सोमवार, 29 मार्च 2010

कहानी



खुले पंजों वाली चील

बलराम अग्रवाल

दोनों आमने-सामने बैठे थे—काले शीशों का परदा आँखों पर डाले बूढ़ा और मुँह में सिगार दबाए, होठों के दाएँ खखोड़ से फुक-फुक धुँआ फेंकता फ्रेंचकट युवा। चेहरे पर अगर सफेद दाढ़ी चस्पाँ कर दी जाती और चश्मे के एक शीशे को हरा पोत दिया जाता तो बूढ़ा ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ का सरदार नजर आता। और फ्रेंचकट? लम्बोतरे चेहरे और खिंची हुई भवों के कारण वह चंगेजी-मूल का लगता था।
आकर बैठे हुए दोनों को शायद ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था, क्योंकि मेज अभी तक बिल्कुल खाली थी।
बूढ़े ने बैठे-बिठाए एकाएक कोट की दायीं जेब में हाथ घुमाया। कुछ न मिलने पर फिर बायीं को टटोला। फिर एक गहरी साँस छोड़कर सीधा बैठ गया।
“क्या ढूँढ रहे थे?” फ्रेंचकट ने पूछा,“सिगार?”
“नहीं…”
“तब?”
“ऐसे ही…” बूढ़ा बोला, “बीमारी है थोड़ी-थोड़ी देर बाद जेबें टटोल लेने की। अच्छी तरह पता है कि कुछ नहीं मिलेगा, फिर भी…”
इसी बीच बेयरा आया और मेज पर मेन्यू और पानी-भरे दो गिलास टिका गया। अपनी ओर रखे गिलास को उठाकर मेज पर दायीं तरफ सरकाते हुए बूढ़े ने युवक से पूछा, “और सुनाओ…किस वजह से…?”
“सिगार लेंगे?” बूढ़े के सवाल का जवाब न देकर अपनी ओर रखे पानी-भरे गिलास से हल्का-सा सिप लेकर युवक ने पूछा।
“नहीं,” बूढ़ा मुस्कराया,“बिल्कुल पाक-साफ तो नहीं हूँ, लेकिन कुछ चीजें मैं तभी इस्तेमाल करता हूँ जब उन पर मुझे मेरे कब्जे का यकीन हो जाए।”
“ऍज़ यू लाइक।” युवक भी मुस्करा दिया।
“…मैं सिर्फ तीस मिनट ही यहाँ रुक सकता हूँ।” बूढ़ा बोला।
इस बीच ऑर्डर की उम्मीद में बेयरा दो बार उनके आसपास मँडरा गया। उन्होंने उसकी तरफ जैसे कोई तवज्जो ही नहीं दी, अपनी बातों में उलझे रहे।
“मैं तहे-दिल से शुक्र-गुजार हूँ आपका कि एक कॉल पर ही आपने चले आने की कृपा की…।” युवक ने बोलना शुरू किया।
“निबन्ध मत लिखो। काम की बात पर आओ।” बूढ़े ने टोका।
“बात दरअसल यह है कि आपसे एक निवेदन करना है…”
“वह तो तुम मोबाइल पर भी कर सकते थे!”
“नहीं। वह बात न तो आपसे मोबाइल पर की जा सकती थी और न आपके ऑफिस में।” युवक बोला,“यकीन मानिए…मैं बाई-हार्ट आपका मुरीद हूँ…।”
“फिर निबन्ध?”
“क्या ले आऊँ सर?” ऑर्डर के लिए उन्हें पहल न करते देख बेयरा ने इस बार बेशर्मी से पूछा।
“अँ…बताते हैं अभी…दस मिनट बाद आना।” चुटकी बजाकर हाथ के इशारे से उसे टरक जाने को कहते हुए युवक बोला।
“फिलहाल दो कॉफी रख जाओ, फीकी…शुगर क्यूब्स अलग से।” बेयरा की परेशानी को महसूस कर बूढ़े ने ऑर्डर किया।
बेयरा चला गया।
“कॉफी…तो…जहाँ तक मेरा विचार है…आप लेते नहीं हैं!”
“तुम तो ले ही लेते हो।”
“हाँ, लेकिन दो?…आप अपने लिए भी कुछ…।”
“नहीं, मेरी इच्छा नहीं है इस समय कुछ भी लेने की।” बूढ़ा स्वर को रहस्यपूर्ण बनाते हुए बोला,“लेकिन…दो हट्टे-कट्टे मर्द सिंगल कॉफी का ऑर्डर दें, अच्छा नहीं महसूस होता। इन बेचारों को तनख्वाह तो खास मिलती नहीं हैं मालिक लोगों से। टिप के टप्पे पर जमे रहते हैं नौकरी में। यह जो ऑर्डर मैंने किया है, जाहिर है कि बिल-भुगतान के समय कुछ टिप मिल जाने का फायदा भी इसको मिल ही जाएगा।…लेकिन उसकी मदद करने का पुण्य कमाने की नीयत से नहीं दिया है ऑर्डर। वह सेकेण्डरी है। प्रायमरीली तो अपने फायदे के लिए किया है।…”
“अपने फायदे के लिए?” युवक ने बीच में टोका।
“बेशक… कॉफी रख जाएगा तो कुछ समय के लिए हमारे आसपास मँडराना बन्द हो जाएगा इसका। उतनी देर में, मैं समझता हूँ कि तुम्हारा निबन्ध भी पूरा हो जाएगा। अब…काम की बात पर आ जाओ।”
फ्रेंचकट मूलत: राजनीतिक मानसिकता का आदमी था और बूढ़ा अच्छी-खासी साहित्यिक हैसियत का। युवक ने राजनीतिज्ञ तो अनेक देखे थे लेकिन साहित्यिक कम। बूढ़े ने राजनीतिज्ञ भी अनेक झेल रखे थे और साहित्यिक भी। कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए युवक राजनीति के साथ-साथ साहित्य के अखाड़े में भी जोर आजमा रहा था। उसके राजनीतिक सम्बन्ध अगर कमजोर रहे होते और वह अगर लेशमात्र भी नजर-अन्दाज होने की हैसियत वाला आदमी होता तो अपना ऑफिस छोड़कर बूढ़ा उसके टेलीफोनिक-आमंत्रण पर एकदम-से चला आने वाला आदमी नहीं था।
“काम की बात यह है कि…आप से एक निवेदन करना था…”
“एक ही बात को बार-बार दोहराकर समय नष्ट न करो…” सरदार वाले मूड में बूढ़ा झुँझलाया।
“आप कल हिन्दी भवन में होने वाले कार्यक्रम में शामिल न होइए, प्लीज।”
“क्यों?” यह पूछते हुए उनकी दायीं आँख चश्मे के फ्रेम पर आ बैठी। काले शीशे के एकदम ऊपर टिकी सफेद आँख। गोलाई में आधा छिलका उतारकर रखी गई ऐसी लीची-सी जिसके गूदे के भीतर से उसकी गुठली हल्की-हल्की झाँक रही हो। उसे देखकर फ्रेंचकट थोड़ा चौंक जरूर गया, लेकिन डरा या सहमा बिल्कुल भी नहीं।
