शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

वातायन-अप्रैल,२०११



हम और हमारा समय

इतिहास रचते अन्ना हजारे

रूपसिंह चन्देल

५ अप्रैल, २०११ एक ऎतिहासिक दिन बन गया. सुप्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे ने देशव्यापी भ्रष्टाचार को लेकर ’जन लोकपाल बिल’ के लिए दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर आमरण अनशन प्रारंभ कर दिया. केन्द्र सरकार ने उनके अनशन और उनके साथ खड़ी जनता के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बहुत हलके से लिया और कांग्रेस के प्रवक्ता ने इसे उठाया गया एक अनुचित कदम करार दिया. लेकिन अन्ना हजारे को लाखों लोगों से मिल रहे समर्थन ने सत्ता में बैठे मदमस्त मंत्रियों की नींद हराम कर दी है. अन्ना के अनुसार कुछ को छोड़कर सभी नेता भ्रष्ट हैं---- तो सोचा जा सकता है कि सत्ता-शक्ति से लैस मंत्री कितना भ्रष्ट होगें. अन्ना के इस आंदोलन से सरकार में सुगबुहाट हुई और इस बिल में संशोधन सुझाने के लिए उसने अपने तीन मंत्रियों की समिति गठित कर दी, जिसमें वीरप्पा मोइली, कपिल सिब्बल और शरद पवार शामिल थे. मोइली साहब को ए राजा अपराधी नहीं लगे, कपिल साहब ने टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले को ही सिरे से खारिज कर दिया था, जबकि शरद पवार साहब के विषय में पूरी दुनिया जानती है. इन नामों पर अन्ना हजारे को आपत्ति थी तो शरद पवार ने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को भेज दिया.

आखिर सरका र जन लोक बिल से घबड़ाई हुई क्यों है और वह ट्यूनीशिया,मिश्र और लीबिया की घटनाओं से सबक क्यों नहीं ले रही ! आज लोग दिल्ली के जंतर-मंतर को मिश्र के तहरीर चौक की संज्ञा दे रहे हैं और यदि सरकार का यही अड़ियल रुख रहा तो यह स्थान तहरीर से भी बड़ा इतिहास लिखने को तैयार दिख रहा है.

हम सभी जानते हैं कि ’जन लोकपाल बिल’ आते ही उन भ्रष्ट लोगों की मुसीबतें बढ़ जाएंगी जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं. तब दिल्ली की मुख्यमंत्री शिगंलू रेपोर्ट को खारिज करते हुए उसमें उठाए गए प्रश्नों पर अपने अधिकारियों की समिति नहीं गठित कर पाएंगी, जिसने दिल्ली की जनता को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि समिति में शामिल उनके उन अधिकारियों की निर्मल छवि की क्या गारण्टी है! अब यह ’ओपेन सीक्रेट’ है कि कामनवेल्थ गेम्स के घोटाले में नेताओं सहित कितने ही अधिकारियों ने अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया है. स्पष्ट है कि इस समिति की विश्वसनीयता जनता की दृष्टि में संदेश के घेरे में है उसी प्रकार जैसी केन्द्र सरकार के उन मंत्रियों की जिन्हें ’जन लोकपाल बिल’ के लिए नियुक्त किया गया था.

आज देश का कौन-सा विभाग है जो भ्रष्टाचार से अछूता है. बचपन में सुनता था कि देश में एक विभाग ऎसा है जहां भ्रष्टाचार नहीं है--- वह था सैन्य विभाग. सैन्य विभाग से मेरा आभिप्राय सेना के तीनों अंगों से है, लेकिन आज सर्वविदित है कि ये विभाग भ्रष्टाचार में कितना डूबे हुए हैं. मेरे बचपन में भी शायद इन विभागों के कुछ क्षेत्रों में भ्रष्टाचार व्याप्त था. कम से कम एम.ई.एस. जैसी जगहें तो थीं ही.

आज आदर्श सोसाइटी घोटाला, सुखना मामला ही नहीं रक्षा विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से उसकी हजारों एकड़ जमीन पर भूमाफिओं का कब्जा है और कितनी ही एकड़ जमीन पर इन माफियाओं ने भवन निर्माण कर अरबों कमा भी लिए हैं. सोचा जा सकता है कि जिन अधिकारियों की मिलीभगत से यह सब हो रहा है उन्हें क्या मिला होगा. और हमारे रक्षा मंत्री जी को यह पता ही नहीं है कि रक्षा विभाग के पास कितने हजार एकड़ जमीन है. इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि देश की रक्षा की बागडोर संभालने वाले सेनाध्यक्ष अनेकों घोटालों में शामिल हों और इससे बड़ी बेशर्मी की क्या बात हो सकती है कि फौज के कोटे की शराब और राशन की लूट में उसके उच्चाधिकारी शामिल हों. कल तक भ्रष्टाचार के लिए बदनाम पुलिस से कहां पीछे है सेना--- फर्क सिर्फ इतना है कि यहां उच्च अधिकारी और मझोले अफसर भ्रष्टाचार कर रहे हैं, जबकि पुलिस में ऊपर से नीचे तक वह व्याप्त है. सैन्य बलों में यह संख्या कम है, फिर भी इस रोग का इलाज यदि समय रहते नहीं किया गया तो यह संक्रामक हो सकता है और तब पुलिस और सैन्य बलों के बीच दिख रहा अंतर मिट जाएगा. इसीलिए ’जन लोकपाल बिल’ आना आवश्यक है.

जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तब टू जी स्पेक्ट्रम और कामनवेल्थ गेम्स को कैसे भूल सकते हैं. अकेले टू जी घोटाला इतनी बड़ी लूट थी कि इतनी बड़ी लूट अंग्रेजों ने देश के दो सौ वर्षों के शासनकाल में भी नहीं की थी. और कामनवेल्थ गेम्स--- दो हजार करोड़ रुपयों में पूरी हो जाने वाली योजनाओं के लिए साठ-सत्तर हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए. इसका मोटा अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के बस स्टैण्ड्स की शेडिंग का जो कार्य एक करोड़ अस्सी लाख में पूरा होना था उसके लिए बयालिस करोड़ रुपए खर्च किए गए. प्रश्न है कि शेष धन कहां गया. दिल्ली सरकार ने तीन आई.ए.एस अधिकारियों की समिति गठित कर दी है वे बताएंगे. ए राजा फंस गए ---- कुछ और लोग भी सलाखों के पीछे हैं, और शायद ऎसा इसलिए कि तमिलनाडु के चुनाव होने थे. लेकिन कब तक ये रहेंगे जेल में कहा नहीं जा सकता. होता यह है कि बड़ी मछलियां मदमस्त घूमती रहती हैं और जिनके इशारों पर दूसरे काम करते हैं उन्हें दबोच लिया जाता है --- जनता की आंखों में धूल --- कलमाड़ी बाहर कैसे हैं--- सरकार के पास उत्तर नहीं है. लीबिया को एक कर्नल गद्दाफी ने लूटा और मिश्र को एक होस्नी मुबारक ने, जबकि भारत में हजारों गदाफी और होस्नी मुबारक मौजूद हैं और सरकार चुप है. ऎसे गद्दाफियों और होस्नी मुबारकों के लिए ही ’जन लोकपाल बिल’ की आवश्यकता है.

लेकिन अब इस पर भी राजनीति प्रारंभ हो गयी है. मैं गलत भी हो सकता हूं लेकिन सरकार की मंशा सही नहीं दिख रही. अंग्रेजों ने फूट डालो और राजनीति करो का रास्ता अपनाया था. साठ वर्षों में देश ने राजनीतिज्ञों को अंग्रेजों की उसी नीति के नक्शेकदम पर चलते देखा है. अन्ना हजारे के इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन को तोड़ने की कोशिश की जा सकती है, वैसे ही जैसे हसन अली द्वारा नेताओं की काली कमाई को हिल्ले लगाने के उसके खुलासे से परेशान उन अपराधी राजनीतिज्ञों ने जांच एजेंसी के खिलाफ एन.जी.ओ. आदि को लगाकर उन्हें भ्रष्ट करार देने के प्रयास तेज कर दिए हैं. एजेंसी के कार्य को बाधित करने के तौर तरीके में से यह एक है. इससे वे जनता की दृष्टि में आने से बचना चाहते हैं. लेकिन जनता ने जान लिया है कि कौन कितना भ्रष्ट है. जिस हसन अली पर सत्तर हजार करोड़ रुपए इनकम टैक्स का बकाया है, दश देशों में जिसके गुर्गे देश के राजनीतिज्ञों, उद्योग पतियों, फिल्मी हस्तियों आदि का काला धन बैकों में जमा करने के लिए कार्यरत हैं, वह धन कितने लाख हजार करोड़ होगा---- अनुमान ही लगाया जा सकता है. कहते हैं कि उसके वापस आने से देश की अर्थव्यवस्था अमेरिका से अधिक अच्छी हो जाएगी. भारत एक बार पुनः सोने की चिड़िया बन जाएगा--- लेकिन क्या सच में ऎसा हो सकेगा ! इसी सच के लिए अन्ना हजारे ने आमरण अनशन प्रारंभ किया है, जिनके साथ देश की एक अरब जनता खड़ी है. मैं इक्कीस करोड़ लोगों को छोड़ रहा हूं, क्योंकि इनमें लाखों वे शामिल होंगे, जिनके लिए ’जन लोकपाल बिल’ गले का फंदा बनेगा.

एक बार पुनः भारतीय मीडिया (विशेष रूप से इलेक्ट्रानिक मीडिया) ने अन्ना हजारे के सपोर्ट में कमर कस ली है. साहित्यकार, पत्रकार, कुछ फिल्मी हस्तियां (रामगोपाल वर्मा जैसे लोगों को छोड़कर जो यह कहते हैं कि अपना वजन घटाने के लिए डायटिंग कर सकते हैं भ्रष्टाचार के विरोध के लिए नहीं) कलाकार --- अन्ना के साथ हैं. एक आवाज आज एक अरब लोगों की आवाज बन गई है. यदि इस बार देश चूक गया तो यह निश्चित है कि भ्रष्टाचारियों के नाखून और दांत और तेज हो जाएंगे और देश को भयंकर लूट से बचाया नहीं जा सकेगा, क्योंकि ये लुटेरे साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार से अधिक घातक हैं . घातक इसलिए,क्योंकि ये हमारे बीच से हैं. ’ जन लोकपाल बिल’ ही इन्हें नख-दंत विहीन कर सकता है.

वातायन के माध्यम से मैं आशा करता हूं कि आप्रवासी भारतीय भी अन्ना हजारे के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित करेंगे.

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वातायन के इस अंक में प्रस्तुत है कन्नड़ के वरिष्टतम लेखक एस.एल.भैरप्पा से मेरी बातचीत.

