सोमवार, 4 मई 2009

कविताएं



सुधा ओम ढींगरा की दस कवितायें
१) रात भर
रात भर
यादों को
सीने में
उतारती रही,
चाँद- तारों
को भी
चुप-चाप
निहारती रही.
शांत
वातावरण
में न
हलचल हो कहीं,
तेरा नाम
धीरे से
फुसफुसा कर
पुकारती रही.
तेरी नजरें
जब भी
मिलीं
मेरी नज़रों से,
उन क्षणों को
समेट
पलकों का सहारा
देती रही.
उदास
वीरान
उजड़े
नीड़ को,
अश्रुओं
कुछ आहों
चंद सिसकियों से
संवारती रही.
जीवन की
राहों में
छूट गए
बिछुड़ गए जो ,
मुड़-मुड़ के
उन्हें देखती
लौट आने को
इंतज़ारती रही.
२)रिश्ते
तुमने कितनी ज़ल्दी
इस अनाम एहसास को
नाम दे दिया,
रिश्ते में बांध दिया.
मैंने तो सिर्फ़ इतना कहा था
कि तुम मेरे दिल के क़रीब हो
क्या दिल के क़रीब सिर्फ़ रिश्ते होते हैं?
वो एहसास वे जज़्बात
जो अँकुरित हुए ही थे,
जिन्हें पलना था,
बढ़ना था,
पल्लवित और
परिमार्जित होना था,
परवान चढ़ना था
अपने शैशवकाल में ही
रिश्तों की सूली पर टँग गए.
भावनाएँ-संवेग
खुले रहकर भी मर्यादित रह सकते हैं
फिर बंधना-बाँधना क्यों?
शायद तुमने सामाजिक ज़रूरत समझी होगी,
मैं ऐसा समाज निर्मित करूँगी
जहाँ औरत सिर्फ़ माँ, बेटी, बहन, पत्नी या
प्रेमिका ही नहीं
एक इन्सान,
सिर्फ़ इन्सान हो,
उसे इसी तरह
जाना, पहचाना और परखा जाए ।
३)क्या पाया.......
खुशियाँ ढूँढने चले
ग़म राह में गड़े थे.
ग़मों को चुन कर हटाया
दर्द साथ ही खड़े थे.
दर्द से रिश्ता जोड़ा
आँसू झर-झर झड़े थे.
आँसुओं को जब समेटा
दिन जीवन के कम पड़े थे.
४)अलगाव
साथ-साथ इकठ्ठे चले
दुनिया जीतने हम.
सीढ़ी दर सीढ़ी
चढ़ते गए--
पीछे न मुड़े हम.
बुलंदियाँ छूने
ऊँचे उठे--
बेखबर उड़ते ही रहे हम.
प्रेम, समझौता भूल
अस्तित्व-व्यक्तित्व से--
टकराते रहे हम.
स्वाभिमान मेरा
अहम् तुम्हारा--
अकड़ी गर्दनों से अड़े रहे हम.
अकाश से तुम
धरती सी मैं--
क्षितिज तलाशते रहे हम.
भोर की लालिमा
साँझ की कालिमा--
डगमग सा जीते रहे हम.
बेतुकी बातों का मुद्दा
बना निस्तेज से प्राणी--
भावनाओं को चोट पहुँचाते रहे हम.
असमान छूते
नीड़ तलाशते--
चोंच से चोंच लड़ाते रहे हम.
वक्त ने झटका दिया
हाथ छूटा, साथ टूटा--
दिशाओं अलग में चल दिए हम.
मैं कहाँ और
तुम कहाँ चल दिए
कहाँ से क्या हो गये हम.
दुनिया तो दूर, स्वयं को भी
जीतने के काबिल न रहे हम.

५)नज़रों से ओझल
मंदिरों के घंटे
मस्जिदों की अज़ाने
शून्य चीरते
हवाओं संग गूँजते
बुलाएँ ऐसे जैसे शाम को सहर.
सुखद क्षणों में भूलें
दुखद पलों में पुकारें
गम की लहरों में
खोजें उसका ठौर
ढूँढें ऐसे जैसे रात को पहर.
हर गाँव
हर बस्ती में
है उसका बसर
फिर क्यूँ भटके इधर-उधर
खोजें ऐसे जैसे सागर को लहर.
झलक न पाई उसकी
पढ़ डाले वेद-पुराण
नज़रों से ओझल रहा
देखा हर द्वार
कम रही
शायद आराधना
पाया न ऐसे जैसे आँसूं को नज़र.
६ )खिलवाड़
दिन की आड़ में
किरणों का सहारा ले
सूर्य ने सारी खुदाई
झुलसा दी.
रात ने धीरे से
चाँद का मरहम लगा
तारों के फहे रख
चाँदनी की पट्टी कर
सुला दी.
७ )वादा किया होगा
धीरे -धीरे
जो कत्ल हुआ होगा
दर्द जाने उसने कितना पिया होगा .
संवेदनशील क्षणों में
स्वार्थ के वजूद को देख
चैन अपना
औरों के नाम किया होगा.
स्वागत में पतझड़ के
झड़ गए पत्ते
उड़ गए आँधी संग
दम तो उसका,
जो फिर भी खड़ा रहा होगा.
समय के थपेड़े
जीवन की बेरहम तरंगें
जान पाएँगी कहाँ
तोड़ा जो घरौंदा होगा.
दहलीज़ ही से जो
लौट यात्रा को गए
यकीनन उन्हें
घर खाली सा लगा होगा.
चाँद से तो नम न होगी
वादों की ज़मीं
आँचल जब किरणों से
भरने का वादा किया होगा.

८ )मजबूरी
न कहने की मजबूरी
दिल पर भारी है.
कुछ कहने की मजबूरी
बुद्घि पर भारी है.
रिश्तों के टूटने की मजबूरी
आत्मा पर भारी है.
रिश्तों को निभाने की मजबूरी
विवेक पर भारी है.
ऐसी मजबूरी की मजबूरी
क्यों निभाना ज़रूरी है?
९)बचा लो इन्हें
तेज़ हवाओं से
डर कर
कहीं बुझ न जायें
दीए,
बचा लो उन्हें
करके साया
दुआओं का .
दिल के
ज़ख्म
दिल में ही
रहने दो
न जान ले
इन्हें कोई
तेरी अदाओं से.
छुपा लो
ख़ुद को
ख़ुद में
या पर्दे में
पता फिर भी
जान ही लेंगे
इन फिज़ाओं से.
रूह छोड़ने
लगती है जब
घरौंदा अपना
नहीं पलट कर आती
वह सदाओं से.

(यह कविता ईराक युद्ध में शहीद हुए नौजवान सिपाहियों को समर्पित हैं. इसे नार्थ-कैरोलाइना (अमेरिका) के सैनिक संस्थान समारोह में पढ़ा गया था.)
१०) माँ की फरियाद
सूरज से कहो
रौशनी न दे
अंधेरों में रह लूंगी.
चाँद से कहो
चाँदनी न दे
बिन चाँदनी जी लूंगी.
तारों से कहो
अपनी चमक न दें
रास्तों में भटक लूंगी.
ऋतुओं से कहो
रंग बदलना छोड़ दें
बेरंगी ही रह लूंगी.
सब दुःख सह लूंगी
पर बेटा मेरा लौटा दो मुझे
वह सिर्फ़ देश प्रेमी और
सिपाही ही नहीं, इन्सान भी है.
२० वर्ष भी पूरे नहीं
किए उसने,
लड़ने का ही नहीं
जीने का भी हक़ है उसे.
*****
सुधा ओम ढींगरा
सुधा ओम ढींगरा का जन्म--जालंधर , पंजाब (भारत) में हुआ.
शिक्षा- बी.ए.आनर्ज़, एम.ए. ,पीएच.डी ( हिंदी ) , पत्रकारिता में डिप्लोमा.
लेखन विधायें--कविता, कहानी , उपन्यास , इंटरव्यू , लेख एवं रिपोतार्ज.
प्रकाशित साहित्य--मेरा दावा है (काव्य संग्रह-अमेरिका के कवियों का संपादन ) ,तलाश पहचान की (काव्य संग्रह ) ,परिक्रमा (पंजाबी से अनुवादित हिन्दी उपन्यास), वसूली (कथा- संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी ), सफर यादों का (काव्य संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी ), माँ ने कहा था (काव्य सी .डी ). पैरां दे पड़ाह , (पंजाबी में काव्य संग्रह ), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण ). १२ प्रवासी संग्रहों में कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित.
अन्य गतिविधियाँ एवं विशेष--विभौम एंटर प्राईसिस की अध्यक्ष , हिन्दी विकास मंडल (नार्थ कैरोलाइना) के न्यास मंडल में हैं. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) के कवि सम्मेलनों की राष्ट्रीय संयोजक हैं. 'प्रथम' शिक्षण संस्थान की कार्यकारिणी सदस्या एवं उत्पीड़ित नारियों की सहायक संस्था 'विभूति' की सलाहकार हैं. हिन्दी चेतना (उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका) की सह- संपादक हैं. पत्रकार हैं -अमेरिका से भारत के बहुत से पत्र -पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं के लिए लिखतीं हैं. अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनगिनत कार्य किये हैं. हिन्दी पाठशालाएं खोलने से ले कर यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाई. इंडिया आर्ट्स ग्रुप की स्थापना कर हिन्दी के बहुत से नाटकों का मंचन कर लोगों को हिन्दी भाषा के प्रति प्रोत्साहित कर अमेरिका में हिन्दी भाषा की गरिमा को बढ़ाया है. अनगिनत कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन एवं संचालन किया है. रेडियो सबरंग ( डेनमार्क ) की संयोजक. टी.वी , रेडियो एवं रंगमंच की प्रतिष्ठित कलाकार. पुरस्कार- सम्मान-- १) अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए वाशिंगटन डी.सी में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चंदर द्वारा सम्मानित. २) चतुर्थ प्रवासी हिन्दी उत्सव २००६ में ''अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान.'' ३) हैरिटेज सोसाइटी नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका ) द्वारा ''सर्वोतम कवियत्री २००६'' से सम्मानित , ४) ट्राईएंगल इंडियन कम्युनिटी, नार्थ - कैरोलाईना (अमेरिका ) द्वारा ''२००३ नागरिक अभिनन्दन ''. हिन्दी विकास मंडल , नार्थ -कैरोलाईना( अमेरिका ), हिंदू- सोसईटी , नार्थ कैरोलाईना( अमेरिका ), अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए कई बार सम्मानित.संपर्क--101 Guymon Ct., Morrisville, NC-27560. U.S.A.E-mail-sudhaom9@gmail .comPhone-(919) 678-9056
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आलेख




आलेख

इस्लामोफ़ोबिया और राजनीति

मुक्ति श्रीवास्तव

गुजरात के चुनाओं के बारॆं में तमाम प्रतिक्रियाएं ’हिन्दुत्व’ के बैकलेश की बात कर रही थीं लेकिन जो बात प्रायः रेखांकित नहीं हो रही थी, वह यह थी कि ये चुनाव सिर्फ गोधरा के बाद हुए चुनाव नहीं हैं--- ये चुनाव ११ सितम्बर और १३ दिसम्बर के बाद हुए पहले चुनाव थे. ’गोधरा’ के प्रचार तंत्र ने उस अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रचार तंत्र का स्थानीय अनुवाद और पुष्टि की जो इन घटनाओं के बाद इस्लामोफ़ोबिया को फैलाने की लगातार कोशिश कर रहा था.

