रविवार, 8 जून 2008

रिपोर्ट

तेजेन्द्र शर्मा का साहित्य ब्रिटेन से हमारा परिचय करवाता है

मोनिका मोहता

"तेजेन्द्र शर्मा ने मित्रता निभाने की कोई सीमाएं नहीं बना रखीं। किसी की भी सहायता करते समय वे कोई हद मुक़र्रर नहीं करते। उनके द्वारा रचे साहित्य की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि उसके विषय यहां ब्रिटेन की ज़मीन से जुड़े हैं। उनकी कहानियां, कविताएं, ग़ज़लें ब्रिटेन की ज़िन्दगी से हमारा परिचय करवाती हैं।" यह उदगार व्यक्त किये भारतीय उच्चायोग की मन्त्री – संस्कृति एवं नेहरू केन्द्र की निदेशिका श्रीमती मोनिका मोहता ने। अवसर था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित कार्यक्रम सृजनात्मकता के तीन दशक जिसमें कथाकार, कवि एवं ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गयी।
मोनिका मोहता ने तेजेन्द्र शर्मा को नेहरू केन्द्र का मित्र और उनके अपने परिवार का सदस्य बताते हुए अपने कवि पति मधुप मोहता द्वारा विशेष तौर पर तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर लिखी गयीं चार पंक्तियों के माध्यम से तेजेन्द्र शर्मा का परिचय कुछ यूं दिया – इक दिया तूफ़ान में जलता रहा / इक शजर सेहरा में भी खिलता रहा / वो कहानी की रवानी है ग़ज़ल की गूंज भी / इक कलम का कारवां, चलता रहा।
कार्यक्रम अपने घोषित समय पर शुरू हो गया तो खचाखच भरे हॉल के दर्शकों को हैरानी हुई। वे सोचने लगे कि अब कार्यक्रम समाप्त भी समय पर ही हो जायेगा। किन्तु ऐसा हुआ नहीं। प्रत्येक वक्ता ने अपने निर्धारित समय से बहुत अधिक समय लिया और जम कर तेजेन्द्र के व्यक्तित्व को श्रोताओं के साथ बांटा।
कार्यक्रम की शुरूआत में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने सभी गण्यमान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि उनकी संस्था कथा यू.के. के साथ मिल कर हिन्दी और उर्दू के बीच की दूरियां पाटने के प्रयास कर रही है। वे साहित्य एवं संस्कृति के माध्यम से दो मुल्कों के नागरिकों के दिलों की दूरियों को दूर करने में विश्वास करती हैं। तेजेन्द्र शर्मा को एक चलती फिरती संस्था का नाम देते हुए उन्होंने तेजेन्द्र की दूसरों की सहायता करने की प्रकृति की सराहना की। तेजेन्द्र की कहानियां उन्हें आधुनिक कहानी का सर्वोत्तम उदाहरण लगती हैं।
वेल्स के डा. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र की ग़ज़ल ये घर तुम्हारा है.... (गायिका – मीतल पटेल, संगीत – अर्पण) और साथ ही तेजेन्द्र का एक साक्षात्कार भी पर्दे पर दिखाया। बाद में अपने पॉवर-पाइण्ट प्रेज़ेन्टेशन के माध्यम से डा. कौशिक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तेजेन्द्र परिवार के मूल्यों के प्रति कटिबद्ध हैं। वे अपने रिश्ते पूरी शिद्दत से निभाते हैं और फिर वसुदैव कुटुम्बकम के आधार पर अपने परिवार का विस्तार भी करते हैं। उन जैसे कई मित्र तेजेन्द्र के विस्तृत परिवार का हिस्सा हैं।
बी.बी.सी हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष श्री कैलाश बुधवार ने तेजेन्द्र पर अपनी बात कुछ यूं कही, "तेजेन्द्र की जिस ख़ूबी का मैं सबसे ज़्यादा क़ायल हूं, वो यह कि वह वन-मैन एन्टरप्राइस हैं। जो भी किया है अकेले दम, सिंगल-हैण्डिड। उनके पीछे कोई गॉडफ़ादर, कोई प्रोमोटर नहीं, कोई गुट नहीं जिसका उन्हें सहारा हो। जब इस मुल्क में आये थे, तो किसी को नहीं जानते थे। सिर पर हाथ रखने वाला कोई नहीं था। मगर आज अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान की जो धूम हैं, उसके नाते जो भी लेखक या संपादक भारत से लन्दन आता है, उनसे मिलना चाहता है।"
भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री राकेश दुबे ने तेजेन्द्र शर्मा के साथ अपनी निजी मित्रता की बात करते हुए अपनी विशिष्ट शैली में कहा, "“काला सागर” की गहराई से शुरु कि‍या जो कहानी लेखन का सफ़र तो फि‍र रुके नहीं, अपनी लेखनी की “ढि‍बरी टाइट” करते हुए लि‍खते रहे, नौकरी भी करते रहे, घर भी चलाते रहे । साहि‍त्‍य साधना में ऐसे जुटे कि‍ अपनी “देह की कीमत" न जानी। फि‍र मुम्‍बई के “ईंटों के जंगल” से नि‍कलकर महारानी वि‍क्‍टोरि‍या के देश में आ बसे । बीबीसी पर उनकी धमक सुनाई पड़ी; जीवन की गाड़ी भी धीरे धीरे पटरी पर दौड़ने लगी । लेकि‍न वे शान्‍त कहां बैठने वाले थे; कहने लगे लोगों से कि‍ अपने “पासपोर्ट का रंग” न देखो, जहॉं रह रहे हो वहॉं की बात सुनो, समझो, कहो क्‍योंकि‍ “ये घर तुम्‍हारा है” । तेजेन्‍द्र जी की नज़र भवि‍ष्‍य पर है, कदम ज़मीन पर और सोच गंगा जमुनी संस्‍कृति‍ की पोषक । वे यह दुआ करते रहे हैं कि‍ उनकी रचनाओं के संदेश की “बेघर आंखें” हर रचनाकार की आंखें बन जाएं और परस्‍पर मेल मि‍लाप की भावना से हम साथ साथ आगे बढ़ें।"
बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी की वर्तमान अध्यक्षा डा. अचला शर्मा ने चुटकी लेते हुए कहा कि तेजेन्द्र की अच्छाइयों के बारे में इतना कुछ कहा जा चुका है कि वे तेजेन्द्र की किसी कमज़ोरी की तरफ़ इशारा करना चाहेंगी। उन्होंने तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तितव के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए उनके पत्रकार रूप की चर्चा की। तेजेन्द्र शर्मा के नवीनतम कहानी संग्रह बेघर आंखें का ज़िक्र करते हुए अचला जी का कहना था कि तेजेन्द्र अब एक सधे हुए कथाकार हैं। क़ब्र का मुनाफ़ा, एक बार फिर होली, मुझे मार डाल बेटा, कोख का किराया, पापा की सज़ा आदि कहानियों में वे ब्रिटेन के भारतीय, पाकिस्तानी एव गोरे चरित्रों का बख़ूबी चित्रण करते हैं। तेजेन्द्र एक सशक्त कहानीकार, नाटककार, अभिनेता और पत्रकार होने के साथ साथ एक सफल आयोजक भी हैं जो अपने व्यक्तित्व की सहजता के कारण सभी को अपने साथ ले कर चलने की क्षमता रखते हैं।
उर्दू के मूर्धन्य विद्वान प्रोफ़ेसर अमीन मुग़ल ने तेजेन्द्र के कहानीकार रूप की बहुत गहराई से पड़ताल की, "वह (तेजेन्द्र) आपको दुःखों की दुनिया की सैर करवाता है। सैर, जो दिल्ली के फूल वालों की सैर नहीं है बल्कि एक सफ़र है जहां रास्ते के हर दरीचे (खिड़की) में सलीबें गड़ी हुई हैं, पत्थरों पर चलना पड़ता है और राह में कोई कहकशां (आकाश गंगा) नहीं है।"... "तेजेन्द्र एक पैदायशी कहानी बाज़ है। बड़े रिसान से बात कहना और किरदारों की सोच के धारे के साथ बहना और पढ़ने वालों को बहा ले जाना उसका कमाल है।"
सनराईज़ रेडियो के महानायक रवि शर्मा ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में तेजेन्द्र को एक दाई की संज्ञा दे डाली। उनका कहना था कि तेजेन्द्र स्वयं तो लिखते ही हैं बल्कि जो लोग बिल्कुल भी नहीं लिखते, उन्हें लिखने को प्रेरित भी करते हैं। उन्हें दूसरे का लिखा देख प्रसन्नता महसूस होती है, जलन नहीं।
मशहूर पत्रकार, मंच कलाकार एवं निर्देशक परवेज़ आलम ने तेजेन्द्र शर्मा की कहानी कैंसर का ड्रामाई अन्दाज़ में पाठ कर श्रोताओं से वाहवाही लूटी। सोनी टेलिविज़न से जुड़ी यासमीन क़ुरैशी ने कार्यक्रम का दक्ष संचालन किया।
तेजेन्द्र शर्मा की ऑडियो बुक (यानि की बोलने वाली किताब) सी.डी. का विमोचन 81 वर्षीय नेत्रहीन हिन्दी प्रेमी श्री मदन लाल खण्डेलवाल ने किया। उनका कहना था कि एम.पी. 3 तरीके से रिकॉर्ड की गयी इन कहानियों को स्वर देने वाले कलाकारों ने कहानियों को जीवन्त बना दिया है। उन्होंने ज़कीया ज़ुबैरी जी को धन्यवाद दिया कि उन जैसे लोगों के लिये कम से कम लन्दन के हिन्दी जगत में किसी ने सोचा तो। उन्होंने कहानियों को ब्रेल पद्धति में प्रकाशित करवाने का सुझाव भी दिया।
कार्यक्रम में शिरक़त कर रहीं हुमा प्राइस ने टिप्पणी की, "जब वक्ताओं ने तेजेन्द्र के विषय में बात करनी शुरू की तो यह साफ़ ज़ाहिर होता जा रहा था कि इस इन्सान को बहुत लोग प्यार करते हैं – पुरुष, महिलाएं, हिन्दू, मुसलमान, भारतीय, पाकिस्तानी, सभी। कुछ ही समय में वातावरण में फैल गई उष्मा से यह ज़ाहिर होता था कि लोग अपनी भाषाई और धार्मिक भिन्नताओं से कहीं ऊपर उठ कर इस एक व्यक्ति की उपलब्धियों के गीत गा रहे हैं। उनके आपसी मतभेद उन्हें तेजेन्द्र और ज़कीया पर अपना प्यार उंडेलने से नहीं रोक पाये।
तेजेन्द्र की कुछ ग़ज़लों को बहुत सुरीली और क्लासिकल बन्दिशों में प्रस्तुत किया श्री सुभाष आनन्द (एम.बी.ई) हवा में आज जो उनसे थी मुलाक़ात हुई / तपते सहरा में जैसे प्यार की बरसात हुई (राग केदार), शमील चौहान (उपाध्यक्ष – एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स) - घर जिसने किसी ग़ैर का आबाद किया है एवं बहुत से गीत ख़्यालों में सो रहे थे मेरे... सुरेन्द्र कुमार ने। सुरेन्द्र कुमार ने एक सरप्राइज़ आइटम के तौर पर ज़कीया ज़ुबैरी का लिखा एक पुरबिया गीत (जाए बसे परदेस हो सइयां, दिल को लागा रोग) भी प्रस्तुत किया जिसे श्रोताओं ने बहुत सराहा।
कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त श्री माधव चन्द्रा (मंत्री - भारतीय उच्चायोग), श्री मधुप मोहता (काउंस‍लर– भारतीय उच्चायोग), डा. कृष्ण कुमार, सोहन राही, रिफ़त शमीम, हुमा प्राईस, जगदीश मित्तर कौशल, कृष्ण भाटिया, सफ़िया सिद्दीक़ी, बानो अरशद, आसिफ़ जीलानी, मोहसिना जीलानी, डा. नज़रुल इस्लाम बोस, अशफ़ाक अहमद, राज चोपड़ा, मन्जी पटेल वेखारिया, तनवीर अख़तर, कौसर काज़मी, इन्द्र स्याल, स्वर्ण तलवार, अनुराधा शर्मा, वेद मोहला, भारत से पधारे डा. जे.सी. बत्तरा, और पाकिस्तान से आये सरायकी भाषा के विद्वान जनाब ताज मुहम्मद लंगा एवं सलीम अहमद ज़ुबैरी उपस्थित थे।
-अनिता चौहान

