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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

समीक्षा




आधी आबादी की पूरी कहानी -”एक औरत: तीन बटा चार‘‘
0 शालिनी माथुर

हिन्दी साहित्य में किताबों की बढ़ती कीमतें और पाठकों की सिमटती संख्या का हमेशा रोना रोया जाता है पर किसी प्रकाशक ने इस दिशा में कभी पहल नहीं की । इस दृष्टि से जयपुर के बोधि प्रकाशन की चर्चित रचनाकारों की स्तरीय किताबें पाठकों तक कम कीमत में पहुंचाने का स्वागत हर ओर से किया जा रहा है । सन् 2010 में कुछ लेखकों की 80 से 96 पष्ठों की पेपरबैक किताबें दस दस रुपये में प्रकाशित की गई थीं। इस साल जून 2011 में दस महिला रचनाकारों की कृतियों का एक सेट पाठकों को सौ रुपये में ( यानी एक पुस्तक दस रुपये में ) उपलब्ध करवाने का बोधि पुस्तक पर्व का अनुष्ठान स्वागत योग्य है । इसमें मन्नू भंडारी की चार लंबी कहानियों का संकलन - करतूते मरदां है , ममता कालिया का विविध टिप्पणियों का संग्रह - पढ़ते लिखते रचते है और चित्रा मुद्गल का पाटी और सुधा अरोड़ा की चैदह चर्चित छोटी कहानियों का संकलन - एक औरत: तीन बटा चार है ।

हमारे समय की बहुचर्चित और प्रतिष्ठित कथाकार सुधा अरोड़ा एक लम्बी लेखकीय यात्रा करने वाली लेखिका हैं । उनकी चैदह छोटी कहानियों का नया संग्रह मेरे सामने है -” एक औरत: तीन बटा चार।‘‘

बेहतरीन कहानियां लिखने के लिए जानी जाने वाली इस कथाकार ने सामाजिक परिघटनाओं और उनमें चोट खा कर गिरती और छटपटा कर फिर उठती हुई स्त्रियों के संघर्षों के आधार पर , कहानियां लिखीं हैं। पुस्तक की कहानियां आकार में छोटी , कलात्मक और प्रतीकात्मक होते हुए भी सरल सहज और बोधगम्य हैं। इन कहानियों का रचना काल 1994 से 2009 तक विस्तृत है। ये किसी क्षणिक आवेग या आवेश में की गई रचनाएं नही है। यूं भी पिछले पैंतालिस वर्षां से निरन्तर लिखने वाली जिस लेखिका की कलम की धार समय के साथ-साथ पैनी होती गई हो, और कहानियां लिखने के अतिरिक्त जिसकी सामाजिक चेतना और सामाजिक समझ ने उसे जमीनी सामाजिक कार्यों से जोड़ रखा हो, उसकी हर नई किताब अपना परिचय खुद होती है।

”एक औरत: तीन बटा चार ” में सुधा जी की चैदह कहानियां है । अक्सर कहानियां जीवन की हकीकत से कुछ ज्यादा सच्ची होती है। हकीकत से सच्ची इन कहानियों के कथानक पाठक की जिज्ञासा शान्त नहीं करते बल्कि पाठक को और प्रश्नाकुल बनाते है, और कुछ कहानियां स्त्री की अकथनीय व्यथा को कुछ इस तरह बयान करती है कि पाठक मजबूर हो कर कहता है बहुत हो गया अब और कुछ न कह¨, अब और नहीं सुना जाता । सुधा अरोड़ा की कहानियां सिर्फ दोपहर की फु़र्सत में महिलाओं को अच्छी नींद सुलाने के लिए नहीं लिखी गई हैं।

पहली कहानी ‘‘एक औरत तीन बटा चार’’ छोटी है - कलात्मक और प्रतीकात्मक। कहानी की शुरूआत ऐसी है मानो ओ. हेनरी ने कोई किस्सा सुनाना शरू किया हो - ”एक तीस बरस पुराना घर था। वहाँ पचास बरस पुरानी एक औरत थी। उसके चेहरे पर घर जितनी ही पुरानी लकीरें थीं।” वह ”एक खूबसूरत औरत थी - आखिरी उंगली पर डस्टर लपेटे - हर कोने कोने की धूलसाफ करती हुई। इसी दिनचर्या में से समय निकाल कर वह बाहर भी जाती बच्चों की किताबें लेने - साहब की पसंद की सब्जियां लेने” ” हर महीने की एक निश्चित तारीख को सखी सहेलियों के साथ चाय पार्टी में भी हिस्सा लेती” पर हर बार घर से बाहर निकलते समय वह अपना एक हिस्सा घर में ही छोड़ आती।” इस प्रतीकात्मक कहानी का अंत वहां होता है जहां पर आत्मकेन्द्रित पति पक्षाघात की बीमारी से उठकर छड़ी ले कर चलने योग्य हुआ और उसका घर संसार चलाने में अपना सर्वस्व लगा देने वाली उसकी खूबसूरत पत्नी उसकी ‘‘ छड़ी बन गई” जो साहब के बाएं हिस्से के अनुरूप अपने को हर माप के सांचे में ढाल ले। यह एक पूरी औरत के तीन बटा चार ‘‘मांस का लोथ” बनने की कहानी है।

उधर ‘‘ताराबाई चाल- कमरा नम्बर एक सौ पैंतीस’’ में रहने वाली गरीब श्रमजीवी महिला अपने पति के परपीड़न सुख और नृशंस बेरहमी को झेलने के बाद गालियों की बौछार कर लेती है , जिसे अनसुना करके मर्द करवट बदल कर खर्राटे भरने लगता है।‘‘उस बांझ औरत के अड़तीस वर्षीय मरद को मरे आज चैदहवां दिन था।’’ यातना देने वाले पति को याद करने के लिए स्त्री स्वयं को यातना देती है स्वयं को सिगरेट से जलाती हुई। कमरे में दम्पत्ति का भीड़ की तरह एक दूसरे से टकराना कतराना, रात के समय छत पर टंगे और दीवारों पर बैठे ख़र्राटों का आस-पास पसर जाना, और मरे हुए पति के धुंधलाए अक्स का खाट पर पैर हिलाते हुए बैठना, सारे बिम्ब पति के परपीड़न सुख और पत्नी के आत्मपीड़क आनन्द को दिखाते है।

बड़े घर की ‘‘तीन बटा चार औरत’’ घर से निकलते समय केवल ‘‘एक बटा चार साथ’’ ले जाती है और छोटे घर में रहने वाली गरीब औरत पति के मरने के चैदह दिन बाद पहली बार अपने आपको आईने में देखती है -” सारे बिखरे हुए टुकड़ों को मिलाकर उसने अपना चेहरा पहली बार एक साथ देखा - गले से नीचे उसने अपने आप को आईने में देखा ही नहीं था।”

उच्च और निम्न वर्ग के दम्पत्तियों के ये चेहरे हिंसा के सूत्र में बंधे है - स्त्री के त्याग पर पति का पनपना और त्याग का अनादर ,उपेक्षा और अवहेलना करते हुए हिंसक ही बने रहना।

