रविवार, 10 फ़रवरी 2013

वातायन-फरवरी,२०१३



मेरी अपनी बात

रूपसिंह चन्देल

इस बार ’वातायन’ में मेरे स्थायी स्तंभ ’हम और हमारा समय’ में प्रस्तुत है चर्चित लेखिका और समाज सेविका शालिनी माथुर का आलेख -’मृतात्माओं का जुलूस’. यह आलेख ’कथादेश’ के फरवरी,२०१३ अंक में प्रकाशित हुआ है. लेकिन कथादेश के प्रसार की अपनी सीमाएं हैं. इसी विषय पर केन्द्रित शालिनी माथुर के दो आलेख पहले भी मैंने वातायन के सहयोगी ब्लॉग ’रचना समय’ में प्रकाशित किए थे, जिनकी अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई थी. 

साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है और साहित्यकार उस समाज का एक हिस्सा होता है. यह भी उतना ही सच है कि किसी न किसी रूप में उसका स्वयं का जीवन उसके साहित्य में अवश्य अभिव्यंजित होता है. पिछले दिनों उपन्यास केन्द्रित एक साहित्यिक आयोजन में वरिष्ठ कथाकार संजीव ने कहा था कि आज अपठनीय और दुरूह रचनाएं चर्चित हो रही हैं. इसमें अश्लीलता को शामिल करना वह शायद भूल गए थे. आज जो जितनी अधिक वीभत्सता के साथ अपनी रचनाओं में अश्लीलता परोसने में सफल हो रहा है वह उतना ही चर्चित रचनाकार माना जा रहा है. ऎसा वे आलोचक, साहित्यकार और सम्पादक कह रहे हैं जो प्रेमचन्द की माला जपते नहीं थकते. पिछले दिनों फेसबुक के माध्यम से एक ब्लॉक में प्रकाशित एक नयी कवयित्री की कविता पढ़ने की संस्तुति एक वरिष्ठ कवि ने की थी. कविता में यौननांगों और उसके क्रियाकलापों को जिस वीभत्सता के साथ अभिव्यक्त किया गया था उसे पढ़कर पाठक का हिन्दी साहित्य से विश्वास यदि उठ जाए तो आश्चर्य नहीं. नयी पीढ़ी ऎसी कविताओं की प्रेरणा कहां से ले रही है? 

इस संदर्भ में मेरे एक मित्र का कहना है कि  खराब रचनाओं और उनके रचनाकारों के साथ जो साहित्यकार खड़े दिखाई देते हैं वे इसलिए कि जिन मठाधीशों ने उन रचनाओं और रचनाकारों की प्रशंसा की है वे भी उनकी दृष्टि में आना चाहते हैं जिससे मठाधीश शब्दों के दो टुकड़े उनकी रचनाओं पर भी उछाल दें. शालिनी जी की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि वे लाखों हिन्दी साहित्य प्रेमियों की लड़ाई उन लोगों के खिलाफ लड़ रही हैं  जो गोलबंद हैं और हित-अहित करने की न केवल क्षमता रखते हैं बल्कि करते ही हैं.  आपका क्या विचार है? 

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इसके अतिरिक्त प्रस्तुत है युवा रचनाकार अर्चना ठाकुर की कविताएं, लघुकथाएं और कहानी.
आशा है वातायन का यह अंक आपको अवश्य पसंद आएगा.

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आलेख : औरत के नज़रिये से
 मृतात्माओं का जुलूस
शालिनी माथुर

 हमारे देश की राजधानी नई दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्ष की एक युवा स्त्री के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। यह रेप एक पुरुष द्वारा किया गया केवल वासना मूलक यौन शोषण ही नहीं था, इसमें कई पुरुषों ने मिलकर क्रूरता , बर्बरता, और नृशंसता से पूरे स्त्री शरीर को अपमानित किया और विरूपित करके चलती हुई बस के बाहर फेंक दिया। 29 दिसम्बर को क्रूर हिंसा की शिकार युवती की मृत्यु हो गई। प्रसिद्ध पुस्तक ’सिस्टरहुड इज़ पावरफ़ुल’ की लेखिका और मिज़ मैगज़ीन की सम्पादिका अमरीकी नारीवादी चिन्तक रॉबिन मार्गन का कथन है -“पोर्न इज़ द थियरीः रेप इज़ द प्रैक्टिस.” हम सब इस कृत्य में रॉबिन मार्गन के इस कथन का सत्यापन होते देख सकते हैं. 


(कोलकता के एक कार्यक्रम में दाएं से डॉ. विजयबहादुर सिंह, शालिनी माथुर, श्रीमती किरन सिपनी और बोलते हुए श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी)
कथादेश पत्रिका के जून 2012 अंक में औरत के नज़रिए से स्तम्भ में मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था- व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि। वह आलेख हिन्दी साहित्य में स्त्री शरीर के पोर्नोग्राफ़िक निरूपण के विरुद्ध था। पोर्न साहित्य और पोर्न कला में स्त्री शरीर को बर्बरता पूर्वक विवश, अपमानित, यौनीकृत और विरूपित रूप में निरूपित किया जाता है और रेप में वास्तविक जीवन में वैसा किया जाता है। पोर्न थियरी यानी सिद्धान्त है और रेप प्रैक्टिस यानी क्रियान्वयन। यह दोनों विमानवीकरण की ही प्रक्रियाएं है।

व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि को पाठकों का इतना सुचिन्तित, सुविचारित, प्रतिबद्ध और उत्साह से परिपूर्ण  जन समर्थन मिला क्योंकि यह लेख न्याय के पक्ष में था, सदाशयता पूर्ण था ,और इसमें पाठक अपने विचारों का प्रतिबिम्ब देख सके थे। इतना बड़ा पाठक वर्ग मेरा हमनवा इसीलिए बना क्योंकि  लेख ने उनके ही भावों की तर्जुमानी की थी। इस आलेख को कथादेश से लेकर कम से कम पच्चीस इन्टरनेट पत्रिकाओं ने छापा और लगभग इतनी ही अन्य लघु पत्रिकाओं ने। 

पाठकों का आभार व्यक्त करने के लिए शब्द पर्याप्त नहीं है। लेख छपने के बाद तीन जून को मेरे पास पहला प्रशंसात्मक फोन आया और आज आठ  जनवरी 2013 तक कोई भी दिन ऐसा नहीं हुआ जिसमें मुझे कोई नया फोन या एस.एम.एस. न मिला हो। जो फोन नम्बर मैं  बचा सकी उनको एक छोटी डायरी में लिख लिया है। इनकी संख्या 565 है। इंटरनेट पर आई टिप्पणियां जोड़ लें तो पाठकों की प्रतिक्रियाओं की संख्या हज़ारों में होगी। पाठकों की  कुल संख्या का तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।

मैं स्वंय को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानती हूँ और विद्यार्थी जीवन से ही समाज से जुड़ कर सामाजिक मुद््दों पर काम करती रही हूं। साहित्य लेखन में मेरा प्रवेश भी मेरे सामाजिक सरोकार का हिस्सा है। मैं हिन्दी भाषी हूँ। आज मुझे अपने हिन्दी भाषी होने पर बहुत गर्व हो रहा है।

ऐसे आलेख वाहवाही बटोरने के लिए नहीं लिखे जाते। पवन करण और अनामिका की उन दो कविताओं को , जिन्हें मैंने पोर्नोग्राफ़ी की शास्त्रीय रचनाएं कहा है , मैंने बड़ी तकलीफ़ के साथ उद्धृत किया था। पाठकों की संवेदनाओं को कष्ट पहुंचाने का मुझे खेद है। आज यह लेख भी उतनी ही तकलीफ के साथ लिख रही हूँ, कि लिखना बहुत ज़रूरी हो गया है, उन मृतात्माओं के बारे में जिन्होंने एक गम्भीर चर्चा को मखौल में बदलने का प्रयास किया ,एक छद्म विपक्ष खड़ा करके उसे बहस में तब्दील करने का प्रयास किया और अहंकार में चूर हो कर खुद ही बहस समाप्ति की घोषणा भी कर दी। वह आलेख मेरा था ,उस पर चर्चा मैं यूं ही समाप्त नहीं होने दूंगी।

मैंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि ’’यह टिप्पणी केवल दो रचनाओं पर है, कवि तथा कवयित्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व या कृतित्व पर नहीं।’’ फिर भी अगस्त के कथादेश में जो लेख छपे उनमें से अर्चना वर्मा का लेख ’’प्रिय शालिनी को सस्नेह’’ और अनामिका का लेख ’’सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित’’  था। तब से अब तक मैंने इस विषय पर एक भी शब्द नहीं लिखा, आज भी न लिखती यदि अर्चना वर्मा ने झूठ ,दम्भ ,कुत्सा और दुर्भावना से भरे पूरे ग्यारह पृष्ठ उसी कथादेश के दिसम्बर 2012 अंक में न लिखे होते ,जिस कथादेश की वे सम्पादन सहयोगी हैं।

जिस आलेख में अर्चना वर्मा का कोई ज़िक्र न था, वह बात उनको बहुत नागवार क्यों गुज़री? वे इतनी व्यथित ,इतनी व्याकुल, इतनी उत्तेजित, इतनी आगबबूला क्यों हैं ?कोई ख़ास बात है क्या? इसका उत्तर इसी आलेख में आगे ढूढ़ेंगे ,पहले उनके झूठ का प्रतिवाद कर दें-

1) अर्चना वर्मा ने लिखा है कि शालिनी ने ’’ आशंका जाहिर की कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उद्धृत कवियों के विरोधियों का कोई कार्टेल इतर कारणों से मुद्दे को ले उड़ा। ’’ (अगस्त पृष्ठ8 )

यह झूठ है,मैंने ऐसा नहीं कहा । पाठकों का कोई कार्टेल नहीं हो सकता क्योंकि उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं होता। मैंने अपने लेख में कवियों के कार्टेल का जिक्र किया था जो खुद ही एक दूसरे को पुरस्कृत किया करते  हैं। इस प्रकरण ने भी यही सिद्ध किया है कि पाठकों द्वारा तिरस्कृत कवि, कार्टेल द्वारा पुरस्कृत हैं।

2)  ’’ शालिनी कथादेश की आमन्त्रित और एक वर्ष से नियमित स्तम्भ कार है। उनसे मेरा परिचय उनके लेखन के माध्यम से ही है। यह आमन्त्रण अपने आप में उनमें लेखन की तेजस्विता और धार की स्वीकृति है। कथादेश को इस बात का गर्व है कि उसके लिए व्यक्तिगत जान पहचान का नहीं रचना का महत्व है।’’ (दिसम्बर पृष्ठ 8) अर्चना वर्मा ने यह साबित करने का प्रयास किया हैं मानों मैं उनके आमन्त्रण पर कथादेश में आई हूँ।यह सच नहीं। सच यह है, कि मेरी पहली टिप्पणी ’कहेगी तो बेघर हो कर रहेगी ’ अगस्त 2007 में और मेरा पहला वैचारिक आलेख ’’नारीवादी आन्दोलन पर एक नारीवादी का अन्तर्दर्शन ’’आज से पूरे पांच वर्ष पूर्व  फरवरी 2008 में प्रतिष्ठत नारीवादी रचनाकार सुधा अरोड़ा ने कथादेश केे अपने स्तम्भ औरत की दुनियां में छापा था। उस पर छिड़ी लम्बी बहस में मन्नू भंडारी ,मृृदुला गर्ग , प्रभु जोशी, प्रभा खैतान , कात्यायनी, रुनू चक्रवर्ती तथा कुसुम त्रिपाठी ने भाग लिया था। उस समय अर्चना वर्मा हंस में सम्पादन सहयोग कर रही थीं। सितम्बर 2008 में साहित्य के नाम पर पत्रिका हंस में चल रही मठाधीशी और पोर्नोग्राफिक प्रवृŸिा के विरुद्ध कथादेश के औरत की दुनियां में ही मेरा आलेख छपा था ’’नवरीतिकालीन संपादक और उनके चीयर लीडर्स।’’, वह लेख भी चर्चित हुआ।