अगला अंक
-“हम और हमारा समय” के अंतर्गत “मैं क्यों लिखता हूँ” की अगली कड़ी में कथाकार रमेश कपूर का आलेख।
-वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी की कहानी “पाषाण गाथा” तथा अन्य सामग्री ।

शुक्रवार, 9 मई 2008

वातायन – मई 2008

हम और हमारा समय
अपनी पीढ़ी के कवियों में राधेश्याम तिवारी लगभग अकेले ऎसे कवि हैं जिनकी कविताएं एक साथ गांव एवं शहर - दोनों से हमें जोड़ती हैं। गहरे जीवनानुभवों से उपजी उनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता जीवन के प्रति इनका सकारात्मक नजरिया है। यही कारण है कि बुरे से बुरे समय में भी जीने का रास्ता ये कविताएं तलाश लेती हैं।
अपने शिल्प में ये कविताएं जितनी बोधगम्य लगती हैं भीतर से उतनी ही अर्थ-गर्हित हैं। यही कारण है कि राधेश्याम तिवारी उन कवियों से अलग नजर आते हैं जो सिर्फ शब्दाडम्बर में उलझकर पाठकों को कविता से दूर करते हैं। प्रस्तुत हैं उनकी पांच कविताएं-


राधेश्याम तिवारी की कविताएं

सेवक की इच्छा

सेवक हूं आपका
आपकी बराबरी भला
कैसे कर सकता मैं
आपकी पवित्र जूठन को
मानता हूं महाप्रसाद
छाया की तरह चलता हूं
आपके पीछे-पीछे
आप हंसते हैं, तो मैं हंसता हूं
रोते हैं, तो रोता हूं,
मैं देह नहीं, सिर्फ कंधा हूं
जिस पर आपका
बोझ ढोता हूं
फिर भी जन्म अकारथ ही गया मेरा
कि इस जन्म में मैं सेवा से
कर न सका आपको संतुष्ट
इसके लिए मुझे
लेना पड़ेगा दूसरा जन्म
पर, दूसरा जन्म
कब, कहां, किस रूप में लूंगा
यह भी तो तय
आप ही करेंगे स्वामी
वैसे तो मुझे
अपने बारे में सोचने का
नहीं है अधिकार
फिर भी सोचता हूं
कि कितना अच्छा होता
अगर अगले जन्म में मैं पैदा होता
मछ्ली के रूप
तब आप मुझे
मिर्च-मसाला डालकर
तेल में तलते
और आराम से पीते हुए
मजे ले लेकर खाते
पर, डर है एक बात का स्वामी
कि अपनी तीव्र भूख के कारण
कहीं आप मुझे
कच्चा ही न चबा जाएं
इससे आपका हाजमा
हो सकता है खराब
जिसे शराब
पहले ही बहुत ज्यादा
बिगाड़ चुकी है
अभी तो आपको
बहुत कुछ खाना है स्वामी
आपको कष्ट होगा
तो मेरी आत्मा को
कैसे मिलेगी शांति ?
लेकिन एक डर और है
कि अगर आपने मुझे
ठीक से तल भी लिया
तो भी मेरे
कांटे तो बचे ही रह जाएंगे
जो मौका पाते ही
आपके गले में फस जाएंगे
उस समय आप
मुझे उस तरह नहीं खा पाएंगे
जैसे अभी अजगर की तरह
निगल रहे हैं।


झरही

मेले में भटकी हुई
किसी बच्ची की तरह
अपनी नदी मां से
बिछड़ गई होगी झरही
और भटकते-भटकते
चली आई होगी
'गौत्तमा' और 'बिसुनपुरा' के बीच
यहां जरूर मिली होगी उसे
घर से भागी हुई कोई औरत
जिसके दुःख से
झरने लगी होंगी उसकी आंखें
और तभी से इसका नाम
पड़ गया होगा झरही

कहने को तो यह नदी है
लेकिन संकोची इतनी
कि आसाढ़-सावन में भी
]इसमें कभी बाढ़ नहीं आती
अपने में सिमटी
यह बहती रहती है चुपचाप
जिसे भीतर तक महसूस कराती हैं
गांव-जवार की औरतें

गर्मी में तो रह जाती है
केवल इसकी निशानी
पानी बस इतना
कि धोबी घाट के पाट से
कपड़े पटकने
आती रहे आवाज
झरही को
इतने से संतोष है

झरही घाट का रामचन्दर माझी
गर्मी में अपना जाल समेटकर
चला जाता है परदेश कमाने
जमीन पर पड़ी उसकी नाव को
देखती रहती है उसकी मेहरारू

झरही की मुर्दघटी में
जब जलती है कोई लाश
उस समय मृतक के साथ
आये लोग
झरही को भी कर लेते हैं याद
कि किस तरह यह बार-बार
सूख कर फिर भर जाती है

सोचता हूं
कभी रही से पूछूं
कि कब और कहां से आई हो तुम
और कहां तुमको जाना है
लेकिन यह पूछते हुए
लगता है डर
कि कहीं मेरा ही प्रश्न
उसने कर दिया मेरी ओर
तो क्या दूंगा इसका उत्तर?


लौटकर जब हम आएंगे

लौटकर जब हम आएंगे
तो यही नहीं रहेंगे
उस समय तक हमारे बाल
कुछ सफेद हो चुके होंगे
गालों की लाली भी
कुछ कम हो चुकी होगी
और चलने की गति में भी
कुछ परिवर्तन हो चुका होगा
लेकिन ये परिवर्तन
इस बात पर भी निर्भर करेगा
कि तब तक हमारे घुटने
और दिल का दर्द कैसा है

लौटकर जब हम आएंगे
तो यह भी बतलाएंगे
कि चिकित्सक के निर्देशानुसार
हम भोजन में नमक और चीनी
कितनी मात्रा में ले रहे हैं
लेकिन यह इस बात पर भी
निर्भर करेगा
कि तब तक मधुमेह और रक्तचाप की
क्या स्थिति है

लौटकर जब हम आएंगे
तो जरूरी नहीं कि
आप मुझे देखकर
इसी तरह मुस्कराएंगे
यह इस बात पर भी
निर्भर करेगा कि
तब तक आप के पास
खुशी कितनी बची हुई है

लौटकर जब हम आएंगे
तो उस समय तक
घर के सामने खाली प्लाटों में
बहुत से प्रियजनों के मकान
बन चुके होंगे
उन बड़े-बड़े मकानों में
टेलीफोन भी लग चुके होंगे
लेकिन संवाद इस बात पर
निर्भर करेगा कि तब तक
प्रेम की पूंजी उनके पास
कितनी बची हुई है.


किसी ने भी नहीं मानी उसकी बात

उसने धरती से
सिर्फ अपने लिए मांगी जगह
लेकिन धरती ने
नहीं मानी उसकी बात
और फैला दिया सबके लिए
अपना हरित आंचल,
नदी से उसने कहा-
तुम सिर्फ मेरे लिए बहो
पर, नदी भी कब मानने वाली थी
उसने सबके लिए बहा दिया
शीतल जल,
सूरज से उसने कहा-
मेरे सिवा मत दो किसी और को उजाला
सूरज ने मुस्कराते हुए
बिखेर दिया सबके लिए उजास,
गगन से उसने कहा-
तुम सिमट जाओ मेरी सीमा में
मगर कहां मानने वाला था आकाश
हवा से उसने कहा-
प्रिये, तुम मेरी सांसों में समा जाओ
हवा बिना कुछ कहे ही सरसराती हुई
सबकी सांसों में समा गई
वह जिनसे बना था
उनमें से किसी ने भी नहीं मानी उसकी बात
सबने मिलकर
उसे बनाया था सबके लिए
अंत में वह हो गया इतना अकेला
कि कुछ भी नहीं बचा उसके पास,
न पृथ्वी, न जल, न अग्नि, हवा, न आकाश!

