रविवार, 4 जनवरी 2009

वातायन – जनवरी 2009




हम और हमारा समय

वर्ष २००८ अनेक दुखद स्मृतियां छोड़कर विदा हो गया. देश के अनेक शहरों में हुए आतंकवादी बम धमाकों के बाद २६ नवम्बर को मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले ने दुनिया के सामने पाकिस्तान की वास्तविकता उजागर कर दी . दुनिया अब तक जिस हकीकत की ओर से आंखे बंद किये हुए थी आंखे खोलकर यह अनुभव करना प्रारंभ कर दिया कि विश्व में आंतकवाद की जड़ें पाकिस्तान में मौजूद हैं. अमेरिका का पालित-पोषित जिन्न आज उसके लिए ही चुनौती बना हुआ है. मुम्बई आंतकवादी हमले के ठोस प्रमाण अमेरिका और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियों द्वारा उपलब्ध करवाए जाने और आंतकवादियों के विरुद्ध कार्यवाई किये जाने के लिए लगातार दबाव डालने के बावजूद पाकिस्तान के कान में आज तक जूं नहीं रेगीं. बेशर्मी की अपनी पुरानी परम्परा को दोहराते हुए उसने भारत के विरुद्ध यौद्धिक तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं. आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका के सहयोगी के रूप अपने को प्रस्तुत कर उसने अमेरिका से अरबों डॉलर घसीट लिए, जिसका उपयोग सैन्य हथियार खरीदने और दुनिया में आतंकवाद फैलाने के लिए जिहादियों को तैयार करने लिए किया. आतंकवाद से प्रभावित और उसके विरुद्ध सोचने वाले देश यदि आज एक जुट होकर पाकिस्तान के विरुद्ध उचित कार्यवाई नहीं करते तो भारत ही नहीं दुनिया के तमाम देश इसका शिकार होने से बच पायेगें कहना कठिन है.

आतंकवाद के साथ ही विश्व में छायी आर्थिक मंदी ने गंभीर स्तिथियां उत्पन्न कर दी हैं. कहने के लिए ही हम अभी तक इससे अप्रभावित हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि कार्पोरेट जगत दो-चार करके अपने कर्मचारियों को निकाल रहा है. हमें आशा करनी चाहिए कि नये वर्ष में दुनिया इन स्तिथियों से उबरने का मार्ग खोज लेगी.

“वातायन” में इस माह प्रस्तुत है वरिष्ठ कथाकार एवं कवि सुभाष नीरव का आलेख - 'मैं क्यों लिखता हूँ ?', कमलेश्वर पर उनके जन्म दिन ६ जनवरी के अवसर पर मेरा संस्मरण और अप्रवासी युवा कथाकार और कवि इला प्रसाद की कहानी.

नववर्ष २००९ के लिए “वातायन” की ओर से मित्रों- पाठकों को शुभकामनाएं.

आलेख



मैं क्यों लिखता हूँ ?
सुभाष नीरव

प्रारंभ में लेखन के लिए बीज हमें हमारे जीवन की घटनाओं से ही मिलते हैं और उन्हें अंकुरित-पल्लवित करने में हमारे आसपास का परिवेश और स्थितियां सहायक बनती हैं, ऐसा मेरा मानना है। इसलिए यहाँ अपने जीवन की उन पारिवारिक स्थितियों-परिस्थितियों का उल्लेख कर लेना मुझे बेहद आवश्यक और प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है जिसकी वजह से मेरे अंदर लेखन के बीज पनपे और जिन्होंने मुझे कलम पकड़ने के लिए प्रेरित किया। ''मैं क्यों लिखता हूँ?'' आज जब मैं इस प्रश्न से दो-चार हो रहा हूँ तो मुझे अपने लेखन के बिलकुल शुरुआती दिन स्मरण हो आ रहे हैं। यह प्रश्न मुझे मेरे अतीत को खंगालने के साथ-साथ मुझे स्मृतियों-विस्मृतियों के बीच उन दिनों की तरफ भी धकेल रहा है जब मैं इंटर कर चुकने के बाद एक असहय अकेलेपन और बेकारी के दंश को झेल रहा था और इस दंश से मुक्ति, मैं साहित्य में ढूँढा करता था। साहित्यिक पत्रिकाएं और पुस्तकें मुझे इस दंश से, भले ही कुछ देर के लिए, मुक्ति दिलाती थीं। कहानी, उपन्यासों के पात्र मेरे साथी बन जाते थे और कई बार कोई पात्र तो मुझे बिलकुल अपने सरीखा लगता था। मुझे लेखन विरासत में नहीं मिला। जिस बेहद गरीब मजदूर परिवार में मैं पला-बढ़ा, उसमें दूर-दूर तक न तो कोई साहित्यिक अभिरूचि वाला व्यक्ति था और न ही आसपास ऐसा कोई वातावरण था। पिता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से नगर, मुराद नगर में स्थित आर्डिनेंस फैक्टरी में वर्कर थे जहां वह बारह घंटे लोहे से कुश्ती किया करते थे। फैक्टरी की ओर से रहने के लिए उन्हें जो मकान मिला हुआ था, वहां आसपास पूरे ब्लॉक में विभिन्न जातियों के बेहद गरीब मजदूर अपने परिवार के संग रहा करते थे, जिनमें पंजाबी, मेहतर, मुसलमान, पूरबिये, जुलाहे आदि प्रमुख थे। एक ब्लॉके में आगे-पीछे कुल 18 क्वार्टर होते थे- नौ आगे, नौ पीछे। दोनों तरफ ब्लॉक के बीचोंबीच एक सार्वजनिक नल होता था जहां सुबह-शाम पानी के लिए धमाचौकड़ी मची रहती थी, झगड़े होते थे, एक दूसरे की बाल्टियाँ टकराती थीं। मेरे हाई स्कूल करने तक वहाँ घरों में बिजली नाम की कोई चीज नहीं थी। बस, स्ट्रीट लाइट हुआ करती थी। ऊँचे-लम्बे लोहे के खम्भों पर लटकते बल्ब शाम होते ही सड़क पर पीली रोशनी फेंकने लगते थे। मुझे अपनी पढ़ाई-लिखाई मिट्टी के तेल के लैम्प की रोशनी में करनी पड़ती थी या फिर घर के पास सड़क के किनारेवाले किसी बिजली के खम्भे के नीचे चारपाई बिछाकर, उसकी पीली मद्धिम रोशनी में अपना होमवर्क पूरा करना पड़ता था।
घर में तीन बहनें, तीन भाई, पिता, अम्मा के अलावा नानी भी थी। नानी के चूंकि कोई बेटा नहीं था, भारत-पाक विभाजन के बाद, वह आरंभ में तो बारी-बारी से अपने तीनों दामादों के पास रहा करती थीं, पर बाद में स्थायी तौर पर अपने सबसे छोटे दामाद यानी मेरे पिता के पास ही रहने लगी थीं। वह बाहर वाले छोटे कमरे में जो रसोई का भी काम करता था, रहा करती थीं। जब तक उनकी देह में जान थी, हाथ-पैर चलते थे, वह फैक्टरी के साहबों के घरों में झाड़ू-पौचा, बर्तन मांजना, बच्चों की देखभाल आदि का काम किया करती थी और अपने गुजारे लायक कमा लेती थीं। बाद में, जब शरीर नाकारा होने लगा तो उन्होंने काम करना छोड़ दिया और वह पूरी तरह अपने दामाद और बेटी पर आश्रित हो गई। दादा भी थे पर वह हमारे साथ वाले घर में हमारे चाचा के संग रहते थे। घर में मुझसे बड़ी एक बहन थी और मुझसे छोटी दो बहनें और दो भाई। उन सस्ती के दिनों में भी पिता अपनी सीमित आय में घर का बमुश्किल गुजारा कर पाते थे। उनकी स्थिति उन दिनों और अधिक पतली हो जाती जब फैक्टरी में 'ओवर टाइम' बन्द हो जाता। कई बार तो शाम को चूल्हा भी न जलता था। पिता घर से छह-सात मील दूर कस्बे की जिस लाला की दुकान से हर माह घर का राशन उधार में लेकर डाला करते थे, ऐसे दिनों में वह भी गेंहू-चावल देने से इन्कार कर दिया करता था। पिछले माह का उधार उसे पहले चुकाना पड़ता था, तब वह अगले माह के लिए राशन उधार देता था। ओवर टाइम बन्द हो जाने पर पिता पिछले माह का पूरा उधार चुकता करने की स्थिति में न होते, वे आधा उधार ही चुकता कर पाते थे। घर में कई बार शाम को चावल ही पकता और उसकी माड़ निकाल कर रख ली जाती और कुछ न होने पर उसी ठंडी माड़ में गुड़ की डली मिलाकर हम लोग पिया करते और अपनी क्षुधा को जबरन शांत करने का प्रयास किया करते थे। माँ, घर के बाहर बने बाड़े में से चौलाई का साग तोड़ लाती और उसमें दो आलू काटकर सब्जी बनाती। सन् 1962 में भारत -चीन युद्ध के दौरान जब गेंहू-चावल का अकाल पड़ा तो हमने बाजरे की बिना चुपड़ी रोटियाँ भी खाईं जिन्हें गरम-गरम ही खाया जा सकता था, ठंडी हो जाने पर वे पत्थर -सी सख्त हो जातीं और उन्हें चबाते-चबाते हमारे मुँह दुखने लगते।
ऐसे में पिता जो पूरे परिवार की गाड़ी किसी प्रकार खींच रहे थे, की नज़रें मझे पर टिक गई थीं। वे चाहते थे कि मैं हाई-स्कूल करने के बाद कोई काम-धंधा या नौकरी देखूं ताकि उन्हें कुछ सहारा मिल सके। उधर उन्हें जवान होती बेटियों के विवाह की चिंता भी सताये जा रही थी। वे चाहते थे कि किसी तरह सबसे बड़ी बेटी की वह शादी कर दें। मुझे भी पिता की दयनीय हालत पर बेहद तरस आता और मैं सोचता कि पढ़ाई में क्या रखा है, मैं भी किसी फैक्टरी, कारखाने में लग जाऊँ और कुछ कमा कर पिता का बोझ हल्का करूँ।
लेकिन मुझे किताबों से बहुत प्रेम था। भले ही वे पाठयक्रम की पुस्तकें थीं। नई किताबों के वर्कों से उठती महक मुझे दीवाना बना देती थी। हाई स्कूल की बोर्ड की परीक्षा देने के बाद मैं एक दिन घर से भाग निकला और अपनी बड़ी बहन जो दिल्ली में ब्याही थी और मोहम्मद पुर गांव में एक किराये के मकान में रहती थी, के पास जा पहुँचा। मेरे जीजा ठेकेदार थे और सरकारी इमारतों की मरम्मत, सफेदी आदि के ठेके लिया करते थे। मुझे अकस्मात् अकेले आया देख वे हतप्रभ थे। पिता चूंकि मुझे आगे पढ़ाना नहीं चाहते थे, इसलिए मैंने जीजा से कहा कि वह मुझे कहीं भी छोटे-मोटे काम पर लगवा दें, भले ही मजदूर के रूप में अपने पास ही रख लें। मुझे पूरी उम्मीद थी कि मैं बोर्ड की परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाऊँगा क्योंकि मेरे पेपर्स अच्छे गए थे। मैं चाहता था कि जब परीक्षा परिणाम निकले तो मेरे पास कम से कम इतने पैसे अवश्य हों कि मैं आगे दाखिला ले सकूं। मेरे जीजा ने मुझे नार्थ ब्लॉक में कह-सुनकर डेलीवेजर के रूप में लगवा दिया- साढ़े तीन रुपये दिहाड़ी पर। सन् 1970 की गर्मियों के दिन थे। मुझे वाटर कूलरों में पानी भरने पर लगा दिया गया था। उन दिनों वहां पाइप से कूलरों में पानी नहीं भरा जाता था। हर डेलीवेजर को दो-दो बाल्टियाँ इशू होती थीं। उन्हें नल से भरकर हमें कूलरों में सुबह-शाम पानी भरना पड़ता था। बीच के वक्त हमसे दूसरा काम लिया जाता जैसे कमरों की साफ-सफाई का, सामान इधर-उधर करने का, चपरासीगिरी का। कभी-कभी किसी साहब के घर का काम करने के लिए भी भेज दिया जाता। छुट्टी के दिन हम लोग डयूटी लगवा लेते थे ताकि कुछ पैसे और बन सकें। मैंने वहां दो माह काम किया। माह के अंत में जो रुपये मुझे मिलते, मैं उन्हें बहन को दे देता। जब बोर्ड की परीक्षा का परिणाम अखबार में निकला, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं गुड सेकेंड डिवीजन से पास हो गया था। मैंने आगे काम करने से इंकार कर दिया और बहन से अपने रुपये लेकर सीधा मोदी इंटर कालेज, मोदी नगर में दाखिला लेने चला गया। मेरा दाखिला भी हो गया। पिता इस पर खुश नहीं थे लेकिन बाद में वह मान गए। इंटर करने तक के वे दो साल बड़े कष्टप्रद रहे। मैं रेल का मासिक स्टुडेंट पास बनवाकर अपने कुछ मित्रों के संग कालेज जाया करता था। कई बार ट्रेन छूट जाती, मेरे पास बस से जाने के पैसे न होते और उस दिन छुट्टी हो जाती। अगले रोज़ कालेज में सजा मिलती। प्रिंसीपल बहुत सख़्त था, कुछ सुनता ही नहीं था। कालेज से नाम काट देने की धमकी देता था। दोपहर में साढ़े बारह बजे कालेज से छुट्टी होती। इसी समय की एक ट्रेन थी जो बहुत मुश्किल से हम पकड़ पाते। कालेज रेलवे लाइन की बगल में था और स्टेशन से दसेक मिनट की दूरी पर था। प्राय: ट्रेन दस-पन्द्रह मिनट लेट हुआ करती थी, इसलिए मिल जाया करती थी। लेकिन जिस दिन सही समय पर आती हमें अपने कालेज से ही दौड़ लगानी पड़ती। स्टेशन पहुँचते-पहुँचते हमारे साँस फूल जाते, कभी चलती ट्रेन में चढ़ने में कामयाब हो जाते, कभी वह छूट जाती। इसके बाद चार बजे की ट्रेन थी जो प्राय: लेट होती और उससे घर पहुँचते-पहुँचते शाम हो जाती। मित्र तो बस पकड़कर चले जाते पर मेरे पास पैसे न होने के कारण मुझे वहीं स्टेशन पर समय बिताना पड़ता। मैं माल गोदाम में पड़े सामान के गट्ठरों पर बैठ कर अपना होम वर्क करता और पढ़ा करता। कभी कभी सुबह जल्दी में लंच बॉक्स छूट जाता तो दोपहर में भूख के मारे बुरा हाल हो जाता। मित्र कभी कभी अपना लंच शेयर करवाते, कभी नहीं। ऐसी स्थिति में यदि मेरे पास एक दो रुपये होते तो मैं पचास पैसे के मिर्च वाले लाल चने लेकर खाया करता और ढ़ेर सारा पानी पीकर अपनी भूख को शांत करने की कोशिश किया करता।

