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मंगलवार, 31 जनवरी 2012

रपट





राजस्थान पत्रिका पुरस्कार समारोह


राजस्थान पत्रिका समूह एवं माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की ओर से गत 22 जनवरी 2012 (रविवार) को पत्रिका मुख्यालय, केसरगढ़, जयपुर में आयोजित पं. झाबरमल स्मृति व्याख्यान के अवसर पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री बी.एल.जोशी के हाथों 'पत्रिका सृजनात्मक साहित्य व पत्रकारिता पुरस्कार 2011' हिन्दी साहित्यकारों एवं पत्रकारों को प्रदान किये गए। कहानी का प्रथम पुरस्कार जोधपुर की कथाकार डॉ. ज़ेबा रशीद को उनकी 'मौसम और पहली तारीख़' कहानी पर, द्वितीय पुरस्कार दिल्ली के कथाकार सुभाष नीरव को उनकी कहानी 'रंग बदलता मौसम' पर, कविता में प्रथम पुरस्कार जोधपुर के कवि/ग़ज़लकार बृजेश अम्बर को तथा द्बितीय पुरस्कार रतलाम के कवि अज़हर हाशमी को प्रदान किया गया। इन रचनाओं का चयन वर्ष 2010 में राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार में प्रकाशित रचनाओं में से किया गया। प्रथम पुरस्कार में 11-11 हज़ार रूपये व द्बितीय पुरस्कार में 5-5 हज़ार रुपये तथा प्रशस्तिपत्र दिए गए। इस अवसर पत्रकारिता के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्य के लिए बहुत

(पुरस्कार ग्रहण करते हुए सुभाष नीरव)


से पत्रकारों को भी सम्मानित किया गया। मंच पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल

श्री बी.एल.जोशी के साथ भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू, पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी मौजूद थे। समारोह में पूर्व न्यायाधीश व भारतीय विधि आयोग के सदस्य शिव कुमार शर्मा, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य विजय शंकर व्यास, राज्य मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष एन.के. जैन, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष बी. डी. कल्ला, सांसद ज्ञान प्रकाश पिलानिया, जयपुर की मेयर सुश्री ज्योति खंडेलवाल, चीफ़ काज़ी खालिद उस्मानी, पंडित झाबरमल शर्मा के पौत्र व छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा सहित लगभग एक हजार के करीब साहित्य प्रेमी, पत्रकार और विशिष्ट जन उपस्थित थे।
राजस्थान पत्रिका 23 जनवरी 2102 में प्रकाशित इस समारोह की विस्तृत

(पुरस्कार ग्रहण करते हुए डॉ. जेबा रशीद)



रिपोर्ट के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें-
http://epaper.patrika.com/22979/Rajasthan-Patrika-Jaipur/23-01-2012#page/9/2
प्रस्तुति : दीप्ति


शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

रपट


सभागार में बैठे साहित्यकार और विद्वान




लोकार्पण और विचार संगोष्ठी




साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था ’दिल्ली संवाद’ की ओर से ९ दिसम्बर,२०११ को साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने की और मुख्य अतिथि थे डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय. कार्यक्रम का संयोजन और संचालन वरिष्ठ लेखक और पत्रकार बलराम ने किया. इस आयोजन में भावना प्रकाशन, पटपड़गंज, दिल्ली से प्रकाशित चर्चित चित्रकार और लेखक राजकमल के उपन्यास ’फिर भी शेष’ पर चर्चा से पूर्व भावना प्रकाशन से सद्यः प्रकाशित दो पुस्तकों – वरिष्ठतम कथाकार हृदयेश की तीन खण्डों में प्रकाशित ’संपूर्ण कहानियां’ और वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल की ’साठ कहानियां’ तथा वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रेमजनमेजय पर केंद्रित कनाडा की हिन्दी पत्रिका ’हिन्दी चेतना’ का लोकार्पण किया गया.

चन्देल ने कभी नीलाम होना स्वीकार नहीं किया : बलराम

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए बलराम ने भावना प्रकाशन, उसके संचालक श्री सतीश चन्द्र मित्तल और नीरज मित्तल के विषय में चर्चा करने के बाद वरिष्ठतम कथाकार हृदयेश के हिन्दी कथासाहित्य में महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे अपने समय के सशक्त रचनाकार रहे हैं जो अस्सी पार होने के बावजूद आज भी निरंतर सृजनरत हैं.
(साठ कहानियां’ का लोकार्पण : बाएं से - बलराम, डॉ. नामवर सिंह, नीरज मित्तल(पीछे), रूपसिंह चन्देल, डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय और डॉ. राजेन्द्र गौतम(बैठे हुए).


”कथाकार रूपसिंह चन्देल के उपन्यासों और कहानियों की चर्चा करते हुए बलराम ने कहा कि चन्देल के न केवल कई उपन्यास चर्चित रहे बल्कि अनेक कहानियां भी चर्चित रहीं. उन्हीं में से श्रेष्ठ कहानियों का संचयन है उनका कहानी संग्रह – ’साठ कहानियां’. उन्होंने कहा कि चन्देल समकालीन कथा साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं जो अपनी सृजनशीलता में विश्वास करते हैं. चन्देल के विषय में मित्रगण जो बात गहनता से अनुभव करते हैं उसे सार्वजनिक मंच से उद्घोषित करते हुए बलराम ने कहा - “चन्देल ने कभी नीलाम होना स्वीकार नहीं किया.”

