गुरुवार, 6 मई 2010

कहानी



चित्र : देव प्रकाश चौधरी
गोवा में तुम
बलराम
धरती के स्वर्ग गोआ के आकर्षण में बंधे हम दोनों ऎसे मौसम में दूसरी बार आ गए थे, जब यहां कोई नहीं आता. पहली बार तब आए थे, जब एक वर्ष का ईशान हमेशा-हमेशा के लिए हमसे बिछ्ड़ गया था और हम दुख के घने अंधेरे में फंस गए थे. दूसरी बार अब आए हैं, जब जौथा मिस्कैरेज होने पर एकदम से टूट गई सुप्रिया का रो-रोकर बुरा हाल हो गया . उसे लग रहा है कि अब वह भी मां नहीं बन सकेगी. मिस्कैरेज के बाद कई दिनों तक मित्र-परिजन आते और हमें सांत्वना देकर चले जाते रहे, लेकिन सुप्रिया का दुख था कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था. रह-रह कर जिस-तिस के कंधे पर सिर रखकर फफक पड़ती थी. ऎसे में भाईजी ने हमें गोआ का रिटर्न टिकट थमाते हुए कहा था, कुछ दिन के लिए दिल्ली से दूर चले जाओ, अन्यथा दोहरे दुख का साया यहां तुम लोगों का पीछा नहीं छोड़ेगा. यह घना दुख उतनी दूर गोआ तक तुम लोगों का पीछा नहीं कर पाएगा, कहीं बीच में ही छूट जाएगा. और हां, लौटते समय खुशनुमा यादें ही साथ लाना और कुछ नहीं."
और सचमुच, भाईजी की युक्ति फलदायी साबित हुई. चालीस घंटे की लंबी यात्रा कर तब हम गोआ एक्सप्रेस से वास्को उतरे तो दुख का वह घनापन काफी कम हो गया था, ईशान की कुछ अच्छी यादें भर बची थीं और यह उम्मीद भी कि यहां धरती के इस स्वर्ग में शायद ईशान से हमारी मुलाकात फिर हो और वह एक बार फिर हमारे ही घर में जन्म ले ले, पुनर्जन्म . इस उम्मीद के साथ न जाने क्यों तुमसे मिलने की इच्छा भी मन में वेग से उठी थी, लेकिन क्यों, सिर्फ तुमसे ही क्यों ! इधर के वर्षों में ’घर’ कुछ इस कदर मेरे चारों ओर लिपटा रहा कि दूर हो चुके मित्रों से मुखातिब होने का न होश रहा, न कोई खास अवसर ही मिल सका. ऎसे में यहां ईशान की वापसी की उम्मीद के साथ तुम, सिर्फ तुम्हीं क्यों याद आ रहे हो राज! ऎसा भी नहीं है कि जब से तुम दिल्ली छोड़कर गए हो, हमें याद ही नहीं आए. तुम हमें खूब-खूब याद आए हो, जिंदगी की हर खुशी तुम्हारे बिना अधूरी-अधूरी-सी लगती रही है और हर गम, गम का पहाड़, जैसे तुम होते तो शायद गम के हर पहाड़ को तर्जनी पर उठा लेते.
यहां गोआ में ;तुम्हारे इस तरह याद आने की एक वजह शायद यह भी है कि यहां से सिर्फ एक रात के फासले पर हो, रेल से जाएं तो, बस से जाएं तो और समुद्र के रास्ते जा सकें तो भी तुम तक हमारा पहुंचना कठिन नहीं है. फोन कर देते तो शायद दो-तीन दिन के लिए तुम यहां आ भी सकते थे. इस समय हमारे साथ होते तो गोआ के इस खूबसूरत बीच पर हम लोग तुम्हारे मस्ती भरे गीत सुनते . तब हमारी सुबहें, हमारी शामें और हमारी रातें ठहाकों से भरी कितनी-कितनी आनंदमय और खुश-खुश होतीं !
उदास और गमज़दा होने से बचने का एक तरीका संघर्ष भरे उन दिनों में हमने तलाश लिया था, जिससे हम उदासियों से बच जाया करते थे, लेकिन दिल्ली से तुम्हारे चले जाने के बाद वह मुझसे सध नहीं सका. दारू पीकर ठहाकों में सब कुछ भूल और भुला देने का तरीका और सलीका तुमने तो सीख लिया था, लेकिन मैं उसे सीख नहीं पाया. तुम्हारे साथ कुछ बरस और रहा होता तो शायद हर स्थिति में ठहाके लगाना सीख गया होता, मगर तुम हमें छोड़कर चले गए. आज तुम शायद यह कहना चाहो कि तुमने नहीं, हमने ही तुम्हें छोड़ दिया है और यह कहकर तुम शायद मुझे एक अप्रिय सच कहने से बचा लोगे. सच है कि हमने ही तुम्हें छोड़ा है, क्योंकि तुमने मेरी बहन को छोड़ दिया था. उसके भावात्मक लगाव को अंतिम हद तक बढ़ाकर तुमने उसे ऎसी जगह मारा कि फिर वह कहीं की न रही और संवेदन शून्य-सी हो गयी. उसकी चेतना को जैसे काठ मार गया. आज वह मेरे साथ यहां नहीं है तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी वजह से और तुमसे मेरा लगाव नहीं रह गया तो भी शायद उसी की वजह से. बहन ने आत्महत्या नहीं की, यही गनीमत रही. संवेदन शून्य हो जाना ही शायद उसके हक में है. अब वह काठवत जी लेगी और समय से पहले मरेगी नहीं, लेकिन कभी-कभी जब वह पोखरा चलने की बात करती है तो मैं डर जाता हूं.
अच्छा, तुम्हीं बताओं, तुम्हारे बिना क्या उसे सपनों जैसी उस यात्रा पर ले जा सकता हुं ? पोखरा में झील के उस पार डूबते सूरज के साथ अगर वह भी डूब गई तो मैं क्या करूंगा !
तुम्हें ;याद होगा, भारत से बाहर की किसी भूमि पर पहली बार तब हमने पांव धरे थे तो नोमेंसलैंड को पार करते हुए कितने-कितने रोमांचित हो उठे थे. बार-बार भारत से नेपाल और नेपाल से भारत की भूमि पर आए-गए थे. कोई वीजा, कोई पासपोर्ट नहीं. शाम को टिके थे भारत के बढ़नी में और विदेशी सामान की तलाश में देर शाम तक भटकते रहे थे नेपाली कृष्णा नगर बाजार में. इधर से उधर जाते-आते लगा ही नहीं था कि हम विदेश में हैं. विदेश में होकर भी विदेश में न होने की अनिर्वचनीय अनुभूति. काश! दुनिया के सारे देश भारत और नेपाल की तरह मुक्त सरहद वाले होते. काफी समय तक हमारे-तुम्हारे संबंध भी कुछ इसी तरह के रहे, लेकिन फिर न जाने क्यों हमारे बीच चाइना बॉर्डर पसर गया था, एक-दूसरे की जड़ और जमीन पर कब्जे की आशंका में डूबा गुआ. ! जैसे हमारा तवांग चीन की दुखती रग है, वैसे ही उसका मानसरोवर हमें अपना लगता है. मेरी बहन तुम्हारी कुछ लगती है, वैसे ही तुम्हारी पत्नी भी मेरी कुछ है, लेकिन फिर वह सब किसी सपने जैसा क्यों हो गया ?
कसमें तुमने बहुत खाई और भूल गए. कसमें खाना और भूल जाना तुम्हारी तरह मैं सीख नहीं पाया और इसी कारण तुम्हारे प्रति कहीं भीतर ही भीतर हिंस्र होता रहा, लेकिन हर हाल में ठहाके लगाने के तुम्हारे गुण का कायल भी रहा और उसी के कारण शायद तुमसे ईर्ष्या भी करता था
तानसेन और पोखरा जैसी खूबसूरत जगहों पर जाना अब शायद तुम्हारे साथ कभी संभव न हो. संभव हो भी तो शायद जाना न चाहूं. हां, तुम यहां गोआ आ पाते तो शायद एक बार को सब कुछ भूल-भाल कर हम ठहाकों भरे फुर्सत के कुछ दिन-रात एंजॉय कर सकते थे, लेकिन बार-बार किए गए तुम्हारे वादे और तोड़े गए सपने हमें भयाक्रांत कर चुके हैं. इसी कारण फोन कर तुम्हें गोआ बुला नहीं सके.
पहली बार गोआ आए थे तो ईशान को यमुना की बाहों में सौंप कर आए थे. लाल किले के पीछे बहती यमुना ने कैसे तो उसे लपक लिया था, जैसे वह हमारा नहीं, उसका ही बेटा रहा हो. पम्मी से तुम्हें मीना ने भी कुछ ऎसे ही छीन लिया था, जैसे तुम उसके कभी कुछ रहे ही नही !
ईशान के न रहने पर पहली बार गोआ हमारे लिए शरण्य बना था. धरती का स्वर्ग वह चाहे हो या न हो, लेकिन शांति और सुकून देने वाली जगह वह हमें जरूर लगी थी, पर तारों भरी रात में दूध सागर फाल्स की ओर जाने वाली नौका यात्रा पर हम नहीं गए थे, जिसमें लोग रात भर नाच-गाना करते हैं. आमोद-प्रमोद में तब हम डूब भी कैसे सकते थे ! हम तो होटल में ईशान को याद करते हुए उसके पुनर्जन्म की उम्मीद में ऊभ-चूभ होते रहे थे, तुमसे पुनर्मिलन की कामना करते हुए, लेकिन न तो ईशान का पुनर्जन्म हुआ, न ही तुमसे पुनर्मिलन संभव हो सका. अब तो कभी-कभी लगता है कि जैसे ईशान की यादों के सहारे ही जीवन कटना है, वैसे ही तुम भी सिर्फ स्मृतियों में ही हमारे पास आओगे.
याद है तानसेन की वह सुबह, जब बादल के कुछ टुकड़े होटल की खिड़की तक टहलते चले आए थे और तुम किसी बच्चे की तरह कोई अजूबा पा लेने के आल्हाद से पुलकित हो बोल पड़े थे, ’काश! पम्मी भी यहां होती . पम्मी यहां होती तो बादलों से हमारे इस साक्षात को रोमांच कुछ और होता, ऎसा कि गम उसे जीवन भर लूटते रहते तो भी खत्म न होता, लेकिन तुम्हें शायद यह सब याद ही न हो. तुम्हें तो शायद यह भी याद न हो कि पोखर में झील के किनारे खड़े होकर डूबते सूरज को देखते हुए तुमने कहा था, "पम्मी यहां होती तो नाव से झील के उस पार चलते और----."
"धत्त!" मैं बोल पड़ा था.
"क्यों ?" तुमने बड़ी मासूमियत से पूछा था, मनो तुम्हें कुछ मालूम ही न हो.
"उधर स्लम्स हैं, जहां घरेलू और इज्जतदार लोग नहीं जाते."
"तू होगा इज्जतदार, मैं तो वाइल्ड हूं, वाइल्ड अ बीस्ट, हर जगह घुस कर खा-पी और जी लेने वाला प्राणी."
"इसीलिए तो उनके साथ उधर नहीं जाते."
"चलो, नहीं जाते, लेकिन उनके बिना यात्रा अधूरी-सी नहीं लग रही ?"
"लग क्यों नहीं रही----ऎसा करते हैं , उनके साथ अगले साल हम फिर यहां आते हैं." मैंने प्रस्ताव रखा था.
"क्यों नहीं." तुमने समर्थन किया था.
"तो फिर अगले साल यहां आना पक्का , उन दोनों के साथ ?"
"पक्का." कहते हुए हमने एक-दूसरे से वादा लिया था. और राज, तुमने वह वादा निभाया नहीं. मैं जब चाहूं, निभा सकता हूं, मगर जब तक हम चारों एक साथ न हों, वादा पूरा नहीं हो सकता और अब हम चारों एक साथ होने से रहे----
हम चारों एक साथ जैसे पोखरा नहीं जा सकते, वैसे ही गोआ में भी चारों कभी एक साथ नहीं हो सकते. अब तो हम तुम्हें याद भर कर सकते हैं, तुम्हारे संग-साथ की कामना करते हुए, मगर वैसा संग-साथ कभी पा नहीं सकते, क्योंकि पल-पल बदलती दुनिया में शाश्वत कुछ भी नहीं है: न रिश्ते, न नाते, न ही यारियां-दोस्तियां! फिर यहां गोआ के बा़अमोला बीच पर तुम्हारी इतनी याद क्यों! मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है राज, मेरे पास इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं है कि अच्छे-भले अनेक मित्रों के बावजूद यहां गोआ में तुम, सिर्फ तुम्हीं क्यों याद आ रहे हो! इस बार और पिछली बार भी तुम्हारे संग-साथ की कामना ही क्यों हमारे साथ यहा टहलती रही ?
जीवन के इस रहस्य को समझने की कोशिश कर रहा हूं कि दु:ख और यातना के बीच भी बेदर्द लोगों की यादें ही क्यों मनुष्य का पीछा करती हैं, जब बीते हुए समय में डूबकर वह यातनाओं से मुक्त होने की कोशिश कर रहा होता है ? मरते दम तक तुम्हारे जैसे दुष्ट ही याद आ-आकर क्यों सताते रहते हैं ? सताते तो खूब हैं, मगर पास आने पर सांत्वना के दो मीठे बोल तक नहीं बोलते, उल्टे कोई उल्टी-सीधी बात कहकर घावों को कुरेद जरूर देते हैं. अपने होते तो नहीं हैं, लेकिन अपनेपन का भ्रम जरूर देते रहते हैं.
गोआ में इस बार भी ईशान की स्मृतियां ही हम पर हावी हैं, शायद इसलिए कि उसने पुनर्जन्म नहीं लिया. लिया भी हो तो हमारे घर न आकर कहीं और चला गया हो. सोचकर दु:ख होता है कि यदि उसे हमारा नहीं होना था तो फिर वह हमारे घर आया ही क्यों, वैसे ही, जैसे तुम ! तुम भी तो सिर्फ कुछ समय के लिए ही हमारे हुए थे. तुम्हें शायद पता था कि हमारे साथ बहुत दिन नहीं रहोगे. उतने साथ में ही हमसे जितना ले सकते थे, तुमने ले लिया, बहन तक से . किस तरह तो वह तुममें डूब गयी थी, लेकिन एक झटके में उससे ही नहीं, हमसे भी नाता तोड़ लिया. ईशान के न रहने पर सुप्रिया कई दिनों तक खूब-खूब रोयी थी, मगर बहन शायद उतनी बावरी नहीं थी या शायद वह कुछ ज्यादा ही बावरी थी कि सब कुछ भूल गयी , यहां तक कि खुद को भी. तुम्हारे साथ बीते समय को उसने माथे पर छलक आए पसीने की तरह पोंछ डाला. सुप्रिया भी शायद ऎसा कर पाती, अगर उसकी कोख अब तक छूंछी न रहती. कोख और दिल में आकर चले जाने वाले तभी तक बहुत याद आते हैं, जब तक उनकी जगह कोई और आ नहीं जाता. बहन के दिल में तुम शायद अब भी हो, लेकिन पहले की तरह नहीं----
ईशान गुजरा न होता तो अब तक कितना बड़ा हो गया होता ! वह होता तो गोआ की यह यात्रा कितनी-कितनी सुखद होती, लेकिन बार-बार हुए मिस्कैरेज ने सुप्रिया को वही नहीं रहने दिया, जो वह हुआ करती थी: दुनिया की सबसे खुशमिजाज लड़की, मंद-मंद मुस्कान से सबको मोहित कर लेने वाली युवती, स्कूल-कॉलेज में साल-दर-साल गोल्डमेडल और दक्षकन्या का खिताब हासिल करती स्टुडेंट, पिता की सबसे अच्छी बेटी और फिर हमारे घर में खुशी बिखेरती धवल-वसना परी जैसी पत्नी, जिसके मुस्कराने भर से सारा घर रोशनी से नहा और खुशबू से महमहा उठता. बहुत गंभीर और समझदार स्त्री में ढल गयी सुप्रिया की गोद लेकिन अब तक सूनी क्यों है, यह सवाल उसे भीतर ही भीतर घुन की तरह खाता रहता है, अहर्निश. इसीलिए अब उसकी हर खुशी क्षणिक होती है और हर सुख क्षणभंगुर.
सुप्रिया फिर से मां बन पाती तो शायद हमारा जीवन कुछ और होता. तुम्हारा कोई विकल्प हमें मिल गया होता तो शायद तुम भी हमारी स्मृतियों में इस कदर छाये न रहते. अपने जीवन से निकालकर हम किसी और को तुम्हारी जगह रख नहीं पाते, क्योंकि हमारे चिथड़ा-चिथड़ा अतीत के साक्षी रहे हो तुम ! उसके बरक्स हमारे वर्तमान को देखते तो शायद आश्चर्यचकित रह जाते, लेकिन एक ईशान के न रहने भर से जो दु:ख हमारे भीतर-बाहर पसर गया है, कुछ दिन के लिए ही सही, अगर तुम गोआ आ जाते तो शायद वह कुछ कम हो गया होता. पम्मी आ पाती तो भी सुप्रिया को सुख मिलता, ऎसा लेकिन सिर्फ दिल को लगता है, दिमाग तो कहता है कि ’गहरी मार कबीर की, दिल से दिया उतार----’ जो हमारे साथ नहीं हैं, जो हमारे साथ हो नहीं सकते, उनके संग-साथ के लिए क्या रोना.
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बलराम समकालीन कथाकारों में एक महत्वपूर्ण नाम.
बहुचर्चित कहानी संग्रह ’कलम हुए हाथ’ के बाद दूसरा संग्रह ’गोआ में तुम’ .
लघुकथा संग्रह ’मृगजाल’ तथा उपन्यास ’जननी-जन्मभूमि’ प्रकाशित.
’कहानी का सफर’ , ’आधे-अधूरे परिचय’ तथा ’आंगन खड़ा फकीर’(समीक्षा) के अलावा ’वैष्णवों से वार्ता’ तथा ’पत्रकारिता के आयाम’ जैसी पत्रकारीय कृतियां भी छपी हैं.
कुछ रचनाएं आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से प्रसारित और कुछ अन्य भाषाओं में अनूदित.
दैनिक ’आज’ के चीफ-रिपोर्टर और ’नवभारत टाइम्स’ के चीफ-सब रह चुके बलराम ने ’सारिका’ के अलावा ’शिखर’ और ’शब्दयोग’ का भी संपादन किया. बस्तर (छत्तीसगढ़) के आदिवासियों पर संदर्भ ग्रंथ ’इंद्रावती’ के अलावा ’विश्व लघुकथा कोश’ आदि एक दर्जन से अधिक पुस्तक श्रृंखलाओं के साथ प्रेमचंद रचनावली का भी संपादन किया.
एनसीईआरटी की पाठ्यक्रम और पुरस्कार समितियों के सदस्य रहे. हिन्दी अकादमी, दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लघनऊ से कुछ कृतियां पुरस्कृत. हिन्दी अकादमी से साहित्यकार सम्मान.
सम्प्रति : राष्ट्रीय समाचार पत्रिका ’लोकायत’ के कार्यकारी सम्पादक.