सन् 1972 में इंटर की परीक्षा पास की तो पिता ने हाथ खड़े कर दिए। वह आगे पढ़ाने के लिए कतई तैयार नहीं थे। वे चाहते थे कि अब मैं कोई न कोई कामधंधा या नौकरी देखूं। वे दिन बड़े भयावह और संत्रास भरे थे। मेरे पास नौकरी के लिए आवेदन करने लायक पैसे तक नहीं होते थे। पिता की स्थिति बड़ी दयनीय थी। तनख्वाह का सारा पैसा उधारी चुकाने में चला जाता था। घर में कभी कभी फाके जैसी हालत होती। मैंने आसपास की फैक्टरियों में काम तलाशने की बहुत कोशिश की पर कामयाब नहीं हो पाया। बगैर सिफारिश के कोई रखता नहीं था। इन दिनों मैं बेकारी के भीषण दंश को झेल रहा था। मैं स्वयं को बेहद अकेला, असहाय और उदास महसूस करता। कई बार घर से भाग जाने की इच्छा होती। रात रात भर नींद नहीं आती थी। किसी से बात करने को मन नहीं करता था। मेरा स्वभाव रूखा और चिड़चिड़ा हो गया था।
इंटर करते समय कालेज की लायब्रेरी में मुझे हिंदी पत्रिकायें जैसे- धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,कादम्बिनी , नवनीत, सारिका, सरिता, मुक्ता आदि पढ़ने को मिल जाती थीं। लेकिन मुराद नगर में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। खरीद कर मैं पढ़ नहीं सकता था। अखबार पढ़ने के लिए घर से डेढ़-दो मील किसी चायवाले या पानवाले की दुकान पर जाना पड़ता। तभी मेरे एक मित्र ने मुझे आर्डिनेंस फैक्टरी की एक छोटी-सी लायब्रेरी जो नई-नई खुली थी, का सदस्य बनवा दिया। वहाँ से साहित्यिक पुस्तकें इशू करवा कर मैं पढ़ने लगा था। हिंदी के नये पुराने कई लेखकों के उपन्यास, कहानी संग्रह, कविता संग्रह जो भी उस पुस्तकालय में उपलब्ध होते, मैंने पढ़ने आरंभ कर दिए थे। ये किताबें मुझे सुकून देती थीं। मैं इनमें खो जाता था। अपना अकेलापन, अपना दुख, अपनी पीड़ा, बेकारी का दंश भूल जाता था। यहीं मैंने प्रेमचंद को पूरा पढ़ा।
इन्हीं दिनों मैंने अनुभव किया कि मैं कवि होता जा रहा हूँ। मैं अपने अकेलेपन के संत्रास को तुकबंदियों में उतारने लगा। ऐसा करने पर मुझे लगता कि मेरा दुख कुछ कम हो गया हो जैसे। उन अधपक्की, अधकचरी कविताओं का रचियता और पाठक मैं ही था। मेरा बहुत मन होता कि कोई मेरी कविता सुने या पढ़े। इधर फैक्टरी में ओवर टाइम लगना आरंभ हो गया था और पिता ने मुझे जेब खर्च के लिए कुछ पैसे देने प्रारंभ कर दिए थे। उन पैसों से मैं नौकरी के लिए आवेदन पोस्ट करने लग पड़ा था। ढेरों इंटरव्यू और लिखित परीक्षाएं दीं पर सफल नहीं हुआ। एक दिन मेरी किस्मत का बंद दरवाजा खुला। मेरा मेरठ कचेहरी में क्लर्क के पद के लिए चयन हो गया, पर मुझे पैनल में डाल दिया गया था। लगभग आठ-नौ महीने के बाद मेरी तैनाती गाजियाबाद सिविल कोर्ट में हुई। मेरे ही नहीं, घर के सभी सदस्यों के पैर धरती पर नहीं पड़ रहे थे। पिता की आंखों में चमक आ गई थी। माँ ने घर में कीर्तन रखवा लिया था।
गाजियाबाद मैं रेल से आता-जाता था। शाम को लौटते वक्त गाजियाबाद स्टेशन पर बुक स्टालों पर मैं पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगा था। मैं अब पत्रिकाओं के पते नोट करता और अपनी कच्ची-पक्की कविताओं को संपादकों को भेजा करता। फिर कई-कई दिन संपादकों के उत्तर की बेसब्री से प्रतीक्षा किया करता। पर मेरी हर रचना सखेद लौट आती थी। मन बेहद दुखी होता। लेकिन रचनाएं भेजना मैंने बन्द नहीं किया। एक दिन दिल्ली प्रेस की पत्रिका ''मुक्ता'' से मुझे जब स्वीकृति पत्र मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं चाहता था कि मैं अपनी इस खुशी को किसी के संग शेयर करुँ। एक दो मित्रों से बात की पर उन्होंने कोई खुशी जाहिर नहीं की। धीरे-धीरे मेरी कविताएं ‘सरिता’ ‘मुक्ता’ में नियमित रूप से छपने लगीं। ये बड़ी रोमानी किस्म की कविताएं होती थीं। कलर पृष्ठों पर छपती थीं। मैं अपनी छपी हुई कविताओं को और उन कविताओं के साथ छपे युवतियों के रंगीन चित्र को देखकर मुग्ध होता रहता। मुझे लगता जैसे मैं देश का एक बड़ा कवि हो गया होऊँ। ‘सरिता-मुक्ता’ में छपने वाली रचनाओं का पारिश्रमिक भी मुझे मिलता था। उस पारिश्रमिक से मैं पत्र पत्रिकाएं खरीदा करता। मुराद नगर के स्थानीय कवि जो मंचों पर कविताएं पढ़ा करते थे, अब मुझे जानने लगे थे। उन दिनों मुझ पर एक अजीब सा नशा सवार रहने लगा था। पर डेढ़-दो वर्ष में ही मेरा यह नशा उतर गया। मुझे अपने लिखे से ही वितृष्णा होने लगी। धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा था कि यह सब नकली लेखन है। मेरी ऑंखों के सामने लाचार, विवश मेरी बूढ़ी नानी आने लगी थी, थके-हारे पराजित से पिता की कातर नज़रें मेरा पीछा करने लगी थीं, माँ का बुझा-बुझा-सा रहने वाला चेहरा और छोटी बहनों की ऑंखों में बनते-टूटते सपने मुझे तंग-परेशान करने लगे थे। मैं अपने आप से प्रश्न करता कि जो कुछ मैं लिख रहा हूँ, उसमें ये लोग कहाँ हैं ? कहाँ हैं इनकी दुख-तकलीफों का चित्रण, जीवन का सच क्या है ? मैं अपने आसपास के यथार्थ से मुँह क्यों मोड़ रहा हूँ ? मेरे अंदर ऐसे विचारों का प्रस्फुटन ठीक तब से होने लगा जब से मैं गंभीर साहित्य पढ़ने लगा था। सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान की कहानियां मुझे जब से उद्वेलित करने लगी थीं। इन कहानियों के पात्र मुझे भीतर तक कुरेदने लगे थे और मुझे अपने लेखन को जीवन की तल्ख़ सच्चाइयों, कड़वे यथार्थ की ओर उन्मुख करने को प्रेरित करने लगे थे।
अच्छा साहित्य न केवल एक बेहतर मनुष्य बनाता है बल्कि एक लेखक को बेहतर लेखक भी बनाता है। मैंने अपने दादा, नानी के दु:ख-दर्दों को बहुत करीब से देखा था। पिता को परिवार के लिए हाड़-मांस गलाते देखा था। माँ को परिवार की रोटी-पानी की चिंता में हर समय घुलते देखा था। अपने परिवार के साथ-साथ अपने पड़ोस में रहते बूढ़ों की दुगर्ति मैंने देखी थी। बुढापे में लाठी का सहारा कहे जाने वाले बेटों की अवहेलना में बूढ़ों को तिल-तिल मरते देखा था। यह एक सामाजिक यथार्थ था मेरी ऑंखों के सामने, इस यथार्थ की छवियाँ, इनका चित्रण कथा-कहानियों में देखता तो मैं भी अपने आप से प्रश्न करता- मैं भी ऐसा क्यों नहीं लिखता जिसमें इन लोगों की बात हो। ये जीवित पात्र मुझे अब बार-बार उकसाने लगे थे। बदलते समय ने मेरे सरोकार और मेरे लेखक के कारण को बदलने में मदद की। मैंने पहली कहानी लिखी- ''अब और नहीं।'' यह एक रिटायर्ड वृद्ध की व्यथा-कथा थी जिसे मैंने अपने ढंग से लिखने की कोशिश की। बूढ़े-बुजुर्ग लोग मेरी संवेदना को झकझोरते रहे हैं और मैं समय-समय पर इनको केन्द्र में रखकर कहानियाँ लिखता रहा हूँ। ''बूढ़ी ऑंखों का आकाश'', ''लुटे हुए लोग'', '' इतने बुरे दिन'', ''तिड़के घड़े'', ''उसकी भागीदारी'' ''आख़िरी पड़ाव का दु:ख'' ''जीवन का ताप'' ''कमरा'' मेरी ऐसी ही कहानियाँ/लघुकथाएं हैं।
बेकारी के दंश को अभिव्यक्त करती मेरी कहानी ''दैत्य'' हो अथवा ''अंतत:'' दोनों के पीछे मेरे अपने बेकारी के दिन भले रहे हों, पर ये कहानियां व्यापक रूप में भारत के हजारों-लाखों बेकार युवकों के संताप को ही व्यक्त करती हैं।
मेरे लेखन के पीछे जो मुख्य कारण व कारक सक्रिय रहा, वह था मेरा अपना परिवार। अभावों, दु:खों-तकलीफों में जीता परिवार। धीरे-धीरे उसमें आस पास का समाज भी जुड़ता चला गया। ज़रूरी नहीं कि एक समय में लिखने का जो कारण रहा हो, दूसरे समय में भी वही रहे। समय के साथ-साथ ये कारण बदलते रहते हैं। जैसे-जैसे लेखक अपने समय और समाज से गहरे जुड़ता जाता है, उसके सरोकार और लिखने के कारण भी उसी प्रकार बनते-परिवर्तित होते रहते हैं। अगर मैं यहाँ यह कहूँ कि ‘प्रेम’ भी मेरे लेखने का एक कारण रहा है तो गलत न होगा। प्रेम भी हमारी सृजनात्मकता को उर्वर बनाता है और उसमें गति लाता है। जब आप प्रेम में होते हैं, तो सृजन के बहुत करीब होते हैं, ऐसा मेरा अनुभव और मानना है। एक समय, मोहल्ले की एक लड़की जो हमारे घर के सामने रहा करती थी, से हुए मेरे इकतरफा प्रेम ने भी मुझसे बहुत कुछ लिखवाया। ढेरों प्रेम कविताएं, कई प्रेम कहानियाँ। इनमें से कुछ ही सुरक्षित रह सकीं, बहुतों को मुझे नष्ट करना पड़ा। इस सन्दर्भ में मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है। जिस लड़की से मुझे इकतरफा प्रेम था, मैं उसे अपने लेखकीय गुण से इंप्रैस करना चाहता था। मैं अपने को लेखक होने के नाते एक विशिष्ट व्यक्ति मानता था और चाहता था कि मेरे इस गुण के वशीभूत वह मुझसे प्रेम करने लगे। मैंने मालूम किया कि उस लड़की के घर कौन-सा हिंदी का अखबार आता है। फिर मैंने एक कहानी लिखी और उसी अखबार में छपने के लिए भेज दी। उस अखबार में कहानी के साथ लेखक की फोटो भी छपा करती थी। एक रविवार कहानी छप गई। मेरी फोटो सहित। लेकिन विडम्बना देखें कि उस दिन उसके घर में वह अखबार नहीं आया, हॉकर उसके बदले में दूसरा अखबार डाल गया। मेरी हसरत पर मानो तुषारापात हो गया।
इस घटना के बाद यह अलग बात है कि उस लड़की से मेरा प्रेम चला। पर इसके पीछे मेरा लेखन कारण नहीं बना। उस लड़की ने मुझे मेरे लेखक होने के नाते प्रेम नहीं किया। हमारा यह प्रेम ऊँची पींगे लेने लगा। हम अकेले में मिलते, सिनेमा देखने जाते, पार्को में मिलते और बीच-बीच में पत्रों का आदान-प्रदान भी होता। पुराना किला, चिड़ियाघर, मदरसा, कुतुब, इंडिया गेट, प्रगति मैदान, कनॉट प्लेस ऐसी कोई जगह नहीं थी दिल्ली की जहाँ हम न मिला करते। लेकिन फिर वही हुआ जैसा कि एक भारतीय समाज में होता है। उसके माँ-बाप ने अपनी बिरादरी में उसका विवाह तय कर दिया। उस समय मेरे दिल के कितने टुकड़े हुए मैं ही जानता हूँ। चोट खाया मैं मजनूं-सा प्रेम कविताएं लिखता रहा और लिख-लिख कर फाड़ता रहा। फिर उसका विवाह हो गया। मुझे लगा, अब हम कभी नहीं मिल पाएंगे। मेरे माँ-बाप ने मेरा विवाह भी कर दिया।
कई बरसों बाद इसी प्रेम के अहसास ने मुझसे ''चोट'' जैसी प्रेम कहानी लिखवाई जिसमे पढ़कर मेरी पत्नी ने नाक-भौं सिकौड़ी थी और कहा था- यह क्या कहानी है ? उन दिनों मेरा भीषण एक्सीडेंट हुआ था और बायें पैर की पाँच हड्डियाँ टूट गई थीं। घर पर मेरे लेखक मित्र मुझे मिलने आया करते थे। रूप सिंह चन्देल तो प्राय: मेरा हाल-चाल जानने आया करते। चन्देल ने वह कहानी पढ़ी और कहा कि इसे तुरत बलराम को दे दो। बलराम उन दिनों 'नवभारत टाइम्स' का रविवासरीय देखा करते थे। बलराम ने कहानी छापी, संग में फोटो और उसके साथ मेरे दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की सूचना भी। ''लौटना'' कहानी में भी असफल प्रेम के उसी अहसास को एक दूसरे कोण से अभिव्यक्त करने की कोशिश की गई है।
लेखक अपने समय और समाज से कट कर कदापि नहीं रह सकता। ''वेलफेयर बाबू'' ''औरत होने का गुनाह'' ''गोष्ठी'' कहानियाँ मेरे अपने समय और समाज की कहानियाँ हैं और मैंने इन्हें लिख कर अपने सामाजिक सरोकार और लेखन के उद्देश्य को स्पष्ट करने की कोशिश की है।
मुझे हमेशा लगता रहा कि लेखन ही एक ऐसा माध्यम है जो मेरी निजता को सामाजिकता में बदल सकता है। जिनके लिए मैं कुछ नहीं कर पाया, मैं उनकी दुख-तकलीफों को अपने लेखन में रेखांकित कर सकता हूँ और उनके लिए 'कुछ न कर पाने' की अपनी पीड़ा को मैं लिखकर कम कर लेता हूँ।
इसमें दो राय नहीं कि मेरे अब तक के लेखन के पीछे मेरे माता-पिता के संघर्ष और अभावों भरे दिन रहे हैं, मेरे अपने संघर्ष रहे हैं। लेकिन साथ ही साथ समय ने मुझे अपने समाज और परिवेश के प्रति भी जागरूक बनाया है। उस समाज में रह रहे हर गरीब, दुखी, असहाय, पीड़ित, दलित, शोषित व्यक्ति के प्रति संवेदनात्मक रिश्ता कायम किया है। अपनी कहानियों, लघुकथाओं में मैंने सदैव कोशिश की कि इन लोगों के यथार्थ को ईमानदारी से स्पर्श कर सकूं और तहों के नीचे छिपे 'सत्य' को उदघाटित कर सकूं। मुझे नहीं मालूम कि मैं इसमें कहाँ तक सफल हुआ हूँ, पर मुझे अपने लिखे पर संतोष है। मुझे यह मुगालता कभी नहीं रहा कि मेरे लेखन से समाज में कोई परिवर्तन हो सकता है। कहानी, लघुकथा और कविता लिखते समय मैं अपने समय और समाज के प्रति जागरुक और ईमानदार रहूँ, ऐसी मेरी कोशिश और मंशा रहती है। आलोचक समीक्षक मेरी रचनाओं को लेकर क्या कहते हैं या क्या कहेंगे, इसकी तरफ़ मैं अधिक ध्यान नहीं देता। लिखना मेरा एक सामाजिक कार्य है और मैं इसे अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी से करते रहना चाहता हूँ। यदि मेरी कोई रचना किसी की संवेदना को जगा पाती है अथवा उसे हल्का सा भी स्पर्श करती है तो यह भी कोई कम उपलब्धि नहीं है मेरे लिए।
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जन्म: 27–12–1953, मुरादनगर (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा: स्नातक, मेरठ विश्वविद्यालय
कृतियाँ: ‘यत्कचित’, ‘रोशनी की लकीर’ (कविता संग्रह)
‘दैत्य तथा अन्य कहानियाँ’, ‘औरत होने का गुनाह’
‘आखिरी पड़ाव का दु:ख’(कहानी-संग्रह)
‘कथाबिंदु’(लघुकथा–संग्रह),
‘मेहनत की रोटी’(बाल कहानी-संग्रह)
लगभग 12 पुस्तकों का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद, जिनमें
“काला दौर”, “कथा-पंजाब – 2”, कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा पंजाबी कहानियाँ”, “पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं”, “तुम नहीं समझ सकते”(जिन्दर का कहानी संग्रह), “छांग्या रुक्ख”(बलबीर माधोपुरी की दलित आत्मकथा) और “रेत” (हरजीत अटवाल का उपन्यास) प्रमुख हैं।
सम्पादन अनियतकालीन पत्रिका ‘प्रयास’ और मासिक ‘मचान’ ।
ब्लॉग्स: सेतु साहित्य( उत्कृष्ट अनूदित साहित्य की नेट पत्रिका )
http://www.setusahitya.blogspot.com/
वाटिका(समकालीन कविताओं की ब्लॉग पत्रिका)
http://www.vaatika.blogspot.com/
साहित्य सृजन( साहित्य, विचार और संस्कृति का संवाहक)
http://www.sahityasrijan.blogspot.com/
गवाक्ष (हिंदी–पंजाबी के समकालीन प्रवासी साहित्य की प्रस्तुति)
http://www.gavaksh.blogspot.com/
सृजन–यात्रा ( सुभाष नीरव की रचनाओं का सफ़र)
http://www.srijanyatra.blogspot.com/
पुरस्कार/सम्मान: हिन्दी में लघुकथा लेखन के साथ-साथ पंजाबी-हिन्दी लघुकथाओं के श्रेष्ठ अनुवाद के लिए ‘माता शरबती देवी स्मृति पुरस्कार, 1992’ तथा ‘मंच पुरस्कार, 2000’ से सम्मानित।
सम्प्रति : भारत सरकार के पोत परिवहन मंत्रालय
में अनुभाग अधिकारी(प्रशासन)।
सम्पर्क: 372, टाईप–4, लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली–110023
ई मेल: subhashneerav@gmail.com
http://www.subhneerav@gmail.com/
दूरभाष : 011–24104912(निवास)
09810534373
संस्मरण

शब्दों के जादूगर : कमलेश्वर
रूपसिंह चन्देल


कमलेश्वर जी से मेरी मुलाकात तब हुई जब वह “गंगा” के सम्पादक थे. मैंने ‘गंगा’ में कोई कहानी भेजी थी. कई महीने बीतने के बाद भी जब वहां से कोई उत्तर नहीं मिला, मैं कमलेश्वर जी से मिलने जा पंहुचा. मेरे मस्तिष्क में उनके व्यक्तित्व का जो स्वरूप बना हुआ था उसके कारण लंबे समय तक मैं 'मिलूं'-'न मिलूं' के उहापोह में रहा था, जबकि कई मित्रों से उनकी उदारता, सरलता, और सहृदयता के विषय में सुन चुका था. उससे पहले मैंने पत्र लिखकर कहानी के विषय में जानना चाहा, लेकिन कोई उत्तर नही मिला. कुछ सप्ताह और बीते. आखिर एक दिन अपरान्ह मैं जा पहुंचा 'गंगा' के कार्यालय. एक सज्जन से पूछा. उन्होंने कमलेश्वर जी के कमरे की ओर इशारा कर कहा, " बैठे हैं…"

ससंकोच मैंने कमरे में झांका. दरवाजा पूरी तरह खुला हुआ था. दरवाजे के ठीक सामने कमलेश्वर जी बैठे लिख रहे थे.

"सर, मैं रूपसिंह चन्देल." दरवाजे पर ठहर मैं बोला.

"अरे… आइये, चन्देल जी." लिखना रोक कमलेश्वर जी बोले और सामने पड़ी कुर्सी की ओर इशारा किया, "बैठिये। बस एक मिनट…" वह पुनः लिखने लगे थे.

वास्तव में उन्होंने एक मिनट ही लिया था. या तो वह आलेख का अंतिम वाक्य लिख रहे थे या वाक्य पूरा कर मुझसे बात करने के लिए आलेख बीच में ही छोड़ दिया था.

मैंनें अपने आने का अभिप्राय बताया.

"कहानी होगी… मैं उसे देख लूंगा. आप फिक्र न करें." कमलेश्वर जी ने पूछा "और क्या लिख रहे हैं?"

"कुछ लघुकथाएं (लघु कहानियां) और बाल कहानियां."

"लघुकथाएं भेजिए… आपने देखा होगा, गंगा में हम लघु कथाएं भी छापते हैं."

कमलेश्वर जी से उस पन्द्रह मिनट की मुलाकात में मैं उनसे बहुत प्रभावित हुआ. कहानी तो 'गंगा' में प्रकाशित नहीं हुई, लेकिन बंद होने से पहले मेरी एक लघुकथा अवश्य प्रकाशित हुई थी.

उस मुलाकात के बाद लंबे समय तक मैं उनसे नहीं मिला. १९९२ या १९९३ में उनके एक कहानी संग्रह पर मैंने 'जनसत्ता' के लिए समीक्षा लिखी, जिसके प्रकाशित होने पर उसकी फोटो प्रति मैंनें उन्हें भेजी. खूबसूरत हस्तलेख में कमलेश्वर जी का पत्र मिला. लिखा था, "आप एक अच्छे कहानीकार हैं…मेरी सलाह है कि समीक्षा लिखने से अपने को बचाएं."

कमलेश्वर जी की सलाह उचित थी. उनकी सलाह के बावजूद मैं समीक्षाएं लिखना रोक नहीं पाया. उन दिनों ‘जनसत्ता’ में मंगलेश डबराल साहित्य देखते थे. जब मैं उनके पास जाता वह दो-चार पुस्तकें मुझे पकड़ा देते… सभी कहानी संग्रह या उपन्यास. महीने में लगभग दो समीक्षाएं मेरी वह छापते भी. उससे पहले 'दैनिक हिन्दुस्तान' में आनंद दीक्षित मुझसे साग्रह लिखवाते रहे थे. जब भी अच्छे संग्रह या उपन्यास आते, दीक्षित जी फोन करके मुझे बुला लेते. कमलेश्वर जी की बात न मानने का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा. समीक्षक - आलोचक बनना मेरा स्वप्न कभी नहीं रहा और न ही यह विचार कभी मन में आया कि अब तक लिखी समीक्षाओं के आधार पर कोई पुस्तक तैयार कर लूं, जैसा कि कुछ लेखकों ने किया भी. उल्टे शत्रु अलग बनाए… यह सब जानते हुए भी लिखना बंद नहीं कर पाया, कम अवश्य हुआ.

लंबे अंतराल के बाद एक साहित्यिक कार्यक्रम में कमलेश्वर जी से मुलाकात हुई. उन दिनों वह बहुत व्यस्त थे. धारावाहिकों के लिए काम कर रहे थे. टकराते ही प्रणाम कर मैने अपना परिचय दिया. कमलेश्वर जी तपाक से बोले, "चन्देल जी, आपको बताने की आवश्यकता नहीं." और वह अपनी व्यस्तताओं की चर्चा करने लगे थे, "क्या करूं…मेरी एक टांग हवाई जहाज में होती है- दिल्ली - मुम्बई के बीच झूलता रहता हूं."