ऎसा भी क्या

आए हो तो
मिलो सबसे जाकर
देखो, कितने सारे लोग हैं यहां
हो सके तो बांटो सबका दुख-दर्द
देखो उन जंगली फूलों को भी
जो मुस्करा रहे हैं तुम्हें देखकर
जिन्हें नहीं है इसका मलाल
कि राष्ट्रपति भवन की वाटिका में
नहीं मिली उन्हें जगह
आए हो तो
इनसे भी कुछ सीख लो
कि किस तरह सबमें
बिखेर रहें हैं सुगंध-केवड़ा, गुलाब और बेला,
ऎसा भी क्या
कि अकेले आए-गए
और जो थोड़े समय के लिए ठहरे हो
उसमें रहना चाहते हो अकेला
0
युवा कवि-पत्रकार राधेश्याम तिवारी का जन्म देवरिया जनपद (उत्तर प्रदेश) के ग्राम परसौनी में मजदूर दिवस अर्थात १ मई, १९६३ को हुआ।

अब तक दो कविता संग्रह - 'सागर प्रश्न' और 'बारिश के बाद' प्रकाशित. हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

सम्पादन - 'पृथ्वी के पक्ष में' (प्रकृति से जुड़ी हिन्दी कविताएं)
पुरस्कार : राष्ट्रीय अज्ञेय शिखर सम्मान एवं नई धारा साहित्य सम्मान .

संपर्क : एफ-119/1, फ़ेज -2,
अंकुर एनक्लेव
करावल नगर,
दिल्ली-110094
मो० न० – 09313565061

