी आयु 13 वर्ष थी। उनके साथ उनका निजी नौकर वन्यूशा था जो बालक ही था और जो बाद में उनकी काकेशस यात्रा के समय उनके साथ रहा था। कज़ान में वह एक अवकाश प्राप्त कर्नल युश्कोव के घर में रहे थे। पढ़ाई की दृष्टि से तोल्स्तॉय अच्छे छात्र नहीं थे। उनकी पत्नी ने अपने संस्मरण में इस विषय में लिखा है, ‘‘वह अच्छे विद्यार्थी नहीं थे और गणित सीखने में उन्हें बहुत कठिनाई होती थी…।" उन्होंने कज़ान विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या विभाग में प्रवेश लिया, किन्तु एक वर्ष पश्चात् ही वह पढ़ाई छोड़कर उन्होनें विधि शास्त्र विभाग में प्रवेश ले लिया था। लेकिन मन यहॉं भी उनका नहीं रमा। वहॉं उनके प्रोफेसर थे-डी. आई. मेयर, जो बहुत अच्छे व्यक्ति थे। वह तोल्स्तॉय में विशेष रुचि ले रहे थे। उन्होंने उन्हें एक विषय पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने का कार्य सौंपा। लेकिन, तोल्स्तॉय वह कार्य नहीं कर पाये थे। बहुत वर्षों बाद पी. पेकार्स्की ने डी. आई. मेयर पर एक संस्मरण लिखा था, जो 1859 में प्रकाशित एक पुस्तक में संकलित हुआ था। उसमें उन्होंने प्रो0 का कथन उद्धृत किया था। प्रो0 मेयर ने कहा था, ‘‘मैनें आज उसकी परीक्षा ली, और देखा कि पढ़ने की उसकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। खेद का विषय है। उसकी ऐसी अभिव्यंजक मुखाकृति और बुद्धिमानों जैसी आंखें हैं कि मैं यह मानता हूँ कि सद्भावना और स्वतंत्रता से एक असाधारण व्यक्ति के रूप में वह अपना विकास कर सकता है।"तोल्स्तॉय ने स्वेच्छया दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया, जिसने उनके भावी लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। बाद में उन्होंनें बाइबिल, अरब की लोक कथाएं, प्राचीन रूसी साहित्य, और ऐसा साहित्य जिसके लेखकों के नाम लोग भूल गये थे, अठारहवीं शताब्दी का साहित्य और भूले-बिसरे जर्नल्स खोजकर पढ़े थे। उन्होंने पुश्किन को बार-बार पढ़ा, और रूसो को बचपन में ही पढ़ डाला था। उन्होंने जिप्सी संगीत से भी बहुत कुछ सीखा था।लियो तोल्स्तॉय के घर में प्रस्कोव्या इसाएव्ना नाम की एक नौकरानी थी, जो बचपन में उन्हें कहानियां सुनाया करती थी। कभी वह उनके दादा, जो सेना में जनरल थे, के बहादुरी के किस्से सुनाती तो कभी लोक-किस्से। कहा जा सकता है कि दादी-नानी की बचपन में सुनी कहानियों की भांति इसाएव्ना की कहानियों ने लियो के बचपन में ही एक महान लेखक की बुनियाद रख दी थी। उसके विषय में तोल्स्तॉय को ज्ञात हुआ था कि वह फोका नामक खानसामा को प्यार करती थी, और उसके साथ शादी की अनुमति चाहती थी। लेकिन उनके दादा ने उसे शादी की अनुमति नहीं दी थी।
तोल्स्तॉय ने किसानों के जीवन का निकट से गहन अध्ययन किया। वह उनकी दयनीय जीवन-स्थितियों से दुखी और व्यवस्था के प्रति विक्षुब्ध थे। उन्होंनें यास्नाया पोल्याना में खेती के कार्यों में अपने को व्यस्त कर लिया था। यह कज़ान से लौट आने के बाद की घटनाएं थीं। उन्होंनें एक थ्रेशिंग मशीन बनायी, जिसका वर्णन उन्होंनें ‘जमींदार की एक सुबह’ में किया है। इस मशीन ने भारी शोर किया था, सनसनाई थी और दम तोड़ दिया था। उन दिनों तोल्स्तॉय 18 वर्ष के थे। थ्रेशिंग मशीन द्वारा किसानों के श्रम को कम करने का उनका सपना टूट गया था। फरवरी, 1849 में वह अपनी मास्टर्स डिग्री के लिए सेंट पीटर्सबर्ग गये थे। जुआ खेलने की लत उन्हें वहीं लगी थी। वह कर्ज में इतना डूब गये थे कि मार्च 1849 में उन्होंने सेर्गेई को लिखा था कि वह उनके घोड़े और कुछ जमीन बेचकर पैसे भेजे। उन्होंनें अपने कारिन्दा को जंगल बेचने के लिए लिखा था। उन्होंनें सेर्गेई को पुन: लिखा और कहा कि वह ‘खरीदारों से किसी भी शर्त‘ पर सौदा करके उन्हें पैसे भेजे। ‘हाजी मुराद‘ और ‘कज्ज़ाक‘ में उन्होंने अपने इस अनुभव का लाभ उठाया है। उसके बाद उन्होंनें विदेश यात्राएं कीं। वह उन स्थानों पर गये, जहॉं कभी रूसो रहे थे और जहॉं उन्होंने नयी शिक्षा पद्धति का स्वप्न देखा था। यात्रा के अंत में तोल्स्तॉय भी रूस में पब्लिक विद्यालय शिक्षा के विषय में सोचने लगे थे।यास्नाया पोल्याना लौटकर तोल्स्तॉय ने किसानों के लिए एक स्कूल की स्थापना की थी। यह उनके एक आलेख – ‘पब्लिक विद्यालयों के प्रबन्धन के लिए योजना का प्रारूप‘ से स्पष्ट है। विद्यालय को सरकारी मान्यता प्राप्त न थी। यहॉं युवा तोल्स्तॉय अपने किसानों के बच्चों को पढ़ाते थे। उनका पुराना नौकर फोका इस कार्य में उनकी सहायता करता था। उनके काकेशस चले जाने के बाद यह कार्य बाधित हुआ था, लेकिन वहॉं से लौटने के बाद उन्होंनें पुन: विद्यालय प्रारंभ कर दिया था। तब स्कूल चलाने के लिए उन्होंनें मास्को के ग्यारह विद्यार्थियों का चयन किया था। इन्हीं दिनों उन्हें किसानों और जमींदारों के बीच मध्यस्थता करने के लिए पब्लिक आर्बिट्रेटर चुना गया था। परिणामत: किसानों के बच्चों के लिए उस क्षेत्र में अनेक स्कूल खुले थे, लेकिन यास्नाया पोल्याना का स्कूल उनके लिए था।
लियो तोल्स्तॉय के परिवार में सैन्य सेवा की सुदीर्घ परम्परा रही थी। उनके पिता ने 1812 में नेपोलियन के विरुद्ध युद्ध किया था। तोल्स्तॉय के बड़े भाई निकोलई सेना में भर्ती हुए थे। 1851 में तोल्स्तॉय भी उनके साथ गए और एक बाहरी व्यक्ति के रूप में सेना के लिए अपनी सेवाएं अर्पित की थीं। उस समय उनकी आयु बाईस वर्ष थी। सेना में वह लगभग पांच वर्ष रहे थे। कमीशन प्राप्त करने के लिए उन्हें बहुत प्रयास करना पड़ा था। परिवार के उच्च संपर्कों का सहारा लेना पड़ा था। उन्होंने काकेशिया, डेन्यूब और क्रीमिया की लड़ाइयों में भाग लिया था। सैन्य अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी, भले ही एक बाहरी व्यक्ति के रूप में, उन्हें काकेशिया तथा सेवस्तोपोल के युद्धों से संबन्धित कहानियों और ‘कज्ज़ाक‘ , ‘युद्ध और शांति’ तथा ‘हाजी मुराद’ जैसे उपन्यासों के सृजन में सहायक सिद्ध हुई थी। उनकी पत्नी सोफिया अन्द्रेएव्ना ने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘‘वह प्राय: मुझसे यह कहते थे कि उनकी सबसे सुखद स्मृतियां काकेशिया से जुड़ी हुई हैं। उन दिनों उन्होंनें बहुत पढ़ा, स्टेर्न की रचनाओं का अनुवाद किया। यहीं उन्होंने ‘बचपन’ और ‘किशोरावस्था’ की रचना की थी।"
वैसे तोल्स्तॉय ने पहली रचना, 1841 में हुई अपनी बुआ की मृत्य के बाद कविता के रूप में लिखी थी।काकेशिया प्रवास भावी लेखक तोल्स्तॉय के लिए वरदान सिद्ध हुआ था। वास्तविकता यह थी कि वह सोची-समझी योजना के बाद ही सैन्य सेवा में गये थे, क्योंकि न केवल वह सैन्य अभियानों को निकट से देखना चाहते थे, बल्कि उस पूरे प्रांत का बहुआयामी अध्ययन भी करना चाहते थे। ‘कज्ज़ाक’ और ‘हाजी मुराद’ इसका प्रमाण हैं। काकेशस में लिखी गयी उनकी रचना ‘बचपन’ उस समय की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘सोव्रेमेन्निक‘ (समकालीन) में प्रकाशित हुई थी। तोल्स्तॉय ने इसमें लेखक के रूप में अपना नाम नहीं दिया था। लेकिन जब पाठकों और आलोचकों ने ‘बचपन’ की प्रशंसा की तब उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा था। इस विषय में उन्होंनें अपनी डायरी में लिखा, ‘‘मैं इसे पढ रहा था, प्रशंसा के कारण अभिभूत हुआ जा रहा था और मेरी छाती गर्व से फटी जा रही थी।" इस पत्रिका के सम्पादक थे प्रसिद्ध कवि और लेखक नेक्रासोव। नेक्रासोव ने इस पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, ‘‘ लेखक हमें हमारे लिए सर्वथा नयी दुनिया में ले जाता है… उनमें पात्रों को समझने और उनके स्वरूप के विषय में गहरी सचाई अभिव्यक्त हुई है… ।"काकेशिया में रहते हुए ही तोल्स्तॉय ने एक लेखक के रूप में प्रसिद्धि पा ली थी। जब वह वहां से नवम्बर 1855 में पीटर्सबर्ग लौटकर आये, तब उस समय के महान रूसी रचनाकारों, आस्त्रोव्स्की, चेर्नीशेव्स्की, तुर्गनेव और गोंचारोव ने उनका एक बड़े लेखक के रूप में स्वागत किया था। तुर्गनेव ने तोल्स्तॉय की बहन मारिया को लिखा था, ‘‘हम सब की राय में लेव निकोलएविच हमारे सर्वश्रेष्ठ लेखकों की पांत में आ गये हैं और अब तो उन्हें कोई ऐसी चीज लिखनी चाहिए कि वह प्रथम स्थान प्राप्त कर लें जिसके योग्य वह हैं और जो उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।" यहां यह उल्लेख करना अनुचित न होगा कि लेखक तुर्गनेव और तोल्स्तॉय की बहन मारिया के मध्य प्रेम संबन्ध थे। मारिया ने अपने पति से तलाक ले लिया था। वह तुर्गनेव से विवाह करना चाहती थी, जिसे तुर्गनेव लंबे समय से टालते आ रहे थे। तोल्स्तॉय के लिए यह एक अप्रिय स्थिति थी। तुर्गनेव के प्रशंसक होने के बावजूद कुछ विषयों में तोल्स्तॉय का उनसे मतवैभिन्य था। उस पर मारिया के संबन्धों का मामला। दरअसल, तुर्गनेव मॉलिन वर्डोट को प्यार करते थे, जिसके मकान में वह रहते थे। लेकिन सुश्री वर्डोट से तुर्गनेव को अपने प्रेम का उत्तर नहीं मिला था। तुर्गनेव के एक पुत्री थी, जिसके पालन-पोषण के लिए वह विशेष चिन्तित रहते थे और सुश्री वर्डोट उस बच्ची की देखभाल करती थीं। लेकिन तोल्स्तॉय मारिया के विषय में चिन्तित थे। 1861 के वसंत में कवि अफानसी फेट की जागीर स्तपनोव्का में एक सुबह नाश्ते के दौरान तुर्गनेव और तोल्स्तॉय की मुलाकात हो गयी थी। किसी विषय पर दोनों में झड़प हुई थी और बहन को लेकर तोल्स्तॉय के मन में जमी क्षुब्धता फूट पड़ी थी। इस सबके बावजूद तोल्स्तॉय के हृदय में तुर्गनेव के विरुद्ध दुर्भाव न था। तुर्गनेव ने अपने किसानों को स्वतंत्र कर दिया था और दुर्भिक्ष के दौरान गरीब किसानों के सहायतार्थ विभिन्न जागीरों की यात्रा करते समय तोल्स्तॉय ने पाया था कि तुर्गनेव के किसानों की स्थिति अन्य जमींदारों के किसानों से बहुत अच्छी थी।