उसके पश्चात फिर कुछ समय बीत गया. एक दिन रात कमलेश्वर जी का फोन आया. मैं गदगद.

"चन्देल, मैं अब पूरी तरह दिल्ली आ गया हूं. 'चन्द्रकान्ता' का काम जल्दी ही सिमट जायेगा… कुछ दिनों की ही बात है…आप संपर्क में रहें. आपके साथ कुछ करना चाहता हूं."

मेरे लिए इससे बड़ी प्रसन्नता की बात क्या हो सकती थी कि कमलेश्वर जी ने मुझे इस योग्य समझा था. मैंने पूछ लिया, "भाई साहब , क्या योजना है?"

"आल्हा-ऊदल पर एक धारावाहिक की योजना है."

मैंने स्वीकृति दे दी. मैंने तब सोचा था, और आज भी सोचता हूं कि आल्हा-ऊदल के लिए उन्होंने मेरा चयन शायद इसलिए किया होगा क्योंकि वे दोनों चन्देल नरेश परिमर्दिदेव के साली के पुत्र थे और उन्हीं के दरबार में थे. दोंनो ने उनके लिए कई गौरवपूर्ण लड़ाइयां लड़ी थीं और 'लोक पुरुष' बन गये थे.

मैंने कमलेश्वर जी से हां तो कह दी, लेकिन स्वयं द्विविधा में पड़ गया था. वह द्विविधा थी मेरी सरकारी नौकरी. जिस विभाग में नौकरी करता था वहां ऎसी किसी भी गतिविधि में शामिल होने की भनक मेरी प्रताड़ना का कारण बन सकता था. स्थितियां ऎसी न थीं कि नौकरी छोड़कर कमलेश्वर जी के साथ जुड़ लेता. अस्तु मैंने कमलेश्वर जी से संपर्क नहीं साधा और उन्होंने भी मुझे याद नहीं किया. पूरी तरह दिल्ली आकर उनकी प्राथमिकताएं बदल गयी थीं. वह लेखन और पत्रकारिता में डूब गये थे. उन्होंने 'भास्कर' समूह के प्रधान सम्पादक का पद स्वीकार लिया था, ''कितने पाकिस्तान' पर काम कर रहे थे और कई अखबारों के लिए नियमित स्तंभ लिख रहे थे.

उन्हीं दिनों की बात है. मे्रे एक मित्र सरकारी सेवा से अवकाश प्राप्त कर दिल्ली में बस गये और स्वतंत्र लेखक और पत्रकारिता का मार्ग ग्रहण किया. यह एक कठिन मार्ग है. कठिनाइयां होनी ही थीं. उन्हें मुकम्मल नौकरी की तलाश थी, क्योंकि तब उनकी आयु पैंतालीस के आस-पास थी. पारिवारिक दायित्व और छोटी-सी पेंशन. मैं चाहता था कि उन्हें किसी अखबार - पत्रिका में काम मिल जाये. वह स्वयं इस दिशा में प्रयत्नशील थे. मैंने अपने वरिष्ठ मित्र योगेन्द्र कुमार लल्ला से बात की, जो उन दिनों 'अमर उजाला' (मेरठ) में संयुक्त सम्पादक थे. मित्र उनसे मिलने गये. लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी. तभी मुझे विचार सूझा कि यदि वह कमलेश्वर जी से मिल लें तो शायद कुछ बात बन जाये. सुना था कि कमलेश्वर जी ने लगभग सौ लोगों को या तो नौकरी दिलवायी थी या किसी न किसी रूप में उनकी सहायता की थी. अपना विचार मित्र पर प्रकट किया. वह बोले, "कमलेश्वर जी मुझे नहीं जानते… कैसे मिलूं-कहूं!"

"मैं मिलवा दूंगा…कह भी दूंगा." मैंने कहा.

इसे संयोग ही कहना होगा कि कुछ दिनों बाद ही एक साहित्यिक कार्यक्रम में कमलेश्वर जी से मुलाकात हो गयी. मित्र मेरे साथ थे. मैंने कमलेश्वर जी को उनका परिचय दिया तो वह तपाक से बोले, " चन्देल, मैं इन्हें जानता हूं". दरअसल कमलेश्वर जी की यह विशेषता थी कि वह किसी को यह अहसास नहीं होने देते थे कि वह उसे नहीं जानते थे.

"भाई साहब, ये आपसे अपने किसी काम से मिलना चाहते हैं." मैंने कहा, "इन्हें आपकी मदद की आवश्यकता है."

"सण्डे को फोन करके आ जायें."

लगभग डेढ़ वर्ष तक उस मित्र ने कमलेश्वर जी के साथ काम किया. उसके बाद उन्होंने उन्हें 'दैनिक भास्कर' में बतौर उप-सम्पादक नौकरी दिला दी, जहां वह स्वयं प्रधान संपादक थे. यद्यपि मित्र को कमलेश्वर जी के साथ जोड़ने में मेरी कोई अहम भूमिका नहीं थी, जिसे मित्र ने कमलेश्वर जी पर लिखे अपने संस्मरण में स्पष्ट भी किया, लेकिन मैं कमलेश्वर जी के प्रति कृतज्ञ अनुभव करता रहा. मैंने उनसे पहली और अंतिम बार किसी काम के लिए कहा और उन्होंने मुझे महत्व दिया था. जैसा कि कहा, कमलेश्वर जी ने अनगिनत लोगों की सहायता की और लोग उनके प्रति कृतज्ञ रहे, लेकिन ऎसे भी उदाहरण हैं जो बाद में उन्हें गाली देते देखे गये. ऎसा ही एक उदाहरण एक अनुवादक, टिप्पणीकार और कवि महोदय का है.

हुआ यह कि २६ मई,२००६ (शनिवार) को हिमाचल की 'शिखर' संस्था ने कमलेश्वर जी को प्रथम शिखर सम्मान प्रदान किया. सम्मान हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने उन्हें दिल्ली आकर हिमाचल भवन में प्रदान किया, क्योंकि उन दिनों खराब स्वास्थ्य के कारण कमलेश्वर जी ने शिमला जाने में असमर्थता व्यक्त की थी. कार्यक्रम के संयोजक कथाकार -पत्रकार बलराम थे. बलराम का आग्रह था कि मैं वहां 'कितने पाकिस्तान' पर बोलूं. कमलेश्वर जी पर अंग्रेजी में केशव और उर्दू में साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. गोपीचाद नारंग को बोलना था. हिन्दी के लिए मुझे चुना गया था. मैं बोला. अगले दिन कई अखबारों में समाचार प्रकाशित हुआ. जिन अनुवादक , टिप्पणीकार और कवि सज्जन का उल्लेख किया, वह २८ मई को मेरे घर आये. उन्होनें 'जनसत्ता' में समाचार पढ़ा था. कार्यक्रम की चर्चा चली तो उत्तेजित स्वर में बोले, "कमलेश्वर जैसा कमीना व्यक्ति मैंने अपनी जिन्दगी में कोई दूसरा नहीं देखा."

मैं हत्प्रभ.

मुझे कुछ कहने का अवसर दिए बिना वह आगे बोले, "देखा कैसे 'शिखर सम्मान' मैनेज कर लिया."

"कमलेश्वर जी को उसे मैनेज करने की क्या आवश्यकता थी. उन्हें सम्मानित कर 'शिखर संस्था' ने स्वयं को सम्मानित अनुभव किया होगा." मैंने प्रतिवाद किया.

क्षणभर की चुप्पी के बाद वह बोले,"और कुछ लोगों को मंच चाहिए होता है बोलने के लिए…कैसा भी मंच हो…बोल आते हैं." यह टिप्पणी मेरे लिए थी उनकी . उसके बाद तेजी से उन्होंने मेज पर से अपना चश्मा और पान का पैकेट (वह पान खाने के शौकीन हैं. एक खाते हैं और चार बंधा लेते हैं और हर समय साथ लेकर चलते हैं ) उठाया और मेरे कुछ कहने से पहले ही बिना दुआ - सलाम प्रस्थान कर गये. लेकिन जब कमलेश्वर जी की मृत्यु हुई तब ये सज्जन मेरे साथ उनकी अंत्येष्टि में गये थे. गाड़ी में हमारे साथ एक वरिष्ठ कवि और एक कथाकार मित्र भी थे.

उन सज्जन ने सबके सामने जो रहस्योद्घाटन किया उसने मुझे चौंकाया था. कमलेश्वर जी ने उनके बेटे की दो बार नौकरी लगवाई थी. नौकरी ही नहीं लगवाई थी, बल्कि उन्हें फोन करके सूचित भी किया था कि उनका बेटा जाकर वहां से नियुक्ति-पत्र ले ले.

हिन्दी में दूसरा कोई लेखक इतना उदार मुझे नहीं मिला, जितना कमलेश्वर जी थे. यदि कोई उदार रहा भी तो वह उनकी जैसी सक्षम स्थिति में नहीं रहा होगा. दरअसल दूसरों का कष्ट उन्हें अपना लगता था. शायद इसका कारण यह था कि उन्होंने अपने जीवन की शुरूआत बहुत ही संघर्षों से की थी. एक स्थान पर अपनी उस स्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा कि वह उन दिनों दिल्ली के राजेन्द्र नगर में रहते थे. बेटी छोटी थी. नौकरी कॊई थी नहीं. उन दिनों नाश्ते के लिए एक अण्डा उबाला जाता, जिसके पीले हिस्से को ब्रेड में लगाकर वे बेटी को देते और ऊपर के सफेद हिस्से को आधा गायत्री जी और आधे को वह ब्रेड के साथ लेते. कह सकते हैं कि कमलेश्वर जी कभी अपने अतीत को भुला नहीं पाये तभी अपने पास आए हर जरूरत मंद की सहायता के लिए तत्पर रहे. जब रमेश बतरा बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए, कमलेश्वर जी ही ऎसे साहित्यकार थे जो गायत्री जी के साथ नियमित शाम रमेश को देखने जाते रहे थे. डाक्टर रमेश का कोई ऑपरेशन करना चाहते थे, जिसके लिए लगभग सत्तर हजार रुपये खर्च होने थे. कमलेश्वर जी ने डाक्टर से कहा कि, " आप खर्च की चिन्ता न करें, मैं दूंगा…जो भी खर्च होगा… वे ऑपरेशन करें." रमेश ने मुम्बई में ‘सारिका’ में उनके साथ काम किया था. सोचा जा सकता है कि वह कितना चाहते थे लोगों को. बाद में डाक्टरों ने यह कहकर रमेश का ऑपरेशन नहीं किया था कि वह आखिरी स्टेज में थे.

हिन्दी में आज जो दलित विमर्श चर्चा के केन्द्र है, उसे कमलेश्वर जी ने तब उठाया था, जब यह लोगों की कल्पना से बाहर था…भले ही उसका स्वरूप कुछ और था.

कमलेश्वर प्रखर प्रतिभा के धनी और प्रयोगशील व्यक्ति थे. उन्हें यदि शब्दों का जादूगर कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी. उन्होंने अनेक फिल्में लिखीं और लगभग सौ फिल्मों के लिए संवाद लिखे. सतह से उठकर उन्होंने शिखर छुआ.वह पहले और शायद अंतिम व्यक्ति थे जो बिना आई.ए.एस. रहे दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक पद पर रहे थे. इंदिरा गांधी को केन्द्र में रखकर 'आंधी' जैसी फिल्म लिखने वाले कमलेश्वर जी को इंदिरा जी बहुत पसंद करती थीं. अंतिम दिनों में वह इंदिरा जी पर बनने वाली फिल्म के लिए काम कर रहे थे. सही मायने में वह विराट व्यक्तित्व के धनी और अथक परिश्रमी थे. उनके साथ मेरी दो मुलाकातें अविस्मरणीय रहीं. एक में मैंने उनका लंबा साक्षात्कार किया था. दूसरी में मैं सपरिवार उनके घर था. लगभग ढाई घण्टे मेरे परिवार के साथ घुल-मिलकर वह बातें करते रहे थे.

जिस रात कमलेश्वर जी की मृत्यु हुई, उस दिन अपरान्ह चार बजे मेरी मुलाकात उनके साले डॉ. माधव सक्सेना 'अरविन्द' (कथाबिंब त्रैमासिक (मुम्बई) के सम्पादक ) के साथ कनॉट प्लेस के कॉफी होम में निश्चित थी. अरविन्द जी सपत्नीक वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए आए थे. भाभी जी भी कॉफी होम आयीं थीं. उन्होंने कथाकार विजय को भी बुला लिया था. बातचीत के दौरान कमलेश्वर जी की चर्चा आयी तो अरविन्द जी बोले, "स्वास्थ्य ठीक नहीं है, फिर भी शादी में वे दीदी के साथ पहुंचे थे."

दरअसल कमलेश्वर जी किसी भी आत्मीय के कार्यक्रम में जाने या मिलने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते थे. मृत्युवाले दिन भी कुछ ऎसा ही हुआ था. वह विदेश से आये अपने एक मित्र से मिलने गये थे, लेकिन घर नहीं लौट पाये. वह उनकी अंतिम यात्रा सिद्ध हुई थी.

कमलेश्वर जी की मृत्यु हिन्दी जगत के लिए अपूरणीय क्षति है. वह कितना 'पापुलर' थे, इसका प्रमाण यह था कि उनकी मृत्यु के पश्चात देश के अनगिनत शहरों-कस्बों में उनके लिए शोक सभाएं आयोजित की गईं और अनेक पत्रिकाओं ने उन पर विशेषांक निकाले थे. शायद ही किसी हिन्दी लेखक की मृत्यु के बाद इतना सब हुआ हो. उनके साक्षात्कार का एक अंश 'गगनांचल' में प्रकाशित करने के विषय में जब मैंने डॉ. कन्हैयालाल नन्दन जी से बात की तब छूटते ही वह बोले थे, "उनके साक्षात्कार के विषय में पूछने की क्या बात रूपसिंह … उनके लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं ."

तो ऎसे थे कमलेश्वर जी… चमत्कारिक व्यक्तित्व. कुछ लोग उनकी प्रशंसा करते हुए उनकी कुछ कमियों - कमजोरियों का उल्लेख करना नहीं भूलते. कमियां - कमजोरियां इंसान में ही होती हैं और कमलेश्वर जी भी एक इंसान ही थे.

रूपसिंह चन्देल
बी-३/२३०, सादतपुर विस्तार ,
दिल्ली-११००९४

कहानी
आकाश
इला प्रसाद


क्या आप जानते हैं, सुन्दर लड़कियाँ क्या चाहती हैं ? हो सकता है आप जानते हों लेकिन आश्वस्त न हों कि जो जानते हैं, सही ही है तो चलिए मैं बतलाए देती हूँ। सुन्दर लड़कियाँ हर किसी की आँख में अपने लिए तारीफ़ देखना चाहती हैं।
आप कहेंगे ,बस इतना ही ? वह तो उन्हें सहज रूप में उपलब्ध होता है। सबॊं की आँखों में अपने लिए प्रशंसा देखते- सुनते ही तो वे बड़ी होती हैं।
लेकिन एक और बात है।
वे आकाश होना चाहती हैं।
क्या आप यह बात जानते थे? नहीं न, लेकिन मुझे पता है। क्योंकि मैंने ऋचा को देखा है। और अब जब मैं किसी सुन्दर लड़की से बातें करती हूँ तो मुझे पहले से पता होता है कि यह क्या चाहती होगी क्योंकि सुन्दर लड़कियाँ सब एक जैसी होती हैं , इस मामले में। वे आकाश होना चाहती हैं और ऋचा तो सौन्दर्य की परिभाषा सी थी।
वह कॉलेज कारीडोर में चलती तो दोनों ओर लड़के खड़े रहते - उसकी एक झलक पाने के लिए। उसकी गर्दन और ऊँची हो जाती। लड़कों में बाजियाँ लगतीं कि कौन जाकर उससे बात कर सकता है। गाने बजाए जाते -"तुमसे अच्छा कौन है !"
वह मुस्कराती, एक नजर देखती, चल देती।
लड़के दिल थाम लेते।
लेकिन यह तो कॉलेज के दिनों की बात है।
आत्मविश्वास से भरी, सारी दुनिया को अपने कदमों तले लेने को आतुर यह लड़की बड़ी हो गई। अब आगे आप सोचिए। सौन्दर्य के साथ यदि मष्तिष्क भी मिला हो, किसी को तो ?
उसे मिला था।
मैं कोई परी कथा नहीं सुना रही आपको । अपने चारों ओर देखिए। ऐसी लड़कियाँ होती तो हैं ही , चाहे बहुत थोड़ी। तो कहानियाँ भी तो ऐसी ही लड़कियों की बनती है न।
या यूँ कहिए कि वे कहानी बन जाना चाहती हैं।
तो ऋचा बहुत वर्षों तक कहानी बनी रही। लड़के इंतजार करते रहे कि वह शादी करेगी। कुछ जो अपने कॊ लायक समझते थे उन्होंने शराफ़त से रिश्ते भिजवाए, कुछ ने खुद प्रस्ताव रखा और वह सारे के सारे रिश्तों को उनके मुँह पर मार आई।
तब मेरी समझ में कुछ नहीं आता था।
वह मुझे अबूझ लगती थी। मैं ऐसी कॊई परी नहीं थी , पढ़ने में अच्छी थी सो उसने अपनी दोस्ती के काबिल समझ रखा था। उसके साथ चलती मैं कई बार हीन भाव से भर जाती।
वह अपनी विजय के किस्से सुनाती। मैं नासमझ पूछती - "तो तुम उससे शादी क्यों नहीं कर लेती ?
"उससे कौन शादी करेगा जी ? " वह मुँह बनाती।
हर बार वही। मैं चकित होती, आखिर इसे क्या चाहिए !
तब इलाहाबाद में अपनी पीएच डी समेट रही थी कि अचानक उसका पत्र मिला। "मैं शादी कर रही हूँ।"
मैं चकित, मैं प्रसन्न। उत्सुक भी कि कौन है वह खुशनसीब जिसको ऋचा ने इस काबिल समझा।
थीसिस जमाकर घर पहुँची तो अशोक आया हुआ था , इन्दौर से। मामा का लड़का।
बातों बातों में मैं बोल पड़ी "पता है ऋचा की शादी हो गई। "
अशोक एक बार उससे मिला था। उसकी सुन्दरता से , तेज दिमाग से प्रभावित हुआ था। सुनते ही चंचल हो उठा - कब हुई, किससे हुई?"
"तुमसे नहीं हुई , बस।" मैंने चिढ़ाया ।
वह उदास हो गया। चोट शायद गहरी थी।
"बैंक में है। तुम्हारे इन्दौर का ही है। निशीथ नाम है ।"
उसके पिता का नाम श्यामसुन्दर वर्मा है?"
"हाँ।"
"उससे कैसे इसने शादी कर ली ?"
'तुम्हें क्या?"
"वह लड़का अच्छा नहीं । उस परिवार को तो पूरा शहर जानता है !
"ईर्ष्या हो रही है ?"
"नहीं, तुम मिल लेना। कभी तो मिलोगी ही। तुम्हारी प्यारी दोस्त है। तब याद करोगी।"
वह मेरी प्यारी दोस्त तो थी ही। थोड़ा गर्व भी था मुझे उसपर कि आज कम्पनी की मैनेजर हो गई है ,तब जाकर उसे शादी का मन हुआ। समझ लेना चाहिए था मुझे पहले ही कि उसके जैसी जहीन दिमाग,सुन्दर लड़कियाँ जिन्दगी में छॊटी चीजों से समझौता नहीं करतीं। बड़ी नौकरी। बड़े शहर में। अपने कॊ पूरी तरह स्थापित कर चुकी थी वह , तब जाकर शादी की ।
मेरे माता-पिता अभी तक एक लड़का तलाश रहे थे जो उनकी नालायक बेटी का बोझ उठा सके। लेकिन उससे मेरी कोई तुलना नहीं थी। जब वह रिश्ते लौटा रही थी तब भी मेरे दरवाजे कॊई नहीं आया था। मेरी उम्र बढ़ती जा रही थी। मेरे पिता को डर लगा रहता था कि आखिर मेरी शादी होगी भी क्या ? लेकिन, वह तो इस मुद्दे पर बिल्कुल बेपर्वाह थी और आज उसने शादी भी कर ली थी।
हम बहुत समय तक उसकी शादी की ही चर्चा करते रहे। हर किसी को उत्सुकता थी और ढेर सारी बातें जमा हो रही थीं। लेकिन सबका सार एक ही था "आखिर उसने उस लड़के में क्या देखा ?'
"टॊल, डार्क, हैन्डसम।" उसने लिखा था। मैं बतलाती तो दोस्त लोग हँस देते ।