कहानी

फ़र्क

सूरज प्रकाश
कुंदन आज बहुत खुश है। आज का दिन उसे मनमाफिक तरीके से मनाने के लिए मिला है। खूब घुमायेगा बच्चों को। पार्क, सिनेमा, चिड़ियाघर। किसी अच्छे होटल में खाना खिलायेगा। आज उसे मारुति वैन चलाते हुए अजब-सा रोमांच हो रहा है। रोज यही वैन चलाता है वह, पर रोज के चलाने और आज के चलाने में फ़र्क महसूस हो रहा है उसे। रोज वह ड्राइवर होता है। हर वक्त सतर्क, सहमा हुआ-सा। बैक व्यू मिरर पर एक आंख रखे। पता नहीं सेठजी कब क्या कह दें, पूछ लें। लेकिन आज के दिन तो वह मालिक बना बैठा है। सेठ जी ने खुद उसे दिन भर के लिए गाड़ी दी है। ``जाओ कुंदन। एक बार तुम कह रहे थे न, कभी बच्चों को घुमाने के लिए गाड़ी चाहिए। ले जाओ। बच्चों को घुमा-फिरा लाओ।'' दो सौ रुपये भी दिये हैं उसे। सेठ कितने अच्छे हैं। आज बेशक एक दिन के लिए सही, उस ज़िंदगी को जी कर देखेगा, जो उसका सपना थी। उसके भीतर का सहमा-सा, हर वक्त बुझा-बुझा रहने वाला मामूली वर्दी-कैप धारी ड्राइवर न जाने कहां फुर्र से उड़ गया है। आज वह सफारी सूट पहने बैठा है।
उसका मन गुनगुनाने को हो रहा है। स्टीरियो चला दिया है उसने। कोई बहुत पुराना गाना। उसके स्कूल के दिनों बहुत बजने वाला। वह मुस्कुराया। डैश बोर्ड पर लगी घड़ी में वक्त देखा। दस बजने को हैं। अब तक सब तैयार हो चुके होंगे, उसने सोचा। कल रात जब उसे सेठजी ने ग़ाड़ी ले जाने के लिए कहा था, तभी उसने कुंती से कह दिया था, दस बजे तक तैयार रखना बच्चों को। सुबह गाड़ी लेने जाते समय फिर से ताकीद कर गया था। एकदम अपटूडेट। सेठ के बच्चों के माफिक। अभी पांच मिनट में वह घर के दरवाजे पर होगा।
गाड़ी के गली में पहुंचते ही, वहां हर वक्त खेलने वाले बच्चों ने गाड़ी को घेर लिया और ज़ोर-ज़ोर से हो-हो करने लगे। दो-एक खिड़कियों में से उत्सुक चेहरे भी टंग गये। आज वह पहली बार गाड़ी घर पर लाया है। शोर सुनकर गप्पू, संजय और पिंकी बाहर निकल आये। वे अभी भी तैयार हो रहे हैं। गप्पू ने स्कूल यूनिफार्म पहनी हुई है और मुचड़ी हुई टाई उसके हाथ में है। संजय ने अपना इकलौता सफ़ारी सूट डाटा हुआ है और पैरों में हैं हवाई चम्पलें। तीनों उसे देखते ही चिल्लाये, ``मम्मी, मम्मी, पापा आ गये, पापा आ गये। अहा, कितनी अच्छी है, पापा की मारुति।'' गप्पू टाई हाथ में लिये-लिये सीधा वैन तक जा पहुंचा और बच्चों को धकियाने लगा, ``हटो, हटो, हमारी कार है यह। पापा आ गये, पापा देखो, संजय मुझे पहले कंघी नहीं करने दे रहा है।'' लगा, जैसे वे पहले से ही लड़ रहे थे। पिंकी बहुत ही शोख रंग की फ्राक पहने हुए है। उसे कुंती पर गुस्सा आया। ``इस औरत को कभी अक्कल नहीं आयेगी। बच्चों को ढंग से तैयार भी नहीं कर सकती।'' बच्चों को एक किनारे ठेल कर वह घर के भीतर वाले हिस्से में आया, जहां रसोई में एक दीवार की आड़ में बने गुसलखाने में कुंती की खटपट सुनायी दे रही है। वह वहीं से चिल्लाया, ``यह क्या तमाशा है, न खुद तैयार हुई हो, न बच्चों को तैयार किया है। अब मैं क्या सारा दिन दरवाजे पर ही टंगा रहूंगा?'' वह वहीं से बोली, ``क्या करती मैं। पानी ही नहीं आया। अभी तक बैठी थी, पानी के इंतज़ार में। नहीं आया तो राजो की मां से मांग कर लायी हूं दो बाल्टी।'' यह कहते-कहते कुंती केवल ब्रेसरी और पेटीकोट पहने, हाथ में गीला तौलिया लिये सामने आ गयी। हालांकि उसका गुसलखाने से बाहर आने का यह रोज़ का तरीका है, लेकिन कुंदन ने कभी इस तरफ ध्यान ही न दिया था। आज उसे इस हालत में देख कर कुंदन के सौन्दर्य बोध को बेतरह ठेस लगी। वह फिर फट पड़ा, ``यह क्या बेहूदगी है, जरा भी शऊर नहीं है तुम्हें?'' कुंती ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और पास ही खड़ी गीले बात तौलिये से फटकारने लगी। कुंदन ने फिर चोर नज़रों से बीवी की तरफ देखा, जो बालों को सुखाने के बाद दोनों हाथ आगे किये हुए ब्लाउज पहन रही थी। कुंदन की निगाह अचानक उसकी बगल के गीले बालों की तरफ चली गयी। उसने मुंह बिचकाया और बाहर वाले कमरे में आ गया।कमरें में आकर उसे समझ में नहीं आया, क्या करे। थोड़ी देर अजनबियों की तरह जेब में हाथ डाले खड़ा रहा। जैसे वह किसी और के घर में मजबूरी में खड़ा हो। तभी गप्पू उससे लिपटता हुआ बोला, ``पापा, मैं तैयार हो गया। गाड़ी में बैठ जाऊं?'' कुंदन ने उसकी तरफ देख लिया। कहा कुछ नहीं। संजय और पिंकी अभी भी बहस कर रहे हैं। कुंदन को लगा, उसका मूड उखड़ रहा है। वह आते समय यही मान कर चल रहा था कि बच्चे बिल्कुल तैयार होंगे। साफ-सुथरे, करीने से कपड़े पहने और यहां...।वह दरवाजे पर आ खड़ा हुआ। सिगरेट सुलगाई और चाबियों का छल्ला घुमाते हुए गली का एक चक्कर लगाने की नीयत से चल पड़ा। गली के बच्चे अभी भी वैन के आस-पास डटे हुए हैं।• जब कुंती बच्चों को लेकर वैन में सवार होने के लिए आयी, तो कुंदन को चारों कार्टून नजर आये। गप्पू ने यूनिफार्म उतार दी है और नेकर-बुश्शर्ट पहन लिये हैं। नेकर-बुश्शर्ट के रंगों का कोई मेल नहीं है। एक हरी, एक लाल। पिंकी ने खूब कस कर बालों की चुटिया बनायी है। चेहरा एकदम खिंचा-खिंचा सा लग रहा है उसका। संजय सफारी में किसी कम्पनी एक्सक्यूटिव की तरह तना-तनाया खड़ा है, लेकिन हवाई चप्पल उसकी सारी हेकड़ी निकाल रहे हैं। उसने एक नज़र कुंती पर डाली। शायद उसने अपनी सबसे भड़कीली साड़ी पहनी है। तेल चुपड़े बाल, मांग में ढेर सारा सिंदूर और कहीं से भी मैच न करती लिपस्टिक। वह कुंती से फिर कोई कड़वी बात कहना चाहता है, लेकिन कुछ कहे बिना ही उसने अपने चेहरे के भावों से मन की बात कह ही दी।
बच्चे वैन के दरवाजे खुलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। तीनों बच्चे पीछे हुड खोलकर वहां बैठने के चक्कर में हैं और पिछले दरवाजे पर खड़े एक-दूसरे को धकिया रहे हैं। गली के बच्चे अब भी थोबड़े लटकाये, मुंह में गंदी उंगलियां ठूंसे इन्हें बड़ी ईर्ष्यालु निगाहों से देख रहे हैं। कुंदन झल्लाया बच्चों पर, हटो परे, सब पिछली सीट पर बैठेंगे। हुड नहीं खुलेगा। बच्चों के चेहरे उतर गये।
कुंदन उन्हें इस तरह पीछे हुड खोल कर बिठा तो देता, लेकिन बेमेल और गंदे कपड़े देखते हुए उसकी हिम्मत नहीं हुई कि खुले हुड से सबको पता चले कि ये गाड़ी के मालिक के नहीं ड्राइवर के बच्चे हैं। तीनों बच्चे लपक कर चढ़ गये। कुंती ने सलीके से साड़ी का पल्लू संभाला और बड़ी ठसक के साथ बगल वाली सीट पर आ विराजी।वैन के चलते ही बच्चे धमाचौकड़ी करने लगे। कुंदन ने अचानक ही ब्रेक लगायी। सभी चौंके, पता नहीं क्या हुआ। कुंदन ने कुंती की तरफ झुक कर दरवाजा ठीक से बंद किया और गाड़ी गियर में डाली। कुंदन का मूड अभी भी ठिकाने नहीं है। उसे लगातार इस बात की कोफ्त हो रही है कि उसने नाहक ही सेठजी का अहसान लिया। ये बच्चे इस लायक नहीं हैं कि गाड़ियों में घूम सकें। अब खुद सेठ की तरह गाड़ी चलाने, बीवी-बचों को सेठ के बच्चों की तरह ऐश करवाने का उसका कत्तई मन नहीं है।•
कभी जिंदगी में उनका भी सपना था, एक बड़ा आदमी बनने का। खूब सारी अच्छी-अच्छी चीज़ें खरीदने, अमीर आदमियों की तरह एकदम बढ़िया कपड़े पहने होटलों में जाने का। एकदम लापरवाही का अंदाज लिये ज़िंदगी जीने का। शुरू-शुरू में उसकी बहुत इच्छा हुआ करती थी कि उसकी बीवी बहुत ही खूबसूरत हो और बच्चे एकदम फर्स्ट क्लास। तमीजदार। फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलने वाले। बचपन उसका बहुत अभावों में बीता था। सुख-सुविधाएं तो दूर, ज़रूरी चीज़ों तक से वंचित।और सपना भी उसका कहां पूरा हो पाया था। आधी-अधूरी छोड़ी हुई पढ़ाई। दसियों तरह के धंधे। साधारण-सी औरत से शादी और कहीं से भी विशिष्ट न बन सकने या लग सकने वाले बच्चे। चाह कर भी वह उनको मनमाफिक ज़िंदगी नहीं दे पाया था। कुछ अरसे से इस सेठ की मारुति वैन चलाने का काम मिल गया है। `उस तरफ की दुनिया' की हसरतें फिर ज़ोर मारने लगी थीं और उसने सेठजी से कह दिया था, एक दिन के लिए गाड़ी देने के लिए।उसके ख्यालों की शृंखला टूट गयी। पिछली सीट से उसके कंधे पर उचक आया गप्पू उससे कार स्टीरियो चलाने के लिए कह रहा है। वह फिर लौट आया अपने खराब मूड में। नहीं चलाया उसने स्टीरियो। गप्पू ने फिर कहा, तो कुंती भी बोली, ``चला दीजिए न'। कुंदन ने भरपूर नज़र से कुंती की तरफ देखा और एक झटके से स्टीरियो ऑन कर दिया। बच्चे गाने की धुन के साथ-साथ उछलने लगे।कुंदन ने फिर डपटा, ``शांति से नहीं बैठ सकते क्या?'' दरअसल इस समय वह कत्तई इस मूड में नहीं है कि ज़रा-सा भी शोर हो। वह उन्हें पुराने दिनों के ख्वाबों में खोया रहना चाहता है। लेकिन सब कुछ उसके खिलाफ चल रहा है। कुंती सब देख रही है। वह साफ महसूस कर रही है कि आज का कुंदन रोज़ वाला कुंदन नहीं है। बार-बार उसे और बच्चों को ऐसे डपट रहा है जैसे उन्हें कभी इस रूप में देखा ही न हो। उसे क्या पता नहीं, बच्चों के पास कैसे और कौन-से कपड़े हैं। य सोच-सोच कर अपना खून जला रहा है कि उसके बच्चे सेठ के बच्चों जैसे क्यों नहीं हैं। कुंती अनमनी-सी सड़क की तरफ देखने लगी।
वैन जू के गेट पर रुकी। बच्चे अभी सहमे हुए हैं। वे कुंदन से आंखें चुरा रहे हैं। उसने दरवाजे खोले तो डरते-डरते उतरे। कुंदन को लगा, उससे कुछ ज्यादती हो गयी है। गाड़ी पार्क करके उसने टिकट लिये और बच्चों को धौल-धप्पा करके दौड़ा दिया। बच्चे फिर किलकारियां भरते पिंजरों की तरफ भागे।
कुंदन और कुंती धीरे-धीरे चलने लगे। कुंदन ने गॉगल्स पहन लिये और चाबियों का छल्ला घुमाने लगा। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल रहा है। आज छुट्टी का दिन नहीं है, फिर भी चिड़ियाघर में चहल-पहल है। बच्चे थक जाते हैं तो रुक कर इन दोनों का इंतज़ार करने लगते हैं। उन्होंने जब बताया कि प्यास लगी है तो कुंदन ने सबको कोल्ड ड्रिंक्स पिलवाये।जू दिखाने के बाद कुंदन उन्हें हैंगिंग गार्डेन ले गया। वहां तेजी से रपटते हुए पिंकी गिरी और अपने घुटने, कोहनियां छिलवायी। फ्रॉक खराब हुई सो अलग। बजाय बच्चे को संभालने, पुचकारने के, कुंदन फिर बड़बड़ाने लगा, ``ढंग से चल भी नहीं सकते। जब देखो गंदे बच्चों की तरह कूदते-फांदते रहेंगे।'' कुंती ने तुरन्त पिंकी को संभाला और कुंदन पर बरस पड़ी, ``अब ये तो नहीं कि बच्ची गिर गयी है, उसे संभालें, पुचकारें, बस तब से लट्ठ लेकर पीछे पड़े हैं,'' उसने पिंकी को दुलारते हुए अपनी गोद में उठाया और उसकी चोटें सहलाने लगी। कुंदन पिंकी के नज़दीक ही था, जब वह गिरी, लेकिन अपना सफ़ारी खराब होने के चक्कर में उसे नहीं उठाया उसने।
हैंगिंग गार्डन से चौपाटी आते समय सब एकदम चुप हैं। तीनों बच्चों को भूख लगी है। सामने स्टाल भी है, लेकिन हिम्मत नहीं हुई कुछ मांगें। बस ललचाई निगाहों से वे खाने-पीने का सामान देखते रहे। कुंदन आगे-आगे चलता रहा। बिना इस बात की परवाह किये कि उन्हें कुछ दिलवा दे।
मछली घर देखते-देखते तीनों बच्चे भूख और थकान से निढाल हो रहे हैं। सुबह जो कुछ खाकर चले थे, तब से एक-एक कोल्ड ड्रिंक पिया है, सबने। यहां भी कुंदन का ध्यान इस ओर कत्तई नहीं है कि बच्चों को कुछ दिलवा दे। कुंती समझ नहीं पा रही, कुंदन ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है। कल तक तो भला-चंगा था। कल रात कितना उत्साहित था, बच्चों को घुमाने के लिए। और आज सुबह से उसके और बच्चों के पीछे पड़ा है। ``कपड़े गंदे क्यों हैं?'' ``ढंग से तैयार क्यों नहीं हुए?'' ``शऊर नहीं है, कुछ खाने का, जैसे कुछ देखा नहीं है, नदीदे कहीं के।'' अरे तुमने ज़िंदगी में कुछ दिखाया होता तो देखा होता। कभी इस तन को पहने हुए जोड़े के अलावा दूसरा ढंग को जोड़ा नसीब नहीं हुआ, और कहता है, ``ढंग के कपड़े क्यों नहीं पहने। मैं ही जानती हूं, जैसे-तैसे लाज रखे हुए हूं। घर की गाड़ी खींच रही हूं। माना, आज एक दिन के लिए सेठ ने तुम्हें गाड़ी दे दी है, हमें घुमाने-फिराने के लिए पर इसका ये मतलब तो नहीं कि तुम लाट साहब हो गये, गाड़ी चलाते-चलाते और हम फटीचर ही रह गये। कुंती कुढ़े जा रही है, अब ड्राइवर के बच्चे सेठ के बच्चे तो नहीं बन सकते न, अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले कि एक बार में मान जायें। आखिर बच्चे ही तो हैं। पहली बार घूमने निकले हैं। थोड़ा बिगड़-बिफर गये तो क्या? बेकार ही आये, अगर पहले पता होता कि कुंदन यह हाल करेगा तो...।''
बच्चे अलग कुढ़ रहे हैं। आज पहली बार गाड़ी लाये हैं और रौब मार रहे हैं दुनिया भर का। अब कभी नहीं बैठेंगे पापा की गाड़ी में। तीनों रुआंसे-से बैठे हुए हैं। अबकी बार संजय को चपत लगी है, अपनी चप्पलों से सीट खराब करने के चक्कर में। वही सबसे ज्यादा उत्साहित था सुबह और इस समय वहीं सबसे अधिक उखड़ा हुआ बैठा है।सबको बहुत हैरानी हुई जब कुंदन ने एक एयरकंडीशंड और अच्छे रेस्तरां के आगे गाड़ी रोकी। शायद वह दिन भर की कसर यहीं पूरी करना चाहता है। बच्चे, चमत्कृत होकर भीतर की सज्जा देखने लगे। कुंती भरसक प्रयास करने लगी, सहज दिखने की, जैसे यहां आना उनके लिए कत्तई नयी बात न हो। कुंदन खुद ऐसा ही दिखाने की कोशिश कर रहा है जैसे इस तरह की जगहों में उसका रोज़ का आना-जाना हो, लेकिन साफ लग रहा है, वह खुद पहली बार आया है यहां। आस-पास की मेजों पर खूब शोर है। लोग खुल कर ठहाके लगा रहे हैं, लेकिन ये सब बिल्कुल काना-फूसी के स्वर में बातें कर रहे हैं। गप्पू, पिंकी और संजय आपस में खुसुर-पुसुर करके माहौल से परिचय पा रहे हैं।
मीनू देखते ही कुंदन चकरा गया है। चीजों के दाम उसकी उम्मीद से बहुत अधिक हैं। दूसरी परेशानी यह है कि उसे पता नहीं चल पा रहा कि ये चीजें हैं क्या? कभी नाम भी नहीं सुने थे, ऐसे व्यंजनों से भरा पड़ा है मीनू। टाईधारी स्टुअर्ट ऑर्डर लेने के लिए सिर पर आ खड़ा हुआ। कुंदन ने थोड़ा समय मांगने की गरज से उसे टरकाया और कुंती से फुसफुसा कर कहा, ``यहां तो चीजें बहुत महंगी हैं, क्या करें?'' कुंती ने उसे सलाह दी, ``दो-तीन दाल-सब्जियां मंगा लो किसी तरह मिल-बांट कर खा लेंगे।'' कुंदन ने किसी तरह हकलाते हुए सबसे कम कीमत वाली दाल-सब्जियों का ऑर्डर दिया और राहत की सांस ली। ए.सी. रेस्तरां में भी उसे पसीना आ रहा है। वेटर छुरी-कांटे सजा गया है। बच्चे उन्हें उलट-पुलट कर देख रहे हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा, इनसे कैसे खाना खायेंगे।
सुबह से यह पहली बार है कि कुंदन बीवी-बच्चों से आंखें चुरा रहा है। वह खुद को इस माहौल में एडजस्ट नहीं कर पा रहा। बार-बार पसीना पोंछता, यही कहता रहा है, बहुत गर्मी है। सबने मुश्किल से खाना खाया है। हौले-हौले। चुपचाप। अभी भी वे अजनबियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। खाने के बाद जब वेटर फिंगर वाउल लाया, तो किसी को समझ नहीं आया, इनका क्या करना है। गुनगुना पानी और उसमें तैरते नीबू के कतरे। सबने कुंदन की तरफ देखा। वह खुद सकपका रहा है, क्या करे इसका। संजय ने कुछ सोचा, झट से नीबू निचोड़ा और गटक कर पानी पी गया। गप्पू और पिंकी भी यही करने वाले थे, तभी पास खड़े वेटर ने उन्हें बताया, यह पानी पीने के लिए नहीं, उंगलियों पर लगा तेल, घी, हटाने और धोने के लिए हैं। कुन्दन का चेहरा विद्रूपता से एकदम काला होने लगा। उसे लगा, भरे बाज़ार में उसे नंगा कर दिया गया है। उससे भी अदने आदमी द्वारा आज उसे उसकी औकात दिखा दी गयी है। उसने सिर ऊपर उठाये बिना हाथ धोये और बिल लाने के लिए कहा।खाना खाकर बाहर निकलते समय सबके मूड उखड़े हुए हैं। गप्पू चिंहुक रहा है, क्योंकि आइसक्रीम न दिलवाये जाने के कारण वह बुक्का फाड़ कर रो पड़ा था और कुंदन ने बिना देर किये उसे एक चांटा रसीद कर दिया। कुंती की शिकायत है, ऐसे होटल में क्यों लाये जहां पैसे तो ढेर सारे लगे, खाने में जरा भी मज़ा नहीं आया। इसी बात पर कुंदन फिर भड़क गया है, ``जैसे मैं यह सब अपने लिए कर रहा हूं। तुम्हीं लोगों को घुमाने-फिराने के लिए सेठ का अहसान लिया और यहां यह हाल है...''``हमें पता होता कि इस तरह गाड़ी का रौब मार कर हमारी पत उतारोगे तो आते ही नहीं। देखो तो ज़रा, कितने ज़रा-ज़रा से मुंह निकल आये हैं बेचारों के।'' गप्पू अब आगे आया है, मां की गोद में, ``अगर एक आइसक्रीम दिलवा देते उसे तो क्या घट जाता?'' कुंती गप्पू को चुप कर रही है।
``हां दिलवा देता आइसक्रीम, देखा नहीं कितनी महंगी थी आइसक्रीम और बाकी चीजें। बाहर आकर मांग लेता, दिलवा भी देता, वह तो वहीं चिल्लाने लगा, नदीदों की तरह। अरे कोई देखे तो कया समझे?''
``हां कोई देखे तो यही समझे कि कोई बड़े लाट साहब अपने ड्राइवर के गलीज बच्चों को घुमा रहे हैं शहर में। अरे इतना ही शौक था किसी बालकटी बीवी का और टीम टाम वाले बच्चों का, तो क्यों नहीं कह दिया सेठ को अपने, लौंडिया ब्याह दी होती अपनी। हमारी जान के पीछे क्यों पड़े हो। जाहिल हैं, गंवार हैं हम तो। हमें तो गाड़ियों में घूमने का न तो शऊर है और न ही शौक। कहीं नहीं जाना अब हमें। छोड़ दो घर पर। बहुत हो गया।'' कुंती का पारा भी चढ़ गया है।बात तू-तू मैं-मैं से हाथा पाई तक पहुंचती, इससे पहले कुंदन ने इसी में खैरियत समझी कि उन्हें घर पर छोड़े। गाड़ी सेठ के हवाले करे और कहीं बैठ दारू पिये। अभी सिर्फ तीन ही बजे हैं और गाड़ी उसने सात-आठ बजे तक लौटाने के लिए कह रखा है।