फरवरी, 1862 में पब्लिक आर्बीट्रेटर के पद से त्यागपत्र देकर तोल्स्तॉय 12 मई 1862 को मास्को चले गये थे। उनके साथ उनके शिष्य वसीली मोरोजोव, और इगोर चेर्नोव थे और था पुराना नौकर अलेक्सेई ओरेखोव जो सेवास्तोपोल में उनके साथ रहा था। मास्को में उन्होनें बेहर्स परिवार के साथ रात व्यतीत की थी। उनकी भावी पत्नी सोनिया बेहर्स (सोफिया अन्द्रेएव्ना) ने पहली बार उस ग्रामीण युवक को देखा था। मास्को से तोल्स्तॉय त्वेर चले गये थे। जिन दिनों वह यास्नाया पोल्याना से बाहर थे, अधिकारियों ने उनके स्कूल में छापा मारा था। उससे स्कूल को इतनी क्षति हुई थी कि स्कूल उससे उबर नहीं पाया था।लियो निकोलएविच तोल्स्तॉय लगभग चौंतीस वर्ष के हो चुके थे, लेकिन अविवाहित थे। काकेशस से लौटने के बाद वह एक किसान युवती अक्सीनिया बजीकिना के प्रेम में पड़ गये थे। वह उन दिनों ‘कज्ज़ाक‘ लिख रहे थे। लेकिन उन्हीं दिनों त्युचेवा नामक युवती से भी उनके प्रेम संबन्ध थे। उन दिनों वह नियमित डायरी लिखते थे। 14 जनवरी, 1858 को उन्होनें लिखा, ‘‘त्युचेवा हर समय मेरे दिमाग में रहती है। सच, इससे मुझे खीज होती है, क्योंकि वास्तव में यह प्रेम नहीं है।" 26 जनवरी, 1858 को उन्होंनें लिखा, ‘‘वह ठंडी, तुच्छ और अभिजातवर्गीय है जबकि चिचेरिना सुन्दर है।" लेकिन अक्सीनिया के विषय में वह लिखते हैं, ‘‘अक्सीनिया को एक दृश्टि देखा। वह बहुत सुन्दर है। मैनें इतने दिन व्यर्थ ही गंवा दिए। आज पुराने बड़े जंगल में, वहां उसकी भाभी भी थी, और मैं मूर्ख हूँ… मैं उसके प्यार में पड़ गया हूँ। ऐसा जीवन में पहले कभी नहीं हुआ था। मेरे मस्तिष्क में दूसरा कोई विचार नहीं है। मैं संतप्त हूँ।"कुछ लोगों का कहना है कि अक्सीनिया से उन्हें एक पुत्र भी था। लेकिन अक्सीनिया से पूर्व अन्य युवतियों से भी उनके प्रेम संबन्ध थे। कोकेशस जाने से पूर्व वह एक जिप्सी युवती के प्रति आकर्षित थे। उनका भाई सेर्गेई लंबे समय तक एक जिप्सी युवती के साथ रहने के पश्चात् उससे विवाह कर चुका था। उसने तोल्स्तॉय को भी उस जिप्सी युवती से, जिसके प्रति तोल्स्तॉय आकर्षित थे, विवाह के लिए प्रेरित किया था। बाद में, तोल्स्तॉय बलेरिया असे‍र्नीवा के प्रेम में पड़े थे, जिसके साथ संबन्ध विच्छेद करते हुए उन्होंनें 14जनवरी, 1857 को उसे एक पत्र लिखा था, ‘‘प्रिय अलेरिया व्लादीमीरोव्ना, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं अपने प्रति कसूरवार हूँ और भयानक रूप से आपके प्रति भी कसूरवार हूँ… मैं शीघ्र ही पेरिस के लिए रवाना हूँगा और कब रूस वापस लौटूंगा, ईश्वर ही जानता है।" वलेरिया व्लादीमीरोव्ना असे‍र्नीवा अपने मां-पिता को खो चुकी थी। वह सुदाकोवो, जो यास्नाया पोल्साना के निकट था, में रहती थी और अच्छे रहन-सहन के बावजूद धनवान न थी। लेकिन काले बालों वाली, संगीत पसंद वह एक सुदर्शना युवती थी। असे‍र्नीवा के साथ तोल्स्तॉय के संबन्ध बहुत गहराई तक स्थापित हो चुके थे। उन्होंनें अपनी बुआ, भाई ओर मित्रों से उसका परिचय करवाया था। उसे सोलह पत्र भी लिखे थे, लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों से उन्होंनें उससे विवाह नहीं किया था।
तोल्स्तॉय जब तीस के थे, वह त्युचोवा के विषय में सोचते थे, ‘‘मैं उससे बिना प्यार के निश्चय ही शांतिपूर्वक विवाह के लिए अपने को तैयार कर रहा था, लेकिन उसने जान-बूझकर ठंडेपन के साथ मेरा स्वागत किया।" अंतत: उन्होंनें उससे भी विवाह का विचार त्याग दिया था। 1 जनवरी, 1859 को उन्होंनें डायरी में लिखा, ‘‘ मैं या तो इस वर्ष विवाह कर लूंगा अथवा कभी नहीं करूंगा।" उन दिनों की उनकी डायरी से ज्ञात होता है कि विवाह को लेकर वह कितना उलझन में थे। लगातार वह अक्सीनिया का उल्लेख करते हैं। अंतत: बेहर्स परिवार से उनकी निकटता ने उन्हें सोनिया के निकट ला दिया था। वास्तव में, डाक्टर अन्द्रेई इव्स्ताफीविच बेहर्स अपनी बड़ी बेटी लिजा का विवाह तोल्स्तॉय के साथ करना चाहते थे। लेकिन 6 मई, 1862 को तोल्स्तॉय ने अपनी डायरी में लिखा, ‘‘मैनें बेहर्स परिवार में सुखद दिन व्यतीत किया, लेकिन लिजा के साथ विवाह का साहस मुझमें नहीं है।" वह बेहर्स की छोटी बेटी सोनिया, जो उनसे सोलह वर्ष छोटी थी, को पसंद करते थे और 24 सितम्बर, 1862 को सोनिया के साथ उनका विवाह हुआ था। डाक्टर बेहर्स लिजा के साथ तोल्स्तॉय के विवाह न करने से इतना नाराज थे कि उन्होंनें सोनिया को दहेज के रूप में कुछ भी नहीं दिया था।
सोफिया अन्द्रेएव्ना के साथ शादी के पश्चात् तोल्स्तॉय के जीवन का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। सोफिया निश्चित ही उनकी एक कुशल संगिनी सिद्ध हुई थीं। वह उनकी पत्नी, सहायिका, निजी सचिव आदि विभिन्न रूपों में उनके रचनात्मक कार्यों में सहायता करती थीं। वह उनकी प्रत्येक रचना की पहली पाठक ही नहीं होती थीं, बल्कि वह उन्हें अपनी सलाह भी देती थीं। वह उनकी रचनाओं को फेयर करती थीं। शादी के पश्चात् लंबी अवधि तक तोल्स्तॉय कुछ नहीं लिख पाये थे। ‘कज्ज़ाक’ (1852-1862) लिखकर वह पर्याप्त यश पा चुके थे। लेकिन, लगभग दो वर्षों तक कुछ न लिख पाने के दौरान वह एक बड़े विषय पर कार्य करने के लिए अपने को तैयार कर रहे थे। उन्होंनें 1865 में ‘युद्ध और शांति’ पर कार्य प्रारंभ किया, जिसे 1869 में पूरा किया था। यह उपन्यास राजनीतिक, सामाजिक, कूटनीतिक, धार्मिक, दार्शनिक, सामरिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक अर्थात् जीवन के लगभग सभी पक्षों पर प्रकाश डालता है। इस उपन्यास ने तोल्स्तॉय को विश्व के महान लेखकों के मध्य आसीन कर दिया। सामरसेट माम ने उनके विषय में लिखा, ‘‘ संसार का सबसे बड़ा उपन्यासकार बाल्जाक था, किन्तु ‘युद्ध और शांति’ संसार का महान उपन्यास है।" तोल्स्तॉय ने इस उपन्यास को लिखने में अथक श्रम किया था। इस दौरान उन्होनें दो छोटी रचनाएं ‘काकेशस में एक युद्धबंदी’ (1872) और ‘फादर सेर्गेई (1873) लिखा। लेकिन वह कुछ और महत्वपूर्ण लिखने की योजना बना रहे थे। यह उपन्यास था ‘अन्ना कारेनिना’ जिसे उन्होंनें 1875-77 में लिखा था। यह उपन्यास सुन्दर अन्ना, कूपमंडूक और सीमित जीवन दृष्टि रखने वाला उसका कुलीन पति कारेनिन, जो उम्र में अन्ना से काफी बड़ा था और अन्ना को प्रेम करने वाले जवान काउंट व्रोन्स्की की कहानी है । उपन्यास का अंत अन्ना की आत्महत्या में होता है। इसमें मुख्य कथा के साथ लेविन और कीटी की प्रेम कथा भी है। लेविन के विचार तत्कालीन रूस की विविध समस्याओं पर तोल्स्तॉय के विचारों को व्याख्यायित करते हैं। इस उपन्यास के विषय में रोमा रोलां का कथन है, ‘‘अन्ना कारेनिना पूरा एक संसार है जिसकी निधि अकूत है।"
‘अन्ना कारेनिना’ के बाद तोल्स्तॉय का लेखन निरंतर चलता रहा। 1882 में उन्होंनें – ‘एक स्वीकारोक्ति’, ‘मेरा धर्म’ (1884) , ‘घोड़े की कहानी’ (1864 में – पुन: 1886 में), ‘इवान इल्यीच की मृत्यु’ (886) , ‘एक व्यकित को कितनी जमीन की आवश्यकता है?’ (1886) , ‘अंधकार की सत्ता’ (ड्रामा –1886), ‘क्रुट्जर सोनाटा’ (1889 – लंबी कहानी), ‘पुररुत्थान’ (1889–99), ‘हाजी मुराद’ (1896 – 1904) जैसी कालजयी रचनाएं लिखीं। ‘पुररुत्थान’ में तोल्स्तॉय ने भूदास प्रथा के बाद की रूसी सामाजिक जीवन की विसंगतियों को गंभीरता से अभिव्यक्त किया है। यद्यपि इस उपन्यास का नायक नेखल्युदोव है, तथापि वास्तविक नायक आम-साधारण लोग हैं जो नेखल्युदोव के माध्यम से अपने वास्तविक रूप में पाठकों के समक्ष प्रकट होते हैं।‘हाजी मुराद’ तोल्स्तॉय का ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसमें हाजी मुराद ही नहीं अधिकांश अन्य पात्र वास्तविक हैं। उन्होंनें इस उपन्यास को लगभग पचास वर्ष पश्चात् लिखा था, जबकि वह यास्नाया पोल्याना के स्कूल के अपने छात्रों को प्राय: हाजी मुराद की वीर गाथाएं सुनाया करते थे। ‘क्रुट्जर सोनाटा‘ के विषय में कुछ विद्वानों का कहना है कि उन्होंने अपनी पत्नी सोफिया अन्द्रेएव्ना से ईर्ष्या के कारण उसे लिखा था। ऐसा माना जाता है कि सोफिया अन्द्रेएव्ना और उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार सेर्गेई इवानएविच तानेएव, जो तोल्स्तॉय का अच्छा मित्र था, के मध्य यास्नाया पोल्याना अथवा मास्को में प्रेम संबन्ध स्थापित हुआ था लेकिन शायद वह सोफिया का एकपक्षीय प्यार था। वह यह नहीं जानती थी कि तानेएव उसे प्यार नहीं करता। वह यह सोचती थी कि वह उसके पति से भयभीत था। लेकिन वह प्रत्येक संगीत समारोहों में जाती थीं और तानेएव के बगल में बैठती थीं। एक बार तानेएव कीव गया और वहां मस्कोव परिवार के साथ ठहरा। सोफिया अन्द्रेएव्ना भी उसकी पीछे कीव गयी थीं। वह पहले अपनी बहन तातियाना से मिलीं, फिर मस्लोव परिवार की मेहमान बनी थीं। इस परिवार से उनके पुराने संबन्ध थे। अगले दिन वह सभी के साथ जंगल घूमने गयीं, जहां सोफिया के चित्र खींचे गये थे। जब वह मास्को लौटीं तब उन्होंने तोल्स्तॉय का तनावग्रस्त खिंचा हुआ चेहरा देखा था। तोल्स्तॉय ने अपनी भाभी को एक पत्र लिखा था, जिसमें दुखी मन से उन्होंने लिखा था कि “आखिर अब मैं सत्तर वर्ष का बूढ़ा जो हूँ।" उन्होंनें पांच पृष्ठों का एक लंबा पत्र सोफिया को लिखा था, जिसे उन्होंनें ‘एक संवाद’ कहा था। उसमें उन्होंनें सोफिया से कीव यात्रा और तानेएव के प्रति उनके सम्मोहन के विषय में स्पष्टीकरण मांगा था। पत्र पढ़कर सोफिया आग बबूला हो उठी थीं और चीखती हुई बोली थीं, ‘‘आप कमीने हैं, आप एक जानवर हैं ! और मैं एक अच्छे, सहृदय व्यक्ति को प्यार करती हूँ, न कि आपको। आप एक पशु हैं !"
वास्तव में तानेएव और सोफिया का प्रेम वास्तविक नहीं था। निश्चित् ही पारिवारिक असंतोष और प्रेम की आंकाक्षा के कारण वह उसकी ओर आकर्षित हुई थीं, लेकिन वह एकपक्षीय था। ऐसी स्थिति में तोल्स्तॉय की मानसिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।सोफिया अन्द्रेएव्ना ने यास्नाया पोल्याना में घर बनवाया, उसे सजाया, और वहां रही भी थीं। लेकिन वास्तविकता यह थी कि ग्राम्य जीवन को वह स्वीकार नहीं कर पायी थीं। परिवार के लिए समर्पित और बच्चों के भविष्य की चिन्ता में डूबी रहने वाली उस अथक परिश्रमी महिला को पति का किसानों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण, सामाजिक कार्यों में उनकी संलिप्तता और व्यवस्था का मुखर विरोध पसंद नहीं था। वह तोल्स्तॉय को एक काउंट की भांति… एक अभिजातीय वर्ग के व्यक्ति की भांति देखना चाहती थीं। जबकि तोल्स्तॉय किसानों जैसा सामान्य जीवन जीना पसंद करते थे। 28 जून, 1881 को तोल्स्तॉय ने अपनी डायरी में लिखा, ‘‘मैं एक गरीब आत्मा को देखने गया था। वह एक सप्ताह से बीमार है। उसे दर्द और कफ है। पीलिया बढ़ रहा है। कुर्नोसेन्कोव को पीलिया था। कोन्द्राती उसी से मरा था। गरीब लोग पीलिया से मर रहे हैं। वे फलाला से मर रहे हैं।" वह आगे लिखते हैं, ‘‘उसकी पत्नी की गोद में एक बच्चा है, तीन लड़कियां हैं और भोजन नहीं है। चार बजे तक उन्हें भोजन नहीं मिला था। लड़कियां सरसफल तोड़ने गयी थीं और वही उनका भोजन था।"तोल्स्तॉय ने आगे लिखा कि उस घर में स्टोव इसलिए जलाया गया कि बच्चे को लगे कि कुछ पकाया जा रहा था और वह चीखे नहीं। गरीबी का यह भयावह दृश्य तत्कालीन रूस की स्थिति का वास्तविक बयान है। उन्होंने पुन: लिखा, ‘‘ हम शैम्पेन के साथ अच्छा रात्रिभोज करते हैं ।… प्रत्येक बच्चे को खर्च के लिए पांच रूबल दिए जाते हैं। गाडि़यां तैयार हैं, जिनमें वे पिकनिक के लिए जाएगें। उनकी गाडि़यां कठिन श्रम से थके-मांदे किसानों की गाडि़यों के पास से गुजरेगीं… ।"तोल्स्तॉय की रचनाएं ही नहीं समय-समय पर उनकी डायरी में दर्ज की गई बातें रूस की उस समय की सामाजिक ओर आर्थिक विद्रूपता को उद्घघाटित करती हैं। तुर्गनेव की भांति उन्होंने भी अपने किसानों को स्वतंत्रता दे दी थी। लेनिन ने उनके विषय में अपने आलेख – ‘‘लेव तोल्स्तॉय रूसी क्रांति के दर्पण में" में लिखा था, ‘‘तोल्स्तॉय के विचारों में विरोधाभास वस्तुत: उन विरोधाभासपूर्ण परिस्थितियों का दर्पण है जिनमें किसान समुदाय को हमारी क्रांति में अपनी ऐतिहासिक भूमिका अदा करनी पड़ी थी।"