कहानी


चित्र - देवप्रकाश चौधरी

घुग्घू
बद्री सिंह भाटिया
रतना अब बढ़ोह गांव जाना नहीं चाहती। क्यार के रास्ते तो बिल्कुल भी नहीं। बढ़ोह जाने के नाम से ही वह सिहर उठती है। मगर रिश्तेदारी, बिरादरी की अदृश्य डोरों से बन्धी अनिवार्यताओं के दृष्टिगत उसे कभी-कभार जाना ही पड़ता है। बढ़ोह जाने का दूसरा रास्ता भी था। छोटा परन्तु विकट। लगभग एक किलोमीटर लम्बी धार के एक ओर की ढलान पर घना जंगल था। किसी ने न जाने कब इसके बीच से वह रास्ता खोजा होगा। उस रास्ते से जाने के लिए पहले नाला, फिर बड़ी खड्ड और तब घनी झाडि़यों के बीच से गुजरती संकरी पगडण्डी से एक किलोमीटर चढ़ कर उपर धार पर पीपल की छाँव में सुस्ताए और फिर वहाँ से आधा किलोमीटर उतराई। क्रोन्दे और दाड़ू के कान्टेदार बौने पेड़ हरवक्त एक एहसास दिलाते कि जरा सी चूक, किसी गोल, बेडौल पत्थर पर पैर रखने से बिगड़ा सन्तुलन गिराएगा नहीं तो हाथ में कांटे जरूर चुभो देगा। और कहीं रीछ, लक्कड़बग्घा मिल गया तो और खतरा। अब यह रास्ता रहा ही नहीं, न रहा वह पीपल का पेड़। सब समा गये पत्थरखोर कम्पनी के पेट में।
हुआ यह कि इलाके में सड़क आने पर सरकार को पता चला कि इस धार में सीमेन्ट का उच्च कोटि का पत्थर है। इस पर इसके उपयोग का विचार बना। सारी खोजबीन और परीक्षणों के बाद विश्वव्यापी निविदाएँ दी गईं और देश की सबसे बड़ी सीमेन्ट उत्पादन कम्पनी को ठेका मिल गया। कम्पनी ने जमीन का अधिग्रहण किया और खदान शुरू। बढ़ोह को धार से होता रास्ता बंद। धार धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। रास्ता बचा तो क्यार वाला। बहुत लम्बा। धार की तराई में धान के खेत, अर्ध गोलाकार में फैले हुए। इन खेतों के उपर से विकर्णाकार पगडण्डी एक हद तक और फिर लम्ब की तरह चढ़ाई। किसी ने एक तिर्यक रास्ता भी बनाया है, परन्तु वह भी कंटीला है।
कभी यह रास्ता खूब चलता था-इसकी चैड़ाई भी ठीक थी। मगर कम्पनी के आने और आवागमन के दूसरे तरीके निकलने से इस रास्ते का रूप बदला गया। दूसरा कारण यह भी कि इस रास्ते कभी-कभार धार पर से पत्थर लुढ़कते रहते हैं- सो जीवन को खतरा बना रहता है। कम्पनी कब ब्लास्ट कर दे। पहाड़ हिले और पत्थर लुढ़कने लगे। ऊपर पहाड़ पर चल रही जे.सी.बी., बुलडोजर भी पत्थर गिराते रहते हैं। कभी-कभार आने-जाने वालों को खतरा ही खतरा। और यदि आना-जाना ही हो तो प्रतिदिन होने वाले धमाके के बाद या तब जब मशीनें धार के दूसरे खण्ड में कार्यरत हों।
उस दिन बढ़ोह में रतना के एक निकट रिश्तेदार की मृत्यु होने पर उसे शोक सभा में जाना अनिवार्य हो गया। पहले इस प्रकार के कार्य पति निपटा दिया करता था। मगर जब से वह नहीं रहा, समाज के ये सारे कर्म उसके सिर पर आ गये थे- उस दिन उसने गाँव की दो औरतों, अपने देवर, देवरानी को साथ चलने को कहा। वे राजी हो गए थे।
हवाघाटी पार करते ही उसकी नजर ढलान मे नीचे अपने क्यार पर पड़ी। आस-पास के सभी खेतों में गेहूं की फसल लहलहा रही थी। खड्ड से बहते पानी का शोर उपर घाटी तक आ रहा था। इन्हीं खेतों के बीच तीन छोटे सीढ़ीनुमा क्षत-विक्षत खेत सूखी घास से चमक रहे थे। भूरे-भूरे। खेतों की टूटी दीवारों, उनमें पड़े पत्थरों के ढेर देख वह ठिठक गई। उसे वह दिन याद हो आया जब इन खेतों की मेंडें टूटी थीं। कितने खेत तहस नहस हो गये थे। उस दिन तो वह यह देख ही नहीं पाई थी। यह सब बाद में पता चला था.....उस दिन तो उसकी दुनिया ही उजड़ गई थी।
वह खड़ी सोचती रही। लोगों ने अपने खेतों की टूटी दिवारों को चिन कर फिर से खेत तैयार कर फसल लगानी शुरु कर दी और उसने यहाँ आना ही छोड़ दिया।
उसके साथी हवाघाटी के उस ओर सुस्ताने को बैठ गये। यह सोच कि उसने कहीं शौचादि के लिए किसी ओट में बैठना होगा। एक स्त्री ने कहा भी-‘कहीं ऐसे बैठना जहां उपर से पत्थर न आए।’ आज घुग्घु भी नहीं सुनाई दिया।’ वह उपर धार देखने लगी थी। यह आभास पाने कि कम्पनी का बुलडोजर, शॉवल और सुरंग छेदने की मशीन की आवाज तो नहीं आ रही। उनका क्या, कभी भी कहीं भी काम करने लग जाते हैं। अब सारी धार उनकी है, तराई तक। इन पारम्परिक रास्तों के उपभोक्ता चलें अपने जोखिम पर। कम्पनी वाले तो ब्लास्ट के समय मात्र घुग्घु बजा देते हैं...। एक हल। रतना ने मन ही मन कहा-‘उसे गाँव से चलते मशीनों को देख लेना चाहिए था। पर अब क्या हो सकता है। पहाड़ पर जहाँ काम चल रहा है बहुत उपर है। यहाँ से तो काम का छोर भी पता नहीं चलता।
और रतना की आँखों में वह दिन उतर आया था। धान लगाने का समय गुजर रहा था। पति अपने दौरे से नहीं लौटा था। उसकी तकलीफ यह थी कि जब वह घर से निकलता तो कई दिनों के बाद ही लौटता। वह टोकती-‘ऐसा क्यों करते हो? घर की सुध ही नहीं रहती।’ तब वह हंसकर कहता-’रतना पेट की खातिर। तेरे लिए, इन दो बच्चों के लिए और बूढ़े माता-पिता के लिए। ... पैसा कमाना आसान नहीं होता। तू बोल....।’ वह कहती-‘क्या बोलूं, फसल लगाने का समय हो गया है। नीचे क्यार में....।’
‘ अरे! क्यार में जाना तो छोड़ देना चाहिए। साला कब चट्टाने आ जाएँ पता नहीं चलता। कम्पनी का डेंजर जोन है यह।‘
‘तो क्या, दूसरे लोग भी तो काश्त करते हैं। हर वक्त पत्थर थोड़े ही आते रहते हैं।’
‘पिछली बार देखा कितने पत्थर आए थे। खेत भर गये थे।’
‘वो तो नीचे वालों के थे-हमारे खेतों में तो एक भी कंकर नहीं आया था।’
‘सो तो है।’
और इस ’सो तो है’, की धारणा पर अगले रविवार को धान लगाने के लिए खेत तैयार करने चले गये। इससे पहले रतना बच्चों के साथ वहाँ जाकर सारी कंटीली झाडि़याँ साफ कर आई थीं। उसके तीनों खेत उजले दिख रहे थे। दूसरे खेतों में घास काटती औरतों ने कहा भी था।- रतना चान्दी बना देती है। ‘बीड़’ में क्या ‘माश’ लगाने है?’
‘हाँ! करना पड़ता है, वर्ना चूहे खेत को नुक्सान पहुँचाते हैं।’
‘अरे! अभी तो पानी है... पानी में थोड़े भी आता है चूहा।’
‘बरसात के बाद भी तो आता है, जब क्यार का पानी सूख जाता है-
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रविवार की सुबह वे हल, जुआ, सुहागा लेकर खेत में पहुँचे। खेत पानी से भरे थे। दूसरे खेतों में लोग हल चलाने लग गये थे। अपने देर से पहुँचने पर वह बुदबुदाई-‘उठी तो वह तड़के थी। सोचा था कि सबसे पहले पहुँचेगी पर ये लोग... मुए जाने यहीं सोये थे। उसने एक खेतवाली को आवाज दे ही दी-‘ यहीं सोई थी क्या? रात भी खुलने नहीं दी ।’ खेतों की मेंड़ों से छर-छर करते पानी और खड्ड के शोर के बीच उसने सुना-‘भई अब काम डर के करना पड़ता है -कम्पनी कब क्या कर दे किसको पता।’
उसका मानना था कि दोपहर तक खेत में हल चलाकर फारिग हो जाएँगे। जितने में कम्पनी के ब्लास्ट का समय होगा; वे खेत खाली कर घर निकल जाएँगे। दोपहर को आराम करेंगे। कुछ काम बचेगा तो शाम की पारी में कर लेंगे।
रतना जब भी इन खेतों में काम करने आती उसके मन में कई सवाल उठते। वह मानवीय प्रकृति के बारे में ज्यादा सोचती। वह उन लोगों को दोषी ठहराती है जिन्होंने बिचौलिए बन लोगों की भूमि का सौदा कराया। उसे जमीन अधिग्रहण से लेकर वर्तमान समय तक याद हो आता। उनके ये खेत भी दफा-चार की अधिसूचना में थे। अब वे इस जमीन के मालिक थे तो ऐतराज करना तो लाजिमी था। कम्पनी भूसे से भी सस्ते भाव जमीन खरीद रही थी-उन्हें कल करोड़ों का लाभ होगा पर वे तो भूमिहीन हो जाएँगे। इसकी किसी को फिक्र ही नहीं थी। सो अपना पक्ष सरकार के आगे रखा। संभवतः यह उस प्रतिवेदन का प्रभाव हुआ होगा कि जब दफा-छः के नोटिस आए तो उनकी यह जमीन और उपर का सारा ढलुआँ क्षेत्र अधिग्रहण की सूचना में नहीं था। एक बार तो वह खुश हुई। अपनी खुशी पति से बाँटी तो उसे पता चला कि यह जमीन जानबूझ कर छोड़ी गई है। इस ओर के आपत्तिकर्ता काफी तेज हैं। उनकी वजह से अधिग्रहण की प्रक्रिया में अन्तर आएगा। सो काट दी। अब ये लोग वार्ता और अधिग्रहण प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे। कम्पनी कल इनमें डर पैदा करेगी और फिर प्रेशर बनाकर या कोई हाथकण्डा अपना कर या मजबूरी पैदा कर जमीन ले ही लेगी। यह भी हो सकता है कि इन लोगों ने ही कम्पनी के साथ गुप्त समझौता किया हो कि बाद में थोड़ा अधिक दाम ले कर इस ढलान को उसके नाम कर दिया जायेगा....पति ने यह भी बताया कि इस समय जाने कितने लोग कम्पनी ने अपने पक्ष में कर लिए हैं। अनेक तरीके अपनाए जा रहे हैं। वे कम्पनी से अनेक लाभ उठा रहे हैं और कम्पनी के गुण गा रहे हैं। देर-सवेर ये खेत कभी भी कम्पनी के समझो।
कालान्तर में अधिग्रहण हुआ तो खेतों के उपर के प्लाट धारकों के साथ अलग समझौता हुआ। उन्हें औरों से अधिक पैसे दिए गये हैं।....अब जमीन कम्पनी की हो गई है तो धार पर बुलडोजर जेसीबी आदि मजे से चलने लगे।
