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शनिवार, 4 जून 2011

पुस्तक अंश



गर्दिश के दिन

हृदयेश

मैं जो आपके सामने इस रूप में हूं, यह भी अपने में अचरज है, और शायद नहीं भी.

घर पर मुझे बौना बना देने वाली अपशकुनी छायाएं लिए सारी स्थितियां और व्यक्तित्वहंता परिवेश मौजूद था. पिता कचहरी में एक मामूली अहलकार थे और स्वाभाविक था कि उनकी दृष्टि बेहद संकुचित हो. वह एक बार-बार की चली और परखी हुई डगर पर चलने के हिमायती थे. देहरी पार का झुका हुआ आसमान ही उनके लिए क्षितिज था और इस क्षितिज के बाहर जाना आवश्यक है, या उसे लांघने की किसी में सहज उत्कंठा हो सकती है, ऎसा वह मानते नहीं थे—शायद इस बारे में कभी सोचा भी न हो. मेरे बड़े भाई ने दसवां दरजा पास कर लिया था. वह एक किरानी बन सकते थे और पिता ने उनको किरानी बना दिया. इसके बाद मेरी बारी थी. दो साल बाद मेरा परीक्षाफल निकलते ही मुझसे भी कहा गया कि अब तेरी पढ़ाई बंद और तू भी नौकरी करेगा. मैं आगे पढ़ना चाहता था, इसलिए मैंने वैसी इच्छा प्रकट की. पिता का उत्तर था—‌“आगे पढ़कर क्या होगा? नौकरी बाद में भी जब करनी है तो अभी क्यों न कर?” मैंने बात लौटाने की कोशिश की तो पिता ने इस बार दलील रखी –‌ ‍“मैं रिटायर होने वाला हूं, गृहस्थी का जुआ कौन उठाएगा?” मैं पिता को बातों द्वारा हरा नहीं सकता था. वैसे संस्कार भी नहीं थे. पर मैं चाहता था कि कैसे भी पिता अपने तर्कों को स्वयं ही समेट लें और कह दें – अच्छा जा पढ़, तेरी मर्जी. कोई-न-कोई इंतजाम फिर किया ही जाएगा. मैंने दबाव डालने की नीयत से खाना-पीना छोड़ दिया. किंतु डेढ़-दो दिन बाद मेरी अपनी ही भूख मुझे आंख दिखाने लगी और मैं उस उपाय से डर गया.

उम्र के सत्रह वर्ष पूरे नहीं हो पाए थे और मैं भी किरानी बन गया, क्योंकि बनना जरूरी था.

पिता की मानसिकता-सूचक एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा.

वे सन ४२-४३ के दिन थे. ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ जनता में नफरत तेजाबी बन चुकी थी. आए दिन सड़कों पर जुलूस निकलते और नारे लगते. उम्र ऎसी थी कि हर चटक रंग को पोरों से छूने की इच्छा होती थी. आस-पड़ोस के ६-७ बच्चों ने जुलूस निकालना तय किया. हाथों में बेंत, सेंठा, खपच्ची, यानी झंडेनुमा जो कुछ भी मिला, ले लिया गया. शाम का वक्त था और हम सब पीछे गली में पहुंचकर नारे लगाने लगे—इंकलाब जिंदाबाद-इंकलाब जिंदाबाद. उन दिनों यही नारा गर्म था और हम लोग इसका उच्चारण अपने-अपने ढंग से, लेकिन जोश-खरोश के साथ, कर रहे थे. अभी कुछ ही मिनट गुजरे होंगे कि पिता की चाबुक जैसी आवाज मुझे घर पर खींच ले गई—“‌क्यों बे, क्या बक रहा है? मेरी सरकारी नौकरी लेने पर तुला है ?”

मेरी मां उस किस्म की महिला थीं जिनकी सारी दिनचर्या, क्रियाकलाप और छोटी-से-छोटी योजना पैसे के गिर्द होती है. वे चूंकि कूड़े-कचरे और फटे-पुराने से भी सिक्के बना सकती हैं, अपने को चतुर मानती हैं और उन सिक्कों में से थोड़ा-सा दान-पुन कर लेती हैं, इसलिए स्वयं को ’अच्छी’ की अधिकारिणी भी. ऎसी महिलाएं भले ही अपने बच्चों के लिए मकान वगैरह की ढंग की व्यवस्था कर जाएं, पर वे निश्चय ही उनके लिए कोई सम्मानजनक भविष्य नहीं छोड़ सकती हैं.

विवाह मेरा हो सकता था और कर दिया गया. रिश्ता मां-बाप को तय करना चाहिए और उन्होंने ही तय किया, हालांकि लड़की और लड़की में अंतर होता है और ’सिरी जोग लिखी’ लिख लेना या ’रामायन’ के आखर बांच लेने की साक्षरता शिक्षा नहीं है, वे वैसा समझने में अक्षम थे.

यह शारीरिक स्तर पर एक समझौता ही था कि हम दोनों के बीच चार बच्चे आ गए.

छः प्राणियों की भरी-पूरी गृहस्थी में दो-ढाई सौ रुपये की आय की स्थिति उस कमजोर गले हुए कपड़े जैसी होती है जो जरा-सा दबाव पड़ने पर मसक जाता है. एक जगह सिलो तो कुछ ही देर बाद दूसरी जगह से और दूसरी जगह सिलो तो तीसरी जगह से. मंशा है कि कहीं-न-कहीं से आपको नंगे दिखना है.

बच्चे बड़े हो रहे थे. गिरानी बढ़ती जा रही थी और आर्थिक दबाव सख्त से सख्त. हर मौसम विरोधी होता. तीसरी या चौथी तारीख के बाद पत्नी पोरों पर तिथियां जोड़ने लगती कि अब आने वाली पहली तारीख कब है.

पिता मैं था लेकिन बच्चे जरूरत के लिए पैसे मांगते अपने चाचा से, आय की दृष्टि से अपेक्षाकृत जो साफ-सुथरी जमीन पर खड़े थे. संरक्षण देने का क्या एक अपना सुख नहीं होता है? चाचा-चाची मीठा-खट्टा लाते और उनके अपने बच्चों के आगे इन बच्चों की स्थिति दूसरे-तीसरे दरजे के नागरिक जैसी बन जाती. केले के पत्ते जैसे उनके नरम चेहरों पर अपने से ही लड़ने के जख्म होते.

निरी छोटी-छोटी इच्छाओं और आकांक्षाओं का भी दस,बीस,तीस और चालीस साल तक अनपूरी रहना या बिना बड़ी मांग करने वाली सहज स्वाभाविक प्रवृत्तियों का अनवरत कुचला जाना या वस्तु के स्थान पर बार-बार सस्ते विकल्प खोजने की लाचारी क्या मनुष्य के लिए जिंदा रहने की एक यातनामय सजा नहीं है? किंतु मनुष्य फिर भी जीवित रहता है.

