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बुधवार, 1 अगस्त 2012

कविताएं





कवयित्री विजया सती की कविताएं






स्मृतियां

एक

किस एक स्मृति से है मन की संपन्नता का नाता ?
पूछती हूँ अपने–आप से.
कितना संपन्न था पहले यह मन
चांदनीचौक की तंग गलियों में घूमता पिता के साथ
दो अक्तूबर से शुरू होती थी खादी पर छूट 
और हम चुनते थे उनके साथ छोटे-छोटे रंगीन टुकड़े 
कुछ न कुछ बना ही देती थी मां -
मेरी सुन्दर सी फ़्राक, कुर्सी की गद्दी का खोल या फिर मेजपोश ही.
थकता कहाँ था यह मन 
ऊंची पहाड़ी के मंदिर तक उड़े चले जाता था
स्वस्थ पिता की उंगलियां थाम नवरात्र के मेले में
फतेहपुरी के भीड़ भरे बाज़ार की हलचल के बीच
खील-बताशे खरीदता दिवाली के आसपास !
उस सम्पन्नता का है कहीं सानी ?
जब झड़ते थे प्रश्न बेहिसाब
बचपन की फ़ैली आँखों से
उत्तर सब थे पिता के पास
और था कहानियों से भरा बस्ता
जिसमें झांकते थे -
टाम काका वेनिस का सौदागर और पात्र पंचतंत्र के.

यमुना किनारे की रेत से कभी बटोरते हम कांस फूल
नंगे पाँव ही हो आते थे उनके साथ
छोटी सी क्यारी में बोए मक्का तोड़ने
या उलझी लता से खींचते थे साथ मिलकर
नरम हरी तोरियाँ !
सुबह जागती-सी नींद में गूंजता स्वर
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ..
संध्या वेला को त्र्यम्बकं यजामहे का विशुद्ध अटूट क्रम
यह है पिता के साथ की समृद्ध दुनिया अब भी मेरे भीतर.

बहुत बढ़-चढ़ तो गई ही है बाहर भी सब ओर
मेरे आस-पास की दुनिया 
सूना रहता ही कहाँ है
कामकाजी अभिनय से भरा जीवन-मंच?
मुश्किल से मिले निपट अकेले क्षणों में कभी
याद करना बीते हुए मां-पिता की दुनिया में अपनी व्याप्ति
और खो देना समूची रिक्तता 
लगता नहीं 
है कहीं इस सम्पन्नता का कोई सानी !

-0-0-0-

दो

जिंदगी को गणित के सवालों सा हल करना
मुझे कभी नहीं आया.
कभी भाया ही नहीं जमा-घटा-गुणा-भाग.
बचपन से ही
कविता के आसपास रहती आई जिंदगी मेरी. 
रसोई में बर्तनों की खटपट के बीच मां गुनगुनाती -
गूंजते थे कानों में वे घुँघरू शब्द
जिन्हें पगों में बाँध नाचती थी मीरा !
बाहर खुले बरामदे में बैठ हम सुनते
पिता का सधा कंठस्वर
सुबह के उजाले को साथ लाता -
नागेन्द्र हाराय  त्रिलोचनाय ...अतुलित बलधामं हेम शैलाभ देहं
फिर कस्तूरबा आश्रम की दिनचर्या में भी तो तय था
सुबह शाम की प्रार्थना सभा का समय
जब आश्रम भजनावली से चुने भजनों का समवेत स्वर
धीमे से ऊंचा उठाती थी मैं भी
छात्रावास की सहेलियों के साथ -
वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे ...
अब इस तरह के सवाल क्यों
जिनका कोई हासिल न हो?
मेरे अंत: को निर्मल बना रहे हैं जब तक रहीम रसखान भर्तृहरि
कबीर का अक्खड़ दोहा बल दे जाता है मुझे
जब तक
अज्ञेय का मौन और भवानी के कमल के फूल झरते हैं आसपास
शून्य हो जाने दूं जीवन का उल्लास 
व्यर्थ की जोड़ तोड़ करते ! ?

-0-0-0-

तीन  

उनके जीवन के साथ
उनके दुख भी गये
वे किसी  को कोई दुख न दे गये
न किसी का कुछ  ले गये 
बहुत कम जो भी जोड़ा था
तन की मेहनत से
 मन की लगन से
उसी से था घर भरा-भरा
उनके जाने के बाद भी.
कई दिनों तक रहेगा
रसोई के भण्डार में
नमक तेल चीनी के साथ
और भी बहुत कुछ उनसे जुड़ा.