भले लोग गोधरा-सिंड्रोम को गुजरात से बाहर फैलने नहीं देने के लिए तो उत्सुक थे, लेकिन इस इस्लामोफ़ोबिया के राष्ट्रीयकरण या अंतरराष्ट्रीय़करण के विरुद्ध एक ताकतवर प्रतिकारात्मक अभियान छेड़े बिना. एक अच्छा-खासा धर्म अतिरेक की मीडिया भाषा में बदनाम कर दिया गया और उसके विरुद्ध तथाकथित धर्म-निरपेक्ष शक्तियां खामोश रही हैं. दोहरापन क्या ज़बर्दस्त था? गोधरा की प्रतिक्रिया तो निंदा के लायक थी, लेकिन वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर की प्रतिक्रिया स्वीकार्य. क्या जितनी अतार्किकता गोधरा प्रतिक्रिया में थी, उससे कहीं ज्य़ादा अतार्किकता अमेरिका की तथाकथित ’दीर्घस्थाई स्वतंत्रता’ (एड्योरिंग फ्रीडम) में नहीं थी ? इस प्रतिक्रिया में ४००/५०० मुसलमान मरे तो हमारा सिर शर्म से झुक गया और उस प्रतिक्रिया में हज़ारों निर्दोष और अबोध अफग़ानी मारे गए तो वह गर्व करने योग्य था. यदि गोधरा का हिसाब एक पैशाचिक प्रतिक्रिया में चुकाना बर्बर है तो ओसामा-बिन-लादेन या अलकायदा का हिसाब अफग़ानी मासूमों की जान से चुकाना कैसे ’सभ्यता का संघर्ष’ बन जाता है ?

अगर अटलबिहारी बाजपेयी कहते हैं कि गोधरा काण्ड की मुस्लिम समाज में पर्याप्त निंदा नहीं हुई तो हमारी (सेक्यूलर) पार्टियों को यह कथन आपत्तिजनक लगता है, लेकिन यही बात जब मार्गरेट थ्रैचर ने ४ अक्टूबर, २००१ को कही कि ११ सितम्बर, २००१ की घटना की मुस्लिम समाज ने पर्याप्त निंदा नहीं की-तो हमारे हरेक के फटे में टांग अड़ाने वाले बुद्धिजीवियों को यह कथन सुपाच्य लगा.

यह ’पर्याप्तता’ का तर्क ग़ज़ब है ? क्या इसके मापने का कोई यंत्र है ? काफी कुछ तो इसी पर निर्भर करता है कि मापता कौन है. लेकिन एक बार मान भी लें कि पर्याप्त निंदा नहीं हुई तो क्या इससे किसी को मारने का लाइसेंस मिल जाता है ?

हमारा अंग्रेजी़ मीडिया यदि औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने का दावा करता है, तो वह यह बताये कि क्यों वह नरेन्द्र मोदी को खलनायक बनाता है और बुश को नायक जबकि नरेन्द्र मोदी तो उत्तेजित भीड़ की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया का दावा कर सकते हैं लेकिन जॉर्ज बुश राज्य-प्रायोजित प्रत्याक्रमण के स्पष्ट पैरोकार हैं. एक को संदेह का लाभ भी नहीं , दूसरे को नंगे होने के बाद भी राजा कहा जा रहा है. आज अमेरिका अल्जीरिया की प्रजातांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को मान्यता नहीं दे रहा क्योंकि वे ’फण्डामेंटलिस्ट’ हैं. लेकिन कल इसी आधार पर वह नरेन्द्र मोदी की सरकार को अमान्य कर सकता है. उसे इसके लिए सी.आई.ए. की रपट की ज़रूरत भी नहीं होगी, हमारे अंग्रेज़ी मीडिया की रपटें काफ़ी होंगी.

यह एक धर्म है जिसने विश्व के एक बड़े हिस्से में लोगों को जीवनाधार वैसे ही दिया है, जैसे दूसरे हिस्सों में दूसरे धर्मों ने दिया. जैसे दूसरे धर्म आंतरिक ध्वंस का शिकार हैं, वैसे यह धर्म भी. लेकिन इसके कुछ मुट्ठी भर उन्मादियों के राक्षसी कर्मों का अभिशाप जितना इस धर्म के निरीह अनुयायियों को भुगतना पड़ रहा है, उतना अन्य किसे ?

पिछले साल २८ जुलाई को अटलांटा में ओलंपिक सेंटेनिएल पार्क में एक पाइप बम फट तो मध्य-पूर्व के बहुत से मुस्लिम न केवल पूछताछ के लिए धर लिए गए, बल्कि सेंटेनिएल, टेक्सास में एफ.बी.आई. एजेंटों ने उनके घरों की तलाशी भी ली. मध्य-पूर्व माने क्या : अरब, कुर्द, तुर्क या सीरियाई, ईरानी, फिलीस्तीनी या मुस्लिम या बहाई ? पूर्वाग्रह बारीकियां नहीं देखता--ईरानी और सीरियाई में, मिस्री या मोरक्कन में, शिया में या सुन्नी में उसे कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता. खा़सकर अमेरिकी पूर्वाग्रह जिसे ओसामा-बिन-लादेन और सिखों की पगड़ी तक में फ़र्क़ करने तक का औसत ज्ञान नहीं है-- ज्ञानाधारित समाज के निर्माण के तमाम दावों के बावजूद. कश्मीर में बुरका़ न पहनने पर बलात्कार, हत्या और सिर कलम कर देने की घटनाएं दिसम्बर में घटीं. यह उससे भी बदतर आतंरिक त्रासदी थी, जो हरियाणा में गौओं के मामलों में दलितों की हत्या में देखने में आई भले ही भारत का मीडिया इस आंतरिक त्रासदी को दिखाने में चुप रहा. इसकी रपट एक घटना की तरह हुई, एक प्रवृत्ति की तरह नहीं, लेकिन हरियाणा की घटना को प्रवृत्ति की तरह बरतकर चाबुक चलाए गए. इटली के राष्ट्रीय लोकसेवा समाचार प्रसरण ने कार्डिनल जिओकोमो बीफी का वह कथन प्रसारित किया कि ’मुस्लिम हमारी मानवता का अंग नहीं हैं.’ वेल्स में शहर के मध्य में दो मस्जिदों को बंद कर देने की बात उठी क्योंकि उनका शहर के बीच में होना ’सार्वजनिक ख़तरा’ समझा गया, जिससे लोग ’भयभीत’ हैं. टेलीलोम्बार्डिया ने यह ’विचार’ ख़ूब जो़र-शोर से प्रसारित किया कि यूरोपीय समुदाय के देशों में मुस्लिमों का प्रवेश बंद कर दिया जाना चाहिए. हमारे अटलबिहारी बाजपेयी की ही तरह इटली के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी ने सार्वजनिक मंच से मुस्लिमों के विरुद्ध ’अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता’ का दावा किया. जर्मन चान्सलर हेल्मुट कोल ने तो साफ़-साफ़ कहा कि बॉन और पेरिस दोनों के लिए उत्तरी अफ्रीका के इस्लामिक आंदोलन बढ़ती हुई चिंता का श्रोत हैं और उन पर ध्यानपूर्वक नज़र रखी जा रही है. बेल्जियम के गृहमंत्री जोसेफ माइकल ने कहा कि हमें रोमन जनता की तरह वही ख़तरा है कि हम बर्बर जातियों जैसे - अरबों, मोरक्को, स्लावों और तुर्कों के द्वारा रौंदे जाएंगे. जेक्यूस शिराक के प्रमुख सलाहकार पियरे ले-लो -उचे ने मुस्लिम संसार में बढ़ते हुए कट्टरपंथ और तानाशाही के खतरों के प्रति चेताया है. ब्रिटेन के यूरोप मामलों के मंत्री पीटर हैने ने कहा कि ब्रिटेन का मुस्लिम समुदाय एकांतवादी (आइसोलेशनिस्ट) है. मिडिल ईस्ट क्वार्टर्ली के संपादक डेनियल पाइप्स ने तो अमेरिकी प्रशासन को उकसाया कि पूर्व में अमेरिका ने दक्षिण को वाम के विरुद्ध समर्थन दिया था, अब उसे नव ’दक्षिण ’(इस्लामिक कट्टरपंथियों) के विरुद्ध पुराने वाम का सहयोग लेना चाहिए. इस तरह देखा जाए तो ११ सितम्बर, २००१ की घटना के बाद अलकायदा पर नहीं, इस्लाम पर निशाना साधने की खेदजनक और शैतान अतार्किकता विश्वभर में देखी जा रही है. अरिजोना में सिख गैस स्टेशन के मालिक को डलास में मारा गया. पाकिस्तानी युवा और फिनिक्स में मरा मिस्री दुकानदार सभी उसी अतार्किकता के चेहरे हैं, जो गोधरा के बाद गुजरात में देखी गई. भारत में तो मीडिया ने गोधरा के बाद निर्दोष मुस्लिम की यातना-कथा को उजागर किया किन्तु अमेरिका के राष्ट्रीय अखबार गाहे-बगाहे ऎसे आप्त वाक्य बोलते रहे --’इस्लाम में क्षमा की ईसाई अवधारणा अनुपस्थित है’ या ’मुस्लिम संस्कृतियों में वाद-विवाद एवं व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का विचार ही नहीं है’ या ’इस्लाम अद्वितीतः ऎसा धर्म है, जो सब प्रकार की हिंसा का समर्थन करता है.’ जिस समय गुजरात में दंगों की नृशंसता की आलोचना हमारे अखबारों और चैनल पर छाई हुई थी, उसी समय चीन में मुसलमान युवकों को उनके आखिरी भोजन में अल्कोहल मिलाकर, आधी बेहोशी के दौरान, खुली लॉरी में मृत्यु-पर्यन्त घसीटा जा रहा था और भीड़ हंस रही थी. लेकिन चीन के द्वारा मानवाधिकारों के उतने ही नृशंस उल्लंघन का कोई उल्लेख हमारे वामपंथी बुद्धिजीवियों और बहुत ही तेज चैनलों के द्वारा नहीं हो रहा था.