“आ…ऽ…प नहीं होंगे तो जाहिर है कि अध्यक्षता की बागडोर मुझे ही सौंपी जाएगी। इसीलिए, बस…” वह किंचित संकोच के साथ बोला।
“बस! इतनी-सी बात कहने के लिए तुमने मुझे इतनी दूर हैरान किया?” यह कहते हुए बूढ़े की दूसरी आँख भी काले चश्मे के फ्रेम पर आ चढ़ी। पहले जैसी ही—गोलाई में आधी छीलकर रखी दूसरी लीची-सी।
बेयरा इस दौरान कॉफी-भरी थर्मस और कप-प्लेट्स वगैरा रखी ट्रे को मेज पर टिका गया था। युवक ने थर्मस उठाकर एक कप में कॉफी को पलटने का उद्यम करना चाहा।
“नहीं, थर्मस को ऐसे ही रखा रहने दो अभी।” बूढ़े ने धीमे लेकिन आक्रामक आवाज में कहा। वह आवाज फ्रेंचकट को ऐसी लगी जैसे कोई खुले पंजों वाली कोई भूखी चील अपने नाखूनों से उसके नंगे जिस्म को नोंचती-सी निकल गई हो। आशंकित-सी आँखों से उसने बूढ़े की ओर देखा—वह भूखी चील लौटकर कहीं वापस तो उसी ओर नहीं आ रही है? और उसकी आशंका निर्मूल न रही, चील लौटकर आई।
“कार्यक्रम का अध्यक्ष तो मैं अपने होते हुए भी बनवा दूँगा तुम्हें!…” उसी आक्रामक अन्दाज़ में बूढ़ा बोला,“मैं खुद प्रोपोज कर दूँगा।”
“आपकी मुझपर कृपा है, मैं जानता हूँ।” चील से अपने जिस्म को बचाने का प्रयास करते हुए युवक तनिक विश्वास-भरे स्वर में बोला,“महत्वपूर्ण मेरा अध्यक्ष-पद सँभालना नहीं, उस पद से आपको दो-चार गालियाँ सर्व करना होगा।…और वैसा मैं आपकी अनुपस्थिति में ही कर पाऊँगा, उपस्थिति में नहीं।”
उसकी इस बात को सुनकर बूढ़े ने फ्रेम पर आ टिकी दोनों लीचियों को बड़ी सावधानी से उनकी सही जगह पर पहुँचा दिया। चील के घोंसले से माँस चुराने की हिमाकत कर रहा है मादरचोद!—उसने भीतर ही भीतर सोचा। बिना प्रयास के ही प्रसन्नता की एक लहर-सी उसकी शिराओं में दौड़ गई जिसे उसने बाहर नहीं झलकने दिया। बाहरी हाल यह था कि अपनी जगह पर सेट कर दी गईं लीचियाँ एकाएक एक-साथ उछलीं और फ्रेम से उछलकर सफेदी पकड़ चुकी भवों पर जा बैठीं।
“मेरी मौजूदगी में, मुझसे ही अपनी इस वाहियात महत्वाकांक्षा को जाहिर करने की हिम्मत तो तुममें है, लेकिन गालियाँ देने की नहीं!…कमाल है।” बूढ़ा लगभग डाँट पिलाते हुए उससे बोला।
युवक पर लेकिन लीचियों की इस बार की जोरदार उछाल का कोई असर न पड़ा। वह जस का तस बैठा रहा। बोला,“बात को समझने की कोशिश कीजिए प्लीज!…पुराना जमाना गया। यह नए मैनेजमेंट का जमाना है, पॉलिश्ड पॉलीटिकल मैनेजमेंट का। अकॉर्डिंग टु दैट— आजकल दुश्मन वह नहीं जो आपको सरे-बाजार गाली देता फिरे; बल्कि वह है जो वैसा करने से कतराता है…”
“अच्छा मजाक है…।” बूढ़ा हँसा।
“मजाक नहीं, हकीकत है!” युवक आगे बोला,“मैं बचपन से ही आपके आर्टिकल्स पढ़ता और सराहता आ रहा हूँ। मानस-पुत्र हूँ आपका…।”
“फिर फालतू की बातें…”
“देखिए, लोगों के चरित्र में इस सदी में गज़ब की गिरावट आई है। दुनियाभर के साइक्लॉजिस्ट्स ने इस गिरावट को अण्डरलाइन किया है। आप एक मजबूत साहित्यिक हैसियत के आदमी हैं। चौबीसों घण्टे आपके चारों तरफ मँडराने, आपकी जय-जयकार करते रहने वाले आपके प्रशंसकों में कितने लोग मुँह में राम वाले हैं और कितने बगल में छुरी वाले—आप नहीं जान सकते। इस योजना के तहत उक्त अध्यक्ष-पद से मैं आपको ऐसी-ऐसी बढ़िया और इतनी ज्यादा गालियाँ दूँगा…लोगों के अन्तर्मन में दबी आपके खिलाफ वाली भावनाओं को इतना भड़का दूँगा कि खिलाफत की मंशा वाले सारे चूहे बिलों से बाहर आ जाएँगे…मेरे साथ आ मिलेंगे…”
“यानी कि एक पंथ दो काज।” चश्मा बोला,“साँप भी मर जाएगा और…”
“साँप?…मैं आपके बारे में ऐसा नहीं सोच सकता।” युवक ने कहा।
“नहीं सोच सकते तो गालियाँ दिमाग के किस कोने से क्रिएट करोगे?”
“यह सोचना आपका काम नहीं है।”
“अच्छा! यानी कि मुझे यह कहने या जानने का हक भी नहीं है कि मुझे गालियाँ देने की अनुमति मुझसे माँगने वाला शख्स वैसा करने में सक्षम नहीं है।”
“कुछ बातें मौके पर सीधे सिद्ध करके दिखाई जाती हैं, बकी नहीं जातीं।”
“यानी कि खेल में बहुत आगे बढ़ चुके हो!”
“आपके प्रति अपने मन में जमी श्रद्धा की खातिर।”
“तुम्हारे मन में जमी श्रद्धा के सारे मतलब मैं समझ रहा हूँ।” चश्मे ने कहा,“बेटा, मुझे गालियाँ बककर दिल की भड़ास भी निकाल लोगे और मेरी नजरों में भले भी बने रहोगे, क्यों?”
उसके इस आकलन पर चंगेजी-मूल का दिखनेवाले उस युवक को लाल-पीले अन्दाज में उछल पड़ना चाहिए था, या फिर वैसा नाटक तो कम से कम करना ही चाहिए था; लेकिन उसने ये दोनों ही नहीं किए। अविचल बैठा रहा।
बूढ़े ने एकाएक ही दोनों हथेलियों को अपने सीने पर ऊपर-नीचे सरकाकर ऊपर ही ऊपर जेबें टटोल डालीं। टटोलते-टटोलते ही वह खड़ा हो गया और ऊपर ही ऊपर पेंट की जेबों पर भी हथेलियाँ सरकाईं। फिर दायीं जेब से पर्स बाहर निकालते हुए बुदबुदाया,“शुक्र है, यह जेब में चला आया…मेज की दराज में ही छूट नहीं गया।”