कोई ऋण बाकी न रहा उन पर
क्या उऋण  हो सकेगी संतान?

करेगी वह सभी के साथ
पिता और मां जैसा निस्वार्थ
और बिना शर्त प्यार?

इसीलिए तो
इतना अभावग्रस्त कर  देने वाला है
पिता के बाद मां का भी चले जाना !

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चार

 बारीक सा एक धागा जरूर टूट जाता  है
बाहर से
अटूट बना रह सकता है
भीतर ही भीतर
मां और पिता के साथ संतान का नाता
आजन्म !

जितना ही उनके जीवन के सच और त्याग
और आदर्श के निकट होंगे हम
उतना ही गहरे जुड़े रह सकेंगे
पिता और मां से हम
अपने जीते जी !

-0-0-0-

पांच

पहले ही दिन से
महसूस नहीं हुआ कि
अपने देश और परिचित परिवेश से
बहुत दूर चली आई हूँ !
शायद यह भाषा ही थी जिसने मुझे
सबसे पहले थामा ! 
एक नई पहचान के साथ
केवल भाषा ही नहीं यहाँ तो जैसे
पूरा परिवेश भी मेरे साथ चला आया है !
बर्फ़ से ढकी इन पहाडियों में मिलती हूँ अपने नैनीताल से,
यह जो हलचल से भरा पुल है न,
लोहे का वही पुराना पुल है जमनापार वाला !
मारिया में पाती हूँ मीरा की झलक,
क्रिस्तीना में कृष्णा
और ओर्शी ..मुझे उर्वशी ही तो लगी.
शायद नहीं
यह सचमुच भाषा तो थी ही
और भी था कई तरह का अपनापन
जिसने मुझे इस अनजाने विस्तार में
पहले ही दिन से अकेला नहीं होने दिया !

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विजया सती
 

पहली कविता कॉलेज के प्रथम वर्ष में कॉलेज की ही वार्षिक पत्रिका में प्रकाशित.
कालान्तर में कल्पना, नया प्रतीक, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, संचेतना, दीर्घा आदि में कविताएँ.

एक सहयोगी काव्य संग्रह के अतिरिक्त दो शोध पुस्तकों का प्रकाशन. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलेख निरंतर प्रकाशित.

दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए. और एम.ए. हिन्दी – सर्वश्रेष्ठ छात्रा होने के नाते पुरस्कृत. वहीं से पीएचडी.

एसोसिएट प्रोफ़ेसर हिन्दू कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय.
वर्तमान में – विज़िटिंग प्रोफेसर – भारोपीय अध्ययन विभाग,बुदापैश्त.

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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

कविताएं









वरिष्ठ कवियत्री और कथाकार सुधा अरोड़ा की

दो कविताएं


दरवाज़ा - दो कवितायेँ

दरवाज़ा - एक

चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाजा हो
या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना
उस पर ख़ूबसूरत हैंडल जड़ा हो
या लोहे का कुंडा !

वह दरवाज़ा ऐसे घर का हो
जहाँ माँ बाप की रजामंदी के बगैर
अपने प्रेमी के साथ भागी हुई बेटी से
माता पिता कह सकें --
'' जानते हैं , तुमने गलत फैसला लिया
फिर भी हमारी यही दुआ है
खुश रहो उसके साथ
जिसे तुमने वरा है !
यह मत भूलना
कभी यह फैसला भारी पड़े
और पाँव लौटने को मुड़ें
तो यह दरवाज़ा खुला है तुम्हारे लिए ! ''

बेटियों को जब सारी दिशाएं
बंद नज़र आएं
कम से कम एक दरवाज़ा

हमेशा खुला रहे उनके लिए !
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(बांए से - मन्नू भंडारी,सुधा अरोड़ा और रूपसिंह चन्देल)






दरवाज़ा -- दो

जरी की पट्रटीदार रेशमी साड़ी पर
अपनी उंगलियां फिराते हुए
इतरा रही है !
राखी बांधकर
दिल्ली से लौट रही है बहन
अपने शहर सहारनपुर !

कितना मान सम्मान देते हैं उसे
कह रहे थे रुकने को
नहीं रुकी
इतने बरसों बाद जाने क्यों
पैबंद सा लगता है अपना आप वहां !