‘‘रहोगी तुम वही” कहानी, जो लेखिका ने अपने बारह वर्ष के मौन के बाद 1993 में लिखी, एकालाप शैली में लिखी छोटी कहानी है जो अत्यंत लोकप्रिय हुई। ”सारा दिन घर घुसरी बनी क्यों बैठी रहती हो। खुली हवा में थोड़ा बाहर निकला करो - बाल छोटे करवा लो, सूरत भी कुछ सुधर जाएगी।” और फिर पन्द्रह साल बाद ”यह तुमने बाल क्यों इतने छोटे करवा लिए है। तुम्हें क्या लगता है, छोटे बालो में बहुत खूबसूरत लगती हो? यू लुक हारिबल।

यह कहानी पुरुष के लगातार बोलने और औरत के चुप रहने की कहानी नहीं है। यह कहानी स्त्री के बदलने और पुरुष के स्वभाव के न बदल पाने की कहानी है । यहां दृष्टव्य है कि स्त्री बदल तो रही है पर अपनी मर्जी से नहीं - पति की प्रताड़ना से और पति के उकसाने पर परन्तु फिर भी पति को संतोष नहीं। बदली हुई स्त्री के बदलाव को पति चिन्हित तो करता है - कटे बालों को , रोज़ दाल रोटी बैगन भिंडी और आलू की जगह बायल्ड वेजेटेबल्स को, समाज सेवा को और किताबों को, पर उसे न सम्मान दे पाता है न स्वीकृति।”कितनी भी किताबें पढ लो तुम्हारी बुद्धि में बढ़ोत्तरी होने वाली नहीं है। रहोगी तुम वही” वाक्य में कितना तिरस्कार भरा है और कितनी हिकारत।

स्त्री शिक्षा , स्त्री सशक्तीकरण का स्रोत बनेगी , यह उम्मीद कैसे पूरी होगी ? पुरुषवादी मानसिकता और पूर्वाग्रह तो स्थिति को बदलने ही नहीं देते। मुझे लगता है सशक्तीकरण एक मानसिक अवस्था है, उस व्यक्ति की, जिसे सशक्त होना है और सशक्त महसूस करना है। स्त्री को अपनी अवस्था बदलनी है - वह तब बदलेगी जब वह स्वयं को अपनी दृष्टि से देखेगी - सामाजिक दृष्टि की परवाह किए बगै़र।

”समुद्र में रेगिस्तान” कहानी इस संकलन की एक बहुत ख़ास कहानी है - केवल अपने षिल्प की बारीक बयानी और अमूत्र्तन के कारण ही नहीं बल्कि अपने कथ्य में छिपी गहन और प्रच्छन्न करुणा के कारण भी । संकलन की अन्य कहानियों की तरह इस कहानी की मुख्य पात्र भी एक औरत ही है। इस औरत ने अपनी रचनात्मकता को पीछे छोड़ कर एक अधेड़ , तीन बच्चों वाले पुरुष का घर बसाया पर स्वयं अधेड़ होने तक पीछे छूट गई - अकेली। हमारे देश में विवाह औरत को नई पहचान नहीं दे पाता, बल्कि उससे उसकी निजी पहचान भी छीन लेता है। नायिका छवि भी कहानी के अन्त में अपना नाम याद करती है , और पहचान पा लेती है - खुद अपने आप से परिचित होती है। अपर्णा सेन की फिल्म परमा के अन्तिम दृश्य में भी घर से बहिष्कृत नायिका को अपनी पहचान याद आती है और तभी एक पौधे का भूला हुआ नाम याद आ जाता है - कृष्णपल्लवी।

‘‘समुद्र में रेगिस्तान’’ कहानी उन कहानियों में से है जो ‘‘अपना शिल्प अपने आप गढ़ती है।’’ कहानी यूँ शरु होती है मानो कविता हो - ” दिन ,हफ्ते, महीने, साल - लगभग पैंतीस सालों से वे खड़ी थीं - खिड़की के आयताकार फ्रेम के दो हिस्सों में बँटे समुद्र के निस्सीम विस्तार के सामने - ऐसे जैसे समुद्र का हिस्सा हों वे। वे मानो कैलेंडर में जड़े एक खूबसूरत लैंडस्केप का हिस्सा बन गई थी।” व्यक्ति की मनःस्थिति जैसी होती है वाह्य जगत् भी उसे वैसा ही दिखाई देता है।

”तीस साल पहले समुद्र ऐसा मटमैला नहीं था। चढ़ती दुपहरी में वह आसमान के हल्के नीले रंग से कुछ ज़्यादा नीलापन लिए दिखता। आसमानी नीले रंग से तीन शेड गहरा।” दस साल बाद एक दिन अचानक जब गर्मी की छुट्टियां खत्म होने पर, बच्चे वापस पंचगनी के हाॅस्टल लौट गए, उन्हें समुद्र बदरंग सा नीला लगा।” समय गुज़रता गया। ”न जाने कब वह खिलंदड़ा समुद्र एकाकी और हताष रेगिस्तान में बदल गया।” कहानी के अंत में ”न जाने कैसे खिड़की के बाहर हिलोरें लेता रेगिस्तान उमड़ते समुद्र की तरह बेरोकटोक कमरे में चला आया और सारे बांध तोड़ कर उफनता हुआ उनकी आंखों के रास्ते वह निकला। नायिका का जीवन और समुद्र मानो एक ही गति से बहते हैं।

एक दिन अचानक एक पुराने सहपाठी ने उन्हें नाम से बुलाया और ”दीवारों पर लगी पेंटिंग्स के कोनों पर लिखा उनका छोटा सा नाम वहां से निकल कर पूरे कमरे में फैल गया। कमरे के बीचोंबीच वह नाम जैसे उनकी प्रतीक्षा में बैठा था।” अपने नाम का भूलना और उसका याद आ जाना हमारी खु़द से मुलाक़ात का प्रतीक है। नाम खोया नहीं था, वहीं बैठा था कमरे में , लिखा था तस्वीर पर , याद था हमारे सहपाठियों को , ज़िन्दा था उनकी स्मृतियों में , भुलाया तो सिर्फ हमने था - उस सुख की चाहत में जो सुख हमें इस पितृसत्तात्मक समाज की परिवार नामक इकाई का हिस्सा बनकर , विवाह नामक संस्था में प्रवेश करके , पति नामक प्राणी के माध्यम से प्राप्त होने वाला था - पर हो न सका। मिला क्या , और छूटा क्या? कहानी में मातृत्व की चाहत के संकेत हैं, छह आठ और दस साल के बालकों को पालने के लिए किए गए दूसरे विवाह के संकेत भी हैं। परन्तु सच बात तो यह है कि मातृत्व की चाहत भी समाज में द्वारा निर्मित ही होती है, तभी तो विश्व के हर समाज में यह भावनाएं तथा चाहतें अलग अलग रूप में दिखलाई पड़ती है। इस प्रकार की कथाओं में पति के देहान्त और वयस्क पुत्रों के जाने के बाद खाली घोंसले में अकेली छूटी नायिकायें हमें मन्नू भंडारी, मालती जोशी, उषा प्रियंवदा की रचनाओं में भी मिलती हैं परन्तु यह कहानी ख़ास है। क्योंकि यह कहानी समाज द्वारा छोड़ी हुई औरत की नहीं बल्कि स्वयं अपने आप से बिछुड़ी हुई औरत की दास्तान है, जिनका नाम उनकी प्रतीक्षा कर रहा था , ‘‘जिससे वे हुलस कर मिलीं और ढह गईं।”