प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेमजनमेजय की व्यंग्ययात्रा पर प्रकाश डालते हुए बलराम ने कहा कि समकालीन व्यंग्यविधा के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है और उनके योगदान का ही परिणाम है कि कनाडा की हिन्दी चेतना ने उनपर केन्द्रित विशेषांक प्रकाशित किया.

(हिन्दी चेतना का लोकार्पण: बाएं से - डॉ. अर्चना वर्मा, बलराम, डॉ.नामवर सिंह, नीरज मित्तल, डॉ. श्रोत्रिय और डॉ. गौतम)


लेखकों पर बलराम की परिचायत्मक टिप्पणियों के बाद दोनों पुस्तकों और पत्रिका के लोकार्पण डॉ. नामवर सिंह, डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय और डॉ. अर्चना वर्मा द्वारा किया गया.

’फिर भी शेष’ पर विचार संगोष्ठी

लोकार्पण के पश्चात राजकमल के उपन्यास ’फिर भी शेष’ पर विचार गोष्ठी प्रारंभ हुई. डॉ. अर्चना वर्मा ने अपना विस्तृत आलेख पढ़ा. आलेख की विशेषता यह थी कि उन्होंने विस्तार से उपन्यास की कथा की चर्चा करते हुए उसकी भाषा, शिल्प और पात्रों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की. वरिष्ठ गीतकार डॉ. राजेन्द्र गौतम ने उपन्यास की प्रशंसा करते हुए उसे एक महत्वपूर्ण

(उपन्यास पर विचार गोष्ठी - बाएं से डॉ.श्रोत्रिय, डॉ. गौतम, डॉ.ज्योतिष जोशी, उपन्यासकार राजकमल और राजकुमार गौतम)

उपन्यास बताया. वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता ने उपन्यास पर अपना सकारात्मक मत व्यक्त करते हुए उसके कवर की प्रशंसा की. डॉ. ज्योतिष जोशी ने उसके पात्र आदित्य के चरित्र पर पूर्व वक्ताओं द्वारा व्यक्त मत से अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि उपन्यास ने उन्हें चौंकाया बावजूद इसके कि उसमें गज़ब की पठनीयता है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाती है. इन वक्ताओं के बोलने के बाद डॉ. नामवर सिंह ने जाने की इजाजत मांगी और “मैंने उपन्यास पढ़ा नहीं है, लेकिन वायदा करता हूं कि उसे पढ़ूंगा अवश्य और जो भी संभव होगा करूंगा.” कहते हुए उपस्थित भीड़ को हत्प्रभ छोड़कर नामवर जी तेजी से उठकर चले गए. नामवर जी के जाने के पश्चात उपन्यास पर अपना मत व्यक्त करते हुए बलराम ने कहा कि यह एक महाकाव्यात्मक उपन्यास है.

कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपना लंबा वक्तव्य दिया. उन्होंने उपन्यास के अनेक अछूते पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए पूर्व वक्ताओं से अपनी असहमति व्यक्त की, लेकिन लेखक की भाषा और शिल्प की प्रशंसा करने से अपने को वह भी रोक नहीं पाए.

भावना प्रकाशन के नीरज मित्तल ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया. इस अवसर पर बड़ी मात्रा में दिल्ली और दिल्ली से बाहर के साहित्यकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे. डॉ. कमलकिशोर गोयनका,डॉ. रणजीत शाहा, बलराम अग्रवाल,सुभाष नीरव, रमेश कपूर, प्रदीप पंत, उपेन्द्र कुमार, गिरिराजशरण अग्रवाल, राजकुमार गौतम सहित लगभग पचहत्तर साहित्यकार और विद्वान उपस्थित थे.