इसी आलीशान कोठी में बीता है बचपन
सांप सीढ़ी के खेल में जान बूझ कर हारती थी वह
हर बार जीतता था भाई
और भाई को फुदकते देख
अपनी हार का जश्न मनाती
उसके गालों पर चिकोटियां काटती
रूठने का अभिनय करती !

इसी कोठी की देहरी से
अपने माल असबाब के साथ
विदा हुई एक दिन
भाई बिलख बिलख कर रोया

इसी कोठी के सबसे बड़े कमरे में
पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा
और मां बेचारी सी
अपने लहीम शहीम पति को
जाते देखती रही

पिता नहीं लिख पाये अपनी वसीयत
नहीं देख पाये
कि दामाद भी उसी साल हादसे का शिकार हो गया
और बेटी अकेली रह गयी
इसी भाई ने की दौड़ धूप
दिलायी एक छत
जहां काट सके वह अपने बचे खुचे दिन !
पर छत के नीचे रहने वाले का पेट भी होता है
यह न भाई को याद रहा , न उसे खुद !

मां ने कहा - इस कोठी में एक हिस्सा तेरा भी है
तू उस हिस्से में रह लेना
सुनकर भाई ने आंखें तरेरीं
भाभी ने मुंह सिकोडा
और दोनों ने मुंह फेर लिया !

बस , उस एक साल भाई ने
न अपनी बेटी की शादी पर बुलाया
न राखी पर आने की इजाज़त दी
वकील ने नोटिस के कागज तैयार किये
उसने न मां की सुनीं ,
न वकील की
सांप सीढ़ी का खेल
नहीं खेलना उसे भाई के साथ
और नोटिस के चार टुकड़े कर डाले !
उसने कहा - नहीं चाहिये मुझे खैरात
मैं जहां हूं , वहीं भली
और अपने रोटी पानी के जुगाड़ में
बच्चों के स्कूल में अपने पैर जमा लिये
तब से वहीं है
अपने शहर सहारनपुर !

अब तो अपना एक कमरा भी कोठी सा लगता है ,
बच्चे खिलखिलाते आते - जाते हैं
कॉपी किताबें छोड़ जाते हैं
जिन्हें सहेजने में सारा दिन निकल जाता है
भाई ने अगले साल राखी पर आने का न्यौता दिया
बच्चे याद करते हैं बुआ को
और अब हर साल बड़े चाव से जाती है ,
उसके बच्चों के लिये
अपनी औकात भर उपहार लेकर !

जितना ले जाती है
उससे कहीं ज्यादा भाभी
उसकी झोली में भर देती है !
अब यह सिल्क की साड़ी ही
तीन चार हज़ार से कम तो क्या होगी ,
वह एहतियात से तह लगा देती है ,
अपनी दूसरी भतीजी की शादी में यही पहनेगी !

कितना अच्छा है राखी का त्यौहार
बिछड़े भाई बहनों को मिला देता है ,
कोठी के एक हिस्से पर

हक़ जताकर क्या वह सुख मिलता
जो भाई की कलाई पर राखी बांध कर मिलता है !
मायके का दरवाज़ा खुला रहने का
मतलब क्या होता है

यह बात सिर्फ वह बहन जानती है जो उम्र के इस पड़ाव पर भी इतनी भोली है

कि बहुत बड़ी कीमत चुका कर

अपने को बड़ा मानती है !

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मंगलवार, 31 जनवरी 2012

कविताएं


इला प्रसाद की चार कविताएं

सुरक्षा

पेड़ वस्त्र उतार रहे हैं
नन्हॊं , नवजातों के लिए
सूखे पत्ते बन गए हैं ढाल
आगामी हिमपात के विरुद्ध।
हवा ने बिछाया है उन्हें,
एहतियात से,
छॊटे- छॊटे पौधों की जड़ॊं में ;
सदा की संगिनी जो ठहरी !
खुले आकाश तले
गर्व से सिर उठाए
अब घॊषणा करते हैं वे, निर्वस्त्र
अगली पीढ़ी सुरक्षित है!
-०-०-०
ठंढ

उसने बोगन वेलिया से कहा
ठंढ तो है ,
लेकिन तुम्हे परेशानी नहीं होगी
तुम्हारी शाखें
पहुँचती हैं
धूप तक
जैसे मैं
थाम लेती हूँ
अपने नन्हे बच्चे की
नाजुक, नम उंगली
और भूल जाती हूँ
वे तमाम चोटें
जो जिन्दगी देती है!
-०-०-०-
बाजार

आजकल अक्सर मुझे बहुत डर लगता है
बची तो रहेंगी न
वे वनस्पतियाँ , पेड़ , जंगल
जिनसे बनती है मेरी
दवा
इतनी तेजी से कटते जा
रहे हैं पेड़
नष्ट हो रही हैं वनस्पतियाँ
कैसे स्वस्थ रहूंगी
मैं !