एक दिन रतना की पड़ौसिन अपने प्लाट में पशु चरा रही थी। कि उपर से चट्टानें लुढ़कने की आवाज सुनाई दी। खड्ड से दूसरी तरफ की ढलान में काम कर रहे लोगों ने उसे अगाह किया भी मगर तब भागने का कोई अवसर नहीं था। छोटी-बड़ी, जाने कितनी चट्टाने नीचे लुढ़क रही थीं। वह इस आशा में थी कि आज मर तो जाना ही है एक दाड़ूदाने की झाड़ी के नीचे आंखें बन्द कर बैठ गई। भाग्य अच्छा था कि उसकी ओर छोटे पत्थर आए और झाड़ी में उलझ गये। मगर दो विशाल चट्टाने पास से भारी वेग के साथ लुढ़क कर नीचे चली गईं। एक का वेग तो इतना था कि वह काफी चैड़ी खड्ड पार कर दूसरी ओर के खेतों में जा पड़ी। फसल का काफी नुक्सान हुआ। उसने जब आँखें खोली तो दिल धक-धक कर भारी गति से चल रहा था। उसकी नजर पशुओं की ओर गई। वे ढलान की दूसरी तरफ दौड़ कर चले गये थे और चरने लग पड़े थे। उसने प्रभु का आभार व्यक्त किया और धीरे-धीरे पशुओं की ओर बढ़ी। दिल की धड़कन अभी शान्त नहीं हुई थी।
ढलान से पत्थर लुढ़कने की खबर गाँव में पहुँची । पड़ौसिन के वहाँ पशुओं के साथ होने का भी पता चला। वे दौड़े आये। उसे सुरक्षित पा वे आश्वस्त हुए। वे कम्पनी पर नाराज हो गालियाँ बकने लगे। सबकी जुबान पर एक ही बात कि बिना चेतावनी के ब्लास्ट क्यों किया । ये तो शुक्र मनाओ कि रास्ते में कोई चल नहीं रहा था। पर यह औरत तो थी। पशु थे। चेतावनी देते तो यह समय पर वहाँ से निकल जाती। यह तो कम्पनी की ज्यादती है।’ फिर किसी प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि वे तो धार पर मशीन के लिए जगह बना रहे थे। एक पत्थर को जेसीबी का धक्का लगा, चालक उसे नहीं सम्भाल पाया और...। शाम को गाँव में वार्ता हुई और अगले दिन लोग कम्पनी के खनन अधिकारी के पास शिकायत कर अपना रोष प्रकट कर आये। अधिकारी ने घटना पर अफसोस प्रकट किया और आगे को सजग रहने का आश्वासन दिया।
इस प्रकार दो-तीन बार और पत्थर आए। एक बार रतना के खेतों की ओर भी लुढ़के। आस-पास के गाँव के लोगों ने कम्पनी से फिर बात की कि इन खेतों का अधिग्रहण कर लोगों को खतरे से बचाया जाए। तब कहीं यह तय हुआ कि कम्पनी द्वारा बाउण्डरी के साथ लगते क्षेत्र को डेंजर जोन बना दिया जाएगा। इस प्रकार लोग अपनी फसल का मुआवजा ले सकते हैं। यह भी कि इन खेतों को बंजर छोड़ दिया जाए। लोगों ने बात मान ली।
डेंजर जोन बनने के बाद लोग फिर भी खेतों में काश्त करते रहे। यह सोच कि रोज तो उस ओर पत्थर आते नहीं। फिर काम अभी काफी उपर है-छः हजार बीघा की इस धार पर कभी काम इस ओर तो कभी उस ओर होता है। एक बैड उतरते समय तो लगता है-सो खेत क्यों उजाड़ छोड़े जाएँ ? दोहरा लाभ है- फसल भी और मुआवजा भी।
काम की गति से खनन क्षेत्र में रोज धमाके होते। इससे कभी ढलान से पत्थर गिरते कभी नहीं। कभी ब्लास्ट से दूर तक भी जाते। इससे चलते लोगों को तंगी होने लगी। वार्ता फिर चली और तय हुआ कि धमाके से आधा घण्टा पहले घुग्घु बजाया जाएगा, ताकि तराई में बनी पगडण्डियों पर चलने वाले, घासनियों से घास लाने वाले और खेतों में काम करने वाले लोग सुरक्षित स्थान पर चले जाएँ।
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अब घुग्घू कभी धार के इस छोर पर बजता कभी उस छोर पर। घुग्घू बजते ही धार-नाल घुग्घु की आवाज से गूँज जाते। जिससे धार के दोनों तरफ के लोग चौंक जाते। जो घरों के भीतर होते वे कच्चे घरों में हिल्लण के साथ स्लेटों और टीन का बजना महसूस करते।
घुग्घू बजने से पूर्व हुए धमाकों के भारी वेग के कारण जाने कितने कच्चे-पक्के घरों की दीवारें, लैन्टल दो फाड़ हो गये थे। इससे क्षुब्ध लोग कम्पनी तक गए, फलस्वरूप अब कम वेग का ब्लास्ट होने लगा। मगर धरती के अन्दर ही अन्दर फिर भी हिलने से घरों में धागे की मोटाई की दरारें फिर भी आ रहीं जो पक्के घरों और आँगनों में देखी जा सकती है। लोग कम्पनी प्रबन्धको को सूचित करते हैं मगर उनके कारिन्दे इन दरारों को घरों की बनावट का ठीक न होना बताकर कन्नी काट जाते हैं।
रतना ठण्डी निःश्वास छोड़ती है। बुदबुदाई,‘भाग्य ने इस जमीन के बारे और यहाँ के लोगों के बारे जाने क्या लिखा है।’ ...घुग्घु बजने के साथ राह में चलते लोग तेज कदम चलकर माइन के एरिया से बाहर होने की कोशिश करते हैं, डर यह कि क्या पता कहाँ से पत्थर लुढ़क कर आ जाए और बचना मुश्किल हो या कोई सुरंग के फटने से उछल कर उन पर न गिर जाए। आखिर जान तो सभी को प्यारी होती है। इधर-उधर खेतों, घासनी या कहीं दूर राह में चलने वाले धार की ओर कान कर लेते हैं कि जब धमाका होगा तो वे पत्थरों की वर्षा और धूल के गुब्बार को देखेंगे- डेंजर जोन में काम करने वाले लोग भी दूर हटने की तैयारी करते-पूरे वातावरण में एक डर सा व्याप्त हो जाता। घुग्घू बजने के बाद पहाड़ पर घूंऽ, घर्र करती मशीनें भी रुक जातीं और जब ब्लास्ट होता तो एक धूल का गुब्बार बरगद के वृक्ष का सा आकार बनाता उपर उठता। उसके साथ छोटे बड़े पत्थर अपने-अपने वेग के साथ इधर-उधर बिखर जाते। धूल हवा के साथ कभी खेतों की ओर तो कभी खनन क्षेत्र में ही विलीन हो जाती। कुछ देर बाद धार फिर मशीनों की आवाज से सराबोर हो जाती। घाटी में जीवन फिर चलने लगता।
एक बार धार पर एक स्थान पर लिपाई की मिट्टी निकली थी। रतना गांव की अन्य औरतों के साथ मिट्टी लाने चली गई थी। वह हैरान रह गई थी। नुकीली धार पर अब लम्बे चैड़े मैदान बने हैं। मैदानों से उपर लम्बे खेत से भी थे जिन पर गाडि़यों के टायरों के निशान थे। धार काफी नीचे उतर गई थी। घर आकर उसने पति को सारा वृतांत बताया- पति ने बताया कि यह नियोजित खनन है। एक बैड के बाद दूसरा बनाया जाता है। पहले सबसे उपर वाला खेत भी लम्बा चैड़ा मैदान था। कम्पनी का एक सिस्टम है। वह चरणबद्ध ढँग से पहाड़ कुतर रही है। उसने यह भी बताया कि उसकी योजना है कि जब पहाड़ डेंजर जोन तक खनन में आ जायेगा और कम्पनी यहाँ काम करना बन्द करने वाली होगी तो वह यहाँ एक झील बनाने का प्रस्ताव करेगा। एक लम्बी झील जिसमें तरह-तरह की मछलियां हों, उसमें साईबेरिया के पक्षी आएँ और..... इससे यहाँ के जलवायु पर भी प्रभाव पड़ेगा..।
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रतना यादों के समन्दर से बाहर आई। रास्ते में आगे बढ़ी। परन्तु उसकी नजर रह-रह कर अपने उजाड़ खेतों की ओर उठती रही। वे ऐसे ही गिरे, बिगड़े थे जैसे उस दिन बिगड़े थे। आस-पास के खेतों में लोगों ने फसल लगाई हुई थी। दुःख की बात यह कि उस दिन के बाद इस ओर ऐसी चट्टानें कभी नहीं आईं। मगर इधर के जोन में जो खेत हैं वहां घुग्घू डर का प्रतीक बन गया है। उपर घुग्घू बजा कि लोगों ने बैल खोलने शुरू कर दिए। खेत जितना कात हुआ उतना छोड़ना पड़ता। क्या पता कौन सा पत्थर उनकी ओर आ जाये। कहीं उनकी गति भी रतना के पति की तरह न हो। रतना का पति एक उदाहरण बन गया है.... वे जल्दी-जल्दी नाला पार निकलने की कोशिश करते। कई बार वे काम छोड़ घर ही आ जाते.... बाद में जब फिर आते तो आधे कात खेत में दुबारा बीज डालना पड़ता क्योंकि तब तक पहले का बीज चिडि़यों का भोजन बना होता.....
यादें उसे फिर झिंझोड़ती है। वह सोचती है अपने बारे...। उस रविवार को वे तड़के खेत में आ गये थे। फटाफट हल चलाया जा रहा था। मगर पानी के बीच हल चलाना काफी दक्षता का काम है। इसलिए समय तो लगना ही था। फिर तीन खेत। रतना के पति ने जब दूसरा खेत जोत कर तीसरे की ओर रुख किया तो रतना ने कहा, ‘बस करो अब, शाम को देखेंगे। घुग्घु बजने वाला है-कहीं, पत्थर-वत्थर आ गये तो ठीक नहीं होगा। उसने ब्लास्ट की मशीन धार के इस ओर देखी है। पति ने कहा-’अभी काफी समय है। खेत छोटा है। काम पूरा हो जाएगा” मगर भाग्य-वह अभी आधा खेत ही काश्त कर पाया था कि घुग्घू बजा। रतना ने पति को कहा कि काम बन्द करे। दूसरे खेतों वाले बैल खोल कर खड्ड पार कर घर चले गये हैं- मगर वह छप-छप कर पानी में हल चलाता रहा। यह मान कि अभी आधा घण्टा है, दूसरा घुग्घू बजते ही वह बैल खोल देगा।
दूसरा घुग्घू बजते ही खेत जुत गया था। उसने बैल खोले और जल्दी-जल्दी खतरे की सीमा से बाहर जाने लगे। वे खड्ड पार कर गये थे। तभी ध्यान आया कि बैलों का जुआ वहीं रह गया है। उसने लड़के से कहा कि दौड़ कर जुआ ले आए। और लड़का दौड़ा चला गया। वह भी जुए के पास पहुँचा ही था कि उपर भारी धमाका हुआ। पूरा पहाड़ ही हिल गया। मानो भूकम्प आया हो। यह खड्ड से इधर के लोगों ने भी महसूस किया। कहते हैं कि उस दिन कम्पनी ने पहले से दुगुना ब्लास्ट मैटिरियल डाला था। देखते-देखते ढलान से विभिन्न आकार के सैकड़ों पत्थर नीचे खेतों की ओर लुढ़कने लगे। रतना के पति ने बच्चे को खतरे में देख उस ओर दौड़ लगाई।