3)  स्तम्भकार होने का उलाहना अर्चना वर्मा मुझे न ही देतीं तो बेहतर होता। फ़रवरी 2012 में मेरा लेख ओथेलो का नारीवादी पाठ पढ़ने के बाद एक वरिष्ठ लेखिका होते हुए स्वयं अर्चना वर्मा ने मुझे फ़ोन ही नहीं किया बल्कि उस लेख की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव रखा कि मैं एक स्तम्भ क्यों न शुरू कर दूं। मार्च 2012 में औरत के नज़रिये से नामक अपने स्तम्भ में मैंने मातृत्व के व्यवसायीकरण पर एक लेख लिखा। मगर अगले ही माह उस स्तम्भ में अर्चना वर्मा ने अपनी एक विस्तृत टिप्पणी के साथ नीहारिका की कहानी छाप दी और उसके कुछ समय बाद उसी स्तम्भ में विभास वर्मा द्वारा किया गया एक अपठनीय अनुवाद। क्या किसी आमन्त्रित स्तम्भकार के स्तम्भ में कोई सहयोगी सम्पादक ऐसी घुसपैठ करता है ? क्या यही उनकी सम्पादकीय नैतिकता है? मुझे स्तम्भकार कहलाने का कोई शौक नहीं है, न ही साहित्यकार कहलाने का । इस प्रकरण को पाठकों के सामने उठाने का मुझे खेद है।


आइए अब अपने लेख के सम्बन्ध में छपे कुछ आलेखों की पाठाधारित चर्चा कर लें। 

दिसम्बर 2012 के कथादेश में छपा अर्चना वर्मा का आलेख ’पढ़न्त की राजनीति ’पूरे ग्यारह पृष्ठों में विस्तीर्ण है। इसकी  पढ़न्त उसकी  पढ़न्त , तेरी पढ़न्त मेरी पढ़न्त,ऐसी पढ़न्त वैसी पढ़न्त,  लगभग इकहत्तर बार पढ़न्त-पढ़न्त लिख कर कदाचित् उन्होंने यह कहने का प्रयास किया है कि एक ही रचना को कई तरह से पढ़ा जा सकता है। अनामिका और पवन करण दोनों ही पन्द्रह बीस वर्ष से लिख रहे होंगे। मैंने तो अपना केवल एक ही पाठ उन पाठकों के आगे प्रस्तुत किया था जिनके शीर्ष पर चढ़ कर वर्षों से ऐसा कविता पाठ चल रहा था। अर्चना वर्मा आखिर कितनी पढ़न्त करेंगी? क्या मेरे जैसा सामान्य पाठक एक पाठ भी नहीं कर सकता? यह पढ़न्त की कैसी राजनीति है?

अनामिका के लेख के विषय में वे कहती हैं ,’’पढ़ने वालों ने अनुचित ही इसे शालिनी के जवाब की तरह पढ़ा  और उचित ही असन्तुष्ट हुए कि जवाब नहीं मिला , जवाब दिया ही नहीं गया था।... इसी तरह अर्चना वर्मा का आलेख भी पिछले अंक से जारी लेख का पूरक अंश था।’’  (दिसम्बर पृ. 8 ) मतलब यह, कि दोनों विदुषियों  ने स्वतन्त्र लेख लिखे हैं,न कि प्रतिवाद । 

अनामिका ने जो लेख बक़ौल अर्चना वर्मा मेरे लेख के जवाब के रूप में नहीं लिखा था उसकी बानगी देखें -’’ प्रतिवाद- कविता के कंधे -(सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित) प्रिय शालिनी जी , प्रेमचन्द के बड़े भाई साहब वाले भाव से आप से दो बातें कहना चाहूँगी...। हबड़ तबड़ करने वाले हड़बड़िया पाठकों के सामने कविता खुलती नहीं.....। शालिनी बाबू मैं जिस मिथिला की हूँ वहाँ तो अट्ठाइस तीस की उम्र में ही माताएं सासें ब्लाउज़ धारना बन्द कर देती हैं ... । लड़कियों की जीन में वाई फैक्टर नहीं होता न अन्जान सिंह की छवि प्रक्षेपित करने की मजबूरी।... स्त्री शरीर कोई पुपुही नहीं होता कि एक ही फंूक में बजने लगे,...उन्नत पहाड़ विशाल भी हों यह ज़रूरी नहीं। ...नैतिकता का ठेका तो आप खैर लें ही मत......इस बन्धन की गांठे धीरे धीरे खुलती हंै। यत्न करके देखिये। सस्नेह, अनामिका।’’

अनामिका दर्पवती हैं,वे ईसा मसीह नहीं हैं , वे क्षमा नहीं करेंगी ,वे पाठ पढ़ाएंगी,- ’’ ईसू, यदि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं तो इन्हें जानना चाहिए , हम दिखाएंगे इन्हें आईना कि इन्हें पता तो चले कि ये क्या कर रहे हैं। ’’(अगस्त पृ 13) पाठक एक कवयित्री की स्नेह भरी भाषा देखें।

समयांतर के प्रतिष्ठित स्तम्भकार दरबारी लाल कहते हैं कि ’’ अनामिका के लेख की विशेषता उनका गुस्सा है। उनके लेख में नोट करने लायक बात यह है कि वे शालिनी को कम से कम दो जगह पुल्लिंग में बदल देती हैं। इस तरह वे ठीक उस पुरुषवादी तौर तरीके का इस्तेमाल करती नज़र आती हैं, जो अपने विरोधी पुरुषों को अपमानित करने के लिए उन्हें स्त्री या स्त्रैण सम्बोधित ही नहीं करते सिद्ध करने की कोशिश भी करते हैं।’’ (समयांतर सितम्बर 2012) मैं इसमें जोड़ना चाहूंगी कि अनामिका के लेख में रौद्र रस ही नहीं अद्भुत रस भी विद्यमान है। पूरा आलेख ही विस्मयपूर्वक लिखा गया है, अनामिका के पद्य में बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह थे, अनामिका के गद्य में लगभग छप्पन । प्रभु जोशी ने आशंका व्यक्त की है कि,’’अनामिका के पास यदि भाषा का कोई बघनखा होता तो वे शालिनी की आलोचना का पेट फाड़ कर अंतड़ियां बाहर निकाल देतीं।’’ निश्चिन्त रहें, अनामिका  ऐसा कर नहीं सकेंगी। वे बेहद सौभाग्यशाली हैं कि गम्भीर आलोचना की निगाह अब तक उनकी एक ही कविता पर पड़ी है। 

अर्चना वर्मा कहती हैं- ’’अनामिका शालिनी के विश्लेषण को जल्दबाज़ पठन्त के रूप में सन्देह का लाभ दे कर कविता की भाषा के कारगर सूत्र देती हैं यह अलग बात है कि वे शालिनी के क्रोध को उबाल देने का काम करते हैं।’’ (दिसम्बर पृष्ठ 9 ) मैंने तो अनामिका के प्रतिवाद पर एक भी शब्द नहीं लिखा , उन को किस सिद्धि की सहायता से इल्हाम हो गया, कि मुझे क्रोध आया या दुलार ? मुझे इन दोनों  करूणामयी स्त्रियों के प्रेम पर पूरा यक़ीन है। वे कहती हैं कि ” भैया और बाबू अपने से छोटे के लिए लाड़ के उभयलिंगी सम्बोधन हैं,“ (दिसम्बर पृ 10 ) तो सच ही होगा। बाबू कह कर मुझे नवजात शिशु मानते हुए अनामिका ने अपने वात्सल्य रस के घड़े मेरे ऊपर ऐसे उलीचे कि उस रस से भीग कर इस शरद ऋतु में मैं थर थर कांप रही हूँ। क्रोध के उबाल का प्रश्न कहाँ ? मैं तो अर्चना वर्मा के स्नेह से सिक्त हूँ और अनामिका के लाड़ से सराबोर । समझ में नहीं आ रहा महान् विदुषी अर्चना वर्मा की इस बात पर अहो अहो कहूँ या धिक् धिक्। (साभार अर्चना वर्मा )

अनामिका अपनी ओर से इस काव्यशास्त्रीय और स्त्रीवादी चर्चा के बीच एक अति महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं, ”अरे भैया शालिनी, कहाँ पैदा हुए है अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें? “ मेरे पास इस घटिया प्रश्न का तो उत्तर नहीं मगर एक जिज्ञासा ज़रूर है, ”अनामिका की जिस मिथिला में अट्ठाइस वर्ष की युवा स्त्री ब्लाउज़ पहनना छोड़ चुकी होती है , क्या अनामिका की उसी मिथिला में बच्चों के साथ भी यौनिकता सम्बन्धी चर्चा की जाती है? ऐसी मिथिला कहां है? दोनों विदुषियों से निवेदन है कि मेहरबानी करके वे अब न तो हमारी अक्ल का और इम्तहान लें, न ही हमारे सब्र का।

अर्चना वर्मा पाठकों की ‘‘सीमित पठन्त क्षमता’ ’’सीमित भाषिक क्षमता’’,’’ सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ’’ और ’’अनिच्छा’’ पर खेद जताते हुए कहती हैं- अनामिका की ’’लिखन्त के तर्क को समझा ही नहीं गया।“ विदुषी लेखिका फ़रमाती हैं, ’’लेकिन अगर किताब के साथ पाठक की खोपड़ी टकराने से खाली घड़ा बजने की आवाज़ आती हो तो क्या ग़लती सिर्फ किताब की होती है?’’ (दिसम्बर पृ 9 ) पाठक कृपया ध्यान दें ,उक्त वचन एक ऐसी महिला के हैं, जिनकी आयु साठ वर्ष से अधिक है, जो तीस वर्ष तक बी.ए. के विद्यार्थियों को पढ़ाती रही हैं ,जो चालीस पैंतालिस वर्ष से हिन्दी में लेखन कार्य कर रही हैं और जो सम्प्रति कथादेश नामक साहित्यिक पत्रिका की सम्पादन सहयोगी हैं।

यहाँ पर एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़ा होता हैं ,कि पाठकों की खोपड़ी खाली क्यों है? कारण कदाचित् यह है कि जिस समय बुद्धि बंट रही थी उस समय  अनामिका सब के शीर्ष पर विराजमान थीं, इसलिए लगभग सारी बुद्धि उन्हें ही मिल गई। बची खुची बुद्धि उनकी अभिभाविका अर्चना वर्मा को प्राप्त हुई। इसमें हम पाठकों का कोई दोष नहीं कि जब तक हमारा नम्बर आया तब तक बु़द्धि बची ही नहीं थी। अर्चना वर्मा तो अपार बुद्धिमती हैं ,जब उन्हें मालूम ही है कि खोपड़ियां खाली हैं, तो वे अपनी किताब से उन पर प्रहार करती ही क्यों हैं? सिर में बुद्धि नहीं तो क्या उसमें दर्द तो हो ही सकता है। पाठकों पर कुछ तो रहम करें।

मैं लखनऊ शहर की रहने वाली हूँ। अर्चना वर्मा देश की राजधानी दिल्ली में रहती हंै। उनके शहर में पाठकों के साथ पेश आने की क्या यही तहज़ीब है ?   
     