प्रस्तुति – सुभाष नीरव

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

वातायन-दिसम्बर,२०१०



हम और हमारा समय

२०१०-२०११ हिन्दी के चार महान कवियों के जन्म- शती के रूप में मनाया जा रहा है . ये कवि हैं अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, बाबा नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह. इनके साथ एक नाम और जुड़ता है फैज़ अहमद फैज़ का. फैज़ की लिपि भले ही उर्दू थी, लेकिन हम उन्हें हिन्दी का कवि ही मानते हैं . इसप्रकार यह काल पांच महान कवियों का जन्म-शती वर्ष है. लेकिन हिन्दी की दुर्भाग्यपूर्ण राजनीति के चलते कुछ आभिजात्य साहित्यकार केवल अज्ञेय और शमशेर की जन्म-शती ही मनाने की बात कर रहे हैं और शेष को हासिए पर डालने के उनके प्रयास जारी हैं. उनके दुरभिसंधिपूर्ण प्रयासों के बावजूद
देश के अनेक शहरों और कस्बों में नागार्जुन, केदार और फैज़ के चहेते अपने स्तर पर उन पर केन्द्रित कार्यक्रम कर रहे हैं. ऎसी स्थिति में सादतपुर कैसे पीछे रह सकता था, जहां जीवन के अंतिम दस-ग्यारह वर्षों तक नागार्जुन की आवाज गूंजती रही थी और जहां की गलियां उनके पगचिन्हों को आज भी अपने सीने पर सहेजे हुए हुए हैं. सादतपुर का हर घर बाबा का अपना घर था और गली नम्बर दो में उनका अपना मकान होते हुए भी कभी-कभी कई-कई दिन वह किसी साहित्यकार के घर बने रहते थे. उस घर के किचन से लेकर चौबारे तक बाबा का आधिपत्य होता था . प्रतिदिन सुबह आठ बजे आप
ना डंडा ले वह घर से निकलते और चित्रकार-साहित्यकार हरिपाल त्यागी के घर तक पांच गलियां मंझाते हुए सभी साहित्यकारों-पत्रकारों के दरवाजे पर दस्तक देते घूम आते. मन होता तब किसी के घर कुछ देर बैठ लेते. घर के सुख-दुख जानते-समझते और समझाते ,हंसते और हंसाते और चाय पीकर उठ जाते. सादतपुर रहते हुए बाबा का यह सिलसिला अबाध चलता रहता. शाम के समय बाबा को रमाकांत जी के पास बैठे देखा जा सकता था. वहीं कवि विष्णुचन्द्र शर्मा भी पहुंच जाते और दूसरे लोग भी .
यहां यह बताना आवश्यक है कि सादतपुर दिल्ली के उत्तर-पूर्व में बसी वह बस्ती है जहां १९७१ में सबसे पहले कथाकार स्व. रमाकांत आ बसे थे. रमाकांत जी ने अनेक साहित्यकारों और पत्रकारों को यहां आ बसने के लिए प्रोत्साहित किया. उनके बाद यहां आने वालों में हैं विष्णुचन्द्र शर्मा, सुरेश सलिल, महेश दर्पण, स्व.माहेश्वर, बाबा नागार्जुन, हरिपाल त्यागी, धीरेन्द्र अस्थाना, बलराम, वीरेन्द्र जैन, रामकुमार कृषक, सुरेन्द्र जोशी, अरविन्द सिंह -----यह सिलसिला आज भी जारी है. आलोचक मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह-रेखा अवस्थी , पत्रकार अजेय सिंह और कथाकार- चितंक भगवान सिंह ने भी यहां जमीनें खरीदीं थीं, लेकिन यहां बसे नहीं.

दिल्ली के नक्शे में भले ही सादपुर खोजना कठिन हो लेकिन यह एक ऎसी बस्ती है जो पूरे देश में ही नहीं दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी साहित्यकारों-पत्रकारों की बस्ती के रूप में जानी जाती है. यह दिल्ली के साहित्यिक-सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में प्रख्यात है. साहित्यिक गोष्ठियों और समाराहों की मजबूत परम्परा रही है यहां और आज भी व्यस्ततम जीवनचर्या के बावजूद यहां साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है. साहित्यिक मेल-मिलाप का जो सिलसिला रमाकांत जी के समय से प्रारंभ हुआ था वह आज भी चल रहा है. ऎसी ही एक बैठक के दौरान हरिपाल त्यागी, रामकुमार कृषक और महेश दर्पण
ने यह निर्णय लिया कि सादतपुर में नागार्जुन जन्मशती समारोह का आयोजन किया जाना चाहिए . इन तीनों ने ही इस कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए अथक प्रयास किए , जिसमें यहां के सभी साहित्यकारों-पत्रकारों का इन्हें भरपूर सहयोग मिला. हरिपाल त्यागी ने बाबा की कविताओं (बांग्ला कविताओं सहित) के २८ पोस्टर और बाबा का एक तैलचित्र बनाया.

२१ नवम्बर,२०१० (रविवार) को अंततः सादतपुर के जीवन ज्योति हायर सेकण्डरी स्कूल में दोपहर दो बजे से शाम सात बजे तक यह समारोह सम्पन्न हुआ, जिसमें बनारस से वाचस्पति
बरेली से सुधीर विद्यार्थी सम्मिलित हुए. दिल्ली के कोने-कोने से ही नहीं गाजियाबाद, बिजनौर, फरीदाबाद, गुड़गांव आदि दूरस्थ स्थानों से भी साहित्यकार –पत्रकार आए .

प्रस्तुत है समारोह की विस्तृत रपट और साथ में बाबा नागार्जुन की छः कविताएं .
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नागार्जुन-जन्मशती समारोह - एक रपट

सुबह सात बजे का समय. सादतपुर की गली नं. २ का ’यात्री निवास’ --- बाबा नागार्जुन का घर जहां आज उनके पुत्र श्रीकांत रहते हैं . हमें वहां एकत्र होना था. दस मिनट के अंदर सादतपुर
और उसके आस-पास क्षेत्र में रहने वाले सभी साहित्यकार-पत्रकार, आमजन, बड़ी संख्या में किशोर और बच्चे एकत्र हो गये . सवा सात बजे “’अमल-धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है , सादतपुर की इन गलियों ने , बाबा को चलते देखा है.” नारे की अनुगूंज के साथ प्रभातफेरी प्रारंभ हुई. इस नारे की पहली दो पंक्तियां बाबा की एक कविता की हैं, जिनके साथ बाद की दो पंक्तियां राककुमार कृषक ने अपनी जोड़ दी हैं.