उपर से पत्थरों के लुढ़कने का आभास बच्चे को भी हो गया। वह जुआ उठाकर खेतों के एक ओर मेंड के साथ हो लिया। डरा सा। उसे यह ध्यान नहीं रहा कि पिता उसे बचाने के लिए भी दौड़ा है।
तभी उसे एक चीख सुनाई दी। उसकी माँ की खड्ड के पार और इधर पिता की। उनके साथ घर को जाते दूसरे लोगों की भी... हजारों पत्थर उनके खेतों को बीचों-बीच से तोड़ते खड्ड में चले गये थे, पीछे धूल और खेतों का पानी और खेतों की गाद टूटी दीवारों से बहने लगे थे। घर को जाते लोग पीछे हट कर अपने खेतों की दुर्दशा देखने हटने लगे। लड़का मेंड के नीचे से बाहर आया।
रतना ने आवाज लगाई- ‘तेरा पिता कहाँ है?’ बच्चा उस ओर बढ़ा। पिता तीसरे खेत की मेंड़ के पास एक चट्टान के नीचे दबा पड़ा था। बच्चे की चीख निकली और वह चट्टान हटाने लगा। बच्चे की चीख सुन रतना उस ओर दौड़ी दूसरे लोग भी दौड़े। उसने भी चट्टान को धक्का दिया मगर विशाल चट्टान उनके बस की नहीं थी।
थोड़ी देर में इधर-उधर के गाँवों के लोगों का जमघट उनके गिर्द खड़ा हो गया। रतना धान के खेत वाले कीचड़ में लतपथ पहचानी नहीं जा रही थी। वह खूब ऊँचे रो रही थी। साथ में बच्चा भी रो रहा था। लोगों के साथ उसकी लड़की, सास-ससुर भी आ गये थे। मगर अब क्या शेष था। पति जा चुका था। वहाँ तो बस एक लाश थी। लोगों ने झब्बल से किसी तरह मृत शरीर को बाहर निकाला-
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जाने कितनी कार्रवाइयों से गुजरी रतना। उस सब कुछ के बारे में सोचती सिहर जाती है। जब भी कहीं जाती, पति के स्थान पर उसे किसी रिश्तेदार को साथ ले जाना पड़ता। बेशक वह पढ़ी-लिखी थी मगर पति के होते वह निश्चिंत थी-घर के काम के इलावा बाहर के सारे काम वहीं करता था- और अब। पति की मृत्यु पर जिस दिन मुआवजा मिला था-वह बुदबुदाई थी-क्या पैसा आदमी की कमी पूरी कर लेगा-उसके शेष जीवन के खालीपन को भर पायेगा?
मन ही मन एक प्रण ले लिया था- अब इन खेतों में चाहे सोना भी उपजे वह वहाँ नहीं जाएगी। बल्कि उस ओर जाना भी स्थगित कर देगी। भरी जवानी में पति की लाश उठी। वह बच्चे को नहीं खोना चाहती। कल बच्चे को कुछ हो गया तो...
और जाने कितने बरस बाद वह इधर से गुजर रही थी। यदि बढ़ोह में उसके रिश्तेदार के यहाँ शोक न हुआ होता और उसका जाना जरूरी न होता तो वह इधर आती ही नहीं। वह सोचती आगे बढ़ती रही। अपने खेतों की सीमा पार करते ही उसके कानां में घुग्घू की आवाज पड़ी। वह चौंकी . आवाज धार पर कहीं दूर से आई थी। वह तेज कदमों से आगे चलने लगी। उसकी साथी औरतें, मर्द आगे निकल गये थे। वह उन्हें पार करती आगे बढ़ी, बोली, घुग्घू बज गया है-दूर हटो, क्या पता आज भी वैसा ही हो... और वह आगे निकल गई, घबराई सी। एक साथिन ने कहा- घुग्घू दूर बोला है। पत्थर इस ओर नहीं आएँगे।
उसके साथियों में से एक ने कहा-’जब भी धार पर घुग्घू बोलता है-रतना बहुत डर जाती है। वह कहीं भी हो, दूर हट जाती है। दूर से तब तक धार ताकती रहती है जब तक धमाका नहीं हो जाता। धमाके के साथ उठते वटवृक्ष की तरह धूल के गुब्बार के साथ उठे पत्थरों को देखती है-कि आज कहाँ-कहाँ गिरे ? बड़ी देर तक डरी सी वहीं रुकी रहती है।’
तभी एक ने बताया- ‘इसको मालूम नहीं कि अब धमाका धरती के भीतर ही होता है-पत्थर नहीं गिरते। बाहर मात्र धूल आती है या छोटे-मोटे पत्थर।’
‘पर हिल्लण से धरती के उपर के पत्थर तो खिसक सकते हैं न?’
‘हां! पर वे कितने होते हैं?’
‘मौत के लिए एक भी काफी है।’
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रतना साथियों की बातों से बेखबर, आगे एक मोड़ पर खड़ी धमाका सुनने की मुद्रा में खड़ी हो गई थी। यहां से बढ़ोह के लिए सीधी चढ़ाई शुरू होती है। खड़े-खड़े रतना को खयाल आया। यदि इस इलाके में सड़क नहीं आती तो उसकी तबाही नहीं होनी थी। न कम्पनी आनी थी न बजना था घुग्घू। उसकी तबाही की जिम्मेवारी यहाँ सड़क लाने वाले परधान पर हैं। वह उसे गाली देती है-‘मुआ, बड़ा आया विकास करने वाला।- मेरा तो भट्ठा ही गुल कर गया।’
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उन्हे बढ़ोह से लौटते देर हो गई थी। रतना घर आई तो मवेशियों के काम में उलझ गई। वह किसी से नहीं मिल पाई। रसोई में आई तो आम दिनों की तरह चाय बनाने लगी। देखा तो पत्ती नहीं है। दुकान जाना पड़ेगा। सोचा उसने। बच्चे पड़ौस में थे। ससुर को भेजना उचित नहीं था। उसने पाकेट में पैसों के लिए हाथ डाला तो पाया कि बीड़ी भी नहीं है। वह उठी और स्वयं दुकान की ओर चली गई। दुकान पर काफी लोग थे। उनमें प्रधान भी था। उसे देख उसका पारा चढ़ गया। मन ही मन उसे गाली दी। फिर उसने उसकी ओर पीठ कर दुकानदार से सौदा माँगा। तभी उसके कानों में हरिये के शब्द पड़े-‘मुए साइरन बजाते तो...ये तो पहले तय है कि...ये गुप्त धमाका करना तो ठीक नहीं ।’ वह मुड़ी। पूछा-‘क्या हुआ?’
‘होना क्या, आज फिर पत्थर आये। ये तो शुक्र मनाओ उस ओर कोई रास्ता नहीं है। सारे पत्थर धान के खेतों में जा पड़े। देविए के तो सारे खेत ही भर गये।’
‘कहाँ?’
‘इधर हवाणी को ओर। सूरतू बता रही थी कि उसने सारा नजारा देखा। एकाएक छोटी-बड़ी चट्टाने ढलान से लुढ़कने लगी। वह तो ऊँध रही थी। पर जब हड़ड़ का शोर उत्तरोत्तर बढ़ने लगा तो चौंकी।’
‘आज घुग्घू नहीं बजा।’
‘बजाया होगा। इधर तो किसी ने नहीं सुना।’
‘मरेंगे लोग। मरेंगे। ये कम्पनी कुछ लालची लोगों की देन है। इनको तो ठेके चाहिए। किसी का घर उजड़े इससे उन्हे क्या?’ उसने प्रधान को इंगित कर कहा।
इधर दुकानदार ने कहा-‘भई नुकसान के लिए कम्पनी को फोन करो। काफी दिन हो गये कम्पनी से बात किए। तुम सीधे लोगों तो कम्पनी ने भगा देना यहाँ से बिना मुआवजा लिए।’
‘नुक्सान तो वे दे देंगे। पर खतरे के बारे में सोचना जरूरी है।’ एक बोला।
दूसरे ने कहा-‘फोन कर दिया है। बोले कल देखेंगे। मैनेजर बड़ी लापरवाही से बोला था। जब जोर से कहा तो बोला-भाई कम्पनी काम कर रही है। पत्थर तो आयेंगे ही। इसी लिए हमने डेंजर जोन बनाया है। आप लोग सेफ्टी बरता करो...’
‘माना डेंजर जोन बनाया है। पर सार्वजनिक रास्ता तो वहीं से गुजरता है।’ दुकानदार बोला।
‘सो तो है। पर अब क्या किया जा सकता है? हमसे पहले ही चूक हो गई है।’ हरिया बोला। चर्चा में दम न देख रतना सौदा लेकर घर आ गई। चलते-चलते उसके भीतर घुग्घू बजने लगा था। सारी आवाजें एक साथ सुनाई देने लगी थी। उन आवाजों के साथ वह घर की ओर बढ़ने लगी। दुकान पर चर्चा जारी थी।
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जीवन वृत्त
बद्री सिंह भाटिया का जन्म 4 जुलाई, 1947 को सोलन जिले की अर्की तहसील के गांव ग्याणा में।
शिक्षाः स्नात्कोत्तर (हिन्दी) तथा लोक सम्पर्क एवं विज्ञापन कला में डिप्लोमा।
प्रकाशित कृतिया: ठिठके हुए पल, मुश्तरका जमीन, छोटा पड़ता आसमान, बावड़ी तथा अन्य कहानियां,यातना शिविर, कवच, और वह गीत हो गई (सभी कहानी संग्रह), पड़ाव(उपन्यास), कंटीली तारों का घेरा(कविता संग्रह), सूत्रगाथा और धन्धा (कहानी संग्रह, सहयोगी सम्पादन)। इसके इलावा अनेक सम्पादित संग्रहों में कहानिया संकलित तथा देश की अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित, कुछ कहानियां अनूदित भी।
* पहली सरकारी नौकरी के समय में मेडिकल कालेज शिमला की कर्मचारी यूनियन की पत्रिका तरु-प्रछाया का सम्पादन, कालान्तर में सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग में नौकरी के साथ साप्ताहिक पत्र ’गिरिराज’ और मासिक पत्रिका”हिमप्रस्थ’में सम्पादन सहयोग।
**सम्मानः साहित्यिक यात्रा में हि. प्र. कला,संस्कृति एवं भाषा अकादमी द्वारा पड़ाव (उपन्यास, 1987) तथा कवच (कहानी संग्रह, 2004) पुरस्कृत। हिम साहित्य परिषद मण्डी द्वारा 2001 में साहित्य सम्मान तथा हिमोत्कर्ष साहित्य, संस्कृति एवं जन कल्याण परिषद ऊना द्वारा 2007 में हिमाचल श्री साहित्य पुरस्कार से सम्मानित।
***अन्यः अर्की-धामी ग्राम सुधार समिति और ग्याणा मण्डल विकास संस्था के अध्यक्ष पद पर रहते हुए समाज सेवा तथा विभिन्न कर्मचारी यूनियनो, एसोसिएशनों में अनेक गरिमामय पदों पर सक्रिय भागीदारी।
**** अर्पणा(साहित्यिक एवं वैचारिक मंच) के अध्यक्ष पद पर भी कार्य।सम्प्रतिः हि. प्र. सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग, शिमला से सम्पादक पद पर से फरवरी,2005 में सेवा निवृत के पश्चात स्वतंत्र लेखन और पैतृक गांव ग्याण में कृषि कार्य में संलग्न.
सम्पर्कः (1) 2-हरबंस काटेज, संजौली, शिमला-171006।
(2) गांव ग्याणा, डाकधर मांगू, वाया दाड़ला घाट, तहसील अर्की, जिला सोलन, हि. प्र. मोबाइलः 094184-78878