वे पाठकों से इसलिए नाराज़ है क्यांेकि पाठक न अनामिका का पद्य समझ सके न अनामिका का गद्य। वे कहती हैं ”अनामिका के आलेख की पढ़न्त कविताओं से कहीं ज्यादा दिक्कत तलब साबित हुई दीखती है।’’(दिसम्बर पृ10) उन को सहसा वाचिक परम्परा याद हो आई जब श्रोता कवयित्रियों के सामने होता था, (जिसका ज़िक्र कात्यायनी ने तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा गा कर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री के मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार के  रूप में किया है)। अर्चना वर्मा कहती हैं, ’’लेखन की सीमा यह है कि वह पाठक की क्षमताओं और सीमाओं से अपरिचित होता है।’’उन्हें पक्का यकीन है कि अनामिका की क्षमता असीमित है और पाठकों की क्षमता अति सीमित। वे आगे कहती हैं कि अनामिका ने ऐसे पाठक की इच्छा की थी जो उनके ’’लेखन की देह भाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेगा। यह आकांक्षा हताशा के लिए अभिशप्त है। ’’(दिसम्बर पृ 9) 

हताश क्यों ? हम सब पाठक महान् विदुषियों को यकीन दिलाना चाहेंगे कि पाठक भी देहभाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेंगे बशर्ते देहभाषा की हर भंगिमा, हर इशारा कविता का हो, न कि कवयित्री का। मंच पर चढ़ कर कवि तथा कवयित्री देहभाषा, भंगिमा और इशारों से मंच सिद्ध कर सकते हैं, काव्य नहीं। तीन मुहावरे, चार कहावतें, लोकगीतों के पाँच मुखडे़, छः परस्पर विरोधाभासी उपमान, आन्तरिक विसंगतियों से भरे सात वाक्यांश और बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह कवयित्री को शीर्ष पर बैठा सकते है, कविता को नहीं।

 विदुषी अर्चना वर्मा जिस उत्तर आधुनिकतावाद की दुन्दुभी ज़ोर ज़ोर से बजा रही हैं वह एक दर्शन है जिसकी अपनी एक विचार पद्धति है और अपनी निजी शब्दावली। जिस तरह वेदान्त में ब्रह्म और माया महत्वपूर्ण प्रत्यय (कान्सेप्ट) हैं , सांख्य में प्रकृति और पुरुष ,न्याय में अणु तथा प्रमा, प्रमेय और प्रमाण ,भर्तृहरि के व्याकरण दर्शन में स्फोट और माक्र्सवाद में बोर्जु़आ और प्रॉॅलिटेरियट उसी तरह भाषा की निर्मितियों पर विशेष ध्यान देने वाले उत्तर आधुनिकता वादी दर्शन में टेक्स्ट ,रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट उनके निजी प्रत्यय हैं। इसे रीडर्स रिस्पॉन्स थियरी के अन्तर्गत समझा गया है, यानी एक ही पठन सामग्री को अलग अलग दृष्टियों से पढ़ा जा सकता है आदि।

संस्कृत भाषा तथा दर्शन शास्त्र की अपनी पृष्ठभूमि के कारण शास्त्रों की मर्यादा ,भाषाओं की गरिमा और अनुवाद के जिस अनुशासन से मेरा परिचय है उसके अनुसार एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि मूल भाषा तथा संस्कृति में उस प्रत्यय की क्या गरिमा, मर्यादा, स्थान और महत्व है। जैसे कूड़े के ढेर पर घूमते जिस पशु को हम सुअर कहते हैं ,सांस्कृतिक धार्मिक संदर्भों के अनुसार अन्यत्र उसे ही वराह कहते हैं। कई बार हम अपनी भाषा का कोई प्रचलित शब्द अपना लेते हैं जैसे अंग्रेजी के रेल को रेलगाड़ी कहना या केवल गाड़ी कह देना जैसे गाड़ी चल पड़ी ,गाड़ी छूट गई आदि।

टेक्स्ट, रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट के महत्वपूर्ण उत्तर आधुनिकतावादी प्रत्ययों का अनुवाद लिखन्त ,पढ़न्त और गढ़न्त बेहद कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु है। ये शब्द हिन्दी भाषा के पूर्व प्रचलित शब्द भी नहीं हैं। कृत्रिम रूप से गढ़े गए ये शब्द दर्शनशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रत्ययों को ट्रिवियलाइज़ करते हुए उन्हें मखौल की भाषा में बदल देते हैं, जैसे तोतारटन्त, मनगढ़न्त आदि। ये न दर्शनशास्त्र की गरिमा के अनुकूल हैं न हिन्दी भाषा की। मैं इन कृत्रिम, कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु शब्दों को सिरे से खारिज करती हूं। इन निरर्थक शब्दों को बार बार प्रयोग करके करेंसी में लाने के प्रयास गर्हणीय है।
एक ही आलेख में सत्तर से भी अधिक बार पढ़न्त पढ़न्त लिखने वाली अर्चना वर्मा को उसी आलेख में एकाधिक बार पढ़न्त क्षमता पद का प्रयोग करते हुए ज़रा भी संकोच नहीं हुआ। शिक्षा का अधिकार कानून (2009) बनाने में अमत्र्य सेन और मार्था नुस्बॉम द्वारा प्रतिपादित केपेबिलिटी थियरी का आधार लिया गया है जो यह मान कर चलती है कि क्षमता हर एक के भीतर होती है। अब विद्यार्थियों की क्षमता को भी कम ज़्यादा आंकने पर प्रतिबन्ध है और अध्यापकों द्वारा ऐसी भाषा बोला जाना एक दंडनीय अपराध है। उत्तर आधुनिकता भी पाठों की विविधता की बात करती है, क्षमता पद इस दर्शन में सर्वथा अस्वीकार्य है। स्पष्ट है कि अर्चना वर्मा केवल विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए उत्तर आधुनिकता की शब्दावली दोहराती हैं। वे न तो उस दर्शन की भावना समझ सकी हैं, न ही उसे आत्मसात कर सकी हैं। 

जो पाठक अर्चना वर्मा का अगस्त वाला पाठ ठीक से समझ नहीं पाए थे उनकी सुविधा के लिए दयालु लेखिका दिसम्बर वाले पाठ में उन्हें विस्तार से भूतकाल ,वर्तमानकाल और भविष्यकाल समझाने लगीं-’’शल्योपचार अभी हुआ नहीं है ,बल्कि होने वाला है , मौत की चुहिया अभी निकली नहीं है,निकाली जानी है।वह भूतकालिक क्रिया पदों में बावजूद भविष्यार्थे अतीत है।’’(दिसम्बर पृ 15) मेरी जिज्ञासा है कि यह भविष्यार्थे अतीत पाणिनि का कौन सा सूत्र है? अनामिका की कविता में स्त्री को ख़तरनाक व्याधि हो गई है यह सुनकर वह भूतकाल में हंस चुकी हो, व्याधि इतनी फैल चुकी है कि मृत्यु से उसे बचाने के लिए पूरे अंग काट कर निकालने पड़ेंगे, यह सुनकर वर्तमान काल में वह हंस रही हो या अंग शरीर से काट कर अलग कर देने के बाद जब ’सर्जरी की प्लेट’  में सजा कर स्त्री के सामने पेश किए जाएंगे तब ’कहो कैसी रही’ कह कर वह भविष्यकाल में हंसेगी ,तीनों ही स्थितियों में कवयित्री द्वारा किया गया वर्णन अमानवीय,क्रूर ,नृशंस, बर्बर और हृदयहीन है। शरीर का विमानवीकरण करते हुए स्त्री स्वयं को पोर्नोग्राफर की नज़र से देख रही  है। काल चाहे भूत हो ,चाहे वर्तमान, चाहे भविष्य उससे अनामिका की कविता की अश्लीलता में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 

वैसे अनामिका द्वारा ग्रेस निकोलस की कविता की नग्नतावादी पंक्तियों को उद्धृत करने का क्या प्रयोजन रहा होगा? क्या अपनी कविता को उससे कम अश्लील साबित करना? ग्रेस निकोलस की कविता रंगभेद के विरुद्ध लिखी गई विद्रोह की कविता है, उसमें न आत्ममुग्ध नायिका है ,न ही व्याधि का हृदयहीन निरूपण। यह उद्धरण अप्रासंगिक है। व्याधि का रूपक लेकर लिखी गई कविताओं पर हो रही चर्चा के बीच यौनिकता जगाने, पुपुही बजाने, और पहाड़ों की ऊंचाई और विशालता का विवरण देने का प्रयास कवयित्री की मानसिकता प्रदर्शित करता है। पाठकों ने देख ही लिया होगा कि अनामिका का गद्य अनामिका के पद्य से भी ज़्यादा अश्लील है।

मेरे आलेख को इन्टरनेट पर पहुंचाने का श्रेय आशुतोष कुमार को जाता है। स्त्रीविमर्श ब्लाग की सम्पादिका डा. कविता वाचक्नवी ने 15 जून 2012 को लिखा ’’आशुतोष कुमार जी द्वारा यह लिखने पर कि ’’ कथादेश के जून अंक में शालिनी माथुर ने ग़ज़ब का लेख लिखा है, कविता की व्याधि पर। निवेदन हैं कि इसे दूसरे दस काम छोड़ कर पढ़ा जाए। पवन करण और अनामिका अपनी स्त्रीवादी चेतना के लिए चर्चित रहे हैं लेकिन माथुर तर्क करती हैं कि उनकी कविताएं न सिर्फ स्त्री विरोधी है बल्कि सबसे आपराधिक अर्थों में पोर्नोग्राफिक है। किसी भी रूप में उनकी बहस नैतिकतावादी या अंध-अस्मितावादी नहीं है, न कविता के प्रति बेवजह कठोर। इस लेख पर चर्चाओं का तूफ़ान उठना चाहिए।’’ इस लेख को पढ़ने की उत्कंठा थी।वैचारिक लेखन,स्त्रीविमर्श और कविता तथा आलोचना में रुचि रखने वालों के लिए उक्त आलेख को कल यूनीकोडित किया है।’’( डा. कविता वाचक्नवी ,लंदन )

जून 2012 के प्रथम सप्ताह में फेसबुक पर इसे ग़ज़ब का लेख बताने वाले आशुतोष कुमार ने अगस्त 2012 के प्रथम सप्ताह में कथादेश में अर्चना वर्मा, अनामिका और मदन कश्यप के एक साथ मिलकर आए आक्रमण मंे शामिल होकर एक ऐसा लेख लिखा, जिसमें इस ’ग़ज़ब के लेख’ की हर एक निष्पत्ति से असहमति जताई गई थी। ’’(अगस्त पृ 82) बात यहीं तक सीमित नहीं है। तब से लेकर अब तक वे फेसबुक पर मेरे आलेख के विरुद्ध एक लम्बा अभियान चला रहे हैं जिसमें नवम्बर के कथादेश में छपे कात्यायनी के आलेख का विरोध भी शामिल है। (मैं फेसबुक की सदस्य नहीं हूं।)
व्याधि पर कविता में मैंने कहा था कि मन, बुद्धि, और आत्मा से रहित स्त्री शरीर का विमानवीकृृत निरुपण पोर्नोग्राफी कहलाता है। लेख में मैंने यौनीकृत ,उपभोक्ता वस्तु के रूप में निरूपित,विवश, अपमानित, पुरुष के अधीन, हृदयहीन जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग कम से कम एक सौ तीन बार किया था। आशुतोष कुमार ने कथादेश में लिखा है, ’’विवशता के उल्लेख मात्र से कविताएं पोर्नोग्राफिक कैसे हो गईं ? अगर कविता का पाठ इस तरह किया जाएगा तो  ’कस विधि रची नारि जग माहीं ,पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ और ’मैं नीर भरी दुख की बदली जैसी पंक्तियां भी पोर्नोग्राफिक कहलाएंगी।’’(अगस्त पृृ 83) क्या कोई भी पाठक इस बात से सहमत हो सकता है? उक्त पंक्तियां लिखने वाला व्यक्ति अध्यापक है। जो अध्यापक उसी बात को एक सौ तीन बार पढ़ने के बाद भी इतना ही समझ सका ,उसकी बुद्धि पर तरस खाने से ज़्यादा तरस उन विद्यार्थियों के भाग्य पर खाया जाना चाहिए जो ऐसे अध्यापक से पढ़ने के लिए अभिशप्त हैं। 