लेकिन बात सच थी।
मैं उन दोनों से मिली और चकित रह गई।
"कैसे तुमने इससे शादी कर ली?" मैंने ऋचा से अकेले में पूछा ।
"मैं आकाश हो गई थी।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं आकाश होना चाहती थी।"
"जमीन पर आ गई?"
"हाँ।"
"कैसे हुआ यह सब?"
"आकाश में आग लगी थी। ...फ़िर रुक कर उसने जोड़ा - और इतनी भी राख ना बनी कि मेरी ही मुट्ठियाँ भर सकें। मैंने वो निगाहें तलाशीं जिनमें आकाश को पाने की लालसा थी। लेकिन मुर्दा निगाहों से कॊई टकराना ही नहीं चाहता।"
मैं चुप हो गई।
"जिन्दगी में किसी को सबकुछ नहीं मिलता ", वह समझदारी से बोल रही थी -"मुझे भी नहीं मिला। तो क्या हुआ!"
"कुछ नहीं। रह सकोगी इसके साथ ? इसने तो तुमसे विवाह के बाद नौकरी भी छोड़ दी है।"
"निशीथ में कुछ अच्छी बातें हैं। तुम समझ नहीं पा रही। इसने मेरी सहायता की जब मुझे घोटाले में बेवजह फ़ँसाया जा रहा था। इसके कॉन्टैक्ट्स हैं। यह मेरी नौकरी भी संभाल सकता है और जिन्दगी भी। मैं इस महानगर में अकेले रहने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। उसे अमीर होना है, जल्दी से, इसीलिए बिजनेस करना चाहता है , नौकरी छोड़ दी।
“मैं फ़िर आकाश हूँ। हो जाऊँगी।"
"अच्छी बात है।"

इसके बाद पाँच वर्षों तक हम नहीं मिले। उसके बेटे की तस्वीर मुझे अरसे बाद मिली , जब वह चलना सीख चुका था। मैंने सुना ऋचा चुनाव में खड़ी होना चाहती है। चुनावों में निशीथ ने खूब पैसे कमाए और वह सचमुच अमीर हो गया। उसे अपने बड़े से फ़्लैट में ले आया। लेकिन ऋचा चुनाव में नहीं जीत पाई थी।
हम फ़िर मिले। मुझे एक कॉलेज की नौकरी मिल गई थी। मेरे पैसे राजनीति की वजह से अटके पड़े थे। नौकरी के बावजूद घर में खाने का जुगाड़ बिठाना मुश्किल। मैं उसके कान्टैक्ट्स का लाभ लेना चाहती थी।
उसने मेरी सहायता की।
"तुम तो सचमुच आकाश हो। " इस बार मैंने उसकी तारीफ़ की। उसकी वजह से मेरी समस्या सुलझी थी।
वह तृप्त भाव से मुस्कराई।
लेकिन मेरे सामने भी पति पत्नी के झगड़े चलते रहे। बेटा भागकर मेरी गोद में दुबक जाता।
"यह क्या है? क्यों इतना लड़ते हो ?"
"कहता है आफ़िस में बॉस के साथ इतनी बातें करती हो, यहाँ- वहाँ जाती हो तो मेरे दोस्त के साथ क्यों नहीं जा सकती ?"
"कहाँ जाना है ? तुम अकेले उसके साथ क्यों जाओगी ?"
"वही तो। कहता है उसके साथ जाओगी तो अगले चुनाव में जीत जाओगी। यह सुन्दरता किस काम की।"
मैं लौट आई।

वह लगातार बीमार चल रही थी। आजकल वापस अपने छोटे से शहर में थी, जहाँ मैं अब भी नौकरी कर रही थी और अपनी छोटी सी गृहस्थी में अपने सुदर्शन पति और बच्चों के साथ संतुष्ट थी। मैं आकाश नहीं थी और वह मेरे साथ रह सकती थी।
"मैं निशीथ के साथ नहीं रह सकती। " वह बोली
"तो तलाक दे दो।"
"बेटा नहीं मानता। पूरा बाप पर गया है। कुछ नहीं समझता। सारे समय बाप की तरफ़दारी।"
"उसे जाने दो उसके साथ।" मैं चिढ़कर बोली। "मर रही हो और हाल नहीं देखता।"
"मैं बेटे को नहीं छोड़ सकती।"
मुझे याद आया, निशीथ ने बतलाया था, वह गर्भावस्था के दिनों में अत्यधिक उद्विग्न रहा करती थी। मानसिक रुप से बच्चे को जन्म देने को तैयार ही नहीं थी। तब इस बात को लेकर भी उनमें खूब झगड़े होते थे। लेकिन जन्म के बाद से बेटा सर्वस्व था।
"तो झेलो।"मैंने कहा "बीमार रहॊ।"
वह लौट गई।

वह चाहती क्या है ? यह सवाल मुझे उलझाए रहता। वह बीमार ही रही। यह और बात है कि तब भी हर कोण से वह अब भी सुन्दर ही नजर आती थी। कॉलेज के दिनों के उसके दीवाने चाहे अब शादीशुदा लोगों में अपना नाम लिखा चुके थे, उसकी जिन्दगी को लेकर उनमें अब भी दिलचस्पी बाकी थी। उसके, रुतबे, विवाह, सन्तान , पति . अशान्त जिन्दगी सब की खबर अब हर किसी को थी। वह अब भी चर्चा में थी। मशहूर थी।
हर किसी को अब उससे सहानुभूति थी। वे उससे मिल भी आते।
निशीथ और भड़कता। गालियाँ देता।
मैंने सुना, वह अपने ही घर के बाहर रात भर बैठी रही। निशीथ ने उसे घर से निकाल दिया था। फ़िर एक मित्र के यहाँ जा कर रही, दो दिनों तक। तब फ़िर वापस लौटने की अनुमति मिली। उसके सारे पैसे भी अब ज्वायन्ट अकाउन्ट या निशीथ के अकाउन्ट में थे। बेटा अब भी पिता को छोड़ने को तैयार न था। वह अपनी सुन्दरता को अब भी बचाए हुए थी। अप्राप्य बनी हुई थी। आकाश थी। जब एक नजर के इशारे पर वह काम करा सकती थी तो खुद को परोसने की जरुरत क्या ? लेकिन निशीथ का अविश्वासी मन मानता ही नहीं था कि वह ऐसी ही रही है। वह तो विवाह के पहले उसे अपने साथ होटल में दो रात सुला चुका था। विवाह के बाद की विशिष्ट जिन्दगी के सपने दिखा कर। उस अप्राप्य सौन्दर्य को मुट्ठी में मसल चुका था।
लेकिन यह सब मैं आज जानती हूँ क्योंकि ज्योतिषी अंकल के सामने वह झूठ नहीं बोल पाई थी। उसने निशीथ के साथ अपने विवाह पूर्व सम्बन्धों की बात स्वीकार की थी। यह भी कि पारिवारिक झगड़े सुलझाने के लिए जो कोर्ट केस चल रहा था उसे जीतने के लिए उसे निशीथ की सहायता लेनी पड़ी थी। आफ़िस में अपने पद पर बने रहने के लिए भी। आकाश में आग कैसे लगी , कब लगी , अब मेरी समझ में आने लगा था। यह भी कि सौन्दर्य, मष्तिष्क और कैल्कुलेटिव प्रवृत्ति के बावजूद वह एक कमजोर, भावुक और मोहग्रस्त लड़की थी,जो आकाश होने का भ्रम पाले हुए थी। अब मैं जानती हूँ , सब सुन्दर लड़कियाँ आकाश नहीं होतीं। वे आकाश होना चाहती हैं ,व्यक्तित्व के उस विस्तार के अभाव के बावजूद , क्योंकि वे सुन्दर हैं।
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झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।
छात्र जीवन में काव्य लेखन की शुरुआत । प्रारम्भ में कालेज पत्रिका एवं आकाशवाणी तक सीमित।
"इस कहानी का अन्त नहीं " कहानी , जो जनसत्ता में २००२ में प्रकाशित हुई , से कहानी लेखन की शुरुआत। अबतक देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं यथा, वागर्थ, हंस, कादम्बिनी, आधारशिला , हिन्दीजगत, हिन्दी- चेतना, निकट, पुरवाई , स्पाइल आदि तथा अनुभूति- अभिव्यक्ति , हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुंज सहित तमाम वेब पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ प्रकाशित। "वर्तमान -साहित्य" और "रचना- समय" के प्रवासी कथाकार विशेषांक में कहानियाँ/कविताएँ संकलित । डा. अन्जना सन्धीर द्वारा सम्पादित "प्रवासिनी के बोल "में कविताएँ एवं "प्रवासी आवाज" में कहानी संकलित। कुछ रचनाओं का हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद भी। विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी एवं सम्मेलन की अमेरिका से प्रकाशित स्मारिका में लेख संकलित। कुछ संस्मरण एवं अन्य लेखकों की किताबों की समीक्षा आदि भी लिखी है । हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखों का अनुवाद और स्वतंत्र लेखन। आरम्भिक दिनों में इला नरेन के नाम से भी लेखन।कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) ।सम्प्रति :स्वतंत्र लेखन ।
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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

वातायन - दिसम्बर, २००८




चित्र : डॉ० अवधेश मिश्र
हम और हमारा समय

आतंकवाद की जड़ें

रूपसिंह चन्देल
२६ नवम्बर, २००८ को मुम्बई में हुआ आतंकवादी हमला ११ सितम्बर, २००१ को अमेरिका के 'वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर" पर हुए हमले की भांति ही सुनियोजित था. अमेरिकी हमले के तार किसी न किसी रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान से जुड़े हुए थे, जबकि हमारे देश में होने वाले सभी आतंकवादी हमलों की रूपरेखा पाकिस्तान की धरती पर ही तैयार की जाती है. वहीं चल रहे प्रशिक्षण केन्द्रों में आतंकवादियों को लश्कर- ए- तैय्याबा और आई.एस.आई. द्वारा संयुक्त रूप से प्रशिक्षित किया जाता है.यही नहीं विश्व के अन्य देशों में होने वाली आतंकवादी घटनाओं में सम्मिलित आतंकियों में से कुछ को पाकिस्तान में ही प्रशिक्षण दिए जाने के प्रमाण मिलते रहे हैं. आज सम्पूर्ण विश्व इस बात को समझ रहा है कि विश्व में व्याप्त आतंकवाद की जड़ें पाकिस्तान में हैं और उन्हें आई.एस.आई. का प्रश्रय प्राप्त है. प्रश्रय ही नहीं, आई.एस.आई अपने अनुसार उनका इस्तेमाल करती है-----खासकर भारत के विरुद्ध.

(मुम्बई आतंकवादी हमले में जलता हुआ ताजमहल होटल)
पाकिस्तान की जमीन से संचालित आतंकवादी गतिविधियों के विषय में भारत द्वारा लगातार उपलब्ध करवाये जाते रहे प्रमाणों पर अमेरिका आंखें मूंदे रहा. आंखें ही नहीं मूंदे रहा बल्कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में पाकिस्तान के छद्म सहयोग को महत्व देते हुए इसी उद्देश्य से उस पर करोड़ों डॉलर की राशि लुटाता रहा और आई.एस.आई. उस धन का दुरुपयोग आतंकवादी तैयार करने के निमित्त करता रहा. आज विश्व के कम-से कम दस ऎसे देश हैं, जो भायनक रूप से आतंकवाद से प्रभावित हैं. अपने को सशक्त मानने वाला चीन भी इस बात से आशंकित और आतंकित है और इसीलिए २६ नवम्बर को मुम्बई में हुए हमले के बाद उसने अपनी सीमाएं सील कर दी हैं.

(मुम्बई में आतंकवादी हमले का एक दृश्य)
पाकिस्तन को आतंकवाद की जड़ मानते हुए भी अमरीका अपने किंचित निहितार्थ के कारण न उसे छोड़ पा रहा है और न ही उसकी सहायता में कटौती करता दिख रहा है, बावजूद अपनी ध्वस्त हो रही आर्थिक स्थिति के. लेकिन हमारी विवशता क्या है कि हम कोई सख्त कदम उठा पाने में असमर्थ रहे और मुम्बई जैसे बड़े और घातक हमले के लिए आतंवादियों और आई.एस.आई के हौसले बुलंद हो जाने दिए. यह सब राजनैतिक इच्छा- शक्ति की कमजोरी को प्रमाणित करता है जिसके पीछे तुष्टिकरण का सीधा गणित है. संसद पर हमले का जिम्मेदार अतंकवादी अफ़जल गुरू जानता है कि वोट की राजनीति उसे फांसी के फंदे तक नहीं पहुंचने देगी. कितना दुखद है कि कलाम साहब से लौटी उसकी 'मर्सी अपील' की फाइल पर आजतक दिल्ली सरकार ने कोई टिप्पणी नहीं दी. वास्तविकता यह है कि फाइल उसी रूप में बंधी रखी है---- खोली ही नहीं गई.

अफजल गुरू एक मात्र उदाहरण नहीं है. यह सिलसिला स्व० विश्वनाथ प्रताप सिंह साहब के समय कश्मीरी नेता और तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी के अपहरण से प्रारंभ हुआ था. उसके बाद------ एक जान के लिए देश के हजारों आमजनों की जाने जाती रहीं. आज वे ही राजनेता एक दूसरे पर दोषारोपण करते नहीं अघा रहे. उन्हें आमजन की रक्षा से अधिक अपने वोटों की चिन्ता अधिक सताती है. अपनी सुरक्षा के लिए चीख-पुकार करने वाले इन लोगों ने देश की सुरक्षा के प्रति कितनी जिम्मेदारी अनुभव की यह जनता से छुपा नहीं है. आज देश चारों दिशाओं से आतंकवादियों से घिरा हुआ है. अभी तक समुद्री मार्ग सुरक्षित माना जा रहा था, लेकिन मुम्बई हमले ने सिद्ध कर दिया कि हमारी लापरवाही और नेताओं की राजनीति के कारण आतंकवादियों के लिए कुछ भी असंभव नहीं रहा.

अब इन समाचारों का क्या अर्थ कि हमारे रक्षा मंत्री ने तीन बार भारतीय नेवी को चेताया था कि समुद्री मार्ग से हमला हो सकता है या नरेन्द्र मोदी ने इस बात की आशंका केन्द्र सरकार से पहले ही व्यक्त की थी. यदि एण्टनी साहब ने यह आशंका व्यक्त की थी या नेवी को चेताया था तब उन्होंने चीफ ऑफ नवल स्टॉफ को बुलाकर उस दिशा में कुछ कार्यवाई करने और उसकी प्रगति रपट लगातार देने के लिए क्यों नहीं कहा? और यदि कहा था तब उस दिशा में क्या कोताही रही कि इतना बड़ा हादसा घटित हो गया. उसी दिन समुद्री मार्ग से आए दस आतंकवादी कितनी मात्रा में असलहा और आठ-आठ किलो के आर.डी.एक्स. बम ले आये थे, जो ताज महल होटल के अलावा अन्य जगहों में पाये गये. संभवतः असलहा पहले से ही यहां पहुंचाया जा चुका होगा और आतंकवादियों की संख्या कहीं अधिक रही होगी. निश्चित ही मुम्बई काण्ड में कुछ स्थानीय लोगों की भूमिका रही है और इस घटना को एक दिन में अंजाम नहीं दिया गया. समाचार यह हैं कि आज चौदह खूंखार आतंकवादी दिल्ली में किसी बड़ी घटना को अंजाम देने के लिए मौजूद हैं और ४४०० पाकिस्तान में तैयार बैठे हैं अपने आका आई.एस.आई. से निर्देश पाने के इंतजार में.

वर्षों से हम आतंकवादी हमलों से जूझते आ रहे हैं. आतंकवाद की जड़ें पड़ोसी देश में हैं यह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कहते भी रहे हैं लेकिन कोई ठोस कदम क्यॊं नहीं उठा पाये. संसद में हुए हमले के बाद सेना को पश्चिमी सीमा में तैनात कर दिया गया था और आशंका व्यक्त की जा रही कि कभी भी युद्ध हो जाएगा. लेकिन कुछ जाहिल सिरफिरों के लिए दोनों देशों की जनता पर युद्ध थोपना कोई विकल्प नहीं है. दरअसल हम अमेरिका की भांति यहां होने वाले आतंकवादी हमलों का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने में विफल रहते आए हैं. लेकिन आज स्थिति भिन्न है. मुम्बई हमले से पाकिस्तान समर्थन के इतने प्रमाण मिले हैं कि भारत को सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव १३७३ के तहत इसे सुरक्षा परिषद में अवश्य उठाना चाहिए. इतने दिन बीत जाने के बाद भी चुप्पी क्यों है? इस हमले में अनेकों विदेशी नागरिक मारे गये हैं, जिनमें छः अमेरिकी नागरिक हैं. कोण्डालिसा राइस का भारत दौरा इससे पहले हुए आतंकवादी हमलों के बाद क्यों नहीं हुआ इस बात को भारत को समझना चाहिए. भारत को पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविरों को ध्वस्त करने के लिए विश्व समुदाय की सहायता लेनी चाहिए और आज के संदर्भ में वह मिलना असंभव नहीं है. लेकिन यहां भी कहीं वोटों की राजनीति आड़े न आ जाये हमें यह आशंका है.

इस संदर्भ में मुझे दिल्ली के बाटला हाउस में दिल्ली पुलिस और आतंकवादियों के बीच हुई मुठभेड़ की याद आ रही है, जिसमें दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा शहीद हुए थे. राजनीतिज्ञों का एक बड़ा समूह ( जिसकी अग्रणी भूमिका ठाकुर अमर सिंह, पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव, केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान, रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव जैसे लोग निभा रहे थे ) उसे फेक एन्काउण्टर बता रहे थे और उसकी सी. बी. आई. जांच की मांग कर रहे थे. हमारे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का एक वर्ग भी यही सब कह रहा था. उनके अनुसार शर्मा को दिल्ली पुलिस के किसी सिपाही ने ही गोली मारी होगी. जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर ने दस कदम आगे जाकर पकड़े गये आतंकवादियों के लिए विश्वविद्यालय की ओर से कानूनी सयायता उपलब्ध करवाने की घोषणा भी कर दी, जिसे शिक्षा जगत में एक अनोखा उदाहरण माना जाएगा. यह सब लिखने का आभिप्राय यह कि आज देश की जनता आतंकवाद के जिस अभिशाप को झेल रही है वह हमारी कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है. अमेरिका में ९/११ के बाद कोई आतंवादी दुर्घटना क्यों नहीं घटी, क्योंकि वहां का हर नागरिक और नेता अमेरिकी पहले है---- डेमोक्रेट या रिपब्लिकन बाद में.