बाबा की एक अन्य कविता की तीन पंक्तियां लेकर एक और नारा अकाश में गूंज रहा था –
"नए गगन में , नया सूर्य जो चमक रहा है, मेरी भी आभा है इसमें.”

तीसरा नारा था रामकुमार कृषक द्वारा निर्मित पंक्तियां :

“दुनिया कहती दुनिया-भर के , मैं कहता सादतपुर के हैं, बाबा अधुनातन पुरखे हैं.”


उपरोक्त तीनों नारे लगभग दो घण्टे तक सादतपुर की गलियों को गुंजायमान करते रहे. प्रभातफेरी का कारंवा आगे बढ़ता रहा और नए चेहरे जुड़ते रहे. पूरे सादतपुर का चक्कर लगाकर प्रभातफेरी का समापन ’यात्री निवास’ में हुआ.

मुख्य समारोह दोपहर दो बजे गली नं. तीन स्थित जीवन ज्योति हायर सेकण्डरी स्कूल के प्रांगण में हुआ. बाबा कितने गहरे जन-सरोकारों वाले कवि थे यह समारोह इस बात को प्रमाणित कर रहा था. इस कार्यक्रम में न केवल नागार्जुन के रचनात्मक अवदान पर गंभीर चर्चा हुई, बल्कि उनकी रचनाओं को कला, संगीत, फिल्म, पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के माध्यम से भी उपस्थित किया गया. प्रभातफेरी से लेक शाम को फिल्म-प्रदर्शन तक चले इस शताब्दी समारोह का आयोजन ’सादतपुर साहित्य समाज’ ने किया था, जिसमें सादतपुर के नागरिकों तथा दिल्ली और दिल्ली के बाहर से आए अनेक सुप्रतिष्ठ लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों ने भाग लिया.

कार्यक्रम की शुरुआत हरिपाल त्यागी द्वारा बनाए नागार्जुन के भव्य तैलचित्र और उनकी कविताओं के २८ पोस्टरों के उद्घाटन-अनावरण से हुई. अनावरण श्रीमती कमलिनी दत्त, कु. कणिका , डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. भगवान सिंह , वाचस्पति, उमेश वर्मा, कुबेरदत्त आदि के हाथों हुआ.

उद्घाटन-अनावरण के बाद नागार्जुन की कुछ कविताओं की स्वरबद्ध प्रस्तुति इस समारोह की विशॆष उपलब्धि रही. प्रस्तोता थीं लेडी श्रीराम कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक डॉ. प्रीति प्रकाश प्रजापति. उनका काव्य-गायन सभी के लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा. इसके बाद सादतपुर के कुछ वरिष्ठ और युवा नागरिकों ने बाबा के साथ जुड़ी अपनी यादों को ताजा किया.

अगला सत्र था नागार्जुन का महत्व-मूल्यांकन . इसमें सर्वप्रथम बोलते हुए सुप्रसिद्ध समालोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि नागार्जुन की जन्मशती सारे देश में मनाई जा रही है. लेकिन सादतपुर में इसका मनाया जाना विषेष महत्व रखता है. यह
समारोह तरौनी(बाबा का गांव) में मनाए गए समारोह से कम महत्वपूर्ण नहीं है. उन्होंने कहा कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करना आज की जरूरत है.बाबा का फोटो आपने किसी राजनेता के साथ नहीं देखा होगा. यहां आप यह विचार कीजिए कि आज जो प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं, वे किनसे मिलते हैं और नागार्जुन किनसे मिलते थे. बाबा को हिन्दी में साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिला. यह पुरस्कार की परंपरा और मान्यता पर गहरा व्यंग्य और कटाक्ष है. वे वंचितों के कवि थे. डॉ. त्रिपाठी ने ’अकाल और उसके बाद’ शीर्षक कविता के हवाले से कहा कि ’सामयिक’ को ’कालजयी’ कैसे बनाया जाता है, यह बाबा से सीखा जा सकता है. आज ऎसी कविता की बड़ी जरूरत है. उन्होंने कहा कि जनवादी संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए जनवादी शिल्प की जरूरत होती है. उसे साधना कठिन है, लेकिन इसे साधे बिना क्लैसिक कविता नहीं रची जा सकती. जनवादी साहित्य में क्लैसिक क्या है, यह नागार्जुन से सीखना होगा.