यह एक बेहद घटिया खेल है, आशुतोष कुमार जिसमें शामिल हो कर पवन करण और अनामिका को गोस्वामी तुलसीदास और महादेवी वर्मा, के समकक्ष बता रहे हैं और मदन कश्यप इन्हें पाब्लो नेरुदा, निराला और मुक्तिबोध के समकक्ष । पाठक को कविता समझने मेें अक्षम साबित करने का प्रयास करते हुए ’कविता समझने की मुश्किल ’ शीर्षक से कथादेश में बहुत प्रतिष्ठा पूर्वक बाॅक्स में छापी गई धूर्त टिप्पणी में मदन कश्यप  ने विनम्रता का झूठा प्रदर्शन करते हुए अपनी सहयोगी विदुषियों के समान ही मुझसे व्यक्तिगत निवेदन किया है। मेरा उत्तर है कि पवन करण और अनामिका की आलोच्य रचनाएं यदि छद्मपूर्वक महीयसी महादेवी वर्मा, और महाप्राण निराला के नाम से भी प्रकाशित कर दी जातीं तब भी मैं इन्हें पोर्न ही कहती क्यों कि ये पोर्न ही हैं। मेरी धारणा है कि समीक्षा रचना की होती है ,रचनाकार की नहींे। मुझे बडे़ बडे़ नामों की नेम ड्रापिंग से बिल्कुल डर नहीं लगता। उम्मीद है कि मदन कश्यप  को अपने सवाल का जवाब मिल गया होगा। 

मेरे लेख में जो प्रश्न दो रचनाओं पर थे उन पर विद्तचतुष्टय ने दुर्भावना पूर्ण व्यक्तिगत उत्तर लिखे ,यह दुर्भाग्य पूर्ण है।  विचारणीय है कि आशुतोष कुमार के लिए जून में फेसबुक पर जो ग़ज़ब का लेख अन्ध अस्मितावादी नहीं था, अगस्त में वही लेख अन्ध अस्मितावादी (कथादेश पृ 86) हो गया ? कैसे ? कोई ख़ास बात है क्या ?

ख़ास तो दिसम्बर 2012 में कथादेश में छपा मैत्रेयी पुष्पा का पत्र भी है। वे एक वरिष्ठ लेखिका हैं जो हमेशा किसी न किसी कारण से चर्चा में बनी रहती हैं। उन्होंने स्वयं मुझको तीन बार फोन करके इस आलेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारा यह लेख नहीं, शिलालेख है, जिससे उन्होंने बहुत कुछ सीखा । फिर उन्होंने स्वयं अपनी पुस्तक तब्दील निगाहें मेरे पास भेजी, कि मैं उसकी समीक्षा कर दूँ और यदि समीक्षा न भी करूँ तो अपनी राय ज़रूर बताऊँ क्योंकि वे मेरी स्त्रीवादी दृष्टि की कायल है। दिसम्बर में उन्होंने उसी लेख के विरुद्ध सम्पादक ने नाम पत्र लिखना ज़रूरी समझा जो लेख कल तक शिलालेख था। शिलालेख के ऊपर उत्कीर्ण इबारत इतनी जल्दी मिट गई ? कैसे?

अपनी पुस्तक चाक पर सात साल से चल रही चर्चा से तो मैत्रेयी पुष्पा को ऊब नहीं हुई , पर मेरे एक गम्भीर लेख पर हो रही चर्चा से वे सात महीने में ही ऊब गईं,उन्होने लिखा,’’ देखते पढ़ते और समझते महीनों बीत गए - बहरहाल अब इस पोर्नोग्राफी की चर्चा चकल्लस पर विराम लगा देना चाहिए। ( दिसम्बर पृ 5) मैत्रेयी पुष्पा की भेजी हुई पुस्तक मेरे पास है और एस एम एस भी। उनकी तब्दील निगाहें की समीक्षा तो मैंने नहीं लिखी मगर खुद मैत्रेयी पुष्पा की निगाहें क्यों तब्दील हुईं, यह वे ही बेहतर जानती होंगी।

अर्चना वर्मा ने और कुछ ठीक लिखा हो या नहीं यह तो ठीक लिखा है कि ” शालिनी माथुर स्वयं को हिन्दी साहित्य जगत् की अन्तेवासी नहीं मानतीं, और वैचारिक दल बन्दियों , सुविधाजनक गुटबाजियों, व्यक्तिगत ईष्र्याओं, अवसरवादिताओं की भीतरी राजनीतियों से भी अपरिचित हैं।’’ (अगस्त पृ 8) ।ख़ुदा का शुक्र है, मैं हिन्दी के इस अन्तःपुर में नहीं रहती, इसके भीतर बहुत अंधेरा है। 

विद्वतत्रयी के आलेखों के पक्ष में संजीव चन्दन ने अविनाश के ब्लॉग पर लिखा ’’ मुज़फ़्फरपुर में साहित्यकारों ने अनामिका और पवन करण की कविताओं पर एक विचार गोष्ठी आयोजित की। इसमें शिरकत के लिए मैंने भी अनामिका और पवन करण की कविता, उसके पाठ तथा स्त्रीवादी आलोचना के सन्दर्भ पर विचार किया। पवन करण की कविता पोर्न तो कतई नहीं है, इसे बड़ी तफसील से अर्चना वर्मा ने स्पष्ट किया है। .....शालिनी संस्कृत साहित्य की प्रकांड विदुषी बताई जाती हैं। पता नहीं क्यों वे कविताओं को कविता की तरह नहीं पढ़ रही हैं। मुज़फ़्फरपुर में लोग कथादेश के पन्नों की फ़ोटो कॉपी के माध्यम से इन लेखों का प्रसार कर रहे हैं।’’ संजीव चन्दन पाठकों से अपील करते हैं कि,‘‘ शालिनी जी के आलेख को  अकेले न पढ़कर अर्चना वर्मा ,आशुतोष कुमार और अनामिका जी के लेखों के साथ पढ़ा जाए।’’ (मोहल्ला लाइव 24 अगस्त 2012) पाठकों ने देख लिया होगा कि विचार का यह मगध दिल्ली में ही सीमित नहीं है इसकी जड़ें मुज़फ़्फरपुर तक फैली है। इसने मेरे आलेख को एक नए विचार के रूप में नहीं, मगध पर हुए हमले की तरह देखा और किलेबंदी का प्रयास किया जो सफल न हो सका।

अनामिका बड़े गर्व से स्वयं को वाइ फैक्टर से रहित बताती हंै। संजीव चन्दन कहते हैं कि अनामिका की पूरी विचार प्रक्रिया ऐसी स्त्रीवादी विचार प्रक्रिया है जो स्त्री को प्रकृति से ही श्रेष्ठ मानती है। मैं भी एक मां की ही बेटी हूं और एक बेटी की मां भी। एक्स या वाइ क्रोमोज़ोम प्रकृति प्रदत्त होते हैं उन पर क्या इतराना ? केवल अपने क्रोमोज़ोम के आधार पर साहित्य में जगह बनाने की कोशिश करने वाली कुछ महिलाओं के कारण स्त्री का दर्जा साहित्य में भी गिरा है और समाज में भी।

मैं तो यह बात मान गई कि मैं बाबू अर्थात् शिशु हूँ ,मेरी जिज्ञासा है कि अनामिका जिन्होंने अर्चना वर्मा के ’’आग्रह की रक्षा करते हुए व्यस्तता के बावजूद लिखना स्वीकार किया’’(दिसम्बरपृ08) स्वयं पद्मिनी नायिका हैं या वे भी शिशु ही है। कविताएं तो वे केवल वयस्कों के लिए लिखती हंै, मगर वयस्क पाठकों के प्रश्नों से ’कीलित’ होते ही वे शिशु बन र्गइं ,और अर्चना वर्मा उनकी अभिभाविका बन कर उठ खड़ी हुईं। चाइल्डवुमन पोर्नोग्राफ़र का सब से हसीन ख़्वाब होती है, जिसका शरीर वयस्क हो और चेहरा शिशुवत्, पलकें झपकाती ,इठलाती ,तुतलाती। स्वयं को वामपंथी कहने वालों को पता होना चाहिए कि कम्युनिस्ट रूस ने अपने देश में बार्बी डॉल्स पर इसीलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि उसका चेहरा शिशु तुल्य है और शरीर वयस्क, जिसे बच्चों के दिमाग़ के स्वाभाविक विकास के लिए हानिकारक माना गया।

अर्चना वर्मा अपने आमन्त्रणों ,आग्रहों ,गोवा और कर्नाटक वालों से हुई फोन वार्ताओं और मुजफ़्फ़रपुर में हुई कार्यशाला, वहां  बांटी गई फ़ोटोकॉपियों और जारी की गई अपील के बावजूद पोर्न कविताओं के समर्थन में जितने समर्थक जुटा सकीं उनकी संख्या दस से भी कम है , इनमें इन्टरनेट पर आई टिप्पणियां भी शामिल हैं। मामला कथादेश तक सीमित नहीं , जिसे वे ’’कुल मिला कर तीन बनाम ग्यारह’’ (दिसम्बर पृष्ठ 7) बता रही हैं। पोर्न के इस प्रायोजित अनुष्ठान में आमंत्रित सदस्यों के अतिरिक्त कोई भी शरीक नहीं। मामला तीन बनाम ग्यारह नहीं,दस बनाम हज़ारों लाखों है।

अर्चना वर्मा केवल उद्भ्रान्त ,उर्मिला जैन ,अनिता गोपेेश ,प्रभु जोशी ,सुनील सिंह ,राहुल ब्रजमोहन ,उदयभानु पांडे, विद्या लाल और कात्यायनी के लेखों और पाठकों के छपे पत्रों से ही क्षुब्ध नहीं है। उनका  कोप इंटरनेट पर हज़ारों की संख्या में आ रही पाठकीय टिप्पणियों को लेकर भी है और उन अनेक आलेखों को लेकर भी जो कथादेश में नहीं छापे जा सके ,मगर जो अन्यत्र प्रतिष्ठा से छपे। उद्भ्रान्त का  15 जून 2012 को लिखा पूरा लेख ’दुनियां इन दिनों’ में  विस्तार से छपा। लेख में भविष्यवाणी की गई थी कि ’’उनका कार्टेल क्या ख़ामोश बैठा रह जाएगा? वह बाँस की खपच्चियों की मदद से उन्हें पुनः त्रिशंकु की तरह ‘शीर्ष’ के स्वर्ग की ओर धकेलने का प्रयास तो अवश्य करेगा। ’’ अर्चना वर्मा ने उद्भ्रान्त पर आ रहे गुस्से को उदयभानु पांडे पर उतारते हुए दिसम्बर में प्रोफेसर पांडे को ’मानसिक आलस्य’ और ’बौद्धिक जड़ता’ का ताना दे कर डपट दिया।