किसानों के जीवन परिवर्तन के विषय में तोल्स्तॉय जैसा सोचते थे क्रांतिकारी भी वैसा ही सोच रहे थे। शायद इसीलिए उन्होंनें कहा था, ‘‘ क्रांति अपरिहार्य है।" वह दूसरी क्रांति की प्रतीक्षा कर रहे थे, जो किसानों की जीवन स्थितियां बदल देने वाली थी। लेकिन दूसरी ओर वह क्रांति से भयभीत भी थे। ऐसी ही अनेक बातों में हमें उनका विरोधाभास प्रकट होता दिखता है।उन्होंने 13 मई, 1908 से 15 जून, 1908 तक एक आलेख पर कार्य किया, जिसका शीर्षक था, ‘‘मैं चुप नहीं रह सकता"। इस आलेख ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। सेंसर किये जाने के भय से तोल्स्तॉय ने इसे लेटिश (Lettish) में प्रकाशित करवाया था। उसके बाद यह तूला के एक गुप्त छापाखाने से पूरा प्रकाशित हुआ। दुनिया के लगभग सभी देशों में इसे प्रकाशित किया गया और आश्चर्यजनक रूप से जर्मन के दो सौ अखबारों में यह एक साथ प्रकाशित हुआ था। इस लेख का प्रारंभ इस प्रकार होता है, ‘‘सात मौत की सजाएं। दो सेण्ट पीटर्सबर्ग में, एक मास्को में, दो पेन्जा़ में, दो रिगा में। चार फांसियां – दो खर्सन में, एक विल्नो में और एक आडेसा में।" इस लेख में आगे कहा गया कि 1880 के दशक में देश में एक जल्लाद था, लेकिन 1908 में अनेकों दिवालिया दुकानदार जल्लादी काम के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं और बदले में सैकड़ों रूबल पाकर अपने व्यवसाय को पुन: स्थापित कर रहे हैं। इन जल्लादों में होड़ गची हुई है। परिणामस्वरूप वे कुछ कम पैसों में, अनेक केवल पचास रूबल में ही हत्या के लिए तैयार हैं।तोल्स्तॉय के इस आलेख से सरकार हिल उठी थी। लेकिन वह उस महान लेखक के विरुद्ध कुछ कर नहीं सकती थी, जिसे जनता का अपार स्नेह प्राप्त था। इस आलेख को पढ़कर अमेरिका में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी तारकनाथ दास ने तोल्स्तॉय को 24 मई 1908 को भारत की स्थिति के विषय में एक पत्र लिखा था। तोल्स्तॉय ने उन्हें उत्तर दिया था। इसके पश्चात् महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखे, जिनके उत्तर ‘एक भारतीय के नाम पत्र’ के रूप में यास्नाया पोल्याना के पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। महात्मागांधी को लिखे तोल्स्तॉय के पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जो भारत की पराधीनता के विषय में उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं।तोल्स्तॉय तिहत्तर वर्ष के थे। उनका स्वास्थ्य खराब था। वह याल्टा जाना चाहते थे। 5 सितम्बर, 1901 को सेवेस्ताप जानेवाली ट्रेन में उनके लिए एक विशेष कोच की व्यवस्था की गई थी। जब ट्रेन खार्कोव स्टेशन पहुँची, जनता का हुजूम अपने उस महान लेखक की एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़ा था। विश्व के शायद वे एक मात्र ऐसे लेखक थे जिनकी एक झलक पाने के लिए स्टेशनों पर हजारों की भीड़, एक बार लगभग पचीस हजार की भीड़, एकत्र होती थी।
याल्टा में उनसे मिलने वालों में चेखव थे। चेखव ने गोर्की को सितम्बर 1901 के अंत के पत्र में तोल्स्तॉय के चिन्ताजनक स्वास्थ्य के विषय में लिखा था। लेकिन तोल्स्तॉय स्वस्थ होकर घर लौटे थे। उसके पश्चात् उन्होंनें ‘हाजी मुराद' पूरा किया था। अन्य रचनाएं लिखी थीं। इस दौरान वसीयत को लेकर पारिवारिक विवाद प्रारंभ हो गया था। तोल्स्तॉय अपने बेटों से असंतुष्ट थे। वह बेटी मारिया को अधिक चाहते थे। सम्पत्ति का बंटवारा सबमें करना चाहते थे। जबकि सोफिया अन्द्रेएव्ना की चिन्ता पूरे परिवार से जुड़ी हुई थी। वह तोल्स्तॉय के साहित्य का प्रकाशन दॉस्तोएव्स्की की पत्नी अन्ना की भांति स्वयं करना चाहती थीं, (और उन्होंनें यह कार्य सफलतापूर्वक किया भी था) और सम्पूर्ण साहित्य पऱ अधिकार चाहती थीं, जबकि तोल्स्तॉय 1885 के पश्चात् के अपने साहित्य को स्वतंत्र कर देना चाहते थे, जिसे कोई भी प्रकाशित कर सकता था। विवाद गहरा था। परिणामत: 28 अक्टूबर 1910 को सुबह पांच बजे तोल्स्तॉय ने घर छोड़ दिया था। उस क्षण उनकी जेब में 39 रूबल थे और उनके साथ यात्रा करने वाले मकोवित्स्की के पास तीन सौ रूबल थे। वह अस्तापे पहुँचे थे, जहां 7 नवम्बर, 1910 (नये कलेण्डर के अनुसार 20 नवम्बर) को इस महान लेखक ने सुबह छ: बजकर पांच मिनट पर इस संसार को अलविदा कह दिया था।रूसी सरकार ने अपने इस लेखक के दर्शनार्थ जानेवालों के लिए विशेष ट्रेनें चलायी थीं। रूस की जनता ने जितना प्यार अपने इस महान लेखक को दिया वह अद्भुत था। गोर्की ने उनके विषय में लिखा, ‘‘तोल्स्तॉय एक पूरा जगत हैं … उन्होंने सचमुच एक विराट कार्य किया है… पूरी शताब्दी का निचोड़ पेश किया है।" अपने लेख ‘लेव तोल्स्तॉय’ में गोर्की ने लिखा था, ‘‘ जब तक यह व्यक्ति इस धरती पर विद्यमान है, मैं यतीम नहीं हूँ।"गोर्की की उपरोक्त बात अब तोल्स्तॉय के साहित्य के संदर्भ में कही जा सकती है।(लेखक द्वारा अनूदित लियो तोल्स्तॉय के हिन्दी में अब तक अप्रकाशित उपन्यासहाजी मुराद‘ में दिया गया संक्षिप्त जीवन परिचय। उपन्यास ‘हाजी मुराद‘ संवाद प्रकाशन,मुम्बई/ मेरठ से प्रकाशित।)