कहानी ’’ नमक ’’ में स्त्री अपने ’’आफ़्टर शेव की महक से गमकते पति’’ को साहब कहती है जो नाश्ते में कटे हुए फल खाते हैं, ताजा रस पीते हैं, अंडों की सफेदी की भुर्जी खाते है और उसमें नमक कम होने पर प्लेट फेंक देते हैं। वह अपनी पत्नी को स्कूल में नौकरी नहीं करने देतेप पत्नी का काम है भरपूर नाश्ता देना -’’ कुल्ले फूटे साबुत मूंग , कटा हुआ पपीता ,सेब के कुछ टुकडे़, अनार के दानों के साथ पत्ता गोभी खीरा टमाटर हरे प्याज के पत्ते का बारीक कटा सलाद और उस पर डालने के लिए धनिया पुदीने की हरी चटनी और खट्टी मीठी इमली की चटनी, ज़र्दी के बगै़र दो अंडों की भुर्जी , छाछ का गिलास, संदेश ,गाजर चुक़न्दर का रस ,टिकोज़ी ढंकी हरी चाय।’’

शादी से पहले नौकरी करने वाली लड़की शादी के बाद पति की नौकरानी बनती है। उसके मायके वाले भी उसे पति सेवा का ही उपदेश देते हैं कि शादी के बाद उसके लिए मायके का कपाट भी बंद है । तीस साल तक वह मेज़ पर नमक रखना नहीं भूली ,और न ही पति नमक पर बवाल करना भूले। नमक कहानी का अन्त अनपेक्षित है। ’’सुना नहीं, नमक कम है लगता है भूल गई ’’ ,पति के शोर का जवाब पत्नी धीमी आवाज में देती है- ’’नहीं, भूली नहीं ,डाक्टर ने कम नमक खाने को कहा है। याद नही? आपका बीपी हाई है। फिर भी लेना हो तो आपके सामने ही पड़ा है।’’

पत्नी के पति के स्वास्थ्य के प्रति सजग है , प्रताड़ित होकर भी पति का ध्यान रखना नहीं भूली पर कहानी के अन्त तक इतना बड़ा साहस जुटा सकी कि कह सके कि नमक खुद उठा लो। यह बड़े घरों के घमंडी लड़कों से ब्याही गई सामान्य घरों की लड़कियों की कहानी है , जिसे भारतीय समाज की कोई भी लड़की आसानी से समझ सकती है।

‘‘सुरक्षा का पाठ ” और ‘‘दहलीज़ पर संवाद ” वयोवृद्ध दम्पत्तियों की दास्ताने हैं ,जिन्होनें अपना पूरा जीवन लगा कर अपने बच्चों को बड़ा किया है और जिनके बच्चे अब अपने पांव पर खड़े हैं। सुरक्षा का पाठ में मां का बेटा अमरीका में प्रवासी भारतीय है, उसकी पत्नी अमरीकी है, मां उनकी प्रतीक्षा करती है, बच्चों के बच्चे में अपने बच्चे के बचपन को ढूंढ़ती है। भारतवर्ष मां को याद है कि नियाग्रा फ्राल्स देख कर लौटते समय उसका बेटा बेबी सीट पर अकेले बैठ कर फुक्का फाड़ कर रो पड़ा था और वह विदेशी नियम कायदों के कारण उसे गोद में नहीं उठा सकी थी। वह आज भी अपराध बोध से ग्रस्त है और नियाग्रा फाल्स के आंखें को बेइंतहा ठंडक पहुंचाने वाले पानी के तेज़ तेज़ गिरने के शोर से भी उसे पाल के मुंह फाड़ कर रोने का स्वर ही सुनाई देता रहा। आज भी नियाग्रा फाल्स की स्मृतियों में दोनों शोर गड्ड मड्ड हो जाते है। ’’ आज मां के बेटा बहू अपनी बेटी को दूसरे कमरे में अकेली रोती छोड़ कर चैन से सोते हैं ,मां सो नहीं पाती और अपने बेटा बहू से फटकार खाती है कि वह पोती के फेफडे़ मजबूत क्यों नहीं होने देती। यह कहानी पीढ़ियों के अन्तर की नहीं संस्कृतियों के अन्तर को रेखांकित करती मार्मिक कहानी है।

भारतवर्ष में माता-पिता चाहे समृद्ध हों चाहे मध्य या निम्नवर्गीय वे अपना जीवन अपने लिये नहीं जीते। उनकी आंखों में अपने बच्चों के जीवन के लिए सपने होते हैं। यह ऐसी ही समृद्ध मां के -एम्पटी नेस्ट-वीरान घोंसले की कहानी है।

दहलीज पर संवाद के दम्पत्ति उतने समृद्ध नहीं। वे निम्नमध्यवित्त वर्ग के हैं, वे बीमार हैं और वृद्ध। उनका अफसर पुत्र और पुत्रवधू उनके साथ नहीं रहना चाहते। मध्यवर्गीय दोहरेपन के तहत साफ़ साफ़ कहते भी नहीं पर अपनी उदासीनता से उनका दिल दुखा देते हैं। उनके बच्चों को उनकी ज़रूरत नहीं ,और उन्होंने अपने जीवन को बच्चों की नजर के अलावा किसी नजर से देखा नहीं। वे स्वयं को बेज़रूरत समझते हैं। उनकी शारीरिक कमजोरी, ज़िन्दगी से उनकी निराशा ,उनकी उदासी ,निरूपायता और अकेलापन छोटे छोटे संवादों से स्पष्ट होता जाता है। मुझे तो लगता है ’’ कि न हम इधर है न उधर ’’’’तुम्हें ऐसा नहीं लगता’’ ’’कैसा ’’ ’’कि हमें अब’’ ’’हाय रब्बा मनहूस बातें ही निकालोगे मुंह से ’’ भारत के निम्न मध्यवर्गीय दम्पत्ति की जीवन भर की आमदनी बेटों पर खर्च हो जाती है और बेटे अपनी आमदनी अपने बच्चों पर खर्च करते हैं न कि अपने माता-पिता पर। बेटों की समृद्धि माता पिता के लिए समृद्धि नहीं लाती। वे अकेले छूट जाते हैं ’’ ऊपर छत पर धूलसना ,मैला पंखा धुंधला होता जाता है। दूर कीं दो घंटा बजता है तो अंधेरेदार सन्नाटा यूं कांपता है जैसे कोई अधमरी चीज हवा में उल्टी लटक रही हो.......।’’ । यह कहानी निम्न मध्यवर्गीय दम्पत्ति के एम्पटी नेस्ट की कहानी है । लेखिका छत, पंखे ,घंटे , अंधेरे और सन्नाटे के बिम्बों से अकेले छूटे माता पिता की वीरानी रचती हंै।

वीरानी तो संग्रह की अन्तिम कहानी पीले पत्ते में भी व्याप्त है। यह एक ऐसी स्त्री की कहानी है जिसके ’’गोरे चिट्टे संभ्रांत और भव्य से दिखते पति’’ ने उसे उसकी बेटी के साथ भारत में छोड़ कर जर्मनी में रहना शुरू कर दिया, किसी अन्य स्त्री के साथ। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पति के पास पत्नी को छोड़ने का कोई विशेष कारण नहीं है, और न ही कोई ग्लानि या पश्चाताप। पत्नी को छोड़ देने के बाद भी पति हर साल एक बार उसके घर आता था क्योंकि ’’ पापा को मां के हाथ का खाना बहुत पसंद है। मां खूब बढ़िया खाना बनाती थी तब। अपने हाथों से पापा के लिए। ’’ वह बेटी के लिए डेªसेज लाता है। पत्नी अपने पति की दूसरी पत्नी को देख कर चुप हो गई और ’’ दो साल से ऐसे ही चुप है ’’ और बेटी का ’’फिर किसी से भी शादी करने का मन नहीं हुआ।’’ कहानी एक पड़ोस में रहने वाली स्त्री की ज़बानी बयान हुई है और स्त्री भाषा में ,स्त्री मन की परतें खोलती है।

”अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी” का ज़िक्र किए बिना इस पुस्तक पर चर्चा पूरी नहीं हो सकती। पूरब में कलकत्ते के पास बांकुड़ा से लेकर पश्चिम में बम्बई तक फैला वितान, बरसात का मौसम, भीगी सड़क, तालाब, पोखर, नाली, कीचड़, केंचुए, बारिष में भाई-बहनों का एक साथ खेलना, ”मौसम की पहली बरसात देखकर हम कैसे उछलते कूदते, माँ का बारिश आने की खबर देते, जैसे पानी की बूँदे सिर्फ हमें ही दिखाई देती है, और किसी को नहीं” (पृ-32) और निर्धन माँ बाप का बेटी ब्याहने का सपना, बेटी का ब्याह कर पराए दश जाना, उसकी गृहस्थी और जुड़वां बेटियों का जन्म। अपने जीवन से त्रस्त क्षुब्ध, निराश और व्यथित औरतें कितना डरती है बेटियों को जन्म देते ! उन्हें ज्ञात है - लड़की होना होता क्या है। पूरी कहानी बाहर से एक भौगोलिक विस्तार रचती है बंगाल के एक छोटे से गांव से बम्बई तक और भीतर ही भीतर रचती है एक अवचेतन का संसार जिसके भीतर रहते हुए एक सूत्र से गुंथे है - पराए देश ब्याही गई बेटी और उसके माँ बाप। क्या वे उसकी पीड़ा जानते नहीं, फिर भी यही सुनना चाहते है कि बेटी सुखी है -” तुम्हें मेरे ख़त कभी मिले ही नहीं।” बेटी ने माँ बाप को लिखा तो था उन्होंने पढ़ा ही नहीं-पढ़ना चाहा नहीं । इस कहानी पर विस्तार से लिखने की इच्छा है। पर वह टिप्पणी फिर कभी ।
‘‘डर’’ और ‘‘करवा चैथी औरत’’ मध्य तथा उच्च मध्य वर्ग की पढ़ी लिखी औरत की दयनीय स्थिति की कहानियां है। लेखिका ने इन्हें करुण कथा की तरह नहीं ,रुचिकर क़िस्से की तरह बयान किया है - अपने ही घर में गृहिणी का डर कर रहना (डर) और अपने ही घर में धीरे धीरे महत्वहीन होते चले जाना (करवाचैथी औरत) मध्यवर्गीय स्त्री की वास्तविकता है। ‘‘सत्ता संवाद’’ कहानी एक स्त्री का एकालाप है जो पैसा कमाने और घर की सारी जिम्मेदारी उठाने के लिए मजबूर स्त्री द्वारा गैर ज़िम्मेदार लेखक टाइप पति को झेलते रहने से उपजा क्रोध है जो खीझयुक्त बड़बड़ाहट के रूप में उभरता है। स्वयं को लेखक मानने वाले पाठक पाठिकाएं कदाचित् इस कहानी से सरलता से तादात्म्य स्थापित कर पाएंगे, जब कि यह कहानी किसी और प्रकार के दम्पत्ति की भी हो सकती है।

‘‘ तीसरी बेटी के नामः ये ठंडे सूखे बेजान शब्द ’’कहानी उस लड़की के विषय में है जिसने प्रेम किया, प्रेम विवाह किया, पढाई भी की और नौकरी भी, परन्तु वह अपने महत्वाकांक्षी ईष्यालु पति के द्वारा मारी गई। लेखिका ने इस कहानी को नयना साहनी और अंजू इल्यासी जैसी महिलाओं की हत्या के आलोक में लिखा बताया है जो अपने पुरूष साथियों द्वारा मारी गई।

सार्वजनिक स्मृति की आयु बहुत छोटी होती है। इस तरह की घटनाएं हत्याकांडों के रुप में हिन्दी अखबारों के मुखपृष्ठ पर कुछ दिन स्थान पाती हैं, फिर लुप्त हो जाती हैं। लोग कहते हैं, ये औरतें सबकुछ जानते हुए भी सार्वजनिक जीवन में आई ही क्यों थीं ? पुरुष तो बदमाश होते ही हैं । कहानी के रुप में प्रस्तुत हो कर यही विचार भावनाओं में अनुस्यूत हो जाते हैं और हृदय के भीतर घर कर जाते हंै।

‘‘बड़ी हत्या, छोटी हत्या’’ कहानी संवाद शैली में लिखी गई कहानी है जिसमें घर की बुज़ुर्ग महिला, दाई द्वारा नवजात कन्या की हत्या करवाती है। बीस बरस तक पालपोस कर बड़ी की गई बेटी को दहेज कम मिलने के कारण आधा टिन मिट्टी के तेल में फूंक दिया जाएगा , दादी यह जानती है, इसलिए नवजात पोती की हत्या करवा देती है -उस दाई से, जो सबेरे से दो हत्याएं और कर चुकी है। ससुराल में जलने से बेहतर है जन्मते ही मरना।

सुधा अरोड़ा की कई कहानियां यहां एक दूसरे के बरक्स खड़ी हैं - ‘‘रहोगी तुम वही’’ के सामने ‘‘सत्ता संवाद’’ , ‘‘एक औरत-तीन बटा चार’’ के सामने ‘‘ताराबाई चाल’’ ,‘‘सुरक्षा का पाठ ” के सामने ‘‘दहलीज़ पर संवाद, ” पीले पत्ते ’’ के सामने ‘‘नमक ’’ ‘‘अन्नपूर्णा मंडल’’ के सामने ‘‘समुद्र में रेगिस्तान’’, ‘‘तीसरी बेटी’’ के सामने ‘‘बड़ी हत्या,छोटी हत्या’’और डर के सामने करवाचैथी औरत । बाहर से बहुत दूर और कितने अलग अलग दिखने वाले विश्व, भीतर से बिल्कुल एक से हैं। सम्पन्न दम्पत्ति और विपन्न दम्पत्ति के घरों में सत्ता समीकरण एक जैसे हैं। कहानियां दर्शाती हैं कि सुविधाएं सुख का पर्याय नहीं होतीं, संभ्रान्तता से क्रूरता कम नहीं होती । कोई आवश्यक नहीं कि शिक्षा और उच्च पद किसी व्यक्ति को मानवीय रिश्तों को बेहतर बनाने की सलाहियत दे सके।

लोग माक्र्सवादी वर्ग की धारणा को जानते है, जहाँ मिल मालिक मजदूर का शोषण करता है , वह पूँजी और श्रम की लड़ाई है, और अमीर और ग़रीब की। परन्तु घरों के भीतर एक और तरह की लड़ाई जारी है जिसमें गरीब गरीब को ही सताता है और अमीर अमीर को ही। यह लिंगाधारित भूमिका विभाजन का प्रतिफल है जिसमें अधिकतर पुरुष ही शोषक की भूमिका में रहता है, अपने ही वर्ग की स्त्री को सताता हुआ।