बातचीत













कन्नड़ के वरिष्टतम लेखक एस.एल. भैरप्पा को बिरला फाउण्डेशन की ओर से ’सरस्वती सम्मान’ प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है. भैरप्पा मेरे पसंदीदा लेखक हैं . उनके अधिकांश उपन्याशों का संग्रह मेरे पास है. भैरप्पा के उपन्यासों मे उनकी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि परिलक्षित है. ’पर्व’, ’साक्षी, उल्लंघन’, वंश वृक्ष, गृहभंग, आधार, गोधूलि, छोर, निराकरण ,तन्तु आदि उपन्यास इसके उदाहरण हैं. कन्नड़ में उन्हें लेकर विवाद रहा है और लेखकों का एक वर्ग उन पर अश्लीलता के आरोप मढ़ता रहा है, जो कि सच नहीं है. लेखक समय-सापेक्ष होता है और भैरप्पा के उपन्यासों में ऎसा कुछ नहीं जो अपने समय से साक्षात नहीं करवाता.

अक्टूबर, १९९३ में मैं सपरिवार बंगलौर, मैसूर और ऊटी की यात्रा पर गया था. मेरे साथ मित्र अशोक आंद्रे और श्रीमती बीना आंद्रे भी थे. हम १६ अक्टूबर को मैसूर पहुंचे. डी.आर.डी.ओ. गेस्ट हाउस में ठहरे, जो चामुण्डा हिल के सामने है. भैरप्पा जी से मिलने के लिए मैंने पत्र लिखकर दिन और समय पहले ही तय कर लिया था, लेकिन एक बार फोन करना आवश्यक था. १७ को सुबह मैंने उन्हें फोन किया तो फोन उन्होंने ही उठाया . सुबह दस बजे के लगभग मैं और अशोक आंद्रे उनसे मिलने उनके निवास पर पहुंचे. दुबले-पतले, गोरे मध्यम कद के भैरप्पा जी मेरी कल्पना से बाहर सहज-सरल थे. मैंने उनसे लंबी बातचीत की . वह हिन्दी कम बोल पा रहे थे, अतः बातचीत अंग्रेजी में हुई.

प्रस्तुत है भैरप्पा जी के साथ हुई बातचीत.

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लेखन में किसी ’केस हिस्ट्री’ को आधार नहीं बनाता :एस.एल. भैरप्पा

रूपसिंह चन्देल : आजकल आप कोई नया उपन्यास लिख रहे हैं ?

भैरप्पा : हाल ही में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है – ‍’तन्तु’ . यह एक बड़ा उपन्यास है. कन्नड़ में लगभग ९०० पृष्टों का. इसमें स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन को चित्रित किया गया है---- विशेषरूप से इन्दिरा गान्धी के समय को. इसमें मैंने राजनैतिक और सांस्कृतिक भ्रष्टाचार को उद्घाटित करने का प्रयास किया है. (बाद में मैंने इस उपन्यास की समीक्षा ’इंडिया टुडे’ के लिए लिखी थी ).

रूपसिंह चन्देल : अर्थात यह एक राजनैतिक उपन्यास है !

भैरप्पा : वास्तव में यह मात्र राजनैतिक उपन्यास ही नहीं है. इसकी पृष्ठभूमि राजनैतिक है अवश्य; किन्तु यह एक सामाजिक उपन्यास है. सामाजिक और वैयक्तिक जीवन का चित्रण है इसमें.

रू.सिं.च. : हिन्दी में इसका सही अर्थ----

भैरप्पा : इसका साहित्यिक अर्थ है तार-धागा.

रू.सिं.च. : यह संस्कृत शब्द है.

भैरप्पा : जी हां.

रू.सिं.च. : इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद होगा ?

भैरप्पा : जी हां, हिन्दी में अनुवाद होगा. श्री बी.आर.नारायणन करेंगे.

रू.सिं.च. : आपके अधिकांश उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद उन्होंने ही किया है.

भैरप्पा : हां, ’पर्व’, ’गोधूलि’, ’आधार’, और----.

रू.सिं.च.: ’उल्लघंन’ .

भैरप्पा : उल्लघंन का नहीं. उल्लधंन का अनुवाद पुत्रन ने किया है.

रू.सिं.च. : और ’छोर’---?

भैरप्पा : ’छोर’ का अनुवाद शेट्टी ने किया है.

रू.सिं.च. : आपने ’छोर’ में ’चामुण्डा हिल’ (मैसूर) को चित्रित किया है. आपकी पात्रा अमृता चामुण्डा पहाड़ी पर और जंगल में दिन और रात में (प्रायः हर दूसरी रात) जाती है.

भैरप्पा : जी हां.

रू.सिं.च.: ’छोर’ में अमृता का चरित्र पाठकों को आकर्षित करता है. उपन्यास में मनोवैज्ञानिक चित्रण हमें मिलता है.

भैरप्पा : हां.

रू.सिं.च. : आपने लेखक बनने का ही निर्णय क्यों किया. ? उसके पीछे क्या कारण थे ?

भैरप्पा : इसके पीछे मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि थी. मैं एक गांव से आया था. मेरा परिवार बहुत ही गरीब था--- बहुत ही गरीब. मेरी मां कुछ साहित्यिक अभिरुचि की थीं. कन्नड़ में ’भारत’ को (यहां शायद महाभारत से आभिप्राय है) ’कुमार व्यास भारत’ के नाम से जाना जाता है, जिसका प्रणयन चौदहवीं शताब्दी में किया गया था. यह अत्यधिक प्रभावपूर्ण महाकाव्य है. व्यास भारत का कन्नड़ ’वर्जन’ ’भामिनी सत्पथी काव्य’ में लिखा गया है. मेरी मां ’कुमार व्यास भारत’ को पढ़ती रहती थीं और वह स्वयं भी कुछ कविताएं लिखती थीं. लेकिन वह सब ग्रामीण स्तर तक ही सीमित था. उनकी कोई पहचान न थी. मैं सोचता हूं, मेरी मां से ही मुझे साहित्यिक प्रेरणा प्राप्त हुई थी. जब मैं ११ वर्ष का था, मेरी मां की मृत्यु हो गयी थी. और जब मैं ९ वर्ष का था, मेरे बड़े भाई और बड़ी बहन की मृत्यु हो गयी थी. वह भी एक ही दिन. उन दिनों ’प्लेग’ भयानक रूप से फैलता था. ’क्लोरोमाइसिटिन’ तब तक इज़ाद नहीं हुई थी.

रू.सिं.च. : शायद आपका एक उपन्यास इसी---.

भैरप्पा : ’गृहभंग’ . सच तो यह है कि मैं भी ’प्लेग’ की पकड़ में आ गया था. लेकिन यह एक प्रकार का चमत्कार ही था कि मैं बच गया. भाई और बहन की एक ही दिन हुई मृत्यु से मैं बुरी तरह विचलित हो उठा था. और जब मेरी मां की मृत्यु हुई मैं पूर्णरूप से अनाथ हो गया और किसीने भी मेरी परवाह नहीं की.

रू.सिं.च. आपके पिता जी ---?

भैरप्पा : मेरे पिता जी आवारा किस्म के व्यक्ति थे. उन्होंने कभी जिम्मेदारी अनुभव नहीं की. यही (सब कारण) पृष्ठभूमि थी. उसके बाद (जीविका और अध्ययन के लिए) मैं एक शहर से दूसरे शहर भटकता रहा. कमाते हुए पढ़ाई जारी रखने के लिए मैंने सभी प्रकार के काम किए. उदाहरण के लिए मैं होटल में ’सप्लायर’ था, तो सिनेमा थियेटर में ’गेटकीपर’ रहा---.

रू.सिं.च. (आश्चर्यान्वित स्वर में) ऎसा ?

भैरप्पा : हां! यही नहीं, मैं मैसूर से अगरबत्ती खरीदता और उन्हें कुछ खास स्थानों में जाकर बेचता था. इस प्रकार कुछ पैसे कमाकर पढ़ाई जारी रखने की कोशिश करता रहा. यह मेरे जीवन के प्रारंभिक अनुभव थे. जब मैंने इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की तब तक मैं बेहद अन्तर्मुखी हो चुका था और मृत्यु क्या है --- मृत्यु के पश्चात आत्मा कहां जाती है जैसे प्रश्न मेरे मस्तिष्क में घूमने लगे थे.

(कुछ रुकावट)

मैंने बी.ए. में दर्शनशास्त्र पढ़ने का निर्णय किया. केवल यह जानने के उद्देश्य से कि आत्मा, परमात्मा, मृत्यु आदि सब क्या हैं? मैंने दर्शन में एम.ए. किया और प्राध्यापक हो गया. प्राध्यापक होकर मैं सरदार पटेल विश्वविद्यालय गुजरात चला गया.

रू.सिं.च. आपने मैसूर विश्वविद्यालय से ही शिक्षा प्राप्त की थी ?

भैरप्पा : एम.ए. और उससे पूर्व की शिक्षा मैसूर विश्वविद्यालय से ही प्राप्त की. जब मैं हाई स्कूल में था, मैंने स्कूल छोड़ दिया था और सेना में भर्ती होने गया था. सेना में मेरा चयन भी हो गया था, लेकिन मैं ’एयर फोर्स’ में जाना चाहत था. उन्होंने मुझे ’एयर फोर्स’ में लेने से इंकार कर दिया, क्योंकि मैं हाई स्कूल नहीं था. ’नॉन मैट्रिक’ को वे ’एयर फोर्स’ में नहीं लेते थे. उन्होंने मुझे थल सेना के लिए कहा, लेकिन वह मुझे पसन्द नहीं था और मैं नहीं गया. उसके बाद मैं बम्बई गया. मेरे पास पैसे नहीं थे. मैं हुबली तक ट्रेन से गया. मैं बिना टिकट था. टिकट चेकर आया और मैं पकड़ा गया. क्रोधित स्वर में वह बोला, “बिना टिकट यात्रा करते तुम्हे शर्म नहीं आती ?” मैंने वास्तव में शर्मिन्दगी अनुभव की और पैदल ही बम्बई जाने का निर्णय किया.

(कुछ याद करते हुए)

मैं बम्बई क्यों गया ? (चेहरे पर गंभीर भाव--- कुछ सोचते हुए) क्योंकि कुछ लोगों ने मुझे कहा था कि तुम बम्बई जाओ. बम्बई एक ऎसी जगह है जहां भिखारी भी लखपती हो जाता है. मैंने सोचा, मैं भी लखपती बनूंगा. मैं पांच महीने तक वहां रुका. वहां, बम्बई सेण्ट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने लगा और वहीं रहने लगा. एक दिन मैंने दो लोगों को कन्नड़ भाषा में बातें करते सुना. मैं उनके पास गया और कन्नड़ में उनसे बात की. ज्ञात हुआ वे तांगावाले थे और मेरी ओर के --- मेरे क्षेत्र के थे. उस अनजान जगह पर अपने क्षेत्र के लोगों से मिलकर मुझे जो खुशी हुई होगी, उसका अंदाजा आप लगा सकते हैं. उन दोनों ने मुझसे पूछा, “मैं वहां क्या कर रहा हूं ?” मैंने बताया तो वे बोले, “हमारे साथ चलो.”