मंगलवार, 30 मार्च 2010

वातायन - अप्रैल, २०१०



हम और हमारा समय

पुरस्कारों का घमासान

रूपसिंह चन्देल

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कारों के अतिरिक्त सभी सरकारी-गैर सरकारी पुरस्कारों (साहित्य अकादमी सहित) की घोषणा के उपरांत उन पर वाद-विवाद होता रहा और होता रहेगा. इसका कारण उनके चयन की विश्वसनीयता और उन्हें प्राप्त करने वाले साहित्यकारों की पात्रता होती है. पिछले दिनों साहित्य अकादमी बहुदेशीय कारोबारी कंपनी सामसुंग के सहयोग से प्रदान किये गये पुरस्कार के कारण विवाद में घिरी और दुर्भाग्यपूर्णरूप से उस पुरस्कार के साथ रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम जोड़ा गया. वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने जनसत्ता में इस मुद्दे को उठाया, जिसके पक्ष और विपक्ष में अनेक लेखकों ने अपने मत व्यक्त किए. वह विवाद अभी चल ही रहा था कि हिन्दी अकादमी दिल्ली का वर्ष २००८-०९ का शलाका सम्मान सम्बन्धी विवाद उठ खड़ा हुआ. इस सम्मान का निर्णय कार्यकारिणी समिति ने वरिष्ठतम कथाकार कृष्ण बलदेव के पक्ष में किया था. हिन्दी अकादमी के पुरस्कारों का निर्णयन कार्यकारिणी समिति ही करती है. बाद में अकादमी की अध्यक्ष (दिल्ली की मुख्य मंत्री) की अध्यक्षता में संचालन समिति उसे अंतिमरूप से स्वीकृति प्रदान करती है. इस पुरस्कार को भी मार्च २००९ में स्वीकृत किया गया और स्पष्ट है कि अकादमी की अध्यक्ष शीला दीक्षित जी ने इस पर अपनी अंतिम मोहर लगा दी, लेकिन २००८-०९ और २००९-१० के पुरस्कारों की घोषणा के समय २००८-०९ के शलाका सम्मान को छोड़कर ( जो वैद जी के लिए तय किया गया था) शेष सभी को यथावत घोषित किया गया. कहते हैं ऎसा कांग्रेसी नेता पुरुषोत्तम गोयल द्वारा कृष्ण बलदेव वैद की कृतियों में अश्लीलता के आरोप के कारण किया गया. लेकिन अपुष्ट समाचार के अनुसार इसके पीछे एक बड़े साहित्यकार का हाथ था, क्योंकि अकादमी अध्यक्ष को गोयल जी ने ३१.०३.२००९ को जो पत्र लिखा , उसकी भाषा इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि पुरुषोत्तम गोयल ने शायद ही वैद जी की कोई कृति पढ़ी होगी. पत्र में गोयल साहब ने लेखक के उपन्यास ’नसरीन’ से एक पृष्ठ की सामग्री उद्धृत की जिसमें मां की गाली का प्रयोग किया गया है. इसी पत्र में वैद जी के प्रति असम्मानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए वह आगे लिखते हैं -- " इस आदमी ने श्री अशोक बाजपेयी की शराब संस्कृति के सम्बन्धों के चलते इस पुरस्कार की सिफारिश करवा ली..... "
गोयल साहब के आरोपों से महत्वपूर्ण उनके पत्र का वह अंतिम अंश है जिसमें वह शीला जी को लिखते हैं --"उपन्यास अंश की जांच किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र विशेषज्ञ से करवा लें ." और पत्र का यही वह अंश है जो यह संदेश उत्पन्न करता है कि क्या गोयल जी ने ’नसरीन’ पढ़ा था ? और अध्यक्ष ने गोयल जी की सिफारिश मानकर क्या किसी ’निष्पक्ष और स्वतंत्र विशेषज्ञ’ से उसकी जांच करवायी थी ? अध्यक्ष स्वयं साहित्य मर्मज्ञ हैं. कम से कम वह स्वयं ही उन अंशों पर दृष्टिपात कर सकती थीं. संभव है उन्होंने अकादमी के विद्वान उपाध्यक्ष को यह कार्य सौंपा हो, जिनके ’च्यौं रे चम्पू’ का लोकार्पण करते समय उन्होंने उसे हिन्दी साहित्य की महानतम रचना बताया था और उससे प्रभावित महात्मा गांधी के ’हिन्द स्वराज’ को अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर की कृति बता दी . राजनीतिज्ञों से ऎसी भूल-चूक होती रहती हैं. अपने प्रिय व्यक्ति के पक्ष में की गई भूल-चूक के परिहार की आवश्यकता भी उन्हें नहीं होती. और हो भी क्यों ? चक्रधर कोई मामूली व्यक्ति नहीं हैं ? ’हिन्दी अकादमी’ (दिल्ली) और ’केन्द्रीय हिन्दी संस्थान’ (आगरा) के बोझ संभालने वाला व्यक्ति साधारण नहीं हो सकता . फिर यदि सत्ता की ताकत उसके साथ हो तब उसकी शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है. ऎसा असाधारण व्यक्ति ही वैद प्रकरण में अकादमी के पक्ष में खड़ा होकर कह सकता है कि उस पुरस्कार की जब घोषणा ही नहीं हुई तब वैद जी का अपमान कैसा ?
लेकिन कुछ लेखकों को वैद जी का अपमान सम्पूर्ण हिन्दी लेखक समुदाय का अपमान लगा और उन्होंने अपने स्वीकृत पुरस्कारों को अस्वीकार करने की घोषणाएं कर दीं. केदारनाथ सिंह जी को वर्ष २००९-१० का शलाका सम्मान घोषित हुआ था ---- वैद जी के अपमान से आहत उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया. पुरुषोत्त्तम अग्रवाल, पंकज सिंह, रेखा जैन, गगन गिल, और विमल कुमार ने भी अपने द्वारा स्वीकृत पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया. इस कड़ी में वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता का नाम भी शामिल हो चुका है, जिनका पत्र मुझे इन पंक्तियों को टाइप करते समय प्राप्त हुआ है. निश्चित ही इन साहित्यकारों का निर्णय श्लाघनीय हैं. लेकिन अकादमी से सम्बद्ध वरिष्ठ कथाकार असगर वज़ाहत का यह कथन समझ से परे है कि एक बार स्वीकार करने के बाद पुरस्कार लौटाना नहीं चाहिए था. क्या असगर भाई ने वैद जी के अपमान की पीड़ा अनुभव नहीं की ? केदार जी और पुरुषोत्तम अग्रवाल ने स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्हें पता ही नहीं था कि वैद जी के नाम पर मोहर लगने के बाद उन्हें इंकार किया गया. जब ज्ञात हुआ उन्होंने पुरस्कार लौटा दिए. पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों के साथ भी ऎसा ही हुआ होगा.
बात कुछ भी हो , वास्तविकता यही है कि यह वैद जी का ही अपमान नहीं , सम्पूर्ण हिन्दी लेखक समुदाय का अपमान है और जिन साहित्यकारों ने अभी तक पुरस्कार नहीं लौटाए उन्हें भी विरोधस्वरूप पुरस्कार अस्वीकृत कर देना चाहिए , जिससे राजनीतिज्ञों और उनके तलवे चाटने वालों को यह संदेश जा सके कि साहित्यकार कोई कमजोर जीव नहीं और न ही पुरस्कार उससे बड़ा होता है. उन्हें आलू के बोरे (सात्र के शब्दों में ) की जरूरत नहीं. हालांकि भीड़ में कुछ लोग ही शहीद हुआ करते हैं और इतिहास उनसे ही बनता है.
अब कुछ बातें कार्यकारिणी समिति की निर्णायक स्थिति पर भी . निर्णायक समिति के पास दिल्ली या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के साहित्यकारों की वरिष्ठता-क्रमानुसार तैयार कोई सूची नहीं है. यही कारण है कि पिछले वर्षों में एक-दो पुस्तकों के लेखकों को भी साहित्यकार पुरस्कार से नवाजा जाता रहा. अपुष्ट समाचारों के अनुसार इसमें अकादमी के उपाध्यक्ष और सचिव की अहम भूमिका होती है. अर्थात वे कार्यकारिणी समिति के अन्य सदस्यों पर भारी पड़ते रहे हैं. यदि रचनात्मक योगदान के आधार पर वरिष्ठता सूची तैयार होती तब ’वाह कैंप’ और ’धुव सत्य’ जैसे उल्लेखनीय उपन्यासों के लेखक पचहत्तर वर्षीय द्रोणवीर कोहली का नाम २००८-०९ की सूची में शामिल न होता. उन्हें अंतिम दशक में ही यह पुरस्कार मिल जाना चाहिए था. ’विष्णुगुप्त चाणक्य’ जैसा कालजयी उपन्यास लिखने वाले ८३ वर्षीय वीरेन्द्र कुमार गुप्त को तो शायद कार्यकारिणी के सदस्य जानते ही न होंगे, लेकिन उन्हें जैनेन्द्र कुमार की पुस्तक -’समय और हम’ की याद अवश्य होगी. यह साक्षात्कारों की विश्व की सबसे बड़ी पुस्तक है, जिसके साक्षात्कर्ता वीरेन्द्र कुमार गुप्त थे. दुर्भाग्य से जैनेन्द्र जी के छल के कारण वह पुस्तक उनके नाम से नहीं जैनेन्द्र जी के नाम से प्रकाशित हुई थी. यदि वीरेन्द्र कुमार गुप्त के प्रश्न न होते तब जैनेन्द्र जी के उत्तर कैसे हो सकते थे. इन वरिष्ठ लेखकों की ओर से कार्यकारिणी समितियां अपना पल्ला नहीं झाड़ सकतीं. उनकी जवाबदेही इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी. यदि अकादमी वरिष्ठता-क्रम सूची तैयार कर ले और उसे तैयार करने में निष्पक्षता और पारदर्शिता का परिचय दिया जाए तब शायद अकादमी के विरुद्ध उठने वाली उंगलियों की संख्या कम होगी----- हालांकि तब भी पुरस्कार हड़पने के जुगाड़ु़ओं और चाटुकारों से अकादमी अपने को कैसे बचा पाएगी यही उसके लिए चुनौती होगी और इसीसे उसकी सफलता -असफलता निर्धारित होगी.
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वातायन के अप्रैल अंक में प्रस्तुत हैं वरिष्ठ कथाकार, आलोचक और पत्रकार महेश दर्पण के यात्रा संस्मरण पुस्तक ’पुश्किन के देस में’ से एक महत्वपूर्ण अंश, वरिष्ठ कवि अशोक आंद्रे की कविताएं और वरिष्ठ कथाकार बलराम अग्रवाल की कहानी . आशा आपको अंक पसंद आएगा. आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.

