मंगलवार, 3 नवंबर 2009

कहानी


तीन लँगोटिया यार
प्राण शर्मा
राजेंद्र ,राहुल और राकेश लँगोटिया यार हैं. तीनों के नाम " र " अक्षर से शुरू होते हैं. ज़ाहिर है कि उनकी राशि तुला है. कहते हैं कि जिन लोगों की राशि एक होती है उनमें बहुत समानताएँ पायी जाती हैं. राजेंद्र,राहुल और राकेश में भी बहुत समानताएँ हैं. ये दीगर बात है कि राम और रावण की राशि भी एक थी यानी तुला थी, फिर भी दोनो में असमानताएं थीं. राम में गुण ही गुण थे और रावण में अवगुण ही अवगुण. एक उद्धारक था और दूसरा संहारक. एक रक्षक था और दूसरा भक्षक. यदि राजेन्द्र, राहुल और राकेश में समानताएँ हैं तो कोई चाहने पर भी उन्हें असमानताओं में तबदील नहीं कर सकता है. सभी का मानना है कि उनमें समानताएँ हैं तो जीवन भर समानताएँ ही रहेंगी. इस बात की पुष्टि कुछ साल पहले चंडीगढ़ के जाने-माने ज्योतिषाचार्य महेश चन्द्र ने भी की थी. राजेंद्र, राहुल और राकेश के माथों की रेखाओं को देखते ही उन्होंने कहा था- "कितनी अभिन्नता है तुम तीनों में! भाग्यशाली हो कि विचार ,व्यवहार और स्वभाव में तुम तीनों ही एक जैसे हो..जाओ बेटो, तुम तीनों की मित्रता अटूट रहेगी. सब के लिए उदाहरण बनेगी तुम तीनों की मित्रता."
राजेंद्र, राहुल और राकेश की अटूट मित्रता के बारे में ज्योतिषाचार्य महेश चन्द्र के भविष्यवाणी करने या नहीं करने से कोई अंतर नहीं पड़ता था क्योंकि उनकी मित्रता के चर्चे पहले से ही घर-घर में हो रहे हैं. मोहल्ले के सभी माँ-बाप अपनी-अपनी संतान को राजेंद्र,राहुल और राकेश के नाम ले-लेकर अच्छा बनने की नसीहत देते हैं, समझाते हैं-"अच्छा इंसान बनना है तो राजेंद्र,राहुल और राकेश जैसा मिल-जुलकर रहो. उन जैसा बनो और उन जैसे विचार पैदा करो. किसीसे दोस्ती हो तो उन जैसी."
राजेंद्र ,राहुल और राकेश एक ही स्कूल और एक ही कॉलिज में पढ़े. साथ-साथ एक ही बेंच पर बैठे. बीस की उम्र पार कर जाने के बाद भी वे साथ-साथ उठते-बैठते हैं.हर जगह साथ-साथ आते-जाते हैं. कन्धा से कन्धा मिलाकर चलते हैं. मुस्कराहटें बिखेरते हैं.रास्ते में किसीको राम-राम और किसी को जय माता की कहते हैं. बचपन जैसी मौज-मस्ती अब भी बरकरार है उनमें. कभी किसीकी तोड़-फोड़ नहीं करते हैं वे. मोहल्ले के सभी बुजुर्ग लोग उनसे खुश हैं. किसीको कोई शिकायत नहीं है उनसे. मोहल्ले भर की सबसे ज़्यादा चहेती मौसी आनंदी का तो कहना है- "कलयुग में ऐसे होनहार और शांतिप्रिय बच्चे, विश्वास नहीं होता है . है आजकल के युवकों में उन के जैसी खूबियाँ? आजकल के युवकों को समझाओ तो आँखें दिखाते हैं. पढ़ाई न लिखाई और शर्म भी है उन्होंने बेच खाई. माँ-बाप की नसीहत के बावजूद मोहल्ले के कुछेक लड़के शरारतें करने से बाज़ नहीं आते हैं. ऊधम मचाना उनका रोज़ का काम है . जब से राजेन्द्र,राहुल और राकेश की अटूट मित्रता के सुगंध घर-घर में फैली है तब से उनके गिरोह का का पहला मकसद है उनकी मित्रता की अटूटता को छिन्न-भिन्न करना. इसके लिए उन्होंने कई हथकंडे अपनाए हैं. लेकिन हर हथकंडे में उनको असफलता का सामना करना पड़ा है. फिर भी वे निराश नहीं हुए हैं.उनके हथकंडे जारी हैं.
चूँकि राजेंद्र, राहुल और राकेश की चमड़ियों के रंगों में असमानता है यानि राजेंद्र का रंग गोरा है ,राहुल का रंग भूरा है और राकेश का रंग काला है, इसलिए इन शरारती लड़कों को उनके रंगों को लेकर उन्हें आपस में लड़वाने की सूझी है. तीनो को आपस में लड़वाने का काम गिरोह के मुखिया सरोज को सौंपा गया है. ऐसे मामलों में वो एक्सपर्ट माना जाता है.
एक दिन रास्ते में राजेंद्र मिला तो सरोज ने मुस्कराहट बिखेरते हुए उसे गले से लगा लिया. दोनो में बातों का सिलसिला शुरू हो गया. इधर-उधर की कई बातें हुई उनमें. अंत में बड़ी आत्मीयता और शालीनता से सरोज बोला -"अरे भईया ,तुम दूध की तरह गोरे - चिट्टे हो. किन भूरे-काले से दोस्ती किये बैठे हो ? तुम्हारी दोस्ती उनसे रत्ती भर नहीं मिलती है. आओ हमारी संगत में. फायदे में रहोगे." जवाब में राजेंद्र ने अपनी आँखें ही तरेरी थीं. सरोज मुँह लटका कर मुड़ गया था. जब राहुल और राकेश को इस बात का पता राजेंद्र से लगा तो तीनो ही झूमकर एक सुर में गा उठे--"आँधियों के चलने से क्या पहाड़ भी डोलते हैं?"
शायद ही ऐसी शाम होती जब राजेंद्र,राहुल और राकेश की महफ़िल नहीं जमती. शायद ही ऐसे शाम होती जब तीनों मिलकर अपने- अपने नेत्र शीतल नहीं करते. शाम के छे बजे नहीं कि वे नमूदार हुए नहीं. गर्मियों में रोज गार्डेन और सर्दियों में फ्रेंड्स कॉर्नर रेस्टोरंट में. घंटों ही साथ-साथ बैठकर बतियाना उनकी आदत में शुमार है. कहकहों और ठहाकों के बीच कोई ऐसा विषय नहीं होता है जो उनसे अछूता रहता हो. उनके नज़रिए में वो विषय ही क्या जो बोरिंग हो और जो खट्टा,मीठा और चटपटा न हो.
आज के दैनिक समाचार पत्र " नयी सुबह" में समलिंगी संबंधों पर प्रसिद्ध लेखक रोहित यति का एक लंबा लेख है. काफी विचारोत्तेजक है. राजेंद्र ,राहुल और राकेश ने उसे रस ले-लेकर पढा है. उन्होंने सबसे पहले इसी विषय पर बोलना बेहतर समझा है.
"जून के गर्म-गर्म महीने में ऐसा गर्म विषय होना ही चाहिए डिस्कस करने के लिए.मैं कहीं गलत तो नहीं कह रहा हूँ?" राजेंद्र के इस कथन से सहमत होता राकेश कहता है- " तुम ठीक कहते हो. ये मैटर, ये सब्जेक्ट हर व्यक्ति को डिस्कस करना चाहिए. लेख आँखें खोलने वाला है . उसमें कोई ऐसी बात नहीं जिससे किसीको एतराज़ हो. सच तो ये है कि इस प्रक्रिया से कौन नहीं गुज़रता है ? मैं हैरान होता हूँ आत्मकथाओं को लिखने वालों पर कि वे किस चतुराई से इस सत्य को छिपा जाते हैं. क्या कोई आत्मकथा लिखने वाला इस प्रक्रिया से नहीं गुज़रता है? अरे,उनसे तो वे लोग सच्चे और ईमानदार हैं जो सरेआम कबूल करते हैं कि वे समलिंगी सम्बन्ध रखते हैं." राकेश अपनी राय को इस ढंग से पेश करता है कि राजेंद्र और राहुल के ठहाकों से आकाश गूँज उठता है. आस-पास के बेंचों पर बैठे हुए लोग उनकी ओर देखने लगते हैं लेकिन राजेंद्र,राहुल और राकेश के ठहाके जारी रहते हैं. ठहाकों में राहुल याद दिलाता है -" तुम दोनो को क्या वो दिन याद है जिस दिन हम तीनों नंगे-धड़ंगे बाथरूम में घुस गये थे. घंटों एक -दूसरे पर पानी भर-भरकर पिचकारियाँ चलाते रहे थे. कभी किसी अंग पर और कभे किसी अंग पर. ऊपर से लेकर नीचे तक कोई हिस्सा नहीं छोड़ा था हमने. कितने बेशर्म हो गये थे हम. क्या-क्या छेड़खानी नहीं की थी हमने उस समय!"