मैंने चाहा कि सर्दियों में नहाने से पहले दिन-भर की खुश्की की चरपराहट बचाने के लिए जिस्म में थोड़ा सरसों का तेल मल लिया करूं. किंतु ऎसा नहीं हो पाता. मैंने चाहा कि गर्मियों में यह न सोचना पड़े कि परसों ही सिर साबुन से घोया है और बारी आज नहीं रविवार को होगी. किंतु ऎसा ही होता.

मैंने चाहा कि बहुत पहले सिले होने के सबब से बदन पर ढीले हो गए कपड़े फिट कराकर पहना करूं. पाजामें और जांघिए में कायदे का इजारबंद पड़े, सुतली या झुतड़ेदार धोती के किनारे जैसी चीज नहीं. पर ऎसा ही होता.

मैंने चाहा कि ब्लेड इतना धारदार हुआ करे कि शेव दो मिनट में बन जाया करे. पर ऎसा नहीं होता.

मैंने चाहा कि दफ्तर जाते हुए साइकिल रास्ते-भर गुहार न किया करे. पर वह करती.

मैंने चाहा कि सयाने हो गए बच्चे अलग सोया करें. लेकिन खाट और बिस्तर पूरे न होने के कारण वे सड़ी गर्मियों में भी मेरे पास लेटते.

मैंने चाहा कि साल-दर-साल कमरों की सफाई-पुताई हो जाया करे. जिन प्यालों में सब्जी खाऊं वे खुरदरे, चटखे या बेडौल न हों. कंघे और फाउंटेन पेन में बच्चों की साझेदारी न रहा करे. एक मामूली बीमे की छोटी रकम वाली किस्तों की अदायगी बिना जुर्माना दिए नियत समय पर कर दिया करूं. जिन पत्रिकाओं को अच्छी मानकर पढ़ूं, वे अपनी हों. लेकिन ऎसा नहीं हो पाता.

मैंने चाहा कि जब यात्रा करनी पड़े या नाते-रिश्तेदारी में शिरकत करने की मजबूरी आए तो जूता, मोजा, बनियान और रूमाल या बिस्तरबंद और अटैची, भाई या भतीजे की न होकर अपनी हुआ करे. कोई मित्र यदि पांच-सात बार मुझे किसी होटल-रेस्टोरेंट में जलपान कराए या सिनेमा का टिकट खरीदे तो एक बार मैं भी उसका खर्च सहन करूं. मगर ऎसा नहीं होता.

बरसों से मेरी इच्छा है कि कॉफी का एक डिब्बा ले आऊं, भले ही पचास ग्राम वाला, और उसे अपने हाथों फेंटकर दो बार अभिन्न लोगों के साथ गपशप करते हुए साफ-सुथरे मगों में पिऊं. पर यह संभव नहीं हो पाता.

एक लंबे समय तक मैं अपने देश की राजधानी न देख सका. रेगिस्तान, समुद्र, नदियों पर बने बांध, पुराने मंदिर और ऎतिहासिक स्थल, इच्छा होने पर भी इनसे आज तक रू-ब-रू न हो सका.

अभी आठ-दस महीने पहले मैं बाटा की दुकान पर चप्पल खरीदने गया. ’रेडेक्शन सेल’ का माल एक ओर रखा था और आंखें वहीं ठहरीं. चप्पलों की एक मजबूत जोड़ी मौजूद थी और लगी हुई चिप्पी देखने पर पाया कि असली कीमत बाईस रुपये से घटाकर साढ़े दस रुपये कर दी गई है.

मैंने जोड़ी हाथ में उठा ली. फिर पैरों में डालकर परखी. फिर दुबारा हाथ में ले ली.

“आप इसे क्या लीजिएगा?” सेल्समैन ने पूछा.

“इसकी कीमत ६० प्रतिशत तक घटा दी गई है. मैं चाहूंगा कि आप खराबी बता दें.”

‌“बात यह है कि एक चप्पल नौ नंबर की है और दूसरी आठ की.”

मैंने चप्पलों के तले एक-दूसरे पर रखे. हां, वे छोटी-बड़ी थीं.

‌आप फ्रेश माल भी देख लीजिए. कई नए डिजाइन हैं.” सेल्समैन ने सुझाव दिया. उसे संदेह था कि मैं वे चप्पलें लूंगा.

पर मैंने उन्हीं चप्पलों को ले लिया. अरे, गोली मारो. पैरों में पड़कर छोटी-बड़ी की शिनाख्त की जा सके, इतनी तमीज किसमें है. एक्दम बारह रुपये बचते हैं, जिनसे बारह दूसरे काम चल सकते हैं. फिर देखने में भी बुरी नहीं हैं. किंतु जब मैंने बारीकी से अपने को टटोला तो लगा कि नई चीज पाने वाली प्रसन्नता की गंध मेरे अंदर नहीं है. दूसरों को भले न लगे, पर स्वयं को चप्पलों की असमानता बराबर महसूस होती रहेगी- तलवे के नीचे आ गई कंकड़ी की चुभन जैसी. और यह चुभन उनका इस्तेमाल उस सहजता से न करने देगी जिस सहजता से करना चाहिए. क्या यह अपनी नजर में अपने को छोटा करना नहीं है, नामालूम ढंग से किरच-किरचकर अपने को तोड़ना? अंदर और ज्यादा उलटने-पलटने पर पाया कि एक मुद्दत से किसी-न-किसी रूप में ऎसा करता आ रहा हूं और यह मेरी मानसिकता बन चुकी है. साबुन की टिक्की डैमेज्ड वाली खरीदूंगा, चाय का चूरा खुला हुआ लूंगा, बिना डिजाइन पर ध्यान दिए कपड़ा कटपीस या रिबेट वाला उठा लाउंगा और सब्जी और दाल का चुनाव बाजार के रुख पर करूंगा.

छोटे-छोटे अभाव और समझौतों के चौखटों में अपने को फिट कर देने वाली विवशताएं मनुष्य में कितनी गठानें छोड़ जाती हैं और उसके व्यक्तित्व को कितना विरूपित कर देती हैं, यह इस बात से समझा जा सकता है कि यदि मैं अब अच्छे किस्म के कपड़े पहनूं तो मुझे अटपटा लगेगा, किसी के भव्य सजे हुए ड्राइंगरूम में घुसूं तो सोफा, मेज, स्टैंड या किसी शो-पीस से टकरा जाऊंगा, टेलीफोन का चोंगा उठाऊं तो घबड़ाहट में दूसरे की बात पूरी सुन न सकूंगा और अपनी कह न पाउंगा, और कोई कार में बैठने का सुअवसर दे तो दरवाजा खोलने वाले हैंडिल को उल्टा-टेढ़ा घुमाऊंगा.