“अरे…पर्स क्यों निकाल लिया आपने?” युवक दबी जुबान में लगभग चीखते हुए बोला।
“अब…यह चला आया जेब में तो निकाल लिया।” पर्स को अपने सामने मेज पर रखकर वापस कुर्सी पर बैठते हुए बूढ़ा बोला।
“अब आप इसे वापस जेब के ही हवाले कर दीजिए प्लीज़।” युवक आदेशात्मक शाही अंदाज में फुसफुसाया।
“एक बात कान खोलकर सुन लो…” बूढ़ा कड़े अंदाज़ में बोला,“कितने भी बड़े तीसमार खाँ सही तुम…तुम्हारी किसी भी बात को मानने के लिए मजबूर नहीं हूँ मैं।”
“दिस इज़ अ रिक्वेस्ट, नॉट अन ऑर्डर सर!” युवक ने हाथ जोड़कर कहा।
“तुम्हारी हर रिक्वेस्ट को मान लेने के लिए भी मैं मजबूर नहीं हूँ।” बूढ़ा पूर्व-अंदाज में बुदबुदाया; और युवक कुछ समझता, उससे पहले ही उसने सौ रुपए का एक नोट पर्स से निकालकर कॉफी के बर्तन रखी ट्रे में डाल दिया।
“यह…यह क्या कर रहे हैं आप?” उसके इस कृत्य से चौंककर युवक बोल उठा।
“अब सिर्फ पाँच मिनट बचे हैं तुम्हारे पास।” उसकी बात पर ध्यान दिये बिना वह निर्णायक स्वर में बोला।
“यह ओवर-रेस्पेक्ट का मामला बन गया स्साला…और ओवर-कॉन्फिडेंस का भी।” साफ तौर पर उसे सुनाते हुए बेहद खीझ-भरे स्वर में युवक बुदबुदाया, “बेहतर यह होता कि आपको विश्वास में लेकर काम की शुरूआत करने की बजाय, पहले मैं काम को अंजाम देता और आपके सामने पेश होकर बाद में अपनी सफाई पेश करता। इस समय पता नहीं आप समझ क्यों नहीं पा रहे हैं मेरी योजना को?”
“कैसे समझूँ? मैं राजनीतिक-मैनेजमेंट पढ़ा हुआ नई उम्र का लड़का तो हूँ नहीं, बूढ़ा हूँ अस्सी बरस का! फिर, पॉलिटिकल आदमी नहीं हूँ…लिटरेरी हूँ।” दूर खड़े बेयरे को ट्रे उठा ले जाने का इशारा करते हुए चश्मे ने कहा। बेयरा शायद आगामी ऑर्डर की उम्मीद में इनकी मेज पर नजर रखे था। इशारा पाते ही चला आया और ट्रे को उठाकर ले गया।
“न समझ पाने जैसी तो कोई बात ही इस प्रस्ताव में नहीं है।” युवक बोला,“मूर्ख से मूर्ख…”
“शट-अप…शट-अप। गालियाँ देने की इजाजत मैंने अभी दी नहीं है तुम्हें।”
“ओफ् शिट्!” दोनों हथेलियों में अपने सिर को पकड़कर फ्रेंचकट झुँझलाया,“यह मैं गाली दे रहा हूँ आपको?”
“तुम क्या समझते हो कि मेरी समझ में तुम्हारी यह टुच्ची भाषा बिल्कुल भी नहीं आ रही है?”
“इस समय तो आप मेरे एक-एक शब्द का गलत मतलब पकड़ रहे हैं।” वह दुखी अन्दाज में बोला,“इस स्टेज पर मैं अगर अपनी योजना को ड्रॉप भी कर लूँ तो आपकी नजरों में तो गिर ही गया न…विश्वास तो आपका खो ही बैठा मैं!”
इसी दौरान बेयरा ने ट्रे में बिल, बाकी बचे पैसे और सौंफ-मिश्री आदि लाकर उनकी मेज पर रख दिए।
“ये सब अपनी जेब में रखो बेटे और ट्रे को यहीं छोड़ दो।” बकाया में से पचास रुपए वाला नोट उठाकर अपनी जेब के हवाले करके शेष रकम की ओर इशारा करते हुए बूढ़े ने बेयरा से कहा। एकबारगी तो वह बूढ़े की शक्ल को देखने लगा, लेकिन आज्ञा-पालन में उसने देरी नहीं की।
उसके चले जाने के बाद बूढ़े ने फ्रेंचकट से कहा,“बिल्कुल ठीक कहा। मेरी नजरों में गिरने और मेरा विश्वास खो देने के जिस मकसद को लेकर यह मीटिंग तुमने रखी थी, उसमें तुम कामयाब रहे। मतलब यह कि गालियाँ तो अब सरे-बाजार तुम मुझे दोगे ही।…अब तुम मेरी इस बात को सुनो—यह रिस्क मैं लूँगा। हिंदी भवन वाले कार्यक्रम में मैं नहीं जाऊँगा। अध्यक्ष बन जाने का जुगाड़ तुम कर ही चुके हो और मुझे गालियाँ बककर मेरे कमजोर विरोधियों का नेता बन बैठने का भी;…लेकिन मैं परमिट करता हूँ कि उस कार्यक्रम के अलावा भी, तुम जब चाहो, जहाँ चाहो…और जब तक चाहो मेरे खिलाफ अपनी भड़ास निकालते रह सकते हो।…तुम्हारे खिलाफ किसी भी तरह का कोई बयान मेरी ओर से जारी नहीं होगा। हाँ, दूसरों की जिम्मेदारी मैं नहीं ले सकता।”
“भड़ास नहीं सर, यह हमारी रणनीति का हिस्सा है।” पटा लेने की आश्वस्ति से भरपूर फ्रेंचकट प्रसन्न मुद्रा में बोला।
“हमारी नहीं, सिर्फ तुम्हारी रणनीति का।” चर्चा में बने रहने का एक सफल इन्तजाम हो जाने की आश्वस्ति के साथ बूढ़ा कुर्सी से उठते हुए बोला,“बहरहाल, तुम अपने मकसद में कामयाब रहे…क्योंकि मैं जानता हूँ कि ऐसा न करने के लिए मेरे रोने-गिड़गिड़ाने पर भी तुम अब पीछे हटने वाले नहीं हो।”
युवक ने इस स्तर पर कुछ भी बोलना उचित न समझा। बूढ़ा चलने लगा तो औपचारिकतावश वह उठकर खड़ा तो हुआ, लेकिन बाहर तक उसके साथ नहीं गया। बूढ़े को उससे ऐसी अपेक्षा थी भी नहीं शायद। समझदार लोग मुड़-मुड़कर नहीं देखा करते, सो उसने भी नहीं देखा।
‘खुद ही फँसने चले आते हैं स्साले!’—रेस्तराँ से बाहर कदम रखते हुए उसने मन ही मन सोचा—‘और पैंतरेबाज मुझे बताते हैं।’
बाहर निकलकर वह ऑटो में बैठा और चला गया।
उसके जाते ही फ्रेंचकट जीत का जश्न मनाने की मुद्रा में धम-से कुर्सी पर बैठा और निकट बुलाने के संकेत-स्वरूप उसने बेयरा की ओर चुटकी बजाई। उसकी आँखों में चमक उभर आई थी और चेहरे पर मुस्कान।