" सब याद है प्यारे राहुल जी . पानी में छेड़खानी का मज़ा ही कुछ और होता है. "राकेश जवाब में रोमांचित होता हुआ राहुल का हाथ चूमकर कहता है.
" मज़ा तो असल में हमें नहाने के बाद आया था , राजेंद्र राकेश से मुखातिब होकर बोलता है," जब तुम्हारी मम्मी ने धनिये और पनीर के परांठे खिलाये थे हमको . क्या लज्ज़तदार परांठे थे ! उनकी सुगंध अब भी मेरे मन में समायी हुई है. याद है कि घर के दस जनों के परांठे हम तीनों ही खा गये थे. सब के सब इसी ताक में बैठे रहे कि कब हम उठें और कब वे खाने के लिए बैठे . बेचारों की हालत देखते ही बनती थी ".
" उनके पेटों में चूहे जो दौड़ रहे थे , भईया ,भूख की मारे मोटे-मोटे चूहे ." राहुल के संवाद में कुछ इस तरह की नाटकीयता थी कि राजेंद्र और राकेश की हँसी के फव्वारे फूट पड़ते हैं. " उस दोपहर हम घोड़े बेचकर क्या सोये थे कि चार बजे के बाद जागे थे . गुल्ली- डंडे का मैच खेलने नहीं जा सके थे हम. अपना- अपना माथा पीटकर रह गये थे." रुआंसा होकर राकेश कहता है " बचपन के दिन भी क्या खूब थे !" घरवालों के चहेते थे हम . पूरी छूट थी हमको . कभी किसी की मार नहीं थी. किसीकी प्रताड़ना नहीं थी. पंछियों की तरह आजाद थे हम ." राजेंद्र की इस बात का प्रतिवाद करता है राहुल- "माना कि आप पर किसी की मार नहीं थी, किसी की प्रताड़ना नहीं थी लेकिन आप दोनो ही जानते हैं कि मेरे चाचा की मुझपर मार भी थी और प्रताड़ना भी. छोटा होने के नाते पिता जी उनको भाई से ज्यादा बेटा मानते हैं और वे पिता जी के प्यार का नाजायज फायदा उठाते हैं. उनके गुस्से का नजला मुझपर ही गिरता है . एक बात मैंने आपको कभी नहीं बताई. आज बताता हूँ.
एक दिन मेरे चाचा ने मुझे इतना पीटा कि मैं अधमरा हो गया. हुआ यूँ कि उन्होंने अपने एक मित्र को एक कौन्फिडेन्शल लेटर भेजा मेरे हाथ. उनके मित्र का दफ्तर घर से दूर था.तपती दोपहर थी. मैं भागा-भागा उनके दफ्तर पहुंचा. मेरे पहुँचने से पहले मेरे चाचा का मित्र किसी काम के सिलसिले में कहीं और जा चुका था. सोच में पड़ गया कि मैं अब क्या करूँ? पत्र वापस ले जाऊं या चाचा के दोस्त के दफ्तर में छोड़ दूं? आखिर मैं पत्र छोड़कर लौट आया".
" फिर क्या हुआ?" राजेंद्र और राकेश ने जिज्ञासा में पूछा.
" फिर वही हुआ जिसकी मुझे आशंका थी. ये जानकार कि मैं कौन्फिडेन्शल लेटर किसी और के हाथ थमा आया हूँ ,चाचा की आँखें लाल-पीली हो गयीं. वे मुझपर बरस पड़े. एक तो कहर की गर्मी थी, उस पर उनकी डंडों की मार . मेरी दुर्गति कर दी उन्होंने. घर में बचाने वाला कोई नहीं था.छोटा भाई खेलने के लिए गया हुआ था.पिता जी काम पर थे और माँ किसी सहेली के घर में गपशप मारने के लिए गयी हुई थीं."
" आह! " राजेंद्र और राकेश की आँखों में आंसू छलक जाते हैं.
"कल की बात सुन लीजिये. आप जानते ही हैं कि मेरे चाचा नास्तिक हैं आजकल वे इसी कोशिश में हैं कि मैं भी किसी तरह नास्तिक बन जाऊं. मुझे समझाने लगे -" भतीजे,मनुष्य का धर्म ईश्वर को पूजना नहीं है. ईश्वर का अस्तित्व है ही कहाँ कि उसको पूजा जाए. पूजना है तो अपने शरीर को पूज. इस हाड़-मांस की देखभाल करेगा तो स्वस्थ रहेगा. स्वस्थ रहेगा तो तू लम्बी उम्र पायेगा. मेरी बात समझे कि नहीं समझे? ले,तुझे एक तपस्वी की आप बीती सुनाता हूँ उसे सुनकर तेरे विचार अवश्य बदलेंगे, मुझे पूरा विश्वास है".
थोड़ी देर के लिए अपनी बात को विश्राम देकर राहुल कहना शुरू करता है- "चाचा ने जबरन मुझे अपने पास बिठाकर तपस्वी की आपबीती सुनायी. वे सुनाने लगे-" भतीजे, एक तपस्वी था. तप करते-करते वो सूखकर कांटा हो गया था. एक राहगीर ने उसे झंझोड़ कर उससे पूछा- प्रभु,आप ये क्या कर रहे हैं?
" तपस्या कर रहा हूँ. आत्मा और परमात्मा को एक करने में लगा हुआ हूँ.". तपस्वी ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया.
" प्रभु, अपने शरीर की ओर तनिक ध्यान दीजिये. देखिये,सूखकर काँटा हो गया है. लगता है कि आप कुछ दिनों के ही महमान हैं इस संसार के. ईश्वर का तप करना छोड़िये और अपने शरीर की देखभाल कीजिये."
तपस्वी ने अपने शरीर को देखा. वाकई उसका हृष्ट-पुष्ट शरीर सूखकर काँटा हो गया था. उसने तप करना छोड़ दिया. वो जान गया कि ईश्वर होता उसका शरीर यूँ दुबला-पतला नहीं होता, हृष्ट-पुष्ट ही रहता. भतीजे, इंसान समेत धरती पर जितनी जातियाँ हैं ,चाहे वो मनुष्य जाति हो या पशु जाति ,किसी की भी उत्पत्ति ईश्वर ने नहीं की है. हरेक की उत्पत्ति कुदरती तरीकों से ही मुमकिन हुई है. हमारा रूप ,हमारा आकार और हमारा शरीर सब कुछ कुदरत की देन है,ईश्वर की नहीं."
" सभी नास्तिक ऐसे ही उल्टी-सीधी बातें करके औरों को नास्तिक बनाते हैं," राजेंद्र बोल पड़ता है, " तुम्हारे चाचा ने फिर कभी ईश्वर के प्रति तुम्हारी आस्था को ठेस पहुंचाने की कोशिश की तो उन्हें ये प्रसंग जरूर सुनाना- " चाचा,आप जैसा ही एक नास्तिक था. ईश्वर है कि नहीं ,ये जांच करने के लिए वो जंगल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया, भूखा ही. ये सोचकर कि अगर ईश्वर है तो वो अवश्य ही उसकी भूख मिटाने को आएगा. नास्तिक देर तक भूखा बैठा रहा. उसे रोटी खिलाने के लिए ईश्वर नहीं आया. उसने सोचा कि वो आयेगा भी कैसे?उ सका अस्तित्व हो तब न? अचानक नास्तिक ने देखा कि डाकुओं का एक गिरोह उसके पेड़ के नीचे आकर लूट का मालवाल आपस में बांटने लगा है.मालवाल बाँट लेने के बाद डाकुओं को भूख लगी,जोर की. कोई राहगीर अन्न की पोटली भूल से पेड़ के नीचे छोड़ गया था. उनकी नज़रें पोटली पर पड़ीं.पोटली में भोजन था. उनके चेहरों पर खुशियों की लहर दौड़ गयी. वे भोजन पर टूट पड़े. अनायास एक डाकू चिल्ला उठा-" ठहरो,ये भोजन हमें नहीं खाना चाहिए. मुमकिन है कि इसमें विष मिला हो और हमारी हत्या करने को किसीने साजिश रची हो. अपने साथी की बात सुनकर अन्य डाकुओं में भी शंका जाग उठी. सभी इधर-उधर और ऊपर-नीचे देखने लगे..एक डाकू को पेड़ की घनी डाली पर बैठा एक व्यक्ति नज़र आया. वो चिल्ला उठा-" देखो,देखो,वो इंसान छिप कर बैठा है. सभी डाकुओं की नज़र ऊपर उठ गयीं. सभीको एक घनी डाली पर बैठा एक व्यक्ति दिखाई दिया. सभी का शक विश्वास में तब्दील हो गया कि यही धूर्त है कि जिसने भोजन में विष मिलाया है. सभी शेर की तरह गर्जन कर उठे-" कौन है तू? ऊपर बैठा क्या कर रहा है?"
" मैं नास्तिक हूँ . यहाँ बैठकर मैं ईश्वर के होने न होने की जांच कर रहा हूँ, भूखा रहकर. मैं ये देखना चाहता हूँ कि अगर संसार में ईश्वर है तो वो मुझ भूखे को कुछ न कुछ खिलाने के लिए अवश्य आयेगा यहाँ."