इटली के प्रधानमंत्री मानवाधिकारों के मामले में जितनी आसानी से इस्लाम की तुलना में स्वयं की सभ्यता को श्रेष्ठ कह सके, क्या उतनी आसानी से वे उसे चीन या रूस की तुलना में बेहतर बता सकेंगें, जहां मुस्लिम मानवाधिकारों का नृशंस हनन ११ सितबंर, २००१ के बाद और तीव्र हो गया है. गुजरात यदि अस्वीकार्य है तो चेचेन्या कैसे स्वीकार्य हो सकत है ? लेकिन बंधकों को ज़हरीली गैस सुंघाने वाले पुतिन नायक हैं और नरेन्द्र मोदी खलनायक . इस्लामोफोबिया को उचित ठहराना यदि ’आनुवंशिक प्रि-प्रोग्रामिंग’ या ’जैविक अवश्यता’ के नाम पर पश्चिमी मीडिया को लगता है तो लगभग यही तर्क ओसामा-बिन-लादेन का है. इस मीडिया से अच्छे टोनी ब्लेयर थे, जिन्होंने कहा कि यह ’इस्लामी आतंकवादियों’ का काम नहीं है, बस आतंकवादियों का काम है. क्या ओसामा, गाजी बाबा या मसूद अज़हर जैसे नरपिशाच स्व-घोषित मुस्लिम हैं या सच्चे मुस्लिम ? लेकिन मीडिया पश्चिम में ’डॉक्ट्रिन’ पर आधारित आतंकवाद की बात वैसे ही करता है जैसे भारत में वह ’डॉक्ट्रिन’ पर आधारित सांप्रदायिकता की.

दोनों ही जगह संघर्षों के मूल में ’विचार’ को केन्द्र बताया जाता है -विचारहीनता को नहीं. प्रकारान्तर से धर्म पर टिप्पणी की जाती है उनका भेद-विभेद संघर्ष के मूल में है, कि लोग धर्मों पर झगड़ते ही रहे हैं; जबकि तथ्य यह है कि विश्व के १० सबसे भीषण युद्धों , नरसंहारों व अत्याचारों में मारे गये २५० मिलियन लोगों में से मात्र २ प्रतिशत धर्मानुप्रेरित संघर्षों में मरे हैं. लेकिन बिना इस मिथक को प्रचारित किए मीडिया, वामपंथियों और बुद्धिजीवियों के एक बहुछपित वर्ग को तुष्टि नहीं होती.

फिर उन्हें इस बात की शिकायत भी होती है कि उनके इस प्रचार का विनियोग मोदी जैसे चतुर सुजान राजनीतिज्ञों ने अपने पक्ष में कर लिया है. दंगों की विवेचना यदि संतुलन बनाकर स्वयं संवाददाता नहीं कर सकता तो वह उन पीडि़तों-प्रभावितों से संतुलन की अपेक्षा कैसे कर सकता है कि जिनके परिवार या समुदाय का कोई निकटतम व्यक्ति मारा गया है. संतुलन झूठ का नाम नहीं है. संतुलन स्वतंत्रता है--- अपनी लेखनी को किसी भी स्वर्थ-समूह की अपेक्षाओं का बंधक न बनने देने कि आज़ादी.

हम़जा यूसुफ जैसे ख्यात इस्लामी विद्वान ने सही ही कहा कि मीडिया ने चरमपंथियों पर ध्यान केन्द्रित किया, न कि मुख्यधारा पर. यही बात गुजरात के संदर्भ में कही जा सकती है, जहां मात्र कुछ स्थानों पर हुई पाशविकता को इस तरह अतिप्रचारित किया गया कि मानों गांधी का गुजरात सब जगह और सब समय के लिए कहीं खो गया. मोदी की ’गौरव-यात्रा’ सेल्फ-ग्लोरिफिकेशन की एक ऎसी यात्रा थी, जो इस अतिप्रचार की पृष्ठभूमि में क्षतिपूरक रूप से ज़रूरी हो गई थी. कौन नहीं करता यह सेल्फ-ग्लोरिफिकेशन ? क्या पश्चिमी मीडिया ने ११ सितम्बर, २००१ की घटना के बाद इसका एक भी मौका छोड़ा ? वहां तो इस घटना के बाद आत्मसंदर्भी एवं आत्म-बधाई -मूलक श्रेष्ठता भाव के एक से एक नजारे देखने में आये. क्या आपने कभी गौ़र किया कि अब ’पश्चिम’ किस तरह ’अंतरराष्ट्रीय समुदाय’ के रूप में संदर्भित किया जाता है ? ८००० निः शस्त्र मुस्लिमों को अभी-अभी श्रेब्रेनिला के नरसंहार में मारने पर तो कभी ईसाइयत के ’हिसंक स्वभाव’ की चर्चा नहीं हुई. लेकिन अलकायदा के आक्रमण से इस्लाम हिंसक हो गया और गुजरात के कुछ हिस्सों में हिंसा भड़कने से हम. यदि ऎतिहासिक अनुभव इसके लिए जिम्मेदार हैं तो इन्क्वीजीशन, जिहाद, सेंट बार्थोलोम्यू नरसंहार, उपनिवेशीकरण जेनोसाइड, दासता, नेपोलियन के युद्धों , सर्फडम, प्रथम विश्वयुद्ध हो लो-कॉस्ट, द्वितीय विश्वयुद्ध में छः करोड़ लोगों का मरना, आणविक बम, वियतनाम और इराक का विनाश करते हुए जब वे ’क्षमा और करुणा के अवतार ’ हैं तो इस्लाम में ऎसी क्या खराबी है कि इटली के प्रधानमंत्री श्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी कहें कि मुस्लिम सभ्यता यूरोप और इसके इतिहास से कमतर है. दुराग्रह की हालत इस कदर संगीन है कि पौली टॉयनबी का लेख ब्रिटेन के एक अखबार में जब ’उन्माद के पालने’ शीर्षक के साथ प्रकाशित होता है तो उसमें एक चित्र शीर्षक को चरितार्थ करने के लिए दिया गया है. इस चित्र में एक मुस्लिम महिला नमाज पढ़ रही है. नमाज पढ़ना, मंदिर में आरती या चर्च में प्रेयर या गुरुद्वारे में अरदास करना सब ईश्वरोन्मुखता के विविध स्वरुप हैं. सिर्फ नमाज पढ़ने की, उन्माद के साथ स्टिरियोटाइपिंग कैसे हो सकती है.

कबीर और रहीम, रसखान और जायसी का इस्लाम हिंसक इस्लाम कैसे हो सकता है ? मोहम्मद रफ़ी और मीनाकुमारी , उस्ताद अलाउद्दीन खां और अज़हरुद्दीन का इस्लाम हिंसक इस्लाम कैसे हो सकता है ? यह सआदत हसन मंटो और साहिर लुधियानवी का इस्लाम है, यह गा़लिब और बशीर बद्र का इस्लाम है. यह मेरी सबीहा दीदी और आपके जुम्मन चाचा का इस्लाम है. हम अपनी स्मृति और संस्कार के संसार को इनसे खारिज कर ओसामाओं से कैसे भर लें. लेकिन शीतयुद्ध के खत्म होने से ठण्डा हुआ शस्त्र व्यापार ओसामा के भय से ही चमकेगा. गालिब के दीवान से नहीं. पहले लाल खतरे के नाम से हथियार बेचे, अब इस्लामी खतरे के नाम पर बेचेंगे. इन्हीं ने १९७६ और १९८५ के बीच सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान से २१० बिलियन डॉलर का खर्च सुरक्षा पर करवाया था. पॉल मॉडेल, ज्यू-डिथ मिलर, बर्नार्ड लुई, मार्टिन क्रैमर, पैट राबर्टसन, यूसेफ बुदेंस्की जैसे लेखक लगातार पश्चिमी सरकारों को इस्लामी देशों के ’रैडिकल राजनीतिक इस्लाम’ के खतरों से आगाह करने वाले लेख लिखकर इस रोमांच को बढ़ाते रहेंगे. इस रोमांच की अपनी आर्थिकी है.