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जन्म : 26 नवम्बर, 1952 को उत्तर प्रदेश(भारत) के जिला बुलन्दशहर में जन्म।
शिक्षा : एम ए (हिन्दी), अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, आयुर्वेद रत्न।
पुस्तकें : प्रकाशित पुस्तकों में कथा-संग्रह ‘सरसों के फूल’(1994), ‘ज़ुबैदा’(2004) तथा ‘चन्ना चरनदास’(2004। ‘दूसरा भीम’(1997) बाल-कहानियों का संग्रह है। ‘संस्कृत नाट्य:चिन्तन परम्परा और समाज’ (अप्रकाशित), ‘समकालीन हिन्दी लघुकथा का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन’ (अप्रकाशित)।सम्पादन व अन्य : मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ(1997) के अतिरिक्त प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बालशौरि रेड्डी आदि वरिष्ठ कथाकारों की कहानियों/उपन्यासों के लगभग 15 संकलनों एवं कुछेक पत्रिकाओं का संपादन/अतिथि संपादन। ‘अण्डमान व निकोबार की लोककथाएँ’ का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व पुनर्लेखन(2000)। इनके अलावा ‘सहकार संचय’(जुलाई,1997) व ‘आलेख संवाद’(जुलाई,2008) के लघुकथा-विशेषांकों का अतिथि संपादन। अनेक वर्षों तक हिन्दी-रंगमंच से जुड़ाव। कुछेक रंगमंचीय नाटकों हेतु गीत-लेखन भी।
हिन्दी ब्लॉग्स:
जनगाथा(Link:http://www.jangatha.blogspot.com),
कथायात्रा(Link: http://kathayatra.blogspot.com)
लघुकथा-वार्ता(Link: http://wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
सम्प्रति : अध्ययन और लेखन।
संपर्क : एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 (भारत)
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रविवार, 7 मार्च 2010