नास्तिक ने सच -सच कहा लेकिन डाकू उसका विश्वास कैसे कर लेते ? वे चिल्लाने लगे-" झूठे,पाखंडी और धूर्त. नीचे उतर ."
नास्तिक नीचे उतरा ही था कि उसकी शामत आ गयी.तमाचे पर तमाचा उसके गालों पर पड़ना शुरू हो गया. एक डाकू अपनी दायीं भुजा में उसकी गर्दन दबाकर उसे आतंकित करते हुए पूछने लगा-" बता,ये पोटली किसकी है? तू किसका जासूस है? किसने तुझे हमारी ह्त्या करने के लिए भेजा है?"
" ये मेरी पोटली नहीं है." नास्तिक गिड़ गिड़ाया. मेरा विश्वास कीजिये कि मैं किसीका जासूस नहीं हूँ . मैं आप सबके पाँव पड़ता हूँ . मैं निर्दोष हूँ. मुझपर दया कीजिये. मुझे छोड़ दीजिये ."
अगर ये भोजन तेरा नहीं है और तूने इसमें विष नहीं मिलाया है तो पहले तू इसे खायेगा..ले खा. " एक डाकू ने एक रोटी उसके मुँह में ठूंस दी.पलक झपकते ही नास्तिक अजगर की तरह उसे निगल गया. डाकुओं से छुटकारा पाकर नास्तिक भागकर सीधा मंदिर में गया. ईश्वर की मूर्ति के आगे नाक रगड़ कर दीनता भरे स्वर में बोला -" हे भगवन ,तेरी महिमा अपरम्पार है.तूने मेरी आँखों पर पड़े नास्तिकता के परदे को हटा दिया है. मेरी तौबा ,फिर कभी तेरी परीक्षा नहीं लूँगा."
" लेकिन राजेंद्र,ईश्वर के अस्तित्वहीन होने के बारे में मेरे चाचा की एक और दलील है. वो ये कि इस ब्रह्माण्ड का रचयिता अगर ईश्वर है तो उसका भी रचयिता कोई होगा. वो कौन है? वो दिखाई क्यों नहीं देता है?" राहुल ने गंभीरता में कहा .
" तुम अपने चाचा की ये बात रहने दो कि अगर ईश्वर है तो उसका भी रचयिता कोई होगा. शंका का कई शंकाओं को जन्म देती है. सीधी सी बात है कि धरती ,आकाश,बादल ,नदी,पहाड़.सागर,सूरज,चाँद,सितारे,पंछी,जानवर इतना सब कुछ किसी इंसान की उपज तो है नहीं. किसी अलौकिक शक्ति की उपज है. उस अलौकिक शक्ति का नाम ही ईश्वर है. रही बात कि वो दिखाई क्यों नहीं देता तो हवा और गंध भी दिखाई कहाँ देते हैं.? उनके अस्तित्व को नास्तिक क्यों नहीं नकारते हैं ? अरे भाई, इस संसार में कोई नास्तिक-वास्तिक नहीं है. संकट आने पर नास्तिक भी ईश्वर के नाम की माला अपने हाथ में ले लेता है . वो भी उसके रंग में रंगने लगता है. दोस्तो, ईश्वर के रंग में रंगने से मुझे याद आया है कि कल रात को मैं सपने में उसके रंग में रंग गया. सच्ची." " तुम उसके रंग में रंग गये? कैसे ? " राहुल और राकेश कौतूहल व्यक्त करते हैं.
" कल रात को मुझको सपना आया . मैंने देखा कि मेरे चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश था . वो प्रकाश था ईश्वर के रंग-रूप का. वाह,क्या रंग-रूप था ! गोरा -चिट्टा .मेरे जैसा ." बताते-बताते राजेंद्र के मुख पर मुस्कान फैल जाती है.
" गोरा-चिट्टा ,तुम्हारे जैसा ? राहुल प्रतिवाद करता है.
" सच कहता हूँ. ईश्वर रंग-रूप बिलकुल मेरे जैसा है. "
" अरे भाई, उसका रंग गोरा-चिट्टा नहीं है , भूरा है, मेरे जैसा..मेरे सपने में तो ईश्वर कई बार आ चुका है. मैंने हमेशा उसको भूरा देखा है. "
" तुम मान क्यों नहीं लेते कि वो गोरा-चिट्टा है.?"
" तुम भी क्यों नहीं मान लेते कि वो भूरा है?"
" गोरे-चिट्टे को भूरा कैसे मान लूं मैं ?"
" गलत. बिलकुल गलत. तुम दोनो ही गलत कहते हो." राकेश जो अब तक खामोश बैठा राजेंद्र और राहुल की बातें सुन रहा था भावावेश में आकर बोल उठता है ," तुम दोनो की बातों में रंगभेद की बू आ रही है. तुम मेरे रंग को तो खारिज ही कर रहे हो . मेरी बात भी सुनो. न तो वो गोरा है और न ही भूरा. वो तो काला है ,काला. बिलकुल मेरे रंग जैसा. मैं भी सपने में ईश्वर को कई बार देख चुका हूँ. अलबत्ता रोज ही उसको देखता हूँ . क्या तुम दोनों के पास उसके गोरे या भूरे होने का कोई प्रमाण है? नहीं है न? मेरे पास प्रमाण है उसके काले होने का . भगवान् कृष्ण काले थे. अगर ईश्वर गोरा या भूरा है तो तो कृष्ण को भी गोरा या भूरा होना चाहिए था. राकेश के बीच में पड़ने से मामला गरमा जाता है. तीनों की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है. अपनी-अपनी बात पर तीनों अड़ जाते हैं. कोई तस से मस नहीं होता है. राजेंद्र राहुल का कंधा झकझोर कर कहता है- तुम गलत कहते हो " और राकेश दोनों के कंधे झकझोर कर कहता है- " तुम दोनो ही गलत कहते हो ."
ईश्वर का कोई रंग हो या ना हो लेकिन होनी अपना रंग दिखाना शुरू कर देती है. विनाश काले विपरीत बुद्धि . अज्ञान ज्ञान पर हावी हो जाता है. जोश का अजगर होश की मछली निगलने लगता है. राहुल ,राजेंद्र और राकेश की रक्त वाहिनियों में उबाल आ जाता है.देखते ही देखते तीनों का वाक् युद्ध हाथापाई में तब्दील हो जाता है. हाथापाई घूंसों में बदल जाती है. घूसों बरसने की भयानक गर्जना सुनकर आसपास के पेड़ों पर अभी-अभी लौटे परिंदे आतंकित होकर इधर-उधर उड़ जाते हैं. परिंदे तो उड़ जाते हैं लेकिन तमाशबीन ना जाने कहाँ-कहाँ से आकर इकठ्ठा हो जाते हैं . तमाशबीन राजेंद्र, राहुल और राकेश की ओर से बरसते घूसों का आनंद यूँ लेने लगते हैं जैसे मुर्गों की जंग हो. कई तमाशबीन तो आग में घी का काम करते हैं. अपने-अपने रंग के अनुरूप वे ईश्वर का रंग घोषित करके तीनों को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं. शुक्र हो कुछ शरीफ लोगों का. उनके बीच में पड़ने से राजेंद्र ,राहुल और राकेश में युद्ध थमता है. तीनों ही लहूलुहान हैं. क्योंकि तीनों ही दोस्ती के लिए खून बहाने का कलेजा रखते हैं. लंगोटिए यार जो हैं .
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प्राण शर्मा का जन्म १३ जून १९३७ को वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में. पंजाब विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी). १९५५ से लेखन . फिल्मी गीत गाते-गाते गीत , कविताएं और ग़ज़ले कहनी शुरू कीं.१९६५ से ब्रिटेन में.१९६१ में भाषा विभाग, पटियाला द्वारा आयोजित टैगोर निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार. १९८२ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार. १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स, लेस्टर द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार.लेख - 'हिन्दी गज़ल बनाम उर्दू गज़ल" पुरवाई पत्रिका और अभिव्यक्ति वेबसाइट पर काफी सराहा गया. शीघ्र यह लेख पुस्तकाकार रूप में प्रकाश्य.२००६ में हिन्दी समिति, लन्दन द्वारा सम्मानित."गज़ल कहता हूं' और 'सुराही' - दो काव्य संग्रह प्रकाशित.Coventry CVESEB, UK3, Crakston Close, Stoke Hill Estate,E-mail : pransharma@talktalk.net