सुधा अरोड़ा ने कहानियांे में परामर्श केन्द्र से जुड़े अनुभवों को भी आधार बनाया है। मैंने देखा है कि आमतौर पर परामर्श केन्द्र मध्यवर्ग की शिक्षित महिलाओं की पहल पर स्थापित हुए हैं तथा उन्हीं के द्वारा संचालित हैं। पर इनमें मामले निम्न आय वर्ग की महिलाओं के होते हैं जिनमें से अधिकांश को मध्यवर्गीय महिलाओं ने भेजा होता है। कामकाजी, श्रमजीवी, घरों में चैका बर्तन करने वाली, कपड़े धोने वाली, सब्जी वाली - महिलाओं का एक बड़ा वर्ग इनका लाभार्थी है।

पच्चीस वर्ष से ऐसे ही परामर्श केन्द्रों के साथ काम करते हुए मैंने भी यही पाया है कि उच्च तथा मध्य वर्ग की महिलाएं गरीब स्त्रियों के केस लाती हैं, उन्हीं का सरेआम बयान करती हैं , परन्तु वे यह नहीं बतातीं कि उनके अपने घर के भीतर पारिवारिक रिश्तों के टूटने बिखरने की स्थिति क्या है। अपनी आया-बाई, महरी-मिसरानी की व्यथा कहकर और उनके पतियों को उनके किए की सज़ा दिलवा कर मानो वे अपने सुशिक्षित, समृद्ध, सम्भ्रान्त दिखने वाले पतियों से उनकी क्रूरता तथा हिंसा का बदला ले रही होती हैं। जब कोई महिला हमारे परामर्श केन्द्र में चार ऐसे केस भेज चुकी होती है , मंै समझ लेती हूँ कि पांचवा केस उसका खुद का होगा। सुधा अरोड़ा ने संभ्रान्त मुखौटे वाले क्रूर पुरुषों द्वारा की जाने वाली हिंसा का अनेक कहानियांे में निरूपण किया है जहां हिंसा - जूतों डंडो, लाठी और गालियों से नहीं होती बल्कि होती है - उदासीनता और उपेक्षा से ।

हिन्दी जगत में अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि यह समाज अपने बारे में नहीं लिखता। मध्यवर्ग के लेखक जिनमें से कई ऊंचे सरकारी पदों पर बैठे हंै, ऊंची तनख्वाह पा रहे हैं और शराबख़ोरी तथा रिश्वतख़ोरी जैसी अनेक आदतों में लिप्त हैं, वे भी स्वयं को माक्र्सवादी ,गरीबों के रहनुमा ,दलितों के हितैषी सिद्ध करने की होड़ में ग्रामीण अंचलों पर आधारित अतिरंजित ,अतिशयोक्ति पूर्ण कहानियां लिख रहे हैं। उनकी कहानियों में न उनका अपना परिवार दिखाई दे रहा है न उनके अपने घर की स्त्रियां न उनके अपने बच्चे और न मां बाप। वे वर्ग संघर्ष ,जाति संघर्ष को रेखांकित करती नक़ली कहानियां गढ़ रहे है। उनका नकलीपन पाठकों को स्पष्ट दिखाई दे जाता है। इनके बीच प्रतिष्ठित लेखिका सुधा अरोड़ा की यह कहानियां बेहद ईमानदारी से ,जीवन से उठाई गई कहानियां है, इतनी आत्मीयता से लिखी गई, कि पाठक सहज ही इनके पात्रों से तादात्मय स्थापित कर लें। अपने वर्ग पर तटस्थ हो कर दृष्टि डालना ,और अपने समाज , परिवार , परिवेश को सहजता से निरूपित करना इतना सरल नहीं होता। इस जटिल और कठिन काम को ,लेखिका ने सहजता से किया है। शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय पाठक इसमें अपना चित्र देखेंगें,और उनका चित्र भी जो उनके आसपास झोपड़ियों में रह कर अभावों और अपमान का जीवन बिता रहे हैं।

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शालिनी माथुर, ए-5/6 कारपोरेशन फ्लैट्स, निराला नगर ,लखनऊ - 226020 फोन-09839014660 समीक्षित पुस्तक - एक औरत: तीन बटा चार मूल्य: प्रथम संस्करण रुपए 10 / बोधि प्रकाशन ,जयपुर

आकलन



‘‘टेल मी मोर‘‘ की अपेक्षा देती किताब ‘‘एक औरत की नोटबुक’’

0 डॉ. दीपक शर्मा

वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा की नयी पुस्तक ‘‘ एक औरत की नोटबुक ’’नारीवाद के एक महत्वपूर्ण सूत्र ‘‘ द पर्सनल इज़ पॉलिटिकल ‘‘ को वाणी देती है - जहां स्त्री के वैयक्तिक यथार्थ का विस्तार समाज की नीतिसम्मत सत्ता से जा जुड़ता है । इस पुस्तक के आलेख अगर पुरुष वर्चस्व और स्त्री सशक्तीकरण के चिन्तन को अपना विषाय बनाते हुए स्त्री को उसके ‘क्लोज़ेट’ (बंद कमरे) से बाहर लाने का प्रयास करते हैं तो इसकी कहानियां उस ‘क्लोज़ेट’ के अंदर डरी सहमी बैठी स्त्री की त्रासद दशा का जीवंत प्रस्तुतिकरण करती हैं - सुधा अरोड़ा के एक्टिविस्ट सरोकार के साथ साथ उनकी सृजनात्मक प्रतिभा को प्रदर्शित करती हुई ।

पुस्तक दो खंडों में विभाजित है - जिसमें आमुख के रूप में दो लंबे आलेख हैं - घरेलू हिंसा के खिलाफ और मानसिक यातना के खिलाफ । पहले आलेख के विषय पर केंद्रित लेखिका की चार कहानियां और उनका तथ्यपरक विश्लेषण है और दूसरे आलेख के विशय पर केंद्रित लेखिका की छह कहानियां , उदाहरणों और कविताओं के टुकड़ों के साथ सूक्ष्म प्रताड़ना की बारीक छानबीन करती हैं।

आलेख , कहानी , कविता , साक्षात्कार - सभी विधाओं की छतरी तले स्त्री विमर्श के विविध कोणों के वितान समेटे और एक रोचक अंदाज में स्त्री मुद्दों और समस्याओं के कारण , परिणाम और समाधानों के साथ ,एक गंभीर विशय को आम पाठक के बीच ले जाने का यह प्रयोग - ‘‘ एक औरत की नोटबुक ’’ निस्संदेह एक स्वागत योग्य कदम है ।

पुस्तक के पहले आलेख ‘‘आक्रामकता के खिलाफ: एक आम औरत की आवाज़ ’’ में घरेलू हिंसा के भौतिक पहलू पर चर्चा की गयी है । इस हिंसा की शिकार स्त्री अनपढ़ है या कम पढ़ी लिखी है - साधन विहीना । इस समस्या की सटीक प्रस्तुति के बाद सुधा अरोड़ा इसके समाधान के रूप में स्त्री को आर्थिक आत्मनिर्भरता का संदेश देती हैं तथा हम जानते हैं , उनका यह संदेश अर्थवान और लाभदायक सिद्ध होगा भी और फिर आर्थिक सहायता के लिए ऐसी पीड़ित स्त्रियों को सरकारी/गैर सरकारी संस्थाओं एवं संगठनों से सहयोग भी उपलब्ध कराया जा सकता है ।