इस्लाम को शत्रु के रूप में देखने की जगह जीवन में पार्टनर की तरह देखना होगा. मुस्लिम विरोधी पुर्वाग्रह के अंतर्राष्ट्रीय सैलाब के प्रिप्रेक्ष्य में देखना होगा कि किस तरह से भारत में रैह्टारिक नई प्रासंगिकताएं प्राप्त कर अपनी संकीर्णता को अपडेट करते चल रहा है. यह भी देखें कि नेताओं और धर्माधारित संगठनों के अलावा मीडिया ने इस ध्रुवीकरण में कितनी मदद की है. क्या अभी ब्रिटेन में जून, २००१ में ओल्ड हैम और बर्नले में दंगे नहीं हुए थे या इसके थोड़े ही बाद ब्रेडफोर्ड में या कुछ और पहले ब्रिक्सटन , साउथहाल और टौक्स्टेथ, ऑक्सफोर्ड, कार्डिक और लीड्स में. इन दंगों में पुलिस के रेसिस्ट बरताव के तथ्य भी रिकार्ड हुए. लेकिन क्या कोई भी आलोचना उसे ’राज्य प्रायोजित’ कहने की हद तक पहुंची ? किन्तु जब भारत की बात आती है तो एक फैशनेबल जुमला सभी तर्कों और तथ्यों पर हावी हो जाता है. कई संस्थाएं आनन-फानन में गठित होती हैं और ऎसे महान निष्कर्षों पर पहुंचती हैं कि लगता है, चलने से पहले ही उन्होंने इन जुमलों को तैयार कर रखा था. एक संस्था है -”इंटरनैशनल इनीशिएटिव फार जस्टिस इन गुजरात’. इसकी एक सदस्या हैं, न्यूयॉर्क सिटी यूनिवर्सिटी की विधि प्राध्यापक रोंड का-पे-लॉन . ये कहती हैं कि "हिन्दुत्व की शक्तियों द्वारा प्रक्षेपित ताकतवर आदमी’ की छवि गुजरात के दंगों में हुई सेक्सुअल हिंसा के पीछे जिम्मेदार है." अब ओसामा और उसकी गैंग इस्लाम का प्रमाण नहीं है तो गुजरात के कुछ नराधम शोहदे हुन्दुत्व का प्रमाण कैसे हो सकते हैं ? ऎसी ही अतिशयोक्तियां और सामान्यीकरण वे चारा हैं जिनसे ध्रुवीकरण की गाय पुष्ट होती है. क्या उसी न्यूयॉर्क की ब्रुकलिन डायोसिस के बिशप थामस डेली ने २४ जून, २००२ को रेक्टरी में आई एक महिला के साथ जो बलात्कार किया, उसका सामान्यीकरण करना ईसाइयत का अपमान नहीं होगा ? या बोस्टन की न्य़ूटन उपनगरी के रेवरेण्ड पॉल शेनले ने १९७९ से १९८९ के बीच लड़कों का जो यौन शोषण किया, उसका सामान्यीकरण करना ईसाइयत का अपमान न होगा? ईसाइयत के प्रमाण ईसा मसीह और मदर टेरेसा हैं या ये लॉस एंजिल्स के रेवरेण्ड जी.पैट्रिक जीमॉन जैसे लोग जो सेक्सुअल अब्यूज के लिए अदालत के सामने खड़े हैं या रेवरेण्ड-पो-लिएंतो बर्नाबी जैसे पादरी, जो एक युवा लड़की का बलात्कार कर फरार हैं. भारत में ’नाम्बाल’ जैसी कोई संस्था नहीं है और यह खुदा का शुक्र है कि यहां निकृष्ट प्रवृत्ति को दार्शनिकीकृत नहीं किया जाता.

लेकिन दूसरों की क्यों बात करें, जब अपने ही अपनों को चोट पहुंचाने में व्यस्त हैं. आजकल धर्मों के बारे में आंतरिक द्रोह करने वाले लोगों का बाजार गर्म है. कोई हिन्दू लेखक हनुमान को प्रथम आतंकवादी कहता है. नाईजीरिया में एक इस्लामी अखबार का हल्का कथन २०० से ज्यादा आदमियों की जान ले बैठता है. २३ दिसम्बर, २००२ को बी.बी.सी. ने एक वृत्तचित्र दिखाया कि जीसस को जन्म देते वक्त वर्जिन मैरी सिर्फ १३ वर्षों की थी और एक रोमन सैनिक के द्वारा बलात्कार किए जाने के बाद वह गर्भवती हुई थी. ध्यान दें कि ये सब द्रोह, धर्मों की किसी अत्यंत गंभीर भीतरी पड़ताल का नतीजा नहीं हैं -- ये सब फ्रीका दिखने-दिखाने की तलब से पैदा हुए हैं. ये विज्ञान और विश्लेषण की प्यास का परिणाम नहीं हैं, ये विवाद की प्यास का परिणाम हैं. ध्रुवीकरण की शक्तियां इन विवादों से अपने आपको ज्यादा पुनर्गठित करती हैं . धर्म टी.आर.पी. रेटिंग्स पाने के लिए नहीं बनाए गए थे. उन्हें प्रतिदिन के सेन्सेशन के लिए व्यवहृत करने की महत्वाकांक्षा न उनके प्रवर्तकों की थी, न उनके अनुयायियों की. एक नमाज़, एक शिवस्तोत्र, एक मॉस आत्मा की ठण्डक, राहत और स्थैर्य है - लेकिन आत्मा कैमरे की पकड़ में कहां आती है ?
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डी.एन.- २/११, चार इमली, भोपाल - ४६२०१६ (म.प्र.)
( साभार -सम्बोधन (त्रैमासिक) - अप्रैल - जून, २००९)
सम्पर्क : क़मर मेवाड़ी, सलाहकार सम्पादक,
कांकरोली -३१३३२४
फोन : ०२९५२-२२३२२१,
मोबाइल : ०-९८२९१६१३४२

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

वातायन - अप्रैल,२००९




हम और हमारा समय

निकटस्थ लोक सभा चुनाव ने सभी अवसरवादी राजनीतिक दलों को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ आ खड़े होने के लिए विवश कर दिया है. इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति में कोई किसी का दुश्मन नहीं होता. कल तक जो एक दूसरे की ओर देखने से बचते थे, आज उन्हें हंसकर गले मिलते देखा जा सकता है. सभी को सत्ता से सरोकार है. उन्हें कुर्सी चाहिए . कुर्सी के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं. इसे हमारे देश के समृद्ध लोकतंत्र की विशिष्टता ही कहना होगा कि टिकट न मिलने पर लोग अपनी एक नई पार्टी बना लेते हैं और अवसर मिलते ही किसी भी पार्टी में शामिल हो लेते हैं या अपनी ही पार्टी में पुनः वापस लौट लेते हैं. इस देश में कितनी राजनीतिक पार्टियां हैं यह बता पाने में चुनाव आयोग को भी कुछ समय लग सकता है. दरअसल देश में व्याप्त अशिक्षा इन राजनीतिज्ञों को मनमानी करने की पूरी छूट देती है. वे चाहते भी यही हैं --- जनता अशिक्षित बनी रहे. वैसे भी शिक्षित लोगों में वोट के प्रति उत्साह कम होता गया है. जनता के अशिक्षित रहने से वे जवाबदेही से बचे रह सकते हैं.

हमारे लोकतंत्र की एक खूबी यह भी है कि राजनीति में बने रहने की कॊई आयु सीमा निर्धारित नहीं है. शायद अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी नहीं है, लेकिन वहां के राजनीतिज्ञ अपनी क्षमता को पहचान लेते हैं और स्वयं ही राजनीति से सन्यास ले लेते हैं. यहां चल सकने में असमर्थ -- ह्वीलचेयर पर चलने के लिए अभिशप्त बीमार नेता भी राजनीति से सन्यास लेने के लिए तैयार नहीं होता. बल्कि वह प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने के स्वप्न तक देखता रहता है. राजनीति का पतन यहां तक हो चुका है कि सदैव अवसरवादी राजनीति करनी वाली पार्टियां उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रही हैं जिनकी राजनीतिक बुनियाद जातिवाद और अपराधवाद पर टिकी हुई है.

लेकिन सब कुछ अंधकारमय ही नहीं है. उभरते कुछ युवा नेताओं में देश के उज्वल भविष्य की एक क्षीण रेखा दिखाई दे रही है . इन युवाओं की आंखों में देश को लेकर कुछ स्वप्न हैं , जिन्हें कभी नेहरू-गांधी ने देखे थे. उनमें कुछ कर गुजरने का एक ईमानदार जज्बा दिखाई दे रहा है. आज देश को ऎसे ही युवाओं की आवश्यकता है--- उन बूढ़ों की नहीं जो स्विस बैंकों में काला धन जमा करके अपनी भावी पीढि़यों का भविष्य सुरक्षित करते रहे और आगे भी करना चाहते हैं. जो देश के लिए नहीं केवल अपने लिए जीते रहे और चाटुकारों को लाभान्वित करते रहे.

आज स्विस बैंकों में जमा धन को वापस लाने की चर्चा जोर पकड़ती जा रही है. इन बैंकों में राजनीतिज्ञों , ब्यूरोक्रेट्स और सितारों का अकूत धन जमा है. राजनीतिज्ञ और ब्यूरोक्रेट्स मिलकर आजादी के बाद से ही इस देश को लूटते रहे हैं. आज भी लूट रहे हैं और किसी भी समझदार व्यक्ति को यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि इन लोगों का स्विस बैंकों में जमा पैसा वापस आयेगा. कहते हैं यह धन इतना है कि यदि वापस आ जाये तो भारत विदेशी कर्ज से मुक्त हो सकता है.

वातायन के अप्रैल, २००९ अंक में प्रस्तुत है मेरे द्वारा अनूदित और ’संवाद प्रकाशन’ से ही प्रकाश्य पुस्तक ’लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार’ से एक संस्मरण अंश और वरिष्ठ कथाकार और कवि सुभाष नीरव द्वारा अनूदित पंजाबी के युवा कथाकार तलविन्दर की कहानी ’फासला’.

’फासला’ की भी अपनी एक कहानी है. इस कहानी को वरिष्ठतम कथाकार और ’हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने हंस के लिए स्वीकृत किया था. लगभग डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद सुभाष ने जब कहानी के प्रकाशन के विषय में पूछा तब राजेन्द्र जी ने जल्दी ही प्रकाशित होने का अश्वासन दिया. लेकिन कहानी प्रकाशित नहीं हुई. सुभाष ने जब भी राजेन्द्र जी को फोन किया वे अश्वासन देते रहे. इसी बीच कहानीकार संजीव हंस से जुड़े. उन्होंने राजेन्द्र जी द्वारा स्वीकृत कहानियों पर अपने निर्णय लिए और राजेन्द्र जी और अपने चहेते कहानीकारों की कहानियों को छोड़कर शेष को दरकिनार कर दिया. ’फासला’ के साथ भी यही हुआ. अब राजेन्द्र जी ने सुभाष नीरव को संजीव जी से बात करने की सलाह दी और संजीव जी क्यों नीरव से बात करते ! क्योंकि तब वह कहानीकार मात्र नहीं थे, हंस के कार्यकारी सम्पादक भी थे. व्यस्तता के अतिरिक्त और भी जो बात उनके आड़े आयी हो उन्होंने सुश्री वीना उनियाल से कहलवा दिया कि ’फासला’ उन्हें पसंद नहीं .