वरिष्ठ कवि विष्णुचन्द्र शर्मा ने इस अवसर पर नागार्जुन शीर्षक अपनी कविता का पाठ किया और सुप्रसिद्ध समालोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने बाबा के कुछ संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक बार दिनकर जी ने मुझसे कहा कि बाबा उनसे मिल लें. मैंने बाबा से जब यह कहा तो वे बहुत नाराज हुए और पूछा कि तुमने दिनकर को क्या जवाब दिया ? मैं चुप. बाद में जब दिनकर जी ने बाबा की नाराजगी के बारे में जाना तो वे खुद उनसे मिलने आए और उनसे माफी मांगी. उन्होंने कहा कि यह एक जनकवि का स्वाभिमान था. मुरली बाबू ने बाबा की कविता में विवधता पर भी प्रकाश डाला और उनकी प्रगतिशील प्रयोगवादिता पर भी. रेखा अवस्थी का कहना था कि वर्ग चेतना के नाते बाबा ने जो रास्ता दिखाया है, उस पर हमें ध्यान देना चाहिए. वरिष्ठ व्यंग्य लेखक प्रदीप पंत ने कहा कि ’अज्ञेय’ जहां अपने लेखन और साहित्य में अभिजात हैं, वहीं नागार्जुन उनसे एकदम दूर खड़े दिखाई देते हैं .यह एक ही समय में मौजूद दो कवियों का ध्यान देने योग्य अंतर है.

क्रान्तिकारी आंदोलन की शोध-खोज करनेवाले सुपरिचित लेखक सुधीर विद्यार्थी ने अपने मार्मिक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि बाबा में दूसरी भाषाओं और दूसरों से सीखने की जो अद्भुत ललक थी, उसमें वे बच्चों से भी सीखते थे. उन्होंने जो कुछ रचा, वह बंद कमरों में बैठकर नहीं रचा. सुप्रसिद्ध चितंक और कथाकार भगवान सिंह ने नागार्जुन की कविताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें हमारे काव्येतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण कवि कहा. बाबा के परम आत्मीय रहे लेखक-प्राध्यापक वाचस्पति ने उनकी घुमक्कड़ी के कुछ दिलचस्प संस्मरण सुनाए. कथाकार संजीव ने बाबा के वात्सल्य भाव और उनकी जीवंतता को लेकर संस्मरण सुनाए. कहा कि बाबा सबको डांटते जरूर थे, पर स्वयं भी डांट खाने का अवसर जुटा लेते थे. लेकिन इसके पीछे उनके व्यक्तित्व की विशिष्टताएं ही थीं. घन्नासेठों की तो परछाईं तक से वे बचते थे.

समारोह के अंतिम चरण में नागार्जुन केन्द्रित दो महत्वपूर्ण फिल्मों का प्रदर्शन किया गया. इनमें से एक का निर्माण साहित्य अकादेमी और दूसरी का एन.सी.ई.आर.टी ने किया है. समारोह के विभिन्न सत्रों का संचालन क्रमशः रामकुमार कृषक और महेश दर्पण ने किया.

इस समारोह में बड़ी संख्या में लेखकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई. उनमें से कुछ नाम हैं – वरिष्ठ कवि दिनेश कुमार शुक्ल (गुड़गांव) , वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय, कवि गिरधर राठी , बली सिंह , भारत भारद्वाज, त्रिनेत्र जोशी, प्रकाश मनु (फरीदाबाद), दिविक रमेश (नोएडा), भारतेन्दु मिश्र, रमेश प्रजापति, दरवेश भारती, मधुवेश, सुधीर सुमन, प्रेम जनमेजय, श्याम सुशील, वरुण कुमार तिवारी, क्षितिज शर्मा, संजीव ठाकुर (गाजियाबाद) , रमेश आजा़द, आचार्य सारथी, मणिकांत ठाकुर, प्रकाश प्रजापति, अनुराग, आशीष, पूर्वा दत्त, सीमा ओझा, जितेन्द्र जीत, रेखा व्यास, दिलीप मंडल आदि.

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रविवार, 29 नवंबर 2009

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राधेश्याम तिवारी की कविताओं में बेहद सादगी है.

कुंवर नारायण

पटना से आरती सिंह

राधेश्याम तिवारी की कविताओं में बेहद सादगीपूर्ण संघर्ष की चेतना है। इनकी कविताओं से भाषा में मैत्रीपूर्ण व्यवहार का सुखद अहसास होता है। कविता में यह सादगी बहुत मुश्किल से मिलती है। यह टिप्पणी प्रख्यात हिंदी कवि कुँवर नारायण की है। गत दिनों पटना में राधेश्याम तिवारी की नई कविता पुस्तक, ‘इतिहास में चिडि़या’ का विमोचन करते हुए उन्होंने ये बातें कहीं थीं। कुंवर नारायण ने कहा कि भाषा की यह सादगी राधेश्याम तिवारी की कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि भाषा को अपनी बात कहने देना चाहिए। उस पर अनावश्यक दबाव देने से कविता बिगड़ जाती है।

इस अवसर पर नई धारा के संपादक एवं कवि-आलोचक डॉ. शिवनारायण ने कहा कि राधेश्याम तिवारी हमारी पीढ़ी के महत्वपूर्ण कवि हैं। इनकी कविताएं अपने गहरे अर्थबोध के कारण हमें दूर तक ले जाती हैं . उन्होंने कहा कि संप्रेषणीयता के अलावा राधेश्याम तिवारी की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी जनपक्षधरता है, जो हमें सम्मोहित करती है। इस अवसर पर अन्य वक्ताओं में परेश सिनहा, अशोक कुमार सिन्हा, ममता मेहरोत्रा आदि थे।

