रविवार, 10 फ़रवरी 2013

लघुकथाएं और कविताएं



अर्चना ठाकुर की तीन लघुकथाएं

बड़े साहब

कन्हैया लाल बड़बड़ाते हुए अपनी कुर्सी पर आकर बैठते ही मेज़ पर लगी घंटी बजाते है|
'क्या होगा इस देश का - कहते है प्रजातन्त्र है - ख़ाक प्रजातन्त्र है |'
'क्यों कन्हैया लाल जी क्या हुआ ?' साथ की कुर्सी पर बैठे बाबू ने पूछा |
मुँह घुमाकर  उसकी तरफ झुकते हुए कहते है -
'अरे होना क्या है - कई दिनों से छुट्टी के लिए दरख्वास्त दे रहा हूँ पर
हर बार बड़े साहब टाल देते है |'
'क्यों ?'
'क्यों!'(एक एक शब्द गुस्से में कुचलते हुए कहता है)'मैं क्या समझता नहीं
,ये जो कारण बता कर मेरी छुट्टी नामंजूर की है वो सब नाटक है |'
और आगे झुकते हुए -'दरअसल ये सब महज कुर्सी का रौब भर है - अरे हर बड़ा
अफ़सर अपने से छोटे  को अपना गुलाम समझता है की वो जो भी करता जाएगा उसे
छोटा अफ़सर सहता जाएगा |'
'साहब पानी |'
अपने सामने खड़े चपरासी को घूरते हुए कन्हैया लाल लगभग चीखे -
'इतनी देर लगा दी पानी लाने में - मर गया था क्या ?'
'साहब - !'
'क्या है ?'
'आधे दिन की छुट्टी चाहिए थी |'
'क्यों ,कोई मर गया है क्या ?'
'साहब मेरी घर वाली को बच्चा होने वाला है |'
'बच्चा तुम्हारी घर वाली को होने वाला है तुम्हें तो नहीं और जो तुम चले
गए तो यहाँ चाय पानी कौन देगा - जाओ - चाय ले आओ |'
वह गमगीन चेहरे के साथ उल्टे पाँव वापस चल दिया चाय लाने |
उसके जाते ही कन्हैया बाबू फिर उसी तरफ झुक गए -
'हाँ तो मैं कह रहा था की हर बड़ा साहब - |'

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गंदगी

कलफ़ वाली शर्ट पहने वो गले की टाई की नॉट ठीक कर रहा था| बस उसके हाथ कोट
की तरफ बढ़ने ही वाले थे की पत्नी आ गई और अपनी बात कह गई| पत्नी की बात
सुन वो लगभग चिल्लाया -
'तुम पागल तो नहीं हो गई हो - धनी नहीं आया ,तो मैं क्या करूँ -
पाँचसौ-हज़ार एक्स्ट्रा दो पर उससे कहो की छुट्टी न किया  करे - आखिर उसे
सिर्फ पिता जी की देखभाल के लिए ही रखा है - अब  उनकी बीमार हालत पर मैं
क्या कर सकता हूँ - नौकर तो लगा रखा है न - जानती हो न बीमारी के चलते
रोज़ नहाते भी नहीं - ठीक से अपने सहारे खड़े भी नहीं होते अब नौकर आज नहीं
आया तो मैं उनको पेशाब कराने ले जाऊँ - पूरा बोझा मेरे ऊपर ही देदेंगे -
तुम देख रही हो न ,मैं तैयार खड़ा हूँ - जरूरी मीटिंग के लिए निकलना है -
अगर कपड़ों में गंदगी का एक भी दाग लग गया तो बैड इंप्रेशन पड़ेगा - समझती
क्यों नहीं|' एक झल्लाहट के साथ वो अपनी बात खत्म करता है|
पत्नी के सामने कोई रास्ता नहीं था|शवसुर को खिला सकती थी पर गुसलखाने
कैसे ले जाती|
पत्नी को अभी भी खड़ा देख वो आगे कहता है -
'मैं तो कुछ नहीं कर सकता - अब तुम्हें जो समझ आए वो करो - चाहे कोई
दूसरा नौकर रख लो|'आस्तीन झाड़ता वो कोट अपनी बाँह में डाले बाहर की ओर
निकल जाता है| पत्नी बगले झाँकती अपना सा मुँह लिए रह जाती है|
वह बाहर निकल कर जूते के तस्मे बांध रहा था की उसका पाँच वर्षीय बेटा
चॉकलेट खाते खाते वहीं आ जाता है और अपने पिता से चिपटने ही वाला था की
पत्नी चिल्लाई -
'नहीं -हीं - पापा के कपड़े खराब हो जाएँगें|'
'तुम भी - मेरा बेटा कोई गंदगी थोड़े ही है - आओ बेटा पापा के गालों में
जरा प्यार तो कर लो ,फिर पापा जाएँगें - |'
बेटे को गोद में ले कर उसके फूले गुलाबी गालों पर अपना प्यार अंकित कर वो
मुस्कराता बाहर निकल जाता है और हाथों में लगे चॉकलेट के दाग को अपने
रुमाल से पौंछते बाहर अपनी कार की तरफ बढ़ जाता है|
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हक़