रविवार, 6 अप्रैल 2008

जीवनी

ऑकलैंड के समाजवादी पुत्र- श्रमिक लेखक - जैक लंडन
रूप सिंह चन्देल


महान अमेरिकी लेखक जैक लंडन का जन्म सैनफ्रांसिस्को (कैलीफोर्निया) की मार्केट स्ट्रीट में १२ जनवरी, १८७६ को हुआ था. जन्म के समय उनका नाम जॉन ग्रिफिथ चेनी था. ऎसा मना जाता है कि वह यायावर ज्योतिषी और पत्रकार विलियम चेनी की जारज़ संतान थे, जिन्होनें उनकी मां फ्लोरा, जो एक आध्यात्मवादी महिला थीं, से उनके जन्म से पूर्व ही संबध विच्छेद कर लिए थे. फ्लोरा ने जैक के जन्म के आठ माह पश्चात जॉन लंडन, जो भूतपूर्व सैनिक थे, से विवाह किया. जॉन कुछ समय पहले ही सैन फ्रांसिस्को आए थे. बीस-बाइस वर्ष की आयु तक जैक को अपने जन्म की वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं थी. उनकी किशोरावस्था का अधिकांश कैलीफोर्निया के ऑकलैण्ड के तटीय भाग में व्यतीत हुआ. उन्हें सुव्यवस्थित शिक्षा न के बराबर प्राप्त हुई. प्रारंभ में, वह आठवीं स्तर तक ही विद्यालय जा पाये थे, हालांकि उन्हें पढ़ने की उत्कट लालसा थी. अपनी उस लालसा की पूर्ति उन्होनें पब्लिक पुस्तकालयों में, विशेषरूप से 'ऑकलैण्ड पब्लिक पुस्तकालय' में जाकर किया और बाद में कैलीफोर्निया के पहले राजकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए. अंतिम दशक के मध्य में (१८९० के बाद) जैक ने ऑकलैण्ड के हाईस्कूल में प्रवेश लिया और स्नातक बने.
जैक ने जीवन के अनेक क्षेत्रों में व्यापक अनुभव प्राप्त किया था. उन्होनें मजदूर, फैक्ट्री श्रमिक, सैनफ्रंसिस्को समुद्र खाड़ी में शुक्ति (सीप) दस्युता, कैलीफोर्निया के मत्स्य गश्तीदल के सदस्य, नाविक, रेलमार्ग मजदूर, क्लोण्डाइक (कनाडा १८९७-९८) में सोने की खोज आदि काम किए. किशोरावस्था में कॉक्सी आर्मी के प्रसिद्ध वाशिगंटन डी.सी. प्रयाण के समय उसमें शामिल हुए और बाद में इरी काउण्टी, न्यूयार्क में आवारागर्दी करते हुए गिरफ्तार हुए . एक पत्रकार के रूप में जैक ने १९०४ में रूस-जापान युद्ध का हर्स्ट समाचार पत्र के लिए रिपोर्टिंग की थी और १९१४ में उन्होनें मैक्सिकन क्रान्ति को कॉलियर के लिए 'कवर' किया था. देशाटन के दौरान वह समाजवाद से परिचित हुए जो वर्षों उनके कर्म और चिन्तन का विषय रहा. उनके भावपूर्ण समाजवादी नुक्कड़ भाषणों के कारण उन्हें ऑकलैण्ड का 'समाजवादी पुत्र' कहा जाता था. समाजवादी पार्टी प्रत्याशी के रूप में अनेक बार वह मेयर का चुनाव लड़े और असफल रहे थे.
१९०० में जैक ने अपनी गणित की शिक्षिका और मित्र बेस मैडर्न से विवाह किया . यह ठेठ विक्टोरियन शादी थी जो प्रेमाधारित नहीं बल्कि अच्छे शिष्टाचार पर आधारित था. बेस से उन्हें दो बेटियां - जोन और बेस (बेकी) थीं. १९०३ में बेस से संबन्ध विच्छेद के बाद उन्होनें अपनी सेक्रेटरी चर्मियन किट्रेज से विवाह किया जिससे उन्हें वास्तविक प्रेम प्रप्त हुआ. वे साथ-साथ खेलते, यात्राएं करते, लिखते और जीवन का आनंद लेते. चर्मियन से उन्हें एक पुत्र हुआ, जो केवल अड़तीस घण्ट ही जीवित रहा था.
१९०७ में चर्मियन के साथ जैक ने स्नार्क में प्रशांत महासागर से द्क्षिणी समुदों की यात्रएं की जो उनके उपन्यास 'क्रूज आफ द स्नार्क' का आधार बना. चर्मियन के सहयोग से उन्होनें कैलीफोर्निया के ग्लेन ब्लेन में १४०० एकड़ जमीन में खूबसूरत फारम विकसित किया. जैक की मृत्यु के समय वह अनेक शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त थे, जिसमें पेट की गड़बड़ और किडनियों का काम करना बंद कर देना शामिल थे. उनके मृत्यु प्रमाण पत्र में उनकी मृत्यु का कारण 'यूरेमिक विषाक्तता' (प्वायजनिगं) लिखा गया था .
जैक लंडन अपने समय बहुचर्चित व्यक्ति थे. अपने भाषणों में वह समाजवाद और महिलाओं के मताधिकार की बात अवश्य करते थे. वे उन प्रारंभिक 'सेलेब्रिटीज' में से एक थे जिन्होनें व्यावसायिक उत्पादों, जैसे अंगूर जूस और पुरुषों के सूटिंग्स आदि के विज्ञापनों के लिए अनुबन्ध किए थे.
युवा जैक लंडन की विशिष्ट तेजस्विता, आशावादी उत्फुल्ल व्यक्तित्व और अनेक जीवनानुभव संभवतः संयुक्त रूप से सेवा और उत्तर जीवन के श्रमिक दर्शन में परिवर्तित हुए थे. वह अपने सद्गुणों और सिद्धान्तों के कारण अपने पाठकों के लिए आदर्श बन गए थे और देश के पहले श्रमिक लेखक के रूप में पहचान बनाई थी.
एक बार एक लेखक के रूप में सफलता प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय करने के बाद, अपनी अध्यवसायी प्रकृति और अंतर्निष्ठ कौशल के बल पर जैक संदर्भ और अंतर्वस्तु दोनों में अपने समकालीन साहित्यकार मित्रों में शीर्ष स्थान पर पंहुचे थे. उन्होनें एक हजार शब्द प्रतिदिन लिखने का कठोर नियम का पालन किया और अठारह वर्षों के निरंतर लेखन करते हुए प्रभूत मात्रा में उच्च कोटि का साहित्य सृजित किया. वह अपने समय के अमेरिका के सर्वाधिक चर्चित, उच्चतम पारिश्रमिक पाने वाले और बहुत बिकने वाले लेखक थे. वह बहु आयामी सर्जक थे… अनेक विधाओं में उन्होनें कार्य किया. उनकी इक्यावन पुस्तकें और सैकड़ों आलेख प्रकाशित ही थे. हजारों की संख्या में उन्होनें पत्र लिखे थे. उनका सृजित बहुत-सा कार्य उनके मर्णोंपरान्त प्रकाशित हुआ था. उनकी बहुचर्चित पुस्तकों में - 'कॉल आफ दि वाइल्ड' (मूल शीर्षक स्लीपिगं वुल्फ १९०३ में प्रकाशित), दि आयरन हील, ह्वाइट फैंग, दि सी वुल्फ (जिसका मूल शीर्षक था - मर्सी आफ दि सी), दि पीपल आफ दि अबिस (लंदन की मलिन बस्तियों पर समातवैग्यानिक शोध प्रबन्ध पुस्तक), जॉन बर्लेकार्न, मार्टिन ईडेन, और 'दि स्टर रोवर'. उनकी खानी 'टु बिल्ड अ फायर' को युगान्तरकारी रचना माना गया था. उनका साहित्य दर्जनों भाषाओं में अनूदित हुआ और आज पूरे विश्व मेम समादर के साथ पढ़ा जता है. इस अमेरिकी साहित्यिक प्रतिभा ने जीवन और समय के साथ कभी न समाप्त होने वाले आम आदमी के संघर्ष और प्रकृति का अत्यंत कलात्मक कौशल के साथ चित्रण किया. उनकी साहसिक कहानियों को पढ़कर लाखों की संख्या में उत्सुक पाठक रोमांचित हो उठते हैं. लेखक और सामाजिक आन्दोलनकारी उनके ह्रदयस्पर्शी गद्य को पढ़कर प्रेरित होते थे. तथापि, उनके अनेक जीवनानुभव उनके कथा साहित्य से कहीं अधिक उत्तेजक हैं
कहते हैं जैक लंडन से अधिक जलयात्राओं को प्रेम करने वाला व्यक्ति शायद ही कोई अन्य हो, विशेषरूप से कोई कलाकार. जब वह बच्चे थे और अपने सौतेले पिता के साथ मछ्लियां पकड़ रहे होते तब वह उष्ण कटिबन्धी द्वीपों और दूर-दराज के स्थानों के स्वप्न देखा करते थे. जैसे ही वह बड़े हुए, अपने छोटे-मोटे कामों से संग्रहीत पैसों से वह प्रायः नाव किराए पर लेने लगे थे. जब जैक पन्द्रह वर्ष के थे, उन्होंने अपनी ऑण्ट जेनी प्रेण्टिस की आर्थिक सहायता से 'रेज़ल-डैज़ल' नामक जहाज खरीदा और गैर कानूनी रूप से समुद्र में सीपी लूटना प्रारंभ कर दिया. वह 'शुक्ति(सीप) दस्युता के राजकुंवर' के रूप में जाने जाते, इससे पहले ही एक सप्ताह में उन्होनें इतना धन कमा लिया था जितना एक लेखक के रूप में एक वर्ष में भी वह न कमा पाते. यह अनुभव करके कि 'शुक्ति दस्युओं' का जीवन प्रायः जेल में व्यतीत होता है या वे मृत्यु का शिकार होते हैं, अपने को बदलते हुए वह 'कैलीफोर्निया मत्स्य गश्तीदल के उप' नियुक्त हुए.
अपने जीवन काल में जैक ने विभिन्न जहाजों में जापान (सोफिया सदरलैंड), अलास्का (एस.एस.उमातिला और सिटी आफ टोपेका), इंग्लैंड (आर.एम.एस.मैजिस्टिक), साइबेरिया (एस.एस.साइबेरिया - रूस-जापान युद्ध के दौरान संवाददाता के रूप में), कोरिया, हवाई, ताहिती से सैनफ्रांसिस्को, आस्ट्रेलिया से इक्वाडोर, सीटल से कैलीफोर्निया, न्यूयार्क से सैनफ्रांसिस्को, अमेरिकी सैन्य जहाज किल्पैट्रिक में मैक्सिको (मैक्सिकन क्रान्ति के विषय में लिखने के लिए), आदि स्थानों की यात्राएं की थीं. कुछ स्थानों की यात्राएं उन्होनें एकाधिक बार की थीं.
क्लोण्डाइक (उत्तर पश्चिमी कनाडा का एक क्षेत्र जहां १८९० के दशक में सोना प्राप्त हुआ था और धनवान बनने के लिए बहुत से लोग वहां गए थे ) ज्वर से त्रस्त होने के पश्चात जैक ने २५ जुलाई १८९७ में एस.एस. उमातिला पर सैनफ्रासिंस्को से वहां के लिए प्रस्थान किया. उनके साथ उनके वृद्ध साले कैप्टेन शेफर्ड भी थे और उन्हीनें उनके इस अभियान के लिए धन खर्च किया था. २००० पाउण्ड की आवश्यक वस्तुएं, जिनमें गर्म कपड़े, भोजन, खदान के औजार, टेण्ट, कंबल और क्लोण्डाइक स्टोव के साथ जैक दिया नदी और विख्यात चिल्कूट दर्रे के रास्ते युकोन क्षेत्र में प्रविष्ट हुए. सोने के खोज के एक माह पश्चात नवम्बर, १८९७ के प्रारंभ में हेण्डर्सन ग्रीक पर उन्होनें अपना अधिकार प्रकट किया था. ठण्ड के लम्बे मौसम में जैक सोने के खोजी लोगों को कहानियां सुनाया करते थे और अपनी कहानी कहने की योग्यता के लिए चर्चित हो गए थे.
मई, १८९८ में ताजे फलों और सब्जियों के अभाव में वह स्कर्वी रोग से ग्रस्त हो गए. परिणामतः उन्हें सोने की खोज स्थगित करनी पड़ी थी. हताशापूर्वक वह तुरन्त उपचार की आवश्यक्ता अनुभव कर रहे थे, और व्यग्रतापूर्वक युकोन नदी में बर्फ पिघलने की प्रतीक्षा कर रहे थे जिसके कारण मार्ग अवरुद्ध था. वहां उन्हें बहुत मामूली उपचार सुविधा उपलब्ध हुई और उन्हें घर वापस लौटने की सलाह दी गई. अंततः युकोन नदी मार्ग से एक छोटी नाव में १५०० किलोमीटर की लंबी यात्रा तय करते हुए २८ जून को वह सेण्ट माइकल पहुंचे. सेण्ट माइकल से उन्होनें घर के लिए प्रस्थान किया. अलास्का और क्लोण्डाइक (कनाडा) में रहते हुए जैक लण्डन में अद्भुत अंतर्दृष्टि का विकास हुआ. यद्यपि उन्हें बहुत सोना प्राप्त नहीं हुआ था, लेकिन उन्हें अनुभव का अपार भण्डार प्राप्त हुआ था, जो उनके भावी उपन्यासों और कहानियों का आधार बननेवाला था.
ऑकलैण्ड, कैलीफिर्निया पहुंचने के बाद उन्हें अपने सौतेले पिता जॉन लंडन की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ. बाइस वर्ष की आयु में मां और सौतेले भाई के भरण-पोषण का भार उन पर आ पड़ा था. यद्यपि उन्होनें हर प्रकार की नौकरी की तथापि उन्हें कोई स्थायी काम नहीं मिला. अंततः निराशा के कारण उन्होंने अपना अधिकांश सामान बेच दिया और पूरी तरह लेखन में डूब गए थे. वह प्रतिभाशाली और बहु-आयामी व्यक्ति थे, फिर भी उनकी लगभग सभी प्रारंभिक रचनाएं अस्वीकृत हुईं थीं. दिसम्बर, १८९८ के प्रारंभ में उन्होनें अपनी पहली कहानी, अलास्का की एक लोककथा - 'टु दि मैन आन ट्रायल' (To the Man on Trail ) को बेचा. इस प्रकार उनका लेखकीय जीवन प्रारंभ हुआ था.
१९०५ में चर्मियां के साथ कैलीफोर्निया के ग्लेन इलेन में लेक रॉबिन लाज़ में रहते हुए जैक लंडन ने स्थायी रूप से 'वैली ऑफ मून' में बसने का निर्णय किया. जून में उन्होनें १३० एकड़ जमीन का एक टुकडा़ - 'हिल रैंच' खरीदा जिसमें खूबसूरत पेड़, खेत, चश्मे, सीधे खड़े पत्थरों वाली गहरी घाटियां , पहाड़ियां, और बड़ी मात्रा में जंगली जानवर थे. जमीन के छः और टुकड़े खरीदने के बाद जैक लंडन का 'ब्यूटी रैंच' १४०० एकड़ भूभाग में विस्तारित हो गया और वह सारी जमीन उन्होंने सात भागों में १९०५ से १९१३ के मध्य खरीदी थी. जैक को पशुपालन बहुत प्रिय था. अपने 'ब्यूटी रैंच' में उन्होनें अनेक प्रकार के जानवर पाल रखे थे, जिनमें विशेष प्रकार के सांड़, घोड़े और सुअर थे. उसमें उन्होनें विभिन्न प्रकार की फसलें उगायीं, जिनमें उन्होंने चालीस एकड़ में शराबी अंगूर लगाए थे. एक सोते में बांध बनाकर सिंचाई और मनोरंजन के लिए एक झील तैयार की थी. सीढ़ीदार खेती से सर्वप्रथम उन्होनें लोगों को परिचित करवाया था. बड़े रकबे में जई की फसल की रिकार्ड पैदावार की थी. उन्होनें नवीनतम प्रयोग किए. उदाहरणस्वरूप बिना कांटों का कैक्टस 'प्लांट विजार्ड' जिसे उनके मित्र लूथर बरबैंक (जो सांता रोजा के निकट रहते थे) ने विकसित किया था, जिसका उपयोग अनुर्वर क्षेत्र में जानवरों के भोजन के लिए होना था, लेकिन दुर्भाग्य से कैक्टस पूरी तरह कांटों रहित विकसित नहीं हो पाया था. उन्होनें आस्ट्रेलिया से हजारों की संख्या में युक्लिप्टस के वृक्षों का इस आशा से आयात किया था कि उनका उपयोग इमारती लकड़ी के रूप में किया जा सकेगा, लेकिन लकड़ी बहुत नरम थी. जैक का 'पिग पैलेस' काउण्टी का दर्शनीय स्थल था और जैक की कंक्रीट की खत्ती (बुखारी) कैलीफोर्निया में पहली थी. रैंच में एक और दर्शनीय बिल्डिगं थी - 'भव्य वुल्फ़ हाउस' - पूर्णतया देशी पेड़ों की लाल लकड़ी और स्थानीय उत्खनित ज्वालामुखीय और नीले स्लेटी पत्थरों से निर्मित 'वुल्फ़ हाउस' के निर्माण में दो वर्षों से अधिक का समय लगा था. जैक और चर्मियां के वहां रहने जाने से कुछ दिन पहले ही वुल्फ़ हाउस मजदूरों की लापरवाही के कारण जलकर नष्ट हो गया था, केवल दीवारें ही शेष बची थीं. भ्रमणार्थी आज भी जैक लंडन का 'ब्यूटी रैंच' देखने और उसका आनंद उठाने जाते हैं. अब यह कैलीफोर्निया का ऎतिहासिक पार्क है, जिसमें 'हाउस आफ हैपी वाल्स म्यूजियम, पिग पैलेस, जैक लंडन की कब्र, झील, वुल्फ़ हाउस के भग्नावशेष के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ दर्शनीय है.