वातायन - मार्च, २०१०



हम और हमारा समय

कब होगा इस गुलामी का अंत !

रूपसिंह चन्देल
उसने एक स्वप्न देखा और पूरा होने पर उसके ध्वस्त होने की पीड़ा भी झेली थी . अपने स्वप्न को पूरा करने के लिए उसने वह सब कुछ किया जो आवश्यक था. जल्दी सुबह जब उसकी उम्र के युवक गहरी नींद में होते वह बंबे (नहर) की पटरी पर दौड़ रहा होता. लौट कर रात भिगोये चनों के साथ दूध लेता और निश्चित समय पर साइकिल पर बस्ता लटका कॉलेज के लिए निकल लेता. शाम कॉलेज से लौट कसरत और पढ़ाई----दो वर्षों तक अर्थात इण्टर के दोनों वर्षों के दौरान ---उसने घरवालों से काम की छूट ले ली थी और पूरी तरह अपने स्वप्न को साकार करने में जुट गया था. दो वर्षों की कड़ी मेहनत से उसका शरीर खिल उठा था. इंटर में भी उसने अच्छे अंक पाये और एक दिन वह जा पहुंचा था लखनऊ. उसे सफलता मिली और वह एक सैनिक के रूप में भारतीय सेना के लिए चुना गया. लेकिन देश की रक्षा के लिए कुछ कर गुजरने का उसका स्वप्न कुछ समय बाद ही ध्वस्त हो गया, जब उसे एक अधिकारी की सेवा में तैनात किया गया.
उसकी बाद की कहानी उन हजारों जवानों की कहानी है जिन्हें छोटे से लेकर उच्च अधिकारियों तक की सेवा में उनके सहायक के रूप में उनके कपड़े प्रेस करने से लेकर जूते पॉलिश करने, बागवानी से लेकर सब्जी लाने---- साहब के दफ्तर जाने के समय उन्हें जूते पहनाने और दफ्तर से लौटने पर उनके जूते उतारने तक के ही काम नहीं करने होते बल्कि साहब के बीबी बच्चों तक की गुलामी भी करनी होती है. और मज़ाल कि जवान साहब की किसी बात पर एक शब्द भी प्रतिक्रिया दे सके---- साहब तो साहब उसे उसके बीबी बच्चों के हुक्म और डांट-फटकार को किसी गुलाम की भांति सिर झुकाकर सुनना होता है.
एक बार मेरी मुलाकात एक कर्नल साहब से हुई. बातचीत में उन्होंने अपने सहायक के प्रति अपनी उदारता का परिचय देते हुए कहा, " मैं अपने असिस्टैण्ट को बेल्ट से पीटता था और मज़ाल कि वह चूं करता." लेकिन मेरे चेहरे पर आए भावों को पढ़कर उन्होंने तुरंत जोड़ा, "लेकिन मैं उसे प्यार भी करता था."
आजादी के बासठ वर्षों बाद भी भारतीय सेना में औपनिवेशिक गुलाम प्रथा का जारी रहना दुर्भाग्यपूर्ण और आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा.
रक्षा मंत्रालय द्वारा सशस्त्र बलों में तनाव प्रबन्धन विषय पर संसद की एक स्थायी समिति का गठन किया गया था, जिसकी रपट समिति ने २००८ में प्रस्तुत की थी , जिसके आधार पर भारतीय वायुसेना और नौसेना ने अपने अफसरों को सहायक मुहैय्या करवाना स्थगित कर दिया जबकि भारतीय सेना इस बात के लिए तैयार नहीं है. वह गुलामी की इस प्रथा को जारी रखना चाहती है . उसका जितना बड़ा अधिकारी उतने ही उसके सहायकों का दल.
बड़े अफसर के तामझाम भी बड़े होते हैं.
संसद की स्थायी समिति की रेपोर्ट पर अफसरों को सहायक उप्लब्ध करवाने की इस गुलाम प्रथा के पक्ष में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए रक्षा मंत्रालय ने उत्तर देते हुए कहा कि एक सहायक अधिकारियों के लिए कॉमरेड इन आर्म्स होता है जो विश्वास, सम्मान, गर्मजोशी, भरोसे और एक दूसरे पर निर्भरता का प्रतीक है और यह नेतृत्वकर्ता और अनुगामी के बीच सम्बन्धों का मूल सिद्धांत है.
सेना के अफरों के लिए सहायकों की नियुक्ति सरकारी नीति के अनुसार होती है, लेकिन देश का कौन-सा ऎसा सरकारी विभाग है (केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों का ) जहां अफसरों के घरों में काम मरने के लिए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को नहीं जाना पड़ता ? हाल की एक रपट के अनुसार दिल्ली नगर निगम के बाइस हजार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को वर्षों से वेतन नगर निगम दे रहा है जबकि उनकी सेवाएम अफसरों, निगम पार्षदों और विधायकॊं -मंत्रियों को मिल रही हैं. मेरे नवीनतम उपन्यास - ’गुलाम बादशाह’ का केन्द्रीय विशय ही यह है. इन कर्मचारियों से अफसरों की बीबियां झाड़ू-पोंछे से लेकर कपड़े धुलवाने तक के काम करवाती हैं. उन्हें पानी तक के लिए नहीं पूछा जाता. पानी पीने के लिए वे सड़क किनारे लगे सार्वजनिक नल का उपयोग करते हैं और पानी पीने जाने तक की अवधि की अनुपस्थिति के लिए डांट-फटकार सुनते हैं.
संसद की स्थायी समिति ने रक्षा मंत्रालय से पुनः जोरदार अपील की है कि वह सेना में अफसरों के सहायक के रूप में जवानों को तैनात करने की अपमानजनक व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से समाप्त करे, लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों, स्वायत्तशासी संस्थानों आदि में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को आजाद भारत की इस गुलाम प्रथा से मुक्ति कैसे मिलेगी ? सांसदों की कोई समिति क्या इस बात के अध्ययन और सिफारिश के लिए भी गठित की जाएगी ?
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वातायन के मार्च अंक में प्रस्तुत हैं वरिष्ठ कवि, सम्पादक और पत्रकार आलोक श्रीवास्तव और प्रसिद्ध पंजाबी कवि विशाल की कविताएं और संवाद प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ’इज़ाडोरा की प्रेमकथा’ ( अनुवाद : युगांक धीर) से एक महत्वपूर्ण अंश. आशा है अंक आपको पसंद आएगा. आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.
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आत्मकथा