दीप्ति गुप्ता का आलेख भी  ’रचना समय’ सहित अनेक ब्लॉग्स में छप कर बहुत चर्चित हुआ। उत्तेजना के ज्वार में अर्चना वर्मा ने दीप्ति गुप्ता के नाम से पृष्ठ 13 पर जो आवेशमय टिप्पणी उद्धृत की है वह  दीप्ति गुप्ता ने नहीं लिखी थी। डा.दीप्ति गुप्ता हिन्दी और अंग्रेजी की वरिष्ठ लेखिका हैं और डा. अर्चना वर्मा की ही तरह विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका भी। अर्चना वर्मा ने अपने क्रोध की गागर मेरे साथ उन पर भी उलीच दी ,’’ये कविताएं दीप्ति गुप्ता और शालिनी जैसों के लिए नहीं है। उनकी सीमाएं समझी जा सकती हैं। ’’ (दिसम्बर पृ 12) कथादेश की सम्पादन सहयोगी ने यदि जानबूझ कर उनकी टिप्पणी ग़लत उद्धृत की है तो उन्हें अपनी दुर्भावना पर ग्लानि होनी चाहिए ,यदि भूल वश ऐसा हुआ है तो उन्हें क्षमा मांगनी चाहिए।

दिसम्बर 2012 में लिखे आलेख में अर्चना वर्मा ने सारे टिप्पणीकारों, पत्रलेखकों और पाठकों को नाम ले लेकर कोसा है। कोसने के इस क्रम में उन्होंने मुझ नाचीज़ का नाम चालीस से भी अधिक बार लिया है। वैसे चालीसा के बारे में कहा गया  है कि यदि कोई भक्त इतनी बार प्रेमपूर्वक प्रभु का नाम लेता है तो प्रभु स्वयं धरती पर उतर कर उसके संकट हर लेते हैं।

 इस पूरे प्रकरण में अर्चना वर्मा की भूमिका क्या है? न चर्चित लेख उनका था न आलोच्य कविताएं उनकी। वे स्पष्ट कहती हैं कि उनकी शालिनी की ’’पढ़न्त से घनघोर असहमति’’ है (दिसम्बर पृष्ठ 8)। अनामिका और पवन करण के पद्य के पक्ष में उन्होंने छह पृष्ठ लिखे, और अनामिका के गद्य के पक्ष में ग्यारह पृष्ठ। ज़ाहिर है,वे एक पक्षकार हैं। उन्होंने एक गम्भीर चर्चा को छद्मपूर्वक एक घटिया खेल में तब्दील करने का प्रयास किया और स्वयं एक ऐसी रेफरी की भूमिका में आ गईं ,जो सरेआम पक्षपात करते हुए अपनी टीम को पूरे अंक देता है और विपक्षी टीम को केवल फ़ाउल ।
अर्चना वर्मा इतनी व्याकुल इतनी उद्वेलित, इतनी उत्तेजित और क्रोधित यूँ ही नहीं है,बात बहुत ख़ास है। वह ख़ास बात यह है कि इन वरिष्ठ विश्वविद्यालयीय विदुषी के पास हिन्दी के समकालीन साहित्य के लिए एक बहुत बड़ी परियोजना थी ,जिसमें कदाचित् मेरे इस छोटे आलेख से बड़ा व्यवधान पड़ गया। अर्चना वर्मा की इस महती परियोजना का प्रस्ताव हम स्पष्ट देख सकते हंै, वे लिखती हैं- ’’ एक समाज का पोर्न किसी दूसरे समाज का रसराज श्रृंगार हो सकता है। ’’ 

(कथादेश अगस्त पृ0 8) पोर्न को ’’नैतिक सदमा ’’ बताने वाली इस अति बुद्धिमती विदुषी  की इस निष्पत्ति का मैं कड़ा विरोध करती हूँ। 

विश्व की किसी भी सभ्यता संस्कृति के पूरे इतिहास के किसी भी कालखंड में पोर्न का कोई साहित्यिक मूल्य नहीं रहा। अर्चना वर्मा कहती हैं कि वह एक ही रस है उसे कहीं पोर्न कहते हंै कहीं रसराज श्रृंगार । उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि पोर्न श्रृंगार का विलोम है। ग्रीक साहित्यालोचन में भी दो विपरीत ऊर्जाएं मानी गई है ईरांॅस और थानाटॉस। श्रृंगार की ऊर्जा है ईरॉस पोर्न की ऊर्जा है थानाटॉस -एक प्रेम है दूसरी मृत्यु। पोर्न दरअसल सारे रसों का विपर्यय है।
आज से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व भारत में भरत के नाट्यशास्त्र की रचना हुई थी ,जिसमें आठ रस वर्णित थे। श्लोक स्मृति के आधार पर प्रस्तुत कर रही हूं - 

          श्रृंगारहास्यकरूणारौद्रवीरभयानकाः।
          वीभत्साद्भुतौ संज्ञौ चेत् अष्टौनाट्ये रसाः स्मृताः।।

उसके लगभग एक हज़ार वर्ष बाद हमारे आचार्य अभिनवगुप्त ने नाट्यशास्त्र पर टीका लिखी अभिनव भारती ,जिसमें नवां रस शामिल किया गया-शांत रस जिसका स्थाई भाव है शम, अर्थात् आठों रसों की सामरस्य पूर्ण उपस्थिति। आज, ईसा के लगभग दो हजार साल बाद, दिल्ली की विदुषी अर्चना वर्मा दशम् रस पोर्न को प्रतिष्ठित करने का प्रस्ताव लाई हैं। इसका स्थाई भाव क्या होगा, विमानवीकरण, विरूपीकरण, और अगर उर्दू से परहेज़ न हो तो ग़लाज़त?

खेल सामने आ चुका है, मामला दो कविताओं की अस्मिता का नहीं, हिन्दी के समकालीन साहित्य में पोर्न की प्रतिष्ठा का है। प्रस्ताव अर्चना वर्मा का है और समर्थन वामपंथी आलोचक आशुतोष कुमार का- ’’ शालिनी माथुर के चर्चित आलेख में कहा गया है कि वह नग्नता के खिलाफ़ नहीं है सिर्फ स्त्री शरीर के पोर्नाग्राफ़िक निरूपण के खिलाफ है,तब भी वह उन तमाम स्त्रियों के खिलाफ़ तो है ही जो अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए पोर्न कलाकार बनती हेंै।...आखिर पोर्न कलाकार बनने का फैसला स्त्री के लिए अपमान जनक क्यों होना चाहिए।........पोर्नोग्राफ़ी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही होती है यह कोई सर्व स्वीकार्य धारणा नहीं है। ’’ ( अगस्त पृ0 85 ) पोर्नस्टार की जीविका के अधिकार का प्रश्न उठाते हुए वामाचार के पक्ष में खड़े आशुतोष कुमार अपने नाम से पूर्व बेहयाई से वामपंथी लिखते हैं, इससे ज़्यादा लज्जास्पद बात और क्या हो सकती है ?

जिस तरह हम सब को मालूम है,उसी तरह आशुतोष कुमार को ज़रूर मालूम होगा कि पोर्न एक इंडस्ट्री (व्यवसाय) है और पोर्नस्टार उसका प्रोडक्ट (उत्पाद)। पोर्न इंडस्ट्री उत्पाद को अपमानित, विवश ,विरूपित, यौन उपभोक्ता सामग्री के रूप में पोर्न के उपभोक्ताओं को बेचती है। पोर्न इंडस्ट्री में स्त्री पण्यवस्तु है उसे बेचा ख़रीदा जाता है। आशुतोष कुमार ने सोच समझ कर ही अर्चना वर्मा की प्रस्तावित पोर्न प्रतिष्ठा का समर्थन किया होगा। यह वामपंथ है ,यह जनवाद और जनसंस्कृति है ,यह प्रगतिशीलता है,तो अवनति शीलता कैसी होती होगी? यह समय बहुत अंधेरा है। 

मानिनी विदुषी अर्चना वर्मा ने पवन करण की शहद के छत्तों और दशहरी आमों वाली कविता में संस्कृत के व्याकरण दर्शन के आचार्य भर्तृहरि के शब्दब्रह्म स्फोट का संधान किया है ( अगस्त पृष्ठ 9 ) और अभिमानिनी विदुषी अनामिका ने अपनी उन्नत पहाडों की गहरी गुफाओं वाली कविता को ’’कालिदास की पंक्तियों से अन्तर्पाठीय संवाद करती’’( अगस्त पृष्ठ 14 )  ब्रह्मगांठ बताया है जिसे खोल पाना मेरे जैसे सामान्य पाठक के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
अर्चना वर्मा ,संजीव चंदन और मदन कश्यप ने कहा है कि मैं कविता समझने योग्य  नहीं और अनामिका मुझसे सस्नेह निवेदन कर चुकी हैं कि,’’नए पाठक को कविता के योग्य बनना पड़ता है!’ ’समझने की योग्यता विकसित करनी पड़ती है! यत्न करके देखिये!’’ ( अगस्त पृष्ठ 14 )

योग्यता वाली बात पर बचपन में पढ़ी हुई एक कहानी याद आ गई ,जिसमें सम्राट के कपड़े उसी को दिखाई देते थे जो इस योग्य होता था। नए वर्ष में आइए वह पुरानी कहानी सुनें।

बहुत दिन पहले एक राजा था। उस मूर्ख और घमंडी राजा को कपड़ों के साथ नए नए प्रयोग करने का बहुत शौक था ,और वह हमेशा चापलूसों से घिरा रहता था। एक बार उस दम्भी सम्राट के दरबार में दो धूर्त ठग आए और बोले कि वे उसके लिए एक ऐसे कपड़े की पोशाक तैयार करके देंगे जो उसको दिखाई नहीं देगी जो नादान होगा या जो अपने पद के योग्य नहीं होगा।

वे धूर्त ठग हथकरघे पर बिना धागे के ताना बाना बुनने लगे ,वे हवा में सुई में धागा पिरोने का अभिनय करने लगे ,फिर वे ऐसी सुई से उस कपड़े पर बारीक बेलबूटे काढ़ने का अभिनय करने लगे जो बुना ही नहीं गया था। वे सोने चांदी और रेशम के तार मंगवाते और पुरस्कार स्वरूप अपने थैलों में भर लेते। ऐसा बहुत दिनों तक चलता रहा। राजा ने दरबारियों को भेजा। कपड़ा उन्हें दिखाई तो नहीं दिया ,पर स्वयं को योग्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने सम्राट से कपडे़ की प्रशंसा की ,उसकी नर्मी ,बुनावट और उस पर कढे़ बारीक बेलबूटों की भी। सम्राट स्वयं जा पहुंचा,कपड़ा उसे भी दिखाई नहीं दिया पर वह नादान नहीं, योग्य था। 

धूर्त ठगों ने हवा में कैंची चलाते हुए कपड़ा काटा और हवा में सुई धागा चला कर पोशाक सीकर सम्राट को पहनाने का अभिनय किया। आत्ममुग्ध सम्राट अदृश्य पोशाक पहनकर चाटुकार दरबारियों के जुलूस का नेतृत्व करता हुआ शहर के बीच चल पड़ा। भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ ने देखा पर चुप रही। इसी बीच भीड़ में खड़ा एक बच्चा ( मिथिला का बाबू) चिल्लाया -’’ राजा ने तो कुछ भी नहीं पहन रखा।’’ ’’नादान बच्चे की आवाज सुनो’’ , एक बुजुर्ग बोला, और फिर यह आवाज़ फुसफुसाहटों में बदलकर एक कान से दूसरे कान तक होती हुई एक शोर में बदल गई- ’’देखो राजा के तन पर तो वस्त्र ही नहीं।’’