मुझे आपकी बेबाक टिप्पणी की प्रतीक्षा रहेगी.

संस्मरण

’संवाद प्रकाशन’
मेरठ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक
’लियो तोल्स्तोय का अंतरंग संसार’

से उद्धृत एक संस्मरण

संस्मृतियां

अलेक्जेन्द्रा अन्द्रेयेव्ना तोल्स्तोया
(१८१७-१९०४)
(लेव तोल्स्तोय की ऑण्ट)

अनुवाद : रूपसिंह चन्देल
लियो तोल्स्तोय(१८६३)

मुझे भलीभांत याद है कि जब १८५५ में एक युवा आर्टलरी अफसर के रूप में वह (लेव तोल्स्तोय) सेबस्तोपोल से वापस लौटे तब कैसा दिख रहे थे. मुझे याद है कि उन्होंने हम सब पर कैसा मोहक प्रभाव छोड़ा था.

व्यवहार में वह अत्यंत विनयशील और अकृत्रिम थे और इतना जिन्दादिल कि उन्होंने सभी पर अपने व्यक्तित्व की सजीव छाप छोड़ी थी. वह अपने विषय में कभी ही बात करते थे, नये (परिचित)चेहरे का ध्यानपूर्वक अध्ययन करते और उसके विषय में अपनी राय विनोदशीलता, और प्रायः अतिरंजना में व्यक्त करते . उपनाम ’पतली खाल’ जिसे उनकी पत्नी ने बाद में उन्हें दिया था उन पर सटीक था. हर विचार पर, अनुकूल हो या प्रतिकूल, उनकी प्रतिक्रिया जोरदार होती थी. लोगों को वह अपनी कलापूर्ण छठी इंद्रिय से परखते थे और उनकी राय प्रायः आश्चर्यजनक-रूप से सच होती थी. बुद्दिमान , सौम्य और अर्थपूर्ण आंखोंवाले उनके सरल चेहरे की अभिव्यंजकता सुन्दर चेहरे के अभाव की क्षतिपूर्ति करते थे, और, मैं कहूंगी कि वह खूबसूरत न होते हुए भी खूबसूरत था.

हम सब उन्हें बहुत प्यार करते थे और जब भी वह आते हम उहें देखकर बहुत प्रसन्न होते थे. लेकिन उनसे मित्रता, जिसने हमें आजीवन बांधे रखा था, बहुत विलंब से प्रारंभ हुई थी. वास्तव में वह १८५७ तक, जब हम स्विट्जरलैण्ड में साथ-साथ थे, विकसित नहीं हुई थी.


पूरी सर्दियां हम जेनेवा में रहे थे और हमे बहुत आश्चर्य हुआ था जब अकस्मात लेव मार्च में वहां आ उपस्थित हुए थे (यहां मैं यह भी जोड़ दूं कि उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति सदैव ’कूप दे थियेटर की प्रकृति की थी ).

चूंकि हमारा पत्राचार नहीं था, अतः मुझे उनके पता-ठिकाना की जानकरी नहीं होती थी, और मैं उनके रूस में होने का अनुमान करती थी.

"मैं सीधे यहां पेरिस से आ रहा हूं," उन्होंने कहा था, "पेरिस इतना घृणित है कि मैं लगभग पागल ही हो गया था. मैंने वहां क्या देखा ! वहां एक छोटे-से मकान (गार्नी) में छत्तीस जोड़े (विवाहित ) रहते थे, जहां, मैं ठहरा हुआ था. उनमें से उन्नीस के आपस में अवैध सम्बन्ध थे. यह मुझे क्रोधोन्मत्त करता था. तब मैंने स्वयं के परीक्षण का निर्णय किया और एक गिलोटन देखने गया. उसके बाद मैं सो नहीं सका और नहीं समझ पाया कि अपने साथ क्या करू ! सौभाग्य से, मुझे यह ज्ञात हुआ कि तुम जेनेवा में हो और तत्काल वहां से भाग खड़ा हुआ कि तुम मुझे बचा लोगी.

यह बिल्कुल सच है, कि यह बताने के बाद उन्होंने हल्का अनुभव किया था और पुनः अपनी मानसिक शांति प्राप्त कर ली थी. हम प्रतिदिन एक दूसरे से मिलने, पहाड़ों पर जाने और हर प्रकार से जीवन का आनंद प्राप्त करने लगे थे. मौसम अत्यन्त सुन्दर था, और प्राकृतिक दृश्य------ मैं क्या कहूं ? मैदान के निवासी होने के कारण हमें उसमें परम आनंद मिल रहा था, हालांकि लेव ने हमारे उत्साह को बाधित करते हुए कभी-कभी यह समझाने का प्रयास किया कि काकेशस की तुलना में यह कुछ भी न था. फिर भी, हमारे लिए वही पर्याप्त था. उन्होंने पुराने कपड़ों की भांति अपने अतीत को त्यागकर सदा के लिए पुनः नई जिन्दगी शुरू कर दी थी. तब हम दोनों कितनी सहजता से इस संभावना पर विश्वास करते थे कि एक दिन स्वयं को दूसरे की ओर मोड़ लेगें और चाहने पर स्वयं को बदल लेगें. उस आयु में, हम बेहतर समझ सकते थे, हमने इसप्रकार पूरी तरह अपने को स्व-प्रवंचना को समर्पित कर दिया था, कि आयु की अपेक्षा अपनी अतंरात्मा में हम अधिक युवा थे.

बहुत दिनों तक पहाड़ों और उपत्यकाओं में भटकने के बाद हम लूसर्न (Lucerne) गये , और दूसरी बार लेव अनपेक्षित और अकल्पनीय रूप से वहां प्रकट हुए थे. ऎसा प्रतीत हुआ मानो वह धरती फोड़कर निकल पड़े थे. लुसर्न में वह हमसे दो दिन पहले ही पहुंच गये थे और वहां के अनुभव प्राप्त कर चुके थे, जिसका चित्रण उन्होंने बाद में अपनी कहानी ," नोट्स ऑफ प्रिंस नेख्ल्यूदोव’ में किया था. हमने उन्हें रोष से उत्तेजित और आंदोलित पाया था.


उन्होंने बताया, कि वह घटना हमारे पहुंचने की पूर्व संध्या को घटित हुई थी. एक घुमन्तू संगीतकार ने स्वीजरहॉफ बाल्कनी के नीचे लंबे समय तक संगीत वादन किया था, जहां आभिजात्यवर्ग के कुछ लोग एकत्र हो गये थे. सभी ने आनन्दपूर्वक संगीत सुना, लेकिन उसने जब इनाम के लिए अपनी हैट आगे बढ़ाई तब एक भी व्यक्ति ने एक पैसा भी नहीं दिया. निश्चित ही यह बहुत भयानक था, लेकिन लेव ने इसे महापराध माना था.

उस दंभी भीड़ को प्रताड़ित करने के भाव से उन्होंने उस संगीतकार की बांह पकड़ी थी, एक रेस्तरां में उसके साथ एक मेज पर जा बैठे थे , और भोजन और शैम्पेन का आर्डर किया था. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिन लोगों को वह प्रताड़ित करना चाहते थे उन्होंने या उस गरीब संगीतकार ने उनके उद्देश्य को समझ प्रशंसा की थी या नहीं.

उनमें एक और विशेषता थी, जिसकी मैं चर्चा करना चाहूंगी. उन्हें झूठ से घृणा थी, चाहे वह कहा गया हो या किया गया. लेकिन कभी कभी इसके उलट भी हो जाता था.

एक बार, एक दिन सुबह के समय, जब वह मेरी बहन के यहां चाय पर आमन्त्रित थे, जहां बहुत से अतिथियों के आने की आशा थी, उन्होंने मुझे लिख भेजा कि वह नहीं आ सकते, क्योंकि उन्हें कुछ समय पहले ही अपने भाई की मृत्यु की सूचना मिली थी. (वह अपने भाइयों को बहुत प्यार करते थे). मैंने उत्तर दिया कि निश्चित ही मैं उनकी स्थिति को ठीक से समझ सकती हूं . और आप क्या कल्पना करते हैं ? वह अचानक चाय पार्टी में आ उपस्थित हुए थे मानों कुछ हुआ ही न था.

उनके आगमन ने मुझे स्तब्ध और व्यथित किया था.

"लेव, तुम क्यों आए?" मैंने उनसे फ्रेंच में पूछा.

"क्यों? क्योंकि इस सुबह मैंने तुम्हें जो लिख भेजा था, वह असत्य था. यदि मैं आया, तो इसका अर्थ है कि मैं आ सकता था."

मानो, इतना ही पर्याप्त न था. कई दिनों बाद उन्होंने मुझसे स्वीकार किया कि वह थियेटर भी गये थे.

"तुम्हें यह बहुत आश्चर्यजनक अनुभव करना चाहिए." बहुत ही व्यथित-भाव से मैंने ध्यान से उनकी देखा.

"नहीं किया, ऎसा नहीं कह सकता. जब मैं थियेटर से लौटा मैं भयानक यातना से होकर गुजरा. यदि मेरे पास रिवाल्वर होता निश्चित ही मैं अपने गोली मार लेता."


"सत्य के मार्ग पर लंबी दूरी तय करने के बाद, तुमने सत्य का उपहास किया." ऎसे अवसरों पर मैं उनसे कहती और वह मुझसे सहमत होते. लेकिन फिर भी अपने पर परीक्षण करने से वह बाज नहीं आते थे.

"मुझे अपने पर कठोरतम परीक्षण करने चाहिए." वह कहते.

उन जाड़ों मे कई बार वह कहानियों की पाण्डुलिपियां पढ़ने के लिए लाते. "ए हैपी मैरीड लाइफ" और "थ्री डेथ्स" पहली बार मेरे घर ही पढ़ी गई थीं. वह बहुत खराब ढंग और शुद्ध अंतःकरण से पढ़ते थे और आलोचना को सकारात्मक भाव से ग्रहण करते थे.