मुझे वे अपनी चाल में ले गए. आप जानते हैं बम्बई में चाल क्या होती है?

रू.सिं.च. : हां आ.

भैरप्पा : (द्विविधा भांपकर अपने कमरे की ओर संकेत कर ---जिस कमरे में हम बातें कर रहे थे वह १०X१२ के लगभग था.) इस कमरे से कुछ बड़ी जगह होती है और लगभग पन्द्रह लोग उसमें रहते थे. मैं भी उस व्यवस्था का अंग बन गया. उन दोनों ने आश्वस्त किया कि वे ’तांगावाला’ बनने में मेरी सहायता करेंगे. वे मुझे तांगा चलाना सिखायेंगे. और तांगा चलाने के लिए लाइसेंस प्राप्त करने में मेरी मदद करेंगे. बम्बई में उन दिनों तांगा को ’विक्टोरिया’ कहा जाता था. मुझे लाइसेस नहीं मिला. मैं उन सभी के लिए खाना अवश्य पकाने लगा. सभी पन्द्रह लोगों के लिए. उनमें से कुछ तांगावाले थे, कुछ कुली और कुछ मिलों में मजदूर थे. मुझे भोजन पकाना आता था और मैंने सहर्ष वह काम स्वीकार कर लिया. उसके बदले मेरा रहना और खाना मुफ्त था. उस चाल के निकट ही एक पुस्तकालय था. खाली समय मैं पुस्तकालय में पुस्तकें पढ़ते हुए बिताने लगा. पांच महीने पश्चात वहां तीन ’मेटीकेट्स’ (साधू) –अवधूत किस्म के साधू आए. जो एक स्थान से दूसरे स्थान में घूमते रहते थे. उन दिनों दर्शन प्रतिक्षण मेरे मस्तिष्क को विकल किए रहता था. मैं उन अवधूतों के साथ हो गया और लगभग एक माह तक उनके साथ मैं गांव-गांव घूमता फिरा. वे गांव-गांव भीख मांगते थे. भीख मांगने का यह अर्थ नहीं कि दरवाजे –दरवाजे जाकर मांगते थे. वे किसी मंदिर में जाकर डेरा जमाते थे, कोई न कोई उन्हें भोजन पहुंचाता था और वे लोग भजन-कीर्तन करते थे और गांजा फूंकते थे. मैं भी वह सब करने लगा. लेकिन एक माह पश्चात मैं उस जीवन से ऊब गया. वापस लौटकर मैंने अपनी पढ़ाई पुनः जारी रखने का निर्णय किया. उन्हें छोड़कर मैं मैसूर आ गया. पढ़ाई प्रारंभ की और मैट्रिक किया. उस समय तक मेरा लक्ष्य स्पष्ट हो चुका था--- अर्थात मुझे पढ़ना था. उसके तुरन्त बाद मैंने कॉलेज ज्वाइन किया. कठिन से कठिन काम करते हुए मैंने पढ़ाई जारी रखी.

रू.सिं.च. ’पार्ट टाइम’ काम भी किया----किसी फर्म आदि में?

भैरप्पा : हां. और इस प्रकार मैंने बी.ए. में दर्शन का अध्ययन किया. जबकि मेरे मित्रों ने कहा कि दर्शन के स्नातक के लिए जॉब लेना कठिन होगा. इसका व्यासायिक मूल्य नहीं है. मैंने उत्तर दिया कि मुझे जॉब की चिन्ता नहीं है. बाद में मैंने दर्शन में ही एम.ए. किया और हुबली के एक निजी कॉलेज में मुझे काम भी किल गया. वहां से गुजरात गया. एक विद्यार्थी के रूप में मैं सदैव ’मेरिट’ में रहा था और विश्वविद्यालय में मैं प्रथम श्रेणी में प्रथम था.

रू.सिं.च. निश्चित ही उन दिनों प्राध्यापक पद के लिए आज जैसी आपा-धापी भी न थी.

भैरप्पा : जी हां, मुझे सहजता से प्राध्यापकी मिल गयी थी. मैंने बड़ौदा विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की. मेरी पी-एच.डी. ’सत्य और सौन्दर्य’ पर है.

रू.सिं.च.: क्या यह हिन्दी में प्रकाशित हुई है ?

भैरप्पा : यह अंग्रेजी और कन्नड़ में प्रकाशित हुई है. पी-एच.डी. के बाद मैंने सौन्दर्यशास्त्र पर ही डी.लिट करने का निर्णय किया. डी.लिट .करते हुए एक पुस्तक लिखने का विचार आया. इसी दौरान मैंने दो उपन्यास लिखे.

रू.सिं.च.: आपने अपना पहला उपन्यास कब लिखा ?

भैरप्पा : मेरा पहला उपन्यास था ’ धर्मश्री’ जो १९५८ में लिखा गया. एम.ए. करने के कुछ दिनों पश्चात ही.

रू.सिं.च.: क्या उसका अनुवाद हिन्दी में हुआ है ?

भैरप्पा : नहीं.

रूपसिंह चन्देल : आपका दूसरा उपन्यास ?

भैरप्पा : दूसरे का अनुवाद भी हिन्दी में नहीं हुआ. क्योंकि मेरी दृष्टि में वे साधारण उपन्यास हैं. लेकिन जैसे ही मैंने पी-एच.डी. का शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया, मैंने ’वशवृक्ष’ लिखा. कथानक तो मेरे दिमाग में था ही. उपन्यास लिखा और पाण्डुलिपि रखकर भूल गया.

रू.सिं.च.: नारी प्रधान चरित्रवाला उपन्यास, जो पढ़ने के लिए प्रतिदिन मैसूर आती-जाती है--- डेली पैसेन्जर और जो प्रायः वृन्दावन गार्डन जाती है…..

भैरप्पा : हां---हां---वही. उपन्यास लिखकर मैं अपने डी.लिट के काम में व्यस्त हो गया था. उसमें मैं ढाई वर्ष व्यस्त रहा. ’वंशवृक्ष’ की पाण्डुलिपि के विषय में स्मरण ही नहीं रहा. उस समय मैं गुजरात में था. मेरा प्रकाशक हुबली में था. उसने मुझे पत्र लिखा कि ढाई वर्ष पहले आपने बताया था कि आपने ’वंशवृक्ष’ उपन्यास लिखा था. बाद में उसके विषय में आपसे कुछ सुनने को नहीं मिला. आपने माण्डुलिपि क्यों नहीं भेजी ? उसने पाण्डुलिपि मांगी. मुझे अब साफ प्रति तैयार करनी थी. उन दिनों कन्नड़ टाइपिंग की सुविधा न थी. मैंने पाण्डुलिपि निकाली और उसे पढ़ना प्रारंभ किया. जब मैंने पाण्डुलिपि पढ़नी शुरू की, मुझे उससे प्यार होता गया. मैं उसमें डूब गया. मैंने उसे बार-बार पढ़ा और बार-बार ठीक किया. और साफ प्रति तैयार कर प्रकाशक को भेज दी. उसके पश्चात मैं पुनः डी.लिट. के शोधकार्य में लग गया. लेकिन मैं अपने को दोबारा उस ओर ’कन्सट्रेट नहीं कर सका. सोचने लगा, मैं क्या कर रहा हूं ! मेरा क्षेत्र तो साहित्य है---- रचनात्मक लेखन. जो जीवन में रस दे सकेगा और मुझे पहचान भी. सौन्दर्यशास्त्र में हम केवल रस पर चर्चा कर सकते हैं. वह रचनात्मक कार्य न होगा. इसलिए मैं साहित्य की ओर उन्मुख हुआ. लेकिन मैंने कभी साहित्य का औपचारिक अध्ययन नहीं किया था. केवल सामान्य अध्ययन ही था. अतः मुझे साहित्य का अध्ययन करना चाहिए, मैंने सोचा. मैंने अपने एक मित्र से संपर्क किया, जो अंग्रेजी विभाग में थे, क्योंकि मैं अध्यापन के साथ एम.ए. अंग्रेजी की पढ़ाई करना चाहता था. ’’क्या आप अपने विभाग में अनुमति देंगे?” मैंने उनसे पूछा, “आप मुझे इस प्रकार एडजस्ट करें, जिससे मैं अपने विभाग में पढ़ा सकूं और आपकी क्लास में आकर पढ़ सकूं.” उन्होंने इस विषय में अपने सहयोगियों से चर्चा की. उनके सहयोगियों ने कहा, “भैरप्पा दर्शन विभाग में प्राध्यापक हैं और सौन्दर्यशास्त्र में पी-एच.डी. हैं. यदि वे हमारी कक्षा में विद्यार्थी होकर बैठेगें तो हम अपने को बाधित अनुभव किए बिना न रह सकेंगे.”

(समवेत हंसी)

उसके बाद मेरे मित्र, जो अंग्रेजी विभागाध्यक्ष थे, बोले, “आप अंग्रेजी में एम.ए. क्यों करना चाहते हैं ? एम.ए.(अंग्रेजी) में आपको उसका इतिहास, काव्य, आलोचना आदि पढ़ना होगा, जबकि (मेरे विचार से ) आपका उद्देश्य एक उपन्यासकार बनना है. इसके बजाए आप विश्वप्रसिद्ध क्लासिक उपन्यास , जैसे रशियन उपन्यासकारों में तोल्स्तोय, दॉस्तोएव्स्की, तुर्गनेव आदि, फ्रेंच लेखकों में विक्टर ह्यूगो, बाल्जाक आदि--- और कुछ अंग्रेजी तथा स्पेनिश लेखकों को पढ़ें. पहले आप उपन्यास पढ़ें, फिर उन पर आलोचना. एक दिन आप स्वतः अनुभव करेंगे कि आप कहां खड़े हैं. यदि आप चाहेंगे तो मैं आपका दिशा निर्देश कर सकूंगा.”