पुस्तक अंश

महेश दर्पण की यात्रा-संस्मरण पुस्तक ’पुश्किन के देस में’ से एक महत्वपूर्ण अंश :
पुश्किन पुरस्कार ग्रहण करने के लिए महेश दर्पण रूस गए. पुरस्कार उन्होंने प्राप्त किया और ’पुश्किन के देस में’ यात्रा पुस्तक हिन्दी पाठकों को प्राप्त हुई. इस महत्वपूर्ण यात्रा पुस्तक में रूस का वर्तमान परिदृश्य ही नहीं उसका अनछुआ अतीत भी उद्घाटित हुआ है. महेश दर्पण हिन्दी के उन कथाकारों में हैं जो रेगिस्तान से भी मोती चुन लाने की क्षमता रखते हैं. कभी शंकरदयाल सिंह की सोवियत संघ की यात्रा के संस्मरण साप्ताहिक हिन्दुस्तान में पढ़े थे और उन दिनों उनकी पर्याप्त चर्चा रही थी. उसके बाद भी कई साहित्यकारों-पत्रकारों ने सोवियत संघ पर यात्रा संस्मरण लिखे, लेकिन ल्युदमीला ख़ख़लोवा (प्लैप) की इस बात से असहमति का कोई कारण नहीं कि -सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस काफी बदल गया है. रूस का जीवन भी अब पहले जैसा नहीं रहा. महेश दर्पण ने इसी बदले हुए जमाने का बेहद आत्मीय, सच्चा और सहज चित्र प्रस्तुत किया है. बदले रूस को जानने के लिए दर्पण की यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की भांति है. प्रस्तुत है इससे एक महत्वपूर्ण अंश :
मास्को में तोल्स्तोय का संग्रहालय
महेश दर्पण
मास्को स्थित तोल्स्तोय संग्रहालय दरअसल १८६८ में एक लॉज हुआ करता था. यहां तब एक कोस्चवान और सहन की देखभाल करने वाले रहा करते थे. तोल्स्तोय संग्रहालय देखकर लेखक के उन दिनों की कल्पना बखूबी की जा सकती है. मैं और अनिल अचानक ही यहां आ पहुंचे थे.
इसका डाइनिंग रुम देखने लायक है. कहते हैं, यहा सिर्फ मेहमानों को ही वाइन पेश की जाती थी. १८९३ में तात्याना ने बेटी मारिया का जो चित्र बनाया था, वह यहीं रखा हुआ है. उस वक्त की एक जर्मन घड़ी भी सजी हुई है. ठीक सामने एक बड़ी खिड़की है. इसके साथ ही लगे दूसरे कमरे में रहने वाले, परिवार के लोग, बदलते रहते थे. उसी वक्त का खास सामान यहां रखा गया है. लेखक के बेटे सर्गेई की पत्नी का चित्र , तोल्स्तोय की पत्नी का पलंग, पियानो और तमाम दूसरी चीजें यहां देखी जा सकती हैं.
म्यूजियम के बहाने अंतरंग जीवन-कथा भी खुलती है लेखक की. १८८८ से पति-पत्नी का शयन कक्ष तीसरा कमरा हो गया. आखिरी बेटे के जन्म के बाद पलंग अलग कर लिए गए थे. यहीं मेज पर सोफिया पति की रचनाओं के प्रूफ और घर का हिसाब देखा करती थीं. वह कहानियां भी लिखती थीं. संगीत में तो उनकी दिलचस्पी थी ही, वह फोटोग्रफी भी किया करती थीं. ज्यादातर कामकाज उन्हीं के निर्देशन में हुआ करता था. यही वजह है कि यहां मेहमानों की लिस्ट, हिसाब-किताब और बिल आदि भी सहेज कर रखे गए हैं.
तोल्स्तोय के पलंग पर रखा हुआ कंबल कभी खुद पत्नी ने बुना था. किसी खास अवसर के लिए तैयार कराया गया आमंत्रण पत्र भी रखा हुआ है. अपने सबसे छोटे बेटे के साथ सोफिया आंद्रेवना का चित्र भी देखा जा सकता है जो कलाकार गे ने बनाया था.
चौथा कमरा बच्चों का है. पहले तीन बच्चे यहीं रहते थे. दो बेटे और एक बेटी. बाद में अलेक्सांद्रा बड़ी होकर इस कमरे से चली गई. इस कमरे में १३वें बच्चे वान्या का सारा सामान सुरक्षित रखा हुआ है.
वान्या को लेखक खूब प्यार करते थे. उन्हें यकीन था कि छोटा बेटा ही उनका प्रभु सेवा का काम पूरा करेगा. यह कमरा उसकी स्मृतियों को संजोए है. यहां आप सर्गेई की लिखी एक कहानी का संपादित रूप देख सकते हैं. यहां रखे दस्तावेज बताते हैं कि १८९५ में वान्या सात साल का होकर मर गया. दो पलंग हैं जिनमें से एक पर आया और एक पर बच्चा सोया करता था. दरवाजे पर ही झूले के कांटे लगे हुए हैं. एक पक्षी का पिंजरा रखा हुआ है. कई हस्तशिल्प और खिलौने उस समय की कला से परिचित कराते हैं.
एक कमरा बच्चों की पढ़ाई का है. इसे देख कर पता लगता है कि सामान्य पढ़ाई के अलावा यहां विदेशी भाषाएं भी सीखी जाती थीं. अलेक्सांद्रा के अलावा यहां गवर्नेस हमेशा रहा करती थी. वह आमतौर पर जर्मन या फ्रेंच में बोला करती थी. सोफिया भी जर्मन पढ़ा देती थीं. कुर्सी की गद्दियों पर कढ़ाई तोल्स्तोय की पत्नी ने की है. यहां उस वक्त इस्तेमाल होने वाला लकड़ी का संदूक और कुछ बर्तन भी रखे हुए हैं.
इस कमरे को पार कर के आप नौकरानियों के कमरे तक जा पहुंचेंगे. इनका काम हुआ करता था कपड़े धोना, प्रेस करना और जरूरी मरम्मत. खली समय में ये मेज के पास आकर चाय पिया करती थीं. इनमें से एक नौकरानी मरीया ने रसोइए से शादी कर ली थी. इस कमरे की विशेषता यह है कि यहां से आप बाहर भी जा सकते हैं और ऊपर भी. यहीं से खाना लाया जाता था.
सातवें कमरे में दो बेटे आंद्रेई और मिखाइल रहा करते थे. इन लोगों के पलंग अब भी यहीं रखे हैं. ये वॉयलिन और हारमोनियम बजाया करते थे. उनकी मेज भी यहीं रखी हुई है. आठवां कमरा बेटी तात्याना का है. कमरे की खूबसूरती उसके बताए गए मिजाज के अनुरूप ही है. उसने चित्रकारी और कढ़ाई बाकायदा सीखी थी. उसके बारे में कहा जाता है कि वह काफी मिलनसार, दयालु और खुशमिजाज थी. उसे छोटे बच्चों की बड़ी चिंता रहती थी. यही नहीं, जब कभी मां-बाप में तनातनी हो जाती, समझौता भी यही कराती थी. वह गे, रेपिन और कसातकिन जैसे चित्रकारों की मित्र थी. इस कमरे में रखे तात्याना के कई पोट्रेट इन्हीं चित्रकारों के बनाए हैं. इस कमरे की एक मेज पर काला मेजपोश बिछा है. इस पर मेहमानों के हस्ताक्षर मौजूद हैं. उन पर कढ़ाईदार काम भी है.
इसके बाद खाना सर्व करने वाला कमरा आता है. यहां उस जमाने मिट्टी के तेल का एक लैंप रखा हुआ है. यहां दून्या रोज ऑमलेट बनाया करती थी. घर के लोग उससे कॉफी और खिचड़ी भी बनवा लेते थे. शेल्फों में बर्तन सजे हैं.यहीं पास में एक अलमारी में तोल्स्तोय का कोट रखा है. इसका साइज बता है कि वह कितने लंबे-तगड़े थे. (उनके मित्रों के संस्मरणों में यह स्पष्ट मिलता है कि तोल्स्तोय लंबे नहीं --- सामान्य कद के थे - रूपसिंह चन्देल)
नीचे की मंजिल में तोल्स्तोय खुद रहते थे और ऊपर मेहमानों को टिकाते थे. आप जरूर जानना चाहेंगे कि मेहमानों में अक्सर आने वालों में कौन लोग होते थे. इनमें थे : चेखव, लेस्कोव, बूनिन, अस्त्रोवस्की और गोर्की.
ऊपर जाने के लिए, पहले नकली भालू के हाथ में विजिटिग कार्ड रखते थे लोग. ये वे दिन थे जब बिजली नहीं हुआ करती थी. इसीलिए गैलरी में चित्रों के मॉडल रखे हैं.यही थी चित्र बनाने की जगह. यहां घोड़ों के दो चित्र आज भी आप देख सकते हैं. ये हैं : ’ताकत का अंदाजा बुड़ापे में’ और ’ताकत का अंदाजा जवानी में’. ये दोनों चित्र स्वेर्चकोव के हैं. ये उन्होंने तोल्स्तोय को भेंट किए थे.
हॉल में संगमरमर इंप्रेशन का वॉल पेपर लगा है. यहां गोष्ठी और पारिवारिक समारोह हुआ करते थे. इन समाराहों में स्क्रियाबिन, रहमानिनफ, रीम्स्की, कोर्साक, रानेमेव और शल्यापिन जैसे संगीतकार आया करते थे. यहां आप तोल्स्तोय की वह मूर्ति भी देख सकते हैं जो गे ने खुद बना कर उन्हें भेंट की थी. १८५८ में मारे गए रीछ की खाल भी यहां रखी हुई है. कहते हैं, इस रीछ ने लेखक पर हमला कर दिया था.
तोल्स्तोय मेहमानों का जमकर स्वागत करते थे. खासकर ईस्टर के मौके पर. ईस्टर पर्व मनाते हुए कई चित्र यहां उनके साथ विशेष लोगों के देखे जा सकते हैं.एक बड़ी शतरंज भी यहां रखी है. आप चाहें तो रिकार्ड की गई तोल्स्तोय की आवाज भी सुन सकते हैं. इसमें वे गांव के स्कूली बच्चों को संबोधित कर रहे हैं. जो कुछ मैं सुन पाया, उसका आभिप्राय लीन ने मुझे यह बताया : ’शुक्रिया बच्चो कि आप मेरे पास आते हैं. मैं खुश हूं . मुझे मालूम है कि आप में ऎसे बच्चे भी हैं जो पढ़ाई नहीं करते . वे शैतानी करते हैं. बड़े होने पर आप लोग मुझे याद करेंगे.’