इस अवसर पर तिवारी ने अनेक कविताएं सुनाईं, जिसे श्रोताओं ने मन से सराहा .
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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2008

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"कथाकार तेजेन्द्र शर्मा इन दिनों लन्दन से भारत पधारे हैं। २ अक्टूबर २००८ को उनके आई.टी. विशेषज्ञ पुत्र मयंक की सगाई मुंबई की उन्नति नारवेकर के साथ सम्पन्न हुई। उन्नति ने इसी वर्ष डेन्टिस्ट्री का इम्तहान पास किया है। अपने भारत प्रवास के दौरान तेजेन्द्र शर्मा ने नई दिल्ली, भोपाल एवं फ़रीदाबाद में अपनी कहानियों का अभिनय पाठ किया।

प्रस्तुत है सभी कार्यक्रमों की एक साझा रेपोर्ट:

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में कथाकार तेजेन्द्र शर्मा का कथापाठ....

अखिल भारतीय सांस्‍कृतिक पत्रकार संघ, नई दिल्‍ली द्वारा आयोजित मित्र संवाद व कहानी पाठ २५ सितम्‍बर २००८ की संध्‍या को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सफलतापूर्वक संपन्‍न हुआ। संचालक अजित राय ने इस पहली बैठक में पत्रकार संघ की रूपरेखा सामने रखते समय यह भी घोषणा की कि संघ की ओर से वर्ष में दो सांस्‍कृतिक संवाददाताओं को पुरस्‍कृत किया जाया करेगा।

(कहानी पाठ करते कथाकार तेजेन्द्र शर्मा)

इस अवसर पर लन्दन से पधारे कथाकार तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव – कथा यू.के.) ने अपनी बहुचर्चित कहानी 'क़ब्र का मुनाफ़ा' का अभिनय पाठ किया। यह कहानी लन्दन में बसे दक्षिण एशियाई मुस्लिम समाज में मृत्यु का एक नया विमर्श सामने लाती है। जीवन में बाज़ार की घुसपैठ इस क़दर बढ़ गई है कि अंतिम संस्कार जैसे पवित्र रीति-रिवाजों का भी व्यापार होने लगा है। यह एक बड़े दृष्टिकोण की कहानी है जो खिलन्दड़े अन्दाज़ में मृत्यु जैसे गंभीर और डरावने विषय को उत्सव में बदल देती है। श्री तेजेन्‍द्र शर्मा के कहानी पाठ ने समां बांध दिया। लीक से हटकर लिखी गई उनकी कहानी 'क़ब्र का मुनाफ़ा' की रोमांचक करवटों से श्रोताओं को आनंद विभोर होते रहे। संवादों के अनुरूप स्‍वर के आरोह और अवरोह से प्रकट हो रहा था कि तेजेन्द्र शर्मा कथापाठ के सिद्धहस्त कलाकार हैं। उल्‍लेखनीय है कि साक्षात्‍कार के संपादक हरि भटनागर ने इंडिया टुडे के एक सर्वे में 'क़ब्र का मुनाफ़ा' को पिछले साठ साल में प्रकाशित बीस महत्‍वपूर्ण कहानियों में स्‍थान दिया है। कहानी एवं कहानी के अभिनय पाठ की सभी ने भूरि भूरि प्रशंसा की।

श्री तेजेन्द्र शर्मा एक चर्चित कथाकार होने के साथ ही, दूरदर्शन के शांति धारावाहिक के लिए लेखन कर चुके हैं तथा अन्नू् कपूर निर्देशित फिल्म अभय में नाना पाटेकर के साथ अभिनय भी कर चुके हैं। वे हिंदी साहित्य के एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 'इंदु शर्मा कथा सम्मान' प्रदान करने वाली संस्था 'कथा यू.के.' के महासचिव हैं। अनेक पुरस्कारों से सम्मानित श्री शर्मा अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों में भी सहभागी रह चुके हैं।

(मंच पर स.श्री अशोक बाजपेई, राजेन्द्र यादव और तेजेन्द्र शर्मा)

ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने तेजेन्द्र शर्मा की कहानी 'क़ब्र का मुनाफ़ा' पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक ऐसी सशक्त कहानी हो जो शुरू से आख़िर तक पाठकों को बान्धे रखती है। उन्होंने कहा कि कहानी का अभिनय पाठ एक अद्बुत नाटकीयता को सामने लाता है।

वरिष्ठ कथाकार असग़र वजाहत ने लन्दन के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त करने के दौरान हुए अपने अनुभवों को दर्शकों के साथ बांटा। उन्होंने कहा कि तेजेन्द्र की कहानियां सामाजिक एवं निजी विसंगतियों को कलात्मक ढंग से सामने लाती हैं।

हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने सांस्कृतिक पत्रकारों के इस संगठन को एक नई पहल बताते हुए कहा कि इससे सांस्कृतिक ख़बरों के क्षेत्र में फैली अराजकता कुछ कम होगी। उन्होंने कहा कि 'क़ब्र का मुनाफ़ा' एक अनोखे विषय को ख़ास तरह की नाटकीयता के साथ गहराई से देखने की कोशिश है। इसे सुनने के बाद लगा कि कहानी पढना भी एक सांस्कृतिक गतिविधि है।