इसप्रकार मैंने विश्व-साहित्य का अध्ययन प्रारंभ किया—श्रेष्ठ उपन्यासों का. और इस प्रकार मैं धीरे-धीरे साहित्य में डूबता चला गया. मैं सोचता हूं कि वह मेरे जीवन का ’टर्निंग पाइण्ट’ था. दर्शनशास्त्र से मैं साहित्य में आया. दर्शन में मैं अधिक मौलिक न रह पाता, क्योंकि तब मैं दर्शन का विद्वान मात्र बनकर रह जाता. वास्तव में उस समय मेरी अभिलाषा थी डी.लिट. करके किसी अमेरिकन विश्वविद्यालय में प्राध्यापिकी हासिल करने की. वहां अध्यापन करने और वहीं व्यवस्थित होकर दर्शन की पुस्तकें लिखने और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रकाशक से प्रकाशित करवाने की. मेरे आदर्श थे डॉ. राधाकृष्णन. मैं नाम, यश और अच्छा वेतन चाहता था. शायद मेरी गरीब पृष्ठभूमि के कारण. अच्छा वेतन मेरी प्रमुख इच्छा थी. लेकिन जब मेरा झुकाव साहित्य की ओर हुआ तो मेरे मस्तिष्क में एक द्वन्द्व प्रारंभ हो गया. लगभग छः महीनों तक मैं द्वन्द्व में जीता रहा. मैं सोचता, मैं कन्नड़ में उपन्यास लिखता हूं--- मुझे मान्यता कैसे मिलेगी? मैं कर्नाटक से बाहर गुजरात में हूं--- मुझे प्रोत्साहन के अवसर कहां मिलेंगे ? इसी तरह के सवालों में मैं उलझ गया. लेकिन आंतरिक दबाव इतना अधिक था कि मैंने तय किया कि भले ही मुझे एक ’लेक्चरर’ के रूप में ही क्यों न अवकाश ग्रहण करना पड़े ( और मैं था भी लेक्चरर)--- लेकिन मुझे अब अपने को केवल साहित्य में केन्द्रित करना चाहिए, क्योंकि मैं एक ऎसे बिन्दु पर पहुंच चुका हूं, जहां मनोवैज्ञानिक तौर पर उपन्यास लिखने के अतिरिक्त और कुछ कर ही नहीं सकता. इसलिए मैंने वही निर्णय किया.

रू.सिं.च. आपने मैसूर विश्वविद्यालय कब ज्वाइन किया ?

भैरप्पा : मैसूर विश्वविद्यालय नहीं. लगभग छः वर्षों तक मैं गुजरात में था. वहां से एन.सी.आर.टी. नई दिल्ली आया.

रू.सिं.च. : किस रूप में ?

भैरप्पा : रीडर होकर. उन दिनों इसे ’वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी’ कहा जाता था.

रू.सिं.च. : किस वर्ष ?

भैरप्पा : जनवरी, १९६७ से जून १९७१ तक मैं वहां था, लगभग साढ़े चार वर्ष. वहां से यहां मैसूर में एक कॉलेज है – ’रीजनल कॉलेज ऑफ एजूकेशन’ (जो एन.सी.आर.टी. के अधीन आता है) में स्थानांतरण के लिए अनुरोध किया और मैं यहां आ गया. बीस वर्षों तक इस कॉलेज में सेवा करने के बाद मैंने अवकाश ग्रहण किया.

रू.सिं.च. : तो आजकल आप अपने को केवल साहित्य सृजन में केन्द्रित किए हुए हैं.

भैरप्पा : हां. (कुछ रुककर) दूसरे विषयों के पढ़ने में भी मेरी रुचि है, जैसे, इतिहास, समाजशास्त्र, विज्ञान आदि. दर्शन तो मेरा प्रोफेशनल विषय रहा ही है.

रू.सिं.च. : साहित्यकार को अधिकाधिक विषयों को पढ़ना चाहिए----.

भैरप्पा : हां---

रू.सिं.च. : आपकी पत्नी---?

भैरप्पा : वह मात्र गृहणी हैं. आजकल वह यहां नहीं हैं--- बद्री, केदार और गंगोत्री की यात्रा पर गयीं हुई हैं.

रू.सिं.च. : आपके बच्चे क्या कर रहे हैं ?

भैरप्पा : मेरे दो बच्चे हैं. दोनों इंजीनियर हैं. बड़ा लड़का मस्कट में है.

रू.सिं.च. : स्थायी नौकरी में ?

भैरप्पा : स्थाई नहीं.

रू.सिं.च. : कांट्रैक्ट में ?

भैरप्पा : हां---- और मेरा दूसरा बेटा हैदराबाद में है.

रू.सिं.च. : आजकल आप अकेले हैं. अतः आप अधिक एकाग्रतापूर्वक लेखन कर पा रहे होंगे.

भैरप्पा : नहीं---- ऎसा नहीं है. जब मेरे बच्चे साथ होते हैं तब भी मैं किसी को यह अनुमति नहीं देता कि कोई मेरी एकाग्रता को भंग करे. मेरी पत्नी पारिवारिक मसलों को नियंत्रित करती है और मैं अपने को लेखन, अध्ययन और यात्रा में ’कन्सण्ट्रेट’ करता हूं.

रू.सिं. च.: यात्राएं आपको पसंद हैं ?

भैरप्पा : (मुग्धस्वर में) बहुत.

रू.सिं.च.: आपने किन-किन स्थानों की यात्राएं की हैं ?

भैरप्पा : भारत में लगभग सभी स्थानों की यात्रा मैंने की है. जैसा कि बता चुका हूं मैं गुजरात और दिल्ली में था. कई बार विभागीय कार्यों से मुझे देश के भिन्न-भिन्न स्थानों में जाना पड़ा. इसके अतिरिक्त मैं अपने खर्च पर भी यात्रा करता रहा हूं. हिमालय में मेरी विशेष रुचि है. अनेक बार मैंने हिमालय की यात्रा की है. और मैंने कैलाश –मानसरोवर की यात्रा भी की है. जब १९८१ में पहली बार चीन ने अनुमति दी थी, मैंने यात्रा के लिए आवेदन किया. मैं चुना गया और वहां गया. मैंने बहुत से दूसरे देशों की यात्रा भी की है. सम्पूर्ण योरोपीय देशों में मैं दो बार घूमा हूं.

रू.सिं.च.: निजी खर्च से या----.

भैरप्पा : कभी किसी सम्मेलन में या अन्य कार्य से जाता रहा हूं.

रू.सिं.च.: एन.सी.आर.टी. के काम से !

भैरप्पा : एन.सी.आर.टी. की ओर से नहीं. कुछ साहित्यिक सम्मेलनों में भाग लेने--- और कभी निजी खर्च से. मैंने इस तरह यात्रा की ---- मान लो मैं किसी सम्मेलन में भाग लेने के लिए जर्मनी गया--- वहां कार्य सम्पन्नकर अपने खर्च पर मैं पड़ोसी देशों में घूमने निकल जाता रहा. मैंने धन खर्च किया और यात्राएं कीं. मैंने योरोप, कनाडा और अरब देशों की यात्राएं कीं. मैंने चीन, जापान, सिंगापुर, और हांगकांग आदि की भी यात्राएं कीं. सच तो यह हि कि भ्रमण मेरा शौक है---- मेरी कमजोरी है यात्रा----.

रू.सिं.च.: आपने ’पर्व’ लिखने की योजना कब बनायी ? जब आप दिल्ली में रहते थे ?

भैरप्पा : जब मैं दिल्ली में था, ’पर्व’ की ’थीम’ मेरे मस्तिष्क में थी. लेकिन जब मैं मैसूर आ गया, मैंने ’पर्व’ पर गंभीरतापूर्वक शोध प्रारंभ किया. छः से सात वर्ष तक मैंने ’पर्व’ से सम्बन्धित सामग्री की खोज में लगा दिए. इसमें सभी ऎतिहासिक तथ्य, परम्परांए, व्यवहार आदि के विषय में जानना था. मैं उन स्थानों में गया, जिनका सम्बन्ध महाभारत से था. जैसे द्वारका, विराटनगर, कुरुक्षेत्र और जरासंध का स्थान ’राजगृह’ (राजगीर), हस्तिनावती और हिमालय के निचले स्थान, यथा – पाण्डुकेश्वर (जोशीमठ और बद्रीनाथ के मध्य एक जगह है, जिसे पाण्डुकेश्वर कहते हैं). वहां यह मान्यता है कि पाण्डु ने वहीं निवास किया था, जब वह अपनी पत्नियों के साथ गया था. इस प्रकार मैंने ’अध्ययन यात्राएं’ कीं और तब ’पर्व’ लिखा.

रू.सिं.च. हिन्दी लेखकों में आपने किन्हें पढ़ा है ?

भैरप्पा : मेरी समस्या यह है कि मैं हिन्दी तो पढ़ सकता हूं, लेकिन मेरी गति बहुत कम है. मैंने जयशंकर प्रसाद को पढ़ा है.

रू.सिं.च. : प्रेमचन्द को पढ़ा ?

भैरप्पा : प्रेमचन्द को मैंने कन्नड़ में पढ़ा है. मूल हिन्दी में मैंने ’गुनाहों का देवता’ पढ़ा है.

रू.सिं.च.: डॉ. धर्मवीर भारती का उपन्यास ….

भैरप्पा : हां. इसके अतिरिक्त मैंने एकाध और पुस्तकें पढ़ी हैं.

रू.सिं.च.: अनुवाद में केवल प्रेमचन्द को ही आपने पढ़ा ?

भैरप्पा : नहीं और भी मैंने पढ़ा. इस समय वह सब याद नहीं आ रहा है. लेकिन जब भी कुछ उपलब्ध होता है, मैं पढ़ता हूं.

रू.सिं. च.: मुझे महसूस होता है कि हिन्दी से कन्नड़ अनुवाद में कुछ समस्या है शायद ! क्या कोई भी हिन्दी उपन्यासों का कन्नड़ में अनुवाद करने के लिए उत्साहित नहीं होता ?

भैरप्पा : नहीं, ऎसा नहीं है. बहुत लोग अनुवाद करना चाहते हैं और बहुतों का हुआ भी है. कुछ ऎतिहासिक उपन्यासों का अनुवाद हुआ है.

(कुछ व्यवधान)

(भैरप्पा जी उठकर जाते हैं. जिस डाक्टर को आना था, वह आ गयी थीं. वे लौटकर, सरलतापूर्वक बताते हैं कि वह महिला अतिथि किस प्रकार बेअगांव से मैसूर पहुंचीं.)

रू.सिं.च. : कृपया अपने ’छोर’ उपन्यास के विषय में बताएं! इसके कथानक की प्रेरणा आपको कहां से मिली ? इसकी पृष्ठ्भूमि में कोई ऎसा वास्तविक चरित्र था जिसे आप जानते थे ?

भैरप्पा : नहीं---नहीं---. प्रायः मैं वास्तविक चरित्रों को आधार नहीं बनाता. होता क्या है, जहां हम वास्तविक चरित्र को आधार बनाते हैं, वह उपन्यास कभी अच्छा नहीं हो सकता. यह बात मैं अपने व्यक्तिगत लेखन-अनुभव के आधार पर कह रहा हूं. जब कल्पना पूर्णरूप से स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करती है तब एक अच्छे उपन्यास का जन्म होता है --- भले ही वह काल्पनिक होता है. ’छोर’ वास्तव में मेरे उपन्यास ’साक्षी’ का विकास है. आपने साक्षी पढ़ा है ?