मुझे डर लगता है
कोई तो बचा रहेगा न
जो मेरी भाषा में बोलेगा?
समझ सकेगा मेरी बात?
इतनी तेजी से बदल रही
है भाषा ,
लुप्त हो रहे हैं मेरी
भाषा के शब्द, शब्दों के अर्थ !
मेरे अंत तक
बचा तो रहेगा न एक आदमी
जिसमे बची रहेंगी
मानवीय संवेदनाये
इतनी तेजी से ख़त्म
होती जा रही है
मनुष्यता !

क्या होगा मेरे जैसे
लोगों का
जो बाजार का हिस्सा
नहीं बन सकते
क्या वो भी मेरी ही
तरह
डरे हुए हैं !

पृथ्वी

मैं कहाँ जानती थी
तुमको
लेकिन जब तुमसे बँध
गई
तो जुड़ना चाहा
और इस जुड़ाव का सच
जानोगे?

तुम सूरज हुए या
नहीं, तुम्हें पता होगा
लेकिन तुम्हारे इर्द-गिर्द
घूमती
दुख-सुख भोगती
अपमान- अहंकार झेलती
सबकुछ सहती
मैं सचमुच पृथ्वी
हो गई हूँ!

-०-०-०-०

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

कविताएं

(सभी चित्र : जी मनोहर)


सुभाष नीरव की तीन कविताएँ


नाखून

इन दिनों
नाखून
मेरी कविता का
हिस्सा होना चाहते हैं।

इस पर
मेरे कवि मित्र हँसते हैं
और कहते हैं-
कविता की संवेदन-भूमि पर
नाखूनों का क्या काम ?
नाखूनों पर बात हो सकती है
कविता नहीं।

जैसे
यह जानते हुए भी कि
नाखून रोग का कारण होते हैं
फिर भी
फैशनपरस्त और पढ़ी-लिखी स्त्रियों को
बहुत प्रिय होते हैं नाखून।

या फिर
खाज में खुजलाना
बेमजा होता है
बगैर नाखूनों के।

अधिक कहें तो
एक निहत्थे आदमी का
हथियार होते हैं नाखून
जो मौका मिलने पर
नोंच लेते हैं
दुश्मन का चेहरा।

पर दोस्तो
मेरे सामने एक ओर नाखून हैं
और दूसरी तरफ
धागे की गुंजलक-सा उलझा मेरा देश
और हम सब जानते हैं
गांठों और गुंजलकों को खोलने में
कितने कारगर होते हैं नाखून।
00



नाशुक्रे हम

राहों ने कब कहा
हमें मत रोंदो
उन्होंने तो चूमे हमारे कदम
और खुशामदीद कहा।

ये हम ही थे
जो पैरों तले उन्हें रौदते भी रहे
और पहुंचकर अपनी मंजिल पर
नाशुक्रों की तरह भूलते भी रहे।
00







ठोकरें

पहली ठोकर
उसके क्रोध का कारण बनी ।

दूसरी ने
उसमें खीझ पैदा की ।

तीसरी ठोकर ने
किया उसे सचेत ।

चौथी ने भरा आत्म-विश्वास
उसके भीतर ।

अब नहीं करता वह परवाह
ठोकरों की !
00

सम्पर्क :
372, टाइप -4, लक्ष्मीबाई नगर
नई दिल्ली-110023
मेल :subhashneerav@gmail.com

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

कविताएं





नागार्जुन की छः कविताएं


जेष्ठ पूर्णिमा, १९११ - ५.११.१९९८
(१)

कालिदास

कालिदास, सच-सच बतलाना !
इंदुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोए थे ?
कालिदास, सच-सच बतलाना

शिवजी की तीसरी आंख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृतमिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आंसू से
तुमने ही तो दृग धोए थे ?
कालिदास, सच-सच बतलाना
रति रोई या तुम रोए थे ?