'दमयंती देवी जी के केस के सिलसिले में जा रहा हूँ|' एक ने कहा|
'दमयंती- दमयंती देवी-!' वो सोचने लगा|
'जानते हो क्या -!' वो एकाएक उत्सुक हो उठा|
'मध्यम कद की हल्के रंगत वाली महिला दमयंती देवी को तो मैं जानता हूँ -
यही कोई गाँव में हमारे घर से चार घर छोड़ कर घर था उनका - दमनी दीदी दमनी
दीदी कहा करते थे - वही है न|'
अब प्रश्न उसके चेहरे पर नज़र आ रहे थे|
सरकारी रोडवेज़ बस, सुबह के ग्यारह बजे| अचानक बस पर दो मित्रों की भेंट
हो जाती है| एक पेशे से वकील दूसरा प्राइवेट नौकरी पेशा| मिले तो अपनी
गुफ़्तगू के साथ दमयंती देवी के नाम के साथ उसके विषय पर चर्चा छिड़ गई|
'जानता हूँ - बहुत अच्छे से जानता हूँ - शुरुवात से ही बड़ी तेज़ रही है -
घर परिवार के हर मसले पर अपनी पैठ बनाने वाली - पर तुम ये बताओ कोर्ट
कचहरी में क्या चल रहा है उनका?'
'उनके निवास की पीठ दीवार से मिला कोई चार सौ गज़ का टूटा फूटा मकान है
,उसी के हक़ का मुक़दमा चल रहा है - आज आखिरी फैसले की तारीख़ है -|'
'वो क्या उनके किसी जानने वाले की ज़मीन थी?'
इस प्रश्न पर वो फिसफिसी हँसी हँस दिया|
'तुम कहते हो कि उनको जानते हो, फिर उल्टा प्रश्न मुझ ही से कर रहे हो -
वहाँ कोई बुढ़िया रहती थी - उसका तो कोई अपना था नहीं - अचानक एक दिन जब
गंध आई तब पता चला कि बुढ़िया मर गई - परिस्थितियों की मारी बेचारी को कभी
दमयन्ती देवी ने उधर झांक कर भी देखा नहीं होगा - पर उसके मरते जाने कौन
कौन से सबूत इकट्ठे कर लिए कि वो उस बुढ़िया को खाना खिलाती थी, वो मरने
से पहले कह गई थी की बिटिया ये तुम्हारा ही घर है|' वो बीच बीच में
फिसफसी हँसी हँसता जाता था 'मानना पड़ेगा बहुत चालू औरत है - अपने मतलब के
लिए गधे को भी बाप बना लेगी - एक नज़र देखो तो सभ्य समाज का आईना है तो
दूसरी तरफ तस्वीर ही दूसरी है|'
'हूँ|'
'दो लड़को ,पति के साथ खुद का पाँच सौ गज़ का अच्छा ख़ासा मकान है, पति बैंक
में नौकरी करता है,खुद भी सरकारी नौकरी में है - दोनों बेटे कमाऊ पूत है
- दिन रात घर पर धन लक्ष्मी की वर्षा होती है - पर सुना है (कहते कहते वो
उसके और नज़दीक सरक आया) पति के घर परिवार में भी मुकदमे से सारी ज़मीन
हथिया ली थी - सास श्वसुर की सारी ज़मीन जायदाद पर हक़ जता लिया - अब एक
छोटे से टुकड़े पर उसका देवर रहता है|'
'हाँ अपने गाँव में भी यही किया - उसकी माँ के मरने पर बाप ने दूसरा
ब्याह किया था - उससे दो लड़कियाँ हुई थी - तब तो वो चुप रही पर जैसे ही
इधर बाप मरा उधर बाप की पेंशन ,बैंक खाता सब पर इकलौती वारिस बन अपना
जायज़ हक़ दिखा कर सब हथिया लिया - सौतेली माँ को तो कानों कान ख़बर भी नहीं
हुई - बस गाँव के छोटे से घर में बेचारिया रह रही है|'
'बड़ी तेज़ औरत है ,मिलो तो दादा भैया से कम बात नहीं करती जैसे जबान में
गुड़ की ढेली हो पर है दो धारी तलवार है|'
'हमे क्या करना भैया - उसको मिला चाहे उसका हक़ रहा हो या न रहा हो|'
'ऊपर वाला भी कमाल है - किसके हक़ का किसको देता है - |'
फिर दोनों विषय बदल दूसरी चर्चा करने लगते है|
कहीं दूसरी सड़क पर एक तेज़ चमचमाती कार अचानक बंद पड़ गई| ड्राइवर पीछे की
सीट पर बैठी महिला से कहता है - 'मैडम जी गाड़ी में कुछ दिक्कत हो गई है|'
'क्या - मुझे कोर्ट पहुँचना है|'
'गाड़ी नहीं जा पाएगी - मैं ऑटो बुला कर लाता हूँ|'
कुछ ही देर में ऑटो आता है | दमयंती देवी उसमे बैठती है और फिर ऑटो हवा
से बातें करने लगता है कि तभी किसी मोड़ पर सामने से आते तेज़ रफ्तार ट्रक
से बचने में ऑटो सड़क के किनारे पेड़ो के झुरमुट से टकरा जाता गया| दमयंती
जैसे किसी रबड़ बाल सी उछलती पेड़ों के पीछे की झड़ियो में जैसे लुप्त हो
जाती है| ट्रक वाले को अपनी गलती का अहसास होता है और वो ट्रक रोक ऑटो के
पास आता है| वो एक नज़र में देखता है की वहाँ सिर्फ एक घायल ऑटो वाला था
,आस पास किसी और को न पा कर वो ऑटो वाले को ही अपने साथ उठा ले जाता है|
दमयंती घायल वही पड़ी रहती है उनही झाड़ियों के झुरमुट में जहाँ किसी की भी
नज़र उसे छू नहीं पाती | पत्थरों से टकराने से और झाड़ियों से लिपटने से
दमयंती का पूरा शरीर छिल गया था और लगातार उससे खून बह रहा था| पुलिस आती
है पर दमयंती तक उनकी भी नज़र नहीं जाती और वो वही उसी हालत में पड़ी रहती
है|
ढलती दुपहर तक किसी की भी नज़र उस घायल महिला पर नहीं जाती है | उधर घर
वाले परेशान की आखिर दमयंती गई कहाँ? दुपहर के नियत समय पर कोर्ट उसके हक़
में फ़ैसला सुना देता है और उसके घर के पिछवाड़े की ज़मीन पर उसका मालिकाना
हक़ जायज़ मान लिया जाता है| तभी घायल अवस्था में पड़ी दमयंती आखिरी हिचकी
लेती है|उसी वक़्त गाँव की ओर लौटती बकरियों का झुण्ड उसकी लाश को कुचलता
निकल जाता है और चरवाहा उसे देख चौंक जाता है|
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अर्चना ठाकुर की तीन कविताएं