रू.सिं.च. : जी हां.

भैरप्पा : ’साक्षी’ में एक व्यक्ति केवल औरतों और सेक्स के पीछे दौड़ता रहता है. वह, मंजय्या यह नहीं जानता कि वह चाहता क्या है ? लेकिन वह एक औरत से दूसरी औरत की ओर दौड़ता रहता है. एक नारी चरित्र है सरोजाक्षी. मंजय्या उसके पीछे होता है और एक रात वह अवसर आ भी जाता है. सरोजाक्षी उसे उत्तेजित कर देती है और उत्तेजित हो मंजय्या कुछ करता, इससे पहले ही वह उसे रोककर कहती है, “ उत्तेजित मत हो. कुछ करने से पूर्व हम क्यों न कुछ देर बातें करें. और तब वह प्रश्न पूछती है. “अपने जीवन में तुम कितनी औरतों के साथ सोये हो ? क्रिकेट के खिलाड़ी की भांति कितने शतक पूरे किए ? मैं जानती हूं कि तुमने बहुत सारी औरतों कॊ ’हिट’ किया है, लेकिन जानना चाहती हूं कि तुम एक औरत से दूसरी औरत तक क्यों भटकते रहे ? तुमने क्या पाया ? क्या मिला तुम्हें ? क्या पाना चाहते हो ?” सरोजाक्षी ने विनम्र होकर कहा, “कृपया मेरे प्रश्न का उत्तर दो.” और तब वह रिफ्लेक्टिव हो गया. सरोजाक्षी ने उसे उत्साहित करने की कोशिश की, लेकिन वह पुनः उत्तेजित नहीं हुआ. वह उसके साथ कुछ नहीं कर सका. तब सरोजाक्षी ने कहा, “आप पुरुष हैं? नहीं, वास्तव में आप पुरुष नहीं हैं.” आदि आदि.

(कुछ रुककर)

आप कहानी जानते हैं. तब एक विचार मेरे मस्तिष्क में था, “आदमी जीवन में क्या पाता है ? जीवन क्या है ?” यही प्रश्न था. उपन्यास ’छोर’ में उस प्रश्न के दो रूप उभरते हैं. ’छोर’ की नायिका ’अमृता’ जो प्यार की आकांक्षिणी है और एक आदमी है (सोम शेखर) जो उसे प्यार देना चाहता है. लेकिन अमृता उसी के साथ दुर्व्यवहार करती है और वह अपनी सहिष्णुता प्रदर्शित करता उसे बर्दाश्त करता है. जबकि कोई भी उस महिला (अमृता) के साथ अपना संबन्ध बरकरार नहीं रख सकता था. लेकिन सवाल यह है कि अमृता सोमशेखर के साथ क्रूर व्यवहार क्यों करती है ? उसने क्या गलती की है ?दूसरों ने तो अमृता के साथ गलतियां की थी, जबकि सोमशेखर ने नहीं. लेकिन वह उन सबका प्रतिशोध उससे लेना चाहती है, जो उसे प्यार करता है. यही प्यार का वास्तविक रूप है. इस प्रकार मैंने प्यार को व्याख्यायित-चित्रित करने का प्रयास किया है. ’साक्षी’ से ’छोर’ तक मैंने किसी खास ’केस हिस्ट्री’ का अनुसरण नहीं किया . यह कोई मनोवैज्ञानिक उपन्यास ही नहीं है. यह प्रणय की प्रकृति को चित्रित करता है. इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण व्यवस्था (सामाजिक) के विरुद्ध कुछ विषयों का खुलासा करता है. जैसे किसी युवक –युवती पर परिवार द्वारा विवाह का थोपा जाना. वह (अमृता) इसी बात के विरुद्ध विद्रोह करती है. वह कहती है कि उसका विवाह उसके साथ किया गया एक फ्राड था. वह एक प्रकार का धोखा था. अतः वह उससे बोझ की भांति फेककर मुक्त हो जाती है.

(बाहर कहीं कौओं की कांव-कांव सुनाई पड़ती है. बीच-बीच में सड़क पर चलती गाड़ियों का हार्न भी सुनाई दे जाता है.)

रू.सिं.च. : आपके अनेक उपन्यास नारी प्रधान हैं, जैसे कि ’वंशवृक्ष’, ’छोर’, ’उल्लघंन’--- जिनमें नारी चरित्रों को केन्द्र में रखा गया है. इसका कारण ?

भैरप्पा : कई पुरुष पात्र भी तो हैं. सशक्त पुरुष चरित्र. उदाहरण स्वरूप ---’वंशवृक्ष’. उसमें भी सशक्त पुरुष पात्र हैं. होता क्या है, जब आप वास्तविक जीवन में देखते हैं कि पुरुष सशक्त हो जाता है-- उसका विकास बौद्धिकता और वैचारिकता की ओर अधिक होता है. लेकिन नारी की शक्ति का आधार होता है प्यार और आकर्षण. मैं सोचता हूं, यह प्रकृति प्रदत्त होता है. ’पर्व’ में कुन्ती का चरित्र ऎसा ही है. दूसरे चरित्र भी हैं. द्रौपदी भीम से अधिक शक्तिशाली है. कुन्ती दूसरे पात्रों की अपेक्षा अधिक सशक्त है. वास्तविक जीवन में आप पुरुष और नारी की प्रकृति पर विचार करें तो पाएगें कि जहां पुरुष बौद्धिक स्तर पर शक्ति अर्जित करता दिखता है, वहीं नारी भावुकता के स्तर पर अधिक सशक्त होती है.

रू.सिं.च.: आपने कहानियां भी लिखी हैं ?

भैरप्पा : मैंने केवल दो कहानियां लिखी हैं.

रू.सिं.च.: दो के आगे क्यों नहीं लिख पाए ?

भैरप्पा : मैं ;समझता हूं हर लेखक का एक मनोधरम---प्रकृति होती है--- तो मैंने अनुभव किया कि मैं जो भी कहना चाहता हूं उसे ’शार्ट स्टोरी’ में कहना मेरे लिए कठिन है.

(घड़ी पर नजर डालता हूं, बारह बजने वाले हैं. कई आवश्यक कार्य कर दो बजे गेस्ट हाउस पहुंचना था. शैलानियों के लिए समय सदैव महत्वपूर्ण होता है. मैं भैरप्पा जी के प्रति क्रुतज्ञता ज्ञापित करता हूं और प्रणाम कर बाहर निकल आता हूं. बाहर खिलखिलाती धूप मेरा स्वागत करती है. मैं आंद्रे के साथ सड़क पर उतर जाता हूं भैरप्पा जी के विषय में सोचता हुआ, जिन्हें कुवेम्पुनगर (मैसूर) का बच्चा-बच्चा जानता है.

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शुक्रवार, 11 मार्च 2011

वातायन - मार्च,२०११


हम और हमारा समय

सड़कें, शिकारी और महिलाएं

रूपसिंह चन्देल

साफ़-चौड़ी सड़कें, सड़कों पर दौड़ते वाहन और भागती जिन्दगी--- जिन्दगी इतनी व्यस्त कि उसके आस-पास क्या हो रहा है, क्या हो चुका है इस ओर ध्यान देने का वक्त नहीं है उसके पास और यदि वक्त है भी तो वह इतनी खुदगर्ज हो चुकी है कि सारा वक्त केवल अपने लिए ही सुरक्षित रखना चाहती है. यह तस्वीर है आज की उस दिल्ली की, जहां संसद है, संसद में देश के भाग्य विधाता बैठते हैं, जिनमें से कितनों ही की गाढ़ी कमाई के हजारों करोड़ डॉलर विदेशी बैंकों में जमा है और मज़ाल है किसीकी कि उस पर चर्चा करने का साहस कर सके. साहस करने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं ये लोग. इसी दिल्ली में चमचमाती सरकारी कारों में घूमते हैं ब्यूरेक्रेट्स, जिनमें हर दूसरा भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है.

इसी दिल्ली में दौड़ती हैं कालेरंग की स्क्रीन चढ़ी कारें और उन कारों के अंदर बैठे होते हैं अपराधी. अपराधी केवल ऎसी कारों में ही नहीं घूमते, वे सड़कों पर खुले सांड़ की भांति घूमते रहते हैं और उनके समक्ष विवश है दिल्ली पुलिस, जिसे देश की सर्वश्रेष्ठ पुलिस होने का गौरव प्राप्त है. देश की राजधानी में अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ा है और उनमें सर्वाधिक अपराध बढ़े हैं महिलाओं के विरुद्ध. यद्यपि दिल्ली पुलिस का दावा है कि पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में कमी आई है . पिछले वर्ष के अंतिम दो माह में जहां ७७ बलात्कार के मामले प्रकाश में आए थे, वहीं बीते दो माह में ४४, लेकिन एक सर्वेक्षणकर्ता के अनुसार यह ग्राफ सही नहीं है, क्योंकि ग्राफ कम दिखाने के लिए पुलिस अनेक मामले दर्ज ही नहीं करती.

बात दिल्ली की ही नहीं, पूरे देश में अपराधों में वृद्धि हुई है. आज की दिल्ली में दिन दहाड़े किसी लड़की को काले रंग की स्क्रीन चढ़ी कार में अपराधी घसीट लेते हैं और सड़क पर दौड़ती उस कारे में उसके साथ बलात्कार होता रहता है--- दिल्ली पुलिस मुस्तैद रहती है और अपराधी अपने काले कारनामों को अंजाम देते रहते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैम्पस के पास रिंग रोड पर बने फुट ओवर ब्रिज पर सरे आम पचास-साठ लोगों की उपस्थिति में एक अपराधी युवक राधिका तंवर को गोली मारकर निश्चिन्तता के साथ निकल जाता है और जिन्दगी ठहर कर यह भी नहीं देखती कि खून से लथपथ मृत्यु से जूझती वह लड़की थी कौन? ’हर समय आपके साथ’ रहने का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस अपने ही एक सिपाही द्वारा लगातार भेजे गए संदेशों के बावजूद घटनास्थल पर विलंब से पहुंचती है और अस्पताल पहुंचने से पूर्व ही राधिका अपनी अंतिम सांस ले चुकी होती है.