कविताएं


अतीत
याद किसी की गीत बन गई!
कितना अलबेला सा लगता था, मुझे तुम्‍हारा हर सपना,
साकार बनाने से पहले , क्यों फेरा प्रयेसी मुख अपना,
तुम थी कितनी दूर और मैं, नगरी के उस पार खड़ा था,
अरुण कपोलों पर काली सी, दो अलकों का जाल पड़ा था,
अब तुम ही अनचाहे मन से अंतर का संगीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!
उस दिन हंसता चांद और तुम झांक रही छत से
मदमातीआंख मिचौनी सी करती थीं लट संभालती नयन घुमाती
कसे हुए अंगों में झीने पट का बंधन भार हो उठा
और तुम्‍हारी पायल से मुखरित मेरा संसार हो उठा
सचमुच वह चितवन तो मेरे अंतर्तम का मीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!
तुम ने जो कुछ दिया आज वह मेरा पंथ प्रवाह बना है
आज थके नयनों में पिघला आंसू मन की दाह बना है
अब न शलभ की पुलक प्रतीक्षा और न जलने की अभिलाषा
सांसों के बोझिल बंधन में बंधी अधूरी सी परिभाषा
लेकिन यह तारों की तड़पन धड़कन की चिर प्रीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!
जाने अजाने
गीत तो गाये बहुत जाने अजाने
स्वर तुम्‍हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने !
उड़ गये कुछ बोल जो मेरे हवा में,
स्‍यात् उनकी कुछ भनक तुम को लगी हो
स्‍वप्‍न की निशि होलिका में रंग घोले,
स्‍यात्‌ तेरी नींद की चूनर रंगी हो
भेज दी मैंने तुम्‍हें लिख ज्‍योति पाती,
सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने ।

जाने अजाने

गीत तो गाये बहुत जाने अजाने

स्‍वर तुम्‍हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने !

उड़ गये कुछ बोल जो मेरे हवा में,

स्‍यात् उनकी कुछ भनक तुम को लगी हो

स्वप्न की निशि होलिका में रंग घोले,

स्‍यात्‌ तेरी नींद की चूनर रंगी हो

भेज दी मैंने तुम्‍हें लिख ज्‍योति पाती,

सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने ।

यह शरद का चांद सपना देखता है,

आज किस बिछड़ी हुई मुमताज़ का यों

गुम्बदों में गूंजती प्रतिध्‍वनि उड़ाती,

आज हर आवाज़ का उपहास यह क्‍यों ?

संगमरमर पर चरण ये चांदनी के,

बुन रहे किस रूप की सम्‍मोहिनी के आज ताने ।

छू गुलाबी रात का शीतल सुखद तन,

आज मौसम ने सभी आदत बदल दी ओस

ओस कण से दूब की गीली बरौनी,

छोड़ कर अब रिम झिमें किस ओर चल दीं

किस सुलगती प्राण धरती पर नयन के,

यह सजलतम मेघ बरबस बन गये हैं अब विराने ।

प्रात की किरणें कमल के लोचनों में,

और शशि धुंधला रहा जलते दिये में

रात का जादू गिरा जाता इसी से,

एक अन‍जानी कसक जगती हिये में

टूटते टकरा सपन के गृह - उपगृह,

जब कि आकर्षण हुए हैं सौर - मण्‍डल के पुराने ।

स्‍वर तुम्‍हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने !!