इज़ाडोरा की आत्मकथा का एक महत्वपूर्ण अंश

पीर्ट्सबर्ग की बर्फ़ीली हवाओं में
अनुवाद : युगांक धीर
संपादक : आलोक श्रीवास्तव
कितना मुश्किल है भाग्य या नियति में विश्वास करना, जब हम सुबह किसी अख़बार में पढ़ते हैं कि ट्रेन दुर्घटना में बीस लोग मारे गए, जिन्होंने एक दिन पहले मृत्यु के बारे में सोचा भी नहीं होगा ;या कि पूरा एक शहर समुद्री लहरों या बाढ़ की चपेट में आकर तहस-नहस हो गया, तो फ़िर क्यों हम इतने अहंवादी हैं कि सोचते हैं कि कोई भाग्य या नियति हमारे छोटे-से अस्तित्व को निर्देशित कर रही है ?
लेकिन मेरी ज़िन्दगी में कई ऎसी अनोखी घटनाएं हुई हैं कि कई बार मुझे नियति पर विश्वास होने लगता है. जैसेकि मेरी ट्रेन बर्फ़ गिरने की वजह से शाम के चार बजे सेंट पीर्ट्सबर्ग पहुंचने की बजाय अगली सुबह चार बजे वहां पहुंची. स्टेशन पर कोई भी मुझे लिवाने नहीं आया था. मैं गाड़ी से नीचे उतरी तो तापमान ज़ीरो से दस डिग्री नीचे था. इतनी ठंड मैंने पहले कभी नहीं देखी थी. रूसी गाड़ीवान दस्तानों में लिपटी अपनी मुट्ठियों को बार-बार अपनी बाहों पर मार रहे थे, ताति उनकी रगों में दौड़ता ख़ून जम न जाए.
मैंने अपनी नौकरानी को सामान के साथ वहीं छोड़ा और एक घोड़ागाड़ी लेकर यूरोपा होटल की ओर चल दी. बर्फ़ और कोहरे में ढंकी वह वीरान-सी रूसी भोर और गाड़ीवान के सथ मैं बिल्कुल अकेली. रास्ते में मुझे जो दृश्य दिखाई दिया वह किसी प्रेत-कथा की फंतासी से कम डरावना न था.
दूर से वह एक लंबा जुलूस लग रहा था. काला और शोक भरा. आदमियों के कधों पर लंबे बक्से थे, जिनके वज़न के कारण वे आगे को झुक कर चल रहे थे. वे कफन थे, एक-के-बाद-एक जाने कितने. गाड़ीवान ने घोड़े की रफ़्तार कम करके चलने की रफ़्तार जितनी कर दी और खुद भी आगे को झुक कर हाथ से क्रॉस का संकेत बनाने लगा. दहशत से सिहर-सी गई मैं. किसी तरह मैंने उससे पूछा कि यह सब क्या है. मुझे रूसी भाषा नहीं आती थी, फिर भी उसने मुझे समझाया कि ये शव उन मज़दूरों के थे जिन्हें पिछले दिन, ५ जनवरी, १९०५ को, विंटर पैलेस के सामने गोलियों से भून डाला गया था---क्योंकि वे ज़ार के पास मदद के लिए गए थे, अपने बीबी-बच्चों के लिए रोटी मांगने. मैंने गाड़ीवान को ठहर जाने के लिए कहा और भीगी पलकों से उस उदास और अनंत लंबे जुलूस को देखती रही. "लेकिन इतने मुंह-अंधेरे उन्हें दफनाने की क्या ज़रूरत थी?" " ताकि दिन में यह सब किया गया तो कहीं क्रान्ति न भड़क उठे." मेरी आंखों में उदासी थी और रगों में एक सिहरन-सी दौड़ रही थी. ट्रेन बारह घंटे लेट न हुई होती तो मैं वह दहला देने वाला मंज़र कभी न देख पाती.
’ओह, अंघेरी शोकाकुल रात
जिसमें भोर का कोई नामोनिशां नहीं है
ओ, चलती-लड़खड़ाती आकृतियों की उदास श्रृंखला
खौफज़दा नम आंखें और मेहनतकश सख़्त हाथ
अपने काले शालों के भीतर अपनी सिसकियां और आहें छिपाए
--दोनों तरफ प्रहरियों के क़दमों की कठोर आवाज़’
अगर मैंने वह दृश्य न देखा होता तो मेरी ज़िंदगी कुछ अलग ही होती. वहीं, उस अनंत लंबे जुलूस के सामने, उस दारुण कथा के सामने , मैंने संकल्प किया कि मैं और मेरी तमाम शक्तियां लोगों और दलितों-दमितों की सेवा को समर्पित होंगी. इसके सामने मेरी खुद की प्रेम-इच्छाएं और पीड़ाएं कितनी छोटी और व्यर्थ प्रतीत हो रही थीं ! और-तो-और मेरी कला भी कितनी व्यर्थ थी, अगर वह इसमें कोई मदद न कर सके. आख़िर उस विशाल और मौन जुलूस का आख़िरी हिस्सा भी हमारी आंखों के आगे से गुज़र गया. गाड़ीवान ने पीछे मुड़कर देखा और आश्चर्य से मेरे आंसुओं को देखता रहा. एक लंबी सांस छोड़ कर उसने फ़िर से हाथ से क्रॉस का निशान बनाया और घोड़े को होटल की तरफ़ दौड़ा दिया.
होटल के अपने आरामदायक कमरे और गर्म बिस्तर में भी मैं बहुत रोने के बाद ही सो सकी. लेकिन उस भोर का वह दुख और पीड़ा भरा मंज़र ज़िंदगी भर मेरे साथ रहने वाला था.