सेठजी कुंदन को देखते ही चौंके, ``क्या बात है, इतनी जल्दी लौट आये। अच्छी तरह घूमा-फिरा दिया न बच्चों को?'' इससे पहले कि कुंदन कुछ कह पाता, अचानक जैसे उन्हें कुछ याद आया; बोले, ``ऐसा करो, घर चले जाओ। मेम साहब की बहनें आयी हुई हैं, बच्चों के साथ। सब लोग उनकी कार में नहीं आ पायेंगे। तुम वैन ले जाओ और वे जहां कहें, घुमा लाओ सबको। मैं फोन कर देता हूं, ठीक।''कुंदन अब फिर ड्राइवर बन चुका है। ``यस सर'' कहकर बाहर आ गया। मूड अब भी संवरा नहीं है। कहां तो सोच रहा था, दारू पियेगा कहीं आराम से बैठ कर, और यहां फिर ड्यूटी लग गयी, शहर भर के चक्कर काटने की। बेकार ही यहां आया, सोचा उसने, ``गाड़ी लौटाने शाम को ही आना चाहिए था।''
सेठजी के घर पहुंचा तो कोई तैयार नहीं था वहां। अपने आने की खबर दे कर वापिस वैन में आ गया। वहीं बैठा लगातार सिगरेट फूंकता रहा। कोई घंटे भर बाद सब लोग नीचे आये। तीन महिलाएं, एक पुरुष, ढेर सारे बच्चे। शायद सात-आठ। एक बड़ी लड़की। कुंदन ने सबको नमस्कार किया, जिसका उसे कोई जवाब नहीं मिला। एस्टीम मेम साहब ने खुद निकाली। उनकी बहनें, जवान लड़की, दो बड़े लड़के उसी में बैठे। वैन की तरफ सभी बच्चे लपके। तीनों दरवाजे भड़भड़ा कर खोले गये और सारे बच्चे पीछे हुड खोलकर वहां बैठने के लिए झगड़ने लगे। कुंदन अपनी सीट छोड़ कर नीचे आया। उसने देखा, सभी बच्चों ने रंग-बिरंगे कपड़े पहने हुए हैं। किसी की नेकर कहीं जा रही है, तो किसी की टी शर्ट झूल रही है। सभी बच्चे पीछे बैठने के लिए उतावले हैं। आखिर उन सज्जन ने किसी तरह समझौता करवाया उनमें कि जो बच्चे जाते समय पीछे बैठेंगे, वापसी में वे आगे बैठेंगे।
कुंदन किनारे पर खड़ा सब देख रहा है। अचानक उसकी निगाह वैन के अन्दर गयी। सभी बच्चों ने गंदे जूते-चप्पलों से सीटें बुरी तरह खराब कर दी हैं। उसकी मुट्ठियां तनने लगीं, लेकिन जब उसके कानों ने ``चलो ड्राइवर'' का आदेश सुना तो चुपचाप अपनी सीट पर आकर बैठ गया और एस्टीम के आगे निकलने का इन्तज़ार करने लगा। आदेश हुआ, ``पहले हैगिंग गार्डन चलो।'' वे सज्जन उसकी बगल वाली सीट पर बैठ गये। बच्चे अभी गुलगपाड़ा मचाए हुए हैं। वैन के चलते ही किसी बच्चे ने उसे एकदम रूखी आवाज में आदेश दिया, ``ड्राइवर, स्टीरियो ऑन करो'' उसने पीछे मुड़ कर देखा, आदेश देने वाला लड़का गप्पू की उम्र का ही रहा होगा सींकिया-सा। अचानक उसे सुबह गप्पू का कहा वाक्य याद आया, कैसे मिमिया कर कह रहा था, ``पापा स्टीरियो बजाओ ना,'' लड़के की आवाज फिर गूंजी, ``सुना नहीं ड्राइवर, स्टीरियो चलाओ।'' वह तिलमिलाया। चुपचाप स्टीरियो चला दिया। सभी बच्चे चिल्लाने लगे। उसने कनखियों से साथ वाली सीट पर बैठे साहब को देखा। उन पर बच्चे की टोन का कोई असर नहीं हुआ है। हैंगिग गार्डन तक पहुंचते-पहुंचते बच्चों ने शोर मचा-मचा कर, गंदी जुबान में बातें करते हुए उसकी नाक में दम कर दिया। वह किसी तरह खुद पर नियंत्रण रखे हुए है। बार-बार उसका जी चाह रहा है, गले पकड़ कर धुनाई कर दे सब बच्चों की अभी। ज़रा भी तमीज नहीं है। मां-बाप कुछ भी नहीं सिखाते इन्हें। देखो तो, कैसे शह दे रहे हैं अपने बच्चों को।हैंगिंग गार्डन पहुंचते ही सब बच्चे कूदते-फांदते भाग निकले, सेठानी और उनके मेहमान टहलते हुए उनके पीछे चले। उसका मूड फिर उखड़ गया है। अचानक उसे ख्याल आया, पिछली सीट बहुत गंदी कर दी है बच्चों ने। वह एक कपड़ा गीला करके लाया और रगड़ -रगड़ कर सीटें पोंछने लगा। उसे याद आया, उसके अपने बच्चे भी तो तीन-चार घंटे बैठे रहे हैं इसी गाड़ी में तब तो एक दाग भी नहीं लगा था सीटों पर। संजय को सीट पर सिर्फ चप्पल रखने पर भी डांटा था उसने। सीटें साफ करते समय उसने सोचा, नाहक ही इतनी मेहनत कर रहा है। थोड़ी देर बाद बच्चों ने इनका फिर यही हाल कर देना है।
जब सब लोग हैंगिंग गार्डेन से निकले तो एक बच्चे के कपड़े बुरी तरह गंदे हैं और घुटने छिले हुए हैं। कहीं गिर-गिरा गया होगा, कुंदन ने सोचा। उसे उस सज्जन ने गोद में उठा रखा है और बार-बार पुचकार रहे हैं। गाड़ियों में सवार होने से पहले सारा काफिला रेस्तरां की तरफ बढ़ गया।हैंगिंग गार्डेन से सब लोग चौपाटी की तरफ चले। इस बार वह लड़की वैन में आ गयी है। बड़े अजीब-से कपड़े हैं उसके। घुटनों तक टी शर्ट। बहुत ही मैली चीकट जींस और बाथरूम स्लीपर्स। वह बार-बार आंखें मिचमिचा रही है और बबलगम चुभला रही है। कुंदन को बबलगम से बहुत चिढ़ है। खास कर ये बच्चे जब बबलगम मुंह में फुलाकर पच्च की आवाज करते हुए फोड़ देते हैं। उसे बराबर यह डर बना रहा कि यह लड़की बबलगम कहीं गाड़ी में न चिपका दे।कुंदन का डर सही निकला। चौपाटी पर उतरते समय लड़की के मुंह में चुंइगम नहीं हैं। सबके दूर जाते ही उसने तुंत गाड़ी की पिछली सीटों वाली जगह पर देखा। चुंगम दरवाजे की फोम पर टिकुली-सा चिपका हुआ है। कुंदन की आंखों में अजीब रंग आने-जाने लगे। जी में आया, ईंट का टुकड़ा उठा कर सिर पर दे मारे उसके। ``ये बच्चे तो सचमुच ही मेरे बच्चों से भी गये-गुज़रे हैं। मैं फालतू में ही सारा दिन अपने बच्चों के पीछे पड़ा रहा कि उन्हें मैनर्स नहीं है।''उसे अपने आप पर बहुत शर्मिंदगी होने लगी। चुपचाप अपनी सीट पर आकर बैठ गया और शीशा चढ़ा दिया। एकदम उदास हो गया। कितने बड़े भ्रम में था वह अब तक। उस तरफ की दुनिया। ऊहं!!उसने तय किया कि रात को घर जाते समय बच्चों के लिए खाने की ढेर सारी चीज़ें और खिलौने ले जायेगा।