दिल्ली में महिलाएं किस कदर असुरक्षित हैं इसका अनुमान दिल्ली में बारह वर्षों से एक-छत्र राज करने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के उस वक्तव्य से लगाया जा सकता है, जब वे कहती हैं कि वह भी अपने को असुरक्षित अनुभव करती हैं. वह जब यह कहती हैं कि अपराधियों के विरुद्ध जनता को भी जागरूक होने की आवश्यकता है, तब मीडिया उनकी इस सलाह की धज्जियां उड़ाने लगता है, लेकिन हमें सब कुछ पुलिस पर ही नहीं छोड़ देना चाहिए. डेढ़ करोड़ की आबादी वाली इस दिल्ली में लोग इतना खुदगर्ज और संवेदशून्य हो गए हैं कि सड़क पर तड़प रहे दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को तड़पता छोड़ लोग उसके पास से गुजरते रहते हैं. राजौरीगार्डन के पास रिंगरोड पर दुर्घटनाग्रस्त सड़क पर पड़ी एक महिला को रौंदती कितनी ही कारें गुजरती रहीं और मानवता कराहती और शर्मसार होती रही. तो यह है आज की दिल्ली.

दिल्ली में अपराधों में वृद्धि का कारण पुलिस और राजनीतिज्ञों में व्याप्त भ्रष्टाचार भी है. कितने ही अपराधी वहां संरक्षण पाते हैं और क्यों पाते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं . अपराधियों के हौसले इसलिए भी बुलंद हैं क्योंकि न्याय प्रणाली लचर है. बलात्कारियों को फांसी की मांग करने वाले लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री बनते ही अपने इस मुद्दे को भूल बैठे थे. बलात्कारियों को मृत्युदंड से कम सजा नहीं दी जानी चाहिए. महिलाओं के प्रति अन्य अपराधों के लिए भी कठोरतम दंड का विधान किया जाना चाहिए--- संविधान को बदला जाना चाहिए. तभी महिलाओं के शिकार के लिए घूमने वाले अपराधियों के हौसले ही नहीं पस्त होंगे, घरों और दफ्तरों में भी उनके प्रति कुदृष्टि रखने वालों पर अंकुश लगेगा.
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वातायन के मार्च अंक में प्रस्तुत है ले-मिज़ेराबल के इटैलियन—रूपांतर के प्रकाशक एम.डाएल्ली के नाम विक्तोर ह्यूगो का पर, कामिल बुल्के पर चर्चित कथाकार और कवयित्री इला प्रसाद का संस्मरण और वरिष्ठ हिन्दी और सिन्धी कवयित्री देवी नागरानी की कविता और गज़ल.

दस्तावेज


’ले - मिज़ेराबल’ के इटैलियन रूपांतर के प्रकाशक
एम.डाएल्ली के नाम विक्तोर ह्यूगो का पत्र

’ले-मिज़ेराबल’ वह आईना है----’

महोदय,

आपका यह कहना बिल्कुल ठीक है कि ’ले-मिज़ेराबल’ दुनिया के सभी देशों के लिए लिखा गया है. मैं नहीं जानता कि दुनिया के सभी लोग इसे पढ़ेंगे या नहीं, पर लिखा तो मैंने इसे निश्चित ही दुनिया के सभी लोगों के लिए है. यदि एक ओर यह संबोधित किया गया है इंग्लैंड को तो दूसरी ओर स्पेन को भी; एक ओर इटली को तो दूसरी ओर फ्रांस को भी; एक ओर जर्मनी को तो दूसरी ओर आयरलैंड को भी; एक ओर गुलामी से बजबजाते लोकतत्रों को तो दूसरी ओर बेगारी बजानेवाले बेमुंह के लोगों के धनी साम्राज्यों को भी. सामाजिक समस्याएं देशों की सीमाओं से नहीं बंधतीं. मानव-जाति के नासूर पूरे ग्लोब पर रिस रहे हैं. वे नक्शों पर खिंची लाल या नीली रेखाओं पर आकर रुक या ठहर जाने वाले नहीं. आज जहां भी आदमी जाहिल है, निराश है, टूटा हुआ है; आज जहां भी औरत पेट की रोटी के लिए अपना सौदा करती है; और, आज जहां भी किसी बच्चे के पास लिखने-पढ़ने को किताबें और तापने को चूल्हे की आग नहीं है, वहीं ’ले-मिज़ेराबल’ दरवाजे़ पर दस्तक देता है और कहता है ---’दरवाज़ा खोलो, मैं हूं---- तुम्हारे लिए ही तो यहां तक आया हूं.’

आज हम सभ्यता के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसका आगे का रास्ता काफ़ी घुंधला है; और इस यात्रा के इस मोड़ पर ’मिज़ेराबल’ का नाम आदमी है, इंसान है. यह आदमी, यह इंसान आज हर हवा-पानी में दर्द पर दर्द सह रहा है और हर भाषा में कराह रहा है.

मैंने माना कि हमारा फ्रांस संकटों का शिकार है, पर आपका इटली भी इससे मुक्त नहीं. आप जिस इटली की इतनी प्रशंसा और सराहना करते हैं, उसके तो चेहरे पर ही जाने कितने दुख-दर्दों के दाग और झुर्रियां हैं. क्या आपके पहाड़ी इलाक़े, ग़रीबी की और भी गई---बीती स्थिति, लूटमार के अजायबघर नहीं? कॉन्वेंटों (महिला-मठों) के जिस औंधे फोड़े के अंदर मैंने झांकने की चेष्टा की है, उसने जितना ज़हर इटली के बदन में घोला है, उतना ज़हर शायद ही दुनिया के और देशों के शरीर में घोला हो. आपके पास रोम,मिलान, नेपिल्स, पालेरमो, तूसि, फ्लोरेंस, सियेन्ना, पीसा, मंतुआ, वोलोगना, फेरारा, जेनोआ और वेनिस हैं; आपके पास पराक्रमों से भरा इतिहास, आपके पास लाजवाब, शानदार खंडहर हैं; और, आपके पास दर्शनीय नगर हैं, पर इन सभी बातों के बावजूद आप बिल्कुल हमारे जैसे हैं—दीन-हीन. आप चमत्कारों, करिश्मों और ज़हरीलें कीड़ों से घिरे औरे ढंके हुए हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि इटली का सूरज इटली का सूरज होता है, पर इटली के आसमान के धुले, नीले बादल आदमी के शरीर पर झूलते चिथड़े, झटके से हटा कर दूर नहीं कर सकते.

बिल्कुल हमारे यहां की तरह ही आपके यहां भी रूढ़ियां हैं. अंधविश्वास हैं, अत्याचार हैं, धार्मिक-उन्माद हैं और अंधे का़नून हैं; और यह सभी मिलकर हाथ मज़बूत करते हैं, बुद्धि और विवेक से शून्य रीति-रिवाज़ों के, रीतियों-नीतियों के. आप अतीत के रंगों के बिना न वर्तमान की कल्पना कर सकते हैं, और न मंगलमय भविष्य का कोई रेखाचित्र तैयार कर सकते हैं. आपके यहां गंवार हैं, साधु-सन्यासी हैं, जंगली जातियों के लोग हैं और अछूत भिखारी-भिकारिनें हैं. सामयिक प्रश्न आपके सामने भी वही हैं जो हमारे सामने. आपके यहां अगर हमारे यहां से कुछ कम लोग भूख से मरते हैं तो हमारे यहां से कहीं अधिक लोग जूड़ी-बुखार से दम तोड़ते हैं. आपके यहां सामाजिक स्वास्थ्य-विज्ञान की स्थिति हमारे यहां से कोई बहुत अधिक बीस नहीं है. जो साये इंग्लैंड में प्रोटेस्टेंट कहे जाते हैं, वही इटली में कैथॉयिक के नाम से पुकारे जाते हैं. वैसे नाम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन ’वेस्कोवों’ ’बिशप’ का ही दूसरा रूप है; और, इसका मतलब सदा एक होता है, और वह होता है – घनघोर अंधेरा--- इस छोर से उस छोर तक बिछी रात. फ़िर, गुण की दृष्टि से भी इनमें कोई विशेष अंतर नहीं होता. जो व्यक्ति बाइबिल की व्याख्या ढंग से नहीं कर पाएगा, वह पिता-यीशु या उनके शिष्यों के धर्मोंपदेशों को समझने का दावा भी नहीं कर सकेगा.

क्या आवश्यक है कि इस बात पर और अधिक बल दिया ही जाए? क्या इस भयानक समानता को पूरी तरह साबित करना ही होगा? क्या आपके यहां नंगे-भूखे-अपाहिज नहीं हैं? ज़रा नीचे देखिए, क्या आपके यहां दूसरों की ज़िंदगियां चाटकर ख़ुद लंबी-लंबी उम्रों तक जीने वाले नहीं हैं? ज़रा ऊपर निगाह कीजिए. जिस भयानक तराजू के दो पलड़े---परोपजीवन और कंगाली दांत भींच कर आपस में जैसे-तैसे एक-दूसरे को साधे रहते हैं, क्या वह आपके सामने वैसे ही नहीं हिलती रहती, जैसे हमारे सामने? सभ्यता जिस एकमात्र सेना को मान्यता प्रदान करती है, स्कूली मास्टरों की आपकी वह सेना कहां है?

आपके मुफ्त लिखाई-पढ़ाई वाले सारे-के-सारे स्कूल कहां हैं? आपके वे स्कूल कहां हैं, जहां हर एक को अनिवार्य शिक्षा दी जाती है? क्या दांते और माइकेल एंजेलो के देश में हर एक कुछ-न-कुछ लिख-पढ़ सकता है? क्या आप अपनी फ़ौजी बैरकों को आम जनता के स्कूलों में बदल सके हैं? क्या हमारी तरह आपके यहां भी लड़ाई के खर्च का बजट लंबा –चौड़ा और लिखाई-पढ़ाई के ख़र्च का बजट कुछ नहीं सा नहीं होता? क्या आपके यहां भी लोगों को, बिना आह-ऊह का अवसर दिए, इस तरह हुक्म मानना नहीं सिखाया जाता कि होते-होते वे हुक्म बजा लाने के ऎसे आदी हो जाएं, जैसे फौ़जी? उस पर फौज, फौज के क्या कहने हैं! क्या यही फ़ौज क़ानून को रबड़ की तरह खींच-खींचकर वहां नहीं ले जाती, जहां गैरीबाल्डी पर यानी स्वयं इटली के सांस लेते सम्मान पर और स्वयं इटली की जीती-जागती प्रतिष्ठा पर गोली चला दी जाती है? आइए, ज़रा आपकी सामाजिक व्यवस्था को कसौटी पर कसें; उसे वहां ले चलकर खड़ा करें, जहां वह है, और उसे उस हालत में खड़ा करें, जिस हालत में सचमुच वह है. आइए, उसके नंगे कारनामों पर एक उड़ती नज़र डालें. ज़रा मुझे अपने यहां की कोई औरत और अपने यहां का कोई बच्चा दिखलाइए. आप इन दो निर्बल प्राणियों की सुरक्षा की व्यवस्था जिस सीमा तक कर सकेंगे, हम आपको उस सीमा तक सभ्य मानेंगे. क्या नारियों को अपने शरीर बेचते देखकर नेपल्स में कुछ कम कलेजा फटता है, और पेरिस में कुछ ज़्यादा? आपके क़ानूनों से सच्चाई किस सीमा तक उभर कर ऊपर आती है और आपकी अदालतों में कहां तक न्याय होता है. क्या आप ऎसे क़िस्मत वाले हैं कि आम जनता के सामने होने वाले मुक़दमों, क़ानून के काले चेहरों, जेलों-हवालातों, गले में फ़ंदा डालने वाले कसाइयों और जीते जी मौत की सज़ा पाने वाले लोगों, आदि की करुण-कथाएं आपके कानों में न पड़ती हों?--- इटली के लोगों, हमारी तरह आपके लिए भी ’बिस्सारिया’* मर चुका है, और ’फेरिनेस’* ज़िंदा है. यही नहीं, आइए, ज़रा उन कारणॊं पर विचार करें, जो आपके देश की इस स्थिति के मूल में हैं.