होटल का कमरा बहुत विशाल और ऊंची छत वाला था. खिड़कियां बंद थीं और कभी नहीं खुलती थीं. हवा ऊंचे रोशनदानों के ज़रिए कमरे में आती थी. मेरी बहुत देर से आंख खुली. मैनेजर ने मुझे फूल भिजवाए. फ़िर तो फूलों का तांता ही लग गया.
दो रातों के बाद मैं सेंट पीर्ट्सबर्ग के विशिष्ट वर्ग के सम्मुख प्रस्तुत हुई. भव्य बैले-नृत्य के आदी उन स्त्री-पुरुषों को एक अकेली लड़की का बहुत सादी पोशाक में मात्र एक नीले परदे के सामने शोपेन के संगीत पर नृत्य करना कैसा लगा होगा ! शोपेन की आत्मा को अपनी आत्मा के माध्यम से अभिव्यक्त करना ! पर उस पहले नृत्य का भी तालियों के तूफ़ान से स्वागत हुआ. मेरी आत्मा के दर्द ने, उस मुंह-अंधेरे की उदास शवयात्रा से उपजे मेरे क्रोध मिश्रित आंसुओं के दर्द ने, उन धनी, विलासी और ऎश्वर्य-प्रिय दर्शकों को तालियों की बौछार पर विवश कर दिया था. कितना अजीब था न !
अगले दिन एक नाज़ुक देहयष्टि की बहुत प्यारी और मोहक स्त्री मुझसे मिलने आई. उसके कानों में हीरे झूल रहे थे और गले में मोती लटक रहे थे. मुझे ताज्जुब हुआ जब उसने बताया कि वह महान नर्तकी शिंस्की है. वह रूसी बैले की तरफ़ से मेरा अभिवादन करने आई थी. साथ ही ऑपेरा में अगली रात का एक भव्य प्रदर्शन देखने का निमंत्रण देने. बेरूत में बैले-नर्तकियों का मेरे प्रति बहुत ठंडा और कटु रवैया होता था. कभी-कभी तो वे बाकायदा दुश्मनी पर उतर आती थीं और मुझे हानि पहुंचाने की कोशिश करती थीं. पर यहां उनमें इतनी शिष्टता और स्नेह देख कर मुझे आनंद भरा आश्चर्य हुआ.
अगली शाम एक बहुत भव्य और सुसज्जित वाहन मुझे ऑपेरा लेकर गया. वहां मौजूद दर्शक इतने संपन्न और फैशनेबुल थे कि उन्हें मेरी मामूली पोशाक और सादगी बहुत अटपटी लगी होगी.
मैं बैले की दुश्मन हूं, जो मुझे नकली और आडंबर भरी कला लगती है बल्कि उसे मैं कला मानती ही नहीं. लेकिन मंच पर एक जलपरी की तरह थिरकती शिंस्की की आकृति की सराहना न करना असंभव था. ऎसे लगता था जैसे वह इंसान न हो कर कोई पक्षी या तितली हो और मंच पर इघर-से-उधर हवा में फरफरा रही हो.
मैंने अपने आसपास नज़र दौड़ाई और दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत स्त्रियों को, बहुमूल्य आभूषणों से लदी और एक-से-एक नामी उच्चाधिकारियों के साथ बैठी स्त्रियों को, दर्शक-दीर्घा में देखा. यह ऎश्वर्यभरी संपन्नता उस मुंह-अंधेरे के उदास जुलूस से कितनी भिन्न थी. ये मुस्कराते हुए भाग्यशाली लोग, क्या इनका उन लोगों के साथ कुछ भी संबंध था
? कार्यक्रम के बाद मुझे शिंस्की के महल में भोजन पर आमंत्रित किया गया, जहां मेरी मुलाक़ात ग्रै़ड ड्यूक माइकल से हुई. मैंने उसे नृत्य-स्कूल खोलने के अपने विचार के बारे में बताया तो वह विस्मय से मुझे देखता रह गया. उस भोज में सभी लोग मुझसे बहुत विनम्रता और आदर के साथ मिले.
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इज़ाडोरा की प्रेमकथा
(इज़ाडोरा डंकन की विश्वविख्यात आत्मकथाMy Life का अनुवाद)
पृ. २८३, मूल्य : २०० (पेपर बैक)

संवाद प्रकाशन
मेरठ कार्यालय : आई-४९९, शास्त्रीनगर,
मेरठ -२५० ००४ (उ.प्र.)

मुम्बई कार्यालय : ए-४, ईडन रोज़,
वृंदावन, एवरशाइन सिटी, वसई रोड (पूर्व), ठाणे,पिन - ४०१ २०८

कविता




सुनो यह विलाप


-आलोक श्रीवास्तव


अवध की एक शाम पुकारती है
लोगो सुनो
लहू में डूबी, वह शाम फैलती जाती है चारो ओर


बिछा दो तुम जाजम
रौशनियां
तुम्हारी कोई होली, कोई दीवाली, कोई ईद
उस मातम को छिपा नहीं पाएगी
जो इस मुल्क के बाशिंदों पर डेढ़ सौ साल से तारी है


पूरा अवध खून में डूबा आज भी पुकारता है
ढही मेहराबों और ऊंचे बुर्जों के पीछे से एक कराह उठती है
गोमती का सूखा पानी
किसी ग़ज़ल में आज भी रोता है


इस लुटे पिटे शहर की वीरानी
क्या रोती है तुम्हारी रात में?
तुम अपने ही शहर के आंसू नहीं देख पाते!