00
१४ मार्च १९५२ को देहरादून (उत्तर प्रदेश - अब उत्तरांचल) में जन्में वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश ने पत्रकारिता में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की. १९८७ से नियमित लेखन. अब तक अनेक पुस्तकें, जिनमें -- अधूरी तस्वीर, छूटे हुए लोग तथा साचा सर्नामे (गुजराती में) (कहानी संग्रह) , हादसों के बीच, और देश बिराना (उपन्यास), जरा संभल के चलो (व्यंग्य संग्रह) आदि प्रमुख हैं. अनुवादक के रूप में सूरज प्रकाश ने अपनी एक अलग पहचान बनायी है और अंग्रेजी तथा गुजराती से अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के अनुवाद किये हैं, जिनमें प्रमुख हैं : एनिमल फार्म (जॉर्ज आर्वेल), क्रॉनिकल ऑफ ए डैथ फोरटोल्ड(गैब्रियल गार्सिया मार्खेज़), ऎन फ्रैंक की डायरी (ऎन फ्रैंक), चार्ल्स चैप्लिन की आत्मकथा (चार्ल्स चैप्लिन), तथा अनेक अनेक कालजयी कहानियां. गुजराती लेखक - दिनकर जोशी और विनोद भट्ट की रचनाओं के अनुवाद के साथ बम्बई-१(बम्बई पर आधारित कहानियों का विशिष्ट संग्रह) और 'कथा लन्दन (इंगलैंड में लिखी जा रही हिन्दी कहानियों का संग्रह) के सम्पादन.

पुरस्कार : गुजरात साहित्य अकादमी का पहला कथा सम्मान(१९९४) और महाराष्ट्र राज्य हिन्दी अकादमी का प्रेमचन्द कथा सम्मान(२०००) .
सम्प्रति : रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत.
सम्पर्क : एच-१/१००१, रिद्धि गार्डन, फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व,
मुम्बई-४०००९७
मोबाईल नं० – ०९८६००९४४०२

अगला अंक

वातायन- जून 2008
‘हम और हमारा समय’ के अंतर्गत हरिपाल त्यागी का आलेख – “मैं क्यों लिखता हूँ?” और तेजेन्द्र शर्मा की कहानी- “अभिश्प्त” ।

रविवार, 6 अप्रैल 2008

वातायन- अप्रैल,2008

हम और हमारा समय

हिंदी कथाकार-कवि सुभाष नीरव की कहानियाँ जहाँ घर, परिवार और समाज में मरती हुई संवेदनाओं पर गहरी चिंता प्रकट करती हैं, वहीं उनकी कविताएं भी व्यक्ति, समाज और देश के विद्रूप चेहरों को चीन्हने का काम करती प्रतीत होती हैं। सुभाष नीरव के अब तक तीन कहानी-संग्रह- “दैत्य तथा अन्य कहानियाँ”(आत्माराम एंड संस), “औरत होने का गुनाह”(मेधा बुक्स) तथा “आख़िरी पड़ाव का दु:ख”(भावना प्रकाशन), दो कविता-संग्रह – “यत्किंचित” और “रोशनी की लकीर”, एक बाल कहानी संग्रह – “मेहनत की रोटी” आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हिंदी में मौलिक लेखन के साथ-साथ गत कई वर्षों से अनुवाद कार्य में भी संलग्न रहे हैं। पंजाबी से हिंदी में इनके द्वारा अनूदित 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें “काला दौर”, “छांग्या रुक्ख(दलित आत्मकथा)”, “कथा पंजाब” और “कुलवंतसिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ”, पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं” और “रेत(उपन्यास)” प्रमुख हैं। इन दिनों नेट पर “सेतु साहित्य”, “वाटिका”, “साहित्य सृजन” और “गवाक्ष” नाम से अपने चार साहित्यिक-वैचारिक ब्लागों के कारण काफी चर्चा का विषय बने हुए हैं। “हम और हमारा समय” के अंतर्गत प्रस्तुत हैं - हमारे समय और समाज के सच को रेखांकित करती सुभाष नीरव की पाँच कविताएं…
सुभाष नीरव की पाँच कविताएं

(1) बधाइयों की भीड़ में

‘जब न मिलने के आसार बहुत हों
जो मिल जाए, वही अच्छा है’
एक अरसे के बाद
सुनने को मिलीं ये पंक्तियां
उनके मुख से
जब मिला उन्हें लखटकिया पुरस्कार
उम्र की ढलती शाम में
उनकी साहित्य-सेवा के लिए ।

मिली बहुत–बहुत चिट्ठियाँ
आए बहुत-बहुत फोन
मिले बहुत-बहुत लोग
बधाई देते हुए।

जो अपने थे
हितैषी थे, हितचिंतक थे
उन्होंने की जाहिर खुशी यह कह कर
‘चलो, देर आयद, दुरस्त आयद
इनकी लंबी साधना की
कद्र तो की सरकार ने ...
वरना
हकदार तो थे इसके
कई बरस पहले ... ।’

जो रहे छत्तीस का आंकड़ा
करते रहे ईर्ष्या
उन्होंने भी दी बधाई
मन ही मन भले ही वे बोले
‘चलो, निबटा दिया सरकार ने
इस बरस एक बूढ़े को ...’

बधाइयों के इस तांतों के बीच
कितने अकेले और चिंतामग्न रहे वे
बत्तीस को छूती
अविवाहित जवान बेटी के विवाह को लेकर
नौकरी के लिए भटकते
जवान बेटे के भविष्य की सोच कर
बीमार पत्नी के मंहगे इलाज, और
ढहने की कगार पर खड़े छोटे-से मकान को लेकर ।

जाने से पहले
इनमें से कोई एक काम तो कर ही जाएं
वे इस लखटकिया पुरस्कार से
इसी सोच में डूबे
बेहद अकेला पा रहे हैं वे खुद को
बधाइयों की भीड़ में ।

(2) बेहतर दुनिया का सपना देखते लोग

बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग इस दुनिया में
जो चढ़ते सूरज को करते हैं नमस्कार
जुटाते हैं सुख-सुविधाएं और पाते हैं पुरस्कार ।

बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग
जो देख कर हवा का रुख चलते हैं
जिधर बहे पानी, उधर ही बहते हैं ।

बहुत अधिक गिनती में हैं ऐसे लोग
जो कष्टों-संघर्षों से कतराते हैं
करके समझौते बहुत कुछ पाते हैं ।

कम नहीं है ऐसे लोगों की गिनती
जो पाने को प्रवेश दरबारों में
अपनी रीढ़ तक गिरवी रख देते हैं ।

रीढ़हीन लोगों की इस बहुत बड़ी दुनिया में
बहुत कम गिनती में हैं ऐसे लोग जो
धारा के विरुद्ध चलते हैं
कष्टों-संघर्षों से जूझते हैं
समझौतों को नकारते हैं
अपना सूरज खुद उगाते हैं ।

भले ही कम हैं
पर हैं अभी भी ऐसे लोग
जो बेहतर दुनिया का सपना देखते हैं
और बचाये रखते हैं अपनी रीढ़
रीढ़हीन लोगों की भीड़ में ।

(3) जब मुझे

जब मुझे रास्ते की ज़रूरत थी
खड़ीं की तुमने दीवारें
खोदीं खाइयाँ।

जब मुझे ज़रूरत थी आलोक की
तुमने धकेल दिया
अंधी गुफाओं में।

जब मुझे ज़रूरत थी प्यार की
मेरे तलुवों के नीचे
बिछा दिया तुमने
नफ़रत का तपता रेगिस्तान।
सोचता हूँ
जो न तुम
खड़ीं करते दीवारें
न खोदते खाइयाँ
न धकेलते मुझे अंधी गुफाओं में
न बिछाते तपता रेगिस्तान
समझ कहाँ पाता
संघर्ष किस चिड़िया का नाम होता है
और मंजिल पाने का
सुख क्या होता है
संघर्ष के बाद।