हांस क्रिस्चन एंडरसन की यह कहानी भले ही फेयरीटेल के रूप में संकलित हो , यह कहानी बच्चों की नहीं है। दरबार की हिप्पोक्रेसी और बौद्धिकता के झूठे दम्भ के खिलाफ लिखी कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। कहानी  आगे चलती हैं- आवाज़ को सुनकर राजा समझ गया कि सब लोग जान चुके हैं कि वह निर्वस्त्र है, मगर उसने निर्णय किया कि वह उसी प्रकार दरबारियों के जलूस का नेतृत्व करता रहेगा। प्रजा शोर मचाती रही ,दरबारी निर्वस्त्र सम्राट के नेतृत्व में चलते रहे और यह दिखावा  करने के लिए और भी अधिक श्रम करने लगे कि वे एक बेहद शानदार ,बेशकीमती , बेहतरीन पोशाक के दूर तक फैले दामन की झालर को सावधानी से संवार और संभाल कर चल रहे है। 

निर्वसनों के वसनों की प्रशंसा में अनेक बौद्धिक लेख लिखे जा चुके हैं। प्रगतिशील तथा अवनतिशील कवि तथा विद्वत््जन निर्लज्जता से निर्वसन के नेतृत्व वाले जलूस में चल रहे हैं। उन सब ने नादान बच्चे की आवाज सुन ली है ,और उन सब की भी जिन्हें वे आम पाठक और सामान्य पाठक कह कर अपमानित और तिरस्कृत करते रहे हंै। छद्म खुल चुका है, फिर भी मृतात्माओं का जुलूस चल रहा है। खूबी यह है कि इस जुलूस में इस बार स्त्रियां भी शामिल है।
अर्चना वर्मा ने अपनी आठों सिद्धियों के द्वारा प्राप्त अलौकिक ज्ञान के आधार पर मेरे संस्कारों को कोसा है और मेरे जेहादी नारीवादी एक्टिविज़्म को भी। मुझे अपने बहुत पढ़े लिखे सुसंस्कृत माता पिता से मिले संस्कारों पर नाज़ है, जिनके कारण मैं सामाजिक एक्टिविस्ट बनी। 

ईसा के दो हज़ार बारहवें वर्ष का अंतिम माह इस विडम्बना के लिए याद रखा जाएगा कि जिस समय देश की राजधानी दिल्ली में हज़ारों आम लोग रेप के विरुद्ध जुलूस में चल रहे थे उसी समय हिन्दी साहित्य की विद्वत्त्रयी दिल्ली में पोर्न के पक्ष में जुलूस निकाल रही थी। यह समय अंधेरा है। मेरा यह प्रतिरोध एक नारीवादी एक्टिविस्ट का पोर्न के विरूद्ध प्रतिरोध है, जो इसी तरह जारी रहेगा क्यों कि मेरा यकीन है कि “पोर्न इज़ द थियरी:रेप इज़ द प्रैक्टिस ।” इस अंधेरे समय में मैं अपनी रोशनी के साथ खड़ी हूं, कि अब मैं अकेली नहीं , मेरे साथ हिन्दी का लगभग सारा संसार है।

मैं इस तरह से खेल समाप्ति की घोषणा नहीं होने दूंगी कि मेरे लिए यह कोई खेल नहीं, एक गम्भीर चर्चा है। यह चर्चा अभी समाप्त  नहीं हुई है।
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शालिनी माथुर

शिक्षा- संस्कृत में स्नातकोत्तर तथा प्रबंधन में स्नातकोत्तर। संगीत गायन में भातखंडे महाविद्यालय से संगीत विशारद तथा प्रयाग संगीत समिति से संगीत प्रभाकर की डिग्री। फु़ल ब्राइट स्कालर के  रूप में  संयुक्त राज्य अमरीका से एन जी ओ मैनेजमेंट में डिप्लोमा, यूनिवर्सिटी  ऑफ कोलम्बिया तथा  न्यू स्कूल यूनिवर्सिटी  में पेपर  प्रस्तुत।  


कार्यक्षेत्र -1980 से आज तक विभिन्न स्वयंसेवी संगठनो के साथ तथा स्वतन्त्र रूप से सामाजिक बदलाव के लिये सक्रिय। महिला अधिकारों के मुद्दों पर जमीनी स्तर के कार्याे से लेकर नीतिनिर्धारण के मंचों तक सक्रिय भागीदारी। सन् 1987 से नारीवादी आन्दोलन से सम्बद्ध। इंटरनैशनल विजिटर्स प्रोग्राम के तहत संयुक्त राज्य अमरीका सरकार द्वारा वाशिंगटन न्यूयॉर्क सांटा फ़े, मयामी तथा सेंडियागो में आयोजित कार्यशालाओं  में समाज सेवा के क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व । 

कार्यस्थल पर यौनशोषण प्रतिषेध के लिए गठित 26 सरकारी विभागों, बैंकों,मेडिकल कालेज आदि की समितियों में सलाहकार। विद्यालयों से लेकर कार्यालयों तक लोगों की जेन्डर ट्रेनिंग। पारिवारिक हिंसा और हत्या ,दहेज मांग,घर वालों द्वारा यौन-शोषण दुराचार के मामलों को सुलझाने में काउंसलिंग तथा आवश्यकतानुसार पुलिस कार्यवाही और न्यायालय से न्याय दिलाना। महिला आयोग आदि के साथ नए कानून बनाने की प्रक्रिया में भागीदारी। मानव अधिकारों तथा महिला अधिकारों पर परिचर्चाओं  में मंचों,रेडियो तथा टीवी कार्यक्रमों में भागीदारी। नारीवादी  मुद्दों पर लेखन।  

समाज सेवा के लिए हिन्द प्रभा सम्मान, वुमन अचीवर अवार्ड, नारी गौरव सम्मान, लायन इंटरनैशनल द्वारा अवार्ड आदि ।

 कथादेश, वसुधा, वागर्थ रंगप्रसंग,रचनासमय, समीक्षा, दैनिक हिन्दुस्तान, पुस्तक वार्ता, आदि प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में साहित्यिक आलेख तथा  समीक्षाएं प्रकाशित ।

सम्प्रति - ’सुरक्षा’ - दहेज मांग विरोधी संस्था तथा परिवार परामर्श केन्द्र की अवैतनिक सचिव के रूप में  स्वैच्छिक सेवा तथा एक उर्वरक उत्पादक राष्ट्रीय स्तरीय  सहकारी संस्था में प्रबन्धकीय पद पर कार्यरत। 

सम्पर्क - ए 5/6 कारपोरेशन फ्लैट्स, निराला नगर, लखनऊ फोन 9839014660
Email shalinilucknow @ yahoo.com
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लघुकथाएं और कविताएं



अर्चना ठाकुर की तीन लघुकथाएं

बड़े साहब

कन्हैया लाल बड़बड़ाते हुए अपनी कुर्सी पर आकर बैठते ही मेज़ पर लगी घंटी बजाते है|
'क्या होगा इस देश का - कहते है प्रजातन्त्र है - ख़ाक प्रजातन्त्र है |'
'क्यों कन्हैया लाल जी क्या हुआ ?' साथ की कुर्सी पर बैठे बाबू ने पूछा |
मुँह घुमाकर  उसकी तरफ झुकते हुए कहते है -
'अरे होना क्या है - कई दिनों से छुट्टी के लिए दरख्वास्त दे रहा हूँ पर
हर बार बड़े साहब टाल देते है |'
'क्यों ?'
'क्यों!'(एक एक शब्द गुस्से में कुचलते हुए कहता है)'मैं क्या समझता नहीं
,ये जो कारण बता कर मेरी छुट्टी नामंजूर की है वो सब नाटक है |'
और आगे झुकते हुए -'दरअसल ये सब महज कुर्सी का रौब भर है - अरे हर बड़ा
अफ़सर अपने से छोटे  को अपना गुलाम समझता है की वो जो भी करता जाएगा उसे
छोटा अफ़सर सहता जाएगा |'
'साहब पानी |'
अपने सामने खड़े चपरासी को घूरते हुए कन्हैया लाल लगभग चीखे -
'इतनी देर लगा दी पानी लाने में - मर गया था क्या ?'
'साहब - !'
'क्या है ?'
'आधे दिन की छुट्टी चाहिए थी |'
'क्यों ,कोई मर गया है क्या ?'
'साहब मेरी घर वाली को बच्चा होने वाला है |'
'बच्चा तुम्हारी घर वाली को होने वाला है तुम्हें तो नहीं और जो तुम चले
गए तो यहाँ चाय पानी कौन देगा - जाओ - चाय ले आओ |'
वह गमगीन चेहरे के साथ उल्टे पाँव वापस चल दिया चाय लाने |
उसके जाते ही कन्हैया बाबू फिर उसी तरफ झुक गए -
'हाँ तो मैं कह रहा था की हर बड़ा साहब - |'

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गंदगी

कलफ़ वाली शर्ट पहने वो गले की टाई की नॉट ठीक कर रहा था| बस उसके हाथ कोट
की तरफ बढ़ने ही वाले थे की पत्नी आ गई और अपनी बात कह गई| पत्नी की बात
सुन वो लगभग चिल्लाया -
'तुम पागल तो नहीं हो गई हो - धनी नहीं आया ,तो मैं क्या करूँ -
पाँचसौ-हज़ार एक्स्ट्रा दो पर उससे कहो की छुट्टी न किया  करे - आखिर उसे
सिर्फ पिता जी की देखभाल के लिए ही रखा है - अब  उनकी बीमार हालत पर मैं
क्या कर सकता हूँ - नौकर तो लगा रखा है न - जानती हो न बीमारी के चलते
रोज़ नहाते भी नहीं - ठीक से अपने सहारे खड़े भी नहीं होते अब नौकर आज नहीं
आया तो मैं उनको पेशाब कराने ले जाऊँ - पूरा बोझा मेरे ऊपर ही देदेंगे -
तुम देख रही हो न ,मैं तैयार खड़ा हूँ - जरूरी मीटिंग के लिए निकलना है -
अगर कपड़ों में गंदगी का एक भी दाग लग गया तो बैड इंप्रेशन पड़ेगा - समझती
क्यों नहीं|' एक झल्लाहट के साथ वो अपनी बात खत्म करता है|
पत्नी के सामने कोई रास्ता नहीं था|शवसुर को खिला सकती थी पर गुसलखाने
कैसे ले जाती|
पत्नी को अभी भी खड़ा देख वो आगे कहता है -
'मैं तो कुछ नहीं कर सकता - अब तुम्हें जो समझ आए वो करो - चाहे कोई
दूसरा नौकर रख लो|'आस्तीन झाड़ता वो कोट अपनी बाँह में डाले बाहर की ओर
निकल जाता है| पत्नी बगले झाँकती अपना सा मुँह लिए रह जाती है|
वह बाहर निकल कर जूते के तस्मे बांध रहा था की उसका पाँच वर्षीय बेटा
चॉकलेट खाते खाते वहीं आ जाता है और अपने पिता से चिपटने ही वाला था की
पत्नी चिल्लाई -
'नहीं -हीं - पापा के कपड़े खराब हो जाएँगें|'
'तुम भी - मेरा बेटा कोई गंदगी थोड़े ही है - आओ बेटा पापा के गालों में
जरा प्यार तो कर लो ,फिर पापा जाएँगें - |'
बेटे को गोद में ले कर उसके फूले गुलाबी गालों पर अपना प्यार अंकित कर वो
मुस्कराता बाहर निकल जाता है और हाथों में लगे चॉकलेट के दाग को अपने
रुमाल से पौंछते बाहर अपनी कार की तरफ बढ़ जाता है|
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हक़