नयनों से कितने ही जलकण…

कवि हृदय विकल जब होता है तो भाव उमड़ ही आते हैं

नयनों से कितने ही जलकण कविता बन कर बह जाते हैं

आते बसंत को जब देखा, हो विकसित कवि का मन बोला

आई उपवन में हरियाली, सुमनों ने दृग अंचल खोला

मुस्का कर देखा ऊपर को, जहां अंशुमालि थे घूम रहे

अपनी आल्हादित किरणों से सुमनों को मुख से चूम रहे

मधुमास में उनकी किरणों से पल्लव शृंगार बनाते हैं

नयनों से कितने ही जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

हो कर ओझल क्षण भर में ही, स्वप्नों का खंडन कर डाला

क्षण भर को ही क्यों आई थी, बोलो मधु बासंती बाला

अब नयनों में ले भाव सजल अधरों पर ले कम्पित वाणी

क्या हुआ तुम्हारे यौवन को पतझड़ में बोलो कल्याणी

कवि की वीणा के सुप्त तार बस वीत राग अब गाते हैं

नयनों से कितने ही जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

महावीर शर्मा

जन्मः १९३३ , दिल्ली, भारतनिवास-स्थानः लन्दनशिक्षाः एम.ए. पंजाब विश्वविद्यालय, भारतलन्दन विश्वविद्यालय तथा ब्राइटन विश्वविद्यालय में गणित, ऑडियो विज़ुअल एड्स तथा स्टटिस्टिक्स ।
उर्दू का भी अध्ययन।
कार्य-क्षेत्रः १९६२ – १९६४ तक स्व: श्री उच्छ्रंगराय नवल शंकर ढेबर भाई जी के प्रधानत्व में भारतीय घुमन्तूजन (Nomadic Tribes) सेवक संघ के अन्तर्गत राजस्थान रीजनल ऑर्गनाइज़र के रूप में कार्य किया । १९६५ में इंग्लैण्ड के लिये प्रस्थान । १९८२ तक भारत, इंग्लैण्ड तथा नाइजीरिया में अध्यापन । अनेक एशियन संस्थाओं से संपर्क रहा । तीन वर्षों तक एशियन वेलफेयर एसोशियेशन के जनरल सेक्रेटरी के पद पर सेवा करता रहा । १९९२ में स्वैच्छिक पद से निवृत्ति के पश्चात लन्दन में ही मेरा स्थाई निवास स्थान है।१९६० से १९६४ की अवधि में महावीर यात्रिक के नाम से कुछ हिन्दी और उर्दू की मासिक तथा साप्ताहिक पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियां और लेख प्रकाशित होते रहे । १९६१ तक रंग-मंच से भी जुड़ा रहा ।दिल्ली से प्रकाशित हिंदी पत्रिकाओं “कादम्बिनी”,”सरिता”, “गृहशोभा”, “पुरवाई”(यू. के.), “हिन्दी चेतना” (अमेरिका), “पुष्पक”, तथा “इन्द्र दर्शन”(इंदौर), “कलायन”, “गर्भनाल”, “काव्यालय”, “निरंतर”,”अभिव्यक्ति”, “अनुभूति”, “साहित्यकुञ्ज”, “महावीर”, “मंथन”, “अनुभूति कलश”,”अनुगूँज”, “नई सुबह”, “ई-बज़्म” आदि अनेक जालघरों में हिन्दी और उर्दू भाषा में कविताएं ,कहानियां और लेख प्रकाशित होते रहते हैं। इंग्लैण्ड में आने के पश्चात साहित्य से जुड़ी हुई कड़ी टूट गई थी, अब उस कड़ी को जोड़ने का प्रयास कर रहा हूं।
दो ब्लॉग:'मंथन'
http://mahavir.wordpress.com/
'महावीर'
http://mahavirsharma.blogspot.com/

संस्मरण

यास्नाया पोल्याना में तोल्स्तोय के साथ एक दिन

आई.आई. मेक्नीकोव
(मेक्नोकोव, इल्या इल्यिच (१८४५-१९१६) : प्रतिष्ठित रूसी प्राणी-विज्ञानी और जीवाणु विज्ञानी और पेरिस में पास्तर इंस्टीट्यूट के निदेशक थे )

अनुवाद : रूपसिंह चन्देल

१९०९ की वसंत की एक भोर, मैं अपनी पत्नी के साथ यास्नाया पोल्याना पहुंचा था. जैसे ही हम जमींदार के एक पुराने और कुछ-कुछ उपेक्षित घर के हॉल में दाखिल हुए, मैंने सफेद कुर्ते में, जिसे बेल्ट से बांधा गया था, तोल्स्तोय को सीढ़ियों से नीचे आते देखा. उनकी भेदक आंखें मुझ पर जमी हुई थीं और आते ही उन्होंने सबसे पहली जो बात कही वह यह कि उन्होंने मेरी जो तस्वीर देखी थी मैं उसके सदृश नहीं था. स्वागत में कुछ शब्द कहने के बाद अपने बच्चों के साथ हमें छोड़कर वह काम करने के लिए ऊपर चले गये, जैसा कि उनकी आदत थी. लंच के समय अच्छी मनः स्थिति में वह नीचे आये और अनेक विषयों पर प्रसन्नतापूर्वक बातचीत की. उन्होंने अपने लिए विशेषरूप से तैयार किया गया भोजन किया : अण्डा, दूध और शाकाहारी चीजें. लंच के बाद उन्होंने थोड़ी-सी सफेद शराब पानी मिलाकर ली.

डायनिगं मेज पर वह सकारण महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा से बच रहे थे, और उन पर तब बात करना चाहते थे जब हम दोनों अकेले हों. अकेले होने का अवसर लंच के बाद मिला, जब वह चेर्त्कोव से मिलने गये, जो बगल की जागीर में रहते थे और एक घोड़ा गाड़ी में वह मुझे भी साथ लेते गये जिसे वह स्वयं हांक रहे थे. मुश्किल से हम गेट से बाहर निकले थे कि उन्होंने बोलना प्रारंभ कर दिया और मेरा अनुमान था कि उसे उन्होंने पहले से ही अपने दिमाग में तैयार कर रखा था :

मेक्नीकोव के साथ तोल्स्तोय ( मई १९०९ )

"मुझे इस बात के लिए गलत दोषी ठहराया जाता है कि मैं विज्ञान और धर्म विरोधी हूं." उन्होंने कहना प्रारम्भ किया, "दोनों दोषारोपण अनुचित हैं. इसके विपरीत, मैं गहरी आस्था वाला व्यक्ति हूं, लेकिन चर्च जिस रूप में धर्म को विकृत करते हैं, मैं उसके विरुद्ध हूं. यही बात विज्ञान के संबन्ध में सत्य है, जिसका गहरा संबन्ध मानव की खुशी और भवितव्यता से है , लेकिन मैं भ्रांतिजनक विज्ञान का शत्रु हूं जो यह कल्पना करता है कि उसने शनि और उसी प्रकार के अन्य चीजो के वजन का अन्वेषण कर ज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण और उपयोगी योगदान किया है."

उनकी बात समाप्त होने के बाद मैंने कहा कि जिन समस्याओं को वह अत्यावश्यक समझते हैं विज्ञान उनकी अवहेलना नहीं कर सकता. बल्कि इसके विपरीत, वह उसे सुलझाने का प्रयास करता है. कुछ शब्दों में उन्हें मैंने अपना दृढ़ विश्वास प्रस्तुत किया, जो इस प्रकार था, कि मनुष्य एक जानवर है जिसे बहुत अधिक दुख देने वाली कुछ संघटनात्मक विशेषताएं वंशानुक्रम में प्राप्त हुई हैं. यही कमियां उसके संक्षिप्त जीवन और मृत्युभय का कारण हैं. विज्ञान की उपलब्धियों ने मनुष्य के लिए यह संभव बना दिया है कि वह विवेकपूर्ण ढंग अपना कर अपना संपूर्ण जीवन जी ले. ऎसी स्थिति में बीमारी, वृद्धावस्था, मृत्यु और उनसे संबद्ध अन्य मामलों की चिन्ता उसे नहीं रहेगी और मनुष्य अपने को पूरी तरह और शांति-पूर्वक कला और विशुद्ध विज्ञान को समर्पित कर सकता है.

ध्यानपूर्वक मेरी बातें सुनने के बाद तोल्स्तोय ने टिप्पणी की कि आगे चलकर हमारे विचार समान होंगे, लेकिन वह आध्यात्मवाद पर कायम रहे, जबकि मैं भौतिकवाद पर. उस समय तक हम चेर्त्कोव के यहां पहुंच गये थे और हमारी बातचीत दूसरी ओर मुड़ गयी थी. भले ही हमारी बातचीत के विषय कुछ भी क्यों न थे, लेकिन एक बात स्पष्ट थी कि हम सामान्य समस्याओं पर चर्चा करने के लिए उत्कंठित थे. इस संबन्ध में अनेकों प्रयास के बाद तोल्स्तोय ने मानवीय अन्याय के विषय में बोलना प्रारंभ कर दिया, कि यह कितना असह्य है कि एक नौकर अपने मालिक के लिए मेज पर अत्यधिक भोजन सामग्री परोसता है और खुद उसके जूठन से अपना पेट भरता है.

जब बातचीत ऎसे विषय की ओर मुड़ गयी तब अधिक नहीं चली. चेर्त्कोव परिवार के सभी सदस्य पूरी तरह से शाकाहारी थे और वे और तोल्स्तोय अपने एक प्रिय विषय पर उत्सुकतापूर्वक चर्चा करने लगे. लेव निकोलायेविच बहुत ही सजीवता के साथ उस विषय की व्याख्या कर रहे थे.