मुझे एकाकी रहने दो.।

लहू लहू में बह जाने दो
नस नस में चढ़ जाने दो,
नशा है ये एकाकीपन का
जगह जगह इसे बिखर जाने दो,

न कहना है न सुनना है
न हँसना है न रोना है,
सिर्फ अँधेरों की गलियों में
भटक के खो जाने,

ख्वाहिशों की गहरी रातों में
तमन्नाओं के डूबे तारे है,
चिथड़ी चिथड़ी आवाज़ों के
दम घोटूँ सन्नाटे है,

मुझे न पुकारो कि न सुनूँगी मैं,
मुझे न रोको कि न रुकूँगी मैं,
मुझे आज चले जाने दो
ये एकाकी का समंदर है,
और मुझे इसमे डूब जाने दो,

एकाकी पन के घावों को सहलाने दो,
मैं एकाकी हूँ मुझे एकाकी रहने दो ||

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इस रात की सुबह नहीं..।

अरे कोई सूरज को  ढक दे
कि अभी सबेरा नहीं हुआ
कि अभी भी जगे नहीं लोग
कि अभी भी उनींदी है आँखें
कि अभी भी थका है मन
कि अभी भी गुज़री नहीं काली रात
कि अभी भी घर तक लौटे नहीं लोग
कि अभी भी रात का चूल्हा पड़ा नहीं ठंडा
कि अभी भी पूरे पसरे नहीं पाँव
कि अभी भी देहरी पर टिकी है आँखें
क्योंकि अभी तक सुबक रही है खबरें
रात की कब्रों में ||

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पृथ्वी का रुदन..

अब वो स्नेह नहीं रहा
मुझसे तुमको,
रंगो से बेज़ार नज़र आता है
इंद्रधनुष मुझको,
फूलों में वो खुशबों भी नहीं
लगती मुझको,
बादल आते बरसते
फिर भी नहीं भिगोते मुझको,
अब वो स्नेह नहीं रहा मुझसे तुमको,
चारों ओर दिखते है
सिर्फ काले काले धुएँ मुझको,
सुर्ख रंगों से रंगी
दिखती हर शह मुझको,
क्रूरता,दरिद्रता के दानव
हर पल रौंदते मुझको,
इसलिए लगता है मुझको
की अब वो स्नेह नहीं रहा
मुझसे तुमको |
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कहानी