'दमयंती देवी जी के केस के सिलसिले में जा रहा हूँ|' एक ने कहा|
'दमयंती- दमयंती देवी-!' वो सोचने लगा|
'जानते हो क्या -!' वो एकाएक उत्सुक हो उठा|
'मध्यम कद की हल्के रंगत वाली महिला दमयंती देवी को तो मैं जानता हूँ -
यही कोई गाँव में हमारे घर से चार घर छोड़ कर घर था उनका - दमनी दीदी दमनी
दीदी कहा करते थे - वही है न|'
अब प्रश्न उसके चेहरे पर नज़र आ रहे थे|
सरकारी रोडवेज़ बस, सुबह के ग्यारह बजे| अचानक बस पर दो मित्रों की भेंट
हो जाती है| एक पेशे से वकील दूसरा प्राइवेट नौकरी पेशा| मिले तो अपनी
गुफ़्तगू के साथ दमयंती देवी के नाम के साथ उसके विषय पर चर्चा छिड़ गई|
'जानता हूँ - बहुत अच्छे से जानता हूँ - शुरुवात से ही बड़ी तेज़ रही है -
घर परिवार के हर मसले पर अपनी पैठ बनाने वाली - पर तुम ये बताओ कोर्ट
कचहरी में क्या चल रहा है उनका?'
'उनके निवास की पीठ दीवार से मिला कोई चार सौ गज़ का टूटा फूटा मकान है
,उसी के हक़ का मुक़दमा चल रहा है - आज आखिरी फैसले की तारीख़ है -|'
'वो क्या उनके किसी जानने वाले की ज़मीन थी?'
इस प्रश्न पर वो फिसफिसी हँसी हँस दिया|
'तुम कहते हो कि उनको जानते हो, फिर उल्टा प्रश्न मुझ ही से कर रहे हो -
वहाँ कोई बुढ़िया रहती थी - उसका तो कोई अपना था नहीं - अचानक एक दिन जब
गंध आई तब पता चला कि बुढ़िया मर गई - परिस्थितियों की मारी बेचारी को कभी
दमयन्ती देवी ने उधर झांक कर भी देखा नहीं होगा - पर उसके मरते जाने कौन
कौन से सबूत इकट्ठे कर लिए कि वो उस बुढ़िया को खाना खिलाती थी, वो मरने
से पहले कह गई थी की बिटिया ये तुम्हारा ही घर है|' वो बीच बीच में
फिसफसी हँसी हँसता जाता था 'मानना पड़ेगा बहुत चालू औरत है - अपने मतलब के
लिए गधे को भी बाप बना लेगी - एक नज़र देखो तो सभ्य समाज का आईना है तो
दूसरी तरफ तस्वीर ही दूसरी है|'
'हूँ|'
'दो लड़को ,पति के साथ खुद का पाँच सौ गज़ का अच्छा ख़ासा मकान है, पति बैंक
में नौकरी करता है,खुद भी सरकारी नौकरी में है - दोनों बेटे कमाऊ पूत है
- दिन रात घर पर धन लक्ष्मी की वर्षा होती है - पर सुना है (कहते कहते वो
उसके और नज़दीक सरक आया) पति के घर परिवार में भी मुकदमे से सारी ज़मीन
हथिया ली थी - सास श्वसुर की सारी ज़मीन जायदाद पर हक़ जता लिया - अब एक
छोटे से टुकड़े पर उसका देवर रहता है|'
'हाँ अपने गाँव में भी यही किया - उसकी माँ के मरने पर बाप ने दूसरा
ब्याह किया था - उससे दो लड़कियाँ हुई थी - तब तो वो चुप रही पर जैसे ही
इधर बाप मरा उधर बाप की पेंशन ,बैंक खाता सब पर इकलौती वारिस बन अपना
जायज़ हक़ दिखा कर सब हथिया लिया - सौतेली माँ को तो कानों कान ख़बर भी नहीं
हुई - बस गाँव के छोटे से घर में बेचारिया रह रही है|'
'बड़ी तेज़ औरत है ,मिलो तो दादा भैया से कम बात नहीं करती जैसे जबान में
गुड़ की ढेली हो पर है दो धारी तलवार है|'
'हमे क्या करना भैया - उसको मिला चाहे उसका हक़ रहा हो या न रहा हो|'
'ऊपर वाला भी कमाल है - किसके हक़ का किसको देता है - |'
फिर दोनों विषय बदल दूसरी चर्चा करने लगते है|
कहीं दूसरी सड़क पर एक तेज़ चमचमाती कार अचानक बंद पड़ गई| ड्राइवर पीछे की
सीट पर बैठी महिला से कहता है - 'मैडम जी गाड़ी में कुछ दिक्कत हो गई है|'
'क्या - मुझे कोर्ट पहुँचना है|'
'गाड़ी नहीं जा पाएगी - मैं ऑटो बुला कर लाता हूँ|'
कुछ ही देर में ऑटो आता है | दमयंती देवी उसमे बैठती है और फिर ऑटो हवा
से बातें करने लगता है कि तभी किसी मोड़ पर सामने से आते तेज़ रफ्तार ट्रक
से बचने में ऑटो सड़क के किनारे पेड़ो के झुरमुट से टकरा जाता गया| दमयंती
जैसे किसी रबड़ बाल सी उछलती पेड़ों के पीछे की झड़ियो में जैसे लुप्त हो
जाती है| ट्रक वाले को अपनी गलती का अहसास होता है और वो ट्रक रोक ऑटो के
पास आता है| वो एक नज़र में देखता है की वहाँ सिर्फ एक घायल ऑटो वाला था
,आस पास किसी और को न पा कर वो ऑटो वाले को ही अपने साथ उठा ले जाता है|
दमयंती घायल वही पड़ी रहती है उनही झाड़ियों के झुरमुट में जहाँ किसी की भी
नज़र उसे छू नहीं पाती | पत्थरों से टकराने से और झाड़ियों से लिपटने से
दमयंती का पूरा शरीर छिल गया था और लगातार उससे खून बह रहा था| पुलिस आती
है पर दमयंती तक उनकी भी नज़र नहीं जाती और वो वही उसी हालत में पड़ी रहती
है|
ढलती दुपहर तक किसी की भी नज़र उस घायल महिला पर नहीं जाती है | उधर घर
वाले परेशान की आखिर दमयंती गई कहाँ? दुपहर के नियत समय पर कोर्ट उसके हक़
में फ़ैसला सुना देता है और उसके घर के पिछवाड़े की ज़मीन पर उसका मालिकाना
हक़ जायज़ मान लिया जाता है| तभी घायल अवस्था में पड़ी दमयंती आखिरी हिचकी
लेती है|उसी वक़्त गाँव की ओर लौटती बकरियों का झुण्ड उसकी लाश को कुचलता
निकल जाता है और चरवाहा उसे देख चौंक जाता है|
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अर्चना ठाकुर की तीन कविताएं

मुझे एकाकी रहने दो.।

लहू लहू में बह जाने दो
नस नस में चढ़ जाने दो,
नशा है ये एकाकीपन का
जगह जगह इसे बिखर जाने दो,

न कहना है न सुनना है
न हँसना है न रोना है,
सिर्फ अँधेरों की गलियों में
भटक के खो जाने,

ख्वाहिशों की गहरी रातों में
तमन्नाओं के डूबे तारे है,
चिथड़ी चिथड़ी आवाज़ों के
दम घोटूँ सन्नाटे है,

मुझे न पुकारो कि न सुनूँगी मैं,
मुझे न रोको कि न रुकूँगी मैं,
मुझे आज चले जाने दो
ये एकाकी का समंदर है,
और मुझे इसमे डूब जाने दो,

एकाकी पन के घावों को सहलाने दो,
मैं एकाकी हूँ मुझे एकाकी रहने दो ||

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इस रात की सुबह नहीं..।

अरे कोई सूरज को  ढक दे
कि अभी सबेरा नहीं हुआ
कि अभी भी जगे नहीं लोग
कि अभी भी उनींदी है आँखें
कि अभी भी थका है मन
कि अभी भी गुज़री नहीं काली रात
कि अभी भी घर तक लौटे नहीं लोग
कि अभी भी रात का चूल्हा पड़ा नहीं ठंडा
कि अभी भी पूरे पसरे नहीं पाँव
कि अभी भी देहरी पर टिकी है आँखें
क्योंकि अभी तक सुबक रही है खबरें
रात की कब्रों में ||

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पृथ्वी का रुदन..

अब वो स्नेह नहीं रहा
मुझसे तुमको,
रंगो से बेज़ार नज़र आता है
इंद्रधनुष मुझको,
फूलों में वो खुशबों भी नहीं
लगती मुझको,
बादल आते बरसते
फिर भी नहीं भिगोते मुझको,
अब वो स्नेह नहीं रहा मुझसे तुमको,
चारों ओर दिखते है
सिर्फ काले काले धुएँ मुझको,
सुर्ख रंगों से रंगी
दिखती हर शह मुझको,
क्रूरता,दरिद्रता के दानव
हर पल रौंदते मुझको,
इसलिए लगता है मुझको
की अब वो स्नेह नहीं रहा
मुझसे तुमको |
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कहानी


पीड़ा
अर्चना ठाकुर
छोटी बहन स्कूल गई है| माँ बाज़ार से सौदा लेने अभी निकली है और पिताजी
शाम से पहले  दफ़्तर से घर नहीं आएगें| माँ के जाते सुषमा ने बाहर का
किवाड़ जल्दी से बंद कर लिया और दरवाजे की सारी कुंडियाँ लगा ली फिर एक एक
करके सारे घर की खिड़कियाँ और बाहर को खुलने वाले सभी दरवाजे बंद कर लिए
और बिल्कुल अंदर वाले कमरे में जाकर बैठ गई| आक्रोश और तड़प से उसकी आँखों
की लालिमा और गहरी हो उठी थी| बंधे चेहरे और वेदना में भिंची हुई आँखों
से वह कमरे के चारों ओर देखती है| फिर ऊपर की ओर मरमरी आवाज़ में चलते
पंखे को देखती है| 'जहर खा कर मर जाऊँ पर जहर तो है ही नहीं, मिट्टी का
तेल छिड़क कर जल जाऊँ पर अपनी वज़ह से घर को भी आग में क्यों स्वाहा करूँ|
यही सही है, हाँ पंखे से लटक कर मर जाती हूँ| एक पल में ही सारी पीड़ा का
अंत हो जाएगा| रोज़ रोज़ की मौत से एक दिन की मृत्यु भली| नहीं जीना चाहती
इस तरह तिल तिल मर कर, आज मैं ये किस्सा यही समाप्त कर दूँगी|'
सुषमा जल्दी से उठती है और कमरे की अलमारी खोल कर बैठ जाती है फिर एक
सरसरी नज़र अलमारी के एक एक बड़े खाने में सिमटी साड़ियों पर डालती है| 'अब
कौन सी साड़ी लूँ, जो मजबूत हो और मेरे मर जाने के बाद बेकार भी न हो| कोई
नई साड़ी नहीं निकालूँगी|'