बातचीत में हिस्सा लेते हुए मैंने कहा कि यद्यपि मैंने अपने जीवन में कभी एक भी गोली नहीं दागी और न ही कभी किसी जानवर का शिकार किया, फिर भी शिकार करने में मुझे कुछ भी गलत नहीं प्रतीत होता. जानवरों को विरले ही अपनी पूरी जिन्दगी जीने का अवसर प्राप्त होता है. उनकी मृत्यु प्रायः हिंसा द्वारा ही होती है जैसे ही वे बड़े होने लगते हैं वे दूसरे जानवरों का शिकार बन जाते हैं. दूसरे जानवरों द्वारा अथवा भिन्न प्रकार के परजीवियों द्वारा मार दिया जाना किसी शिकरी की गोली द्वारा मारे जाने की अपेक्षा अधिक दर्दनाक होता है. यदि शिकार पर रोक लगा दी जाये तो शिकारी जानवरों की संख्या में वृद्धि हो जायेगी और यह मनुष्यों के लिए ही हानिकर होगा.

"मान लो " तोल्स्तोय ने प्रतिरोध किया, "यदि हम सभी चीजों को भावशून्य तर्कों से जांचेगें तो हम बेतुके निष्कर्ष पायेंगे. इस कारण हम नरभक्षण में औचित्य पायेगें."

इसके उत्तर में जब मैंने कहा कि मध्य अफ्रीकी देश कांगो में, नीग्रो आदिवासी अपने युद्ध बंदियों को खाते हैं, और विस्तार में बताया कि वे ऎसा कैसे करते हैं. तोल्स्तोय बहुत अधिक उत्तेजित हो उठे और मुझसे पूछा कि उन नीग्रों लोगों की कोई धार्मिक धारणा है ? वे पुरखों की उपासना को मानते हैं.उनका धर्म अन्य बर्बर आदिवासियों के समान है और कांगों के आदिवासियों का नरभक्षण बिलकुल अनैतिक और बुरा नहीं माना जाता. उन आदिवासियों की अपेक्षा जो अपने साथियों को नहीं खाते. मध्य अफ्रीका के बारे में अन्वेषकों का दावे के साथ कहना है कि नरभक्षण त्सेत्से (नगाना (Nagana ) , का परिणाम है, यह एक ऎसी बीमारी है जो उस क्षेत्र में दूर-दूर तक फैली हुई है और जानवरों के लिए यह इतनी खतरनाक है कि इसने जानवरों की अभिवृद्धि असंभव बना दिया है . इसीलिए आहार में मांस की मूलप्रवृत्तिक मांग के कारण नीग्रो लोग अपनी ही जाति के भक्षण का सहारा लेते हैं.

इस विषय में तोल्स्तोय ने इतनी अधिक दिलचस्पी ली कि उन्होंने मुझे उसका विस्तृत विवरण भेजने के लिए कहा. विदा होते समय उन्होंने मेरी पत्नी को सामग्री भेजने के लिए मुझे याद दिला देने के लिए कहा था.

पेरिस लौटने के तुरंत बाद प्रांसीसी अन्वेषकों द्वारा कांगों के विषय में लिखे गये अनेकों आलेख मैंने उन्हे भेजे थे.

लेव निकोलायेविच घोड़े पर यास्नाया पोल्याना लौटे. वह आसानी से घोड़े पर सवार हुए और एक नौजवान की भांति उन्होंने घोड़ा दौड़ा दिया था. यह ऎसा था जैसे वह बीस वर्ष के नौजवान हो गये थे.

जब वह और मैं उनकी स्टडी की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, निर्निमेष मेरी ओर देखते हुए उन्होंने कहा :

"मुझे बताओं किस कारण से तुम्हारा आना हुआ ?"

प्रश्न से जरा-सा पीछे जाते हुए मैंने कहा विज्ञान को लेकर उनकी जो आपत्ति थी उसे स्पष्ट करने और उनके साहित्य के प्रति मेरी जो गहन श्रद्धा है उसे व्यक्त करने के लिए , जो उनके दार्शनिक विषयक कार्य की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ है. मैंने उन्हें अनेकों उदाहरण दिए जहां कला ने जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डाला था.

"चूंकि तुम मेरे साहित्य के विषय में इतनी उच्च भावना रखते हो इसलिए मैं तुम्हे बताऊंगा कि इन दिनों मैं रूस की हाल की क्रान्तिकारी गतिविधियों के विषय में एक उपन्यास पर कार्य कर रहा हूं, लेकिन मैं अनुरोध करता हूं कि इस विषय में किसी को भी नहीं बताना. मुझे डर है कि यह फॉस्ट (Faust) के दूसरे भाग की भांति कुछ कमजोर बन सकता है. जब मैंने कहा कि गोएथ के वृद्धावस्था के इस कार्य में मुझे कलात्मक सौन्दर्य प्राप्त हुआ था, तोल्स्तोय ने संदेह व्यक्त करते हुए कहा कि बहुत से अनावश्यक दृश्यों में सुन्दरता हो सकती थी. तब मैंने उन्हें कहा कि , मेरे विचार में, गोएथ (Goethe) ने इस भाग में एक वृद्ध व्यक्ति के प्रेमासक्ति की अपनी त्रासदी को चित्रित करना चाहा था. लेकिन हास्यास्पद होने के भय से , अपने विषय को असंख्य अवगुंठनों से ढक दिया और बहुत अधिक दृश्य जोड़ दिए जो वास्तव में अनावश्यक थे, और पाठक को उसके संपूर्ण एकीकृत प्रभाव को प्राप्त करने से दूर रखा. तोल्स्तोय को मेरा विचार दिलचस्प प्रतीत हुआ और बोले कि उनके आखिरी दिनों के समय के रचनात्मक साहित्य में दैहिक प्रेम ने कोई भूमिका अदा नहीं की लेकिन फिर भी वह फॉस्ट (Faust) को निश्चय ही पुनः पढ़ना चाहेंगे. मैंने वायदा किया कि मैं अपनी पुस्तक ’Essais optimistes उन्हें भेज दूंगा., जिसमें फॉस्ट के विषय में मेरे विस्तृत विचार दिए गये है.....’

जब हम, शाम बहुत देर बाद अलग हो रहे थे, लेव निकोलायेविच ने बहुत ही मित्र-भाव से ’गुडबाई’ कहा और घोषणा की कि वह प्रसन्नतापूर्व्क सौ वर्षों तक जीवित रहेंगे और यदि ऎसा हुआ तो वह किसी न किसी रूप में मुझे अनुग्रहीत करेंगे. अभी हम गाड़ी में चढ़े ही थे कि वह बालकनी में प्रकट हुए और हाथ हिलाकर उन्होंने ’शुभ यात्रा’ की कामना की थी.
*********

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

वातायन - अक्टूबर २००९



हम और हमारा समय

फलते नेता - मरता किसान

रूपसिंह चंदेल

पिछले दिनों निजी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के वेतनमानों को लेकर सरकार की चिन्ता उभरकर सामने आई. कंपनी मामलों के मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने उनके भारी-भरकम वेतनमानों पर चिन्ता प्रकट की . सरकारी हलकों में बहुत दिनों से इस विषय पर मरमराहट थी और इसीलिए खुर्शीद साहब की टिप्पणी को सरकार का दृष्टिकोण माना गया . योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने अपनी राय प्रकट करते हुए मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के लिए सरकारी सुझावों की बात कही . मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के वेतनमानों का इस परिप्रेक्ष्य में गहराई से विश्लेषण किया जा सकता है कि जिन मंत्रियों के कंधों पर देश का बोझ है उन्हें एक सांसद के बराबर वार्षिक वेतन मिलता है जो किसी क्लर्क से अधिक नहीं है . अन्य सुविधाओं को यदि जोड़ा जाए तब यह ग्यारह लाख प्रति माह के लगभग बैठता है. लेकिन इतनी बड़ी जिम्मेदारी ढोनेवाले मंत्री जी का वेतन और सुविधा किसी छोटी कंपनी के मुख्यकार्यकारी अधिकारी से अधिक नहीं बैठता . कहां देश की जिम्मेदारी से हलाकान मंत्री और कहां एक या कुछ कंपनियों का मुख्य कार्यकारी अधिकारी . उसके सामने मंत्री जी का वेतन और सुविधाएं चुटकीभर . इस असुन्तुलन पर सरकार का चिन्तित होना लाजिमी है . उदाहरण के लिए देश के कुछ मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के वेतन की चर्चा आवश्यक है . मुकेश अंबानी ने 2008-09 में बावन करोड़ रुपए के लगभग वेतन और भत्ता प्राप्त किया जबकि 2007-08 में यह राशि 44.02 करोड़ थी . इसी दौरान उनके अनुज अनिल अंबानी को 30.02 करोड़ और भारती एयरटेल के सुनील मित्तल को 22.89 करोड़ मिले थे.