***
लिखना मैंने सन ४७-४८ से प्रारंभ कर दिया था. मेरे पास न तो कोई साहित्यिक या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि थी, न आसपास वैसा परिवेश या वातावरण. अपने साथियों के मुकाबले मैं पढ़ाई में पिछड़ गया था और लिखना इस हीन भावना से उबरने का शायद एक प्रयास था. एक कहानी के बाद लिखना रुक भी गया था, क्योंकि कुछ परीक्षाएं मैं स्कूल-कॉलेज में प्रवेश लिए बिना दे सकता था और तीन-चार वर्ष उनको देता रहा. इसके बाद जीवन में ठहराव आ गया था और मैंने लिखने के छोड़े हुए घागे फिर उठा लिए.

छपी मेरी पहली कहानी सन १९५१ में, जिसके प्रकाशन का उन्माद प्रथम चुंबन जैसा गहरा और छा जाने वाला था.

उन दिनों अच्छी-खासी चर्चा का विषय बने प्रभाकर माचवे और केशवचंद्र वर्मा के हास्य-व्यंग्य लेखों से प्रभावित होकर मैंने भी कुछ समय तक इस क्षेत्र में जोर-आजमाइश की. किंतु हास्य या तो मेरी मानसिकता के लिए भारी था या मेरे अंदर यह संदेश पैठ गया था कि जीवन की सारी विसंगतियों, विद्रूपताओं, समय ने नंगे खड़े कर दिए अनेक प्रश्नों और नाना जटिल गुत्थियों को विशुद्ध हास्य और व्यंग्यमयी दृष्टि से सही-सही नहीं देखा जा सकता है. मैं इस क्षेत्र से हट आया और गंभीर कहानियों की ओर फिर उन्मुख हो गया.

लेखक के रूप में भी मेरी जिंदगी गर्दिश से भरी रही है—ठंडी उपेक्षाओं, तिरस्कार और न चीन्हे जाने की सलीब पर चढ़ी हुई. जो लिखा जाए उसका मूल्यांकन हो और यदि कुछ योगदान है तो वह रेखांकित हो, हर रचनाकार की यह आकांक्षा होती है. विषम स्थितियों में भी वह जो लहूलुहान हो अथक प्रयास करता रहता है, तो केवल इसीलिए. जो यह नकारते हैं कि उनकी सर्जना का कारण यश पाना है, वे अपने चेहरे पर ’एक महान आत्मा’ का मुखौटा लगाना चाहते हैं, इस विद्रूपता के प्रति असावधान हो कि इस मुखौटे के पीछे भी यशैषणा ही होती है.

इतिहास के पृष्ठों तक जाने का रास्ता निस्संदेह बेहद बीहड़ और लंबा होता है, किंतु यदि किसी के दो-चार पग बढ़ाते ही अंधे पुलों पर से रस्से खींच लिए जाएं या बंद दरवाजों पर दी जाने वाली दस्तकों को बधिर बन अनंत काल तक अनसुना किया जाता रहे, तो क्या घोर हताशा की मनःस्थिति पथ-यात्री के लिए सांघातिक सिद्ध नहीं होगी?

सन ५५-५६ तक आते-आते मैं अपनी रचनाओं को समसामयिकता की दृष्टि से संवारता हुआ उनको ’ज्ञानोदय’, ’कल्पना’, ’कहानी’, ’धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं में भेजने लगा था. उन दिनों सर्जनात्मक साहित्य पर परिचर्चाएं निकलती थीं और दो-एक पत्रिकाएं नियमित रूप से समीक्षात्मक स्तंभ देती थीं. इन परिचर्चाओं और स्तम्भों में मुझे अपनी कहानियों पर बातचीत नहीं मिलती थी. मैं अगली कहानियां और अधिक उत्साह से लिखता और प्रकाशित होने पर वैसी बातचीत के बीच अपना नाम फिर खोजता, किंतु जो नाम होते वे दूसरे. मैं इन दूसरे नामों वाली कहानियां दुबारा-तिबारा पढ़ता और उनकी विशेषताएं पकड़ने की कोशिश करता. कई कहानियों में मुझे वह कुछ नहीं मिलता जिसके कारण वे विशेष के मुकुट से मंडित की गई थीं. मैं यह भी पाता कि चर्चित होने वाले नाम अपेक्षाकृत नए हैं और जो मेरे समकालीन भी हैं, वे दौड़ में कहीं आगे निकले जा रहे हैं. मुझे छटपटाहट होती. अंदर कुछ तेज-तेज लौटता-पैटता. मैं फिर उन गले न उतरने वाली चर्चित कहानियों को स्वयं भी विशिष्ट मान लेता और अपनी कहानियों में कुछ वैसा ही तेवर, महीनपन, बुनावट लाने की उछल-कूद करता. परिणाम यह होता कि वे कहानियां अपना निजत्व खोकर चौपट हो जातीं और प्रकाशन योग्य भी नहीं रहतीं. तब मैं साहित्य की दुनिया में भी व्याप्त आपाधापी, अपनों को उठाने और गैरों को गिराने के षडयंत्र, गुटबाजी और एक हाथ से लेने व दूसरे हाथ से देने वाली काली राजनीति से परिचित न था. साहित्यकार मेरे लिए सूरदास, तुलसीदास और प्रेमचंद का वंशज था.

मोहन राकेश ने ’नई कहानियां’ के पृष्ठों पर मेरी ’खेल’ कहानी की अवश्य चर्चा की थी, किंतु वह विजन वन में दी गई अकेले कंठ की पुकार थी.

साहित्य के द्वार पर ही मरने-जीने की भावनावश मैंने ’नीहारिका’, ’माया’, ’नई सदी’ जैसी व्यक्तित्वहीन और प्रकाशन की दृष्टि से सुविधाजनक पत्रिकाओं में लिखना बिलकुल बंद कर दिया.

समय हाथ से निकलता जा रहा था. कई और नए नाम आ गए थे और कहानी के आकाश पर सितारे जैसे टंक गए थे. मेरी स्थिति अब भी राह किनारे के पत्थर जैसी थी. मानी-जानी पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों की एक अच्छी-खासी संख्या पास में होते हुए भी मेरा कोई संग्रह निकल नहीं पा रहा था. यों दूसरों के बराबर आ रहे थे. आलोचक सुविधावादी होता है. एक स्थान पर उसे आलोच्य सामग्री सुलभ करा दी जाए तो वह उसमें रुचि ले सकता है.