अगला अंक
‘हम और हमारा समय’ के अंतर्गत राधेश्याम तिवारी की कविताएं और सूरज प्रकाश की कहानी- “क्या आप ग्रेसी राफेल से मिलना चाहेंगे?”

मंगलवार, 4 मार्च 2008

जीवनी


संक्षिप्त जीवनी : फ्योदोर मिखाइल दॉस्तोएव्स्की
रूपसिंह चन्देल
उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी लेखक फ्योदोर मिखाइलोविच दोस्तोएव्स्की न केवल महान रचनाकार थे, बल्कि वह एक असाधरण व्यक्ति और प्रेमी भी थे। उनका सम्पूर्ण जीवन उथल-पुथलपूर्ण था और उसके लिए परिस्थितियों के साथ वह स्वयं भी जिम्मेदार थे।
दोस्तोएव्स्की के विषय में यह कहा जाता है कि वह मनोमुग्धकारी कथाकार थे। उनके उपन्यासों ने उनकी मनोवैज्ञानिक अंतदृ‍र्ष्टि और दार्शनिक गहनता के कारण आधुनिक पाठकों में उन्हें प्रिय बना दिया था। वे अनूठे कथानकों, विलक्षण पात्रों, अविस्मरणीय स्थितियों और आश्चर्यजनक अंतो से परिपूर्ण हैं। फिर भी, उनका कोई भी कार्य शायद ही इतना चौंकानेवाला हो, जितना उनका स्वयं का जीवन… विशेषरूप से वेश्याओं, आदर्शवादी विवाहिता महिलाओं, आकर्षक और स्वतंत्र-उन्मुक्त औरतों और कामुक युवतियों के साथ बिताया गया उनका जीवन था। यही नहीं, जुआ उनकी विशेष कमजोरी था।
दोस्तोएव्स्की की दूसरी पत्नी अन्ना और उनकी पुत्री ल्यूबोव ने उनके विषय में लिखते हुए ऐसे अनेक तथ्यों के उल्लेख से अपने को बचाया जो उस महान लेखक के जीवन पर नकारात्मक प्रकाश डालते। उन्होंने दोस्तोएव्स्की की छवि एक पवित्र और सच्चरित्र व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। यही नहीं, अन्ना ने स्वयं को उनके कृष्णपक्ष के उल्लेख से बचाने के साथ ही उनके पत्रों और अन्य दस्तावेजों के अनेक उन अंशों पर काली स्याही पोत दी जिन्हें वह खतरनाक, लज्जास्पद और आपत्तिजनक मानती थी। इसके अतिरिक्त दूसरों से अपने को ‘रिजर्व’ रखने की दोस्तोएव्स्की की प्रकृति ने भी किसी हद तक हम तक पहुँचने वाली उनकी जटिलताओं और रत्यात्मक अनुभवों की झूठी तस्वीर प्रस्तुत की। अपने पत्राचारों, और यहॉं तक कि वार्तालाप में, वह अपने अंतरंग विचारों और कार्यों के प्रति इतनी सावधानी बरतते थे कि अनेक दृष्टान्तों में हमें सचाई की केवल एक आकस्मिक झलक ही प्राप्त होने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंनें लंबे समय तक अपनी मिरगी की बीमारी को मित्रों से छुपाए रखा था। एक उदाहरण पर्याप्त है। उनके मित्र डा0 स्टिपेन द्मित्रीएविच’ यनोव्स्की ने एक स्थान पर लिखा था, ‘‘ जब हम गहरे मित्र बन गये थे, दोस्तोएव्स्की ने अपने कष्टकर और उदास बचपन की स्थितियों के विषय में बताया था। अपनी माँ, बहनों और भाइयों के विषय में वह बहुत गहन भावुकता के साथ बताते थे। लेकिन अपने पिता के विषय में बात करना पसंद नहीं करते थे और अनुरोध करते थे कि उनके विषय में कोई प्रश्न न करूं।" (स्टीपेन दिमत्रीएविच यनोव्स्की ( 1817 - 1897 ) गृहमंत्रालय के सरकारी मेडिकल वितरण विभाग में डाक्टर था, जहाँ से 1871 में उसने अवकाश ग्रहण किया था। 1877 में वह स्विट्जरलैण्ड चला गया था जहाँ वह मृत्युपर्यन्त रहा था। दोस्तोएव्स्की से उसकी मुलाकात 1842 में हुई थी। जल्दी ही वे अच्छे मित्र बन गये थे।)
कहना अनुचित न होगा कि दोस्तोएव्स्की एक रहस्यमय व्यक्ति थे। युवावस्था में (साइबेरिया में सश्रम कारावास की सज़ा के लिए भेजे जाने से पहले) बारह वर्षीया एक बच्ची के साथ उनके बलात्कार की घटना का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। लेकिन उनके जीवन के रहस्यमय पक्षों और उनके चर्चित तीन प्रेम प्रसंगों (मारिया, अपेलिनेरिया और अन्ना) के विषय में उनके जीवनीकारों और अन्य विद्वानों ने पर्याप्त प्रकाश डाला है। वह एक ऐसे दुर्धर्ष लेखक भी थे जो दो उपन्यासों पर एक साथ कार्य करना चाहते थे। जोसेफ फ्रैंक और डेविड आई गोल्डस्टीन के अनुसार ‘ दि गैम्बलर’ और ‘ क्राइम एण्ड पनिषमेण्ट’ वे उपन्यास थे और तुर्गनेव का उपहास उड़ाते हुए वह कहते कि ‘‘ वह यह सोचकर ही पागल हो जायेगा।" यहाँ यह विचारणीय है कि तुर्गनेव वह व्यक्ति थे जिन्होंनें दोस्तोएव्स्की की आर्थिक सहायता की थी। यह भी कम आश्चर्यजनक बात नहीं कि लियो तोल्स्तॉय और दोस्तोएव्स्की समकालीन होते हुए भी एक दूसरे से मिलने से बचते रहे। लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण और विचारणीय बात यह है कि ऐसे कौन-से कारण रहे जिससे दोस्तोएव्स्की का जीवन पतनोन्मुख बना।
फ्योदोर दोस्तोएव्स्की पाँच भाई और दो बहनें थे। परिवार में पिता का कठोर अनुशासन था जो मास्को के ‘मारिन्स्की’ अस्पताल में डाक्टर थे। वह गर्म मिजाज, चिड़चिडे़ और शंकालु स्वभाव के थे। वह अपनी पत्नी को निरंतर प्रताड़ित करते रहते थे। ऐसा माना जाता है कि पिता द्वारा माँ की प्रताड़ना से आहत और आत्मकेन्द्रित दोस्तोएव्स्की कालांतर में मिरगी की बीमारी का शिकार बन गये थे। घर में पिता का ऐसा आतंक था कि दोस्तोएव्स्की बंधुओं को किसी से प्रेम करने का अवसर युवावस्था तक नहीं प्राप्त हुआ था। उन्हें कभी-कहीं स्वयं जाने की अनुमति न थी और न ही कभी उन्हें जेब खर्च प्राप्त होता था। सत्रह वर्ष की आयु तक फ्योदोर दोस्तोएव्स्की को निजी खर्च के लिए एक भी पैसा नहीं दिया गया था। शायद यही कारण था कि जीवन में पैसों के मूल्य को वह समझ नहीं पाये थे। हजारों रूबल की रायल्टी वह पानी की तरह बहा देते थे। संकीर्णता, निरंकुशता और चिड़चिड़ाहट फ्योदोर मिखाइलोविच दोस्तोएव्स्की को अपने पिता से विरासत में प्राप्त हुई थी।
दोस्तोएव्स्की की माँ की मृत्यु युवावस्था में 1837 में हो गयी थी। पिता ने फ्योदोर और उनके भाई माइकल को पीटर्सबर्ग के ‘मिलटरी इंजीनियरिंग’ कॉलेज में भर्ती करवा दिया था। यह विद्यालय उच्च शैक्षिक स्तर के लिए प्रतिष्ठित था। सीनियर छात्र फ्योदोर को प्राय: परेशान करते रहते थे। दोस्तोएव्स्की के साथ पढ़ने वाले एक छात्र कोन्स्तान्तिन त्रतोव्स्की, जो बाद में एक कलाकार और शिक्षाविद के रूप में विख्यात हुआ था, के अनुसार, ‘‘ 1838 में दोस्तोएव्स्की दुबले और बेढंगे दिखते थे, क्योंकि उनके कपड़े उनके शरीर पर बोरे की भाँति लटकते रहते थे। व्यवहार में वह चिड़चिड़े और प्रकट में परेशान दिखाई देते थे ।… वह लोगों से मिलने से बचते थे। लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाये, वह यह नहीं जानते थे और महिलाओं के बीच वह बुरी तरह घबड़ा जाते थे।"
पत्नी की मृत्यु के पश्चात् डाक्टर दोस्तोएव्स्की ने नौकरी छोड़ दी थी और अपनी रखैल कैथरीन अलेक्जैण्ड्रोव्ना, जो मास्को में उनकी नौकरानी थी, के साथ गाँव जाकर रहने लगे थे, जहॉं उन्होंनें छोटी-सी जागीर खरीद रखी थी। वह अत्यधिक पीते और मामूली कारणों से कृषि-दासों और घरेलू नौकरों पर कोड़े बरसाते थे। गाँव के किसान उनसे घृणा करते थे। उन लोगों ने अलेक्जैण्ड्रोव्ना के चाचा एफिम मैक्सिमोव के साथ मिलकर डाक्टर दोस्तोएव्स्की की हत्या कर दी थी।
पिता की मृत्यु ने भी फ्योदोर दोस्तोएव्स्की को गहराई तक प्रभावित किया था। अत: कहा जा सकता है कि दोस्तोएव्स्की के व्यक्तित्व निर्माण में अनेक बातें सहायक थीं। पालन-पोषण के समय पिता द्वारा संयम की शिक्षा, मर्यादित और संतुलित आदत का दबाव, माँ की मृत्यु, पिता की नशाखोरी, रखैल सौतेली माँ, किसानों और नौकरों के प्रति पिता का क्रूर व्यवहार , किसानों की पिता के प्रति घृणा , उनके अपने प्रति लोगों का व्यवहार, ये सभी एक प्रकार से प्रारंभिक दुर्व्यवस्था के उद्भव के कारक थे और भावी भयंकर खतरे की चेतावनी इनमें छिपी हुई थी। विद्यालय जीवन काल में एक बार फ्योदोर ने अपने भाई माइकल से कहा था, ‘‘मेरे पास एक योजना है… पागल हो जाने की।"
1841 में दोस्तोएव्स्की को जूनियर सेकेण्ड लेफ्टीनेण्ट बनाया गया। 1843 में वह सेकेण्ड लेफ्टीनेण्ट के रूप में स्नातक बने और उन्हें इंजीनियरिगं विभाग में सरकारी नौकरी मिल गयी थी। एक अधिकारी के रूप में उन्होंने बहुत संक्षिप्त समय ही कार्य किया। 1844 में उन्होंने अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया था। त्यागपत्र देने के बाद उन्होंने अपने भाई माइकल को लिखा था, ‘‘अपने महत्वपूर्ण वर्षों को बरबाद क्यों करूं? अब मैं स्वतंत्र हूँ। एक शैतान की भांति काम करूंगा।"
दरअसल दोस्तोएव्स्की लेखक बनना चाहते थे। उन दिनों वह बाल्जाक के उपन्यासों के अनुवाद कर रहे थे और अपने उपन्यासों की योजना बना रहे थे। जीवन के प्रति बहुत ही लापरवाह थे। सदैव कर्ज में डूबे रहते थे। वह माइकल के जर्मन मित्र डा0 रीसेन्कैम्प के मकान में रहते थे। एक बार उन्हें अपने प्रकाशक से एक हजार रूबल प्राप्त हुए, लेकिन ठीक दूसरे दिन सुबह ही वह डाक्टर को आश्चर्यचकित करते हुए उससे पाँच रूबल मांग रहे थे। 1 फरवरी, 1844 को दोस्तोएव्स्की को प्रकाशक से एक और बड़ी राशि (संभवत: एक हजार रूबल) प्राप्त हुई, लेकिन शाम तक उनके पास मात्र एक सौ रूबल ही बचे थे। शेष राशि उन्होंने बिलियर्ड और डोमिनोज (ताश के एक प्रकार के खेल) में नष्ट कर दिये थे।
दोस्तोएव्स्की के अंदर प्रेम पाने की उत्कट अभिलाषा हिलोरे लेने लगी थी। अपने आत्मकथात्मक लघु उपन्यास ‘‘ह्वाइट नाइट्स" जो ‘पुअर फॉक’ के तुरंत बाद लिखा गया था और 1848 में प्रकाशित हुआ था, दोस्तोएव्स्की ने एक ऐसे नौजवान का चित्रण किया है जो राजधानी की सड़कों में प्यार के प्रतिदान की प्रतीक्षा में भटकता है। लेकिन उसका प्यार केवल कल्पना में ही होता है। दोस्तोएव्स्की महिलाओं के विषय में सोचते, लेकिन उनके सामने पड़ने पर उनसे बचने का प्रारंभ में प्रयत्न भी करते रहे थे।
‘पुअर फॉक’ की सफलता से सेण्ट पीटर्सबर्ग के बंद दरवाजे दोस्तोएव्स्की के लिए खुल गये थे। इवान पानेव के घर में 15 नवम्बर, 1845 को उनका परिचय पानेव की पत्नी अवदोतिया (ईडोक्सिया) से हुआ। उन्होंने 16 नवम्बर, 1845 को माइकल को लिखा, ‘‘कल मैं पहली बार पानेव के घर गया था और मैं सोचता हूँ कि मैं उसकी पत्नी को प्यार करने लगा हूँ।"
अवदोतिया ने अपने संस्मरण में लिखा था, ‘‘यह स्पष्ट था कि वह भयानक रूप से विकल और अतिसंवेदनशील युवक थे… मेरे यहाँ उपस्थित साहित्यकार किसी न किसी विवाद में दोस्तोएव्स्की को खींचकर उनके विषय में ऐसी चुभती हुई बातें करते, जिससे उनका अहम आहत होता था। वह चिड़चिड़ा उठते थे। तुर्गनेव उनमें सबसे आगे होते थे। ‘‘यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि ऐसा उस महिला की उपस्थिति में होता था जिसे वह प्यार करते थे, लेकिन जो उनके प्रति केवल अपमानजनक विनम्रता ही प्रदर्शित करती थी। शायद यही करण रहा होगा कि दोस्तोएव्स्की और तुर्गनेव के सम्बन्ध आगे मधुर नहीं रहे थे।
अधिकांश मिरगी के शिकार लोगों की भांति दोस्तोएव्स्की में वासनात्मक उत्तेजकता का आधिक्य था। देह के प्रति यह आकर्षण पानेवा के प्रति सम्मोहन के रूप में उनमें नहीं प्रकट हुआ था, बल्कि वेश्यागमन और गंदी बस्तियों में सहजरूप से उपलब्ध होने वाली महिलाओं के कारण था। लेकिन नौजवान दोस्तोएव्स्की प्रेम और शारीरिक सुख में भेद करना समझने लगे थे। संभव है कि पानेवा पर शारीरिक अधिकार पाने की असफलता उन्हें वेश्यालयों और पीटर्सबर्ग की गंदी बस्तियों की महिलाओं तक खींच ले गई हो। उन्होंने माइकल को लिखे 16 नवम्बर के पत्र में आगे लिखा था, ‘‘मैं इतना बिगड़ गया हूँ कि सामान्य ढंग से नहीं रह सकता," उन दिनों दोस्तोएव्स्की जिस समाज में विचरण करते थे, उसमें उनकी शामें प्राय: वेश्यालयों में व्यतीत होती थीं। उन्होंने स्वयं एक स्थान पर यह स्वीकार किया था कि वह अपने मित्रों के साथ रंग-रेलियाँ मनाया करते थे। यह भी विश्वसनीय नहीं प्रतीत होता कि मधुशालाओं में शामें बिताने वाले दोस्तोएव्स्की वेश्याओं से बचे कैसे रह सके थे जैसा कि उनकी पत्नी और पुत्री ने कहना चाहा था। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने ओपोचिनिन से कहा था कि वासना किस प्रकार मनुष्य को विचलित करती है और किस प्रकार वह यौनेच्छा के वशीभूत हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा था कि देहेच्छा की मानसिक उत्तेजना स्वयं पाप से भी अधिक बदतर होती है। क्रान्तिकारी गतिविधियों के लिए अपनी गिरफ्तारी के बाद 1849 में जेल से उन्होंने माइकल को लिखा था, ‘‘ बंदी जीवन ने पूरी तरह मेरी दैहिक आवश्यकताओं, जो कि पूरी तरह परिशुद्ध नहीं थीं, को अब तक लगभग नष्ट कर दिया है।"
दोस्तोएव्स्की माइकल पेत्राशेव्स्की बुराशेविच के सम्पर्क में आये थे, जो एक क्रान्तिकारी दल का नेता था। अफवाह थी कि खुफिया पुलिस को जार के विरुद्ध एक षडयंत्र का पता चला था, जो कि एक दल समाजवाद, नागरिक अधिकारों और किसानों की मुक्ति के लिए क्रान्तिकारी गतिविधियों में संलग्न था। बीस लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें दोस्तोएव्स्की भी थे। उन्हें 23 अप्रैल 1849 गिरफ्तार करके पीटर्सबर्ग की ‘सेण्ट पीटर एण्ड पाल’ किले की एक काल कोठरी में बंद कर दिया गया था। सभी को मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई थी। 22 दिसम्बर 1849 को उन्हें मृत्यु दण्ड दिया जाना था। लेकिन जार ने मृत्युदण्ड की सजा बदल दी थी। दोस्तोएव्स्की को चार वर्ष की साइबेरिया में सश्रम कारावास की सजा दी गई थी। उसकी समाप्ति के पश्चात् चार वर्षों तक उन्होंने सेना के अधीन कार्य करना था।
22 दिसम्बर, 1849 के बाद दोस्तोएव्स्की ने माइकल को लिखा, ‘‘ … हां, यह पूरी तरह सच है कि मस्तिष्क जो रचनात्मकता का आदी हो, जो जीवन की उच्चतम कलात्मकता में जीता हो, और जो आत्मा की उच्चाकांक्षाओं का अभ्यस्त हो, वह मस्तिष्क मेरे स्कंध से कट गया है… ऐसा हो सकता है कि मैं कभी पेन न पकड़ सकूं ? … हाँ , यदि मेरे लिए लिखना असंभव हुआ तो मैं मर जाऊंगा। कारावास की कालकोठरी के पन्द्रह वर्ष अच्छे लेकिन हाथ में पेन हो… विदा !…।"
माइकल को विदा कहने के दो दिन बाद, क्रिसमस की पूर्वसंध्या को, दोस्तोएव्स्की के पैरों में आठ पौण्ड की बेडि़यां डालकर स्लेज में बैठा दिया गया था जो एक राजनैतिक अपराधी के रूप में युरोस्लाव और निनी नावगोरोद के रास्ते दो हजार मील दूर उन्हें सश्रम कारावास हेतु साइबेरिया ले जाने वाली थी। आगामी चार वर्ष का समय उन्होनें ओमस्क बंदीगृह में कठोर सजा के रूप में काटे थे, जिसके विषय में उनका कथन था कि ताबूत का ढक्कन उन पर जड़ दिया गया था और उन्हें जीवित ही दफ्न कर दिया गया था। बंदीगृह में वह हत्यारों, चोरों, हिसंक और विक्षिप्त लोगों से घिरे हुए थे। उस भीड़ के मध्य एकाकी ही उन्होनें वह सजा काटी थी।
फरवरी, 1854 में दोस्तोएव्स्की को जेल से रिहा करके सेमीपलातिन्स्क की साइबेरियन इन्फैण्ट्री रेजीमेण्ट में निजी तौर पर कार्य करने के लिए भेज दिया गया था। कुछ दिनों बाद उन्हें कस्बे के एक छोर में वीरान स्थान में एक निजी झोपड़ी किराये पर लेकर रहने की अनुमति मिल गयी थी। उनकी मकान मालकिन एक सैनिक की विधवा थी और उसकी प्रतिष्ठा खराब थी। उसकी छोटी बेटी अत्यंत सुन्दर थी और दोस्तोएव्स्की के उसके साथ संबन्ध स्थापित हो गये थे। कठोर दण्ड और संयम की बाध्यता के पश्चात् अत्यन्त सम्मोहक रूप से वह महिलाओं की ओर खिंचे थे और हर नयी महिला से उनकी मुलाकात का उन पर गहन प्रभाव पड़ता था। उन्होंने सत्रह वर्षीया लिजान्का नेवारोतावा से भी मित्रता गांठ ली थी, जो बाजार में एक स्टॉल पर सफेद पाव रोटी बेचती थी। सेमीपलातिन्स्क आने के कुछ महीनों बाद वह अलेक्जेण्डर इसाएव और उसकी पत्नी मारिया से मिले थे। इसाएव उन दिनों बेकार था। शराब ने उसे बर्बाद कर दिया था। खराब स्वास्थ्य और कमजोर इच्छाशक्ति के कारण शराबियों और बदमाशों का साथ उसे भाने लगा था। दोस्तोएव्स्की ने इसाएव से मित्रता कर ली थी। वह मारिया के प्रति आकर्षित थे। मारिया का पति घर की मधुशाला में रहना पसंद करता था, या नशे में धुत्त दीवान पर पसरा होता था, जबकि मारिया फ्योदोर के साथ अकेली होती थी। 1855 में इसाएव को कर-निर्धारक के रूप में सेमीपलातिन्स्क से पाँच सौ मील दूर कुजनेत्स्क में पुन: नौकरी मिल गयी थी। कुछ समय पश्चात् ही इसाएव की मृत्यु हो गयी थी। दोस्तोएव्स्की मारिया के प्रति अत्यधिक आसक्त थे और उससे विवाह करना चाहते थे। अतंत: मारिया विवाह के लिए तैयार हो गयी थी। लेकिन मारिया के साथ उनका वैवाहिक जीवन सफल नहीं रहा था। इसके अनेक कारण थे,
जिनके विषय में मेरी पुस्तक (‘दॉस्तोएव्स्की के प्रेम’ संवाद प्रकाशन, आई–499, शास्त्रीनगर, मेरठ – 250 004, पृ0 232, मूल्य : 200/– पेपर बैक और 350/– हार्ड बाउण्ड) में वर्णन किया गया है।
मारिया के जीवित रहते ही दोस्तोएव्स्की जिस युवती के प्रेम में पड़ गये थे- वह थी अपोलिनेरिया। वह उसके प्रति भी चुम्बकीय रूप से आकर्षित हुए थे, लेकिन वहाँ भी वह असफल रहे थे। इस असफलता के लिए वह अपनी बीमारियों को दोष देते थे। वह मिरगी और बवासीर का शिकार तो थे ही… अस्थमा का प्रकोप भी कभी-कभी उन्हें झेलना पड़ता था। इतना सब होने के बावजूद जुआ और शराब की लत से वह अपने को मुक्त नहीं कर पाये थे। प्राय: कर्जदार रहते थे।
मारिया की मृत्यु और अपोलिनेरिया के असफल प्रेम के बाद वह अन्य युवतियों के प्रति भी आकर्षित हुए थे, जिनमें उनके मित्र डाक्टर स्टीपेन द्मित्रीएविच यनोव्स्की की पत्नी ए. आई शुबर्ट भी थी, लेकिन उन्हें वहाँ भी सफलता नहीं मिली थी। इससे पहले वह मार्था ब्राउन नाम की युवती के साथ लगभग डेढ़ वर्ष तक रहे थे। उनके विषय में उनके मित्र और उनके प्रथम जीवनीकार एन. एन. स्त्राखोव ने लियो तोल्स्तॉय को 28 नवबंर,1883 के अपने पत्र में लिखा था कि, ‘‘वह (दोस्तोएव्स्की) पाशविक कामुकता वाले व्यक्ति थे।" यहां बताना अनुपयुक्त न होगा कि समकालीन होते हुए भी तोल्स्तोय और दॉस्तोएव्स्की एक दूसरे कभी नहीं मिले थे। दॉस्तोएव्स्की की मृत्यु पर तोल्स्तोय ने लिखा – ‘‘मेरा कितना जी चाहता है कि दॉस्तोएव्स्की के बारे में मैं जो कुछ महसूस करता हूँ वह सब बयान कर सकूं।…मैं उनसे कभी नहीं मिला और न ही उनसे मेरा कभी कोई संपर्क रहा, लेकिन उनके मर जाने के बाद मेरी समझ में आया कि वह मेरे कितने निकट, कितने प्रिय और मेरे लिए कितने आवश्यक व्यक्ति थे। … मैं उन्हें अपना मित्र समझता था और मैनें सोचा कि यह संयोग की ही बात है कि मैं उनसे अब तक नहीं मिल सका, पर कभी न कभी अवश्य मिलूंगा। एक दिन दोपहर का भोजन करते समय- मैं अकेला ही भोजन कर रहा था, क्योंकि मुझे देर हो गयी थी- मैंने पढा : वह मर गये। मेरे अंदर जैसे कोई आधार सहसा टूट गया। मुझे गहरा आघात पहुंचा, और फिर यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गयी कि वह मुझे कितने प्रिय थे, और मैं रो पड़ा, और अब तक रो रहा हूँ।"
जीवन के पैंतालीसवें वर्ष में अन्ना ने उनके जीवन में प्रवेश किया था। अन्ना तब बीस वर्ष की थी। ज़िन्दगी भर वह इस कुंठा का शिकार रहे कि वह अन्ना को दैहिक सुख प्रदान करने में अक्षम थे। इस कारण वह पूर्वापेक्षा अधिक ही चिड़चिड़े हो गये थे। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल इसके विपरीत थी। अन्ना उनके प्रति पूर्णरूप से समर्पित थी। मारिया और अपोलिनेरिया ने गृहस्थ जीवन के प्रति जहां अरुचि दिखाई थी, वहीं अन्ना ने एक सद्गृहणी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया था। उसने पति को नियंत्रित करने का प्रयत्न किया था। वह कितना सफल रही थी, कहना कठिन है। लेकिन उसने उनकी पुस्तकों के प्रकाशन, रॉलल्टी और विवरण की व्यवस्था संभाल ली थी। एक समय ऐसा आया जब उनके सम्पूर्ण साहित्य के, जिसमें से अधिकांश गार्जियन के पास था, प्रकाशन का कार्य उसने स्वयं संभाल लिया था। अन्ना से लियो तोल्स्तोय की पत्नी सोफिया अन्द्रेएव्ना ने प्रेरणा ग्रहण करते हुए तोल्स्तोय का साहित्य स्वयं प्रकाशित करना प्रारंभ कर दिया था। यद्यपि दॉस्तोएव्स्की और तोल्स्तोय आजीवन एक दूसरे नहीं मिले थे लेकिन सोफिया अन्द्रेएव्ना से दॉस्तोएव्स्की की अच्छी मित्रता थी। अन्ना ने अपने संस्मरणों में यह उल्लेख किया है कि सोफिया प्राय: दॉस्तोएव्स्की से मिलने आया करती थीं और उनसे सलाहें भी लिया करती थीं।
कहना उचित होगा कि अन्ना ने दॉस्तोएव्स्की के अराजक जीवन को किसी हद तक संभाल लिया था।