(इंडिया इंटरनेशनल सेण्टर में कुछ मित्रों के साथ कथाकार तेजेन्द्र शर्मा)


सर्वश्री के. बिक्रम सिंह, नासिरा शर्मा, पद्मा सचदेव, विकास राय, देवेन्द्र राज अंकुर, डॉ. कमल कुमार, अशोक चक्रधर, विजय कुमार मल्होत्रा, उषा महाजन, रूप सिंह चन्देल, मंजीत ठाकुर, अशोक मिश्र, गीताश्री, उषा पाहवा, चंदीदत्त शुक्ल, राकेश पांडेय, विमलेश सांदलान, शरद शर्मा, जयंती, सुधीर सक्सेना, रमेश शर्मा, अजय नावरिया, अरूण कुमार जैमिनी, आलोक श्रीवास्तव, अनिल जोशी, रूपसिंह चंदेल, अविनाश वाचस्पति, अरूण माहेश्व,री, महेश भारद्वाज, अनुज अग्रवाल, पायल शर्मा इत्यादि की उपस्थिति ने समारोह को एक गरिमा प्रदान की। समारोह में खूब ठहाके लगे और इसने एक स्तरीय कवि सम्मेलन का सा लुत्फ प्रदान किया।... अंत में अमर उजाला के श्री अरुण आदित्य ने आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापन किया। पर अंत तक यह रहस्य सुलझ न सका कि नामवर सिंह कहीं हवा में ही अटके रहे या दिल्ली के ट्रैफिक में उलझे रहे क्योंकि यह बतलाया गया था कि वे कहीं बाहर हैं और हवाई जहाज़ से इस समारोह में दिल्ली पहुंच रहे हैं...
प्रस्तुति : रू.सिं.च.

कथाकार तेजेन्द्र शर्मा का भोपाल में रचना पाठ.....

हरि भटनागर

प्रसिद्ध कथाकार एवं अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के प्रमुख कर्ता-धर्ता, लंदनवासी तेजेन्द्र शर्मा का भोपाल में रचना-पाठ आयोजित किया गया। रचना-पाठ की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार मुकेश वर्मा एवं विजय वाते ने की।

श्री तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी दो कहानियों – 'तरकीब' एवं 'देह की कीमत' का अभिनय पाठ किया। पाठ से पूर्व उन्होंने कथाकार श्री हरि भटनागर द्वारा संपादित एवं वरिष्ठ रचनाकार स्व. प्रभा खैतान द्वारा अनुदित एवं प्रस्तुत – लेव तॉलस्तॉय की पत्नी सोफ़िया तॉलस्तोया की डायरी लिये 'रचना समय' के अंकों का लोकार्पण किया। तेजेन्द्र शर्मा ने प्रभा खैतान की असमय मृत्यु पर दुःख व्यक्त करते हुए उनके साहित्यिक अवदान के साथ उन्हें याद किया। सोफ़िया तॉलस्तोया की डायरी के बारे में उन्होंने कहा, " यह डायरी तत्कालीन रूस और लेव तॉलस्तॉय के निजी एवं इनके ढंके मुंदे जीवन प्रसंगों को अनावृत करती है। एक तरह से यह डायरी ज़ारशाही व्यवस्था और महान् रचनाकार तॉलस्तॉय के साथ सोफ़िया तॉलस्तोया के जीवन का – नारी जीवन का महा-आख्यान है।"

श्री तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों पर चर्चा आरम्भ करते हुए प्रख्यात कवि एवं व्यंग्य रचनाकार जब्बार ढांकवाला ने कहा कि दोनों ही कहानियां नायाब हैं। उन्होंने कहा कि 'तरकीब' कहानी मुस्लिम समाज की विसंगतियों को व्यंजित करती है जो अपनी प्रस्तुति में अनोखी है। उन्होंने 'देह की कीमत' कहानी को आज के जटिल समय और उसकी विद्रूपता का पर्याय बताया। चित्रकार मंजूषा गांगुली ने चित्रकार जनगण सिंह श्याम को याद किया। उन्होंने कहा कि 'देह की कीमत' कहानी का चरित्र जिस तरह महत्वाकांक्षा की दौड़ में मृत्यु के मुंह में समाता है, मुझे यह कहानी जनगण सिंह श्याम की याद दिलाती है। उन्होंने दोनो कहानियों की सराहना की। युवा आलोचक आनन्द कुमार सिंह ने एक तरफ़ 'देह की कीमत' को वेल-रिटन एवं फ़िनिश्ड कहते हुए उसकी तारीफ़ की वहीं दूसरी कहानी 'तरकीब' के बारे में उनकी धारणा थी कि यह कहानी अपनी प्रस्तुति में कमज़ोर है। कहानी अपने कथ्य को गहरे विमर्श के साथ अभिव्यक्त नहीं कर पाई है।