सन ६९ तक आते-आते १४-१५ वर्ष के लेखनोपरांत भी साहित्य की दुनिया में अजनबी रहने की छटपटाहट मुझमें इतनी अधिक बढ़ गई कि बिना किसी व्यक्तिगत परिचय के मैंने इलाहाबाद के एक नए प्रकाशक को, जिसने कुछ पहचाने हुए हस्ताक्षरों की पुस्तकों का एक अच्छा सेट निकाला था, उसकी शर्तों को सर्वांग स्वीकार करते हुए ५०० रुपये भेज दिए. हताशा की मार तब और भी तीखी पड़ी जब इस प्रकाशन ने अपनी असुविधाओं और विवशताओं का औचित्य सिद्ध करते हुए संग्रह नहीं छापा और मुझे अपने उधार लेकर जुटाए गए उन रुपयों को निकालने के लिए उसके प्रकाशन की पुस्तकों की सेल्समैनी करनी पड़ी.

इस घटना से कुछ ही पहले कानपुर के कहानीकार सम्मेलन में (किसी सम्मेलन में भाग लेने का यह मेरा पहला अवसर था) मुझे शैलेश मटियानी ने सलाह दी थी कि मैं अब उपन्यास लिखूं क्योंकि उसका प्रकाशन अपेक्षाकृत सहज है और दो-एक उपन्यासों से बनी साख के आधार पर प्रकाशक मेरा कहानी-संग्रह भी निकाल सकता है.

मैं उपन्यास के क्षेत्र में जो आया तो केवल इसी लासे से खिंचा हुआ.

मैं ’गांठ’ लिख रहा था, किंतु बेहद घबड़ाया-घबड़ाया. कलेवर में लघु होते हुए भी कहानी की अपेक्षा यह लंबी चीज थी और काफी श्रम और समय देकर भी यदि प्रकाशित नहीं होती है तब? वे हिम्मत टूटने और अपने को ही अपने द्वारा हिम्मत बंधाने के दिन थे.

उपन्यास पत्रिकाओं के द्वार से तो वहां प्रवेश न पा सकने पर घूम-घूमकर लौट आया, लेकिन पुस्तक रूप में निकल गया. प्रकाशित होने पर से.रा.यात्री और कमलेश्वर ने पीठ ठोंकने वाले पत्र लिखे.

उत्साह पर चढ़ा हुआ मैंने दूसरा उपन्यास ’हत्या’ लिख डाला. इस बार राजेन्द्र यादव ने उसकी भरपूर सराहना की और उपन्यास के साथ-साथ कहानी संग्रह भी प्रकाशित करना स्वीकार कर लिया.

जब किसी को अति सामान्य सुविधाओं और छोटे-छोटे अधिकारों की प्राप्ति के लिए भी लंबा और कठिन संघर्ष करना पड़े तो किसी महती उपलब्धि के अनायास मिलने की सूचना उसे थरथराते पानी में पड़ते अक्स की तरह लगती है. उसकी अपनी संदेशशीलता ही पानी को तेज-तेज हिलाती है और अक्स अपनी सही-सही शिनाख्त नहीं दे पाता. मेरी मनःस्थिति भी कुछ ऎसी थी जब अप्रैल सन ७२ में मुझे मुंबई से राम अरोड़ा के साथ एक सज्जन महेंन्द्र विनायके का यह पत्र मिला कि वह मेरे उपन्यास ’गांठ’ पर फिल्म बनाना चाहते हैं. इन्हीं दिनों कमलेश्वर से भी इसी आशय का पत्र मिला. यात्री पहले ही सूचन दे चुके थे. मैं इस स्थिति को एक सुहावने सपने की तरह ले रहा था, पर मेरे परिवार वाले इसे सुबह का सच माने हुए थे. हर आठवें-दसवें दिन विनायके का पत्र आ जाता था जो प्रगति का सूचक होता था. मैं इस प्रगति को अपने में कैद किए हुए था, लेकिन मेरे परिवार वालों ने अपने मित्रों और मिलने वालों को इसकी बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी देनी शुरू कर दी. वे मुझे उठाकर शायद स्वयं भी उठने के आकांक्षी थे. बाहर निकलते हुए मैं पाता—या फिर मुझे ही ऎसा लगता- कि मेरे प्रति लोगों की आंखों में एक बदला हुआ भाव है, कौतूहल की ऊष्मा से पिघला नरम-नरम, और कुछ वे जन भी मुझ किरानी को अभिवादन कर रहे हैं जो पहले मुझसे अभिवादन की अपेक्षा करते थे.

बात शर्तों को पक्के कागज पर उतारने तक पहुंच गई थी. फिर अंतराल लंबा हो गया. पूछने पर विनायके ने क्षमा मांगते हुए उत्तर भेजा कि उन्होंने अब जैनेन्द्र जी के उपन्यास ’त्यागपत्र’ पर फिल्म बनाना निश्चित किया है.

अवांछित आवाज ने नींद से जगा दिया था और सपने की रील कट गई.

मेरे साथ पहले भी कुछ ऎसे हादसे घट चुके थे. कई संपादकों ने विशेषांक के लिए सामग्री आमंत्रित कर नहीं दी थी, दो-एक समीक्षकों ने अपनी पुस्तकों के लिए कहानियों की कटिंग्स मंगवाकर उपयोग नहीं किया था और एक प्रकाशक ने अनुबंध-पत्र हस्ताक्षरित हो जाने के बाद भी निर्लज्ज बन पांडुलिपि लौटा दी थी. मैंने विनायके को लिखा कि जब-तब लोग चोटी पर ले जाकर मुझे नीचे ढकेल देते हैं . पूर्व अनुभवों से सीखकर मैंने अपने जिस्म से हड्डियां निकलवा दी हैं और आप विश्वास करिए, अब मुझे चोट नहीं लगती है.

मैंने तीसरा उपन्यास लिखना प्रारंभ कर दिया था. उन्हीं दिनों कृष्णा सोबती का नया उपन्यास ’सूरजमुखी अंधेरे में’ पढ़ा और अपने लेखन की हीनता मेरे लिए इतनी घृणित हो गई कि मैं रो पड़ा.

रोजमर्रा के दबावों, आघातों, छोटी-छोटी तृष्णाओं, अवांछित समझौतों, कटु शोषण को चुपचाप निगलने की विवशताओं --- इन सबकी पीड़ा को भुलाने के लिए व्यक्ति अपने को किसी व्यस्तता से जोड़ लेता है या फिर अपने ही कई हिस्सों में से कोई स्थल ऎसा खोज लेता है जहां से जिन्दा रहने के लिए वह खुराक लेता रहता है. किन्हीं अर्थों में यही मनुष्य की जिजीविषा होती है. मेरे लिए ऎसा स्थल मेरे बच्चे थे. वे संघर्षशील और महत्वाकांक्षी हैं, यह स्थिति मेरे लिए संतोषमय थी. कक्षाओं में वे प्रथम आ रहे थे और बराबर चढ़ते जा रहे थे. वे अद्वितीय बन सकते थे और मैं उनको बढ़ावा देता जा रहा था, कुछ इस भाव से—बढ़े चलो बहादुरों, हालांकि अविघ्न बढ़ने के लिए उनके पास उचित साज-सज्जा या आवश्यक उपकरण कुछ नहीं थे. वे सिरदर्द, थकावट, जुकाम आदि जैसी अड़चनों की जब तब शिकायत करते. मैं उनको नकार जाने के लिए कहता और वे नकार जाते.