पीड़ा
अर्चना ठाकुर
छोटी बहन स्कूल गई है| माँ बाज़ार से सौदा लेने अभी निकली है और पिताजी
शाम से पहले  दफ़्तर से घर नहीं आएगें| माँ के जाते सुषमा ने बाहर का
किवाड़ जल्दी से बंद कर लिया और दरवाजे की सारी कुंडियाँ लगा ली फिर एक एक
करके सारे घर की खिड़कियाँ और बाहर को खुलने वाले सभी दरवाजे बंद कर लिए
और बिल्कुल अंदर वाले कमरे में जाकर बैठ गई| आक्रोश और तड़प से उसकी आँखों
की लालिमा और गहरी हो उठी थी| बंधे चेहरे और वेदना में भिंची हुई आँखों
से वह कमरे के चारों ओर देखती है| फिर ऊपर की ओर मरमरी आवाज़ में चलते
पंखे को देखती है| 'जहर खा कर मर जाऊँ पर जहर तो है ही नहीं, मिट्टी का
तेल छिड़क कर जल जाऊँ पर अपनी वज़ह से घर को भी आग में क्यों स्वाहा करूँ|
यही सही है, हाँ पंखे से लटक कर मर जाती हूँ| एक पल में ही सारी पीड़ा का
अंत हो जाएगा| रोज़ रोज़ की मौत से एक दिन की मृत्यु भली| नहीं जीना चाहती
इस तरह तिल तिल मर कर, आज मैं ये किस्सा यही समाप्त कर दूँगी|'
सुषमा जल्दी से उठती है और कमरे की अलमारी खोल कर बैठ जाती है फिर एक
सरसरी नज़र अलमारी के एक एक बड़े खाने में सिमटी साड़ियों पर डालती है| 'अब
कौन सी साड़ी लूँ, जो मजबूत हो और मेरे मर जाने के बाद बेकार भी न हो| कोई
नई साड़ी नहीं निकालूँगी|'

कुछ ही पल में कई साड़ियाँ फ़र्श पर दिखने लगी| 'एक एक करके सारी साड़ियाँ
देख डाली, क्या करूँ, एक तो वैसे ही माँ अपने लिए कभी कुछ नहीं खरीदती -
कितनी ही पुरानी हो जाने पर भी वे साड़ी संभाले रहती है - कितनी बार मैंने
कहा माँ कम से कम त्योहारों पर तो एक अदद नई साड़ी ले लिया करो, पर नहीं -
हमेशा हँस कर टाल जाती - अगर कभी मैं ही पैसे जोड़ जाड़ कर साड़ी ले आती तभी
भी तो नहीं पहनती वो साड़ी - तब ये कह कर रख देती कि तुम दोनों की शादी
में काम आएगी - हुअः ! शादी, अब तो मेरी चिन्ता छोड़ दोगी न माँ, आज
तुम्हारी बेटी सदा के लिए विदा होने जा रही है|'
सुषमा ने साड़ी लेने का विचार छोड़कर एक पुरानी चादर उठा ली और स्टूल पर चढ़
कर चादर का फंदा लगाने लगी| 'पुराने और छोटे से घर के एक पुराने से पंखे
पर पुरानी सी चादर का फंदा लगा कर एक पुरानी ज़िन्दगी खत्म कर रही हूँ|'
मन ही मन बुदबुदाई वो|

पंखे पर चादर लटकाते उसे याद आया- 'अरे! मैंने अभी तक कोई सुसाइड नोट भी
नहीं लिखा - कहीं मेरी आत्महत्या को हत्या मान पुलिस वाले बेवज़ह ही मेरे
माता पिता को तंग न करे|' चादर वैसा ही लटका छोड़ सुषमा स्टूल से नीचे उतर
आती है और कागज़ पेन निकाल कर बैठ जाती है|
'
किसको संबोधित करके लिखूँ - दुखी तो सभी होंगे पर माँ की हालत का अंदाज़ा है मुझे|'
'
माँ, आपकी ये बेटी आज आत्महत्या कर रही है| अपने ही हाथों अपनी ज़िंदगी
का गला घोंट रही है| मुझे माफ कर देना| आपने अब तक अपनी इस बेटी का बहुत
साथ दिया|मेरे पल पल में विश्वास किया पर माँ.। मैं अब लोगों की तिरछी
नजरों के सवालों से बहुत आहत हो चुकी हूँ| गली का एक गुंडा मुझे सालों से
छेड़ रहा है और सालों से मैं इस पीड़ा को सह रही हूँ पर अब तो लोग मेरी इस
डर मिश्रित चुप्पी को मेरी स्वीकृति मान मुझे ही टेढ़ी नजरों से देखने लगे
है| मेरे कॉलेज के लड़के मुझे देख फब्तिया कसते है,लड़कियाँ हँसती है|बाज़ार
से सौदा लेते दुकानदार हाथों को छूते हुए सामान देता है, गली से गुज़रते
रिक्शेवाले,आता जाता हर राहगीर मेरे देह में अपनी नजरों के दंश चुभाता
गुज़र जाता है|माँ..अब मेरे लिए इस पीड़ा को लगातार सह पाना मुश्किल हो रहा
है| मैं हार चुकी हूँ माँ, मैं हार चुकी हूँ| माना आपको अपनी बेटी पर
पूर्ण विश्वास है पर बाहर निकल कर मुझमें उन चुभती नजरों का सामना करने
की हिम्मत नहीं है| कल को कोई और अनहोनी हो उससे पहले ही मैं अपने इस
शरीर को जो मेरी आत्मा का दुश्मन बना जा रहा है ,खत्म कर रही हूँ| माँ
मुझे माफ करना , शायद आप मुझे मेरे इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेंगी
पर इसके सिवा मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं है...|'
कलम भींचें सुषमा अपने बहते आँसू पर एक गहरी गटकन से साथ काबू करती है और
फिर विचारों और शब्दों में गोता खाने लगती है|