किसी दूसरे देश से संचालित आतंकवादी हमला उसकी सम्प्रभुता पर हुआ हमला है और उससे उसी प्रकार कठोरता से नपटने की आवश्यकता है जिस प्रकार अमेरिका और रूस नपटते हैं. सभी जानते हैं कि आतंकवादियों का कोई धर्म-जाति नहीं होता, फिर किसी धर्म-जाति की राजनीति में फंसकर आतंकवादियों के हौसलों को क्यों बुलन्द हो जाने दिया गया कि वे एक साथ पांच हजार लोगों की जाने लेने के लिए मुम्बई में उतर पड़े. पिछले आतंकवादी हमलों के दोषी आतंवदियों को अब तक फांसी क्यों नहीं दी गई?

यद्यपि मुम्बई हमले से हमारी सरकार का रुख सख्त दिख रहा है और सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वोट की राजनीति करने वाले नेताओं को भी सांप सूंघ गया है----- तथापि आम जनता पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रही है. सरकार जागी तो है, लेकिन वह कितने दिन जागी रहेगी --- यह भविष्य बताएगा.

बातचीत




संगत में संवाद

प्रसिद्ध साहित्यकार राजी सेठ से रमेश दवे की लंबी बातचीत :

वरिष्ठ कवि और आलोचक रमेश दवे ने राजी जी से लंबी बातचीत की जिसे 'साहित्य में संवाद' शीर्षक से 'संवेद फाउंडेशन', ( बी-३/४४, तीसरी मंजिल, सेक्टर-१६, रोहिणी, दिल्ली ) ने पुस्तकाकार ( ६४ पृष्ठ) रूप में प्रकाशित किया है. प्रस्तुत हैं उसके कुछ महत्वपूर्ण अंश.

रमेश दवे : वैसे तो कई प्रश्न ऎसे होते हैं जो लगभग हर लेखक से पूछे जाते हैं लेकिन यदि किसी लेखक के जीवन और लेखन दोनों के अन्दर से प्रश्न खोजे जाएं तो ऎसा लगेगा जैसे लेखक बनना ही आपकी स्वाभाविक नियति थी. क्या आपको लगता है कि आपका लेखन आत्मप्रेरित के साथ स्वाभाविक नियति ही है?

राजी सेठ : लगता है कभी कुछ चीजें अस्तित्व में होती हैं, पर आंखों से ओझल होती हैं जैसे कि उनकी उपलब्धता या उद्घाटन का समय अभी आया नहीं होता. आपकी इस बात पर एक बिम्ब दिमाग में आता है --- कोई एक वस्तु है पर वह औंधी पड़ी है, जो सामने होते हुए भी दिखायी नहीं पड़ रही-- कुछ -कुछ ऎसी है मेरे लेखन की शुरुआत. कह सकती हूं कि जीवन में अगर घर-गृहस्थी के अतिरिक्त कुछ और होना ही था, तो लेखन को ही सम्भव होना था, क्योंकि साहित्य के प्रति अनुराग ही मेरी प्रकृति और प्रवृत्ति के नजदीक पड़ता है. यदि मेरी योग्यता या क्षमता कुछ हो तो वह भी उसी दिशा में जाएगी. हां, यह जरूर है कि लेखक जैसा होने के जो बाहरी लक्षण होते हैं जैसे --- प्रकाशन की दुर्दम्य आकांक्षा, प्रेरक महत्वाकांक्षा, कुछ होने की इच्छा, यशेष्णा, पैशन आदि-आदि के प्रकट रूप सामने न होने से दोनों बातों में जुड़ाव नहीं बन पाया या वैसा कुछ मेरी समझ में नहीं आया. जब लेखन अनायास शुरू हो गया, तो कार्य-कारण श्रंखला मन में जुड़ने लगी. 'अनायास' इस अर्थ में कि शुरुआती दौर में अहमदाबाद (जहां मेरे पति पोस्टेड थे) में एक अहिन्दीभाषी कथा-शिविर लगा था. मैंने यों ही रोज-रोज की एकरसता से थककर उसमें भाग लिया था. अध्यक्ष श्री विष्णु प्रभाकर थे जिन्हें मैंने पहली बार देखा था. देशभर की उन अनेकों प्रविष्टियों में मेरी कहानी 'एक बड़ी घटना' सर्वश्रेष्ठ मानी गयी थी. तब तक डॉ. भोला भाई पटेल से परिचय हो गया था. वह उन दिनों अज्ञेय पर अपनी थीसिस लिख रहे थे. झिझकते मैंने अपनी एक कहानी
'समान्तर चलते हुए' उन्हें दिखायी थी जिसे उन्होंने अच्छी मानकर अज्ञेय सम्पादित 'नया प्रतीक' में भेज दिया था. वह कहानी वहां तुरन्त छप भी गयी. मेरे लिए अविश्वसनीय लगने की हद तक यह एक महास्वीकृति थी. उसके बाद फिर सिलसिला चल निकला. 'धर्मयुग' के भारती जी और 'कहानी' पत्रिका के श्रीपत राय से भी ऎसे ही प्रत्युत्तर मिले. शायद यही मेरी स्वाभाविक नियति थी. आत्मप्रेरणा से तो पता नहीं कुछ हो पाता या नहीं, पर इन घटनाओं ने उस समय की मेरी जीवन-स्थितियों में मुझे बहुत सहारा दिया. एक तरह से दिशा दिखा दी. अपने रुझानों के चलते मैंने अपने को वहां पूरे मन, प्राण से झोंक दिया. कह सकती हूं कि अपने घटकों, अपनी गढ़न-बुनावट को देखते यही मेरी स्वाभाविक नियति थी नहीं तो इतने हल्के से घटनाक्रम से यात्रा कैसे शुरू हो जाती.

रमेश दवे : आपके पास कविमानस, कथामानस के साथ-साथ एक दार्शनिक मानस भी है. भाषा की नव्यतम समझ के साथ-साथ उत्कृष्ट विश्व-कृतियों के अनुवाद की भी गहरी समझ है. आपको अपना कौन-सा लेखकीय रूप सर्वाधिक पसन्द है--- कवि, कथाकार या अनुवादक का ? क्यों ?

राजी सेठ : चेतना में दीवारें नहीं होतीं. कुछ भी, कभी भी किया जा सकता है. मुझे लगता है हम रचना-रूप को नहीं, रचनारूप अपने तनाव-दबाव, शिल्प और भाषा सहित हमें चुनता है. किसी खास समय या विषय पर क्यों कहानी ही लिखी गयी, क्यों कविता, कहना कठिन है. सवाल मनोगत आशय को पकड़ने का है वह जैसे भी पकड़ा जाए. दार्शनिक मानस की बात भी रचनात्मक मानस से अलग नहीं है. दार्शनिक मानस का होना अर्थात मननशील होना. चीजों को तटस्थ, तार्किक रूप से तल तक देखने की दीक्षा में होना. हर सोचने-समझने वाले व्यक्ति में यह प्रक्रिया अन्तर्निहित है. मैं इस वर्गीकरण को अलग से महत्व नहीं देती. अनुभव के लिए विचार और विचार के लिए अनुभव की बलि नहीं दी जा सकती. रचना एक प्रभावी सम्प्रेषणीय संश्लेष है, जिसे इसी तरह निष्पन्न होना होता है. मुझे अलग से यह कहने में भी कठिनाई होगी कि मुझे अपना कौन-सा लेखकीय रूप सर्वाधिक पसन्द है. मेरे सभी काम अनायास होते हैं, रास्ते में आन पड़ते हैं. जर्मन कवि रिल्के के १०० पत्रों का अनुवाद किया क्योंकि १० पत्रों की पहली पुस्तक 'लेटर्स टू ए यंग पोएट' ने 'निष्कवच' लिखते समय मुझे अधबीच पकड़ लिया. इतनी गहरी, समृद्ध , गम्भीर रचना-अधीरता और समर्पण के वहां दर्शन हुए कि छुटकारा पाना मुश्किल था. उस टेक्स्ट के सारतत्त्व को आत्मसात करने के लिए मुझे अक्षर-अक्ष्रर में निहित स्पंदन को अनुवाद द्वारा अपनी भाषा की लय में पकड़ना पड़ा. उस काम ने मेरा पुनः संस्कार ही किया, वह अलग बात है, पर इस बारे में मैंने कोई कांशस निर्णय नहीं लिया था. वस्तुतः विधा मुझे चुनती है, मैं विधा को नहीं चुनती. किसी इंटेस ज्योतित क्षण में जिसे होना होता है होने लगता है, मैं किस विधा का बेहतर उपयोग कर सकती हूं, यह मुझे दूसरों के रिस्पांस से पता लगता है. मेरे भीतर तो सब कुछ गडमड-सा ही है.

रमेश दवे : तत-सम' आपका पहला उपन्यास है. न वह प्रेमचन्द्र, रेणु, या जैनेन्द्र की परम्परा में है, न यशपाल, भीष्म साहनी या कृष्णा सोबती की परम्परा में? अज्ञेय ने 'शेखर एक जीवनी' के जरिए जो लिखा है, उसकी कोई ध्वनि भी 'तत-सम' में नहीं है.यह उपन्यास आपकी किस आन्तरिक चेतना का अनावरण या उद्घाटन है?

राजी सेठ : पहली बात तो यह है कि किसी को किसी दूसरे की तरह क्यों होना चाहिए या वैसा होने की आकांक्षा क्यों रखनी चाहिए. वस्तुतः हर उपन्यास लेखक के आत्मप्रत्यय का प्रतिफलन है. उसके उपार्जित सत्य का अन्वेषण, उसकी चेतना को जकड़े हुए किसी हिस्से का अनावरण . वह दूसरों का सत्य कैसे हो सकता है. लेखक यथासम्भव अपने मानसिक रूपकारों के नजदीक जाता है. वहीं अपने अर्थविस्तार की जमीन ढूंढ़ता है. समय की बाहरी क्रमबद्धता को तोड़कर अपना समय रचता है. उसमें अपने पात्रों को अवस्थित करता और अपने अभिप्राय को रचनात्मक रूप से उकेरता है. अपने अनुभव और अपने विजन से अपना अपरिहार्य गठजोड़ होने पर भी मनुष्यमात्र के सामाजिक और सर्वजनीन पक्ष को तौलता रहता है. यह सामान्य प्रक्रियाएं 'तत-सम' पर भी लागू होती हैं. अपनी रचना में दूसरों की नकल, अनुसरण, ध्वनियों का पीछा करने की गुंजाइश है कहां? मेरे लिए तो और भी नहीं जो मैं उतने लम्बे समय तक साहित्य की दुनिया और उसके प्रभावों से दूर रही हूं. वैसे भी कोई दूसरों की तरह क्यों होना चाहेगा. जिन लेखकों की आपने चर्चा की है वे भी तो अपने ही आधारों पर खड़े होकर बड़े हुए हैं.

रमेश दवे : आप में विभाजन का नॉस्टेल्जिया है. इस नॉस्टेल्जिया को आपके पात्रों के नामों में पकड़ा जा सकता है --- जैसे सुरजीत, वीरां, कप्पी, तिन्नी, चन्नी आदि. पंजाबीपन का यह दबाव तो आप पर स्वाभाविक लगता है लेकिन रामरिख जैसे नाम उतने सहज नहीं लगते. क्या विभाजन का क्षोभ या पंजाबी आत्मीयता आज भी आपकी कथाओं में नॉस्टेल्जिया की तरह हस्तक्षेप करता है?

राजी सेठ : यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि इस नॉस्टेल्जिया को एक रचनात्मक सरोकार की तरह देखने की मुझमें ज्यादा प्रखर प्रतीति है. नामों में क्या है. वे तो परिवेश की औलाद हैं, इसलिए संस्कृति विशेष को इंगित भी कर सकते हैं, पर हमेशा ऎसा नहीं होता. लिखते समय के दबाव में जो नाम ध्यान में आया वह कथा के पूरा होने तक वहीं स्थित हो जाता है. लिखते समय अक्सर कॊई नाम देना मुझसे नहीं भी बन पाता. अन्तर्वस्तु के उकेरने की प्रमुखता के वातावरण में 'यह' 'वह' से काम चला लेती हूं. वैसे पात्रों के नामों के चुनाव को लेकर इस तरह के नतीजे निकालना मुझे अस्वाभाविक ही नहीं, गलत भी लगता है. नाम किसी का कुछ भी हो सकता है. जब मैं साहित्य-रचना हिन्दी में करती हूं, हिन्दी बोलती हूं, उत्तर प्रदेश में रहती रही हूं तो 'रामरिख' नाम चुनने में अजूबा क्या है. आज के सिकुड़ते संसार में नाम तो दक्षिण भारतीय या किसी और भाषा को इंगित करता हुआ भी हो सकता है.

विभाजन का क्षोभ या पंजाबी आत्मीयता मेरे लेखन में हस्तक्षेप करने का कोई डर पैदा नहीं करती. मैं जो लिख रही होती हूं, पूरी तरह उसी की होकर रहती हूं, यह बात अलग है कि उपयुक्तता के हक में मैं उन भाषाओं के शब्दॊं का खुलकर इस्तेमाल करती होऊं जो भाषाएं मैं जानती हूं. इसमें उर्दू, गुजराती, पंजाबी, अंग्रेजी सभी कुछ शामिल हैं. अंग्रेजी के प्रयोग को लेकर पहले मैं सचेत नही थी, पर अब सचेत हूं. जहां तक बने हिन्दी में उसका समानार्थी शब्द ढूंढ़ना चाहती हूं, जब तक असफल न हो जाऊं. इस क्रिया से मुझे अपनी प्रियतर भाषा (हिन्दी) के समृद्ध और समावेशी होने का सुख मिलता है. ऎसा करना अपना दायित्व भी लगता है.

पंजाबी भाषा बोलना मुझे खूब पसन्द है, पर अब ऎसे अवसर जीवन में कम होते जा रहे हैं. पंजाबी का लोक-संगीत अपनी लय-ताल के लिए उतना ही पसन्द है, जितना भारतीय शास्त्रीय संगीत.

रमेश दवे : एक रचनाकार अपने लेखन की निरन्तरता बनाये रखने को लेकर स्वयं से असन्तुष्ट ही रहता है. वह अपने असन्तोष के भीतर से भविष्य के सन्तोष या भविष्य की रचनात्मक उत्कृष्टता की खोज करता है. क्या आपको ऎसा लगा कि आपने अपनी रचनाओं से उस सन्तोष को हासिल कर लिया है और अगर ऎसा नहीं लगता तो क्या आपके अन्दर उसे पाने की छटपटाहट है?

राजी सेठ : छटपटाहट और असन्तोष की बात क्या कही जाए, वह तो अस्तिव्त का दूसरा नाम हो गया है. अव्वल तो देर से लिखना शुरू किया. लगता है अभी तो मैं अपने हाथ मांज रही हूं. अपने उपकरणॊं को जांच रही हूं, रचना-कौशल की क्षमताओं तक को नापने-तौलने के लिए मुझे अभी तक पूरा समय नहीं मिला. अपने जीवन-अनुभव में रचने के लिए जो कुछ मुझे महत, बृहत लगता रहा है, अभी तो उससे भी छेड़छाड़ नहीं की. हो सकता है ऎसा सोचना मात्र मेरा भ्रम हो, और मैं अपनी क्षमताओं में ही छोटी पड़ती होऊं. एक बात और - किसी घटना के ज्ञान को झट विवरणात्मक चित्रण में रूपान्तरित करने की जल्दी मेरे स्वभाव में नहीं है, मुझे उस आत्म-प्रकाशित, (शायद मेरी अपनी दृष्टि से पूर्ण (?) किसी ऎसे क्षण की तलाश रहती है, जिसमें अनुभव कम-से कम एक बार, काल के सभी आयामों में एकबारगी खुलता हुआ दिखायी दे जाए - किसी चित्र की तरह, जिसकी सतह तो सपाट होती है, पर जिसमें कितनी ही वीथियां, परतें, काट , तराश एक साथ दीख जाती हैं. ऎसी कठिन शर्तों के बीच जो रचना करने का सपना लेकर बैठा हो, उसे छटपटाहट के सिवा और क्या हाथ लगेगा?

रमेश दवे : आपको उपन्यास लेखन और कहानी लेखन के बीच किस तरह का भेद दिखाई देता है जबकि प्रवृत्ति दोनों की एक समान है.

राजी सेठ : उपन्यास लम्बा और कहानी छोटी यह तो एक प्रकट किस्म का भेद है, जिस पर ध्यान देना जरूरी नहीं भी है क्योंकि इनके भेद-विभेद का आधार लम्बा या छोटा होना नहीं है. यह मात्र फलक के चुनाव का मामला भी नहीं है. फलक के चुनाव की बात तो चुनाव में निहित-सी है. उपन्यास एक सिलसिलेवार रेलैक्स्ड विधा है. उपन्यास अन्तर्वस्तु को थामे रहकर भी इधर-उधर, पार्श्वों में ताक-झांक कर सकती है. उप-कथाओं, गौण पात्रों, हाशिय की स्थितियों से सांझा करता हुआ बार-बार अपनी मुख्यधारा में शामिल हो सकता है. उसका घटित एक तरह से सतत वर्तमान है. वह आगे-पीछे के समय को नाथते हुए चलता है, अपने समय की रचना करता चलता है.

वस्तुतः इन दोनों विधाओं का भेद इनके चरितार्थन में है. ठीक से याद नहीं पर शायद 'ओ कॉनर' ने अपनी व्याख्या में इस मुद्दे का स्मरणीय स्पष्टीकरण किया था. उनके अनुसार, कहानी का गंतव्य रहस्योद्घाटन (रीवीलेशन) में है, उपन्यास का विकसनशीलता (इवोल्यूशन) में. कहानी अपनी चुनी हुई स्थिति को एकाएक प्रकाशित कर देने के बिन्दु तक लाती है. उपन्यास में स्थिति, पात्र, समय, अक्सर स्थान भी गतिशील या विकसनशील बने रहते हैं. वहां लेखक का धीरे-धीरे वयस्क होता विजन पाठक को साथ लेता, मूल्यों की उसकी समझ के दायरे में दाखिल होता चलता उसकी अवेयरनेस को बदलता है.

मेरे विचार में कहानी एक कठिनतर विधा है. वह चुस्त, पैनी, सटीक, बेराहत, अपनी धुरी (केन्द्रीयता) पर कायम रहते हुए भी, समय के तीनों आयामों की जटिलताओं को साथ लेने और संकेतित करने के अवसरों को भांपती हुई, एक एसा नुक्ता चुनती है, जहां कम कहते हुए भी भीतर-बाहर का सब कुछ एक साथ प्रकाशित हो सके. उसका काम अपने समेटने को एकाएक खोल देना है. प्रभाव की तीक्ष्णता और चिन्ता ही उसे कहानी बनी रहने देती है. यह कहना गलत नही होगा कि कथालेखन सम्वेदना के संयम और मित्भाषी होने के कौशल का क्रिटिकल आर्ट है. वहां अधिक कहने का लोभ , बनती हुई प्रभावान्विति को बिगाड़ सकता है. कहानी की सिद्धि प्रभाव की एकान्विति को पाना है वही उसके शिल्प का निर्माण करती है. इतनी कसी हुई होती है कि कहा जा सकता है कि अपने अन्त से ही शुरू होती है. प्रभाव की चिन्ता से मुक्त होकर कहानी अपने आधारों को शिथिल कर देती है. इन मापदण्डों के बीच तुलती, वह बड़ी-से बड़ी और छोटी-से -छोटी हो सकती है. वहां आशय ऎसे खिंचकर आता है जैसे मुट्ठी बांधकर कोई नदी में पड़े जाल को खींचकर आशय को बाहर लाता है.