(4) शिखरों पर लोग

जो कटे नहीं
अपनी ज़मीन से
शिखरों को छूने के बाद भी
गिरने का भय
उन्हें कभी नहीं रहा।

जिन्होंने छोड़ दी
अपनी ज़मीन
शिखरों की चाह में
वे गिरे
तो ऐसे गिरे
न शिखरों के रहे
न ज़मीन के।

(5) कविता मेरे लिए

कविता की बारीकियाँ
कविता के सयाने ही जाने।

इधर तो
जब भी लगा है कुछ
असंगत, पीड़ादायक
महसूस हुई है जब भी भीतर
कोई कचोट
कोई खरोंच
मचल उठी है कलम
कोरे काग़ज़ के लिए।

इतनी भर रही कोशिश
कि कलम कोरे काग़ज़ पर
धब्बे नहीं उकेरे
उकेरे ऐसे शब्द
जो सबको अपने से लगें।

शब्द जो बोलें तो बोलें
जीवन का सत्य
शब्द जो खोलें तो खोलें
जीवन के गहन अर्थ।

शब्द जो तिमिर में
रोशनी बन टिमटिमाएं
नफ़रत के इस कठिन दौर में
प्यार की राह दिखाएं।

अपने लिए तो
यही रहे कविता के माने
कविता की बारीकियाँ तो
कविता के सयाने ही जाने।

संपर्क : 248, टाईप-3, सेक्टर-3
सादिक़ नगर, नई दिल्ली-110049
दूरभाष : 09810534373
ई-मेल : subhneerav@gmail.com