'माँ मुझे नहीं पता था की स्त्री होना मेरे लिए मेरा सबसे बड़ा अपराध बन
जाएगा| शायद ये हर स्त्री की पीड़ा है| यकीनन माँ आप भी कहीं न कहीं इस
पीड़ा से गुज़री होंगी तो आपने कैसे हिम्मत की होगी इसे सहने के लिए| पिता
जी द्वारा आपको दी हुई यातना को तो मैंने अपनी आँखों से देखा है| जब
नौकरी चले जाने पर पिताजी शराब पीकर घर आते और नशे में आपको मारते| कितनी
चुप्पी में आपने वो दर्द सहा कि कहीं कोई बाहर आपके चीखने की आवाज़ न सुन
ले| शरीर पर लगी चोट का मरहम्म तो मिला होगा पर पति द्वारा दी हुई
यातनाओं की मानसिक क्षति की भरपाई शायद ही कभी हुई होगी| तब भी आप हर साल
आने वाले त्योहारों में अपने पति के लिए पूजा करती रही,अपना पत्नी धर्म
निभाती रही| माँ सचमुच तुम महान हो| हर वक़्त बेवक्त हम दोनों बहनों का भी
आप एक मात्र सहारा रही| माना पिता जी ने हमारी पढ़ाई में धन खर्च किया पर
जीवन में आगे बढ़ने की हिम्मत,प्रेरणा हमें आपसे ही मिली| मैं सोचती हूँ
अगर कभी आप इतनी परेशानी, दुख, और प्रताड़ना को सहते हुए हार जाती और आप
भी वही कदम उठा लेती जो आज मैं उठा रही हूँ तो हमारा क्या होता माँ ? आज
मैं जो कुछ हूँ वो न होती| पिताजी आप के जाने पर कुछ दिन गम मानते और फिर
दादी की कसम पर दूसरी शादी को राज़ी हो जाते| वो आने वाली हमारी माँ
कहलाती और संभव हो कि वो हमारे सब काम भी कर देती जो आप हमारे लिए करती
है पर क्या वो हमें वही विश्वास और स्नेह दे पाती जो एक माँ अपने बच्चों
को देती है| अच्छा ही हुआ माँ जो आपने हिम्मत से काम लिया| आप का कल का
साहस हमारी आज की हिम्मत है| सच माँ आप ही हमारी प्रेरणास्रोत हो|'
लिखते लिखते सुषमा नज़र उठा कर सामने की दीवार पर लगी अपने माता पिता की
तस्वीर देखती है| धुमिल फ्रेम में भी अपनी माँ की चमकती मुस्कान से वो
नज़र नहीं हटा पाती| एक गहरे उच्छ्वास के साथ वह अब ऊपर पंखे की ओर नज़र
डालती है फिर कुछ सोच उसके चेहरे के भाव बदल जाते है|
'
फिर मैं ये क्या करने जा रही हूँ| मैं तो अपनी माँ के सारे किए कराई
मेहनत पर पानी फेरने जा रही हूँ| आज उनकी एक बेटी नहीं बल्कि उनका एक हाथ
कट जाएगा| नहीं चंद लोगों के एक झूठ के लिए मैं अपना इतना सारा सच नहीं
बदल सकती| वे कौन लोग होते है मेरा नसीब तय करने वाले| मैं अपने बिगड़े आज
के लिए अपना आने वाला कल भी खराब कर रही हूँ| मेरी आत्महत्या  इस बात का
सबूत हो जाएगा की लोगों का झूठ जीत गया और मेरा सच हार गया| सिर्फ उनके
कह देने मात्र से मैं चरित्र हीन नहीं हो जाऊँगी| मैं ज़िन्दा रह कर अपना
सच साबित करूँगी और झूठ के मुँह में तमाचा मारूँगी| मेरी आज की हिम्मत
मेरा कल का भविष्य तय करेगी| मैं..|'