कुछ लोग टोकते – “मगर इन बच्चों की सेहत ठीक नहीं है.”

मैं कहता – “अब ये पढ़ लें या सेहत बना लें.” फिर मैं अपने को ही समझाने के लिए इस कथन में थोड़ा लोच दे देता – “सेहत बाद में ठीक हो जाएगी, अभी पढ़ना मुख्य है.”

मेरा बड़ा लड़का रसायन शास्त्र में शोध कार्य करने लगा था. मद्रास गए हुए उसे एक वर्ष हो गया था और गर्मियों में वह कुछ दिनों के लिए आया था. मेरे दूसरे लड़के का परीक्षाफल निकला. उसने बहुत अच्छे अंकों से प्रथम श्रेणी पाई. मैं अपनी प्रसन्नता का स्वाद ले सकता था, पर तभी मेरा बड़ा लड़का मुंह से खून गिराने लगा. मैं बदहवासी में डॉक्टर के पास दौड़ा गया. उसने क्षय होने की संभावना प्रकट करते हुए एक्स-रे कराने की सलाह दी और एक्स-रे के बाद उस संभावना की पुष्टि कर दी

मैं इलाज करा रहा था और अपराध-बोध मुझे चीर रहा था कि मैं बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सजग क्यों नहीं रहा? जीवन सर्वोपरि है या महत्वाकांक्षा ? प्रश्न इसी के साथ यह भी उठना चाहिए था कि सजग रहने पर भी क्या मैं उनको घी,दूध, फल जैसा पौष्टिक आहार देने के लिए समर्थ था? प्रश्न यह नहीं रहा था और अपराध-बोध का आरा तेज-तेज चल रहा था.

हफ्ते-डेढ़ हफ्ते बाद मेरा दूसरा लड़का भी खाट पर आ गया. बुखार जो उसको लगा तो छूटता नहीं. दस दिन हो गए, बीस दिन हो गए, तीस दिन हो गए, पचास दिन हो गए—थर्मामीटर लगाओं और टेम्प्रेचर वही ९९.

अद्वितीय बनने के आकांक्षी इस दूसरे पुत्र को भी क्षय होने का संदेह दिलाया जाने लगा.

मेरी हालत पागलों जैसी. जलते तवे पर पड़ी पानी की बूंद जैसा मैं बदहवास. हर पल लगता कि मेरे साथ कोई भी दुर्घटना घट सकती है. यहां-वहां कहीं छिपा खड़ा खूंखार भेड़िया अंदर घुसकर किसी को जबड़े से तोड़ देगा. मेरा तीसरा बच्चा भी गिरा-पड़ा रहता. पीड़ा पर जरा-सा दबाव पड़ता और मैं भीगे कपड़े जैसा टपकने लगता. पैसा यहां-वहां से जितना जुटाता, दस-पांच दिन में स्वाहा हो जाता. आर्थिक अभाव मुझे और भी निर्ममता से तोड़ रहा था. मैंने एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक को पत्र लिखा. अपनी रचना का पारिश्रमिक भेजने के लिए उनको पहले भी लिख चुका था. इस बार स्थिति की भयावहता की जानकारी देते हुए विशेष अनुरोध किया. साहित्य से सीधे जुड़े व्यक्ति मानवीय स्तर पर संवेदनशून्य भी हो सकते हैं, मैंने इन दिनों अच्छी तरह जाना.

पत्नी ने पूजा-पाठ, व्रत-नेम का आश्रय लिया था. इन पर आस्था न होते हुए भी मैं टीका-टिप्पणी कर सकूं, उन दिनों मुझमें इतना साहस नहीं था. मैं देखता, पत्नी सिरहाने जाप कर रही है और लड़का रेडियो पर समाचार सुन रहा है. गंडा बांधा गया है और कुछ दिनों उदासीन रहकर उसने उसे उतार दिया है—उहूं! यह सब पाखंड है. मैं स्वयं आशंकित होता, पर मेरे अंदर का लेखक मुदित.

घर में घुटने तोड़कर बैठी बीमारी के कारण मैंने विरोध किया था, पर पत्नी ने त्योहार खोटा न होने देने के लिए दीवाली पर कड़ाही चढ़ाई थी और मेरे अंदर के लेखक ने उसकी जिजीविषा का आदर किया था.

मेरी ये कुछ गर्दिशें हैं. मैंने ’पटरियां’ शीर्षक एक कहानी में इस सत्य को उभारा था कि व्यक्ति के लिए उसका अपना दुःख और दर्द सबसे बड़ा होता है. मेरी से कहीं बड़ी गर्दिशें दूसरों के साथ होंगी—बहुतों के साथ. उनके साथ बने रहने वाले साये क्या मेरे से ज्यादा स्याह नहीं होंगे?

गर्दिशेदौरां मेरे साथ आगे भी रहेगा क्योंकि मैं एक निहायत मामूली आदमी हूं. अब तक मैंने अपने लेखन के लिए इन गर्दिशों को पूंजी माना है और चाहूंगा कि वे आगे भी पूंजी बनें. मैंने अपनी रचनाओं में जो कुछ भी उभारा है, वह जीवन से अलग नहीं है, क्योंकि साहित्य और जीवन के सत्य मेरे लिए कभी भी दो नहीं रहे हैं. रचना झूठी बनती है जब वह अपनी जमीन से उखड़ी होती है और फैशन का सहारा पकड़ती है, जिसके कहीं पैर नहीं होते. ’गांठ’ में मैं, मेरी पत्नी, मेरी मां और मेरे निकट के कई लोग थे—अपनी अच्छाइयों-बुराइयों के साथ, यों रचना में जज्ब होते हुए. व्यक्तिगत जीवन में अपनी दुर्बलताओं और साहसहीनता के कारण जो मैं नहीं कर पाता हूं, मेरी रचनाओं में मेरे पात्र वही करते हैं.

रचनाकार के लिए साहित्य ही ’धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र’ होता है. रथ का पहिया धंस जाने या धनुर्डोर टूट जाने पर भी मैं यहां अर्जुन की तरह अडिग रह सकूं, यह मेरी सबसे बड़ी आकांक्षा है.