उनके दिमाग में योजनाएं ऎसे उत्पन्न होती थीं जैसे वर्षा के बाद कुकरमुत्ते . हर आगमन के समय वह भविष्य के लिए नयी योजना लेकर आते और धाराप्रवाह सुनाते और प्रसन्न होते कि अंततः कोई समुचित व्यवसाय उनके पास भी था.

१८६२ में उनके विवाह के बाद कभी ही उन्होंने गांव छोड़ा था, और हम प्रायः बह्त कम एक दूसरे से मिल पाये, हालांकि मैं मिलने का हर संभव प्रयास करती थी. एक बार----- वह मेरे यहां इलिन्स्कोये आए थे. यह १८६६ की बात थी.

एक बार मधुमक्खी पालन अभियान, दूसरे ---- पूरे रूस में वनारोपण अभियान , और ऎसे ही अन्य कार्यों में वह अपने को व्यस्त रखते, लेकिन अन्य बातों की अपेक्षा उनकी दिलचस्पी अपने स्कूल में ही अधिक थी.

मुझे उस दिन की याद है, जब उन्होंने मुझे तुर्गनेव के साथ अपने झगड़े के विषय में बताया था, जो लगभग एक द्वन्द्व युद्ध में समाप्त हुआ था. झगड़े का विवरण मुझे याद नहीं (कारण बहुत सामान्य था) लेकिन मैं लेव निकोलायेविच की टिप्पणी नहीं भूली हूं.

"मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं" अपने बालों की जड़ों को स्पर्शकर लज्जारुण होते हुए उन्होंने कहा था, "उस मूर्खतापूर्ण मामले में मेरी भूमिका अनुचित न थी. किसी भी प्रकार मुझे दोष नहीं दिया जा सकता, और हालांकि मैंने निर्दोष अनुभव किया, फिर भी मैंनें तुर्गनेव को मित्रतापूर्ण और समझौताकारी पत्र लिखा था. लेकिन उन्होंने उसका उत्तर इतनी अशिष्टतापूर्वक दिया कि मुझे उनके साथ सम्बन्ध विच्छेद करना पड़ा.

बाद में सब ठीक-ठाक हो गया था, और वह प्रायः एक-दूसरे से मिलते भी रहे , लेकिन वे सच्चे मित्र कभी नही हो सके. बुनियादी तौर पर वे एक दूसरे से बहुत भिन्न थे.