अचानक दरवाजे की तेज़ दस्तख की आवाज़ से वो चौंक जाती है| अपनी सुर्ख आँखों
से वह एक पल पंखे से लटकते चादर को तो दूसरे ही पल बंद दरवाजे की ओर
देखती है| फिर जल्दी से संभलते हुए 'आती हूँ' की आवाज़ देकर बिजली की
फुर्ती सी वह उठी, मुँह धो कर चादर उतार कर किनारें फेंक कर तेज़ी से
दरवाज़े की ओर बढ़ जाती है|

दरवाज़े को खोल बाहर अपनी छोटी बहन को देख मुस्कराती हुई बोली -'आ गई|'
आगे वो कुछ कह पाती की छोटी ने जल्दी से अंदर आकर किवाड़ बंद कर लिया|
सुषमा छोटी के चेहरे की ओर देखती है उसकी आँखों का डर देख सुषमा की आँखें
सचेत हो उठती है| उसने उन आँखों में अपनी बहन की पीड़ा नहीं बल्कि एक
स्त्री की पीड़ा महसूस की| आज जो कुछ उसके साथ गुज़र रहा है अब क्या वही
उसकी छोटी बहन को भी सहना होगा|
'
नहीं, एक स्त्री होना मैं एक अपराध नहीं होने दूँगी|'
'
दीदी - कहाँ जा रही हो?'
'
तू यहीं ठहर - मैं अभी आती हूँ|'सुषमा के अंदर का उद्वेग उफन कर आँखों
में जलजले की तरह दिखने लगा|
दीदी - वो वही गुंडा है - आप कहाँ जा रही हो?' उसकी घबराहट शब्दों में झलक आई|
पर सुषमा तेज़ी से बिन सुने कहे बाहर निकल गई|
गली तक निकलते सुषमा को देख गली के शोहदे यूँ निकल आए जैसे बारिश के बाद
जगह जगह कुकुरमुत्ते उग आए हो|
'
अरे वाह! आज रानी बेवक्त भी दरबार से बाहर आ गई -|'
इन फब्तियों के बाद मुँह से तरह तरह की अश्लील आवाज़ों ने सुषमा को और भी
जला कर राख कर दिया|

अपनी माँ का चेहरा आगे रख हिम्मत करके वह आगे बढ़ती रही और गली के मोड़ पर
जा कर रुक गई| पीछे शोहदे खड़े ललचाई नज़रों से उसे ताक रहे थे| सुषमा बिना
समय गवाएँ फुर्ती के साथ पलटी और पास के हलवाई की जलती कढ़ाई में पड़ी
कल्छुन उठा कर घुमाते हुए एक ज़ोर के साथ उन शोहदों के ऊपर टूट पड़ी| एक
साथ कईयों के चेहरे जलन से तड़प उठे| उन सभी की आह की आवाज़ ने सुषमा में
हिम्मत की अग्नि और भी प्रज्वलित कर दी| वह लगातार उन पर वार करती रही|
ये देख आस पास के खड़े सभी लोग सकते में आ गए|
'
ले - कमीनों - तुम्हारी ये हिम्मत, लो मेरा इज़हार|'
लोग भी आगे बढ़े - 'अरे लड़की को छेड़ता है- चलो पुलिस को बुलाते है|'
लोग भी उन शोहदों पर अपने अपने हाथ आज़माने लगते है|
अब सुषमा गहरी गहरी साँसे भरती सारा तमाशा अपनी हिकारत भरी नज़रों से देख
रही थी कि तभी उसने अपने कंधे पर एक भार महसूस किया|
'
अगर लड़की हिम्मत दिखाए तो उसकी एक हिम्मत चार की हिम्मत बन जाती है|'
पीछे से आकर माँ ने सुषमा को संभाला और नई ताज़गी भरी सुबह की भोर सी
मुस्कान के साथ वह उनके साथ वापस घर चल दी|
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जन्म : 05 मार्च,
जन्म स्थान : कानपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा : मनोविज्ञान ,हिंदी साहित्य में  स्नातकोत्तर उपाधि,परामर्श में
डिप्लोमा, एम0 फिल (मनोविज्ञान)
प्रकाशन : विभिन्न मुद्रित एवम अंतरजाल  पत्र-पत्रिकाओं में
कविताएँ,कहानियाँ,लघु कथा ,यात्रा व्यतांत  आदि का प्रकाशन
सम्पर्क :  अर्चना ठाकुर, तेजपुर ,सोनित पुर जिला ,आसाम
             arch .thakur30 @gmail .com
            archana.thakur.182@facebook.com

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

वातायन-जनवरी,२०१३


नए वर्ष में महिलाओं के प्रति सम्मान का संकल्प करें

हम और हमारा समय

पहचानें युवा शक्ति को

रूपसिंह चन्देल

एक  अंतरार्ष्ट्रीय सर्वे के अनुसार बलात्कार के अपराध के मामले में भारत आष्ट्रेलिया और स्वीडन के बाद तीसरे स्थान पर है. जिस देश में प्रत्येक बीस मिनट में एक बलात्कार की घटना घटती है वह तीसरे स्थान पर हो सहज विश्वास नहीं होता. और बीस मिनट के आंकड़े में वे घटनाएं शामिल नहीं हैं जो संज्ञान में नहीं आ पातीं या जिन्हें घर/गांव पंचायत द्वारा दबा दिया जाता है. आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद उफने जनाक्रोश के बावजूद दिल्ली में ही ऎसी घटनाओं पर विराम नहीं लग पा रहा. केवल दिल्ली में ही नवम्बर,२०१२ तक ५८० बलात्कार के मामले दर्ज हो चुके थे. 