रूपसिंह चन्देल
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वातायन - अप्रैल 2008
‘हम और हमारा समय’ के अंतर्गत सुभाष नीरव की कविताएं और ‘जीवनी’ के अंतर्गत महान अमेरिकी लेखक जैक लंडन की संक्षिप्त जीवनी

मंगलवार, 1 जनवरी 2008

जीवनी


संक्षिप्त जीवनी : लियो तोल्स्तॉय

किसानों के हमदर्द लेखक : लियो तोल्स्तॉय
रूपसिंह चन्देल

‘युद्ध और शांति’, ‘अन्ना कारेनिना’, ‘पुनरुत्थान’, और ‘हाजी मुराद’ उपन्यास, तीन आत्मकथात्मक उपन्यास – ‘बचपन’, ‘किशोरावस्था’, और ‘कज्ज़ाक’, ‘फ़ादर सेर्गेई’, ‘इवान इल्यीच की मृत्यु’, ‘क्रुट्ज़र सोनाटा’ (लंबी कहानी), ‘घोड़े की कहानी’, ‘बाल नृत्य के बाद’ आदि कहानियाँ, ‘अंधकार की सत्ता’ तथा ‘जीवित शव’ नाटक सहित लगभग पचीस कृतियों के लेखक, चिन्तक, विचारक, दार्शनिक, शांतिवादी और शैक्षिक सुधारक लियो निकोलएविच तोल्स्तॉय का जन्म कास्को से दो सौ किलोमीटर दूर तूला नगर के यास्नाया पोल्याना नामक जागीर में एक समृद्ध तथा उच्च कुलीन परिवार में 28 अगस्त (नये कलेंडर के अनुसार 9 सितम्बर) 1828 को हुआ था। उनके पिता का नाम निकोलई इल्यिच ताल्स्तॉय और मॉं का नाम मारिया निकोनिकोलएव्ना था। उनकी मॉं प्रतिष्ठित वोल्कोन्स्की परिवार से थीं और महाकवि पुश्किन की दूर की रिश्तेदार थीं। लियो तोल्स्तॉय जब दो वर्ष के थे, उनकी मॉं की मृत्यु हो गयी थी।
बच्चों की शिक्षा के उद्देश्य से निकोलई इल्यिच तोल्स्तॉय ने मास्को जाने का निर्णय किया। 10 जनवरी, 1837 को यास्नाया पोल्याना से उनकी यात्रा सात स्लेजों में प्रारंभ हुई, जिन्हें उनके अपने और किराये के घोड़े खींच रहे थे। लियो की वृद्धा दादी एक अलग स्लेज में थीं। मास्को में प्ल्यू्श्चिखा में शेर्बाचेव का मकान किराये पर लिया गया, जहॉं वे अठारह महीनों तक रहे थे। निकोलई ने बच्चों की शिक्षा के लिए फ्योदोर एवानोविच नामक शिक्षक नियुक्त किया था। लेकिन इन्हीं दिनों एक दुर्घटना घटी थी। एक सम्पत्ति विवाद के सिलसिले में निकोलई इल्यिच तोल्स्तॉय को अकस्मात तूला जाना पड़ा था। 19 जून, 1837 को उन्होनें मत्यूशा नामक शिकारी, जो उनका नौकर भी था, के साथ तूला के लिए प्रस्थान किया और 24 घंटों से भी कम समय में लंबी यात्रा तय कर 21 जून को वह वहां पहुंचे थे। वह किसी से मिलने जा रहे थे कि रास्ते में गिर गये थे और उनकी मृत्यु हो गयी थी। 25 मई, 1838 को लियो तोल्स्तॉय की दादी प्रिन्सेज गोर्चाकोवा की भी मृत्यु हो गयी थी। पिता की मृत्यु के समय लियो मात्र 9 वर्ष के थे। उनके, उनके भाइयों और बहन के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनकी एक आंट अलैक्जैड्रां इल्यिनिच्ना ने संभाली लेकिन 1841 में उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी दूसरी आंट तात्याना अलैक्जाड्रोंव्ना ने उनके पालन-पोशण का भार संभाला था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद लियो तोल्स्तॉय कज़ान विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए गये। उस समय उनकी आयु 13 वर्ष थी। उनके साथ उनका निजी नौकर वन्यूशा था जो बालक ही था और जो बाद में उनकी काकेशस यात्रा के समय उनके साथ रहा था। कज़ान में वह एक अवकाश प्राप्त कर्नल युश्कोव के घर में रहे थे। पढ़ाई की दृष्टि से तोल्स्तॉय अच्छे छात्र नहीं थे। उनकी पत्नी ने अपने संस्मरण में इस विषय में लिखा है, ‘‘वह अच्छे विद्यार्थी नहीं थे और गणित सीखने में उन्हें बहुत कठिनाई होती थी…।" उन्होंने कज़ान विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या विभाग में प्रवेश लिया, किन्तु एक वर्ष पश्चात् ही वह पढ़ाई छोड़कर उन्होनें विधि शास्त्र विभाग में प्रवेश ले लिया था। लेकिन मन यहॉं भी उनका नहीं रमा। वहॉं उनके प्रोफेसर थे-डी. आई. मेयर, जो बहुत अच्छे व्यक्ति थे। वह तोल्स्तॉय में विशेष रुचि ले रहे थे। उन्होंने उन्हें एक विषय पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने का कार्य सौंपा। लेकिन, तोल्स्तॉय वह कार्य नहीं कर पाये थे। बहुत वर्षों बाद पी. पेकार्स्की ने डी. आई. मेयर पर एक संस्मरण लिखा था, जो 1859 में प्रकाशित एक पुस्तक में संकलित हुआ था। उसमें उन्होंने प्रो0 का कथन उद्धृत किया था। प्रो0 मेयर ने कहा था, ‘‘मैनें आज उसकी परीक्षा ली, और देखा कि पढ़ने की उसकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। खेद का विषय है। उसकी ऐसी अभिव्यंजक मुखाकृति और बुद्धिमानों जैसी आंखें हैं कि मैं यह मानता हूँ कि सद्भावना और स्वतंत्रता से एक असाधारण व्यक्ति के रूप में वह अपना विकास कर सकता है।"
तोल्स्तॉय ने स्वेच्छया दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया, जिसने उनके भावी लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। बाद में उन्होंनें बाइबिल, अरब की लोक कथाएं, प्राचीन रूसी साहित्य, और ऐसा साहित्य जिसके लेखकों के नाम लोग भूल गये थे, अठारहवीं शताब्दी का साहित्य और भूले-बिसरे जर्नल्स खोजकर पढ़े थे। उन्होंने पुश्किन को बार-बार पढ़ा, और रूसो को बचपन में ही पढ़ डाला था। उन्होंने जिप्सी संगीत से भी बहुत कुछ सीखा था।
लियो तोल्स्तॉय के घर में प्रस्कोव्या इसाएव्ना नाम की एक नौकरानी थी, जो बचपन में उन्हें कहानियां सुनाया करती थी। कभी वह उनके दादा, जो सेना में जनरल थे, के बहादुरी के किस्से सुनाती तो कभी लोक-किस्से। कहा जा सकता है कि दादी-नानी की बचपन में सुनी कहानियों की भांति इसाएव्ना की कहानियों ने लियो के बचपन में ही एक महान लेखक की बुनियाद रख दी थी। उसके विषय में तोल्स्तॉय को ज्ञात हुआ था कि वह फोका नामक खानसामा को प्यार करती थी, और उसके साथ शादी की अनुमति चाहती थी। लेकिन उनके दादा ने उसे शादी की अनुमति नहीं दी थी।
तोल्स्तॉय ने किसानों के जीवन का निकट से गहन अध्ययन किया। वह उनकी दयनीय जीवन-स्थितियों से दुखी और व्यवस्था के प्रति विक्षुब्ध थे। उन्होंनें यास्नाया पोल्याना में खेती के कार्यों में अपने को व्यस्त कर लिया था। यह कज़ान से लौट आने के बाद की घटनाएं थीं। उन्होंनें एक थ्रेशिंग मशीन बनायी, जिसका वर्णन उन्होंनें ‘जमींदार की एक सुबह’ में किया है। इस मशीन ने भारी शोर किया था, सनसनाई थी और दम तोड़ दिया था। उन दिनों तोल्स्तॉय 18 वर्ष के थे। थ्रेशिंग मशीन द्वारा किसानों के श्रम को कम करने का उनका सपना टूट गया था। फरवरी, 1849 में वह अपनी मास्टर्स डिग्री के लिए सेंट पीटर्सबर्ग गये थे। जुआ खेलने की लत उन्हें वहीं लगी थी। वह कर्ज में इतना डूब गये थे कि मार्च 1849 में उन्होंने सेर्गेई को लिखा था कि वह उनके घोड़े और कुछ जमीन बेचकर पैसे भेजे। उन्होंनें अपने कारिन्दा को जंगल बेचने के लिए लिखा था। उन्होंनें सेर्गेई को पुन: लिखा और कहा कि वह ‘खरीदारों से किसी भी शर्त‘ पर सौदा करके उन्हें पैसे भेजे। ‘हाजी मुराद‘ और ‘कज्ज़ाक‘ में उन्होंने अपने इस अनुभव का लाभ उठाया है। उसके बाद उन्होंनें विदेश यात्राएं कीं। वह उन स्थानों पर गये, जहॉं कभी रूसो रहे थे और जहॉं उन्होंने नयी शिक्षा पद्धति का स्वप्न देखा था। यात्रा के अंत में तोल्स्तॉय भी रूस में पब्लिक विद्यालय शिक्षा के विषय में सोचने लगे थे।
यास्नाया पोल्याना लौटकर तोल्स्तॉय ने किसानों के लिए एक स्कूल की स्थापना की थी। यह उनके एक आलेख – ‘पब्लिक विद्यालयों के प्रबन्धन के लिए योजना का प्रारूप‘ से स्पष्ट है। विद्यालय को सरकारी मान्यता प्राप्त न थी। यहॉं युवा तोल्स्तॉय अपने किसानों के बच्चों को पढ़ाते थे। उनका पुराना नौकर फोका इस कार्य में उनकी सहायता करता था। उनके काकेशस चले जाने के बाद यह कार्य बाधित हुआ था, लेकिन वहॉं से लौटने के बाद उन्होंनें पुन: विद्यालय प्रारंभ कर दिया था। तब स्कूल चलाने के लिए उन्होंनें मास्को के ग्यारह विद्यार्थियों का चयन किया था। इन्हीं दिनों उन्हें किसानों और जमींदारों के बीच मध्यस्थता करने के लिए पब्लिक आर्बिट्रेटर चुना गया था। परिणामत: किसानों के बच्चों के लिए उस क्षेत्र में अनेक स्कूल खुले थे, लेकिन यास्नाया पोल्याना का स्कूल उनके लिए था।
लियो तोल्स्तॉय के परिवार में सैन्य सेवा की सुदीर्घ परम्परा रही थी। उनके पिता ने 1812 में नेपोलियन के विरुद्ध युद्ध किया था। तोल्स्तॉय के बड़े भाई निकोलई सेना में भर्ती हुए थे। 1851 में तोल्स्तॉय भी उनके साथ गए और एक बाहरी व्यक्ति के रूप में सेना के लिए अपनी सेवाएं अर्पित की थीं। उस समय उनकी आयु बाईस वर्ष थी। सेना में वह लगभग पांच वर्ष रहे थे। कमीशन प्राप्त करने के लिए उन्हें बहुत प्रयास करना पड़ा था। परिवार के उच्च संपर्कों का सहारा लेना पड़ा था। उन्होंने काकेशिया, डेन्यूब और क्रीमिया की लड़ाइयों में भाग लिया था। सैन्य अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी, भले ही एक बाहरी व्यक्ति के रूप में, उन्हें काकेशिया तथा सेवस्तोपोल के युद्धों से संबन्धित कहानियों और ‘कज्ज़ाक‘ , ‘युद्ध और शांति’ तथा ‘हाजी मुराद’ जैसे उपन्यासों के सृजन में सहायक सिद्ध हुई थी। उनकी पत्नी सोफिया अन्द्रेएव्ना ने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘‘वह प्राय: मुझसे यह कहते थे कि उनकी सबसे सुखद स्मृतियां काकेशिया से जुड़ी हुई हैं। उन दिनों उन्होंनें बहुत पढ़ा, स्टेर्न की रचनाओं का अनुवाद किया। यहीं उन्होंने ‘बचपन’ और ‘किशोरावस्था’ की रचना की थी।"
वैसे तोल्स्तॉय ने पहली रचना, 1841 में हुई अपनी बुआ की मृत्य के बाद कविता के रूप में लिखी थी।
काकेशिया प्रवास भावी लेखक तोल्स्तॉय के लिए वरदान सिद्ध हुआ था। वास्तविकता यह थी कि वह सोची-समझी योजना के बाद ही सैन्य सेवा में गये थे, क्योंकि न केवल वह सैन्य अभियानों को निकट से देखना चाहते थे, बल्कि उस पूरे प्रांत का बहुआयामी अध्ययन भी करना चाहते थे। ‘कज्ज़ाक’ और ‘हाजी मुराद’ इसका प्रमाण हैं। काकेशस में लिखी गयी उनकी रचना ‘बचपन’ उस समय की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘सोव्रेमेन्निक‘ (समकालीन) में प्रकाशित हुई थी। तोल्स्तॉय ने इसमें लेखक के रूप में अपना नाम नहीं दिया था। लेकिन जब पाठकों और आलोचकों ने ‘बचपन’ की प्रशंसा की तब उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा था। इस विषय में उन्होंनें अपनी डायरी में लिखा, ‘‘मैं इसे पढ रहा था, प्रशंसा के कारण अभिभूत हुआ जा रहा था और मेरी छाती गर्व से फटी जा रही थी।" इस पत्रिका के सम्पादक थे प्रसिद्ध कवि और लेखक नेक्रासोव। नेक्रासोव ने इस पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, ‘‘ लेखक हमें हमारे लिए सर्वथा नयी दुनिया में ले जाता है… उनमें पात्रों को समझने और उनके स्वरूप के विषय में गहरी सचाई अभिव्यक्त हुई है… ।"
काकेशिया में रहते हुए ही तोल्स्तॉय ने एक लेखक के रूप में प्रसिद्धि पा ली थी। जब वह वहां से नवम्बर 1855 में पीटर्सबर्ग लौटकर आये, तब उस समय के महान रूसी रचनाकारों, आस्त्रोव्स्की, चेर्नीशेव्स्की, तुर्गनेव और गोंचारोव ने उनका एक बड़े लेखक के रूप में स्वागत किया था। तुर्गनेव ने तोल्स्तॉय की बहन मारिया को लिखा था, ‘‘हम सब की राय में लेव निकोलएविच हमारे सर्वश्रेष्ठ लेखकों की पांत में आ गये हैं और अब तो उन्हें कोई ऐसी चीज लिखनी चाहिए कि वह प्रथम स्थान प्राप्त कर लें जिसके योग्य वह हैं और जो उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।" यहां यह उल्लेख करना अनुचित न होगा कि लेखक तुर्गनेव और तोल्स्तॉय की बहन मारिया के मध्य प्रेम संबन्ध थे। मारिया ने अपने पति से तलाक ले लिया था। वह तुर्गनेव से विवाह करना चाहती थी, जिसे तुर्गनेव लंबे समय से टालते आ रहे थे। तोल्स्तॉय के लिए यह एक अप्रिय स्थिति थी। तुर्गनेव के प्रशंसक होने के बावजूद कुछ विषयों में तोल्स्तॉय का उनसे मतवैभिन्य था। उस पर मारिया के संबन्धों का मामला। दरअसल, तुर्गनेव मॉलिन वर्डोट को प्यार करते थे, जिसके मकान में वह रहते थे। लेकिन सुश्री वर्डोट से तुर्गनेव को अपने प्रेम का उत्तर नहीं मिला था। तुर्गनेव के एक पुत्री थी, जिसके पालन-पोषण के लिए वह विशेष चिन्तित रहते थे और सुश्री वर्डोट उस बच्ची की देखभाल करती थीं। लेकिन तोल्स्तॉय मारिया के विषय में चिन्तित थे। 1861 के वसंत में कवि अफानसी फेट की जागीर स्तपनोव्का में एक सुबह नाश्ते के दौरान तुर्गनेव और तोल्स्तॉय की मुलाकात हो गयी थी। किसी विषय पर दोनों में झड़प हुई थी और बहन को लेकर तोल्स्तॉय के मन में जमी क्षुब्धता फूट पड़ी थी। इस सबके बावजूद तोल्स्तॉय के हृदय में तुर्गनेव के विरुद्ध दुर्भाव न था। तुर्गनेव ने अपने किसानों को स्वतंत्र कर दिया था और दुर्भिक्ष के दौरान गरीब किसानों के सहायतार्थ विभिन्न जागीरों की यात्रा करते समय तोल्स्तॉय ने पाया था कि तुर्गनेव के किसानों की स्थिति अन्य जमींदारों के किसानों से बहुत अच्छी थी।
फरवरी, 1862 में पब्लिक आर्बीट्रेटर के पद से त्यागपत्र देकर तोल्स्तॉय 12 मई 1862 को मास्को चले गये थे। उनके साथ उनके शिष्य वसीली मोरोजोव, और इगोर चेर्नोव थे और था पुराना नौकर अलेक्सेई ओरेखोव जो सेवास्तोपोल में उनके साथ रहा था। मास्को में उन्होनें बेहर्स परिवार के साथ रात व्यतीत की थी। उनकी भावी पत्नी सोनिया बेहर्स (सोफिया अन्द्रेएव्ना) ने पहली बार उस ग्रामीण युवक को देखा था। मास्को से तोल्स्तॉय त्वेर चले गये थे। जिन दिनों वह यास्नाया पोल्याना से बाहर थे, अधिकारियों ने उनके स्कूल में छापा मारा था। उससे स्कूल को इतनी क्षति हुई थी कि स्कूल उससे उबर नहीं पाया था।