सरकार की चिन्ता मुझ जैसे साहित्यकार को भी चिन्तित करती है और सोचने के लिए विवश करती है कि इतने कम वेतन और सुविधा में एक मंत्री या सांसद अपना गुजर बसर कैसे करता होगा . इस समाचार ने मुझे बहुत छकाया . मैंने कुछ जानकारियां उपलब्ध कीं . अर्थ विशेषज्ञ नहीं हूं इसलिए कुछ चूक भी संभव है .

उपलब्ध जानिकारियों से ज्ञात हुआ कि मंत्री जी का वेतन भले ही ऊंट के मुह में जीरा हो लेकिन उन्हें प्राप्त अन्य सुविधाएं ( जो कि आवश्यक भी हैं ) भारी से भारी वेतन पाने वाले मुख्य कार्यकारी अधिकारी से कई गुना अधिक हैं . केंन्द्र के मंत्री जिन बंगलों में रहते हैं उनके किराए का बाजार मूल्य साठ-सत्तर लाख रुपए प्रति माह है . इसके अतिरिक्त निजी स्टॉफ , सेक्योरिटी , गाडि़यां , पेट्रोल , मुफ्त हवाई यात्राएं आदि.....इत्यादि--- यह सब उन्हें बिना किसी जवाबदेही के उपलब्ध होता है . देश की आर्थिक स्थिति ध्वस्त हो रही है , बाढ़ , सूखा , आतंक ... अर्थात् कहीं कुछ भी होता रहे , न उनकी सुविधाएं कम होती हैं और न उनकी कुर्सी डगमगाती है . उनका पद पांच वर्ष के लिए सुरक्षित रहता है . लेकिन एक कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ ऐसा नहीं होता . वह न केवल कंपनी के शेयर होल्डर्स के प्रति , बल्कि अपने कर्मचारियों और बाजार के प्रति भी जवाबदेह होता है . हमने देखा कि आर्थिक मंदी के कारण दिवालिया हुई कितनी ही कंपनियों -बैंकों के मुख्य-कार्यकारी अधिकारियों को अपने पद से हाथ धोना पड़ा . लेकिन जिस जनता के वोटों से जीतकर एक सांसद मंत्री बनता है , उसके प्रति वह कितनी जिम्मेदारी अनुभव करता है ? उसे उसकी सुध पांच वर्ष बाद ही आती है और तब तक उसके क्षेत्र के कितने ही किसान - मजदूर अपनी परेशानियों के चलते आत्म-हत्याएं कर चुके होते हैं . उसके क्षेत्र का किसान भुखमरी की कगार पर पहुंच रहा होता है ---सरकारी कुनीतियों के कारण दस बीघे खेतों का स्वामी पांच वर्षों में खेत गंवा मजदूर बन चुका होता है जबकि मंत्री जी का बैंक बैंलेंस कई गुना बढ़ चुका होता है . मंत्री ही क्यों सांसदों और विधायकों का भी .

पिछले दिनों एक अन्य समाचार ने भी चैंकाया . समाचार पांच वर्षों में हरियाणा के विधायकों के खातों में पांच करोड़ रुपए जुड़ने का था . कहां से आया यह धन ? और यह वह राशि है जो पत्रकारों की जानकारी में आई . अज्ञात कितनी होगी ? और हरियाणा ही क्यों --- कौन -सा प्रदेश इससे अछूता है ? लूटने के ढंग अलग हो सकत हैं --- लेकिन लुट जनता ही रही होती है .

उत्तर प्रदेश अब ‘बुत प्रदेश’ बनने जा रहा है . जनता की गाढ़ी कमाई के छब्बीस सौ करोड़ रुपए--- और बुत भी उनके नहीं जिनकी कुर्बानियों की बदौलत हम आज स्वतंत्र देश में सांस ले रहे हैं . देश की आजादी के लिए नाना साहब , अजीमुल्ला खां , अजीजन , शमसुद्दीन , तात्यां टोपे , अहमदुल्लाशाह , बेगम हजरत महल , वाजिदअलीशाह , लक्ष्मी बाई आदि ने आजादी के लिए 1857 में प्रथम भारतीय क्रांति की अलख जगाई थी , लेकिन कितनों के बुत लगाए गए ? कानपुर के पास बिठूर में नाना साहब के महल की मात्र एक बची ध्वस्त दीवार ढहने के लिए तैयार है , उसका संरक्षण तक नहीं . जनरल हैवलॉक ने बर्बरता का परिचय देते हुए नाना के महल को जमींदोज करवाकर वहां हल चलवा दिया था . वहां नाना , तांत्या और अजीमुल्ला के स्मारक नहीं बनने चाहिए ? कानपुर में ही गणेश शंकर विद्यार्थी , हलधर बाजपेई आदि की कितनी बुतें लगाई उत्तर प्रदेश सरकार ने ? चन्द्रशेखर आजाद , रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाकउल्ला खां , राजेन्द्र लाहिड़ी --- कितने ही क्रान्तिकारी हैं -- कितनों के स्मारक हैं ? इसे राजनैतिक कृतघ्नता ही कहना होगा --- .

सरकार को निजी कंपनियों के मुख्यकार्यकारी अधिकारियों के वेतनमानों और भत्तों की चिन्ता करने की अपेक्षा राजनैतिक भ्रष्टाचार और कदाचार की चिन्ता करने की आवश्यकता है .
******
वातायन के प्रस्तुत अंक में युवा कवि योगेन्द्र कृष्ण की कविताएं और वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बिहारी की कहानी .
आशा है अंक आपको पसंद आएगा .

कविता



योगेन्द्र कृष्णा की कविताएं

(कवियों-बौध्दिकों के विरुद्ध एक गोपनीय शासनादेश)