***** (1974)

’जोखिम’ – हृदयेश
किताबघर प्रकाशन
४८५५-५६/२४, अंसारी रोड,
दरियागंज,
नयी दिल्ली -११०००२

मंगलवार, 30 मार्च 2010

पुस्तक अंश

महेश दर्पण की यात्रा-संस्मरण पुस्तक ’पुश्किन के देस में’ से एक महत्वपूर्ण अंश :
पुश्किन पुरस्कार ग्रहण करने के लिए महेश दर्पण रूस गए. पुरस्कार उन्होंने प्राप्त किया और ’पुश्किन के देस में’ यात्रा पुस्तक हिन्दी पाठकों को प्राप्त हुई. इस महत्वपूर्ण यात्रा पुस्तक में रूस का वर्तमान परिदृश्य ही नहीं उसका अनछुआ अतीत भी उद्घाटित हुआ है. महेश दर्पण हिन्दी के उन कथाकारों में हैं जो रेगिस्तान से भी मोती चुन लाने की क्षमता रखते हैं. कभी शंकरदयाल सिंह की सोवियत संघ की यात्रा के संस्मरण साप्ताहिक हिन्दुस्तान में पढ़े थे और उन दिनों उनकी पर्याप्त चर्चा रही थी. उसके बाद भी कई साहित्यकारों-पत्रकारों ने सोवियत संघ पर यात्रा संस्मरण लिखे, लेकिन ल्युदमीला ख़ख़लोवा (प्लैप) की इस बात से असहमति का कोई कारण नहीं कि -सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस काफी बदल गया है. रूस का जीवन भी अब पहले जैसा नहीं रहा. महेश दर्पण ने इसी बदले हुए जमाने का बेहद आत्मीय, सच्चा और सहज चित्र प्रस्तुत किया है. बदले रूस को जानने के लिए दर्पण की यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की भांति है. प्रस्तुत है इससे एक महत्वपूर्ण अंश :
मास्को में तोल्स्तोय का संग्रहालय
महेश दर्पण
मास्को स्थित तोल्स्तोय संग्रहालय दरअसल १८६८ में एक लॉज हुआ करता था. यहां तब एक कोस्चवान और सहन की देखभाल करने वाले रहा करते थे. तोल्स्तोय संग्रहालय देखकर लेखक के उन दिनों की कल्पना बखूबी की जा सकती है. मैं और अनिल अचानक ही यहां आ पहुंचे थे.
इसका डाइनिंग रुम देखने लायक है. कहते हैं, यहा सिर्फ मेहमानों को ही वाइन पेश की जाती थी. १८९३ में तात्याना ने बेटी मारिया का जो चित्र बनाया था, वह यहीं रखा हुआ है. उस वक्त की एक जर्मन घड़ी भी सजी हुई है. ठीक सामने एक बड़ी खिड़की है. इसके साथ ही लगे दूसरे कमरे में रहने वाले, परिवार के लोग, बदलते रहते थे. उसी वक्त का खास सामान यहां रखा गया है. लेखक के बेटे सर्गेई की पत्नी का चित्र , तोल्स्तोय की पत्नी का पलंग, पियानो और तमाम दूसरी चीजें यहां देखी जा सकती हैं.
म्यूजियम के बहाने अंतरंग जीवन-कथा भी खुलती है लेखक की. १८८८ से पति-पत्नी का शयन कक्ष तीसरा कमरा हो गया. आखिरी बेटे के जन्म के बाद पलंग अलग कर लिए गए थे. यहीं मेज पर सोफिया पति की रचनाओं के प्रूफ और घर का हिसाब देखा करती थीं. वह कहानियां भी लिखती थीं. संगीत में तो उनकी दिलचस्पी थी ही, वह फोटोग्रफी भी किया करती थीं. ज्यादातर कामकाज उन्हीं के निर्देशन में हुआ करता था. यही वजह है कि यहां मेहमानों की लिस्ट, हिसाब-किताब और बिल आदि भी सहेज कर रखे गए हैं.
तोल्स्तोय के पलंग पर रखा हुआ कंबल कभी खुद पत्नी ने बुना था. किसी खास अवसर के लिए तैयार कराया गया आमंत्रण पत्र भी रखा हुआ है. अपने सबसे छोटे बेटे के साथ सोफिया आंद्रेवना का चित्र भी देखा जा सकता है जो कलाकार गे ने बनाया था.
चौथा कमरा बच्चों का है. पहले तीन बच्चे यहीं रहते थे. दो बेटे और एक बेटी. बाद में अलेक्सांद्रा बड़ी होकर इस कमरे से चली गई. इस कमरे में १३वें बच्चे वान्या का सारा सामान सुरक्षित रखा हुआ है.
वान्या को लेखक खूब प्यार करते थे. उन्हें यकीन था कि छोटा बेटा ही उनका प्रभु सेवा का काम पूरा करेगा. यह कमरा उसकी स्मृतियों को संजोए है. यहां आप सर्गेई की लिखी एक कहानी का संपादित रूप देख सकते हैं. यहां रखे दस्तावेज बताते हैं कि १८९५ में वान्या सात साल का होकर मर गया. दो पलंग हैं जिनमें से एक पर आया और एक पर बच्चा सोया करता था. दरवाजे पर ही झूले के कांटे लगे हुए हैं. एक पक्षी का पिंजरा रखा हुआ है. कई हस्तशिल्प और खिलौने उस समय की कला से परिचित कराते हैं.
एक कमरा बच्चों की पढ़ाई का है. इसे देख कर पता लगता है कि सामान्य पढ़ाई के अलावा यहां विदेशी भाषाएं भी सीखी जाती थीं. अलेक्सांद्रा के अलावा यहां गवर्नेस हमेशा रहा करती थी. वह आमतौर पर जर्मन या फ्रेंच में बोला करती थी. सोफिया भी जर्मन पढ़ा देती थीं. कुर्सी की गद्दियों पर कढ़ाई तोल्स्तोय की पत्नी ने की है. यहां उस वक्त इस्तेमाल होने वाला लकड़ी का संदूक और कुछ बर्तन भी रखे हुए हैं.
इस कमरे को पार कर के आप नौकरानियों के कमरे तक जा पहुंचेंगे. इनका काम हुआ करता था कपड़े धोना, प्रेस करना और जरूरी मरम्मत. खली समय में ये मेज के पास आकर चाय पिया करती थीं. इनमें से एक नौकरानी मरीया ने रसोइए से शादी कर ली थी. इस कमरे की विशेषता यह है कि यहां से आप बाहर भी जा सकते हैं और ऊपर भी. यहीं से खाना लाया जाता था.