कहानी

पंजाबी कहानी

फासला

तलविंदर सिंह
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

वह मेरे सामने बैठी थी- शॉल लपेटे, गुमसुम-सी, चुपचाप। या शायद मुझे ही ऐसा लग रहा था। उसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा था और यही बात मेरे अन्दर एक तल्खी पैदा कर रही थी। उसकी बगल में दाहिनी ओर सोफे पर गुरुद्वारे के तीन नुमांइदे आये बैठे थे। उनके साथ भी दुआ-सलाम से अधिक कोई बात नहीं हुई थी। थोड़ा-सा संकोच मुझे खुद भी हो रहा था, क्योंकि दिनभर की थकावट को उतारने की नीयत से मैंने अभी-अभी व्हिस्की का एक पैग लगाया था। गुरुद्वारे से आये नुमांइदों की समस्या के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी थी मुझे। अरबन एस्टेट के साथ वाली लेबर कालोनी के कुछेक पढ़ाकू लड़कों ने गुरुद्वारे में आकर इस बात पर तकरार की थी कि परीक्षाओं के दिन हैं, इसलिये स्पीकर की आवाज कम की जाये या इसका मुँह दूसरी तरफ किया जाये। तभी से, अफसरनुमा कर्ताधर्ता इधर-उधर घूम रहे थे। अब भी वे इसीलिये आये थे।
प्रधान प्रदुमन सिंह ने हल्का-सा खाँसते हुए बात शुरू की, ''सरदार साहिब, आप तो मामला जानते ही हैं। यह तो सरासर गुरु-घर का अपमान है। मसला और ज्यादा बिगड़ जाने का चांसेज है... आप...।''
अजीब फितरत है मेरी भी। दिमाग में कोई गांठ लग गयी तो तब तक चैन नहीं मिलता, जब तक वह खुलती नहीं। बात इतनी अहम नहीं, यह मैं जानता हूँ। इसका नाम अमृत, अमन, अमरजीत... नहीं, नहीं, बात रुक नहीं रही दिमाग में। वैसे मुझे पता है कि इसका नाम 'अ' से ही शुरू होता है और है भी चार अक्षर का। शॉल में लिपटा उसका चेहरा मासूम लग रहा है, या मुझे ही ऐसा प्रतीत हो रहा है।
''आप तो शायद बाद में आये यहाँ। इकहत्तर में बनाया हमने यह गुरुद्वारा। तन, मन, धन से। इस लेबर कालोनी में से किसी ने फूटी कौड़ी नहीं दी। हमने कहा, कोई बात नहीं, वो जानें। आप तो जानते ही हो, गुरुद्वारे की अपनी रवायतें हैं। यहाँ पाठ भी होना है और कीर्तन भी। कोई उठकर कहने लगे कि गुरुद्वारे को झुका लें... लड़के तो हमारे भी मूंछों को ताव देते घूम रहे हैं, पर हमने कहा, नहीं। ऐसी कोई बात नहीं करेंगे जो सिक्ख उसूलों के खिलाफ हो।''
अचानक, मुझे लगा मानो मेरा सिर घूमने लगा हो। यूँ लगा, जैसे अन्दर धुआँ-सा जमा होने लगा हो। क्या फैसला दूँ मैं? क्या भूमिका निभाऊँ ? इधर एक छोटा-सा कांटा फँसा पड़ा था दिमाग में। पता नहीं, मुझे वह इतनी सहज क्यों लग रही थी। गुरुद्वारे के मसले में मेरी रत्ती भर दिलचस्पी नहीं थी। मैं इधर-उधर देखकर बहादुर को खोजने लगा, जो रसोई की चौखट के साथ पीठ टिकाये खड़ा था। मैंने उसे इशारा किया, ''जरा इधर आओ।''
''जी साहिब!'' वह करीब आकर बोला।
''पहले पानी ला, फिर चाय।'' अपने छुटकारे के लिए मानो यही राह मुझे आसान लगी थी।
''नहीं, नहीं, चाय की कोई ज़रूरत नहीं सरदार साहिब...। आप हमें थोड़ा गाइड करो।'' प्रधान साहिब बोले।
मैं असमंजस में था कि क्या बोलूँ ? लेबर कालोनी के बच्चों की पढ़ाई ज़रूरी है या 'शबद-कीर्तन' का कानफोड़ू शोर। प्रधान प्रदुमन सिंह की दर्शनीय दाढ़ी उनके कंधे पर पड़ी सफेद लोई के साथ खूब मैच कर रही है। सचिव सुखदयाल सिंह की मूंछों के कुंडल उनकी ऊँची शख्सीयत का दम भर रहे हैं। ये तीसरे शख्स गुरुद्वारे के खजांची हैं। उनसे मेरा ज्यादा परिचय नहीं। ये जाने-माने व्यक्ति हैं। गुरुद्वारे का मामला वाकई संगीन है। मुझे बोलने के लिए कोई राह नहीं सूझ रही थी। नशे के हल्के-से सुरूर के कारण मेरी नज़र भी डोल रही थी। दिमाग का एक हिस्सा लड़की के नाम की तलाश में मुझे लगातार बेचैन कर रहा है। अजीब स्थिति है। गुरुद्वारे वाला मसला तो अब किसी भी सूरत में हल होने वाला नहीं। वैसे भी मन के किसी कोने में से आवाज आ रही है कि यह मसला मेरे स्तर पर हल होने वाला है ही नहीं। इस बात को शायद ये लोग भी समझते हैं। मेरी सलाह लेना इनकी कोई मजबूरी भी हो सकती है। एक दिन तड़के पौ फटे सैर करते समय अपने से आगे जा रहे दो व्यक्तियों की बातचीत मैंने सुनी थी- 'यह शडयूल्ड कास्ट अफसर हमारे हक में नहीं खड़ा होगा।' मैंने तभी चाल धीमी कर ली थी। बातें करने वाले वो व्यक्ति ये थे या कोई और, पता नहीं, पर थे वे इन जैसे ही। अपने स्वभाव के अनुसार मुझे इनके मसले में बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं। अच्छा हुआ, बहादुर पानी के गिलासों वाली ट्रे लेकर आ गया। उससे पानी का गिलास लेकर मैंने खुद भी पिया। फिर, उन सज्जनों की ओर मुखातिब हुआ, ''मेरे विचार में जल्दबाजी ठीक नहीं। एक मीटिंग रख लो। मुझे खबर कर देना, मैं आ जाऊँगा, इस वक्त तो ज़रा...।''
वे भी शायद मेरी स्थिति से परिचित हो चुके थे। उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखकर उठने का मन बना लिया।
मैंने कहा, ''बैठो, चाय पीकर जाना।''
''नहीं, नहीं, चाय नहीं सरदार साहब, फिर कभी सही।'' सचिव साहिब बोले, ''पर आप इस मसले का हल निकालें।''
प्रधान साहिब भी उठ खड़े हुए, ''गुरुद्वारे के लिए तो सिंहों ने जानें अर्पण कर दीं।''
अर्णण! खुल गयी गांठ ! उसने भी एक बार सिर उठाकर उनकी ओर देखा। एकदम मैंने स्वयं को सुर्खरू महसूस किया। अर्पण था नाम उसका।
''हम इसका गंभीरता के साथ हल निकालेंगे। आप बस अमन-चैन बनाये रखो।'' मैं भी उठकर उनके साथ चल दिया। वह वहीं बैठी रही। ड्राइंग-रूम में से निकलकर उन्होंने हाथ जोड़ फतह बुलायी और चल गये। मैं दरवाजा भेड़ कर फिर से अपनी पहली वाली जगह पर आ बैठा। बहादुर ने पास आकर पूछा, ''चाय साहब?''
उसे उत्तर देने के बदले मैंने अर्पण से पूछा, ''आप चाय लोगे न?''
''नहीं, नहीं, कोई ज़रूरत नहीं इस वक्त।'' वह बोली।
''देखो संकोच करने की कोई बात नहीं। कोई फारमैल्टी नहीं। आपका अपना घर है...।'' मुझे लगा, बात मैं थोड़ा बड़ी कर गया था। एकदम इतनी छूट ठीक नहीं। आखिर, मेरा भी कोई स्टेट्स है। पूरी तहसील का मालिक हूँ।
''मुझे लगता है, आपने मुझे पहचाना नहीं सर।'' मेरी बात पर शायद उसने राहत महसूस की।
बदन पर लपेटे शॉल को उसने ढीला किया और थोड़ा और सहज हो गयी। नशे की हल्की-सी तार मेरी आँखों में लरजी। उसका चेहरा पहले से कमजोर था। नयन-नक्श मिच्योर हो गये थे। ढीले हुए शॉल में से मैंने उसकी छातियों का जायजा लेने की कोशिश की, पर सफल न हो सका। पहले वाली बात तो अब मेरी भी नहीं रही थी। रसूलपुर की ठठ्ठी के सीलन भरे कोठे में से निकलकर, निचली जात का लड़का तेजू अर्बन एस्टेट की इस शानदार कोठी में रह रहा था, आलीशान घराने की कालेज-लेक्चरर पत्नी और कान्वेंट स्कूल में पढ़ते दो होनहार बच्चों के साथ।
मैंने तेजू के मुँह पर से पर्दा खिसकाया। छठी कक्षा में दाखिला लेने के लिए जब हाई-स्कूल में गया था, तो मास्टर दर्शन सिंह ने टिप्पणी की थी, ''आ रे सुरैणे मज्हबी के पढ़ाकू ! बता अफसर बनना है कि लफटैण?'' मैं नज़रें झुकाये खड़ा रहा था। वे शब्द मेरे लिए बेअसर थे। मैं चुपचाप क्लास में बैठ गया था। फिर, वह दूसरे मास्टरों के साथ अपना दु:ख साझा कर रहा था, ''देखो तो दुहाई रब की। फीसें माफ, किताबें मुफ्त। तुम देखना, जट्टों के लड़के भेड़ें चराया करेंगे और अफसर बनेंगे ये लोग। कोटे, रिजर्वेशन्स...दुर लाहनत।''
''क्यों कुढ़ रहे हो, मास्टर जी ? गुरु साहिब का खंडे-बाटे का अमृत क्यों भूलते हो ?'' मास्टर संतोख सिंह ने कहा था। ''मानस की जात बराबर समझने के लिए कहा है गुरुओं ने। फिर आप तो अमृतधारी...।''
''कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली।'' उसकी बात का उत्तर देने के बजाय वह बुदबुदाया था। बाद में, मास्टर संतोख सिंह ने मुझे राज की एक बात बतायी, ''पढ़ाई से अधिक कोई शॉर्ट कट नहीं। इन बातों की परवाह न कर और डटकर पढ़। मैं जानता हूँ, तेरे अन्दर पढ़ने की लगन है। तू देखना, ये सारे तेरा पानी भरेंगे।''
मुझे लगता था, जैसे मैं इन बातों के बारे में पहले से ही जानता था। पता था कि मेरी जाति के खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश है। कुछ टीचरों की आँख में मैं सबसे अधिक चुभता था। कुछ लड़के मुझसे तीखी खार खाते थे। उन्होंने मेरा एक बिगड़ा हुआ नाम रखा हुआ था। इन सब विरोधों के बीच मैं अपने आप को बचाकर चलता रहा।
अब गेट पर नेमप्लेट लगी है- तेजवंत सिंह, सब डिवीजन मैजिस्ट्रेट। बाहर नई चमचमाती सरकारी जिप्सी खड़ी है। तत्पर, ड्राइवर सहित।
अर्पण कुछ बोली थी शायद। उसने 'सर' कहकर सम्बोधित किया था। शायद, कह रही थी, ''आपने मुझे पहचाना नहीं ?''
मेरी नज़र सहज ही उसके ढीले हुए शॉल के अन्दर चली गयी। उसने मेरी इस हरकत को ताड़ लिया। वह हल्के-से फुसफुसाई, ''गरमी महसूस हो रही है।'' और शॉल उतार कर तह करने लगी। मुझे लगा, मेरी सुविधा के लिए ही उसने ऐसा किया है। मुझे अपनी जल्दबाजी पर अफसोस हुआ।
मैंने बहादुर को पुकारा, ''बहादुर !''
रसोई में से निकल बहादुर मेरे पास आ खड़ा हुआ, ''जी साहिब।''
''क्या कर रहे हो ?'' मैंने पूछा।
''चाय ला रहा हूँ।'' वह बोला।
''चाय सिर्फ इनके लिए लाओ एक कप, मेरे लिए नहीं। ठीक।''
''जी साहिब।'' कहकर वह चला गया।
अर्पण ने शॉल तह लगाकर सोफे की बाजू पर रख लिया। कह रही थी, मुझे पहचाना नहीं ? अपने गाँव के नम्बरदार सरदार तारा सिंह की अंहकारी बेटी अर्पण को कैसे नहीं पहचानता ? उसका नाम भूल जाने वाली बात तो अचानक हो गयी, उसकी आवाज तो मैंने फट पहचान ली थी। मेरा बाप तो इनकी बेगारी करते-करते कुबड़ा हो गया था। शिखर दोपहरी में मैं इनकी गेहूं काटा करता था और जान निकाल लेने वाले चौमासों में धान की पौध लगाया करता था। मुझे वे सिल्वर के टेढ़े-मेढ़े बर्तन कैसे भूल सकते हैं, जो मेरे और मेरे बापू के लिए एक आले में अलग ही पड़े होते थे। उन बर्तनों में जब मैं दाल-रोटी डलवाने के लिए चौके की तरफ जाता था, तो अर्पण मेरी ओर कभी देखती तक नहीं थी। वैसे, मेरी क्लास-मेट थी वह, लेकिन कभी कोई बात मैंने उसके साथ साझी नहीं की थी। ना ही कभी ऐसी कोई इच्छा जागी थी। किसी भी लड़की में मेरी कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही थी। बस्ती की एक दो लड़कियाँ, जो मेरे से निचली कक्षा में पढ़ती थीं, कभी-कभार सवाल पूछने आ जाती थीं। उनके साथ भी मेरी बात सवाल समझाने तक ही सीमित रहती। अर्पण तो खड़ी ही दूसरे छोर पर थी। बल्ब की मरियल-सी रोशनी में देर रात तक पढ़ते रहना मेरा नियम था। आठवीं कक्षा में मैरिट में आया तो मेरा स्कॉलरशिप लग गया। उस वक्त बापू ने मुझे दिहाड़ी पर जाने से बिलकुल रोक दिया था। काम का सारा बोझ बापू के सिर पर पड़ता देख मैं उस वक्त अन्दर-ही-अन्दर दुखी हुआ था। घर की डावांडोल हालत को सुधारने का सामर्थ्य मुझमें नहीं था। लेकिन, पढ़ाई का शॉर्ट कट मुझे हौसला देता, अपनी मंजिल मुझे करीब दिखाई देती।