इस पहले खंड में प्रस्तुत सुधा अरोड़ा की चार विश्लेषित कथाएं हैं । इन छोटी छोटी कहानियों में पहली कथा है -‘‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी ’’, जिसमें बांकुड़ा जैसे कस्बे की निम्नमध्यवर्गीय परिवार की लड़की अन्नपूर्णा मंडल का अपने सारे सपनों के साथ ब्याह के बाद मुंबई आना , उसके सपनों का टूटना , संत्रास और इस संत्रास को अपने माता पिता के सामने खोलकर न कह पाने की टूटन का मर्मविदारक चित्रण है जहां आर्थिक रूप से अपने पति पर निर्भर होने को ही यातना का मूल बताया गया है । ‘‘ताराबाई चाॅल: कमरा नम्बर एक सौ पैंतीस ’’ की अनामवासिनी का अपने मृत पति की आखिरी सिगरेट से आखिरी कश खींचकर अपने को पति के साथ होने की त्रासदी में वापस लौटाना स्थितियों का एक रोंगटे खड़े कर देने वाला विलोम प्रस्तुत करता है । ‘‘तीसरी बेटी के नाम: ये ठंडे , सूखे , बेजान शब्द ’’ में अपनी तीसरी मृत बेटी सुनयना की मां का उसके हिस्से के आसमान का सपना देखने का आग्रह - पुरानी पीढ़ी की स्त्री का अपनी युवा होती पीढ़ी को मोर्चे पर डटे रहने का सकारात्मक संकेत देता है और इस खंड की चैथी और अंतिम कहानी ‘‘ बड़ी हत्या , छोटी हत्या ’’ एक लड़की की भ्रूण में ही हत्या करवा देने का क्रूर सांकेतिक बयान है जो लड़की के बड़े होने के बाद की सामाजिक विसंगतियों की ओर तीखा प्रहार करता है और बताता है कि कन्या भ्रूण हत्या के कारण कहां छिपे हैं।

विकटता दूसरे आलेख की स्त्री के साथ है जो पढ़ी लिखी है , साधन सम्पन्न है फिर भी समस्याओं से घिरी है । आकार में अपेक्षाकृत विस्तृत इस आलेख का शीर्षक है - ‘‘ जिसके निशान नहीं दिखते यानी मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ ’’ । इसमें स्त्री पुरुष के पारस्परिक सत्ता को केन्द्रबिन्दु बनाकर संभवतः सुधा अरोड़ा उस समस्या को बाकायदा नाम देकर चिह्नित कर रही हैं जिसे सन् साठ के दशक में बेटी फ्रेडन ने ‘अ प्राॅब्लम विदाउट अ नेम ’ की संज्ञा दी थी।

अपनी व्याख्या में सुधा अरोड़ा ने इस स्त्री समस्या के सामाजिक , मनोवैज्ञानिक और परिवेशगत कारण के साथ साथ जिन तनावजनित व्याधियों तथा केस हिस्ट्रीज़ के दृष्टान्त प्रस्तुत किए है, वे अत्यंत दुखद और भयावह हैं । इसमें कोई संदेह नहीं कि सुधा की चिन्ता और विश्लेषण में उनकी अन्तर्दृष्टि ही नहीं , समस्याओं की तह तक पहुंचने की उनकी गहरी संवेदना भी शामिल है । पीड़ित स्त्रियों की स्थितियां तथा उत्पीड़क पुरुषों के शस्त्र उन्होंने जिस गहन सरोकार से प्रस्तुत किए हैं , वह सराहनीय हैं । परन्तु समाधान स्वरूप उनकी ओर से जो सुझाव आया है अर्थात् - ‘‘ जिस दिन एक औरत यह समझ लेगी कि उसकी अपनी ज़िंदगी और उसके अपने मूड का भी एक मूल्य है और इससे खेलने का अधिकार उस व्यक्ति को तो बिल्कुल नहीं है , जो उससे प्रेम नहीं करता , उस पर शासन और नियंत्रण करना चाहता है । इस समझ के बाद स्थितियां खुद ब खुद उलझी हुई गांठों को सुलझाने में कामयाब हो जाएंगी । वह जिस दिन अपने पति के इंगित से परिचालित होना बंद कर देगी और अपना एक स्वतंत्र दायरा - जिसकी पहली शर्त आर्थिक आत्मनिर्भरता है - गढ़ लेगी , जिस दिन वह अपने मन पर सिर्फ अपना नियंत्रण स्वीकार करेगी , स्थितियां ऊध्र्वमुखी होने लगेंगी । ’’

यह सुझाव विकट है । यह सच है कि वही पत्नी इस मार्ग का वरण करेगी जिसके पति ने अपने पति-धर्म , पिता-धर्म ,समाज-धर्म एवं मानव-धर्म को भी तिलांजलि दे रखी है लेकिन क्या बड़े पैमाने पर इस वरणाधिकार की पैरवी करते समय समाज एक ‘‘ स्टैट्यूटरी वाॅर्निंग ’’ - सांविधिक चेतावनी भी जारी नहीं करेगा - ‘‘ बाल कल्याण के लिए हानिकारक ! मार्ग जोखिम भरा ! ’’ .......?

यहां जूलिया क्रिस्तेवा के ‘वुमेन्स टाइम ’ में प्रकाशित चर्चित आलेख का यह हवाला भी अप्रासंगिक नहीं होगा जिसमें समाज के लिए एक नये नीतिशास्त्र की मांग करती हुई क्रिस्तेवा स्त्रियों को एक कड़ी चेतावनी देती हैं - ‘‘ अगर वे अपनी एन्टिटी ( सत्ता ) बचाने के लिए सामाजिक संविदा को नष्ट करती हैं तो न केवल अपने वैयक्तिक संतुलन बल्कि सामाजिक संतुलन को भी संकट में डाल देती है ।

इस दूसरे खंड में प्रस्तुत सुधा अरोड़ा की छह छोटी कहानियों का विश्लेषण है जिसमें पहली उनकी बहुचर्चित कहानी ‘‘ रहोगी तुम वही ’’ है जिसमें पति का एकालाप है पर पत्नी की चुप्पी ज्यादा मारक तरीके से पाठक को झकझोरती है ,जिसके बारे में लेखिका का स्पष्टीकरण है कि यह सूक्ष्म प्रताड़ना की ही कहानी है । ‘‘ सत्ता संवाद ’’की कमाऊ औरत का क्रोधावेग सिक्के के दूसरे पहलू को दरशाता है जहां अर्थसत्ता के कंधे पर चढ़कर ही चुप्पी टूटती है । ‘‘ डेज़र्ट फोबिया ’’ की छवि की अपने खोते अस्तित्व से अचानक मुठभेड़ होती है और बाहर हरहराते समुद्र का सारे बांध तोड़कर खिड़की से भीतर चले आना एक आम औरत की अस्मिता को सामने लाकर खड़ा कर देता है । ‘‘ करवाचैथी औरत ’’ का संवेदना शून्य परिवार घर में पालतू कुतिया के वर्चस्व तले घरेलू गृहिणी औरत की औकात को रेखांकित कर हमारे मन में अपनी अमिट छाप छोड़ता ही है लेकिन जिन दो कहानियों में सुधा अरोड़ा की सृजन क्षमता हमें चैंका देती है , वे हैं ‘‘ एक औरत: तीन बटा चार ’’ और ‘‘ डर ’’ ।