सातवें कमरे में दो बेटे आंद्रेई और मिखाइल रहा करते थे. इन लोगों के पलंग अब भी यहीं रखे हैं. ये वॉयलिन और हारमोनियम बजाया करते थे. उनकी मेज भी यहीं रखी हुई है. आठवां कमरा बेटी तात्याना का है. कमरे की खूबसूरती उसके बताए गए मिजाज के अनुरूप ही है. उसने चित्रकारी और कढ़ाई बाकायदा सीखी थी. उसके बारे में कहा जाता है कि वह काफी मिलनसार, दयालु और खुशमिजाज थी. उसे छोटे बच्चों की बड़ी चिंता रहती थी. यही नहीं, जब कभी मां-बाप में तनातनी हो जाती, समझौता भी यही कराती थी. वह गे, रेपिन और कसातकिन जैसे चित्रकारों की मित्र थी. इस कमरे में रखे तात्याना के कई पोट्रेट इन्हीं चित्रकारों के बनाए हैं. इस कमरे की एक मेज पर काला मेजपोश बिछा है. इस पर मेहमानों के हस्ताक्षर मौजूद हैं. उन पर कढ़ाईदार काम भी है.
इसके बाद खाना सर्व करने वाला कमरा आता है. यहां उस जमाने मिट्टी के तेल का एक लैंप रखा हुआ है. यहां दून्या रोज ऑमलेट बनाया करती थी. घर के लोग उससे कॉफी और खिचड़ी भी बनवा लेते थे. शेल्फों में बर्तन सजे हैं.यहीं पास में एक अलमारी में तोल्स्तोय का कोट रखा है. इसका साइज बता है कि वह कितने लंबे-तगड़े थे. (उनके मित्रों के संस्मरणों में यह स्पष्ट मिलता है कि तोल्स्तोय लंबे नहीं --- सामान्य कद के थे - रूपसिंह चन्देल)
नीचे की मंजिल में तोल्स्तोय खुद रहते थे और ऊपर मेहमानों को टिकाते थे. आप जरूर जानना चाहेंगे कि मेहमानों में अक्सर आने वालों में कौन लोग होते थे. इनमें थे : चेखव, लेस्कोव, बूनिन, अस्त्रोवस्की और गोर्की.
ऊपर जाने के लिए, पहले नकली भालू के हाथ में विजिटिग कार्ड रखते थे लोग. ये वे दिन थे जब बिजली नहीं हुआ करती थी. इसीलिए गैलरी में चित्रों के मॉडल रखे हैं.यही थी चित्र बनाने की जगह. यहां घोड़ों के दो चित्र आज भी आप देख सकते हैं. ये हैं : ’ताकत का अंदाजा बुड़ापे में’ और ’ताकत का अंदाजा जवानी में’. ये दोनों चित्र स्वेर्चकोव के हैं. ये उन्होंने तोल्स्तोय को भेंट किए थे.
हॉल में संगमरमर इंप्रेशन का वॉल पेपर लगा है. यहां गोष्ठी और पारिवारिक समारोह हुआ करते थे. इन समाराहों में स्क्रियाबिन, रहमानिनफ, रीम्स्की, कोर्साक, रानेमेव और शल्यापिन जैसे संगीतकार आया करते थे. यहां आप तोल्स्तोय की वह मूर्ति भी देख सकते हैं जो गे ने खुद बना कर उन्हें भेंट की थी. १८५८ में मारे गए रीछ की खाल भी यहां रखी हुई है. कहते हैं, इस रीछ ने लेखक पर हमला कर दिया था.
तोल्स्तोय मेहमानों का जमकर स्वागत करते थे. खासकर ईस्टर के मौके पर. ईस्टर पर्व मनाते हुए कई चित्र यहां उनके साथ विशेष लोगों के देखे जा सकते हैं.एक बड़ी शतरंज भी यहां रखी है. आप चाहें तो रिकार्ड की गई तोल्स्तोय की आवाज भी सुन सकते हैं. इसमें वे गांव के स्कूली बच्चों को संबोधित कर रहे हैं. जो कुछ मैं सुन पाया, उसका आभिप्राय लीन ने मुझे यह बताया : ’शुक्रिया बच्चो कि आप मेरे पास आते हैं. मैं खुश हूं . मुझे मालूम है कि आप में ऎसे बच्चे भी हैं जो पढ़ाई नहीं करते . वे शैतानी करते हैं. बड़े होने पर आप लोग मुझे याद करेंगे.’
वैसे रिकार्ड तो उस म्यूजिक का भी रखा है जो तोल्स्तोय की पोती बजाया करती थी. गेस्ट रूम में कलाकार सोरोव का बनाया सोफिया का खूबसूरत चित्र रखा है. दूसरा चित्र रेपिन का बनाया तात्याना का सजा है. गे का बनाया मरीया का चित्र भी यहां मौजूद है. देखने वाला सोच सकता है कि ये मूल चित्र हैं, लेकिन आप इसे देख कर जब खुश हो रहे हों तो यह भी याद रखिएगा कि तोल्स्तोय खुद इसे बोर मेहमानों का कमरा कहा करते थे.
यहां वह कभी-कभी ही मिलने आया करते थे. यहां अक्सर घर की मालकिन की सहेलियां आकर बैठा करती थीं. यहीं वह छोटी-सी मेज भी है जिस पर बैठ कर सोफिया पति की रचनाओं के प्रूफ देखा करती थी. आखिरी कमरे में यहीं वह पलंग भी रखा हुआ है जिस पर लेखक सोए थे. यहां आपको परिवार के तमाम सदस्यों की तस्वीरें नजर अएंगी. वे उपहार भी बाकायदा सजें हैं जो बच्चों ने लेखक को शादी के ३० बरस पुरे होने पर भेंट किए थे.
इस म्यूजियम में यह गौर करने लायक बात है कि मरीया के कमरे की छत सबसे नीची है. वही पिता की रचनाओं का पुनर्लेखन , उनके पत्रों के उत्तर देने का काम करती और फ्रांसीसी से अनुवाद करती थी. यहां मेज पर बिछे मेजपोश पर परिवार में मेहमान बनकर आए लोगों के हस्ताक्षर नजर आते हैं. वह कबल भी रखा हुआ है जिसे सोफिया ने बनाया था. घर की मैनेजर अवरोतिया थी, जो ३० साल से भी ज्यादा सेवा में रही. कुल दस नौकर थे.
एक कमरे में तोल्स्तोय परिवार की महिलाओं के वस्त्र रखे हुए हैं.
वह कमरा, जहां मुख्य नौकर इल्या सिदोरको खाना लगाता था, उसी तरह से सहेजकर रखने की कोशिश की गई है. उसे लेखक द्वारा बाकायदा मेहमानों के आने की सूचना दी जाती थी. लैंप में तेल वही डाला करता था. वही बच्चों और सोफिया को शहर ले जाता था. सच पूछें, तो यह लेखक का सबसे विश्वस्त नौकर था. शायद इसीलिए अपनी कई किताबें, प्रिय सामान और तस्वीरें लेखक ने उसे भेंट की थी. यहां मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि बीमारी के दिनों में तोल्स्तोय की सबसे ज्यादा सेवा इसी ने की थी. हालांकि सच यह भी था कि लेखक को किसी की मदद लेना कतई पसंद नहीं था. इसके पीछे उनकी वह धारणा सबसे ज्यादा काम करती थी कि किसी को नौकर मानना नैतिक रूप से खराब है. इस कमरे में एक फ्रेंच कलाकार का बनाया इसी नौकर का चित्र सजा हुआ है.