१६ दिसम्बर की रात दामिनी दरिन्दों की जिस बर्बरता का शिकार हुई उसने जनता को सड़कों पर उतरने और सत्ताधीशों को लाल पत्थरों की दीवारों के पीछे दुबक जाने के लिए विवश किया. देश की आजादी में पहली बार बिना किसी पार्टी के आव्हान के जनता ने स्वयं सड़कों की ओर रुख किया. अधिसंख्य युवक और युवतियां थे. साथ स्त्रियां,बच्चे और वृद्ध भी थे. उनमें व्यवस्था के प्रति आक्रोश था. स्त्री अस्मिता खतरे में है. वे शांतपूर्ण ढंग से ’हमें न्याय चाहिए’ (We want justice) के नारे लगा रहे थे, लेकिन उन्हें मिली लाठियां, कड़कती ठंड में पानी की तेज बौछारें और आंसू गैस…आंसू गैस के जो गोले उनकी ओर उछाले गए वे तीन-चार वर्ष पुराने थे.

कड़कती ठंड में देश की युवा शक्ति पिट रही थी, लहू-लुहान हो रही थी लेकिन  टस से मस होने को तैयार नहीं थी. उनके इरादे बुलंद थे. और युवाशक्ति से घबड़ायी सत्ता मूकदर्शी थी. उसने प्रदर्शनकारियों के अपने तक  न पहुंचने देने की व्यवस्था कर ली थी. वे सुख की नींद सो सकते थे…क्योंकि असुरक्षित-चिन्तित जनता की उन्हें अभी परवाह करने की आवश्यकता नहीं थी. परवाह करने में कई महीनॊं का वक्त शेष जो है. उन्होंने मान लिया कि हर विरोध कुछ समय पश्चात अपनी मौत स्वयं मर जाता है और इसका परिणाम भी वही होगा. नहीं मरेगा तो अन्ना आन्दोलन की भांति उसे मार देने की जुगत उन्हें आती है. लेकिन इस आन्दोलन को न अन्ना ने खड़ा किया था और न बाबा रामदेव और अरविन्द केजरीवाल ने. यह स्वतः स्फूर्त है. लेकिन इसकी भूमिका अन्ना आन्दोलन द्वारा ही लिखी गयी थी. उस आन्दोलन ने जनता में जाग्रति पैदा करने का काम तो किया ही था. सड़कों पर युवाओं का इसप्रकार उतर आना मैं  उस जाग्रति की आगे की कड़ी मानता हूं.