क्या आपके यहां ऎसी सरकार है, जो नैतिकता और राजनीति को एक-दूसरे में पिरोती हो? आप तो आज वहां आ गए हैं, जहां आप देश के लिए जान हथेली पर रखने वालों को अपराधी ठहराते और फ़िर उन्हें माफ़ी देकर जेल की दीवारों से बाहर निकालते हैं. ऎसा ही कुछ हमारे यहां फ्रांस में भी हुआ है. तो, सुनिए, आइए इन संकटों पर दृष्टि डालते हुए इनकी बगल में गुज़रें और अपने-अपने कंधे की गरुई गठरी एक जगह खोलें. सचमुच आप भी उतने ही गांठ के पक्के हैं, जितने हम! क्या हमारे यहां की तरह आपके यहां भी दो प्रकार के दंड-विधान नहीं हैं --- यानी, एक तो वह दंड जो धर्म के नाम पर पादरी देता है और दूसरा वह दंड जो समाज के नाम पर जज देता है. ओह, महान देश इटली, तुम अपनी बुनावट और बनावट में महान देश फ्रांस से कितने मिलते-जुलते हो! उफ, मेरे इटेलियन भाइयों, आप भी बिल्कुल हमारी ही तरह हैं---- किस्मत के मारे हैं!


आप अंधेरे की गहराइयों में रहते हैं, और आपको वहां से दूर ईडेन के, आंखों में चकाचौंध पैदा करने वाले, सिंहद्वार कुछ हमसे ज़्यादा साफ़ नहीं टीपते. ग़लत बातें तो महज़ यह पादरी करते हैं. सच तो यह है कि ईडेन के यह पावन-पूत सिंह-द्वार हमारे ऎन सामने हैं, हमारी पीठ के पीछे नहीं.

मैं यह मानकर चलता हूं कि ’ले-मिज़ेराबल’ वह आईना है, जिसमें जितने साफ़ चेहरे हमारे झलकते हैं, उतने ही आपके भी कुछ लोग, कुछ विशेष वर्ग इस कृति का विरोध करते हैं, इसके विरुद्ध विद्रोह का स्वर ऊंचा करते हैं. बात मेरी समझ में आती है, आईने का काम है सच्चाई के ऊपर से पर्दा उठा देना, इसलिए स्वाभाविक है कि लोग उससे घृणा करें, पर इस नफ़रत से कहीं कोई ऎसी रोक तो लगती नहीं कि लोग आईने का इस्तेमाल करना बंद कर दें.

जहां तक मेरा प्रश्न है, मैंने यह उपन्यास सबके लिए लिखा है, पर, इसे लिखते समय भी मेरे मन में अपने देश फ्रांस के लिए अनंत प्यार रहा है. यों ऎसा नहीं हुआ है कि इस रचना-क्रम में मैंने किसी और देश से अधिक महत्व फ्रांस को दिया हो. मैं अपने जीवन-पथ पर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया हूं, त्यों-त्यों अधिक सहज होता गया हूं और मेरे देश-प्रेम की सीमाएं संपूर्ण मानवता के प्रति प्रेम तक लहराती गई हैं.

कहना न होगा कि यह प्रवृत्ति हमारे इस युग की अपनी विशेषता है. दूसरी ओर, फ्रांसीसी-क्रांति से उपलब्ध विवेक का भी अपना एक विधान है. यदि अब साहित्यिक कृतियों को, सभ्यता के विकास के अनुपात में, अपने को व्यापक बनाना होगा, तो वे भविष्य में फ्रेंच, इटेलियन, जर्मन, स्पेनिश या इंगलिश न होकर योरपीय होंगी--- मैं तो इसके एक क़दम आगे जाकर कहना चाहूंगा कि भविष्य में वे संपूर्ण मानव-समाज की होंगी.

यही कारण है कि अब कला की भी अपनी तईं तर्क-विधि होगी और रचना के सुरुचि और भाषा जैसे अपेक्षित तत्वों को, शेष तत्वों की भांति ही, कहीं अधिक विकसित होना होगा, अपना कहीं अधिक विस्तार करना होगा. रचना की यह अपेक्षाएं हर स्थिति पर अपना प्रभाव डालती हैं, पर, खेद का विषय है कि इनकी दृष्टि अब तक बहुत ही संकीर्ण रही है.

मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि फ्रांस में कुछ आलोचकों ने काफ़ी बुरा-भला कहा, और मुझ पर आरोप लगाया है कि वे जिसे ’प्रांसीसी अभिरुचि’ कहते हैं, मैंने उसकी मर्यादा-रेखा लांघी है. काश कि उनके इस ’गुणगान’ में सत्व होता! होता तो मुझे हार्दिक सुख और संतोष का अनुभव होता.

संक्षेप में यह कि मैं जो कुछ भी कर सकता हूं, कर रहा हूं. मैं वही यातना और संत्रास झेल रहा हूं, जो दुनिया के तमाम लोग झेल रहे हैं. मैं अपनी यंत्रणा भूलकर उन्हें धीरज बंधाता हूं. मैं उनके दुख-दर्द में हिस्सा बंटाना और उसे कम करना चाहता हूं. मगर, साधन और सामर्थ्य की दृष्टि से मनुष्य बहुत ही बौना होता है, और मैं भी बहुत ही बौना हूं. इसीलिए तो सभी को गुहार रहा हूं कि करो, कृपा कर मेरी सहायता करो.

श्रीमान, मुझे बस यही कहना है, और आपका पत्र पढ़ने के बाद मुझे यह सब कहना पड़ा है. कहा भी मैंने यह सब आपके लिए है, और आपके देश के लिए है. अगर मेरी बात में कहीं कटुता आ गई है तो उसके लिए ज़िम्मेदार आपके पत्र के कुछ वाक्य हैं. आपने लिखा है –“दुनिया में एक देश इटली भी है और इटली के लोगों की गिनती भी ऎसी कुछ कम नहीं है. उनका कहना है – “ले-मिज़ेराबल’ फ्रेंच कृति है. हमारा उससे किसी तरह का कोई संबन्ध नहीं है, इसलिए फ्रांस के लोग उसे इतिहास समझकर पढ़ें, हम तो उसे रोमांस मानकर पढ़ते हैं.’”--- कमाल है! मैं यह बात दुबारा ज़ोर देकर कहना चाहता हूं कि हम चाहे इटैलियन हों और चाहें फ्रांसीसी, विपन्नता-आपदा-विपदा के मारे हम सब हैं. जब से इतिहास लिखा जाने लगा है, और जब से दर्शन ने मध्यस्थता करने का कार्य आरंभ किया है, तब से आज तक मानव-जाति दुख-दारिद्र्य से अपना तन ढंकती रही है. लेकिन, आज आख़िरकार वह क्षण आ गया है, जब हमें इन चिथड़ों को तार-तार कर देना होगा, और इंसानों को अतीत की इन सड़ी-गली धज्जियों से छुटकारा दिला देना होगा. हमें इन तमाम नंग-धंड़ग इंसानों के हाथ-पैरों को ढंकना होगा सुनहरे विहान के रतनारे परिधानों से.

श्रीमंत, यदि आपको मेरा यह पत्र उपयोगी लगे और ऎसा अनुभव हो कि इसे पढ़ने के बाद कुछ लोगों के मनो के भ्रम दूर होंगे, और उनके पूर्वाग्रह कटेंगे, तो आप इसे बिना संकोच के प्रकाशित कर-करा सकते हैं.

अंत में मैं आपको एक बार फ़िर आश्वस्त करना चाहता हूं कि मेरे मन में आपके देश के लिए, आपके देश के लोगों के लिए और आपके लिए अपार स्नेह है. कृपया मेरा आदर-भाव स्वीकार करें.

आपका—

१८ अक्टूबर,१८६२ विक्तोर ह्यूगो
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*बस्सारिया : यह व्यक्ति बहुत विद्वान था तथा उसने अपराध-विज्ञान तथा विधिशास्त्र पर अनेक पुस्तकों की रचना की थी. उसका मत था कि अपराधी को सुधरने का मौक़ा मिलना चाहिए ताकि वह समाज की मुख्य धारा में सम्मिलित हो सके. वह मृत्युदंड दिए जाने के सख़्त ख़िलाफ था.