वैसे रिकार्ड तो उस म्यूजिक का भी रखा है जो तोल्स्तोय की पोती बजाया करती थी. गेस्ट रूम में कलाकार सोरोव का बनाया सोफिया का खूबसूरत चित्र रखा है. दूसरा चित्र रेपिन का बनाया तात्याना का सजा है. गे का बनाया मरीया का चित्र भी यहां मौजूद है. देखने वाला सोच सकता है कि ये मूल चित्र हैं, लेकिन आप इसे देख कर जब खुश हो रहे हों तो यह भी याद रखिएगा कि तोल्स्तोय खुद इसे बोर मेहमानों का कमरा कहा करते थे.
यहां वह कभी-कभी ही मिलने आया करते थे. यहां अक्सर घर की मालकिन की सहेलियां आकर बैठा करती थीं. यहीं वह छोटी-सी मेज भी है जिस पर बैठ कर सोफिया पति की रचनाओं के प्रूफ देखा करती थी. आखिरी कमरे में यहीं वह पलंग भी रखा हुआ है जिस पर लेखक सोए थे. यहां आपको परिवार के तमाम सदस्यों की तस्वीरें नजर अएंगी. वे उपहार भी बाकायदा सजें हैं जो बच्चों ने लेखक को शादी के ३० बरस पुरे होने पर भेंट किए थे.
इस म्यूजियम में यह गौर करने लायक बात है कि मरीया के कमरे की छत सबसे नीची है. वही पिता की रचनाओं का पुनर्लेखन , उनके पत्रों के उत्तर देने का काम करती और फ्रांसीसी से अनुवाद करती थी. यहां मेज पर बिछे मेजपोश पर परिवार में मेहमान बनकर आए लोगों के हस्ताक्षर नजर आते हैं. वह कबल भी रखा हुआ है जिसे सोफिया ने बनाया था. घर की मैनेजर अवरोतिया थी, जो ३० साल से भी ज्यादा सेवा में रही. कुल दस नौकर थे.
एक कमरे में तोल्स्तोय परिवार की महिलाओं के वस्त्र रखे हुए हैं.
वह कमरा, जहां मुख्य नौकर इल्या सिदोरको खाना लगाता था, उसी तरह से सहेजकर रखने की कोशिश की गई है. उसे लेखक द्वारा बाकायदा मेहमानों के आने की सूचना दी जाती थी. लैंप में तेल वही डाला करता था. वही बच्चों और सोफिया को शहर ले जाता था. सच पूछें, तो यह लेखक का सबसे विश्वस्त नौकर था. शायद इसीलिए अपनी कई किताबें, प्रिय सामान और तस्वीरें लेखक ने उसे भेंट की थी. यहां मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि बीमारी के दिनों में तोल्स्तोय की सबसे ज्यादा सेवा इसी ने की थी. हालांकि सच यह भी था कि लेखक को किसी की मदद लेना कतई पसंद नहीं था. इसके पीछे उनकी वह धारणा सबसे ज्यादा काम करती थी कि किसी को नौकर मानना नैतिक रूप से खराब है. इस कमरे में एक फ्रेंच कलाकार का बनाया इसी नौकर का चित्र सजा हुआ है.
लिखने -पढ़ने के कमरे में दीवारें रंगी हुई हैं. जमीन पर चटाई बिछी है. फर्नीचर कम, लेकिन भारी है. तोल्स्तोय नौ से दस बजे के बीच यहीं बैठ कर लिखा करते थे और फिर अंतराल होता था. इसके बाद तीन से चार बजे के चीच लेखन होता था. इसके बाद वह पत्र लिखते थे. यहीं उन्हॊंने ’पुनरुत्थान’, ’फादर सर्गेई’, ’इवान इलिच’, ’जीवित शव’ और ’मुझे क्या करना चाहिए’ जैसी किताबें लिखीं. धर्म से मोह टूटने के बाद धर्म सभा को उत्तर भी उन्होंने यहीं से लिखा. लेखक को कुर्सी की ऊंची टांगें पसंद नहीं थीं. कुर्सी के पैर उन्होंने खुद काटकर छोटे किए थे. ये वे दिन थे जब लेखक की नजर कमजोर हो गई थी. कुर्सी को कम ऊंचा रखने का कारण यही था कि तोल्स्तोय उन दिनों ज्यादा झुकना नहीं चाहते थे. काम करते-करते थक जाते तो खड़े होकर स्टैंड पर लिखने लगते थे. काम के बाद जिन चौड़ी कुर्सियों पर लेखक आराम करते थे, वे भी यहीं रखी हैं. यहीं वह घर आए लेखकों से मुलाकात किया करते थे.
इस कमरे के बाहर लेखक के जूते रखे हुए हैं. उनके कपड़े, साइकिल और खेत में काम करने का जरूरी सामान भी रखा है.
सात बजे उठ कर तोल्स्तोय बाहर के कमरे में नहाया करते थे. कमरों की सफाई वह खुद किया करते थे. सर्दियों में लकड़ी काटना और फिर उन्हें उठा कर लाना उनके लिए रोजमर्रा के कामों में शुमार था. अपने कमरे में भट्टी भी वह खुद ही जलाते थे. दूर से पानी लाने के लिए वह बर्फगाड़ी का इस्तेमाल किया करते थे. इन तमाम कामों से संबद्ध उनकी कई चीजें आज भी वहा रखी हैं. घूमने के बाद अक्सर तोल्स्तोय जूते बनाया करते थे. जूते बनाना उन्होंने मास्को में रहकर ही सीखा था. इस में काम आने वाली चीजें यहीं सहेज कर रखी गई हैं.
तात्याना के पति के लिए १८९९ में लेखक ने यहीं जूता बनाया . यहीं फेत नाम के कवि के लिए भी उन्होंने जूता बनाया. उनका बनाया एक जूता यहां रखा हुआ है. आप यहीं वह साइकिल भी देख सकते हैं जो तोल्स्तोय चलाया करते थे. उन्हें मुग्दर चलाने का शौक तो था ही, कहते हैं लेखक ने ६७ बरस की उम्र में भी साइकिल चलाई. ये तमाम चीजें साहित्य प्रेमियों के लिए प्रदर्शित हैं.
कहते हैं, यह सब लेखक की पत्नी ने सरकार को बेच दिया था. बाद में सरकार ने १९११ में यहां म्यूजियम बना दिया. दुनिया-भर से आए लोग इसे देखने का मोह नहीं छोड़ पाते . इसके रख-रखाव में अब अच्छा-खासा खर्च होता है. शायद यही वजह है कि इस म्यूजियम में प्रवेश के लिए हमें १५० रूबल का टिकट लेना पड़ा. फोटॊ खींचने के लिए १०० रूबल अलग से. हां, आप पिछले दरवाजे के पास या बाहर वाले कमरे का फोटो खींचना चाहें तो बगैर कुछ दिए खींच सकते हैं. म्यूजियम से, हमारे बाहर पहुंचते ही आइसक्रीम वाले लड़के ने कहा : ’गुड मॉर्निंग . अनिल ने उससे ’द्रास्तुइचे’ कहा तो वह शर्मा गया. उसके साथ की सुंदरी भी हंस पड़ी.
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कल्याणी शिक्षा परिषद , ३३२०-२१, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली-११००२२.
मूल्य ३००.०० , पृष्ठ २२४
आवरण : निर्दोष त्यागी
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कुमाऊं मूल के एक सैन्य-परिवार में महेश दर्पण का जन्म १ जुलाई, १९५६ को तोतारानी, धर्मशाला (हि.प्र.) में हुआ. देश के कई शहरों में शिक्षा ग्रहण करते हुए अंततः एम.ए.(हिन्दी).
*’विश्ववाणी’, ’सूर्या’, ’सारिका’, ’दिनमान’ और ’नवभारत टाइम्स’ के सम्पादन विभाग में जुड़े रहे महेश जी का साहित्यिक पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान है. उनकी कहानियां भीड़ से एकदम अलग आत्मीय आकर्षण लिए हैं जिन्हें आप ’अपने साथ’, ’चेहरे’, ’मिट्टी की औलाद’, ’वर्तमान में भविष्य’, ’जाल’, ’इक्कीस कहानियां’, और ’ एक चिड़िया की उड़ान’ में पढ़ सकते हैं. उनका साहित्य चिंतन झलकता है ’रचना परिवेश’ और ’कथन-उपकथन में’. वह हिन्दी कहानी के एक तटस्थ सम्पादक हैं, जिसकी पहचान उनके द्वारा सम्पादित ’बीसवी शताब्दी की हिन्दी कहानियां’, ’स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी कोश’, ’प्रेम कहानियां’, ’राजधानी की कथायात्रा’, ’प्रेमचन्द की चर्चित कहानियां’, ’जयशंकर प्रसाद की चर्चित कहानियां’, ’रमाकांत का संग्रह, ’जिन्दगी भर का झूठ’ ’अवधनारायण मुद्गल समग्र’ जैसी स्थायी महत्व की पुस्तकों से की जा सकती है. ’पुश्किन सम्मान’ (रूस), ’साहित्यकार सम्मान’, ’कृति सम्मान’ (हिन्दी अकादमी), ’सुभाष चंद्र बोस सम्मान’, ’पीपुल्स विक्ट्री अवार्ड’ और ’नेपाली सम्मान’ से समानित महेशजी की कहानी ’छल ’ पर अमिताभ श्रीवास्तव द्वारा बनाई गई फिल्म भी प्रशंसित हुई है.
संप्रति : टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के सांध्य टाइम्स में कार्यरत.
संपर्क : सी-३/५१, सादतपुर, दिल्ली-११००९४
ई मेल : darpan.mahesh@gmail.com