कथाकार हरि भटनागर ने 'देह की कीमत' कहानी को आजकी एक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण कहानी बताते हुए कहा कि यह कहानी आज के पूंजीवादी समाज के पतन की गाथा है। उन्होंने कहा कि आज का विद्रूप समय हमे कहीं का नहीं छोड़ रहा है और अन्ततः हमें उसका ख़मियाज़ा अपनी जान देकर भुगतना पड़ता है। उनका मानना था कि यह कहानी कथ्य एवं शिल्प में बेजोड़ है। यही वजह है कि जब मैंने 'इंडिया टुडे' द्वारा आयोजित ५० वर्षों की २० श्रेष्ठ कहानियों का मूल्यांकन किया तो मुझे 'देह की कीमत' एवं 'क़ब्र का मुनाफ़ा' में से किसी एक को चुन पाना बहुत दुष्कर कार्य लगा।

युवा कवि रवीन्द्र प्रजापति ने कहा कि दोनों कहानियां कहन और प्रस्तुतिकरण में आधुनिक और अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी कहानी का सबल नमूना हैं। गीतकार राजेन्द्र जोशी ने दोनों कहानियों की विशद मीमांसा प्रस्तुत करते हुए कहा कि दोनों कहानियों में सहजता है जो सीधे दिल-ओ-दिमाग़ को प्रभावित करती है। 'समीरा' पत्रिका की संपादक मीरा सिंह ने 'तरकीब' कहानी की विषय वस्तु की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह कहानी हर देश की नारी पीड़ा और पुरुष-वर्चस्व को व्यंजित करती है। कथा लेखिका स्वाती तिवारी ने दोनों कहानियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि दोनों कहानियां निश्चित ही आज के समय की विसंगति को अभिव्यक्ति देती हैं। उन्होंने तेजेन्द्र शर्मा की पाठ प्रस्तुति की भी भूरि भूरि प्रशंसा की। व्यंग्यकार वीरेन्द्र जैन ने कहा कि दोनों कहानियां मर्म को छूने वाली यादगार कहानियां हैं।
श्री विजय वाते ने दोनों कहानियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि दोनों कहानियां निश्चित ही आज के समय की विसंगतियों को अभिव्यक्ति देती हैं। उन्होंने कहा कि 'तरकीब' कहानी में तेजेन्द्र शर्मा ने मुस्लिम समाज के पुरुष वर्चस्व को बहुत बारीक़ी से छुआ है। डा. शिरीष शर्मा ने 'तरकीब' कहानी को मुस्लिम समाज में पुरुष की क्रूरता का उत्कृष्ठ नमूना कहा। कथाकार मुकेश वर्मा ने कहा कि लम्बे अर्से के बाद ऐसी कहानियां सुनने को मिलीं जो प्रस्तुति और विचार के स्तर पर ऐसी हैं जिनसे हमारे अंदर विचार की यात्रा शुरू कर दी है।

कथा लेखिका उर्मिला शिरीष के जानकी नगर स्थित आवास पर हुए इस रचनापाठ का संचालन उर्मिला शिरीष ने ही किया। उन्होंने कहानियों की सराहना करते हुए कहा कि दोनों कहानियां यादगार कहानियां हैं जो निश्चित रूप से आज के विषमतामूलक समय की पड़ताल करती हैं। एक तरह से ये कहानियां समय के सच की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं।

रचनापाठ में अन्य लोगों के अतिरिक्त सर्वश्री बृजनारायण शर्मा, रामनिवास झा, अनवार-ए-इस्लाम, अनिल करमेले और मृत्युंजय शर्मा भी उपस्थित थे।

तेजेन्द्र शर्मा का फ़रीदाबाद में कथा पाठ.....

फ़रीदाबाद के डी.ए.वी. कॉलेज में तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी कहानी 'देह की कीमत' का अभिनय पाठ किया। वरिष्ठ पत्रकार अजित राय ने हॉल में उपस्थित १५० विद्यार्थियों को तेजेन्द्र शर्मा का परिचय दिया। कार्यक्रम में तेजेन्द्र शर्मा एवं उनकी माता श्रीमती सुरक्षा शर्मा का पुष्पगुच्छ दे कर स्वागत किया गया। तेजेन्द्र शर्मा के कहानी पाठ से मंत्रमुग्ध श्रोताओं के हाव भाव से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वे किस गहराई तक कहानी में डूबे हुए हैं।

कहानी पाठ के पश्चात विद्यार्थियों ने करतल ध्वनि से अपनी तारीफ़ को अभिव्यक्ति दी। कॉलेज के प्रधानाचार्य श्री अहूजा ने कहानी की तारीफ़ करते हुए कहा कि उन्होंने अपने विद्यार्थियों को कभी भी किसी पाठ में इतना मग्न होते नहीं देखा। कहानी के विषय, कथावस्तु, शिल्प एवं पाठ को अद्वितीय बताते हुए उन्होंने तेजेन्द्र शर्मा को खुली दावत दे डाली कि वे जब कभी भी भारत आएं, डी.ए.वी. कॉलेज के छात्रों को अपनी रचना सुनाने अवश्य आएं। हिन्दी विभाग की अध्यक्षा श्रीमती शुभ तनेजा ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।