* फेरीनेस : अत्यंत दीन-हीन व्यक्ति था , जिसके पास तीन बच्चों और ख़ुद को पालने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे. रोटी चुराने के इल्ज़ाम में उसे छह वर्ष का कारावास मिला. उसको भूख बहुत लगती थी तथा खाना पर्याप्त नहीं होता था. जेलर से और खाना मांगने पर हमेशा इंकार ही मिलता. उसकी कोठरी में एक लड़का आया, वह भी चोरी के ही इल्ज़ाम में लाया गया था. लड़का अपने खाने में से आधा फेरीनेस को दे देता. इस तरह दोनों मित्र बन गए. जेलर को यह बर्दाश्त न हुआ. उसने दोनों को अलग-अलग कोठरियों में बंद कर दिया. फेरीनेस फिर भूखा रहने लगा. जेलर से की गई प्रार्थना भी बेकार गई. अंत में फेरीनेस ने तंग आकर जेलर की हत्या करने का निश्चय किया. उसने कपड़ों में जेल के कारखाने से चुरायी एक छोटी कुल्हाड़ी छिपा ली. जेलर के सामने जाकर अत्यंत गंभीर और शांत स्वर में उसने कहा कि यदि उसे उस लड़के के साथ नहीं रखा गया तो वह जेलर की हत्या कर देगा. फेरीनेस की दृढ़ता और संकल्प शक्ति के आगे जेलर को हार माननी पड़ी और अंततः दोनों को पुनः एक ही कोठरी में रख दिया गया.
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अनुवाद : गोपीकृष्ण गोपेश
सम्पादक : आलोक श्रीवास्तव

’विपदा के मारे’ (ले-मिज़ेराबल) –
हिन्दी अनुवाद : स्व. गोपीकृष्ण गोपेश से साभार
संवाद प्रकाशन,
आई-४९९, शास्त्रीनगर,
मेरठ-२५० ००४
मूल्य : ६५०/-

संस्मरण



बड़े ताऊ जी
इला प्रसाद


वह गर्मियों की एक तपती हुई दोपहर थी।

अपने अध्ययन कक्ष में ठीक पंखे के नीचे कुर्सी डालकर बैठा वह विदेशी पादरी किसी किताब में डूबा हुआ था। कमरे का दरवाजा अधखुला। कुछ यूँ कि दरवाजे पर खड़े होते ही पूरा दृश्य एक बारगी आँखों के सामने आ जाय। सामने बड़ी सी मेज, मेज पर किताबों का ढेर और उनके आगे पेपरवेट से दबे हुए कागज ! मौका मिलते ही नियंत्रण से बाहर निकल भागने को उत्सुक , पंखे की हवा में रह रह कर फ़ड़फ़ड़ाते हुए।

उस लम्बे -चौड़े कमरे में अधिक सामान नहीं था। मेज कुर्सी के अतिरिक्त कुछ अलमारियाँ । और कुर्सी पर बैठा वह - सफ़ेद चोगे में , दरवाजे के फ़्रेम से दाहिनी ओर। श्वेत वसन , गौर वर्ण। छह फ़ुट लम्बी आकृति कुर्सी पर सिमटी हुई। अपनी उपस्थिति की सूचना देती. दरवाजे के फ़्रेम में जड़ी सी।

दरवाजे पर हल्की सी ठक-ठक हुई और एक महीन स्वर उभरा।
"फ़ादर!"
फ़ादर पर कोई असर नहीं हुआ।
इस बार लड़की ने दरवाजा कई बार अपनी पतली उंगलियों से ठोका। ठक-ठक। ठक-ठक। गति और स्वर तेज हो गए।
"फ़ादर .....फ़ादर !

पादरी का ध्यान टूटा। दॄष्टि दरवाजे की ओर मुड़ी। आँखॊं में पहचान के भाव उभर आए और अन्दर आने की स्वीकृति भी। वह लड़की बेझिझक करीब आ कर खड़ी हो गई। कुछ बोलती , इससे पहले ही फ़ादर ने रोका।
"ठहरो , पहले कान लगा लूँ।"

सफ़ेद चोगे के अन्दर हाथ डालकर श्रवण यंत्र का स्विच आन हुआ। फ़िर उसे स्नेह से अपने करीब खींचते हुए वह बोला
"हाँ , अब बोलो।"
"दीदी ने कहा कि आपकी लाइब्रेरी से किताब चाहिए।"
"जाओ , ले लो।"
वह किशोरी इस पुस्तकालय के चक्कर लगा- लगा कर ही बड़ी हुई थी। इसमें कुछ नया नहीं था। सिर्फ़ गर्मी की छुट्टियाँ ही नहीं , बाकी की छुट्टियाँ भी, कोर्स की किताबों को पढ़ने के बाद का बचा बहुत सारा वक्त भी किताबों के सान्निध्य में ही कटता था। सिर्फ़ उसका नहीं , सबका। भाई और बहनें भी इसी तरह आते और किताबें ले जाते। लौटा जाते। लेकिन आज का आना विशिष्ट था।
आज अपने आँसू छुपाने थे। वह बड़ी बहन की डाँट खा कर आई थी। कालेज से घर पहुँची तो दीदी ने किताब मांगी और "भूल गई" कहने पर गुस्सा हो गईं-" घर और कालेज के बीच के रास्ते में ही तो है फ़ादर का घर। मनरेसा हाउस। फ़िर भूल कैसे गई ?" गुस्सा उसे दीदी से ज्यादा आता था। वह भूखी-प्यासी उल्टे पैरों चली आई यहाँ। दीदी ने रोकने की कोशिश की थी लेकिन आहत मन वापस लौट कर ही माना।
फ़ादर की स्वीकृति पाकर वह अभ्यस्त कदमों से बाहर आई और बरामदे से होती हुई अगले कमरे के प्रवेश द्वार से पुस्तकालय में घुस गई।
आँसुओं ने नियंत्रण नही माना अब।
किताब निकालते हुए उसने अपने आँसू भी पोंछे। फ़िर सहज होने का अभिनय करती हुई किताब ले कर मुड़ी।
सामने फ़ादर खड़े थे।
उसने फ़िर एक बार खुद को नियंत्रित किया।
"मिल गई। यह चाहिए थी। "
फ़ादर उसे देखते रहे।
उसने आँखों ही आँखों में अभिवादन कर जाने की स्वीकृति चाही।
मुँह से बोल नहीं फ़ूटे। फ़ादर की नीली आँखें जैसे उसके अन्दर तक देख सकती थीं। यह अहसास उसे पहली बार हुआ था। उसे जैसे भी हो भाग जाना था , वहाँ से अब। जल्द से जल्द। अपनी पकड़ नहीं देनी थी।
फ़ादर ने अपनी गहरी आँखों से कुछ क्षण उसकी थाह ली। समझा और फ़िर सिर हिला दिया।
"जाओ।"
उसने एक बार मुड़ कर देखा और तेज कदमों से आगे बढ़कर सीढियाँ उतर गई । गले में रुलाई घोंटती हुई।
उसे पता था, पीछे से उन नीली आँखों ने हमेशा की तरह उसे असीसा है। हालांकि वे फ़ैली हुई भुजाएँ आज बस फ़ैल कर रह गई थीं, हमेशा की तरह अपनी उस बेटी को समेट नहीं पाई थीं। स्नेह से सहला नहीं पाई थीं।

वह उसके बाद भी वहाँ जाती रही। सहज सामान्य वह। सहज सामान्य फ़ादर। यह साथ उसके बचपन में शुरू हुआ था , जब वह अपने पिता की उंगली थाम वहाँ जाया करती थी और फ़ादर की गोद में बैठकर उन दोनों का शुद्ध हिन्दी में किया गया वार्तालाप सुनती थी। कुछ समझे बिना। बीच- बीच में दिए गए आदेश " मेरी दाढ़ी से खेलो" की अवहेलना करती हुई। दाढ़ी को हल्के से सहला कर छोड़ देती हुई। उस दाढ़ी के काले केश काले से काले- उजले हुए और फ़िर दुग्ध धवल। वह बच्ची भी बड़ी हुई। अपने पैरों चलकर आने लगी, अपनी मर्जी से किताबें चुनने लगी। अपनी सफ़लताओं की कथा सुनाने लगी और अपनी हर सफ़लता पर फ़ादर से पुरस्कृत होने लगी। लेकिन तब भी एक दूरी बनी रही। फ़ादर बार-बार कहते -"मैं तुम्हारा बड़ा ताऊ हूँ" और ऐसा कहते हुए उनकी आँखें, चेहरा आवेश से भर जाता।
यह सच था। कोश-निर्माण के दिनों में पिता के साथ विचार-विमर्श से शुरु हुआ सम्बन्ध कब गहरे स्नेह में बदल गया, इसका अहसास शायद उन्हें भी नहीं था। उस स्नेह में वह लड़की कई बार भीगी किन्तु तब भी उनके जीवन काल में कभी भी उन्हें ताऊ जी नहीं कह पाई। न उसके भाई-बहन। जुबान को फ़ादर कहने का कुछ यूँ अभ्यास हो गया था।
वह फ़ादर, फ़ादर कामिल बुल्के थे।
वह लड़की मैं थी।
स्वभाषा और संस्कृति से प्रेम का जो बीज पिता ने हमारे मन में बोया, वह फ़ादर ने पिता के साथ मिल कर सींचा था। वे हमारे बड़े ताऊ जी थे! वह चेहरा , वे नीली आँखें, वह आवेश युक्त भाव एक बार फ़िर यह लिखते हुए मेरी आँखों के सामने आ गया है!

उनके जीवन काल में कभी भी उन्हें ताऊ जी का सम्बोधन न दे पाने का दुख बीतते समय के साथ गहराता ही जाता है। मैं अब, जब भी भारत जाती हूँ, मेरे राँची के घर के प्रवेश द्वार पर उनके द्वारा लगाया गया बोगनवेलिया मेरा स्वागत करता है। मैं बोगनवेलिया के फ़ूले हुए, सफ़ेद पराग वाले बड़े-बड़े बैंगनी फ़ूल देखती हूँ और अपने अंतर्मुखी, संकोची , आत्मलीन स्वभाव पर एक बार फ़िर से शर्मिंदा होती हूँ। हमें तो उनसे हमारा प्राप्य मिल गया लेकिन, हम उनकी अपेक्षाओं पर कितने नालायक साबित हुए थे!
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इला प्रसाद :
झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।
छात्र जीवन में काव्य लेखन की शुरुआत । प्रारम्भ में कालेज पत्रिका एवं आकाशवाणी तक सीमित।"इस कहानी का अन्त नहीं " कहानी , जो जनसत्ता में २००२ में प्रकाशित हुई , से कहानी लेखन की शुरुआत। अबतक देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं यथा, वागर्थ, हंस, कादम्बिनी, आधारशिला , हिन्दीजगत, हिन्दी- चेतना, निकट, पुरवाई , स्पाइल, कथाबिंब,शोधदिशा, पाखी आदि पत्रिकाओं तथा अनुभूति- अभिव्यक्ति , हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुंज सहित तमाम वेब पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ प्रकाशित। "वर्तमान -साहित्य" और "रचना- समय" के प्रवासी कथाकार विशेषांक में कहानियाँ/कविताएँ संकलित । डा. अन्जना सन्धीर द्वारा सम्पादित "प्रवासिनी के बोल "में कविताएँ एवं "प्रवासी आवाज" में कहानी संकलित। कुछ रचनाओं का हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद भी। विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी एवं सम्मेलन की अमेरिका से प्रकाशित स्मारिका में लेख संकलित। कुछ संस्मरण एवं अन्य लेखकों की किताबों की समीक्षा आदि भी लिखी है । हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी लेखों का अनुवाद और स्वतंत्र लेखन। आरम्भिक दिनों में इला नरेन के नाम से भी लेखन।
कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं", उस स्त्रॊ का नाम ( कहानी- संग्रह) । उपन्यास पर कार्यरत .
लेखन के अतिरिक्त योग, रेकी, बागवानी, पर्यटन एवं पुस्तकें पढ़ने में रुचि।
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन ।सम्पर्क : 12934, MEADOW RUNHOUSTON, TX-77066USAई मेल ; ila_prasad1@yahoo.com