वर्षा रितु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट के सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़नेवाले
कालिदास,सच-सच बतलाना
परपीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ’ चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर, तुम कब तक सोए थे ?
रोया यक्ष कि तुम रोए थे ?
कालिदास, सच-सच बतलाना

(१९३८)



(२)

बहती है जीवन की धारा

बहती है जीवन की धारा !
मलिन कहीं पर विमल कहीं पर,
थाह कहीं पर अतल कहीं पर .
कहीं उगाती, कहीं डुबोती,
अपना दोनों कूल-किनारा .

बहती है जीवन की धारा !

तैर रहे कुछ सीख रहे कुछ
हंसते हैं कुछ, चीख रहे कुछ.
कुछ निर्भर हैं लदे नाव पर
खेता है मल्लाह बिचारा.

बहती है जीवन की धारा !

सांस-सांस पर थकने वाले,
पार नहीं जा सकने वाले .
उब-डुब उब-डुब करने वाले ,
तुम्हें मिलेगा कौन सहारा .

बहती है जीवन धारा !
(१९४१)



(३)

सिन्दूर तिलकित भाल

घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल !
याद आता तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल !
कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिए न समाज ?
कौन है वह एक जिसको नहीं पड़ता दूसरे से काज ?
चाहिए किसको नहीं सहयोग ?
चाहिए किसको नहीं सहवास ?
कौन चाहेगा कि उसका शून्य में टकराय यह उच्छ्वास ?
हो गया हूं मैं नहीं पाषाण
जिसको डल दे कोई कहीं भी
करेगा वह कभी कुछ न विरोध
करेगा वह कुछ उअहीं अनुरोध
वेदना ही नहीं उसके पास
फिर उठेगा कहां से निःश्वास
मैं न साधारण, सचेतन जंतु
यहां हां—ना—किन्तु और परन्तु
यहां हर्ष-विषाद-चिंता-क्रोध
यहां है सुख-दुःख का अवबोध
यहां हैं प्रत्यक्ष औ’ अनुमान
यहां स्मृति-विस्मृति के सभी के स्थान
तभी तो तुम याद आतीं प्राण,
हो गया हूं मैं नहीं पाषाण !
याद आते स्वजन
जिनकी स्नेह से भींगी अमृतमय आंख
स्मृति-विहंगम की कभी थकने न देगी पांख
याद आता मुझे अपना वह ’तरउनी’ ग्राम
याद आतीं लीचियां, वे आम
याद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भाग
याद आते धान
याद आते कमल, कुमुदिनि और तालमखान
याद आते शस्य-श्यामल जनपदों के
रूप-गुण-अनुसार ही रक्खे गये वे नाम
याद आते वेणुवन वे नीलिमा के निलय, अति अभिराम

धन्य वे जिनके मृदुलतम अंक
हुए थे मेरे लिए पर्यंक
धन्य वे जिनकी उपज के भाग
अन्न-पानी और भाजी-साग
फूल-फल औ’ कंद-मूल, अनेक विध मधु-मांस
विपुल उनका ऋण , सधा सकता न मैं दशमांश
ओग, यद्यपि पड़ गया हूं दूर उनसे आज
हृदय से पर आ रही आवाज-
धन्य वे जन, वही धन्य समाज
यहां भी तो हूं न मैं असहाय
यहां भी व्यक्ति औ’ समुदाय

किन्तु जीवन-भर रहूं फिर भी प्रवासी ही कहेंगे हाय !
मरूंगा तो चिता पर दो फूल देंगे डाल
समय चलता जायगा निर्बाध अपनी चाल
सुनोगी तुम तो उठेगी हूक
मैं रहूंगा सामने (तस्वीर में) पर मूक
सांध्य नभ में पश्चिमांत-समान
लालिमा का जब करुण आख्यान
सुना करता हूं, सुमुखि उस काल
याद आता तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल !

(१९४३)

(४)

कांग्रेस तो तेणे कहिए-----

कांग्रेसजन तो तेणे कहिए, जे पीर आपणी जाणे रे
पर दुःख में अपना सुख साधे, दया भाव न आणे रे
तीन भुवन मां ठगे सभी को, शरम न राखे केनी रे
टोपी-कुर्ता-धोती खद्दर, धन-धन जननी तेनी रे
समदर्शी बनी लज्जा त्यागे, सुदृढ़ तिरंगी ढाले रे
जिह्वा थकी, सत्य ना बोलै, पर धन अपनो माने रे
माया-मोह न छूटे छन-भर, लोभ बस्यो जेहि मनमां रे
जैसे-तैसे वोट बटोरे, पिछली कीर्ति बखाणै रे
बड़े-बड़े सेठन के हितमां, अपणा हित पहचाणे रे
भूखे रखि-रखि लाख जनन को, हौले-हौले मारे रे
भण नर सैंया कमा-कमा नित कुल इकहत्तर तारे रे
कांग्रेसजन तो तेणे कहिए-----

१७ दिसम्बर, १९५१







(५)

आओ, इसे जिन्दा ही कब्र में गाड़ दें !