जीवनी

ऑकलैंड के समाजवादी पुत्र- श्रमिक लेखक - जैक लंडन
रूप सिंह चन्देल


महान अमेरिकी लेखक जैक लंडन का जन्म सैनफ्रांसिस्को (कैलीफोर्निया) की मार्केट स्ट्रीट में १२ जनवरी, १८७६ को हुआ था. जन्म के समय उनका नाम जॉन ग्रिफिथ चेनी था. ऎसा मना जाता है कि वह यायावर ज्योतिषी और पत्रकार विलियम चेनी की जारज़ संतान थे, जिन्होनें उनकी मां फ्लोरा, जो एक आध्यात्मवादी महिला थीं, से उनके जन्म से पूर्व ही संबध विच्छेद कर लिए थे. फ्लोरा ने जैक के जन्म के आठ माह पश्चात जॉन लंडन, जो भूतपूर्व सैनिक थे, से विवाह किया. जॉन कुछ समय पहले ही सैन फ्रांसिस्को आए थे. बीस-बाइस वर्ष की आयु तक जैक को अपने जन्म की वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं थी. उनकी किशोरावस्था का अधिकांश कैलीफोर्निया के ऑकलैण्ड के तटीय भाग में व्यतीत हुआ. उन्हें सुव्यवस्थित शिक्षा न के बराबर प्राप्त हुई. प्रारंभ में, वह आठवीं स्तर तक ही विद्यालय जा पाये थे, हालांकि उन्हें पढ़ने की उत्कट लालसा थी. अपनी उस लालसा की पूर्ति उन्होनें पब्लिक पुस्तकालयों में, विशेषरूप से 'ऑकलैण्ड पब्लिक पुस्तकालय' में जाकर किया और बाद में कैलीफोर्निया के पहले राजकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए. अंतिम दशक के मध्य में (१८९० के बाद) जैक ने ऑकलैण्ड के हाईस्कूल में प्रवेश लिया और स्नातक बने.
जैक ने जीवन के अनेक क्षेत्रों में व्यापक अनुभव प्राप्त किया था. उन्होनें मजदूर, फैक्ट्री श्रमिक, सैनफ्रंसिस्को समुद्र खाड़ी में शुक्ति (सीप) दस्युता, कैलीफोर्निया के मत्स्य गश्तीदल के सदस्य, नाविक, रेलमार्ग मजदूर, क्लोण्डाइक (कनाडा १८९७-९८) में सोने की खोज आदि काम किए. किशोरावस्था में कॉक्सी आर्मी के प्रसिद्ध वाशिगंटन डी.सी. प्रयाण के समय उसमें शामिल हुए और बाद में इरी काउण्टी, न्यूयार्क में आवारागर्दी करते हुए गिरफ्तार हुए . एक पत्रकार के रूप में जैक ने १९०४ में रूस-जापान युद्ध का हर्स्ट समाचार पत्र के लिए रिपोर्टिंग की थी और १९१४ में उन्होनें मैक्सिकन क्रान्ति को कॉलियर के लिए 'कवर' किया था. देशाटन के दौरान वह समाजवाद से परिचित हुए जो वर्षों उनके कर्म और चिन्तन का विषय रहा. उनके भावपूर्ण समाजवादी नुक्कड़ भाषणों के कारण उन्हें ऑकलैण्ड का 'समाजवादी पुत्र' कहा जाता था. समाजवादी पार्टी प्रत्याशी के रूप में अनेक बार वह मेयर का चुनाव लड़े और असफल रहे थे.
१९०० में जैक ने अपनी गणित की शिक्षिका और मित्र बेस मैडर्न से विवाह किया . यह ठेठ विक्टोरियन शादी थी जो प्रेमाधारित नहीं बल्कि अच्छे शिष्टाचार पर आधारित था. बेस से उन्हें दो बेटियां - जोन और बेस (बेकी) थीं. १९०३ में बेस से संबन्ध विच्छेद के बाद उन्होनें अपनी सेक्रेटरी चर्मियन किट्रेज से विवाह किया जिससे उन्हें वास्तविक प्रेम प्रप्त हुआ. वे साथ-साथ खेलते, यात्राएं करते, लिखते और जीवन का आनंद लेते. चर्मियन से उन्हें एक पुत्र हुआ, जो केवल अड़तीस घण्ट ही जीवित रहा था.
१९०७ में चर्मियन के साथ जैक ने स्नार्क में प्रशांत महासागर से द्क्षिणी समुदों की यात्रएं की जो उनके उपन्यास 'क्रूज आफ द स्नार्क' का आधार बना. चर्मियन के सहयोग से उन्होनें कैलीफोर्निया के ग्लेन ब्लेन में १४०० एकड़ जमीन में खूबसूरत फारम विकसित किया. जैक की मृत्यु के समय वह अनेक शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त थे, जिसमें पेट की गड़बड़ और किडनियों का काम करना बंद कर देना शामिल थे. उनके मृत्यु प्रमाण पत्र में उनकी मृत्यु का कारण 'यूरेमिक विषाक्तता' (प्वायजनिगं) लिखा गया था .
जैक लंडन अपने समय बहुचर्चित व्यक्ति थे. अपने भाषणों में वह समाजवाद और महिलाओं के मताधिकार की बात अवश्य करते थे. वे उन प्रारंभिक 'सेलेब्रिटीज' में से एक थे जिन्होनें व्यावसायिक उत्पादों, जैसे अंगूर जूस और पुरुषों के सूटिंग्स आदि के विज्ञापनों के लिए अनुबन्ध किए थे.
युवा जैक लंडन की विशिष्ट तेजस्विता, आशावादी उत्फुल्ल व्यक्तित्व और अनेक जीवनानुभव संभवतः संयुक्त रूप से सेवा और उत्तर जीवन के श्रमिक दर्शन में परिवर्तित हुए थे. वह अपने सद्गुणों और सिद्धान्तों के कारण अपने पाठकों के लिए आदर्श बन गए थे और देश के पहले श्रमिक लेखक के रूप में पहचान बनाई थी.
एक बार एक लेखक के रूप में सफलता प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय करने के बाद, अपनी अध्यवसायी प्रकृति और अंतर्निष्ठ कौशल के बल पर जैक संदर्भ और अंतर्वस्तु दोनों में अपने समकालीन साहित्यकार मित्रों में शीर्ष स्थान पर पंहुचे थे. उन्होनें एक हजार शब्द प्रतिदिन लिखने का कठोर नियम का पालन किया और अठारह वर्षों के निरंतर लेखन करते हुए प्रभूत मात्रा में उच्च कोटि का साहित्य सृजित किया. वह अपने समय के अमेरिका के सर्वाधिक चर्चित, उच्चतम पारिश्रमिक पाने वाले और बहुत बिकने वाले लेखक थे. वह बहु आयामी सर्जक थे… अनेक विधाओं में उन्होनें कार्य किया. उनकी इक्यावन पुस्तकें और सैकड़ों आलेख प्रकाशित ही थे. हजारों की संख्या में उन्होनें पत्र लिखे थे. उनका सृजित बहुत-सा कार्य उनके मर्णोंपरान्त प्रकाशित हुआ था. उनकी बहुचर्चित पुस्तकों में - 'कॉल आफ दि वाइल्ड' (मूल शीर्षक स्लीपिगं वुल्फ १९०३ में प्रकाशित), दि आयरन हील, ह्वाइट फैंग, दि सी वुल्फ (जिसका मूल शीर्षक था - मर्सी आफ दि सी), दि पीपल आफ दि अबिस (लंदन की मलिन बस्तियों पर समातवैग्यानिक शोध प्रबन्ध पुस्तक), जॉन बर्लेकार्न, मार्टिन ईडेन, और 'दि स्टर रोवर'. उनकी खानी 'टु बिल्ड अ फायर' को युगान्तरकारी रचना माना गया था. उनका साहित्य दर्जनों भाषाओं में अनूदित हुआ और आज पूरे विश्व मेम समादर के साथ पढ़ा जता है. इस अमेरिकी साहित्यिक प्रतिभा ने जीवन और समय के साथ कभी न समाप्त होने वाले आम आदमी के संघर्ष और प्रकृति का अत्यंत कलात्मक कौशल के साथ चित्रण किया. उनकी साहसिक कहानियों को पढ़कर लाखों की संख्या में उत्सुक पाठक रोमांचित हो उठते हैं. लेखक और सामाजिक आन्दोलनकारी उनके ह्रदयस्पर्शी गद्य को पढ़कर प्रेरित होते थे. तथापि, उनके अनेक जीवनानुभव उनके कथा साहित्य से कहीं अधिक उत्तेजक हैं
कहते हैं जैक लंडन से अधिक जलयात्राओं को प्रेम करने वाला व्यक्ति शायद ही कोई अन्य हो, विशेषरूप से कोई कलाकार. जब वह बच्चे थे और अपने सौतेले पिता के साथ मछ्लियां पकड़ रहे होते तब वह उष्ण कटिबन्धी द्वीपों और दूर-दराज के स्थानों के स्वप्न देखा करते थे. जैसे ही वह बड़े हुए, अपने छोटे-मोटे कामों से संग्रहीत पैसों से वह प्रायः नाव किराए पर लेने लगे थे. जब जैक पन्द्रह वर्ष के थे, उन्होंने अपनी ऑण्ट जेनी प्रेण्टिस की आर्थिक सहायता से 'रेज़ल-डैज़ल' नामक जहाज खरीदा और गैर कानूनी रूप से समुद्र में सीपी लूटना प्रारंभ कर दिया. वह 'शुक्ति(सीप) दस्युता के राजकुंवर' के रूप में जाने जाते, इससे पहले ही एक सप्ताह में उन्होनें इतना धन कमा लिया था जितना एक लेखक के रूप में एक वर्ष में भी वह न कमा पाते. यह अनुभव करके कि 'शुक्ति दस्युओं' का जीवन प्रायः जेल में व्यतीत होता है या वे मृत्यु का शिकार होते हैं, अपने को बदलते हुए वह 'कैलीफोर्निया मत्स्य गश्तीदल के उप' नियुक्त हुए.
अपने जीवन काल में जैक ने विभिन्न जहाजों में जापान (सोफिया सदरलैंड), अलास्का (एस.एस.उमातिला और सिटी आफ टोपेका), इंग्लैंड (आर.एम.एस.मैजिस्टिक), साइबेरिया (एस.एस.साइबेरिया - रूस-जापान युद्ध के दौरान संवाददाता के रूप में), कोरिया, हवाई, ताहिती से सैनफ्रांसिस्को, आस्ट्रेलिया से इक्वाडोर, सीटल से कैलीफोर्निया, न्यूयार्क से सैनफ्रांसिस्को, अमेरिकी सैन्य जहाज किल्पैट्रिक में मैक्सिको (मैक्सिकन क्रान्ति के विषय में लिखने के लिए), आदि स्थानों की यात्राएं की थीं. कुछ स्थानों की यात्राएं उन्होनें एकाधिक बार की थीं.
क्लोण्डाइक (उत्तर पश्चिमी कनाडा का एक क्षेत्र जहां १८९० के दशक में सोना प्राप्त हुआ था और धनवान बनने के लिए बहुत से लोग वहां गए थे ) ज्वर से त्रस्त होने के पश्चात जैक ने २५ जुलाई १८९७ में एस.एस. उमातिला पर सैनफ्रासिंस्को से वहां के लिए प्रस्थान किया. उनके साथ उनके वृद्ध साले कैप्टेन शेफर्ड भी थे और उन्हीनें उनके इस अभियान के लिए धन खर्च किया था. २००० पाउण्ड की आवश्यक वस्तुएं, जिनमें गर्म कपड़े, भोजन, खदान के औजार, टेण्ट, कंबल और क्लोण्डाइक स्टोव के साथ जैक दिया नदी और विख्यात चिल्कूट दर्रे के रास्ते युकोन क्षेत्र में प्रविष्ट हुए. सोने के खोज के एक माह पश्चात नवम्बर, १८९७ के प्रारंभ में हेण्डर्सन ग्रीक पर उन्होनें अपना अधिकार प्रकट किया था. ठण्ड के लम्बे मौसम में जैक सोने के खोजी लोगों को कहानियां सुनाया करते थे और अपनी कहानी कहने की योग्यता के लिए चर्चित हो गए थे.
मई, १८९८ में ताजे फलों और सब्जियों के अभाव में वह स्कर्वी रोग से ग्रस्त हो गए. परिणामतः उन्हें सोने की खोज स्थगित करनी पड़ी थी. हताशापूर्वक वह तुरन्त उपचार की आवश्यक्ता अनुभव कर रहे थे, और व्यग्रतापूर्वक युकोन नदी में बर्फ पिघलने की प्रतीक्षा कर रहे थे जिसके कारण मार्ग अवरुद्ध था. वहां उन्हें बहुत मामूली उपचार सुविधा उपलब्ध हुई और उन्हें घर वापस लौटने की सलाह दी गई. अंततः युकोन नदी मार्ग से एक छोटी नाव में १५०० किलोमीटर की लंबी यात्रा तय करते हुए २८ जून को वह सेण्ट माइकल पहुंचे. सेण्ट माइकल से उन्होनें घर के लिए प्रस्थान किया. अलास्का और क्लोण्डाइक (कनाडा) में रहते हुए जैक लण्डन में अद्भुत अंतर्दृष्टि का विकास हुआ. यद्यपि उन्हें बहुत सोना प्राप्त नहीं हुआ था, लेकिन उन्हें अनुभव का अपार भण्डार प्राप्त हुआ था, जो उनके भावी उपन्यासों और कहानियों का आधार बननेवाला था.
ऑकलैण्ड, कैलीफिर्निया पहुंचने के बाद उन्हें अपने सौतेले पिता जॉन लंडन की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ. बाइस वर्ष की आयु में मां और सौतेले भाई के भरण-पोषण का भार उन पर आ पड़ा था. यद्यपि उन्होनें हर प्रकार की नौकरी की तथापि उन्हें कोई स्थायी काम नहीं मिला. अंततः निराशा के कारण उन्होंने अपना अधिकांश सामान बेच दिया और पूरी तरह लेखन में डूब गए थे. वह प्रतिभाशाली और बहु-आयामी व्यक्ति थे, फिर भी उनकी लगभग सभी प्रारंभिक रचनाएं अस्वीकृत हुईं थीं. दिसम्बर, १८९८ के प्रारंभ में उन्होनें अपनी पहली कहानी, अलास्का की एक लोककथा - 'टु दि मैन आन ट्रायल' (To the Man on Trail ) को बेचा. इस प्रकार उनका लेखकीय जीवन प्रारंभ हुआ था.
१९०५ में चर्मियां के साथ कैलीफोर्निया के ग्लेन इलेन में लेक रॉबिन लाज़ में रहते हुए जैक लंडन ने स्थायी रूप से 'वैली ऑफ मून' में बसने का निर्णय किया. जून में उन्होनें १३० एकड़ जमीन का एक टुकडा़ - 'हिल रैंच' खरीदा जिसमें खूबसूरत पेड़, खेत, चश्मे, सीधे खड़े पत्थरों वाली गहरी घाटियां , पहाड़ियां, और बड़ी मात्रा में जंगली जानवर थे. जमीन के छः और टुकड़े खरीदने के बाद जैक लंडन का 'ब्यूटी रैंच' १४०० एकड़ भूभाग में विस्तारित हो गया और वह सारी जमीन उन्होंने सात भागों में १९०५ से १९१३ के मध्य खरीदी थी. जैक को पशुपालन बहुत प्रिय था. अपने 'ब्यूटी रैंच' में उन्होनें अनेक प्रकार के जानवर पाल रखे थे, जिनमें विशेष प्रकार के सांड़, घोड़े और सुअर थे. उसमें उन्होनें विभिन्न प्रकार की फसलें उगायीं, जिनमें उन्होंने चालीस एकड़ में शराबी अंगूर लगाए थे. एक सोते में बांध बनाकर सिंचाई और मनोरंजन के लिए एक झील तैयार की थी. सीढ़ीदार खेती से सर्वप्रथम उन्होनें लोगों को परिचित करवाया था. बड़े रकबे में जई की फसल की रिकार्ड पैदावार की थी. उन्होनें नवीनतम प्रयोग किए. उदाहरणस्वरूप बिना कांटों का कैक्टस 'प्लांट विजार्ड' जिसे उनके मित्र लूथर बरबैंक (जो सांता रोजा के निकट रहते थे) ने विकसित किया था, जिसका उपयोग अनुर्वर क्षेत्र में जानवरों के भोजन के लिए होना था, लेकिन दुर्भाग्य से कैक्टस पूरी तरह कांटों रहित विकसित नहीं हो पाया था. उन्होनें आस्ट्रेलिया से हजारों की संख्या में युक्लिप्टस के वृक्षों का इस आशा से आयात किया था कि उनका उपयोग इमारती लकड़ी के रूप में किया जा सकेगा, लेकिन लकड़ी बहुत नरम थी. जैक का 'पिग पैलेस' काउण्टी का दर्शनीय स्थल था और जैक की कंक्रीट की खत्ती (बुखारी) कैलीफोर्निया में पहली थी. रैंच में एक और दर्शनीय बिल्डिगं थी - 'भव्य वुल्फ़ हाउस' - पूर्णतया देशी पेड़ों की लाल लकड़ी और स्थानीय उत्खनित ज्वालामुखीय और नीले स्लेटी पत्थरों से निर्मित 'वुल्फ़ हाउस' के निर्माण में दो वर्षों से अधिक का समय लगा था. जैक और चर्मियां के वहां रहने जाने से कुछ दिन पहले ही वुल्फ़ हाउस मजदूरों की लापरवाही के कारण जलकर नष्ट हो गया था, केवल दीवारें ही शेष बची थीं. भ्रमणार्थी आज भी जैक लंडन का 'ब्यूटी रैंच' देखने और उसका आनंद उठाने जाते हैं. अब यह कैलीफोर्निया का ऎतिहासिक पार्क है, जिसमें 'हाउस आफ हैपी वाल्स म्यूजियम, पिग पैलेस, जैक लंडन की कब्र, झील, वुल्फ़ हाउस के भग्नावशेष के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ दर्शनीय है.

अगला अंक
‘हम और हमारा समय’ के अंतर्गत राधेश्याम तिवारी की कविताएं और सूरज प्रकाश की कहानी- “क्या आप ग्रेसी राफेल से मिलना चाहेंगे?”