रमेश दवे : आप अपनी कहानियों में मृत्यु को बहुत स्थान देती हैं, क्यों? क्या इसका सम्बन्ध आपकी किन्हीं जीवनगत घटनाओं से है?

राजी सेठ : यह तो मानना ही पड़ेगा कि मृत्यु का विचार, क्योंकि जन्म के साथ ही पैदा हो जाता है इसलिए इसके अस्तित्व को लेकर एक मानसिक खांचा, हर किसी के दिमाग में पहले से रहता है जो जीवन-अनुभव के हस्तक्षेप के चलते जुड़ता-घटता रहता है. जैविक वास्तविकता के अलावा मृत्यु का विचार एक मानसिक विचार भी है जो औरों की तरह मेरे मनाकाश में भी रहता आया है. जिसका उपयोग जीवन के ही एक आयाम की तरह हम रचनाओं में करते ही करते हैं-- एक स्थिति-परिस्थिति की तरह. संयोगवश आत्मीयों की अकाल मृत्य जैसी कई दुर्घटनाएं भी जीवन में कुछ कम नहीं घटीं. उहोंने मानसिक खांचों को काफी दूर तक हिलाया-डुलाया भी. नयी वास्तविकताओं से सामना करना पड़ा जिसमें विस्मृति और सृजनात्मकता दोनों ने काफी सहारा दिया, पर उपस्थित सन्दर्भ में अपनी बात करूं तो कह सकती हूं कि मृत्यु सदा से ही, बहुत से रूपों में मेरे एहसास के घेरे में बनी रही है. छुटपन में वह आत्मीयों (मुख्यतः माता-पिता दादा) को खो देने के डर से जुड़ी रही. अपनी बचकानी जैसी कल्पना में हर बार मैंने ऎसा कुछ हो सकने से पहले ही, स्वयं मरने की कामना की है पर कालान्तर में वास्तव के घटित का सामना करते सारा परिप्रेक्ष्य ही बदल गया. एसा तो होना ही था. समझ में आया कि किसी चीज की कल्पना घटित से ज्यादा भयानक होती है, क्योंकि वह असल के अनुमान में, अपरिहार्यता हमारे लिए जानी-मानी चीज हो जाती है पर अपनी रचनाओं में मृत्यु का उपयोग मैंने एक आत्यन्तिक इंटेंस स्थिति को पा सकने की गरज से किया है. उस टर्मिनल प्वाइंट पर खड़े होकर देखने से स्थिति, घटनाक्रम ऎंगल सब बदल जाता है, तब पात्रों पर उन घटनाओं का प्रभाव भी मेरे लिए जांचने-परखने की चीज़ हो जाता है. मैं पहले भी कह चुकी हूं कि मेरी कहानियां, घटनाओं को लेकर कम और घटनाओं के 'प्रभाव' की पड़ताल करने की प्रक्रिया में लिखी जाती हैं. मृत्यु के मुद्दे से लगकर और भी बहुत कुछ है जो कहा जा सकता है पर वह मेरे रचना-प्रसंग से इतर होगा, इसलिए उसकी चर्चा करना जरूरी नहीं लग रहा.

रमेश दवे : लेखन में दिशा पा लेने के बाद आपको लगता है कि आपको अपना लक्ष्य मिल गया है ?

राजी सेठ : 'लक्ष्य' मिल जाने के तो बहुत बड़े मायने हैं. अभी तो ठीक से यह भी मालूम नहीं कि इस धरती पर हमारे होने का लक्ष्य क्या है. इतना जानती हूं लेखन में 'दिशा' मिल जाने से अब अपनी जिम्मेदारियों के अतिरिक्त, कहीं और, इधर-उधर ध्यान नहीं जाता. भटकन नहीं होती. हताशा जरूर होती है कि लिखना जिस एकाग्रता और सघनता के गहन में जाकर होना चाहे, नहीं हो पाता. पढ़ने-सोचने-लिखने के लिए समुचित समय नहीं मिलता. कहना चाहिए, समय मिल जाता है पर समय में गुणवत्ता का पहलू गायब होता है.ये सब पीड़ादायक एहसास है.
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राजी का जन्म ४ अक्टूबर, १९३५ को नौशेहरा (अविभाजित भारत) में हुआ था. एम.ए.(अंग्रेजी साहित्य), विशेष अध्ययन तुलनात्मक धर्म और भारतीय दर्शन. हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी , उर्दू और गुजराती का भाषा ज्ञान. लेखन की शुरूआत जीवन के उत्तरार्द्ध में. लगभग सभी विधाओं में लेखन.

प्रकाशन : अंधे मोड़ से आगे, तीसरी हथेली, यात्रा-मुक्त, दूसरे देश काल में, यह कहानी नहीं, किसका इतिहास, गमे हयात ने मारा, सदियों से , खाली लिफाफा (कहानी-संग्र), तत-सम, निष्कवच (उपन्यास). जर्मन कवि रिल्के के सौ पत्रों का हिन्दी अनुवाद. अंग्रेजी सहित कई भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित . कई पुस्तकें विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में.

भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार और हिन्दी अकादमी सम्मान/ पुरस्कार, अनन्त गोपाल शेवड़े पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित, कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की सम्मानित सदस्य. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की फैलो रहीं.

सम्पर्क : एम-१६, साकेत, नयी दिल्ली-११००१७
दूरभाष : ०११-२९५६२२३२, २९५६३२५६


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रमेश दवे

जन्म : ०७ नवम्बर, १९३५, शाजापुर (म.प्र.)

शिक्षा : एम.ए.(इतिहास, अंग्रेजी साहित्य और शिक्षा ).
प्रकाशन : कांच के दरख्त का डर, पिकासो के घोड़े हुसैन के घर (कविता), समकालीन अफ्रीकी साहित्य , समकालीन रचना और विचार, कृष्ण बलदेव वैद गल्प का विकल्प, आलोचना : समय और साहित्य, हिन्दी आलोचना : अन्त का आरम्भ (आलोचना), एक नहीं था अफलातून, सुल्तान अहमद का हुक्मनामा, चीख (नाटक), देह दीक्षा (कहानी-संग्रह). स्वीडिश कथाकार पॉर लागरक्विस्त के उपन्यास और अफ्रीकी कविताओं का हिन्दी अनुवाद.

'समावर्तन' के प्रधान सम्पादक.

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का नन्ददुलारे बाजपेयी आलोचना सम्मान.

सम्प्रति : अध्यक्ष, मध्य प्रदेश, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल.
संपर्क : एस.एच.१९, ब्लॉक-८, सह्याद्रि परिसर,
भदभदा रोड, भोपाल -४६२००३

कहानी

छलावा

क्षितिज शर्मा

किस्सा बहुत पुराना नहीं है, एकदम नया भी नहीं.

मध्यवर्गीय ताक-झांक से खरोंच-खरोंचकर खबरें लाने में परिपूर्ण हमारे मित्र पूर्णानंद, उन्हें रोचकता देने के लिए रस-सिद्धान्त के नित्य नए आयाम ला पटकने में प्रायः भरतमुनि को भी पटकनी दे देते हैं. उनकी इस रसप्रियता से मेरा विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि कहानी का जन्म इसी ताक-झांक से हुआ होगा.

हो सकता है खोजी पत्रकारिता भी यहीं से निकली हो.

जो किस्सा यहां कहानी बनने जा रहा है, उसे पूर्णानंद जी ने मुझे कई टुकड़ों में सुनाया है. स्त्री -पुरुष-सबंन्धों के किस्सों को तो कोई अनाड़ी भी अपनी चेपियों से चमका सकता है. जब सुनानेवाला पूर्णानंद जैसा सिद्धहस्त हो तो कहानीकार को उनकी नौतिक टिप्पणियों को हटाकर मानवीय सरोकारों और संवेदनाओं के साथ कल्पना की उड़ान भरने में कितनी देर लगती है!

किस्से के घुमाव-दर-घुमाव वाले तोड़-मरोड़ से कहानी का आरंभ यों हो सकता है-

वह उन्नीस सौ छिहत्तर का साल था. महीना था नवम्बर . तरीख अठारह थी . दिल्ली के लिहाज से बुरा मौसम नहीं था . सुहावने दिन थे - न पंखे की जरूरत थी, न रजाई की. दिन में धूप की चिन्ता किए बगैर घूम-फिर सकते थे. रात में भी नौ-दस बजे तक टहलकदमी का आनंद लिया जा सकता था, बशर्तें आप के पास एकाध साथी हो और बाहर जैसी रंगत आपके भीतर भी हो-- अपरिचित शहर के अकेलेपन की उदासी में डूबे कमरे की बास हरदम आपसे चिपकी न रह रही हो.

"सुनिए, बेबी को बुखार है. आपके पास समय हो तो....." वसुधा के दबे-सहमे अनुरोध ने उदासी में डूबे कमरे में कई विद्युत-चुम्बकीय तरंगें प्रवाहित कर दी थीं. बास का गंदलापन किसी महक के तले दब गया था.

वसुधा की बात पूरी होने से पहले ही चन्द्रप्रकाश समझ गया था-- वह डॉक्टर के पास चलने को कह रही है. लेकिन उसकी उपस्थिति से किसी वशीकरण में-सा आया, स्वर को सही मायने में ग्रहण नहीं कर पा रहा था. इतने दिनों के प्रवास ने वसुधा को लेकर जो अविश्वास पैदा कर दिया था, चुम्बकीय शक्ति के आकर्षण के सामने वह न पूरी तरह टूट पा रहा था, न अपनी जड़ों पर मजबूती से खड़ा रह पा रहा था.

चन्द्रप्रकाश की नासिका और मन सुगंध से भर गए. आंखें विश्वसनीयता को खोजने में सिकुड़ी रहीं.

"सुनिए....!" वसुधा के नए शब्दों ने आंखों की सिकुड़न को फैलाव दिया तो वह झटपट ऎसे खड़ा हो गया जैसे इतनी देर से इसी अवसर की प्रतीक्षा में बैठा हो. उसकी तत्परता में मौका हाथ से छूट न जाए की जल्दबाजी भी आ गई.

वह पैरों में चप्पल डालने को लपक लिया.

"चलो!" कह तो उसने दिया, आवाज में लोच नहीं आई-- स्वर ऊंचा चला गया. उसे अफसोस हुआ. अपने को सुधारने के अंदाज में उसने आवाज को धीमा और मुलायम किया, 'बुखार तेज था तो पहले बताती! अब पता नहीं डॉक्टर की दुकान खुली भी होगी या नहीं.----- देखते हैं, नहीं तो अस्पताल चलेंगे." आवाज में अपनापन तो आ गया, मादकता फिर भी नहीं घुल पाई.

बेबी को वाकई तेज बुखार था. एक सौ चार से कम तो क्या ही रहा होगा, "बाप रे----! इसका तो बदन तप रहा है! बड़ी गलती की तुमने----- बताती तो सही!"

वसुधा ने उसकी तरफ पलक उठाकर देखा-भर, बोली नहीं. शायद बेबी के बुखार ने उसे ज्यादा ही चिन्तित कर दिया है--- चन्द्रप्रकाश ने अनुमान लगाया. तभी अहसास भी हो गया, उसे अपने लहजे से बुखार को और तेज नहीं बनाना चाहिए था. इस समय जरूरत तो उसके दुःख को खुद ओढ़कर उसे चिन्तामुक्त करने की थी.

बाहर निकलते समय बेबी को उसकी गोदी से अपनी बाहों में लेते हुए वह नए सिरे से जागृत हो रही पुरानी अनुभूतियों की ओर लौटने लगा था. क्षण भर को चिंतित स्थितियां आत्मकेंद्रित हो रही लहरों में दब गईं.

"हमारी बिटिया रानीका बुखार तो अभी हो जाएगा छूमंतर----." वह उद्वेलित मन का उल्लास था जो बेबी को दुलार से पकड़ते वक्त स्वतः स्फुटित हुआ था.

यहां मैं पूर्णानंद जी की निर्लज्ज टिप्पणियों का जिक्र नहीं करूंगा. वे सर्वविदित हैं--- उनमें नया कहने को कुछ भी नहीं हैं. मैं वही बता रहा हूं जो पूर्णानंद जी के संकेतों से देख रहा हूं. चन्द्रप्रकाश, इस बार बोलने में भूल नहीं हुई कि आनंदित दृष्टि वसुधा की ओर डालता है और सपाट चेहरे पर मलीन हो आए कोमल चिन्हों को ढूंढ़ने की कोशिश करता है. वहां कुछ न पाने पर मंथर गति से ठहराव की ओर चलता स्थिर हो जाता है.

गली अब पार हो गई थी---- मेन रोड आ गया था. चन्द्रप्रकाश बेबी को कंधे के सहारे लिए आगे चल रहा था. वसुधा पीछे थी, करीब पांच दस गज के फासले पर. सर्दी नहीं थी. जैसा कि पहले बताया है, महीना नवंबर का था . पर रात होने के करण हवा में जुछ तेजी थी. थोड़ी नमी थी और हल्की -सी ठंडक भी. मेन रोड के खुलेपन में हवा को और तेज बहने के लिए जगह मिल गई थी. उससे वसुधा थोड़ा और सतर्क हो गई. उसने बेबी को शॉल से ढक दिया और इसी में वह चन्द्रप्रकाश से पूरी तरह छू गई. चन्द्रप्रकाश की स्थिरता बेग पा गई और स्पंदन की जिन तरंगों को वह छिपाना चाहता था वे जग जाहिर होने को उतावली हो आईं.

उसी से बचने के लिए उसने दूर खड़े रिक्शावाले को आवाज दे दी.

रिक्शावाले को डॉक्टर सेठी की दुकान पर चलने को कह उसने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाना चाहा, "योगेश कब तक लौटेंगे बाहर से ?"

"कह नहीं सकती, शायद कल ही आ जाएं."

जवाब में रस नहीं , खिंचाव था. वह खिंचाव चन्द्रप्रकाश के भीतर तक चला गया-- उसे असहज कर गया. उपेक्षित हो आने के दंश में, उस स्थिति को नहीं पा सकने की बेचैनी भी शामिल हो गई, जिसके लिए वह अचानक व्याकुल हो उठा था.

उसने उड़ती नजरों से वसुधा को देखा. वह रिक्शे पर जितना हो सकता था उतना फासला बनाकर सिकुड़ी बैठी थी. निगाहें रिक्शावाले की बगल से होती हुई सड़क के खुरदरेपन से टकरा रही थीं. चेहरा परेशानियों से घिरा जान पड़ रहा था. चन्द्रप्रकाश को कोफ्त-सी हो उठी-- ऎसा भी क्या है? बेबी की तबीयत इतनी खराब तो नहीं है! मौसम बदलता है तो बच्चे बीमार हो ही जाते हैं.---- हो सकता है बेबी को इतना तेज बुखार पहली बार हुआ हो, इसलिए वसुधा ज्यादा घबरा गई हो. वरना तय है, मुझसे कहने की बजाय वह पहले घरेलू नुस्खे आजमाती. कम से कम एक रात और इंतजार करती. कल तक तो योगेश के लौटने की सम्भावना थी ही.

****

वसुधा के व्यवहार से कभी-कभी मन इतना खिन्न हो जाता कि चन्द्रप्रकाश सोचता है--- इस शहर में तबादला होना ही दुर्भाग्यपूर्ण रहा. जब तक यहां नहीं आया था तो पुराना समय बीत ही चुका था. उसके कुछ अर्थहीन और संदर्भहीन-से अवशेष ही बचे थे दिमाग में, जो यदा-कदा भूले-बिखरे हादसों की तरह ध्यान में आ जाते थे और इसका हल्का असर दिखाकर जल्दी ही विलीन भी हो जाते थे. कोई असर अगर बचा रहना भी चाहता था, तो मीरा--उसकी पत्नी, अपनी खिलखिलाहट से उसे मिटा देती थी. चन्द्रप्रकाश सोचता था--- परिपक्वता का भी अपना स्थान होता है. समय का बदलाव भी यही है कि आदमी हालात के हिसाब से ढल जाता है. मुझे ही देख लो, ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग अपने ही शहर में हो गई. विवाह हो गया और जल्द ही एक बच्ची का पिता बन गया. जिंदगी दो-चार क्रियाओं में बंध गई. न फालतू का वक्त रहा, न फालतू का सोच-विचार.

यहां आते ही एक बार फिर भीतर के उसी झंझावात से उलझना पड़ा. लगा, वसुधा के करीब आने के अलावा मुक्ति का और कोई रास्ता नहीं बचा है. उसकी तथाकथित परिपक्वता ने उसे धोखा दे दिया. ऎन मौके पर पल्ला झाड़ गई. चन्द्रप्रकाश छिटककर युवावस्था के मुहाने पर जा पहुंचा. वह खुद अचंभित था-- बीते दिन वर्तमान की सभी स्थितियों को नकारने को आतुर थे. हादसों के असरों को मिटा देनेवाली मीरा की खिलखिलाहटों के अर्थ अचानक बदल गए थे. वे मीरा के होंठ थे ही नहीं, उनकी चमक वसुधा से उधार ली हुई थी. अपने सम्मोहन में वे बता रहे थे, उसकी परिपक्वता मीरा में वसुधा को स्थापित करने की कवायद थी.

मीरा को मीरा के रूप में कब देखा उसने?

सवाल तेज रौशनी की तरह कौंधा. वह उद्वेलित ही हो आया. बेचैनी में उठे उसके हाथों ने वसुधा के किवाड़ों पर इतनी दस्तकें दे डालीं कि शहर गूंज उठा, पर अफसोस! वसुधा ने सुना ही नहीं.

वह बंद किले की मजबूत दीवारों और फाटकों में भीतर घुस सकने लायक दरारों को खोजते-खोजते पस्त हो गया. घायल सिपाही की तरह बिस्तर पर पड़ा भयावहता को देखता रह गया. एक धारणा स्थायित्व पा गई कि इस शहर में वसुधा से अलग रहना असम्भव है और यहां से भाग जाना बिलकुल ही मुश्किल .

पूर्णानंद जी उसके हावभाव पर चकित हैं. --'तो पट्ठे का पुराना चक्कर है. उनकी टिप्पणी में लोच है--- आवाज में हकलाहट--'शादीशुदा होने के बाद भी ! ' अपनी मध्यवर्गीय नौतिकताओं की ऎसी-तैसी होते देख उन्होंने जितना कहा और जितना कहने को उनके भीतर था, उससे कथा के सूत्र पकड़ना बड़ा आसान हो गया. थोड़ी-बहुत कल्पना तो 'सच्ची कहानियों' में भी जड़नी पड़ती है.

**

कथा का विगत यह है कि महीना-भर पहले चन्द्रप्रकाश का तबादला इस शहर में हो गया. शहर उसके लिए अपरिचित था-- पहली बार यहां आ रहा था. हिचक स्वाभाविक थी--- छोटे शहर की अपने दायरे में सिमटे रहने का मजा देनेवाली डरपोक मानसिकता थी.

पर मामला नौकरी का था. प्रमोशन मिली थी. हिचक को पिताजी ने तोड़ दिया. सहारे की गठरी दे दी, "सीधा वसुधा के वहां जाना. वे लोग रहने का प्रबंध कर देंगे. थोड़े दिन काटो, फिर वापसी की कोशिश करेंगे."

जाने का निश्चय तो तभी कर लिया था, प्रमोशन का पत्र मिलते वक्त ही उत्साह पुराने दिनों के ध्यान में लौट आने की गुदगुदी से बढ़ा. स्मृति-पटल पर मोटे अक्षरों में अंकित हो गया था-- कभी वसुधा और मेरे बीच निकट सम्बन्ध थे. मैं वसुधा था और वसुधा मैं थी.