शांति का हिरन, अहिंसा की गाय –
बाघ ने दोनों को दबोच लिया हाय !
किसका हिरन, किसकी गाय ?
नेहरू का हिरन, गाय गांही की थी हाय !
कौन था बाघ, कौन था खूंखार ?
माओ-चाओ-शाओ की कम्युनिस्ट सरकार !
दुख हुआ मार्क्स को, स्टालिन मुसकाया !
गांधी के मुंह पर फीकापन छाया !!

चेहरा तिलक-सुभाष का तमतमाया---
भगतसिंह की आंखों में खून उतर आया !

लहू की सिंचाई है, अमन की खेती है---
लेनिन की लाश जंभाई नहीं लेती है !
सपने इन्कलाब के यहां-वहां भर गया ;
वो माओ कहां है ? वो माओ मर गया !!
यह माओ कौन है ? बेगाना है यह माओ !
आओ, इसको नफ़रत की थूकों में नहलाओ !!

आओ, इसके खूनीं दांत उखाड़ दें !
आओ, इसे जिंदा ही कब्र में गाड़ दें !!

(धर्मयुग, २६ जनवरी, १९६३)

(६)

भारत-भूमि में प्रजातंत्र का बुरा हाल है

लालबहादुर नीचे, ऊपर कामराज है
इनक़िलाब है नीचे, ऊपर दामराज है
दम घुटता है लोकसभा के मेंबरान का
बन जाए न अचार कहीं इस संविधान का !
लौह-पुरुष के चार शीश हैं, आठ हाथ हैं
देख रहा वह कोटि-कोटि जन कहां साथ हैं
अन्न-संकट में अस्सी प्रतिशत म्ख कुम्हलाए
इन आंखों की चमक कौन फिर वापस लाए !
जंतर-मंतर में नेहरू की रूह कैद है
पता न चलता क्या काला है, क्या सुफ़ेद है !
कहां गया मेनन, मुरार जी क्यों हैं गुमसुम
वह उंगली क्या हुई, कहां है गीला कुमकुम ?

कामराज क्या दामराज है ?
दामराज क्या रामराज है ?
रामराज क्या कामराज है ?
कामराज क्या दामाराज है ?

क्या चक्कर है –
जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊं ?
जनकवि हूं मैं साफ़ कहूंगा, क्यों हकलाऊं ?
नेहरू को तो मरे हुए सौ साल हो गए
अब जो हैं वो शासन के जंजाल हो गए
गृह-मंत्री के सीने पर बैठा अकाल है
भारत-भूमि में प्रजातंत्र का बुरा हाल है !

(जनशक्ति, २१ फरवरी १९६५)

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

कविताएं



अंजना संधीर की पांच कविताएं

( अंजना जी की कविताओं में भाषा का सहज प्रवाह है और मौलिकता भी। अपने परिवेश और सोच, दोनों का सम्मिलित सुन्दर शब्द- चित्र हैं उनकी कविताएँ। उनमें धार है और वे सीधे चोट करती हैं। मुझे बेहद अच्छी लगती हैं. - इला प्रसाद (यू.एस.ए.)


(१) अमरीका हड्डियों में जम जाता है

वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत "हाइवे"
जिन पर चलती हैं कारें--
तेज रफ़्तार से,कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते,
टेलीफ़ोन करते, 'टू -डॊर' कारों में,रोमांस करते-करते,
अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है।

मूँगफ़ली और पिस्ते का एक भाव
पेट्रोल और शराब पानी के भाव,
इतना सस्ता लगता है सब्जियों से ज्यादा मांस
कि ईमान डोलने लगता है।
मँहगी घास खाने से तो अच्छा है सस्ता मांस ही खाना
और अमरीका धीरे-धीरे स्वाद में बसने लगता है।

गर्म पानी के शावर
टेलीविजन के चैनल, सेक्स के मुक्त दृश्य,
किशोरावस्था से 'वीकेन्ड' में गायब रहने की स्वतंत्रता
'डिस्को' की मस्ती, अपनी मनमानी का जीवन,
कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ
उठने- बैठने की आजादी......
धीरे-धीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमरीका।

अमरीका जब साँसों में बसने लगा
तो अच्छा लगा, क्योंकि साँसों को पंखों की
उड़ान का अंदाजा हुआ।
और जब स्वाद में बसने लगा अमरीका
तो सोचा खाओ, इतना सस्ता कहाँ मिलेगा ?
लेकिन अब जब हड्डियों में बसने लगा है अमरीका,
तो परेशान हूँ।

बच्चे हाथ से निकल गए,वतन छूट गया!
संस्कृति का मिश्रण हो गया ।
जवानी बुढ़ा गई,सुविधाएँ हड्डियों में समा गईं
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में समा जाता है!!