देखते ही गोली दागो

धवस्त कर दो
कविता के उन सारे ठिकानों को
शब्दों और तहरीरों से लैस
सारे उन प्रतिष्ठानों को
जहां से प्रतिरोध और बौद्धिकता
की बू आती हो...
कविता अब कोई बौद्धिक विलास नहीं
रोमियो और जुलिएट का रोमांस
या दुखों का अंतहीन विलाप नहीं
यह बौद्धिकों के हाथों में
ख़तरनाक हथियार बन रही है...
यह हमारी व्यवस्था की गुप्त नीतियों
आम आदमी की आकांक्षाओं
और स्वप्नों के खण्डहरों
मलबों-ठिकानों पर प्रेत की तरह मंडराने लगी है
सत्ता की दुखती रगों से टकराने लगी है...
समय रहते कुछ करो
वरना हमारे दु:स्वप्नों में भी यह आने लगी है...
बहुत आसान है इसकी शिनाख्त
देखने में बहुत शरीफ
कुशाग्र और भोली-भाली है
बाईं ओर थोड़ा झुक कर चलती है
और जाग रहे लोगों को अपना निशाना बनाती है
सो रहे लोगों को बस यूं ही छोड़ जाती है...
इसलिए
कवियों, बौद्धिकों और जाग रहे आम लोगों को
किसी तरह सुलाए रखने की मुहिम
तेज़ कर दो...
हो सके तो शराब की भट्ठियों
अफीम के अनाम अड्डों और कटरों को
पूरी तरह मुक्त
और उन्हीं के नाम कर दो...
सस्ते मनोरंजनों, नग्न प्रदर्शनों
और अश्लील चलचित्रों को
बेतहाशा अपनी रफ्तार चलने दो...
संकट के इस कठिन समय में
युवाओं और नव-बौद्धिकों को
कविता के संवेदनशील ठिकानों से
बेदखल और महरूम रखो...
तबतक उन्हें इतिहास और अतीत के
तिलिस्म में भटकाओ
नरमी से पूछो उनसे…
क्या दान्ते की कविताएं
विश्वयुद्ध की भयावहता और
यातनाओं को कम कर सकीं...
क्या गेटे नाज़ियों की क्रूरताओं पर
कभी भारी पड़े...
फिर भी यकीन न हो
तो कहो पूछ लें खुद
जीन अमेरी, प्रीमो लेवी या रुथ क्लगर से
ताद्युश बोरोवस्की, कॉरडेलिया एडवार्डसन
या नीको रॉस्ट से
कि ऑश्वित्ज़, बिरकेनाऊ, बुखेनवाल्ड
या डखाऊ के भयावह यातना-शिविरों में
कविता कितनी मददगार थी!
कवि ऑडेन से कहो, लुई मैकनीस से कहो
वर्ड्सवर्थ और कीट्स से कहो
कि कविता के बारे में
उनकी स्थापनाएं कितनी युगांतकारी हैं!
पोएट्री मेक्स नथिंग हैपेन...
ब्यूटि इज़ ट्रुथ, ट्रुथ ब्यूटि...
पोएट्री इज़ स्पॉन्टेनियस ओवरफ्लो ऑफ पावरफुल फ़ीलिंग्स...
मीनिंग ऑफ अ पोएम इज़ द बीइंग ऑफ अ पोएम...
बावजूद इसके कि कविता के बारे में
महाकवियों की ये दिव्य स्थापनाएं
पूरी तरह निरापद और कालजयी हैं
घोर अनिश्चितता के इस समय में
हम कोई जोखिम नहीं उठा सकते...
कविता को अपना हथियार बनाने वालों
कविता से आग लगाने वालों
शब्दों से बेतुका और अनकहा कहने वालों
को अलग से पहचानो...
और देखते ही गोली दागो
****

सलाखों के इधर और उधर

पिछले दिनों रात के अंधेरे में
हमारे देश का एक
साफ शफ्फ़ाफ़ सम्मानित शख्स
कारागार में वर्षों से बंद
दोषसिद्ध एक निर्दोष क़ैदी से मिलने गया था...
कैदी से हुई उसकी लंबी और स्याह बातचीत को
सार्वजनिक कर देना देशहित में नहीं था
अदने से उस संतरी के हित में भी नहीं
जिसने इस मुलाक़ात के लिए उससे
सिर्फ पच्चास रुपए लिए थे...
इसीलिए मित्रो
अपने देश की अत्यंत साधारण सी
इस घटना की क्लोज़-अप तस्वीर दिखाते हुए
साहसी उस छायाकार ने
आपसे भी कुछ सवाल किए थे...
जवाब देने के पहले
और भी कुछ अनदेखी अनकही पर
ग़ौर कर लेना ज़रूरी था...
तस्वीर में जो चीज उन्हें
एक-दूसरे से अलग करती थी
वह केवल लोहे की मोटी सलाखें थीं
जिसकी एक तरफ़ वह कैदी
और दूसरी तरफ़ वह शख्स था...
जो चीज उन्हें खुद से भी अलग करती थी
वह उनका सार्वजनिक चेहरा था
इसलिए बहुत कठिन था
तस्वीर से यह निष्कर्ष निकाल पाना
कि उन दोनों में आख़िर
बाहर कौन और भीतर कौन था...
लेकिन मित्रो
जो चीज उन्हें
एक-दूसरे से गहरे जोड़ती थी
वह उनकी बातचीत नहीं
बल्कि बातों के दौरान
अतीत के अंधेरे तलघरों से
उनके शब्दों के बीच
बार-बार कौंधता
सघन संतप्त एक मौन था...
क्या देशहित में आप
अब भी नहीं बता सकते
कि क़ैदी से मिलने गया
वह आदमी कौन था...
या वर्षों से सज़ा काट रहा
वह क़ैदी आखिर क्यों
अंतिम सुनवाई के दौरान भी
कटघरे में खड़ा मौन था...
*****

खाली जगहें

ताजा हवा और रौशनी के लिए
जब भी खोलता हूं
बंद और खाली पड़ी
अपने कमरे की खिड़कियां
हवा और रौषनी के साथ
अंदर प्रवेश कर जाती हैं
जानी-अनजानी और भी कई-कई चीजें
दूर खिड़की के बाहर लटके
सफेद बादल
सड़क के किनारे कब से खड़े
उस विशाल पेड़ की षाखें व पत्तियां
और अंधेरी रातों में
आसमान में टिमटिमाते तारे भी
एक साथ प्रवेश कर जाना चाहते हैं
मेरे छोटे से कमरे में
और हमें पता भी नहीं होता
बाहर की यह थोड़ी सी कालिमा
थोड़ी सी उजास थोड़ी सी हरियाली
झूमती शाखों और पत्तियों का संगीत
कब का बना लेते हैं अपने लिए
थोड़ी सी जगह मेरे तंग कमरे में
हम तो उनके बारे में तब जान पाते हैं
जब कमरे में कई-कई रातें
कई-कई दिन रहने के बाद
अंतत: वे जा रहे होते हैं
छोड़ कर अपनी जगह...
*****

सुख की ये चिंदियां

कहीं भी बना लेती हैं अपनी जगह
वे कहीं भी ढूंढ़ लेती हैं हमें...
हमारी गहनतम उदासियों में
बांटती हैं
खौफ़नाक मौत के सिलसिलों के बीच भी
इस दुनिया में
ज़िंदा बचे रहने का सुख
और भी ढेर सारे नन्हे सुख
अपनी उदासियां...अपनी पीड़ाएं
अपनों को बता पाने का सुख...
बहुत अच्छे दिनों में
साथ-साथ पढ़ी गई
बहुत अच्छी-सी किसी कविता
या किसी जीवन-संगीत की तरह...
रिसते ज़ेहन पर उतरता है
अनजाना अप्रत्याशित-सा कोई पल
किसी चमत्कार की तरह...
गहन अंधकार में भी चमकती
सुख की ये नन्ही निस्संग चिंदियां
हमारी पीड़ाओं के खोंखल में
बना लेती हैं सांस लेने की जगह...
और इसीलिए
हां, इसीलिए हमारे आसपास ज़िंदा हैं
सभ्य हत्यारों की नई नस्लें
यातनाओं और सुख के अंतहीन सिलसिलों में
घालमेल होतीं इंसानियत की नई खेपें...
और जिंदा है
बहुत बुरे और कठिन समय में
किसी सच्चे दोस्त की तरह
जीवन से भरपूर कोई कविता...
हमारे संत्रास और दु:स्वप्नों को
सहलाता-खंगालता बहुत अपना-सा कोई स्पर्श...
****

योगेंद्र कृष्णा





A postgraduate in English Literature, writes poems, short stories and criticism in both Hindi and English. Has published articles, poems & short stories in literary magazines & journals like Kahani, Pahal, Hans, kathadesh, Vagarth, Sakshatkar, Gyanoday, Aksharparv, Pal Pratipal, Outlook, Aajkal, Kurukshetra, Lokmat, Purvagrah, Samavartan, etc. Published works include: Khoi Duniya Ka Suraag, Beet Chuke Shahar Mein (both poetry collections), Gas Chamber Ke Liye Kripya Is Taraf, Sansmritiyon Mein Tolstoy (translations in Hindi from foreign languages). Edited a collection of Nirmal Verma's writings under Collection Series for Tuebingen University, Germany. At present : 82/400, Rajvanshinagar,Patna 800023 Mobile : 09835070164 E-mail yogendrakrishna@yahoo.com yogendrakrishna55@gmail.com