‘‘ एक औरत: तीन बटा चार ’’ में सुधा भारतीय समाज की हर एक गृहिणी के अवचेतन के ‘‘ फ्रेग्मेंन्टेड सेल्फ ’’( खंडित अस्तित्व ) को चेतना के दायरे में लाने का काम जिस मौलिकता से करती हैं , वह एकदम ताजगी से भरा है , विशिष्ट है । दूसरी कहानी ‘‘डर’’ - ‘‘मिनिमलिज़्म’’ - अल्पतमवाद का एक सफल प्रयोग है । इस कहानी के कथन में सुधा ‘‘ मिनिमलिस्ट’’ लेखन की उस परिकल्पना को साकार करती हैं जहां ‘‘ लेस इज़ मोर ’’( कम भी ज्यादा है ) के अन्तर्गत वे कथ्य के सार को सारभूत तक सीमित रखती हुई रेमन्ड कार्वर की इस उक्ति का स्मरण दिला देती हैं - ‘‘ आय कट माय वर्क टू द मैरो , नॉट जस्ट द बोन ! ’’( अपने लेखन में मैं हड्डी ही नहीं , मज्जा तक कटाव करता हूं ) लेखिका द्वारा शाब्दिक आडम्बरों और फैलावों की यही उपेक्षा पाठक को यह कहने पर मजबूर भी करती है -‘‘ टेल मी मोर ’’ ( मुझे और बताओ ! )
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दीपक शर्मा , बी 35 , सेक्टर -सी , अलीगंज , डाकखाने के पास , अलीगंज , लखनऊ - 226 028 फोन -0522 2330002 / 98391 70890 .


मंगलवार, 31 जनवरी 2012

समीक्षा




अतिवादिता से मुक्त सहज और सम्प्रेषणीय कहानियाँ

सुभाष नीरव

इला प्रसाद समकालीन हिंदी कहानी में एक परिपक्व और समर्थ कथाकार के रूप में तेजी से उभर कर हमारे सामने आई हैं। परिपक्व और समर्थ कथाकार होने की बानगी इला अपने पहले कथा संग्रह ‘इस कहानी का अंत नहीं’ से हिंदी पाठकों को दे चुकी हैं।‘उस स्त्री का नाम’ इला प्रसाद का दूसरा कहानी संग्रह है जिसमें पंद्रह कहानियाँ संकलित हैं। मानवीय संवेदनाओं से भरी इन कहानियों में मनुष्य के दुख-सुख, उतार-चढ़ाव, आशा-निराशा के अनेक रंग देखने को मिलते हैं। अधिकतर कहानियाँ अमेरिकी समाज में रह रहे भारतीय परिवारों द्वारा वहां की दैनन्दिन मुश्किलों से दो-चार होने की कथा बयान करती हैं।

वर्तमान समय में पूरे विश्व में मानवीय मूल्यों के साथ-साथ मनुष्य के भीतर की संवेदना का क्षरण हो रहा है। ऐसे में साहित्य और साहित्य में कहानी और उपन्यास ही वे क्षेत्र बचे हैं जहाँ इन्हें बचाने की पुरजोर ईमानदार कोशिश एक लेखक करता है। इला प्रसाद भी अपने लेखन में इसी पुरजोर ईमानदार कोशिश में संलग्न है।

किसी भी संग्रह की सभी कहानियाँ पाठकों को एक ही तरह से प्रभावित करें, ज़रूरी नहीं होता। हर कहानी अपने गठन, संगठन, प्रस्तुति, भाषा, शैली, कथ्य और चरित्रों के सृजनात्मक चित्रण के चलते अलग-अलग प्रभाव पाठक पर छोड़ती है। कुछ कहानियों का प्रभाव पाठक की अंतसचेतना पर गहरा पड़ता है तो कुछ का कम। वहीं कुछ कहानियाँ इतनी बेजोड़ होती हैं कि वह पाठक के जेहन में अविस्मरणीय छाप छोड़ जाती हैं। ‘उस स्त्री का नाम’ संग्रह की कहानियाँ पढ़ते हुए इसी प्रकार का मिलाजुला असर होता है। संग्रह में जहाँ ‘एक अधूरी प्रेमकथा’, ‘बैसाखियाँ’ ‘उस स्त्री का नाम’, ‘मेज’ ‘साजिश’ ‘कुंठा’ जैसी उत्कृष्ट और बेजोड़ कहानियाँ हमें पढ़ने को मिलती हैं, वहीं ‘तलाश’ और ‘मुआवज़ा’ जैसी भी कहानियां है जो पाठक के दिलादिमाग पर उस प्रकार का प्रभाव नहीं छोड़ पातीं कि वह उन्हें याद रख सके। यूँ भी सभी कहानियाँ याद रखे जाने लायक होती भी नहीं हैं। बस, पढ़ते समय हल्का-सा क्लिक करती हैं, अच्छी लगती हैं और फिर मन-मस्तिष्क के पटल से गायब हो जाती हैं। लेकिन पाठक के मन-मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव न छोड़ने वाली ये कहानियाँ खारिज कर दी जाने वाली कहानियाँ भी नहीं होतीं। चूंकि कहानी मात्र कहानी नहीं होती, वह अपने समाज, काल, परिस्थिति, परिवेश को प्रतिबिंबित करने की एक सशक्त विधा है। कहानी में अपना समाज, समय और परिवेश के साथ-साथ हमें अपना जीवन भी धड़कता दिखाई देता है, तभी तो वह साहित्य की एक बहुपठनीय और लोकप्रिय विधा है।

इला प्रसाद की कहानियों से गुजरते हुए हम पाते हैं कि लेखिका सामाजिक और परिवेशगत प्रवृत्तियों के प्रति बेहद सजग और जागरूक है। कहानी को गढ़ना और कहना उन्हें बखूबी आता है। अपने छोटे- छोटे अनुभवों को कलात्मकता से व्यक्त करने वाली एक सशक्त भाषा उनके पास है। निरर्थक विस्तार से अपनी कहानियों को बड़ी सफाई से बचा ले जाने की कला उन्हें आती है और यह कला भी उनके पास है कि पाठक को कहानी के उस मूल बिन्दु पर कैसे ले जाकर छोड़ा जाए, जहाँ उस कहानी का अभीष्ट छिपा होता है। ऐसा लेखक की रचनात्मक कौशल से ही संभव हो पाता है और यह रचनात्मक कौशल इला प्रसाद में है।

किसी भी प्रकार के छद्म से मुक्त इन कहानियों में एक बेहद संवेदनशील रचनाकार की चिंताएँ मुखरित हुई हैं। ये चिंताएँ ने केवल भारतीय परिवारों की रोज़मर्रा की मुठभेड़ों से संबंधित हैं, अपितु विदेशी धरती पर सांस ले रहे उन तमाम प्रवासी और ग़ैर-प्रवासी लोगों के जीवन की समस्याओं, उनके दुख-दर्दों, रोज़मर्रा की उठा पटकों को संजीदगी से रेखांकित करती हैं।