सड़कों पर प्रदर्शन होते रहे. कई दिनों बाद एक-दो मंत्रियों ने आश्वासन का लालीपॉप थमाने का प्रयास किया. लेकिन युवाशक्ति को फुसलाया नहीं जा सका. दामिनी के बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड से कम की सजा उन्हें स्वीकार नहीं. गहरी नींद से सत्ता ने अंगड़ाई ली और  सख्त सजा की बात सामने आई. आनन फानन में दो कमीटियां बनाई गईं. युवाशक्ति को भरोसा नहीं हुआ. उनका प्रदर्शन जारी है. इस बीच दामिनी को सिंगापुर भेजा गया, जहां २९.१२.१२ को उसकी मृत्यु हो गयी और कल अर्थात ३० दिसम्बर,२०१२ को शाम सात बजे गुपचुप तरीके से उसकी अत्येंष्टि कर दी गई. उसकी अंत्येष्टि के समाचार ने मुझमें भगतसिंह की अंत्येष्टि की याद ताजा कर दी. तब ब्रिटिश शासन भी इसीप्रकार हिला हुआ था और उसे भय था कि यदि भगतसिंह की लाश अंत्येष्टि के लिए जनता को सौंपी गयी तो जनाक्रोश को संभालना कठिन होगा. तो भारत सरकार भी क्या ब्रिटिश हुकूमत जैसा व्यवहार कर रही थी. बच्चों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के साथ इंडियागेट और रायसिना हिल्स जाते हुए जो कुछ होता दिखा उसने उस दौर की याद भी ताजा की. इतना सब होने के बाद भी युवाशक्ति की मांग पर गंभीरता से विचार करने के लिए  सरकार तैयार नहीं है.    
युवाओं की मांग है कि कानून में  बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान हो. लेकिन हो यह रहा है कि बलात्कार के लिए बने जस्टिस जे.एस.वर्मा कमीटी के समक्ष संस्थाएं जो ड्राफ्ट प्रस्तुत करने वाली हैं उसमें बलात्कारियों के लिए अधिकतम सजा के तौर पर आजीवन कारावास की मांग की जा रही है. कांग्रेस ने भी जो ड्राफ्ट तैयार किया है उसमें बधियाकरण आर्थात नपुंसक करने या अधिकतम ३० वर्ष की सजा की मांग है. मेरा मानना है कि बधियाकरण बलात्कारी में एक अलग  प्रकार की मानसिक विकृति पैदा करेगा. हर बलात्कारी एक मानसिक विकृति का शिकार होता है. सजा के रूप में उसे नपुंसक बना देने से उसमें जो दूसरी प्रकार की मानसिक विकृति पैदा होगी उसके वशीभूत जेल से बाहर आने के बाद वह अन्य प्रकार के जघन्य अपराध कर सकता है.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी लड़की/महिला के साथ बलात्कार हत्या से भी अधिक जघन्य अपराध है. बलात्कृत लड़की न जीवित में होती है न मरने में. ऎसी स्थिति में बलात्कारी को फांसी से कम सजा नहीं दी जानी चाहिए. फांसी की सजा के विरुद्ध बोलने वालों का तर्क है कि इससे सुबूत मिटाने के लिए बलात्कारी बलात्कृत की हत्या कर देगा. जब इस सजा का प्रावधान नहीं है तब भी अपराधी ऎसा कर रहे हैं. बलात्कार स्वयं में जघन्य अपराध है---उसे अलग श्रेणी में व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए. बलात्कार का हर मामला Rarest of the rare माना जाना चाहिए और उसके लिए मृत्युदंड से कम कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.

लेकिन हम यह भी जानते हैं कि कितने ही नेताओं पर बलात्कार के मामले लंबित हैं और वे भी मृत्युदंड के दायरे में आ जाएगें इसलिए शायद ही कोई राजनैतिक दल सजा के इस प्रावधान के लिए तैयार होगा. भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज भले ही अनेक बार इस प्रावधान की मांग संसद से लेकर सड़क तक कर चुकी हैं लेकिन उनकी पार्टी का रुख स्पष्ट नहीं है. स्पष्ट है कि यह उनकी निजी मांग है.

देश में एक लाख से अधिक बलात्कार के मामले लंबित हैं. बलात्कृत को वर्षों-वर्षों से न्याय नहीं मिला. दामिनी के बाद देश के विभिन्न भागों से प्रतिदिन अनेकों ऎसी घटनाओं के समाचार आ रहे हैं. पटियाला, अहमदाबाद, पटना, पश्चिम बंगाल, थाणे, बंगलरू----अर्थात देश का कोई भी हिस्सा ऎसा नहीं है जहां महिलाएं/युवतियां महफूज हों. दामिनी के बाद दिल्ली और उसके आसपास कितनी ही घटनाएं घटित हो चुकी हैं और हो रही हैं. मृत्युदंड के प्रावधान के बाद उन पर बिल्कुल अंकुश लग जाएगा, यह कहना अतिशयोक्ति होगा, लेकिन नियंत्रण पाने में सफलता अवश्य मिलेगी. कानून में छेड़छाड़ के लिए ५ से १५ वर्ष की सजा और बलात्कार के लिए मृत्युदंड का प्रावधान किया जाना चाहिए. केवल किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि उसे तमाम माध्यमों--टी.वी.चैनलों, समाचार पत्रों में विज्ञापनों, गली-मोहल्लों में पोस्टरों द्वारा विज्ञापित भी किया जाना चाहिए. सरकार के साथ निजी संस्थाओं और समाज सेवकों को इसके लिए गंभीर पहल करने की आवश्यकता है. सरकार को सिंगापुर और हांगकांग से सीख लेना चाहिए जहां ऎसे अपराधों के लिए मृत्युदंड की सजा है.


दिल्ली गैंगरेप की चर्चा दुनिया के हर कोने में हो रही है. संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इसे क्रूरतम अपराध माना है. देश की छवि दांव पर है. अतः व्यवस्था को सोचना होगा कि बलात्कार जैसे बर्बर कृत्य के लिए बर्बर सजा द्वारा ही नियंत्रण पाया जा सकता है.

युवाशक्ति की मांगों को नकारना एक भारी भूल न सिद्ध हो. यह वह शक्ति है जो सत्ताएं बदल देती है. मिश्र की मिसाल अभी ताजा है.
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वातायन में इस बार प्रस्तुत है वरिष्ठ कथाकार और कवयित्री सुधा अरोड़ा की कविता, कबीरदास का कटाक्ष और पाश की कविता.
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