लिखने -पढ़ने के कमरे में दीवारें रंगी हुई हैं. जमीन पर चटाई बिछी है. फर्नीचर कम, लेकिन भारी है. तोल्स्तोय नौ से दस बजे के बीच यहीं बैठ कर लिखा करते थे और फिर अंतराल होता था. इसके बाद तीन से चार बजे के चीच लेखन होता था. इसके बाद वह पत्र लिखते थे. यहीं उन्हॊंने ’पुनरुत्थान’, ’फादर सर्गेई’, ’इवान इलिच’, ’जीवित शव’ और ’मुझे क्या करना चाहिए’ जैसी किताबें लिखीं. धर्म से मोह टूटने के बाद धर्म सभा को उत्तर भी उन्होंने यहीं से लिखा. लेखक को कुर्सी की ऊंची टांगें पसंद नहीं थीं. कुर्सी के पैर उन्होंने खुद काटकर छोटे किए थे. ये वे दिन थे जब लेखक की नजर कमजोर हो गई थी. कुर्सी को कम ऊंचा रखने का कारण यही था कि तोल्स्तोय उन दिनों ज्यादा झुकना नहीं चाहते थे. काम करते-करते थक जाते तो खड़े होकर स्टैंड पर लिखने लगते थे. काम के बाद जिन चौड़ी कुर्सियों पर लेखक आराम करते थे, वे भी यहीं रखी हैं. यहीं वह घर आए लेखकों से मुलाकात किया करते थे.
इस कमरे के बाहर लेखक के जूते रखे हुए हैं. उनके कपड़े, साइकिल और खेत में काम करने का जरूरी सामान भी रखा है.
सात बजे उठ कर तोल्स्तोय बाहर के कमरे में नहाया करते थे. कमरों की सफाई वह खुद किया करते थे. सर्दियों में लकड़ी काटना और फिर उन्हें उठा कर लाना उनके लिए रोजमर्रा के कामों में शुमार था. अपने कमरे में भट्टी भी वह खुद ही जलाते थे. दूर से पानी लाने के लिए वह बर्फगाड़ी का इस्तेमाल किया करते थे. इन तमाम कामों से संबद्ध उनकी कई चीजें आज भी वहा रखी हैं. घूमने के बाद अक्सर तोल्स्तोय जूते बनाया करते थे. जूते बनाना उन्होंने मास्को में रहकर ही सीखा था. इस में काम आने वाली चीजें यहीं सहेज कर रखी गई हैं.
तात्याना के पति के लिए १८९९ में लेखक ने यहीं जूता बनाया . यहीं फेत नाम के कवि के लिए भी उन्होंने जूता बनाया. उनका बनाया एक जूता यहां रखा हुआ है. आप यहीं वह साइकिल भी देख सकते हैं जो तोल्स्तोय चलाया करते थे. उन्हें मुग्दर चलाने का शौक तो था ही, कहते हैं लेखक ने ६७ बरस की उम्र में भी साइकिल चलाई. ये तमाम चीजें साहित्य प्रेमियों के लिए प्रदर्शित हैं.
कहते हैं, यह सब लेखक की पत्नी ने सरकार को बेच दिया था. बाद में सरकार ने १९११ में यहां म्यूजियम बना दिया. दुनिया-भर से आए लोग इसे देखने का मोह नहीं छोड़ पाते . इसके रख-रखाव में अब अच्छा-खासा खर्च होता है. शायद यही वजह है कि इस म्यूजियम में प्रवेश के लिए हमें १५० रूबल का टिकट लेना पड़ा. फोटॊ खींचने के लिए १०० रूबल अलग से. हां, आप पिछले दरवाजे के पास या बाहर वाले कमरे का फोटो खींचना चाहें तो बगैर कुछ दिए खींच सकते हैं. म्यूजियम से, हमारे बाहर पहुंचते ही आइसक्रीम वाले लड़के ने कहा : ’गुड मॉर्निंग . अनिल ने उससे ’द्रास्तुइचे’ कहा तो वह शर्मा गया. उसके साथ की सुंदरी भी हंस पड़ी.
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कल्याणी शिक्षा परिषद , ३३२०-२१, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली-११००२२.
मूल्य ३००.०० , पृष्ठ २२४
आवरण : निर्दोष त्यागी
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कुमाऊं मूल के एक सैन्य-परिवार में महेश दर्पण का जन्म १ जुलाई, १९५६ को तोतारानी, धर्मशाला (हि.प्र.) में हुआ. देश के कई शहरों में शिक्षा ग्रहण करते हुए अंततः एम.ए.(हिन्दी).
*’विश्ववाणी’, ’सूर्या’, ’सारिका’, ’दिनमान’ और ’नवभारत टाइम्स’ के सम्पादन विभाग में जुड़े रहे महेश जी का साहित्यिक पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान है. उनकी कहानियां भीड़ से एकदम अलग आत्मीय आकर्षण लिए हैं जिन्हें आप ’अपने साथ’, ’चेहरे’, ’मिट्टी की औलाद’, ’वर्तमान में भविष्य’, ’जाल’, ’इक्कीस कहानियां’, और ’ एक चिड़िया की उड़ान’ में पढ़ सकते हैं. उनका साहित्य चिंतन झलकता है ’रचना परिवेश’ और ’कथन-उपकथन में’. वह हिन्दी कहानी के एक तटस्थ सम्पादक हैं, जिसकी पहचान उनके द्वारा सम्पादित ’बीसवी शताब्दी की हिन्दी कहानियां’, ’स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी कोश’, ’प्रेम कहानियां’, ’राजधानी की कथायात्रा’, ’प्रेमचन्द की चर्चित कहानियां’, ’जयशंकर प्रसाद की चर्चित कहानियां’, ’रमाकांत का संग्रह, ’जिन्दगी भर का झूठ’ ’अवधनारायण मुद्गल समग्र’ जैसी स्थायी महत्व की पुस्तकों से की जा सकती है. ’पुश्किन सम्मान’ (रूस), ’साहित्यकार सम्मान’, ’कृति सम्मान’ (हिन्दी अकादमी), ’सुभाष चंद्र बोस सम्मान’, ’पीपुल्स विक्ट्री अवार्ड’ और ’नेपाली सम्मान’ से समानित महेशजी की कहानी ’छल ’ पर अमिताभ श्रीवास्तव द्वारा बनाई गई फिल्म भी प्रशंसित हुई है.
संप्रति : टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के सांध्य टाइम्स में कार्यरत.
संपर्क : सी-३/५१, सादतपुर, दिल्ली-११००९४
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