‘एक अधूरी प्रेमकथा’ में लेखिका ने प्रेम और समर्पण को एक नये दृष्टिकोण से देखने और उसे अभिव्यक्त करने का सफल प्रयास किया है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘उस स्त्री का नाम’ अपने विशेष कथ्य और अपनी विशिष्ट संरचना में एक उत्कृष्ट कहानी है। विषय में साधारण सी दिखने वाली कहानी ‘मेज’ पूरे संग्रह में क्लासिक कहानी बन गई है। यह कहानी अपनी साधारणता में ही असाधारण है। ‘कुंठा’ एक समय चर्चा और शोहरत के शिखर पर रहे व्यक्ति की समाज में एकाएक बेपहचान होते जाने के दंश को बेहद खूबसूरती से उकेरती है। ‘तूफान की डायरी’ अमेरिका में आए तूफ़ान ‘गुस्ताव’ पर केन्द्रित है और भंयकर तूफ़ान से हुई तबाही से प्रभावित जन-जीवन की कथा बयान करती है। यहाँ तूफान की दहशत है, भय है, चिंताएं हैं और तूफान के बाद पुनः जीवन को पटरी पर लाने की जद्दोजहद है। तूफ़ान कहीं भी किसी भी देश में आएं, अपने पीछे तबाही और लाचारगी के मंजर छोड़ जाते हैं। ‘आकाश’ एक बेहद सुन्दर और टेलेंटिड लड़की के धाराशायी होकर टूटते सपनों की मार्मिक कथा बन पड़ी है। ‘मुआबजा’ न्यूयार्क की तेज रफ्तार ज़िन्दगी और वहाँ के सच को बयान करती कहानी है। अमेरिकी परिवेश और समाज पर लिखी कुछ कहानियाँ जैसे ‘मुआबजा’, ‘तूफान की डायरी’ हमारे उस भ्रम को भी खंडित करती हैं कि पश्चिमी देश श्रेष्ठ और सभ्य हैं और हमारे ही देश भारत में भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक विद्वेष अधिक है। जब कि सच यह भी है कि असभ्यता, अमानवीयता, क्रूरता, भ्रष्टाचार, घृणा, शोषण, भेदभाव विदेशों में भी बहुत है। संग्रह में एक मात्र कहानी ‘तलाश’ अपनी प्रस्तुति में पाठक तक पहुँचने में सफल प्रतीत नहीं होती है।

इन कहानियों की भाषा सरल है पर कहीं कहीं इतनी रम्य और मोहित करने वाली है कि पाठक दंग रह जाता है। संग्रह की पहली ही कहानी की शुरुआती पंक्तियाँ बानगी के तौर पर पेश हैं- “मन घूमता है बार बार, उन्हीं खंडहर हो गए मकानों में, रोता-तड़पता, शिकायतें करता, सूने-टूटे कोनों में ठहरता, पैंबंद लगाने की कोशिश करता... मैं टुकड़ा टुकड़ा जोड़ती हूँ लेकिन कोई ताज़महल नहीं बनता।“

इला प्रसाद की अधिकतर कहानियों की जो उल्लेखनीय विशेषता है- वह है कहानियों की जबरदस्त पठनीयता और सम्प्रेषणियता। यदि कहानी पठनीय और सहज सम्प्रेषणीय होगी, तभी पाठक उस कहानी से भीतर तक एक जुड़ाव महसूस कर सकेगा और कहानी के मूल मंतव्य को जान-समझ सकेगा। कहना न होगा कि इला प्रसाद अपनी कहानियों में इस ओर अधिक सतर्क और जागरूक दिखाई देती हैं और वह कहानी को उलझावों से बचाते हुए उसके भीतर के रोचक प्रवाह को बनाये रखती हैं। यह रोचक प्रवाह ‘एक अधूरी प्रेमकथा’, ‘बैसाखियाँ’, ‘उस स्त्री का नाम’, ‘मेज’, ‘हीरो’, ‘मिट्टी का दीया’, ‘साजिश’, ‘कुंठा’ में बखूबी देखा जा सकता है।

विदेशी धरती के समाज, परिवेश और वहाँ की भिन्न परिस्थितियों के साथ कोई भारतीय रचनाकार अपने वतन से दूर रहकर किस तरह सामंजस्य स्थापित करता है और कैसे वहाँ की कटु सच्चाइयों से बावस्ता होते हुए खट्टे-मीठे अनुभवों को अपने में समाहित कर अपनी कलम द्वारा उन्हें शब्द देता है, इसका उदाहरण बहुत से प्रवासी लेखकों की रचनाओं में हमें बखूबी देखने को मिलता है। इला प्रसाद भी उन्हीं में से एक ऐसी समर्थ कथाकार हैं जो अपने प्रवास के दौरान एक भिन्न समाज, भिन्न संस्कृति, भिन्न परिवेश-परिस्थिति को आत्मसात कर, वहाँ के जीवन की सच्चाइयों से मुठभेड़ करते हुए अपने छोटे-छोटे दैनन्दिन अनुभवों को अपने लेखन द्वारा बहुत बड़ा रचनात्मक और साकरात्मक विस्तार देने में सफल हो जाती हैं।

इला प्रसाद के पास देशी-विदेशी अनुभवों का एक बहुत बड़ा खजाना है यानी उनका अनुभव संसार बहुत व्यापक है। यह अनुभव संसार एक लेखक में जितना व्यापक होगा, उसकी रचनाओं में उतना ही वैविध्य होगा। यह रचनात्मक वैविध्य इला प्रसाद की कहानियों में स्वतः ही दृष्टिगोचर हो जाता है। कुछ कहानियाँ भारतीय पर्व-त्योहार और अमेरिकी समाज के त्योहार को केन्द्र में रखकर भी इस संग्रह में हैं जैसे ‘बैसाखियाँ’ ‘होली’ ‘मिट्टी का दीया’। ये कहानियाँ अपनी भाषा और संवेदना में पाठक के अन्तर्मन को स्पर्श करने में सफल रही हैं।

कहना न होगा कि इस संग्रह की कहानियाँ अतिवादिता के दोष से मुक्त बेहद सहज और सम्प्रेषणीय कहानियाँ है। मानवीय भावनाओं पर लेखिका की पकड़ बहुत गहरी और मजबूत है जो कि कहानियों के चरित्रों को एक ऊँचाई देने में मदद करती है। इनमें स्त्री-पुरुष के अन्तद्र्वंदो को ही नहीं, उनकी आन्तरिक ऊर्जा को रेखांकित करने की सफल कोशिश की गई है। सबसे अच्छी बात यह है कि लेखिका विदेश में रहकर अपनी रचनाओं में किसी नॉस्टेल्जिया का शिकार नहीं है, जो कि प्रायः प्रवासी लेखकों में आसानी से दीख जाता है। लेखिका जहाँ है, वहाँ के समाज और परिवेश के सूक्ष्म से सूक्ष्म यथार्थ को अपने लेखन में गहरी संवेदना के साथ साकारात्मक अभिव्यक्ति देती है।

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सुभाष नीरव
-372, टाइप-4, लक्ष्मीबाई नगर
नई दिल्ली-110023
फोन: 09810534373

समीक्षित कृति:
उस स्त्री का नाम(कहानी संग्रह)
लेखिका: इला प्रसाद
प्रकाशक: भावना प्रकाशन, 109-ए
पटपड़गंज, दिल्ली-110091
मूल्य: 150 रुपये, पृष्ठ: 128