उस रात रेल की बर्थ पर लेटे-लेटे पूरा युग जी गया वह. अतीत ने अपना कुछ भी नहीं छिपाया. सब-कुछ उसके सामने उघाड़ दिया. सवेरे गाड़ी से उतरते वक्त ध्यान में वसुधा ही थी. मुझे अचानक देखकर सकपका न जाए! अगर अकेली हो तो रो ही न पड़े!---- हो सकता है कुछ बदलाव आ गया हो. सुना है एक बच्ची हो गई है. हमारी पिंकी से शायद थोड़ी बड़ी है.---- हो सकता है बच्ची ने भीतर के खालीपन को भर दिया हो! फिर भी विगत से छुटकारा मिला है किसी को? मैं भूला कुछ----.'

यहां आकर पता चला वसुधा के पापा ने उसके आने की सूचना उन्हें पहले ही दे दी थी. उन्होंने बगल के मकान में उसके लिए कमरे का प्रबंध भी कर लिया था.

उसने आते ही वसुधा की प्रतिक्रिया जाननी चाही. चेहरे पर कोई हाव-भाव नहीं था. गहराई से ढूंढ़ने खोजने का अवसर नहीं था. वसुधा ऎसा अवसर दे भी नहीं रही थी. काम में ज्यादा ही व्यस्त थी. चन्द्रप्रकाश के मन ने कहा---- उसके आने से वसुधा को कोई फर्क नहीं पड़ा है.

उसके उदास और मलिन होने के लिए इतना काफी था. समय का जरा-सा अंतराल परिचय के सारे चिन्ह मिटा देता है. उसने अपने-आपसे पूछा-- अभी कल ही की तो बात है-- बसुधा और मेरे परिवार में कितनी घनिष्ठता थी? रोज का आना-जाना था. मेरे जाने पर वसुधा खिल जाती थी. उसने कब चाहा, मैं उसके घर से जल्दी लौट जाऊं? उलझाकर रोक देने के कई बहाने थे उसके पास.

कल और आज का अंतर अजनबीपन को इतना गहरा गया कि दिल्ली उसे डराने ही लगी. स्थिति असहनीय-सी बन आई. दिन अवसाद में डूबने लगे.

बचने के लिए सहारा बनी बेबी. बेबी अगर उससे घुल-मिल न गई होती, तो हर वक्त उपेक्षित महसूस करने का दंश नर्वस ब्रेकडाउन करा ही देता.

दफ्तर के बाद का समय बेबी के साथ खेलने में गुजर जाता था. यह कई मायनों में अच्छा हुआ. चन्द्रप्रकाश को अवसाद से बाहर निकलने का मौका तो मिला ही, इस जुड़ाव से योगेश और उसके बीच भी परिचय हो गया.बातचीत के लिए छोर ढूंढ़ने की बात नहीं रह गई.

अपरिचित तो वसुधा रह गई. पता नहीं, उसके पास काम ही इतना था या चन्द्रप्रकाश के जाने पर नया काम निकल आता था. उसकी व्यस्तता कम नहीं होती थी.

यह व्यस्तता चन्द्रप्रकाश को मथ देती थी. घुटन हो जाती थी. वहां बैठना मुश्किल हो जाता था. अपना ही अंतर कोचोटता था-- तू यहां के लिए एक अवांछनीय तत्व है. किस रिश्ते की डोर पकड़े बैठा है यहां? चाहता क्या है--- और क्या मिल सकता है जबर्दस्ती भीतर घुस आए आदमी को? कौन है यह औरत? वसुधा तो नहीं है!

-- तो यह तड़प, यह अवसाद उस औरत में वसुधा को लौटा लाने की उत्कंठा है.

"हां, है----." भीतर गूंजी चीख उसे उत्तेजित कर जाती है. उसका रंग सूर्ख हो जाता है. आंखों में पानी की परतें जमा होने लगती हैं. धीरे-धीरे उसमें पारदर्शी झरोखे बन जाते हैं, जिनसे टुकड़ों-टुकड़ों में उस पार का अपार संसार दिखने लगता है. शरीर में रक्त संचार तीव्र हो जाता है.हाथ बेचैनी के मद में से आए वसुधा की ओर बढ़ने को तत्पर हो जाते हैं कि उसे झकझोरकर उसकी स्मृति को लौटा लाएं. चीखकर कहे उससे-पहचानो मुझे! मैं चन्द्रप्रकाश हूं! तुम्हारा चन्द्रप्रकाश !---- और तुम वसुधा हो. तुम्हें वसुधा ही बने रहना होगा. नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा या भाग जाऊंगा यहां से और वहां से भी -- सब को छोड़कर----! नहीं चाहिए मुझे कुछ वसुधा के सिवा.

****

पारदर्शी झरोखे पर धीरे-धीरे पर्दा गिरता है. सुर्खी को घुलने में फिर भी वक्त लग जाता है. इतना ही वक्त लगता है उसे चन्द्रप्रकाश की जून पाने में. लम्बी दौड़ के बाद हांफते-हांफते थमने में शरीर जैसे निढाल हो जाता है. वैसी ही गति में आ गया चन्द्रप्रकाश अब आतुर आंखों से बस इतना ही पूछना चाहता है--'विगत का कुछ भी याद नहीं वसुधा तुम्हें?'

पर वसुधा की व्यस्तता ने इतना पूछने का मौका भी नहीं दिया. कभी चाय का कप पकड़ाते पुरानी मुस्कान का एक अंश जरूर दिख जाथा था, 'पापा का पत्र आया है, आपकी खबर पूछी है.'

पता नहीं भीतर पनपता अजाबीपन का तनाव था या हवा-पानी का बदलाव, यहां आने के दस-पन्द्रह दिन बाद बीमार पड़ गया. शिथिलता तो पहले दिन से ही महसूस हो रही थी, ताप अब चढ़ा दस बारह दिन की हरारत के बाद. ठीक उसी तरह का बुखार था, कंपकंपी वाला, जैसा कॉलेज के दिनों में आया था---- एम.ए. प्रीवियस के पेपर के बाद. एक बार तो वह घबरा ही गया था. मम्मी-पापा बाहर गये हे थे, बुखार एक सौ चार से नीचे आने को तयार नहीं था. पर धीरज रखने को एक आसरा था-वसुधा.

सवेरे छः बजे से रात नौ बजे तक दसियों चक्कर लगा जाती थी. चाय, नाश्ता, खाना, दवा, सब जिम्मा खुद ओढ़ लिया था. कड़क नर्स बन गई. मरीज को रत्ती-भर भी छूट नही थी अपनी मनमर्जी करने की. डंडा तगड़ा था--- जैसा डॉक्टर ने कहा है, वही होगा---- क्योंकि जिम्मेदारी मेरी है. पूरे दिन के ताप का हिसाब होता था उसके पास और डॉक्टर को देने के लिए हर घड़ी का उतार-चढ़ाव होता था.

यहां इस कंपकंपाते बुखारे में उसका आसरा थे-- एक रजाई और एक कंबल. कभी-कभी बेबी के स्नेह-भरे कोमल हाथ - 'बुखार आया अंकल को' के मधुर स्वर. सुबह-शाम योगेश आ जाते थे. डॉक्टर के पास वही ले गए थे.

वसुधा तीसरे दिन सवेरे आई थी, चाय और थोड़े बिस्कुट लेकर, "कैसी है तबीयत?" एक नीरस औपचारिकता थी.

पर चन्द्रप्रकाश को उसमें भी एक आनंद की अनुभूति हुई. हवा का एक ताजा झोंका आया. ताप को कुछ कम कर गया, लेकिन कंपकंपी को बढ़ा गया.

"पहले से बैटर हूं." जो कहने का मन हुआ, वह भीतर ही घुमाता रह गया. शब्द मर गए. सांस के साथ आह! जैसी थकन बाहर निकली और वापसी में अजीब किस्म की छटपटाहट को अंदर खींच ले गई.

इच्छा थी वसुधा से और बहुत कुछ पूछे. पर शुरुआत के लिए कोई सिर पकड़ने की बजाय हड़बड़ी में खुद भी औपचारिकता ही निभा पाया, "चाय की बेकार तकलीफ की."

शायद इस हड़बड़ी में 'चुप रहने से संवाद स्थापित होना असम्भव है ' की एक बेचैनी ही थी. एक दिक्कत शब्दों के न रहने से भी आ रही थी. आखिर सम्प्रेषण का माध्यम क्या हो?

"वे जल्दी में थे, दफ्तर के काम से बाहर जाना था. कह गए थे आपको चाय दे आऊं और खाने के लिए पूछ लूं."

वसुधा ने मौन ही नहीं तोड़ा, उसके भीतर बन आई एक सुखद तस्वीर को भी ध्वस्त कर दिया. रंगों का गीलापन एक-दूसरे में ऎसे समा गया कि उन्होंने अपनी पहचान तो खोई ही, सुंदरता का नामोनिशान भी मिटा दिया. ताप कुछ और चढ़ आया. कल से खाई दवाइयों का असर खत्म हो गया. मुंह का स्वाद ऎसा बिगड़ा कि शब्दों से भी बदबू आने लगी.

"खाने को क्या बना दूं?" वसुधा ने पूछा.

"कुछ नहीं, मन नहीं कर रहा." जबर्दस्ती धकेले गए सूखे शब्दों में रस तो नहीं ही था, दम भी नहीं था. उन्हें सुनने के लिए सचेत कानों की जरूरत थी.

वसुधा का तो रोम-रोम सतर्क था. तभी उसने होंठों से सूत-भर की दूरी तय कर पा रहे शब्दों को ग्रहण कर लिया था. चन्द्रप्रकाश के पूरी तरह रजाई में दुबक जाने से पहले ही उसके कदम दरवाजे को उलटने लगे थे.

क्रिया और प्रतिक्रिया एक-दूसरी के स्वभाव से पूर्ण परिचित थीं. उन्हें उतार-चढ़ाव के मायने खोजने की जरूरत नहीं थी--- यह कहानीकार का 'वर्जन' है. पूर्णानंद जी का 'वर्जन' है--- हर प्रेमी-प्रेमिका नाटक करते हैं. सैकड़ों फिल्मों में हमने देखा है. यहां भी देख लेना, वही होगा.

आगे की कथा पर पूर्णानंद जी उछल पड़े-- देखा, हमने क्या कहा था?

करीब डेढ़ घंटे बाद वसुधा फिर आई थी, बेबी को लेकर. चन्द्रप्रकाश पत्रिका के पन्नों में उलझा हुआ था.

"बेबी आपको याद कर रही थी. बार-बार आपके पास आने की जिद कर रही थी."

चन्द्रप्रकाश थोड़ा उत्साहित हुआ. बेबी को पुचकारा . झुककर उसे उठाया और पलंग पर बैठा लिया.

उसे गम्भीर देख, बेबी चुप-चुप-सी उसे देख रही थी. वह हल्के से मुस्कराया, "हमारी रानी बिटिया को अंकल की याद आती है?"

"खाने को कुछ मन नहीं? थोड़ा ले लेते!" वसुधा ने दूर खड़े-खड़े पूछा.

"ऊं-हूं!" उसने गर्दन नहीं उठाई . बेबी को पुचकारने में लगा रहा.

***

आज रिक्शे में वह उसके इतने करीब बैठा था कि अतीत की ओर लौटने से बच नहीं सकता था. विगत वर्तमान को अपने में समा लेने की ताकत पा गया था. चन्द्रप्रकाश उस शक्ति के आगे लाचार था. भावुकता विवश किए हुई थी. उसे हर हालत में अतीत को सत्य ठहराना था. मुंह खुलना बाकी था, शब्द जीभ पर आए बैठे थे. इतने अपरिचित तो नहीं हैं हम वसुधा! मेरी स्थिति तुमसे अलग नहीं है. विवाहित हूं, एक बच्ची का बाप हूं. पर सामाजिक रिश्तों से भिन्न आत्मीय रिश्ते भी होते हैं--- आंतरिक तृष्णा की तृप्ति के लिए. सामाजिक -पारिवारिक सम्बन्धों की सार्वजनिकता, उनमें नितांत निजी क्षणॊं की तुष्टि की गुंजाइश कहां छोड़ती है! उनमें समाहित दायित्वों और मर्यादाओं के तटबन्ध अवरोधक की तरह बार-बार संयमित व्यवहार के लिए चेताते रहते हैं. वे आत्मीय सम्बंध ही हैं जो तटबंधों को उच्छलित लहरों की तरह एक ही छलांग में लांघ जाते हैं-- सुख और आनंद की विलक्षण अनुभूतियां दे जाते हैं---- और तुम हो कि लहरों के पंख काट देना चाहती हो.

रिक्शा डॉक्टर की दुकान पर पहुंच गया था. चन्द्रप्रकाश को भी भावुकता से बाहर निकल आना पड़ा.

"कब से है बुखार?" डॉक्टर ने पूछा था.

"कल से....." जवाब वसुधा ने दिया.

डॉक्टर के जांच परीक्षण करने तक दोनों टुकुर-टुकुर देखते रहे.

"कोई ज्यादा गंभीर बात तो नहीं...? " इस बार चन्द्रप्रकाश ने पूछा था.

"नहीं---- आप लोगों ने ध्यान नहीं दिया. तकलीफ एक-आध दिन पहले से है. निमोनिया होने की संभावना है. दवा से आराम आ जाएगा. फिर भी, आराम न आया तो सबेरे फिर ले आइए."

दवा लेकर वे फिर रिक्शे में बैठ गए. चन्द्रप्रकाश थोड़ा उत्साहित हो आया था, जैसे डॉक्टर से हुई बातचीत से समर्थन पा गया हो. उसे लगा-- भीतर उमड़ती बात की हत्या, अपनी हत्या है. रिक्शा के लिए अतीत ही उसका संबल था. वर्तमान उसे सिरे से ही नकार दे, यह उसके बर्दाश्त से बाहर था.

उसने उत्तेजना को थामा और शालीनता के आवरण में अपना दावा ठोक देने का तरीका पा लिया, "मौसम बदलने पर थोड़ा सावधान तो रहना ही चाहिए. याद है ना, जरा सी लापरवाही से कॉलेज के दिनों में मैं कितना बीमार हो गया था! अगर तुम न होती तो----."

अब विगत को, वसुधा के आज के चेहरे को पढ़ना था. बाकी का समर्थन और साहस वहीं से प्राप्त होना था.

वह चेहरा सपाट तो नहीं था. कुछ स्याह था, कुछ सफेद . कुछ लालिमा लिए हुए था, कुछ पीलापन. खिला बिल्कुल नहीं था. मुर्झाया हुआ कहना भी गलत होगा. ... लेकिन चन्द्रप्रकाश के लिए उसमें कुछ नहीं था-- इतना उसने पढ़ लिया था.

अपने पढ़े को जांचने के लिए उसने फिर उधर नजर उठाई. कोई परिवर्तन नहीं था. आंखें डूबी हुई थीं. किसी अवसाद में नहीं, शायद चिन्ता में. बेबी को उसने कसकर पकड़ रखा था. बार-बार खिसक रहे शॉल से बेबी को ढकने में लगी हुई थी.

अब चन्द्रप्रकाश के अवसाद में डूबने की बारी थी. पर वह अवसाद से पहले बेचैन कर देनेवाली उत्तेजना में जा पहुंचा-- ऎसा भी क्या है कि नहीं बोलने की कसम खा ली है? कुछ असम्भव तो नही चाह रहा हूं मैं. अच्छे मित्र-परिचितों जैसे रसभरे दो बोल ही तो थे. उसके लिए इतनी उपेक्षा!

उसने खीझी हुई आंखों से उसकी ओर देखा तो अपना ही हृदय डोलने लगा. चेहरे के रंग गड़बड़ाए हुए थे. उसमें एक ठहराव था-- झील-सी स्थिरता थी. उसे लगा, वहां एक पवित्र मूर्ति रखी हुई है जिस पर गुस्सा करना पाप है.

कसे हुए दिमाग को खुलापन देने के लिए उसने आंखें मींची ही थी कि रिक्शा ठक से रुक गया . घर आ गया था.

वसुधा बेबी को अंदर ले गई तो बोझ जैसे भारी कदमों में संगत कर बैठा. उसे भी दवा का लिफाफा पकड़े अंदर जाना पड़ा.

बेबी को पलंग पर लिटाकर उसने चन्द्रप्रकाश से बैठने को कहा और खुद किचन की ओर लपकी . चन्द्रप्रकाश पलंग के पास बैठा बेबी के सिर पर हाथ फेरता रहा. वह पानी चम्मच लाई तो उसने बेबी को दवा पिला दी. संवाद को शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ी.

खाली कप पलंग के नीचे खिसकाकर वह उठ खड़ा हुआ. कदम बाहर को मुड़ ही रहे थे कि वसुधा ने पीछे से पुकार दिया, "सुनिए----."

वह ठिठका. कदमों के साथ चेहरा भी उसकी ओर मुड़ गया.

"आप कहीं और रहने का प्रबंध नहीं कर सकते?"

वह अवाक निरंतर उसे देखता रह गया. वसुधा के स्वर, लहजे और चेहरे पर फिर आए कंपन को वह देख ही नहीं पाया. टूटे कांच के टुकड़ों-सा सपने को बटोरने में ही लगा रहा.

सिर घूम गया, पूरी तरह.

वहां से फटाफट निकल भागने के अलावा उसके पास और कोई विकल्प नहीं था.

***

किस्से को चरम तक पहुंचाने में पूर्णानंद जी के ताक झांकी खोजी स्वभाव का कायल मैं बेशक नहीं हूं, पर सूचनाओं के लिए मुझे उनका आभार प्रकट करना चाहिए. लेकिन मैं उनकी टिप्पणियों से परेशान हूं. वह मेरी संवेदनशीलता को ही चुनौती देने लगते हैं. अब भी वह चुप नहीं हैं. नैतिकता का डंडा लिए चन्द्रप्रकाश को जबर्दस्ती खदेड़ने में लगे हुए हैं. टिप्पणी उन्होंने ठोक दी है-- प्रेमी और पागल पिटे बिना रास्ते पर आ ही नहीं सकते. और क्या कहती यह औरत! शालीनता से दुत्कार तो दिया, पर वाह रे मोटी खाल वाले मर्द-- टला नहीं , डटा रहा, पड़ोस में.

इसलिए कथा के चरम पर आ जाने पर भी, उसे आगे बढ़ाने की मजबूरी आ पड़ी है मुझ पर.

हुआ यों-- पराजित पस्त-सा चन्द्रप्रकाश अपने कमरे तक आते-आते पूरी तरह टूट चुका था. शब्दों के अर्थ धीरे-धीरे खुले थे. उनकी गूंज दीवारों से टकराकर प्रतिगूंज के रूप में कानों पर हथौड़े की तरह बज रहे थे. उनकी अप्रियता ने कमरे की बास को असहनीय बना दिया था. अजनबीपन खड़ा होकर खुद ही बोलने लगा था. उसकी भयावहता कमरे से ही नहीं, शहर से ही भाग जाने को कह रही थी.

चन्द्रप्रकाश न बैठ सका, न लेट सका. भीतर का एक कोना जो उपेक्षित और अकेला कर देनेवाली स्थितियों से उत्पन्न हीनता से लगातार लड़ रहा था, चन्द्रप्रकाश का संवाद उसी से बना हुआ था. निर्णय भी उसी की बातचीत से निकला कि इस कमरे में एक दिन भी नहीं रहना है. कल ही दो चार दिन के लिए किसी होटल में चले जाना है. इस बीच दफ्तर के सहयोगियों की मदद से कमरा तलाशना है. महीने-दो महीने में तबादला हो गया तो ठीक, वरना तरक्की की ऎसी-तैसी! पुराने पद पर अपने शहर लौट जाना है.