कुछ ही पल में कई साड़ियाँ फ़र्श पर दिखने लगी| 'एक एक करके सारी साड़ियाँ
देख डाली, क्या करूँ, एक तो वैसे ही माँ अपने लिए कभी कुछ नहीं खरीदती -
कितनी ही पुरानी हो जाने पर भी वे साड़ी संभाले रहती है - कितनी बार मैंने
कहा माँ कम से कम त्योहारों पर तो एक अदद नई साड़ी ले लिया करो, पर नहीं -
हमेशा हँस कर टाल जाती - अगर कभी मैं ही पैसे जोड़ जाड़ कर साड़ी ले आती तभी
भी तो नहीं पहनती वो साड़ी - तब ये कह कर रख देती कि तुम दोनों की शादी
में काम आएगी - हुअः ! शादी, अब तो मेरी चिन्ता छोड़ दोगी न माँ, आज
तुम्हारी बेटी सदा के लिए विदा होने जा रही है|'
सुषमा ने साड़ी लेने का विचार छोड़कर एक पुरानी चादर उठा ली और स्टूल पर चढ़
कर चादर का फंदा लगाने लगी| 'पुराने और छोटे से घर के एक पुराने से पंखे
पर पुरानी सी चादर का फंदा लगा कर एक पुरानी ज़िन्दगी खत्म कर रही हूँ|'
मन ही मन बुदबुदाई वो|

पंखे पर चादर लटकाते उसे याद आया- 'अरे! मैंने अभी तक कोई सुसाइड नोट भी
नहीं लिखा - कहीं मेरी आत्महत्या को हत्या मान पुलिस वाले बेवज़ह ही मेरे
माता पिता को तंग न करे|' चादर वैसा ही लटका छोड़ सुषमा स्टूल से नीचे उतर
आती है और कागज़ पेन निकाल कर बैठ जाती है|
'
किसको संबोधित करके लिखूँ - दुखी तो सभी होंगे पर माँ की हालत का अंदाज़ा है मुझे|'
'
माँ, आपकी ये बेटी आज आत्महत्या कर रही है| अपने ही हाथों अपनी ज़िंदगी
का गला घोंट रही है| मुझे माफ कर देना| आपने अब तक अपनी इस बेटी का बहुत
साथ दिया|मेरे पल पल में विश्वास किया पर माँ.। मैं अब लोगों की तिरछी
नजरों के सवालों से बहुत आहत हो चुकी हूँ| गली का एक गुंडा मुझे सालों से
छेड़ रहा है और सालों से मैं इस पीड़ा को सह रही हूँ पर अब तो लोग मेरी इस
डर मिश्रित चुप्पी को मेरी स्वीकृति मान मुझे ही टेढ़ी नजरों से देखने लगे
है| मेरे कॉलेज के लड़के मुझे देख फब्तिया कसते है,लड़कियाँ हँसती है|बाज़ार
से सौदा लेते दुकानदार हाथों को छूते हुए सामान देता है, गली से गुज़रते
रिक्शेवाले,आता जाता हर राहगीर मेरे देह में अपनी नजरों के दंश चुभाता
गुज़र जाता है|माँ..अब मेरे लिए इस पीड़ा को लगातार सह पाना मुश्किल हो रहा
है| मैं हार चुकी हूँ माँ, मैं हार चुकी हूँ| माना आपको अपनी बेटी पर
पूर्ण विश्वास है पर बाहर निकल कर मुझमें उन चुभती नजरों का सामना करने
की हिम्मत नहीं है| कल को कोई और अनहोनी हो उससे पहले ही मैं अपने इस
शरीर को जो मेरी आत्मा का दुश्मन बना जा रहा है ,खत्म कर रही हूँ| माँ
मुझे माफ करना , शायद आप मुझे मेरे इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेंगी
पर इसके सिवा मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं है...|'
कलम भींचें सुषमा अपने बहते आँसू पर एक गहरी गटकन से साथ काबू करती है और
फिर विचारों और शब्दों में गोता खाने लगती है|

'माँ मुझे नहीं पता था की स्त्री होना मेरे लिए मेरा सबसे बड़ा अपराध बन
जाएगा| शायद ये हर स्त्री की पीड़ा है| यकीनन माँ आप भी कहीं न कहीं इस
पीड़ा से गुज़री होंगी तो आपने कैसे हिम्मत की होगी इसे सहने के लिए| पिता
जी द्वारा आपको दी हुई यातना को तो मैंने अपनी आँखों से देखा है| जब
नौकरी चले जाने पर पिताजी शराब पीकर घर आते और नशे में आपको मारते| कितनी
चुप्पी में आपने वो दर्द सहा कि कहीं कोई बाहर आपके चीखने की आवाज़ न सुन
ले| शरीर पर लगी चोट का मरहम्म तो मिला होगा पर पति द्वारा दी हुई
यातनाओं की मानसिक क्षति की भरपाई शायद ही कभी हुई होगी| तब भी आप हर साल
आने वाले त्योहारों में अपने पति के लिए पूजा करती रही,अपना पत्नी धर्म
निभाती रही| माँ सचमुच तुम महान हो| हर वक़्त बेवक्त हम दोनों बहनों का भी
आप एक मात्र सहारा रही| माना पिता जी ने हमारी पढ़ाई में धन खर्च किया पर
जीवन में आगे बढ़ने की हिम्मत,प्रेरणा हमें आपसे ही मिली| मैं सोचती हूँ
अगर कभी आप इतनी परेशानी, दुख, और प्रताड़ना को सहते हुए हार जाती और आप
भी वही कदम उठा लेती जो आज मैं उठा रही हूँ तो हमारा क्या होता माँ ? आज
मैं जो कुछ हूँ वो न होती| पिताजी आप के जाने पर कुछ दिन गम मानते और फिर
दादी की कसम पर दूसरी शादी को राज़ी हो जाते| वो आने वाली हमारी माँ
कहलाती और संभव हो कि वो हमारे सब काम भी कर देती जो आप हमारे लिए करती
है पर क्या वो हमें वही विश्वास और स्नेह दे पाती जो एक माँ अपने बच्चों
को देती है| अच्छा ही हुआ माँ जो आपने हिम्मत से काम लिया| आप का कल का
साहस हमारी आज की हिम्मत है| सच माँ आप ही हमारी प्रेरणास्रोत हो|'
लिखते लिखते सुषमा नज़र उठा कर सामने की दीवार पर लगी अपने माता पिता की
तस्वीर देखती है| धुमिल फ्रेम में भी अपनी माँ की चमकती मुस्कान से वो
नज़र नहीं हटा पाती| एक गहरे उच्छ्वास के साथ वह अब ऊपर पंखे की ओर नज़र
डालती है फिर कुछ सोच उसके चेहरे के भाव बदल जाते है|
'
फिर मैं ये क्या करने जा रही हूँ| मैं तो अपनी माँ के सारे किए कराई
मेहनत पर पानी फेरने जा रही हूँ| आज उनकी एक बेटी नहीं बल्कि उनका एक हाथ
कट जाएगा| नहीं चंद लोगों के एक झूठ के लिए मैं अपना इतना सारा सच नहीं
बदल सकती| वे कौन लोग होते है मेरा नसीब तय करने वाले| मैं अपने बिगड़े आज
के लिए अपना आने वाला कल भी खराब कर रही हूँ| मेरी आत्महत्या  इस बात का
सबूत हो जाएगा की लोगों का झूठ जीत गया और मेरा सच हार गया| सिर्फ उनके
कह देने मात्र से मैं चरित्र हीन नहीं हो जाऊँगी| मैं ज़िन्दा रह कर अपना
सच साबित करूँगी और झूठ के मुँह में तमाचा मारूँगी| मेरी आज की हिम्मत
मेरा कल का भविष्य तय करेगी| मैं..|'

अचानक दरवाजे की तेज़ दस्तख की आवाज़ से वो चौंक जाती है| अपनी सुर्ख आँखों
से वह एक पल पंखे से लटकते चादर को तो दूसरे ही पल बंद दरवाजे की ओर
देखती है| फिर जल्दी से संभलते हुए 'आती हूँ' की आवाज़ देकर बिजली की
फुर्ती सी वह उठी, मुँह धो कर चादर उतार कर किनारें फेंक कर तेज़ी से
दरवाज़े की ओर बढ़ जाती है|

दरवाज़े को खोल बाहर अपनी छोटी बहन को देख मुस्कराती हुई बोली -'आ गई|'
आगे वो कुछ कह पाती की छोटी ने जल्दी से अंदर आकर किवाड़ बंद कर लिया|
सुषमा छोटी के चेहरे की ओर देखती है उसकी आँखों का डर देख सुषमा की आँखें
सचेत हो उठती है| उसने उन आँखों में अपनी बहन की पीड़ा नहीं बल्कि एक
स्त्री की पीड़ा महसूस की| आज जो कुछ उसके साथ गुज़र रहा है अब क्या वही
उसकी छोटी बहन को भी सहना होगा|
'
नहीं, एक स्त्री होना मैं एक अपराध नहीं होने दूँगी|'
'
दीदी - कहाँ जा रही हो?'
'
तू यहीं ठहर - मैं अभी आती हूँ|'सुषमा के अंदर का उद्वेग उफन कर आँखों
में जलजले की तरह दिखने लगा|
दीदी - वो वही गुंडा है - आप कहाँ जा रही हो?' उसकी घबराहट शब्दों में झलक आई|
पर सुषमा तेज़ी से बिन सुने कहे बाहर निकल गई|
गली तक निकलते सुषमा को देख गली के शोहदे यूँ निकल आए जैसे बारिश के बाद
जगह जगह कुकुरमुत्ते उग आए हो|
'
अरे वाह! आज रानी बेवक्त भी दरबार से बाहर आ गई -|'
इन फब्तियों के बाद मुँह से तरह तरह की अश्लील आवाज़ों ने सुषमा को और भी
जला कर राख कर दिया|

अपनी माँ का चेहरा आगे रख हिम्मत करके वह आगे बढ़ती रही और गली के मोड़ पर
जा कर रुक गई| पीछे शोहदे खड़े ललचाई नज़रों से उसे ताक रहे थे| सुषमा बिना
समय गवाएँ फुर्ती के साथ पलटी और पास के हलवाई की जलती कढ़ाई में पड़ी
कल्छुन उठा कर घुमाते हुए एक ज़ोर के साथ उन शोहदों के ऊपर टूट पड़ी| एक
साथ कईयों के चेहरे जलन से तड़प उठे| उन सभी की आह की आवाज़ ने सुषमा में
हिम्मत की अग्नि और भी प्रज्वलित कर दी| वह लगातार उन पर वार करती रही|
ये देख आस पास के खड़े सभी लोग सकते में आ गए|
'
ले - कमीनों - तुम्हारी ये हिम्मत, लो मेरा इज़हार|'
लोग भी आगे बढ़े - 'अरे लड़की को छेड़ता है- चलो पुलिस को बुलाते है|'
लोग भी उन शोहदों पर अपने अपने हाथ आज़माने लगते है|
अब सुषमा गहरी गहरी साँसे भरती सारा तमाशा अपनी हिकारत भरी नज़रों से देख
रही थी कि तभी उसने अपने कंधे पर एक भार महसूस किया|
'
अगर लड़की हिम्मत दिखाए तो उसकी एक हिम्मत चार की हिम्मत बन जाती है|'
पीछे से आकर माँ ने सुषमा को संभाला और नई ताज़गी भरी सुबह की भोर सी
मुस्कान के साथ वह उनके साथ वापस घर चल दी|
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जन्म : 05 मार्च,
जन्म स्थान : कानपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा : मनोविज्ञान ,हिंदी साहित्य में  स्नातकोत्तर उपाधि,परामर्श में
डिप्लोमा, एम0 फिल (मनोविज्ञान)
प्रकाशन : विभिन्न मुद्रित एवम अंतरजाल  पत्र-पत्रिकाओं में
कविताएँ,कहानियाँ,लघु कथा ,यात्रा व्यतांत  आदि का प्रकाशन
सम्पर्क :  अर्चना ठाकुर, तेजपुर ,सोनित पुर जिला ,आसाम
             arch .thakur30 @gmail .com
            archana.thakur.182@facebook.com