लियो निकोलएविच तोल्स्तॉय लगभग चौंतीस वर्ष के हो चुके थे, लेकिन अविवाहित थे। काकेशस से लौटने के बाद वह एक किसान युवती अक्सीनिया बजीकिना के प्रेम में पड़ गये थे। वह उन दिनों ‘कज्ज़ाक‘ लिख रहे थे। लेकिन उन्हीं दिनों त्युचेवा नामक युवती से भी उनके प्रेम संबन्ध थे। उन दिनों वह नियमित डायरी लिखते थे। 14 जनवरी, 1858 को उन्होनें लिखा, ‘‘त्युचेवा हर समय मेरे दिमाग में रहती है। सच, इससे मुझे खीज होती है, क्योंकि वास्तव में यह प्रेम नहीं है।" 26 जनवरी, 1858 को उन्होंनें लिखा, ‘‘वह ठंडी, तुच्छ और अभिजातवर्गीय है जबकि चिचेरिना सुन्दर है।" लेकिन अक्सीनिया के विषय में वह लिखते हैं, ‘‘अक्सीनिया को एक दृश्टि देखा। वह बहुत सुन्दर है। मैनें इतने दिन व्यर्थ ही गंवा दिए। आज पुराने बड़े जंगल में, वहां उसकी भाभी भी थी, और मैं मूर्ख हूँ… मैं उसके प्यार में पड़ गया हूँ। ऐसा जीवन में पहले कभी नहीं हुआ था। मेरे मस्तिष्क में दूसरा कोई विचार नहीं है। मैं संतप्त हूँ।"
कुछ लोगों का कहना है कि अक्सीनिया से उन्हें एक पुत्र भी था। लेकिन अक्सीनिया से पूर्व अन्य युवतियों से भी उनके प्रेम संबन्ध थे। कोकेशस जाने से पूर्व वह एक जिप्सी युवती के प्रति आकर्षित थे। उनका भाई सेर्गेई लंबे समय तक एक जिप्सी युवती के साथ रहने के पश्चात् उससे विवाह कर चुका था। उसने तोल्स्तॉय को भी उस जिप्सी युवती से, जिसके प्रति तोल्स्तॉय आकर्षित थे, विवाह के लिए प्रेरित किया था। बाद में, तोल्स्तॉय बलेरिया असे‍र्नीवा के प्रेम में पड़े थे, जिसके साथ संबन्ध विच्छेद करते हुए उन्होंनें 14जनवरी, 1857 को उसे एक पत्र लिखा था, ‘‘प्रिय अलेरिया व्लादीमीरोव्ना, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं अपने प्रति कसूरवार हूँ और भयानक रूप से आपके प्रति भी कसूरवार हूँ… मैं शीघ्र ही पेरिस के लिए रवाना हूँगा और कब रूस वापस लौटूंगा, ईश्वर ही जानता है।" वलेरिया व्लादीमीरोव्ना असे‍र्नीवा अपने मां-पिता को खो चुकी थी। वह सुदाकोवो, जो यास्नाया पोल्साना के निकट था, में रहती थी और अच्छे रहन-सहन के बावजूद धनवान न थी। लेकिन काले बालों वाली, संगीत पसंद वह एक सुदर्शना युवती थी। असे‍र्नीवा के साथ तोल्स्तॉय के संबन्ध बहुत गहराई तक स्थापित हो चुके थे। उन्होंनें अपनी बुआ, भाई ओर मित्रों से उसका परिचय करवाया था। उसे सोलह पत्र भी लिखे थे, लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों से उन्होंनें उससे विवाह नहीं किया था।
तोल्स्तॉय जब तीस के थे, वह त्युचोवा के विषय में सोचते थे, ‘‘मैं उससे बिना प्यार के निश्चय ही शांतिपूर्वक विवाह के लिए अपने को तैयार कर रहा था, लेकिन उसने जान-बूझकर ठंडेपन के साथ मेरा स्वागत किया।" अंतत: उन्होंनें उससे भी विवाह का विचार त्याग दिया था। 1 जनवरी, 1859 को उन्होंनें डायरी में लिखा, ‘‘ मैं या तो इस वर्ष विवाह कर लूंगा अथवा कभी नहीं करूंगा।" उन दिनों की उनकी डायरी से ज्ञात होता है कि विवाह को लेकर वह कितना उलझन में थे। लगातार वह अक्सीनिया का उल्लेख करते हैं। अंतत: बेहर्स परिवार से उनकी निकटता ने उन्हें सोनिया के निकट ला दिया था। वास्तव में, डाक्टर अन्द्रेई इव्स्ताफीविच बेहर्स अपनी बड़ी बेटी लिजा का विवाह तोल्स्तॉय के साथ करना चाहते थे। लेकिन 6 मई, 1862 को तोल्स्तॉय ने अपनी डायरी में लिखा, ‘‘मैनें बेहर्स परिवार में सुखद दिन व्यतीत किया, लेकिन लिजा के साथ विवाह का साहस मुझमें नहीं है।" वह बेहर्स की छोटी बेटी सोनिया, जो उनसे सोलह वर्ष छोटी थी, को पसंद करते थे और 24 सितम्बर, 1862 को सोनिया के साथ उनका विवाह हुआ था। डाक्टर बेहर्स लिजा के साथ तोल्स्तॉय के विवाह न करने से इतना नाराज थे कि उन्होंनें सोनिया को दहेज के रूप में कुछ भी नहीं दिया था।
सोफिया अन्द्रेएव्ना के साथ शादी के पश्चात् तोल्स्तॉय के जीवन का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। सोफिया निश्चित ही उनकी एक कुशल संगिनी सिद्ध हुई थीं। वह उनकी पत्नी, सहायिका, निजी सचिव आदि विभिन्न रूपों में उनके रचनात्मक कार्यों में सहायता करती थीं। वह उनकी प्रत्येक रचना की पहली पाठक ही नहीं होती थीं, बल्कि वह उन्हें अपनी सलाह भी देती थीं। वह उनकी रचनाओं को फेयर करती थीं। शादी के पश्चात् लंबी अवधि तक तोल्स्तॉय कुछ नहीं लिख पाये थे। ‘कज्ज़ाक’ (1852-1862) लिखकर वह पर्याप्त यश पा चुके थे। लेकिन, लगभग दो वर्षों तक कुछ न लिख पाने के दौरान वह एक बड़े विषय पर कार्य करने के लिए अपने को तैयार कर रहे थे। उन्होंनें 1865 में ‘युद्ध और शांति’ पर कार्य प्रारंभ किया, जिसे 1869 में पूरा किया था। यह उपन्यास राजनीतिक, सामाजिक, कूटनीतिक, धार्मिक, दार्शनिक, सामरिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक अर्थात् जीवन के लगभग सभी पक्षों पर प्रकाश डालता है। इस उपन्यास ने तोल्स्तॉय को विश्व के महान लेखकों के मध्य आसीन कर दिया। सामरसेट माम ने उनके विषय में लिखा, ‘‘ संसार का सबसे बड़ा उपन्यासकार बाल्जाक था, किन्तु ‘युद्ध और शांति’ संसार का महान उपन्यास है।" तोल्स्तॉय ने इस उपन्यास को लिखने में अथक श्रम किया था। इस दौरान उन्होनें दो छोटी रचनाएं ‘काकेशस में एक युद्धबंदी’ (1872) और ‘फादर सेर्गेई (1873) लिखा। लेकिन वह कुछ और महत्वपूर्ण लिखने की योजना बना रहे थे। यह उपन्यास था ‘अन्ना कारेनिना’ जिसे उन्होंनें 1875-77 में लिखा था। यह उपन्यास सुन्दर अन्ना, कूपमंडूक और सीमित जीवन दृष्टि रखने वाला उसका कुलीन पति कारेनिन, जो उम्र में अन्ना से काफी बड़ा था और अन्ना को प्रेम करने वाले जवान काउंट व्रोन्स्की की कहानी है । उपन्यास का अंत अन्ना की आत्महत्या में होता है। इसमें मुख्य कथा के साथ लेविन और कीटी की प्रेम कथा भी है। लेविन के विचार तत्कालीन रूस की विविध समस्याओं पर तोल्स्तॉय के विचारों को व्याख्यायित करते हैं। इस उपन्यास के विषय में रोमा रोलां का कथन है, ‘‘अन्ना कारेनिना पूरा एक संसार है जिसकी निधि अकूत है।"
‘अन्ना कारेनिना’ के बाद तोल्स्तॉय का लेखन निरंतर चलता रहा। 1882 में उन्होंनें – ‘एक स्वीकारोक्ति’, ‘मेरा धर्म’ (1884) , ‘घोड़े की कहानी’ (1864 में – पुन: 1886 में), ‘इवान इल्यीच की मृत्यु’ (886) , ‘एक व्यकित को कितनी जमीन की आवश्यकता है?’ (1886) , ‘अंधकार की सत्ता’ (ड्रामा –1886), ‘क्रुट्जर सोनाटा’ (1889 – लंबी कहानी), ‘पुररुत्थान’ (1889–99), ‘हाजी मुराद’ (1896 – 1904) जैसी कालजयी रचनाएं लिखीं। ‘पुररुत्थान’ में तोल्स्तॉय ने भूदास प्रथा के बाद की रूसी सामाजिक जीवन की विसंगतियों को गंभीरता से अभिव्यक्त किया है। यद्यपि इस उपन्यास का नायक नेखल्युदोव है, तथापि वास्तविक नायक आम-साधारण लोग हैं जो नेखल्युदोव के माध्यम से अपने वास्तविक रूप में पाठकों के समक्ष प्रकट होते हैं।
‘हाजी मुराद’ तोल्स्तॉय का ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसमें हाजी मुराद ही नहीं अधिकांश अन्य पात्र वास्तविक हैं। उन्होंनें इस उपन्यास को लगभग पचास वर्ष पश्चात् लिखा था, जबकि वह यास्नाया पोल्याना के स्कूल के अपने छात्रों को प्राय: हाजी मुराद की वीर गाथाएं सुनाया करते थे। ‘क्रुट्जर सोनाटा‘ के विषय में कुछ विद्वानों का कहना है कि उन्होंने अपनी पत्नी सोफिया अन्द्रेएव्ना से ईर्ष्या के कारण उसे लिखा था। ऐसा माना जाता है कि सोफिया अन्द्रेएव्ना और उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार सेर्गेई इवानएविच तानेएव, जो तोल्स्तॉय का अच्छा मित्र था, के मध्य यास्नाया पोल्याना अथवा मास्को में प्रेम संबन्ध स्थापित हुआ था लेकिन शायद वह सोफिया का एकपक्षीय प्यार था। वह यह नहीं जानती थी कि तानेएव उसे प्यार नहीं करता। वह यह सोचती थी कि वह उसके पति से भयभीत था। लेकिन वह प्रत्येक संगीत समारोहों में जाती थीं और तानेएव के बगल में बैठती थीं। एक बार तानेएव कीव गया और वहां मस्कोव परिवार के साथ ठहरा। सोफिया अन्द्रेएव्ना भी उसकी पीछे कीव गयी थीं। वह पहले अपनी बहन तातियाना से मिलीं, फिर मस्लोव परिवार की मेहमान बनी थीं। इस परिवार से उनके पुराने संबन्ध थे। अगले दिन वह सभी के साथ जंगल घूमने गयीं, जहां सोफिया के चित्र खींचे गये थे। जब वह मास्को लौटीं तब उन्होंने तोल्स्तॉय का तनावग्रस्त खिंचा हुआ चेहरा देखा था। तोल्स्तॉय ने अपनी भाभी को एक पत्र लिखा था, जिसमें दुखी मन से उन्होंने लिखा था कि “आखिर अब मैं सत्तर वर्ष का बूढ़ा जो हूँ।" उन्होंनें पांच पृष्ठों का एक लंबा पत्र सोफिया को लिखा था, जिसे उन्होंनें ‘एक संवाद’ कहा था। उसमें उन्होंनें सोफिया से कीव यात्रा और तानेएव के प्रति उनके सम्मोहन के विषय में स्पष्टीकरण मांगा था। पत्र पढ़कर सोफिया आग बबूला हो उठी थीं और चीखती हुई बोली थीं, ‘‘आप कमीने हैं, आप एक जानवर हैं ! और मैं एक अच्छे, सहृदय व्यक्ति को प्यार करती हूँ, न कि आपको। आप एक पशु हैं !"
वास्तव में तानेएव और सोफिया का प्रेम वास्तविक नहीं था। निश्चित् ही पारिवारिक असंतोष और प्रेम की आंकाक्षा के कारण वह उसकी ओर आकर्षित हुई थीं, लेकिन वह एकपक्षीय था। ऐसी स्थिति में तोल्स्तॉय की मानसिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
सोफिया अन्द्रेएव्ना ने यास्नाया पोल्याना में घर बनवाया, उसे सजाया, और वहां रही भी थीं। लेकिन वास्तविकता यह थी कि ग्राम्य जीवन को वह स्वीकार नहीं कर पायी थीं। परिवार के लिए समर्पित और बच्चों के भविष्य की चिन्ता में डूबी रहने वाली उस अथक परिश्रमी महिला को पति का किसानों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण, सामाजिक कार्यों में उनकी संलिप्तता और व्यवस्था का मुखर विरोध पसंद नहीं था। वह तोल्स्तॉय को एक काउंट की भांति… एक अभिजातीय वर्ग के व्यक्ति की भांति देखना चाहती थीं। जबकि तोल्स्तॉय किसानों जैसा सामान्य जीवन जीना पसंद करते थे। 28 जून, 1881 को तोल्स्तॉय ने अपनी डायरी में लिखा, ‘‘मैं एक गरीब आत्मा को देखने गया था। वह एक सप्ताह से बीमार है। उसे दर्द और कफ है। पीलिया बढ़ रहा है। कुर्नोसेन्कोव को पीलिया था। कोन्द्राती उसी से मरा था। गरीब लोग पीलिया से मर रहे हैं। वे फलाला से मर रहे हैं।" वह आगे लिखते हैं, ‘‘उसकी पत्नी की गोद में एक बच्चा है, तीन लड़कियां हैं और भोजन नहीं है। चार बजे तक उन्हें भोजन नहीं मिला था। लड़कियां सरसफल तोड़ने गयी थीं और वही उनका भोजन था।"
तोल्स्तॉय ने आगे लिखा कि उस घर में स्टोव इसलिए जलाया गया कि बच्चे को लगे कि कुछ पकाया जा रहा था और वह चीखे नहीं। गरीबी का यह भयावह दृश्य तत्कालीन रूस की स्थिति का वास्तविक बयान है। उन्होंने पुन: लिखा, ‘‘ हम शैम्पेन के साथ अच्छा रात्रिभोज करते हैं ।… प्रत्येक बच्चे को खर्च के लिए पांच रूबल दिए जाते हैं। गाडि़यां तैयार हैं, जिनमें वे पिकनिक के लिए जाएगें। उनकी गाडि़यां कठिन श्रम से थके-मांदे किसानों की गाडि़यों के पास से गुजरेगीं… ।"
तोल्स्तॉय की रचनाएं ही नहीं समय-समय पर उनकी डायरी में दर्ज की गई बातें रूस की उस समय की सामाजिक ओर आर्थिक विद्रूपता को उद्घघाटित करती हैं। तुर्गनेव की भांति उन्होंने भी अपने किसानों को स्वतंत्रता दे दी थी। लेनिन ने उनके विषय में अपने आलेख – ‘‘लेव तोल्स्तॉय रूसी क्रांति के दर्पण में" में लिखा था, ‘‘तोल्स्तॉय के विचारों में विरोधाभास वस्तुत: उन विरोधाभासपूर्ण परिस्थितियों का दर्पण है जिनमें किसान समुदाय को हमारी क्रांति में अपनी ऐतिहासिक भूमिका अदा करनी पड़ी थी।"
किसानों के जीवन परिवर्तन के विषय में तोल्स्तॉय जैसा सोचते थे क्रांतिकारी भी वैसा ही सोच रहे थे। शायद इसीलिए उन्होंनें कहा था, ‘‘ क्रांति अपरिहार्य है।" वह दूसरी क्रांति की प्रतीक्षा कर रहे थे, जो किसानों की जीवन स्थितियां बदल देने वाली थी। लेकिन दूसरी ओर वह क्रांति से भयभीत भी थे। ऐसी ही अनेक बातों में हमें उनका विरोधाभास प्रकट होता दिखता है।
उन्होंने 13 मई, 1908 से 15 जून, 1908 तक एक आलेख पर कार्य किया, जिसका शीर्षक था, ‘‘मैं चुप नहीं रह सकता"। इस आलेख ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। सेंसर किये जाने के भय से तोल्स्तॉय ने इसे लेटिश (Lettish) में प्रकाशित करवाया था। उसके बाद यह तूला के एक गुप्त छापाखाने से पूरा प्रकाशित हुआ। दुनिया के लगभग सभी देशों में इसे प्रकाशित किया गया और आश्चर्यजनक रूप से जर्मन के दो सौ अखबारों में यह एक साथ प्रकाशित हुआ था। इस लेख का प्रारंभ इस प्रकार होता है, ‘‘सात मौत की सजाएं। दो सेण्ट पीटर्सबर्ग में, एक मास्को में, दो पेन्जा़ में, दो रिगा में। चार फांसियां – दो खर्सन में, एक विल्नो में और एक आडेसा में।" इस लेख में आगे कहा गया कि 1880 के दशक में देश में एक जल्लाद था, लेकिन 1908 में अनेकों दिवालिया दुकानदार जल्लादी काम के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं और बदले में सैकड़ों रूबल पाकर अपने व्यवसाय को पुन: स्थापित कर रहे हैं। इन जल्लादों में होड़ गची हुई है। परिणामस्वरूप वे कुछ कम पैसों में, अनेक केवल पचास रूबल में ही हत्या के लिए तैयार हैं।
तोल्स्तॉय के इस आलेख से सरकार हिल उठी थी। लेकिन वह उस महान लेखक के विरुद्ध कुछ कर नहीं सकती थी, जिसे जनता का अपार स्नेह प्राप्त था। इस आलेख को पढ़कर अमेरिका में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी तारकनाथ दास ने तोल्स्तॉय को 24 मई 1908 को भारत की स्थिति के विषय में एक पत्र लिखा था। तोल्स्तॉय ने उन्हें उत्तर दिया था। इसके पश्चात् महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखे, जिनके उत्तर ‘एक भारतीय के नाम पत्र’ के रूप में यास्नाया पोल्याना के पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। महात्मागांधी को लिखे तोल्स्तॉय के पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जो भारत की पराधीनता के विषय में उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं।
तोल्स्तॉय तिहत्तर वर्ष के थे। उनका स्वास्थ्य खराब था। वह याल्टा जाना चाहते थे। 5 सितम्बर, 1901 को सेवेस्ताप जानेवाली ट्रेन में उनके लिए एक विशेष कोच की व्यवस्था की गई थी। जब ट्रेन खार्कोव स्टेशन पहुँची, जनता का हुजूम अपने उस महान लेखक की एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़ा था। विश्व के शायद वे एक मात्र ऐसे लेखक थे जिनकी एक झलक पाने के लिए स्टेशनों पर हजारों की भीड़, एक बार लगभग पचीस हजार की भीड़, एकत्र होती थी।