सामान उसने रात में ही बांध लिया था. सिर्फ बिस्तर बचा था गोल करने को. उसे सवेरे करना था-- रात कट जाने के बाद.

नींद तो नहीं आई, पर मन शांत रहा. अजनबीपन अपने-आप सहम गया. दृढ़ निश्चय के आगे करतब दिखाने का मौका नहीं पा रहा था. कमरे में बास थी--- चन्द्रप्रकाश ने उसकी ओर भी ध्यान नहीं दिया. उसका असर भी अपने-आप खत्म हो गया.

सवेरे चन्द्रप्रकाश अलसाया-सा उठा. आंख खुलते ही नजर बंद कमरे के चुंधले में पसरी पड़ी बीती रात पर पड़ी. उसने चेहरा हथेलियों से ढका और बंद आंखों के भीतर से सीधा खड़े होने की ताकत बटोर ली.

चाय -नाश्ते का सामान रात ही बंध चुका था. उसके लिए अब बाहर ही खाना था. उसने गली में कदम रखा ही था कि योगेश अपने दरवाजे पर खड़े दिख गए. वे रात की गाड़ी से लौट आए थे.

उन्हें देख वह एक कदम झिझका. उसका शिष्टाचार लौटता, योगेश ने पहले ही अभिवादन कर दिया, "नमस्ते, चन्द्रप्रकाश जी! सवेरे-सवेरे बिना नहाए-धोए---."

"यों ही, जरा बाहर तक टहलने..... आप कब लौटे?"

"अभी आया हूं. पांच बजे पहुंचा घर. लेकिन आप परेशान से क्यों नजर आ रहे हैं? अरे भाई, कोई गुस्ताखी हो गई दिल्लीवालों से?"

अपने हंसमुख स्वभाव के मुताबिक योगेश ने कहा, तो चन्द्रप्रकाश सकुचा गया. वह तो हंसी-मजाक के लिए तैयार नहीं था. दूसरा, एक चोर रात से ही भीतर बैठ गया था, जिसे अपने पकड़े जाने का डर था. वह चन्द्रप्रकाश को सहज नहीं होने दे रहा था.

"असल में चाय बनाने का मूड नहीं था. सोचा, बाहर चाय पीने के बहाने थोड़ा चहलकदमी कर लूंगा." असहज मन ने जल्दी छुटकारा पाने की तत्परता में कह दिया.

"जब घर है तो बाहर भटकने की क्या जरूरत है? अंदर आइए, यहां बैठ के पीते हैं चाय."

विवश था चन्द्रप्रकाश. भीतर जाने को बिल्कुल इंकार कर चुके पैरों को योगेश के पीछे घसीटना पड़ा.

"स्वास्थ्य तो ठीक है?" योगेश ने पूछा.

"स्वास्थ्य को क्या होना है." उखड़ी-सी हंसी में चन्द्रप्रकाश बोला.

"तो आप ही ठीक नहीं हैं. दिल्ली बेगानी ही बनी रही आपके लिए. इतनी बुरी जगह तो नहीं है यार! राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तक यहीं रहना पसंद करते हैं. थोड़ा दिल लगाओगे तो दिल्ली फिर कहीं नहीं जाने देगी आपको."

योगेश उसे सहज करने की जितनी कोशिश कर रहे थे, वह उतना ही असहज होता जा रहा था. एक जकड़न-सी हो आई थी भीतर, जो एक ही रट लगाए हुए थी. - 'तुम यहां के लिए अवांछनीय तत्व हो. जितनी जल्दी हो सके, उठ लो, सुखी रहोगे.'

"असल में बात यह है योगेश भाई, मैंने तय कर लिया है-- एक महीना और कोशिश करूंगा. तबादला हो गया तो ठीक , नहीं तो लोअर पोस्ट पर घर लौट जाऊंगा. तब तक के लिए दफ्तर के पास ही जगह ढूंढ़ता हूं, यहां से आने-जाने की दिक्कत है." यह साफगोई बेकार की लाग-लपेट में से सहानुभूति बटोरने की बजाय, भाग निकलने की जल्दबाजी थी.

"अरे!" योगेश चौंक ही गए.

"हां, मैंने सामान बांध लिया है. शाम तक निकला जाऊंगा. " यह वसुधा से अधूरे टुट गए संवाद को पूरा कर, दोनों की एक-दूसरे से मुक्ति का ऎलान था.

इसकी घोषणा पर योगेश सन्न रह गए. हत्प्रभ से उसे देखते रह गए. वसुधा भी जो चाय लेकर आई थी,क्षण भर को ठिठकी. बिना गर्दन उठाए वापस किचन को लौट गई.

चाय का दौर खामोशी में चला- एक मूक संवाद भी चलता रहा दोनों के बीच. योगेश ने मन में सोचा-- पदोन्नति रोज नहीं मिलती. कैरियर के लिए लोग अपना देश तक छोड़ देते हैं. सरी उम्र विदेशों में कट जाती है. एक ये चन्द्रप्रकाश हैं----.

चन्द्रप्रकाश ने कहा-- 'यहां योगेश बनकर तो कोई भी रह सकता है, आनंद से. चन्द्रप्रकाश बनकर रहना असम्भव है!'

कप उठाने आई वसुधा को योगेश ने कहा, "वसुधा, तुम समझाओ भाई , तुम्हारे मायके के हैं. हो सकता है दिल्ली इतनी रूखी हो कि बाहर से आए हुओं के प्रति बेरहमी दिखाती हो. पर हमारा तो इनसे यही कहना है-- निर्णय जो भी लो, इनका मामला है. लेकिन , जब तक आप दिल्ली में हैं,हम आपको यहां से जाने नहीं देंगे. वरना लोग क्या कहेंगे हमसे--- ससुराल के एक आदमी को भी खुश नहीं रख सके?"

योगेश के ठट्ठे पर चन्द्रप्रकाश और वसुधा को चुप ही रहना था.

यह चन्द्रप्रकाश के दिल्ली में जम जाने की नींव का पहला मजबूत पत्थर था.

पूर्णानंद जी चन्द्रप्रकाश पर कितनी ही लानतें फेंकें, सच यही है __ योगेश ने चन्द्रप्रकाश को अकेलेपन से बाहर निकालने का निर्णय ले लिया था. वे जानते थे चन्द्रप्रकाश का इसी पद पर वापस तबादला संभव नहीं है. उसके इस शहर से उखड़ने का जो कारण उनकी समझ में आया था, उसका निदान उन्होंने अपने तरीके से कर दिया. चन्द्रप्रकाश की जानकारी के बगैर पत्र लिखकर उसकी पत्नी और बच्ची को यहां बुलवा लिया.

ये कुछ दिन असहजता से भरे थोड़ी बेचैनी के थे.

पत्नी और बच्ची को अचानक देख चन्द्रप्रकाश सकपकाया . कुछ दिनों तक अपनी स्थिति को समझ ही नहीं पाया. भटकता रहा. वसुधा मरीचिका बन गई थी और मीरा उसके उखड़े स्वभाव को चिंता में मलिनता से सांवली हो आई थी--- वसुधा के साफ रंग के आगे अपना आकर्षण खो रही थी.

पिंकी को तो खैर बेबी मिल गई थी खेलने के लिए. योगेश ने चन्द्रप्रकाश की मनोदशा को पकड़ ही रखा था. उन्हें विश्वास था अकेलेपन के दंश से बाहर निकलते ही चन्द्रप्रकाश की दिनचर्या स्थायित्व पा जाएगी.

चन्द्रप्रकाश के डूबे मन की व्यथा पर चिंता व्यक्त करने और शहर के परायेपन को काटने के लिए मीरा को भी सिर रखने के लिए कंघा मिल गया था, वसुधा का.

वसुधा के संकट की सीमा नहीं थी. मीरा के प्रेम-अपनत्व का मान रखना था, तो भीतर छिपे चोर को भी बचाना था. मीरा की चर्चा का केन्द्र चन्द्रप्रकाश था, जिसे वसुधा स्मृति में आने से ही रोकने के प्रयत्न में जुटी हुई थी.

मीरा, चन्द्रप्रकाश और योगेश -- तीन डोरों से बंध गई वसुधा अपने लिए स्वतंत्र रास्ता चुन लेने को अब कतई आजाद नहीं रह गई. चन्द्रप्रकाश के आने से पहले तक योगेश, बेबी और घर-- कभी-कभी थोड़े-से रिश्तेदार और अड़ोस-पड़ोस उसके स्वभाव को मृदु, कोमल तथा मिलनसार बनाए हुए थे. चिड़चिड़ाहट से रहित जीवन में एक बहाव था. स्मृति में कुछ अवरोध -रुकावट भी थे, पर वे इतने प्रबल नहीं हो पाते थे कि बहाव की धारा को रोक दें या दिशा बदलने को बाध्य कर दे. अब सब उलट गया. बहाव में गति रही न दिशा. वसुधा के नियंत्रण में कुछ भी नहीं रहा जैसे. भीतर जो था उबाल लेता हुआ. उसे न मीरा के सामने कह सकती थी न योगेश के सामने. चन्द्रप्रकाश तो मूल ही था, उसको क्या कहती-- तुम चले क्यों नहीं गए उस रात के बाद----? चन्द्रप्रकाश चला भी जाता---- तो भी क्या वसुधा चैन पा जाती?

कुछ सवाल अपनी सहजता के कारण ही कठिन हो जाते हैं. पूर्णानंद जी ने झूठ कह दिया--- योगेश एक दिन और लेट हो जाते तो किस्सा खत्म ही था. चन्द्रप्रकाश चला जाता और कभी लौटकर नहीं आता यहां.

पूर्णानंद जी के तर्क से सहमत होना मेरे लिए असंभव है. सवाल तो अपनी जगह पर ही रहा-- चन्द्रप्रकाश सचमुच चला जाता? वसुधा चुपचाप रहती ? शब्दों की वक्रता और भाव की भंगिमाओं से भी कुछ नहीं कहती? चन्द्रप्रकाश के जाने के बाद उन दोनों के लिए भी किस्सा खत्म हो गया होता?

अनबूझी पहेलियों का दबाव था या संवेदनशीलता ही उस पर हावी हो गई थी कि वसुधा का नर्वस ब्रेकडाउन ही हो गया.उस दिन भी योगेश बाहर गए हुए थे कंपनी के काम से. मीरा ने चन्द्रप्रकाश के ऑफिस फोने कर दिया था.
चन्द्रप्रकाश के घर पहुंचने तक वसुधा भय, घबराहट, बेचैनी और इन सबके ऊपर उदासी-भरी विरक्ति से इतनी दहशत में आ गई थी कि एक क्षण को भी अकेले रहना मुश्किल हो रहा था. मीरा की गोद में सिर रखे वह उसे ऎसे कसकर पकड़े हुए थी, जैसे मीरा भागने को तत्पर हो और वह उसका गला दबोचने को मीरा के उठने का ही इंतजार कर रहा हो.

चन्द्रप्रकाश खुद भी इस दौर के करीब से गुजर चुका था.जानता था यह अवसाद के कारण है और इसका इलाज मनोचिकित्सक के पास है. डॉक्टर के निरीक्षण और दवा के असर को देखने के इंतजार में थोड़ा-सा समय मिला. मन से कमजोर हो आई वसुधा चन्द्रप्रकाश से बोल गई, "आप भी मेरे कारण परेशान हैं ना! बहुत नाराज हैं मुझसे....?"

चन्द्रप्रकाश ने शायद कहा था, "तुमसे नाराज होने का कोई सवाल ही नहीं है. तुम बहुत सोच-विचार न करो, मन दुःखी होता है.---- वादा करो आज से हम अच्छे पारिवारिक मित्रों की तरह रहेंगे. अपने पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते रहेंगे.कुछ क्षण अपने लिए भी निकाल लेंगे. एक-दूसरे से नाराज न होंगे--- कोई शिकायत नहीं करेंगे."

यह संक्षिप्त संवाद दोनों की रिक्तता को भर गया. भीतर जो अतृप्ति थी-- जिसकी तृष्णा सुख-चैन को ही सोखे दे रही थी, तृप्ति पा गई. भविष्य का अदृश्य, अपरिभाषित सम्बन्ध जीवन पा गया. उसकी प्रगाढ़ता अटूट रहने की प्रतिज्ञा करने लगी. उसको अब अपने ही शब्दों की जरूरत नहीं रही. दूसरे संदर्भों , दूसरों से कहे शब्द भी उनके बीच संवाद स्थापित कर देते थे.

उनकी आत्मतुष्टि के लिए इतना-भर काफी था.

आगे उनकी आकांक्षाएं कहां तक पहुंचीं--- मन, आत्मा और दैहिक स्तरों का विभाजन हम नहीं करते. उसकी बात करना भी अनुचित है. प्रेम-कहानी में भावपूर्ण उदात्त रूप ही रोचक और सुंदर लगता है.

पूर्णानंदों की मध्यवर्गीय शंकालु नजरें कुछ भी अर्थ निकाल सकती हैं-- इतना कि कहानी कभी खत्म ही न हो. पर आश्चर्य, सन उन्नीस सौ छियहत्तर-सतहत्तर से सन दो हजार आने तक पूर्णानंद भी अथक प्रयत्न के बावजूद उनके भाव-जगत की कोमल दीवारों को नहीं भेद पाए. जितनी जानकारी उनके पास है,उतनी सबके पास है. जैसे वसुधा और चन्द्रप्रकाश अवसाद के अंधेरे से तभी बाहर निकल आए थे उस संक्षिप्त संवाद में एक-दूसरे को अपना हृदय दिखा देने के साथ ही. थोड़ी -बहुत आशाएं अपेक्षाएं और दमित किस्म की इच्छाएं तो बरसों की एकरसता के तले दब गए पति-पत्नी के नीरस हो जाते सम्बन्धों में भी अबूझ रह जाती हैं.उतने शिकवे शिकायतें उनके आकर्षण के लिए जरूरी भी थे.

अब यह बताना भी जरूरी है कि चन्द्रप्रकाश का मन दिली में रम गया था. पूर्णानंद जी की बात को ही सही मान लेते हैं--- वसुधा के कारण. मीरा का मन चन्द्रप्रकाश के मन की प्रतिछाया था, उसे तो रमना ही था. दोनॊं परिवारों के सबंधों को प्रगाढ़ होने में कोई दिक्कत नहीं रह गई थी. थोड़ी सावधानी चालाकी वसुधा और चन्द्रप्रकाश को बरतनी थी. एक सांकेतिक भाषा का आविष्कार करना था, जिसके लिए उन्हें प्रयस करना ही नहीं पड़ा. भाव और भावनाओं की त्योंरियों ने इतनी सघन-सुगठित निजी भाषा दे दी थी कि पूर्णानंद जैसे खोजी भी गच्चा खा गए. शायद छिपाने की संयमता और व्यक्त होने की अधीरता की लुका-छिपी ने ही उन्हें जीवंत और आकर्षक बनाए रखा-ऎसा हमारा अनुमान है.

बातचीत के लिए सम्बोधन भी मिल गए. चन्द्रप्रकाश अंकल हो गए थे और वसुधा आंटी. नामॊं की जरूरत ही नहीं रही.

योगेश के पास समय नहीं था. प्राइवेट नौकरी में भागमभाग अधिक थी. महीने में बाहर के दो-दीन चक्कर मामूली बात थे. दिमाग कंपनी के व्यापार -मालिक के निर्देशों में उलझा रहता था. अब तो कंपनी की नई ब्रांच में मैनेजर होकर हैदराबाद चले गए हैं. साल-दो साल वहां रहना ही पड़ेगा.

चन्द्रप्रकाश की सरकारी नौकरी है. समय मिल जाता है. विभागीय पदोन्नति के लिए पढ़ना-लिखना भी पड़ता है. शिक्षा और नौकरी के सम्बन्ध का अच्छा ज्ञान है उसे. बच्चों की पढ़ाई और राय-मशविरा करने में वसुधा और योगेश को चन्द्रप्रकाश पर निर्भर रहने में निश्चिंतता ही मिल रही है.

वसुधा और मीरा के बार-बार के उलाहनों से मकान बन गए हैं साथ साथ अगल-बगल में. चिंता लड़कों की उच्च शिक्षा पूरी होने पर नौकरी पाने की है. पर पहले बेटियों की शादी करनी है.उनकी बढ़ती उम्र और अपनी बढ़ती सफेदी ने कुछ असाध्य रोगों को भी आमंत्रित कर दिया है.

योगेश को कोई बीमारी तो नहीं बताते. लेकिन फोन पर बेटी -बेटे और वसुधा की चिंता व्यक्त करने का उनका तनाव-भरा थका अंदाज उन्हें रोगमुक्त कहने में हिचकता है. चन्द्रप्रकाश को मधुमेह की शिकायत हो रही है और वसुधा का रक्तचाप कभी-कभी उतार-चढ़ाव पकड़ लेता है. मीरा अपने बेफिक्र स्वभाव के कारण बची हुई है.

लेकिन अपने पूर्णानंद का पुराना ताकी झांकी रोग चरम पर पहुंच गया है वर्षों बाद उन्हें कुछ सूत्र दिखाई देने लगे हैं.

बात कुछ भी नहीं है. डॉक्टर की सलाह पर थोड़ी ढीलम-ढिलाई के बाद सवेरे की सैर का पक्का नियम बना चुके चन्द्रप्रकाश को देख बच्चों ने वसुधा को भी उकसा दिया, "मम्मी , अकेले तो आप जाती नहीं थीं. अब अंकल जी के साथ निकल जाया करो सैर को. बहुत फायदा होगा आपको ब्लड प्रेशर में."

पूर्णानंद जी इसी से चकित हैं. उतावले हुए जा रहे हैं. --- अब तो खुल्लम खुल्ला---- सवेरे के एकांत मे-- न कोई डर, न हिचक. पता नहीं क्या गुल-----.

अब उन्हें कैसे समझाऊं--- उम्र खुद एक ढाल है. बहुत सारे अपवादों को यों ही टाल देती है. सम्बन्धों का भी वही स्वरूप नहीं रह जाता जो आपने शुरू में देखा था. अर्थ और जरूरतें बदलती हैं, तो व्यवहार की गंभीरता नुक्ताचीनी की गुंजाइश नहीं छोड़ती. आप खरोंचते रहें--- चिकनाहट वाली सपाट परत से कुछ नहीं निकाल पाएंगे, इसलिए शांत रहिए,एकदम चुप, कहानी इससे आगे नहीं बढ़ सकती.

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वरिष्ठ कथाकार क्षितिज शर्मा का जन्म १५ मार्च, १९५० को अल्मोड़ा (उ०प्र० - अब उत्तराखण्ड) में हुआ था. शिक्षा - बी.एस.सी, एम.ए. (हिन्दी).

प्रकाशित कृतियां : ताला बन्द है, समय कम है, उत्तरांचल की कहानियां, गोरखधंधा (कहानी संग्रह), उकाव, पगडंडियां (उपन्यास), भवानी के गांव का बाघ, पामू का घर (बाल उपन्यास).

पुरस्कार / सम्मान : भवानी के गांव का बाघ के लिए हिन्दी अकादमी दिल्ली का बाल साहित्यकार पुरस्कार.

: 'उकाव' (उपन्यास) के लिए आर्य स्मृति साहित्य सम्मान.

: 'पगडंडियां' के लिए हिन्दी अकादमी , दिल्ली का कृति सम्मान.

सम्प्रति : 'दि सण्डे पोस्ट' में साहित्य सम्पादक.

संपर्क : १००/२ ए, गांवड़ी एक्सटेंशन, दिल्ली -११००५३