अर्पण नये लेडी साइकिल पर स्कूल आती थी। मेरा यह सफ़र पैदल ही तय होता। वह लड़कियों के संग करीब से गुजरती तो कोई ताना मार जाती। मैं अनसुनी करके चुपचाप अपनी राह चलता रहता। मैंने हॉकी की टीम में शामिल होने की कोशिश की, पर मास्टर दर्शन सिंह ने बड़ी चुस्ती के साथ मुझे टीम के पास नहीं फटकने दिया। सबकुछ जानते-समझते मैंने बात को मन पर नहीं लगाया था। मास्टर संतोख सिंह ने मेरी पीठ थपथपाई थी। मुझे पता था, अकेले वही मेरी ओर है, बाकी सब दूसरी ओर।
अर्पण दूसरे धड़े का आखिरी सिरा थी। मुझे देखकर नफ़रत में थूकती थी। मुझे इस बात का कभी रंज नहीं हुआ था। वह लड़कियों को उत्साहित होकर बताती थी, तेजू हमारा कामगार है, नौकर है। वह मेरी बड़ी बहन सीतो के बारे में भी ऊल-जुलूल बोलती थी। मैंने अर्पण को साइंस-रूम में मास्टर सेवा सिंह के साथ देखा था, अकेले और बिलकुल साथ सटे हुए। उस वक्त अर्पण ने शर्मिन्दगी महसूस करने के बदले मुझे धमकी दी थी, ''खबरदार, अगर किसी से कुछ कहा तो। बहुत बुरा करुँगी।''
यह कैसे हो सकता है कि मैं अर्पण को पहचान न सका होऊँ ? यह तो यूँ ही सोच का बहाव बहाकर ले गया मुझे। जीवन के रास्ते कहाँ इतने लम्बे होते हैं कि आदमी बेपहचान हो जाये। यह तो सहज ही जख्म छिल गया। अर्पण भी उस जख्म की जिम्मेदार है। अब वह मेरे सम्मुख सहज और सीधी बनी बैठी है। वह किधर से आयी थी, यह मैं अभी तक नहीं जान सका था।
मेरी मनचली नज़र अर्पण के खुले गले में झांकने का प्रयास कर रही है। अर्पण के बैठने का अंदाज ऐसा है मानो वह मूक स्वीकृति दे रही हो। दिनभर की थकावट के बावजूद, मैं किसी संभावी मुकाबले के लिए खुद को तैयार करने लगा। उस ज़ख्म पर कोई फाहा रखने की खातिर।
बहादुर उसके सामने चाय का कप रख गया। मेरे चेहरे पर तनी कशमकश को देख वह बोली, ''शायद मेरा आना आपको अच्छा नहीं लगा।''
''नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।'' मैंने कहा।
''फिर आप इतना चुप...।'' वह बोली।
''आपको पता ही है शुरू से मेरी आदत। अभी भी वैसा ही हूँ। आप रीलेक्स होकर बैठो। असल में, व्यस्तता बहुत है। आपने देखा न, वो लोग आये थे, उनका भी कोई मसला था। उनके साथ भी संक्षेप में बातचीत हुई। आप चाय लो, ठंडी हो रही है।''
इस गुरुद्वारे वाले मसले ने भी अन्दर का ज़ख्म छील कर रख दिया था। मैंने स्वयं एक बार गुरुद्वारे में जाकर ऐसी ही विनती की थी, परीक्षा का हवाला देते हुए स्पीकर की आवाज कम रखने का अनुरोध किया था। लेकिन, प्रबंधकों ने दुत्कार दिया था, ''तेरी पढ़ाई ऊँची है कि गुरबाणी?'' प्रबंधकों में सबसे आगे अर्पण का बाप ही था। धर्म की इतनी बड़ी दीवार से टक्कर लेना मेरे वश में नहीं था। मैं चुप हो गया था। मुझे लेबर कालोनी के लड़कों पर तरस आया। पर सही धड़े के साथ खड़ा होना इस समय मेरे लिए दुविधा वाला मसला बना हुआ था।
दूसरे धड़े के साथ खड़ी होने वाली अर्पण आज इतनी सहज क्यों है? क्यों इतनी नरम है? कौन-सी ज़रूरत इसे मेरे पास ले आयी है? बाहर अंधेरा पसर रहा है, रात उतर रही है। क्यों आयी है वह?
''आपने मन मारकर पढ़ लिया। इतनी मेहनत आप ही कर सकते थे। मेरी ओर देखो, न आगे, न पीछे।'' चाय में से उठती भाप पर दृष्टि टिकाये वह बोली।
''ऐसी क्या बात हो गयी ?'' मैंने उत्सुकता जाहिर की।
''शायद आपको नहीं मालूम, पिछले कुछ समय से मैं गाँव में ही रह रही हूँ। मैं और मेरी बेटी दोनों।''
''आपके हसबैंड ?''
''उसके साथ अब मेरा कोई रिश्ता नहीं। यह मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी हार है।'' उसके चेहरे पर उदासी तन गयी।
''कोई केस वगैरह ?'' मुझे उसके साथ हमदर्दी जाग गयी।
''केस तक की तो कोई नौबत ही नहीं पड़ी। वह तो मामला ही ठप्प हो गया।'' उसने कहा। फिर, चेहरे पर से उदासी के प्रभाव को हटाकर थोड़ा मुस्कराते हुए बोली, ''आपके पास एक छोटे से काम से आयी हूँ और वह काम आपके हाथ में है।''
''बताओ, बताओ।'' मैंने कहा।
''पिछले साल मेरी बेटी ने दसवीं पास की है। मैंने उसे आपके विभाग में असिसटेंट की पोस्ट के लिए अप्लाई करवाया है। यह काम आपने करना है।'' कहकर उसने चाय का घूंट भरा।
''बस, इतनी सी बात। उसके पर्टीकुलर्स मुझे दे दो। यह कोई बड़ी बात नहीं।'' मैंने उसे सिर से पांव तक निहारा। उसने मुस्करा कर स्वागत किया।
''थैंक्यू सर।'' उसने हाथ जोड़े।
''कम से कम आप तो सर न कहो। हम क्लास-फैलो रहे हैं, और फिर एक गाँव के। एक मुद्दत के बाद मिले हैं। शायद पन्द्रह साल बाद।''
''पन्द्रह नहीं, कम से कम बीस साल बाद। अट्ठारह साल की तो मेरी बेटी हो गयी। आपके बच्चे ?''
''मेरे दो बच्चे हैं। बेटी आठवीं में है और बेटा छठी कक्षा में। दो छुट्टियाँ थीं, अपनी मम्मी से कहने लगे- रॉक गार्डन दिखा लाओ। आज ही दिन में गये हैं।'' मैंने उसके चेहरे पर नज़र गड़ाई तो वह मुस्करा दी। मेरे अन्दर अजीब-सी हलचल मच गयी। आहिस्ता से उठकर मैं बैड रूम में गया और अल्मारी में रखी बोतल में से एक पैग बनाकर पी गया। नशे की मद्धिम पड़ रही तार फिर से तीखी हो उठी।
वापस आया तो वह बोली, ''बाथरूम किधर है ?''
बहादुर से मैंने कहा, ''मैडम को अन्दर वाला बाथरूम दिखा दे बहादुर।''
वह बहादुर के पीछे-पीछे चली गयी। उसकी कमर देखकर मेरे अन्दर गुदगुदी होने लगी। बाथरूम से लौटकर वह रसोई में जा घुसी और बहादुर से कुछ पूछती रही। रसोई में से बाहर आयी तो उसके चेहरे पर से संकोच-झिझक के भाव गायब हो चुके थे। मैंने बैडरूम में जाकर एक पैग और बना लिया। उसे बुलाने की खातिर पूछा, ''बुरा तो नहीं मानते ?''
''नहीं नहीं, कोई बात नहीं।'' वह बोली।
फिर, थोड़ा-सा और खुलकर मैंने कहा, ''आपने स्टे तो अब यहीं करना है, चाहो तो चेंज वगैरह कर लो। मेरी पत्नी का कोई सूट पहन लो। फिर बैठते हैं रीलेक्स होकर।''
''कोई बात नहीं, सोते समय कर लूँगी।'' उसने अपना इरादा स्पष्ट कर दिया।
दो पैग और पीने के बाद मेरी नज़र डोलने लगी थी। वह मैगजीन होल्डर में से पत्रिकायें निकाल कर उलटती-पलटती रही। नज़र मिलती तो मुस्करा देती। डायनिंग टेबल पर खाना खाते समय छोटी-मोटी बातें हुईं। रसोई संभाल कर बहादुर अपने कमरे में चला गया। ड्राइवर को मैंने यह कहकर भेज दिया कि सवेरे जल्दी आ जाए। अर्पण ने मेरी पत्नी की मैक्सी पहन ली। मैंने देखा, उसके शरीर में कशिश बरकरार थी। बेकाबू होती सोच का कांटा बदल कर मैंने कहा, ''बेटी के फार्म वगैरह मुझे दे दो आप।''
वह टेबल के नीचे से फाइल उठा लाई। एक बार उसकी छातियों को नज़र से टटोलते हुए मैंने फाइल ले ली।
''अनुरीत कौर...'' मैंने उसके चेहरे की ओर देखा, ''मेरी बेटी का नाम भी अनुरीत ही है। इधर देखो...।'' मैंने सामने लगी अपनी बेटी की तस्वीर की ओर इशारा किया। स्कूल में कविता-पाठ के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर रही थी वह। अर्पण ने तस्वीर के करीब जाकर देखा और बोली, ''बहुत प्यारी है आपकी बेटी। आपके जैसी इंटेलीजेंट होगी।'' वह मुस्कराई। पता नहीं कैसी मुस्कराहट थी यह ? बिलकुल उसी तरह जिस तरह मेरे दफ्तर का स्टाफ 'जी हुजूर, ठीक है साहब, आपने ठीक फरमाया सर' कहकर मुस्कराता है। मेरी गलत बात का भी समर्थन कर देता है। दूसरे धड़े के अन्तिम सिरे पर खड़ी अर्पण कुछ इसी तरह ही मेरे इतना करीब आ खड़ी हुई है। मेरी बीवी की मैक्सी पहने, मेरे से इतनी दूर जिसे हम फासला नहीं कहते। मैं अर्पण के चेहरे की ओर देख रहा था। नशे के स्थान पर पीड़ा का एक तीखा अहसास मेरे अन्दर जाग रहा था। अर्पण मेरी बड़ी बहन मीतो का नाम अपने चाचा के साथ जोड़कर मजा लिया करती थी और मुझे ग्लानि के गहरे खड्ड में धकेल दिया करती थी। उस वक्त, कई बार मन करता था कि कोई ऐसा हथियार हो, जिससे मैं चीर कर रख दूँ ऐसे लोगों को।
दूसरी दीवार पर मेरे बेटे विकासबीर की तस्वीर थी। कंधे पर बैट रखे, खिलाड़ियों वाली टोपी पहने। मुझसे कहता है, 'पापा, मुझे क्रिकटर बनना है।' मेरे जेहन में मास्टर दर्शन सिंह का चेहरा घूम जाता है। मैं बेटे को उत्साहित करता हूँ, यह जानते हुए भी कि मास्टर दर्शन सिंह जैसे लोग हर जगह मौजूद हैं।
दारू का असर कम होने लगा है। मैंने फाइल बन्द करके अल्मारी में रख दी। सामने दारू की आधी बोतल पड़ी थी। मन हुआ, नीट ही पी जाऊँ और दिल पर पड़ रहे अनचाहे बोझ से मुक्त हो जाऊँ। मैंने हुक्म की प्रतीक्षा में खड़ी अर्पण की ओर देखा। मेरे एक इशारे पर बिलकुल तैयार थी वह। वह जो दूसरे धड़े का आखिरी सिरा था, अचानक टूट कर सामने आ गिरा था।
मैंने उसे कहा, ''आओ, आपको बैडरूम दिखा दूँ।''
सामने वाले कमरे तक छोड़कर मैं वापस आ गया और आते ही बैड पर ढह गया। और दारू पीने का ख्याल छोड़, मैंने स्वयं को पल-पल फैलती जाती सोच के हवाले कर दिया।
अकेलापन, बेगानी औरत, ज़ख्म का अहसास और कई घंटों तक फैली रात...
मेरे से अर्पण तक सिर्फ तीन कदमों का फासला था, बस... दोनों बैडरूम के दरवाजे चौपट खुले थे। मेरी चेतना में फंसा कोई कांटा मुझे बेचैन कर रहा था। तीन कदमों का फासला एकाएक फैलने लगा था। मुझे लग रहा था, यह फासला मुझसे तय नहीं हो सकेगा। और यह रात... यह रात इसी तरह गुजर जाने वाली थी।
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तलविंदर सिंह
जन्म : 14 फरवरी 1955
शिक्षा : एम.ए.
पुस्तकें : दो उपन्यास -'लौ होण तक' तथा 'यौद्धे'
तीन कहानी संग्रह-'रात चानणी', 'नायक दी मौत' और 'विचली औरत' ।
संप्रति : सरकारी नौकरी ।
सम्पर्क : 61, फ्रेण्ड्स कालोनी, मजीठा रोड, अमृतसर, पंजाब।
फोन : 09872178035