कविता


वरिष्ठ कवि अशोक आंद्रे की दो कविताएं
(१)
घर की तलाश
मुद्दतों के बाद लौटा था वह
अपने घर की ओर,
उस समय के इतिहासिक हो गए घर
के
चिन्हों के खंडहरात
शुन्य की ओर
ताकते दिखे प्रतीक्षारत .
उस काल की तमाम स्मृतियाँ
घुमडती हुई दिखाई दीं ,
हर ईंट पर झूलता हुआ घर
भायं-भायं करता दीखा,
दीखा पेड़ , जिसके नीचे माँ
इन्तजार करती थी
बैठ कर
शाम ढले पूरे परिवार का .
उसी घर के दायें कोने में पड़ी
सांप की केंचुली
चमगादड़ों द्वारा छोडी गयी दुर्गन्ध
स्वागत का दस्तरखान
लगाए मिलीं ,
जबकि दुसरे कोने में
मकड़ी के जालों में उलझी हुई
स्मृतियों के साथ
निष्प्राण आकृतियाँ झूल रही थीं
घर के आलों में
भी काफी हवा भर गयी थी
जिसे मेरी सांसें उनसे पहचान
बनाने की
कोशिश कर रही थीं,
हाँ, घर की टूटी दीवार पर लटकी
छड़ी
बहुत कुछ आश्वस्त कर रही थी
टूटे दरवाजों के पीछे
जहां कुलांचें भरने के प्रयास में
जिन्दगी
उल्टी- पुलटी हो रही थी,
उधर आकाश चट कर रहा था-
उन सारी स्थितियों को
जिन्हें इस घर की चहारदीवारी में
सहेज कर
रख गया था
इड़ा तो मेरे साथ गयी थी
लेकिन उस श्रद्धा का कहीं कोई
निशान दिखाई
नहीं दे रहा था
जिसे छोड़ गया था घर के दरवाज़े
को बंद
करते हुए,
अब हताश, घर के मध्य
ठूंठ पर बैठा हुआ वह
निर्माण के सारे तथ्यों को ढूंढ रहा
था,
जिसका सिरा बाती बना इड़ा के
हाथ पर
जलते दीये में ही दिख रहा था,
बीता हुआ समय कल का अंतर बन
कर
खेत में किसी मचान सा दिख रहा
था
जिस पर बैठ कर
सुबह का इन्तजार कर रहा था वह
ताकि घर को
फिर अच्छी तरह टटोलकर
सहेजा जा सके.
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(२)
सपने
सपने हैं कि पीछा नहीं छोड़ते
हर रोज अजीबोगरीब सपनों का
सहारा लेकर
अनगिनत सीढ़ियों को घुटनों के
बल
विजीत करने की कोशिश करता
है वह,
यह व्यक्ति की फितरत हो सकती है
जो,उसे आकाश में भी सीढ़ियों का
दर्शन करा देती है.
सीढ़ियों पर खड़ा व्यक्ति
अपने से नीचे खड़े व्यक्ति को
उसके शास्त्र से जूझने को कहता है.
एक सीढ़ी, दो सीढ़ी पहाड़ तो नहीं
बन पाती है.
हाँ उसके व्याख्यायित आख्यानों का
विस्तार जरूर होती है.
उसी विस्तार को छूने के लिए
वह भी सपनों को विस्तार देता है
और घुटनों में ताकत देता हुआ
अपने अन्दर ही
छू लेता है उन सपनों को.
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exploring adventure
अब तक निम्नलिखित कृतियां प्रकाशित :
*फुनगियों पर लटका एहसास अंधेरे के ख़िलाफ (कविता संग्रह) दूसरी मात (कहानी संग्रह) कथा दर्पण (संपादित कहानी संकलन) सतरंगे गीत चूहे का संकट (बाल-गीत संग्रह) नटखट टीपू (बाल कहानी संग्रह). *लगभग सभी राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित.
* 'साहित्य दिशा' साहित्य द्वैमासिक पत्रिका में मानद सलाहकार सम्पादक और 'न्यूज ब्यूरो ऑफ इण्डिया' मे मानद साहित्य सम्पादक के रूप में कार्य किया.
संपर्क : 188/GH-4,MEERA APARTMENTS,PASCHIM VIHAR,NEW DELHI
MOB NO.-09818967632