याल्टा में उनसे मिलने वालों में चेखव थे। चेखव ने गोर्की को सितम्बर 1901 के अंत के पत्र में तोल्स्तॉय के चिन्ताजनक स्वास्थ्य के विषय में लिखा था। लेकिन तोल्स्तॉय स्वस्थ होकर घर लौटे थे। उसके पश्चात् उन्होंनें ‘हाजी मुराद' पूरा किया था। अन्य रचनाएं लिखी थीं। इस दौरान वसीयत को लेकर पारिवारिक विवाद प्रारंभ हो गया था। तोल्स्तॉय अपने बेटों से असंतुष्ट थे। वह बेटी मारिया को अधिक चाहते थे। सम्पत्ति का बंटवारा सबमें करना चाहते थे। जबकि सोफिया अन्द्रेएव्ना की चिन्ता पूरे परिवार से जुड़ी हुई थी। वह तोल्स्तॉय के साहित्य का प्रकाशन दॉस्तोएव्स्की की पत्नी अन्ना की भांति स्वयं करना चाहती थीं, (और उन्होंनें यह कार्य सफलतापूर्वक किया भी था) और सम्पूर्ण साहित्य पऱ अधिकार चाहती थीं, जबकि तोल्स्तॉय 1885 के पश्चात् के अपने साहित्य को स्वतंत्र कर देना चाहते थे, जिसे कोई भी प्रकाशित कर सकता था। विवाद गहरा था। परिणामत: 28 अक्टूबर 1910 को सुबह पांच बजे तोल्स्तॉय ने घर छोड़ दिया था। उस क्षण उनकी जेब में 39 रूबल थे और उनके साथ यात्रा करने वाले मकोवित्स्की के पास तीन सौ रूबल थे। वह अस्तापे पहुँचे थे, जहां 7 नवम्बर, 1910 (नये कलेण्डर के अनुसार 20 नवम्बर) को इस महान लेखक ने सुबह छ: बजकर पांच मिनट पर इस संसार को अलविदा कह दिया था।
रूसी सरकार ने अपने इस लेखक के दर्शनार्थ जानेवालों के लिए विशेष ट्रेनें चलायी थीं। रूस की जनता ने जितना प्यार अपने इस महान लेखक को दिया वह अद्भुत था। गोर्की ने उनके विषय में लिखा, ‘‘तोल्स्तॉय एक पूरा जगत हैं … उन्होंने सचमुच एक विराट कार्य किया है… पूरी शताब्दी का निचोड़ पेश किया है।" अपने लेख ‘लेव तोल्स्तॉय’ में गोर्की ने लिखा था, ‘‘ जब तक यह व्यक्ति इस धरती पर विद्यमान है, मैं यतीम नहीं हूँ।"
गोर्की की उपरोक्त बात अब तोल्स्तॉय के साहित्य के संदर्भ में कही जा सकती है।
(लेखक द्वारा अनूदित लियो तोल्स्तॉय के हिन्दी में अब तक अप्रकाशित उपन्यास ‘हाजी मुराद‘ में दिया गया संक्षिप्त जीवन परिचय। उपन्यास ‘हाजी मुराद‘ संवाद प्रकाशन , मेरठ से प्रकाशित।)