व्यक्ति वतन को भूल जाता है
और सोचता रहता है--
मैं अपने वतन को जाना चाहता हूँ।
मगर, इन सुखॊं की गुलामी तो मेरी हड्डियों में
बस गई है।
इसीलिए कहता हूँ कि
तुम नए हो,
अमरीका जब साँसों में बसने लगे,
तुम उड़ने लगो, तो सात समुंदर पार
अपनों के चेहरे याद रखना।
जब स्वाद में बसने लगे अमरीका,
तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद करना ।
सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना।
यहीं से जाग जाना.....
संस्कृति की मशाल जलाए रखना
अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना ।
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है!र

(2) तुम अपनी बेटियों को......
तुम अपनी बेटियों को
इन्सान भी नहीं समझते
क्यों बेच देते हो अमरीका के नाम पर?
खरीददार अपने मुल्क में क्या कम हैं कि.....
बीच में सात समुंदर पार डाल देते हो?
जहाँ से सिसकियाँ भी सुनाई न दे सकें
डबडबाई आँखॆं दिखाई न दे सकें
न जहाँ तुम मिलने जा सको
न कोई तुम्हें कुछ बता सके
कभी वापस आएँ भी तो
लाशॆं बने शरीर....जिन पर गहने और
मंहगे कपड़े पड़े हों.....!
तुम्हारी शान बढ़ाएँ और तुम्हारे पास भी
बिना रोये लौट जाएँ
उसी सोने के पिंजरे में
जहाँ अमरीका की कीमत
मजदूरी से भी चुकता नहीं होती !
(3) कैसे जलेंगे अलाव
ठंढे मौसम और
ठंढे खानों का यह देश
धीर-धीर मानसिक और शारीरिक रूप से भी
कर देता है ठण्ढा।
कुछ भी छूता नहीं है तब
कँपकँपाता नहीं है तन
धड़कता नहीं है मन
मर जाता है यहाँ , मान, सम्मान और स्वाभिमान।
बन जातीं हैं आदतें दुम हिलाने की
अपने ही बच्चों से डरने की
प्रार्थनाएँ करने की
छूट जाते हैं सारे रिश्तेदार
भूळ जाती है खुशबू अपनी मिट्टी की
बुलाता नहीं है तब वहाँ भी कोई।
आती नहीं है चिट्टी किसी की
जिनकी खातिर मार डाला अपने स्वाभिमान को।
उड़ जाते हैं वे बच्चे भी
पहले पढ़ाई की खातिर
फ़िर नौकरी, फ़िर ढूँढ़ लेते हैं साथी भी वहीं ।
बड़ी मुश्किलों से बनाए अपने घर में भी
लगने लगता है डर
अकेले रहते।
सरकारी नर्सें आती हैं, कामकाज कर जाती हैं।
फ़ोन कर लेते हैं कभी
आते नहीं हैं बच्चे ।
उनके अपने जीवन हैं
अपने माँ-बाप, भाई-बन्धु और देश तो
पहले ही छॊड़ आये थे वो
अब ये भी छूट गए
माया मिली न राम!
सोचते हैं
धोबी के कुत्ते बने, घर के न घाट के।
घंटों सोचते रह्ते हैं।
खिड़की से पड़ती बर्फ़ धीरे-धीरे
हड्डियों पर भी
पड़ने लगती है।
काम की वजह से मजबूरी में
खाया बासी खाना उम्र भर
रहे ठण्ढे मौसम में
अब सबकुछ ठंढा -ठंढा है
मन पर पड़ी ठंढक में
भला सोचिए, कैसे जलेंगे अलाव?
(4) सभ्य मानव
ईसा!
मैं मानव हूँ।
तुम्हें इस तरह सूली से नीचे नहीं देख सकता!