जनरल नील का कत्लेआम
इलाहाबाद की दरख्त घिरी राहों से चलता
देखो दंडकारण्य तक जा पहुंचा है


पद्मा से सोन तक
मेरी प्रिया का वह लहराता आंचल था मेरे ख्वाब में झलकता
खून के धब्बे गाढ़े होते जाते हैं आज उस पर


और हत्यारों को तोपों की सलामी जारी है
तिरंगे की साक्षी में


सुनो अवध का विलाप
फैलता जा रहा है समूचे मुल्क में


मौत की, मातम की
गुलामी की रात तुम्हारे सिरहाने खड़ी है...
****
(01 मार्च, 2010)
OOOO


जन्म : 15 अगस्त, 1968 .

उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों-कस्बों में बचपन गुजरा। पिछले 20 वर्षों के मुंबई में, पहले सात साल ‘धर्मयुग’ में बतौर उप-सम्पादक काम किया। फिलहाल आजीविका के लिए पत्रकारिता।



प्रकाशन

कविता संग्रह :
वेरा उन सपनों की कथा कहो ! (1996)
जब भी बसंत के फूल खिलेंगे (2004)
यह धरती हमारा ही स्वप्न है !(2006)
दिखना तुम सांझ तारे को (2010)
दुख का देश और बुद्ध (2010)

अन्य :
अख़बारनामा : पत्रकारिता का साम्राज्यवादी चेहरा(2004)
शहीद भगत सिंह : क्रांति के प्रयोग (2004)
(कुलदीप नैयर द्वारा लिखित भगत सिंह की जीवनी का अनुवाद)
विश्व ग्रंथमाला का संपादन।

संपर्क : ए-4, ईडन रोज़, वृंदावन कॉम्पलेक्स, एवरशाइन सिटी, वसई रोड, पूर्व, ठाणे-401 208(मुंबई)
फोन : 0250-2462469, 09320016684
ई-मेल :
samvad.in@gmail.com

कविता



पंजाबी कविता


विशाल

आज तुम्हें मुखातिब होते समय
मन में बड़ी अजीब सी बातें आ रही हैं
वैसे मैंने इस तरह
पहले कभी भी महसूस नहीं किया था
एक लम्बे अरसे से हम मिलते रहे हैं
एक-दूसरे को सुनते-सुनाते रहे हैं
भागीदार एक दूसरे के दुख के।
मेरे बारे में तुमने कई बार
अपने विचार बदले, बनाए
मेरे चेहरे को
कई तरह के फ्रेमों में बांधा
दिल से नहीं लगाया कई बातों को तुमने
मैं भी भूल गया बहुत कुछ
राह-बेराह मिल गए तो ठीक
न मिले तो भी ठीक
'रावी' सी चल रही थी ज़िन्दगी
जहाँ आदमी मिलता, बरतता है
ऊँच-नीच तो हो ही जाती है
वह भी अच्छा-बुरा सोचती थी मेरे बारे में
लड़ भी पड़ती थी
कई बार तो उसकी बिलकुल भी समझ नहीं पड़ती थी
जिस बात से मैं उसे अच्छा नहीं लगता था
उसी बात पर ही वह पसंद करती थी मुझे।
मन बड़ा अजीब सा हो रहा है आज
कि आख़िर किसलिए
मैंने अपने लिए सब कुछ नियुक्त किया
जिसके लिए मैं कभी भी सहमत नहीं होता था
सारे संस्कार-शिष्टाचार
क्यों बांध लिए अपने पैरों से
मेरा सफ़र तो और था
एक से दूसरा देश
देशों की हदें- सरहदें मेरा प्रवास नहीं था
अर्थों की कब्र पर बैठा
शब्द जन्मता रहा
मेरी चुप का, मेरे शब्दों का
मेरी किसी भी सतर का
हर बार हो जाता रहा गलत अनुवाद
मेरा अपना अस्तित्व कहीं भी सुरक्षित नहीं था
न मुहब्बत में, न नफ़रत में
न जुड़ने में, न टूटने में
तुम आते रहे
मुझे थोड़ा-सा खुरच कर
मेरी ही दहलीज़ों पर फेंक जाते रहे
उस वक्त मेरे अन्दर का शरणार्थी
रिश्तों के अन्दर-बाहर खतरे देखकर
अपने ही पैरों में शरण मांगता था
कोई कितना भर लड़े अपने खिलाफ़
इस लड़ाई में
मैंने बड़े वार खाये
उधर से भी मैं मरता
इधर से भी मैं हारता
थोड़ा कहीं गिरा, थोड़ा कहीं
मेरे में से 'मैं' रिसता रहा
आज तुम्हारे साथ बात करते हुए
मन में बड़ी अजीब सी बातें आ रही हैं
पता नहीं क्यों सोच रहा हूँ ऐसा
कि मैं तो पहले ही
तुम्हारे अहसानों के तले दबा पड़ा हूँ
और यदि तुम कुछ कर सकते हो मेरे लिए
तो इतना ज़रूर करना
मेरी सोच, मेरी किताबें, मेरी कविताएँ... और राख
पोटली में बांध कर जल में प्रवाहित न करना
आकाश की ओर बिखेर देना
मेरा पहला संस्करण
यहीं से तो इसी तरह शुरू होगा।


(हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव)0
पंजाबी के बहु चर्चित कवि।

कविता की अनेक पुस्तकें प्रकाशित।

पिछ्ले कई वर्षों से इटली मे।
सम्पर्क :
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ITALY
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