नहीं तो तुममें और मुझमें क्या अंतर?
बच्चों ने आज
कीलें निकाल कर तुम्हें मुक्त कर दिया
क्योंकि नादान हैं वे
तुम्हारा स्थान कहाँ है
वे नहीं जानते
वे तो हैरान हैं
तुम्हें इस तरह कीलों पर गड़ा देखकर
मौका पाते ही,
तुम्हारी मूर्ति क्रास से अलग कर दी उन्होंने
पर मैं...
मैं सभ्य मानव हूँ
दुनिया में प्रेम, ममत्व, वात्सल्य, उपदेश,
सूली पर टँगा ही उचित है
अत: आओ,
बच्चों की भूल मैं सुधार दूँ
तुम्हें फ़िर कीलों से गाड़ दूँ
क्रास पर लटका दूँ
ताकि, तुम ईसा ही बने रहो।
(5) ओवरकोट
काले-लम्बे
घेरदार ,सीधे
विभिन्न नमूनों के ओवर कोट की भीड़ में
मैं भी शामिल हो गई हूँ।
सुबह हो या शाम, दोपहर हो या रात
बर्फ़ीली हड्डियों में घुसती ठंढी हवाओं को
घुटने तक रोकते हैं ये ओवरकोट।
बसों में,सब वे स्टेशनों पर इधर-उधर दौड़ते
तेज कदमों से चलते ये कोट,
बर्फ़ीले वातावरण में अजब सी सुंदरता के

चित्र खींचते हैं।
चाँदी सी बर्फ़ की चादरें जब चारों ओर बिछती हैं
उन्हें चीर कर जब गुजरते हैं ये कोट
तब श्वेत-श्याम से मनोहारी दूश्य
ऐसे लगते हैं
मानों किसी गोरी ने
बर्फ़ीली चादरों को नजर से बचाने के लिए
ओवरकोट रूपी तिल लगा लिया हो!
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डाo अन्जना संधीर का जन्म १ सितम्बर, को रुड़की (उत्तर प्रदेश) में हुआ था.
बहुआयामी प्रतिभा की धनी अंजना जी मनोविज्ञान में पी . एच .डी हैं.
लेखन : हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती और उर्दू में समान अधिकार से लेखन। कई विधाओं - गजल,
कविता, संस्मरण, निबंध, अनुवाद, सम्पादन एवं हिन्दी शिक्षण पाठ्य-पुस्तक लेखन- में एक साथ सक्रिय।
प्रकाशित कृतियाँ - "बारिशों का मौसम", "धूप छाँव और आंगन", "मौजे-सहर", "तुम मेरे पापा जैसे नहीं हो" "अमरीका हड्डियों
में जम जाता है", " संगम" "अमरीका एक अनोखा देश", लर्न हिन्दी एंड हिन्दी फ़िल्म सांग्स","अहमदाबाद से अमरीका"। दूरदर्शन के लिए "स्त्री- शक्ति" सीरियल का निर्माण।
"यादों की परछाइयाँ" और "इजाफ़ा" का उर्दू
से हिन्दी में अनुवाद।
सम्पादन: " प्रवासी हस्ताक्षर", "सात समुन्दर पार से", ये कश्मीर है", प्रवासिनी के बोल " और "प्रवासी - आवाज"।
पुरस्कार: गुजरात उर्दू साहित्य- अकादमी पुरस्कार , गुजरात हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार, "तुलसी
सम्मान"(लखनऊ), "अदिति साहित्य शिखर सम्मान"(गाजियाबाद), अखिल भारतीय कविसभा(दिल्ली) का "काव्यश्री" और "विक्रमशिला" का "साहित्यभूषण" पुरस्कार। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत। इसके अतिरिक्त अमेरिका की विभिन्न संस्थाओं द्वारा विदेश में हिन्दी-
सेवा के लिए कई बार पुरस्कृत।
व्यवसाय : पत्रकारिता से आरम्भ कर अमेरिका में कोलम्बिया विश्वविद्यालय , न्यूयार्क में कई वर्षॊं तक हिन्दी का अध्यापन। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयार्क में उल्लेखनीय भूमिका। "विश्व मंच पर
हिन्दी" का सम्पादन और प्रवासी-हिन्दी साहित्यकारों की पुस्तक-प्रदर्शनी का आयोजन।
संपर्क : एल-१०४, शिलालेख सोसाइटी, अहमदाबाद - ३८०००४
गुजरात, भारत
ईमेल; anjana_sandhir@
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